कुछ कह नहीं सकती यह कि
ह्रदय की जीत है या हार है
ये पीड़ा है मुझे बड़ी प्रिय
जो प्रेम का ही आभार है
आभार इतना कि हर भार से
अतिगत ही जैसे अछूती हूँ
अछूती-अछूती ही हरपल
प्रिय को ऐसे मैं छूती हूँ
वह अलबेला कितना अनछुआ
छू-छू कर अब मैंने जाना है
पाया-पाया सा है लगता
पर उतना ही उसे पाना है
कुछ कह नहीं सकती यह कि
पाकर भी उसे पा ही लूँगी
जो पा भी लिया उसे तो
सबसे मैं तो छिपा ही दूँगी
उस अनजाने-अनपहचाने को
अनजाने में ऐसे जान लिया है
प्रीति लगी बस उस नाम की
जो इतना मैंने नाम लिया है
अब वही नाम इक गीत बन
इन साँसों से बस टकराता रहे
और उखड़ी-उखड़ी धड़कन को
इक विरह-धुन पकड़ाता रहे
कुछ कह नहीं सकती यह कि
यही धुन उसने भी गाया होगा
मतवाली-मतवाली फिरती देख
मुझपर उसका मन आया होगा
अभी उसे तो देखा भी नहीं है
जो मिले भी तो मैं पहचानूँ ना
बस प्रीति लगी है उस नाम की
कैसे लगी यह भी मैं जानूँ ना
बस जानने से जी भरता नहीं
जान-जान कर मैंने जाना है
वह अनजान रहे तब भी उसे
इन साँसों का अर्घ चढ़ाना है
कुछ कह नहीं सकती यह कि
ये अर्घ है या अलख प्रतिकार है
ये पीड़ा है मुझे बड़ी प्रिय
जो प्रेम का ही आभार है .