Social:

Showing posts with label श्रृंगार रस. Show all posts
Showing posts with label श्रृंगार रस. Show all posts

Thursday, May 26, 2022

किसकी आई प्यारी चीठी? ........

किसकी आई प्यारी चीठी?

उठी लालसा मीठी-मीठी

मीठा-मीठा दर्द उठा है

सुलगी है प्रीत की अँगीठी

किसकी आई प्यारी चीठी?


बहका फिर से तन और मन

मचला फिर से ये नव यौवन

उखड़ी ऐसी चढ़ती उमरिया

कहती बात काठ-सी कठेठी

किसकी आई प्यारी चीठी?


जब नैन लड़े तो कैसी लाज

चाहे गिर जाए कोई भी गाज

प्रीत ज्वाल धधक-धधक कर

भसम करे उमर की अमेठी

किसकी आई प्यारी चीठी?


जैसे सोलहवाँ साल लगा है

अकारथ सब मनोरथ जगा है

उँगलियाँ अनामिका से ही पूछे

किस अनामा का है ये अँगूठी?

किसकी आई प्यारी चीठी?


जबसे ऐसी-वैसी बात हुई है

विरह की भी लंबी रात हुई है

मिले वो तो हो मेरा भी सबेरा

अब रह न पाऊँ यूँ ही ठूँठी

किसकी आई प्यारी चीठी?


मन क्यों माने उमर की बात

चाहे कोई कहे उसे विजात

हाँ! प्रीत हुआ है मान लिया

जो ना मानूँ तो हो जाऊँ झूठी

किसकी आई प्यारी चीठी?


अब कोई दे कान कनेठी

या कह दे ये है मेरी हेठी

पर दर्द भी है कितना मीठा

लालसा भी है बड़ी मीठी

किसकी आई प्यारी चीठी?

Saturday, March 19, 2022

अभी तो नशे में चूर हूँ ........

फागुनी मदिरा पीकर

अभी तो नशे में चूर हूँ

कोई टोकना न मुझे 

गरूर में कुछ ज्यादा ही मगरूर हूँ

अभी तो नशे में चूर हूँ


रंगों की रिमझिम फुहार होकर

मधुबन का मधुर उपहार होकर

वन-उपवन में केसर-चंदन घोल

उड़ती-फिरती रास-बहार होकर

सबको जवानी का सिंगार करके

डोल रही हूँ जगती खुमार होकर

हास-फुल्लोल्लास का गुलाल बन मैं

बहुत ही प्यारी, बसीली, मीठी 

बिखरी-बिखरी मोतीचूर हूँ

कोई ठोकना न मुझे

अभी तो नशे में चूर हूँ


देखो आँख मेरी है रसीली

और बात मेरी है कितनी हँसीली

आओ, फैला बाँहें सबको बुलाती हूँ 

मुझसे अहक कर ही पास जो आता है

फिर बहक कर भी कभी न दूर जाता है

सच में मैं हो गई हूँ इतनी ही लसीली

कि बोल-बोल है मेरा आमंत्रण

कि खोल-खोल सब बसंती अवगुंठन

मैं ही तो हर्ष हूँ, मोद हूँ, सूर हूँ

कोई बिलोकना न मुझे

अभी तो नशे में चूर हूँ


अक्षर-अक्षर न डोला तो कैसा नशा?

शब्द-शब्द जो न हो बड़बोला तो कैसा नशा?

भाव-भाव गर न खाए हिचकोला तो कैसा नशा?

सब ढंग-बेढंग न हो तो कैसा नशा?

सब रंग-भंग न हुआ तो कैसा नशा?

सब चाल-बेचाल न हुआ तो कैसा नशा?

सब ताल-बेताल न हुआ तो कैसा नशा?

अंगूरी मदिरा भी न होती है ऐसी मादक

मैं कुछ और ही छक कर चकचूर हूँ

कोई रोकना न मुझे

अभी तो नशे में चूर हूँ


फागुनी मदिरा पीकर

अभी तो नशे में चूर हूँ

कोई मोकना न मुझे

सुरूर में कुछ ज्यादा ही मशहूर हूँ

अभी तो नशे में चूर हूँ।

*** समस्त नशेड़ियों को मतियाया हुआ शुभकामना ***

Thursday, February 3, 2022

कल्पवासी बसंत........

हमारी निजन निजता से नि:सृत

प्रीछित प्रीत की गाथाएँ हैं विस्तृत

उसे अब अनकहा ही मत रहने दो

यदि तुम कहो तो वो हो जाए अमृत


कह दो कि इन्द्रियों पर वश नहीं चलता

कह दो कि संयम ऐसे अधीर हो उठता

है बारहों मास तन-मन का रुत बसंती

मदमाया प्राण रह-रह कर है मचलता


कह दो हर क्षण बिना रंग का खेले होली 

क्ह दो बिना भांग के ही बहकती है बोली 

जो कहा न जाए वो सब भी कहलवाना

कहो कि कैसी होती है प्रीत की ठिठोली 


कह दो कि मुझको आलिंगन में भर कर

कह दो कि मुझको चुंबनों से जकड़ कर

औचक ही चेतना भी क्यों चौंक जाती है ?

क्यों सुप्त चंचलता आ जाती है उभर कर ?


कैसे कल्प प्रयाग में हुआ है अनोखा संगम ?

कहो कैसे स्खलन हो गया कालजयी स्तंभन ?

कह भी दो कि प्रेम-यज्ञ में ही आहुत होकर

कैसे प्रेमिक कल्पवास को किया हृदयंगम ?


कह दो कि कौन करे अब किसी और की पूजा

कहो कैसे मुझमें डूबे कि अब रहा न कोई दूजा

वरदाई अभिगमन के भेद भरे सब राज खोलो

कह दो कि हमने जो जिया कितना है अदूजा


अब तो इन अधरों पर धर ही दो अधरों को

कहीं सब कह कर के कँपा न दे धराधरों को

क्या प्रीत की गरिमा इतनी होती है श्लाघी ?

या चुहल में यूँ ही चसकाती है सुधाधरों को ?


क्या हम पर प्रेम-भंग का असर हुआ है ?

या अभिसारी बसंत ही अभिसर हुआ है ?

या इस माघ-फागुनी प्रेमिक कल्पवास में

उधरा-उधरा कर परिमल ही प्रसर हुआ है ?


कह दो वो अनकहा ही कण-कण खिला है

कहो खुला देहबंध तो प्रेम-समाधि मिला है

जो तुम न कह पाओ तो श्वास-श्वास कहेगा

कि कल्पवासी बसंत कैसे बूँद-बूँद पिघला है .


Saturday, September 11, 2021

वो प्रेम ही क्या ........

वो प्रेम ही क्या

जो कहीं के ईंट को

कहीं के रोड़े से मिलाकर

भानुमती का कुनबा जोड़वाए

और उन्हें कोल्हू पर लगातार

तेरे-मेरे का फेरा लगवाकर

दिन-रात महाभारत करवाए


वो प्रेम ही क्या

जो दूसरों के मनोरंजन के लिए

खेल वाला गुड्डा-गुड्डी बनकर

सबको खुश कर जाए

फिर अपने बीच होते

पारंपरिक खटरागी खटर-पटर से

सबों को मिर्च-मसाला दे कर

खूब तालियां बजवाए


वो प्रेम ही क्या

जो जरा-सा ज्वलनक वाले

फुसफुसिया पटाकों की तरह

झट जले पट बुझ जाए

और उसके शोर को भी कोई

कानों-कान सुन न पाए

फिर भरी-पूरी रोशनी में भी

कालिख पोत बस अंधेरा ही फैलाए


वो प्रेम ही क्या

जो उबाऊ-सी घिसी-पिटी

दैनिक दिनचर्या की तरह

अति सरल-सुलभ हो कर

सुख-सुविधा भोगी हो जाए

और बात दर बात पर

अहं कटारी ले एक-दूसरे का

आजीवन प्रतिद्वंद्वी बन जाए


वो प्रेम ही क्या

जो पहले से निर्धारित सुलह के 

परिपाटी पर पूरा का पूरा खरा उतरे

पर जिसमें कोई भी रोमांच न हो

या न हो सैकड़ों-हजारों झन्नाटेदार झंझटें

और जो जान-जहान का रिस्क न लेकर

उठाये न लाखों-करोड़ों खतरे


वो प्रेम ही क्या

जिसको भली-भांति 

ये न पता हो कि

बस कुछ पल का ही मिलना है

और बहुत दूर हो जाना है

फिर मिलने की तड़प लिए

हर पल तड़फड़ाना है


वो प्रेम ही क्या

जिसपर दुनिया एक-से-एक

मजेदार मनगढ़ंत कहानियाँ

बना-बनाकर न हँसे

और एक सुर मिलाते हुए

सही-गलत की कसौटी पर

खूब बाँच-बाँच कर न कसे


वो प्रेम ही क्या

जो आह भरा-भरा कर

सबके सीने पर

जलन का साँप न लोटवाए

काश! उन्हें भी कभी

कोई ऐसा प्रेम मिल पाता

ये सोचवा-सोचवा कर

प्रेम हलाहल न घोटवाए


वो प्रेम ही क्या

जो दहकता अंगार बना कर

हर पल प्रेम दवानल में

बिना सोचे-समझे न कुदवाए

और अल्हड़ अक्खड़ता से

दोधारी तलवार पर चलवाकर

खुशी-खुशी शीश न कटवाए


वो प्रेम ही क्या

जो युगों-युगों तक

साँसों का सुगंध बन

सबके नथुनों को न फड़काए

और जीवित मुर्दों के साथ-साथ

लकीरों के फ़कीरों में भी

भड़भड़ करवा कर न भड़काए


वो प्रेम ही क्या

जो शब्दातीत होकर

शाश्वत न हो जाए

शायद इसीलिए तो

रुक्मिणी के शैलीगत प्रेम पर

राधा का शहद लुटाता प्रेम 

सदा के लिए भारी पड़ जाए .

Wednesday, August 25, 2021

खीझ-खीझ रह गई रतिप्रीता ............

अबकी सावन भी 

सीझ-सीझ कर बीता

खीझ-खीझ 

रह गई रतिप्रीता


बैरी बालम को 

अब वो कैसे रिझाए

किस विधि अपने 

बिधना को समझाए

अपने बिगड़े बिछुरंता से

ब्यथित बिछिप्त हो हारी

बिख से बिंध-बिंध कर

मुआ बिछुड़न बिछनाग जीता

खीझ-खीझ 

रह गई रतिप्रीता


दिन तो यौवन का

याचनक राग गवाए

नित सूनी सर्पिनी सेज पर 

रो-रो प्रीतरोगिनी रजनी बिताए

अँसुवन संग आस 

बिरझ-बिरझ कर रीता

ओह ! मिलन मास में भी

मुरझ-मुरझ मुरझाए मधुमीता

खीझ-खीझ 

रह गई रतिप्रीता


धधक-धधक कर

ध्वंसी धड़कन धमकावे

धमनियों में रक्त

धम गजर कर थम-थम जावे

न जाने न आवे किस कारन

तन मन प्राण पिरीता

आखिर क्यों बैरी बालम हुआ 

बिन बात के ही विपरीता

खीझ-खीझ

रह गई रतिप्रीता


अंग-अंग को

लख-लख काँटा लहकावे

लहर-लहर कर 

प्रीतज्वर ज्वारभाटा बन जावे

रह-रह मुख पर हिमजल मारे

तब भी होवे हर पल अनचीता

धत् ! अभंगा दुख अब सहा न जाए

कब तक ऐसे ही कुंवारी रहे परिनीता

खीझ-खीझ 

रह गई रतिप्रीता


फुसक-फुसक कर

चुगलखोर भादो भड़कावे

ठुसक-ठुसक कर

बाबला मन धसमसकाए

कासे कहे कि

अरिझ-अरिझ हर धमक बितीता

हाय रे ! सब तीते पर

झींझ-झींझ हिय रह गया अतीता

खीझ-खीझ

रह गई रतिप्रीता


अबकी सावन भी 

सीझ-सीझ कर बीता

खीझ-खीझ

रह गई रतिप्रीता .

Wednesday, July 28, 2021

रूठी रहूंगी सावन से ......

तुम्हारे आने तक 
रूठी रहूंगी सावन से

हिय रुत मनभावन से
बूंदों के सरस अमिरस गावन से
अगत्ती अगन लगाने वाला 
छिन-छिन काया कटावन से
नव यौवनक उठावन से
कनि-कनि कनेरिया उमगावन से
ऐसे में मुझ परकटी को छोड़ कर
पीड़क परदेशी तेरे जावन से
तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से

घिर-घिर आएंगी कारी बदरिया
बन कर तेरी बहुरूपिनी खबरिया
कभी गरज कर, कभी अरज कर
कभी चमका कर बिजई बिजुरिया
बरस-बरस कर मुझे मनावेंगी
पर मुझपर न चलेगा
कोई भी तेरा जोर जबरिया
न मानूंगी किसी भी लुभावन से
तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से

ढोल, मंजीरों पर थाप पड़ेंगी
मृदंग संग झांझे झमकेंगी
घुंघरू पायल की रुनझुन में
सब सखियन संग झूलुआ झूलेंगी
सबके हाथों सजन के लिए मेंहदी रचेंगी
और हरी-भरी चूड़ियां खन-खन खनकेंगी
पर मुझ बिरहिन, बैरागिन को
बिरती है सब सिंगार सजावन से
तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से

कली-कली चहक कर चिढ़ाती
अकड़ कर डाली-डाली अँगड़ाती
फूल-फूल कंटक-सा चुभता
क्यारी-क्यारी यों कुबानी सुनाती
जलहीन मीन सी अँखियां अँसुवाती
और उर अंतर चिंता ज्वाल से धुँधुवाती
हाय! बड़ा बेधक है ये बिलगना
पर क्या हो अब पछतावन से
तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से

पंथ है बड़ा कठिन ज्यों जानती
परदेशी तुमको बस पाहुन ही मानती
हर रुत परझर सा है लगता
तुम्हें हिरदेशी बना मैं ऐसे न कानती
और तेरी जोगनिया बन हठजोग न ठानती 
तब अंधराग तज सावन का संदेसा पहचानती
तन-मन से हरियाती, झुमरी-कजरी गाती
बस एक तेरे आवन से
तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से

तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से .

***सुस्वागतम्***

Friday, March 26, 2021

फागुन की रातें हैं ........

ललछौंहाँ लगन लगी है , उकसौंहाँ बातें हैं

पर कुछ कहते हुए अधर क्यों थरथराते है ?

फागुन की रातें हैं


यह किस बेबुझ-सा गान पर थिरक रहा मन ?

भ्रमरावलियों बीच कौन है वो अछूता सुमन ?

जो छू कर बेसुध स्वरों में रागों को है जगाता 

उसकी छुअन से सारे फूल भी खिल जाते हैं

फागुन की रातें हैं


अपने मधु-गंध से ही साँसों को महकाने वाला

अहम् रूप को भी पिघला कर पी जाने वाला

कमनीय कामनाओं को है जगाकर उकसाता 

पर बड़ी मीठी कटारी-सी ही उसकी ये घातें हैं

फागुन की रातें हैं


हवाओं की बाँहें फैला कर वो ऐसे बुलाता है

न चाहते हुए भी मन उसी ओर खींच जाता है

रंगरलियों की ये गलियां , बहार और मधुमास

अजब अनोखा भास में उलझाकर ललचाते हैं

फागुन की रातें हैं


उसकी निखरी निराली छवि कितनी न्यारी है

तरल-चपल सी गतिविधियां भी सबसे प्यारी है

उसके आगे संसार का सब रंग-रूप है फीका

उसको प्रतिपल अर्पित मृदु नेह मन को भाते हैं

फागुन की रातें हैं


जैसे शाश्वत वर सज-संवर कर उतर आता है

सप्तपदी पर अनगिन-सा भाँवर पड़ जाता है

और षोडशी षोडश-श्रृंगार करके है लजाती 

दोनों आलिंगित हो श्वासोच्छवास मिलाते हैं

फागुन की रातें हैं


लचकौंहाँ लगन लगी है, उलझौंहाँ बातें हैं

पर कुछ कहते हुए अधर क्यों थरथराते हैं ?

फागुन की रातें हैं . 

    

            *** होली की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

*** फगुनाये आनन्द से उन्मत्त जनों को हार्दिक आभार ***

Sunday, March 21, 2021

मन हुआ विहंग ....

उड़-उड़ बैठना 

बैठ-बैठ पैठना

पैठ-पैठ ऐंठना

ऐंठ-ऐंठ ईठना


अमृत-सी तरंग 

रोम-रोम उमंग

फड़के अंग-अंग

मन हुआ विहंग


वश-अवश कल्पना

तिक्त-मृदु जल्पना

बंध-निर्बंध कप्पना

सीम-असीम मप्पना


विकस रही कला

राग रंग चला

भव फूला-फला

लगे जीवन भला


मद मत दर्पना

नित निज अर्पना

सोई सर्व समर्पना

रीत-रीत सतर्पना

*** विश्व कविता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

   *** कविता के रसिकों को हार्दिक आभार ***

Monday, February 22, 2021

रति और पार्वती संवाद ......

रति की मूर्च्छा टूटी तो एक तरफ गूंज रही थी देववाणी की छलना

दूसरी तरफ उसकी उत्कट वेदना का सूझ रहा था कोई भी हल ना

व्याघातक दुर्भाग्य दंड से हत , गलित , व्यथित , शोकाकुल रति को

झुला रहा था विकट , विकराल , विभत्स , विध्वंसक मायावी पलना


तत्क्षण ही वह निज प्राण को तज दे या कि वह चिर प्रतीक्षा करे

या हृदय में अभी देवों और ॠतुपति के द्वारा दिए कल्प शिक्षा धरे

या कि उसके अंगस्वामी कामदेव जब तक पूर्ण सुअंग को न पाए

तब तक वह पतिव्रता निज अंग को पति के लिए क्यों न रक्षा करे


अकस्मात क्षीण-सी स्मृति भी कौंध आई माँ-पिता और बहन की

शापवश ही सही पर हश्र का कारण तो हुए है जो उसके मदन की

निश्चय किया कि जाकर पूछूं कि क्यों अकेले यहाँ मुझे वे छोड़ गए

क्रोधबल को पा उसकी बलवती हुई संचित क्षमता संताप सहन की


मदन-दहन सुन कर शैलराज हिमालय क्योंकर दौड़े-दौड़े आए थे

पिनाकपाणि के भय से भयभीत सुता की दशा देख के घबराये थे

क्या मेरी सुधि तनिक भी न आई कि मैं भी तो उनकी ही जाया हूँ

क्या निज अभिलाष को टूटा हुआ देखकर मन ही मन वे घबराये थे


मेरी आंखों के सामने ही उस एक क्षण में ही ये कैसा अनर्थ हो गया

गौरा की काया का पुलक पूर्ण अवयवों का विक्षेप भी व्यर्थ हो गया

पर यदि शूलपाणि का ही चित्त चंचल नहीं होता तो मैं भी मान लेती 

कि पुरुषार्थ के समक्ष मूल्यविहीन , आकर्षणविहीन स्त्र्यर्थ हो गया


सृष्टि साक्षी है कि जितेंद्रियों का भी वश नहीं चला है स्त्रियों के आगे

तीनों लोक डोल जाता है जब स्त्रियों का सुप्त पड़ा अहंकार जो जागे

पार्वती के दृढ़ संकल्प , विश्वास और निश्चय को कौन नहीं है जानता

भूतनाथ अपने भूतों और गणों के संग जब तक भागना चाहें तो भागे


यदि लज्जा वश , संकोच वश स्त्रियां खुल कर कुछ नहीं कह पाती हैं

तो उसे निर्बल , असहाय , निरुपाय कह-कहकर ही जगती बुलाती है

क्यों पुरुषत्व को भी स्त्रीत्व के ही शरण में पुनः-पुन: आना पड़ता है 

तब तो समर्पित स्त्रीत्व अपना होना भी त्याग कर सृष्टि आगे बढ़ाती है


ये सोचकर अपने कंधों पर अपना ही क्षत-विक्षत हुआ शव को ढोकर

थरथराते-लड़खराते , गिरते-पड़ते मग से पग-पग पर खाते हुए ठोकर

पथराई-सी आंखों में अविश्वसनीय-सा उस दारूण दृश्य को लिए हुए

चल पड़ी विह्वल रति विंध नव वैधव्य के व्यसनार्त में मूर्छित हो-होकर


उस क्षण दिनकर के रहते ही चहुंओर घिर आया था घोर तम का बसेरा

ह:! ह:! विलाप ! उसके सम्मुख ही कैसे डूब गया था उसका ही सबेरा

रह-रह कर उभरता त्रिपुरान्तकारी त्रिलोचन का वो क्रुद्ध कोपानल ही

उसके हर डग पर द्रुत बिजली की भांति ही जैसे कर रहा था उग्र उजेरा


चलो माना !  इस सृष्टि की रक्षा हेतु निमित्त हुआ पंचपुष्प शर सन्धानी

दैवीय प्रपंच के कुटिल व्यूह में फंस मेरा मनोज हुआ आत्म बलिदानी

पर अंतिम श्वास तक मेरा साथ निभाने का मुझको अटूट वचन देकर 

हाय ! हाय ! हाय ! क्यों मेरे इस करुण दुःख से वही ऐसे हुआ अज्ञानी


मेरी आर्त हृदय की ऐसी चित्कार से निष्ठुर परमात्मा भी क्यों नहीं पसीजे

क्षमा करो अब आ भी जाओ , मुझे छोड़कर कहाँ चले गए मेरे मनसिजे 

मेरी न सुनो न सही पर अपने सखा को सोचो कि बिन तुम्हारे क्या होगा

हे मन्मथ ! अभिमान रूप ॠतुराज की आंखें भी वर्षाकाल के जैसे भीजे


मेरे मनोभव ! दुःख है तेरे संग संसार का सुख के उद्गम का नाश हो गया

कल जो तुमने कुसुम शय्या सजाया था आज शोक-सर्प का पाश हो गया

अब तो स्मृतियों में ही तेरा दिव्य रूप दिखेगा और सब का समागम होगा

हे पंचशायक ! पापी दैव और काल के चाल में कैसा ये सत्यानाश हो गया


विदग्धा रति मायके पहुंची यूं ही अनर्गल प्रलाप और विलाप करते-करते 

झुकी हुई आंखों से शैलराज ने उसे देखा मगर भीतर-ही-भीतर डरते-डरते

मरण-शय्या पर लेटी पार्वती थी और सिराहने में माँ मैना भी बुझी बैठी थी

सबके गले लग कर बिलख उठी रति और बोली क्यों वह बच गई मरते-मरते


जो मेरे आत्मभू का सृष्टि हेतु शुभ प्रयोजन न जाने स्वयंभू वे कैसे अन्तर्यामी हैं 

काम से मुख फेर लिया किन्तु क्रोध को जो जीत न पाए तो वे भी वृत्तिगामी हैं

ब्रम्ह विधान में विघ्न डालना कोई उनसे जा के पूछे कि क्या यही है पुरुषोचित 

इतना सबकुछ होने पर भी जग उनको ही पूजेगा क्योंकि वे तो औढरदानी हैं 


जी भर सुनने के बाद गौरा बोली चाहे जो हो जाए पर प्रण मैं निभा कर रहूंगी

जिसको मैंने मन में वरण किया है अब उसी को अपना पति बना कर रहूंगी

मुझ पर आंख बंद करके भरोसा रख और जरा धीरज धर मेरी प्यारी बहना

उसी भोले-भाले त्रिलोचन के प्रसाद से ही तेरे पति को भी जिला कर रहूंगी.


Tuesday, February 16, 2021

बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया ! ...

बड़ी मुश्किल से , मैंने हवाओं से 

होड़म-होड़ करना छोड़ा था

फिरी हुई सिर लेकर , सबसे यूँ ही

बिन बात के भी , टकराना छोड़ा था

अपने बौड़मपन को , बड़े प्यार से 

समझा-बुझाकर , बहला-फुसलाकर

शांत , गूढ़ और गंभीर बनाया था

पर ये क्या ? किसने मुझे भरमा दिया ?

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


अल्हड़ , नवयौवना , रूप-गर्विता बनकर

मैं इधर-उधर , यूँ ही इतराने लगी हूँ

अपने सौंदर्य में ही केसर , कुमकुम , चंदन

घोल-घोल कर , सबपर लुटाने लगी हूँ

मेरी आंखें क्यों हो रही है नशीली ?

और बातें भी क्यों हो रही है रसीली ?

क्या मुझे मत्त मदिरा पिला , मदकी बना दिया ?

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


सुबह ने मेरे माथे को , चूम-चूम कर ऐसे जगाया

और अंगड़ाईयों से मुझे , खींच जैसे-तैसे छुड़ाया

मैं भी अलस नयनों की , बेसुध खुमारियों को

गरम-गरम चुसकियों से , जगाए जा रही थी

कि सूरज की उतावली किरणों ने हरहराकर

मुझे ही , हर कोने-कोने तक , बिखरा दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


यूँ ही टहलते हुए , झील पर , पंछियों से 

अपने को , हँसना-बोलना , सिखा रही थी

पिघलती हुई पहाड़ियों के , नरम-नरम ओंठो पर

अपनी मन बांसुरिया को , रख कर बजा रही थी

कि आप ही आप , मधुरतम मिलन का स्वर

गा-गा कर मुझे , सब दिशाओं में , गूंजा दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


फिर मैं तो , खेल-खेल में ही , ऊंगलियों को

अपने लटों से , उलझा-पुलझा रही थी

जानबूझकर उधेड़-बुन में पड़ी हुई

कुछ पहेलियों को , समझा-बुझा रही थी

कि हजारों फूलों की सुगंधि , आलिंगन में भर कर

यहाँ-वहाँ , जहाँ-तहाँ , मुझे ही बिखेरकर , महका दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


दौड़ते-भागते , गिरते-पड़ते ,  दिन को रोक कर

सोचा कि , थोड़ा आंचल का छांव दे दूँ , इसलिए

दादी-नानी वाली , बात-बात पर टोकारा से , टोक कर

कहा कि दम भर सुस्ता ले , थोड़ा पांव दबवा ले

उससे कलेऊ का  , बियालु का , आग्रह कर रही थी 

कि मुझे ही कंधे पर बिठा कर , सब छोर घुमा दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


ठिठोली में ही , साँझ की बड़री कजरारी , आंखों को 

करपचिया काजलिया से , आंज कर मैं सजा रही थी

झीनी-झीनी बदरिया की भी , भोली-भाली अलकों को

रोल-रोल कर , मुकुलित मुखड़े पर , छितरा रही थी

कि अचानक चारों ओर , शत-शत दीप जल गये

मुझे ही उजालों से भरकर , सारे जग में जगमगा दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


मैं तो बड़ी मीठी , कुनकुनी , अपनी ही नींद को

हाथों के हिंडोले में , हिला कर सुला रही थी 

किसी उस अनजाने को भी , सपनों में बुला रही थी 

कि रात ने आकर , बड़े प्यार से , ऐसे जगाया और

मुझे ही अपनी गोद में उठा , बाहर ले जाकर 

चांद-तारों के , अछूते सौंदर्य से , पूरा नहला दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


अब मेरे बचाव में , बसंत को ही , कुछ कहना पड़ेगा

सारे करतबी करतूतों का , भंडाफोड़ भी , करना पड़ेगा

कि बड़ी मुश्किल से , कैसे अपने को , संभाले हुई थी

और रटा-रटा कर , शालीनता का पाठ , पढ़ाए हुई थी

मैं इतना ही कह सकती हूँ , इसमें मेरा कोई दोष नहीं है

सच में ! किसी ने मुझपर , काला जादू चलवा दिया

या शायद बसंत ने ही मुझे फिर से बहका दिया ! 

*** बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

Friday, February 5, 2021

प्रेम कलह के इस रुत में ........

प्रेम कलह के इस रुत में

मधुर , तिक्त , अगन अहुत में

नियति ने ही जलाया है तो

मेरे प्यारे परदेशी पिया !

भलमानसता से , नेम निष्ठा से

मिलन रुत आने तक

निजदेशी हो , परदेश ही रहना 

हाँ ! वर्णज्वर मैं सहती हूँ 

वर्णज्वर तुम भी सहना !


आते भी तो , दीर्घ कचोट कलह से

जानी-बूझी , सोची-समझी , अलह से

तुमसे न बोलती-बतियाती

अनदेखा कर के , सारा प्रणय उपक्रम

भीतर ही रिझती , सिझती और तुम्हें खीझाती

पर न तुम्हारा , कोई पुचकारी पतियाती


मुँह फुलाये , भौं चढ़ाए , लट बिखराये

सोई रहती , उस ऊँची अटारी 

और तुम , लाख मान-मनौव्वल , करके न थकते

किंतु ! मैं कल कलही , रार ठानकर

प्रेम मिलन के , उस रुत में भी , खोलती नहीं 

अपने रंग महल का , कोई किवाड़ी


प्रेम कलह के इस रुत में

पल-पल , कलकल , लगन आयुत में

हास-उपहास , राग-उपराग हुआ है

कल्प कलेवरों का , खेल-खिलौना

जैसे कनखी ही कनखी में 

हो रहा हो , कोई नेही टोटका-टोना

या चहुंओर एक-दूजे का , हो खुला आमंत्रण

या मोहन-सम्मोहन का , हो जंतर-मंतर 

या कि कर गया हो कोई , विवश-सा वशीकरण


मुझ पर भी , छाया भरम या कि खुमारी है

या कि बहकी-बहकी बातें , मेरी लाचारी है

जबसे पिया तुम परदेशी हुए 

तबसे क्यों लगता है मुझको ?

कि नित प्रात से , लड़ती रहती रात है

हो न हो , कहीं मेरी ही कोई बात हो

तब तो पपीहों का , यूँ बदला-सा गान है 

चिड़ियों की चहचहाहट भी , मेरे उलाहनों का तान है 


संभवतः प्रेम कलह से ही , आकाश से अवनी भी है रूठी

क्यों प्रेम और विरह की , हर कथा है अनूठी

पर परदेशी पिया !  तुम भी हो अनूठे , पर हो झूठे

क्या जानूं कि ,  मैं हूँ रूठी , या कि तुम हो रूठे

जो भी हो , बस समझो , जो हृदय की बात है 

इस रुत पर , बड़ा भारी , विरही आघात है 


प्रेम कलह के इस रुत में

हर पल रहती हूँ ,  तेरे ही युत में

तुमसे मैं भी लड़ती , मन ही मन में

क्या कहूँ ? तेरे बिना , कुछ नहीं है जीवन में

मेरे प्राणप्यारे परदेशी पिया !

जितनी जल्दी हो सके , तुम आना

अपनी सौं , कोई कलह न करूं मैं तुमसे

बस ,  मिलन रुत संग लिए आना . 

Sunday, January 31, 2021

बसंत आने का लक्षण है ? .......

पात-पात फुदकन 

गात-गात मुदकन 


हर शोक का हरण है

बसंत आने का लक्षण है ?


बिखरी-बिखरी कस्तूरी

निखरी-निखरी अंकूरी


रस-रूप का उपकरण है

बसंत आने का लक्षण है ?


देहरी-देहरी सिंदुरी

रेहरी-रेहरी अबीरी


उल्लास का उच्चरण है

बसंत आने का लक्षण है ? 


सिकुड़ी-सकुड़ी साँसें

उखड़ी-उखड़ी टाँसें


बड़ा मीठा-सा मरण है

बसंत आने का लक्षण है ?


अंग-अंग गदरीला

संग-संग सुरभीला


बावले युगलकों का वरण है

बसंत आने का लक्षण है ?


ताल-ताल थिरकन

चाल-चाल बहकन


विगत का विस्मरण है

बसंत आने का लक्षण है ?


राग-राग मल्हार

फाग-फाग विहार


पुलक का प्रस्फुरण है

बसंत आने का लक्षण है ? 

Thursday, January 14, 2021

पुनः प्रथम मिलन ..........

 इस शीत ॠतु में भी , स्वेद-कण ऐसे चमक रहे हैं

हृदय से ह्लादित होकर , रोम-रोम जैसे दमक रहे हैं

यह अद्भुत संयोग भी हो रहा है , हमारा ही आभारी 

और हमारी सुगंध से , गहक कर कैसे गमक रहे हैं


कैसे आवेशित हो गया ,  इस जगती का कण-कण

जैसे प्रचंड कंपन से ,  डोल गया हो यह धरती-गगन

साक्षी होकर सृष्टि भी ,  अचंभित हो गई होगी ऐसे

जैसे शिव-शक्ति का ही , हुआ हो पुनः प्रथम मिलन


अब आत्मस्मरण ओढ़ रहा है , क्षीणता का आवरण

तरंग हीन हो कर , कहीं और अंतर्धान हुआ यह मन 

विश्रांति की इस बेला में , वज्र नींद आकर कह रही 

संयोग श्रम से ही श्लथ हुआ है ,  तेरा तंद्रित यह तन


अब तो एक तरफ है , पलकों पर , नींद की प्रबलता

और दूसरी तरफ है , तुम्हारे इन हाथों की कोमलता

जो तुम ऐसे सहला-सहला कर , मुझे यूँ सुला रहे हो 

तो अधरों को भी रोको न , अब इतना क्यों है चूमता


माथे , आँखों , गालों , अधरों पर ,  तेरा स्मित चुंबन

इन लटों में , फिरती हुई सी उंगलियों की ये थिरकन

वो बैठी नींद भी आँखें खोलकर , देख रही है हमें ही

और मुस्कुराये जा रही है , पोरों की मीठी-सी थकन


छोड़ो भी , अब झूठ-मूठ का मुझे , यूँ ही न सहलाओ

बाहों में छुप कर सोने दो मुझे , औ' तुम भी सो जाओ

सरस , सम्मोहक सपने भी , सज-संवर कर आने को

प्रतीक्षारत हैं , उनका भी नींद से मधुर मिलन कराओ


हा! तुम्हें ऐसे लय लोरी गाने को , अब कौन बोल रहा है

जैसे उत् शीतलता में , कोई उष्ण मादकता घोल रहा है

ये चुंबन और ये सहलाना , ऊपर से ये उन्मुग्ध लोरी गाना

अठखेलियां तो कह रही है , तुम्हारा मन फिर डोल रहा है


मुझे सुला रहे हो , या सच-सच कहो कि सुलगा रहे हो

चंदन-सा तन हुआ है , फिर से क्यों अगन लगा रहे हो

अगन जब लग जाएगी तो , आहुत तुम्हें ही होना होगा

क्यों अनंगीवती को फिर से छेड़ ,  तुम ऐसे जगा रहे हो


अनंगीवती जो जागेगी तो , फिर उसे सुला न पाओगे

सब जान-बूझकर भी , अनंगदेव को फिर से हराओगे

जानती हूँ , हमसे हार के भी तुम्हें सत् सुख मिलता है 

पर इस तरह जीताकर , मुझे दुष्पुर दुख ही पहुँचाओगे


ये निंदासी निशी भी , अब कुहरे से लिपट कर सो रही है

शनै: शनै: आनाकानी , मनमानी की अनुगामी हो रही है

पुनः ये पुण्यतम क्षण , निछावर हो रहा है चरणों पर तेरे

औ' सौंदर्य लहरियां संयोगक्रीड़ा में घुल-घुल कर खो रही है .


Monday, December 28, 2020

तुम्हें बाँहों में भर लेंगी स्मृतियाँ हमारी .......

जब आंँखें अंधकार से भर जाएंगी

दृष्टि स्वयं में ही असहाय हो जाएंगी

प्रतिमित प्रतिमाएं सारी खंडित हो जाएंगी

असह्य हो जाए जब वेदना तुम्हारी

तुम्हें बाँहों में भर लेंगी स्मृतियांँ हमारी


जब चूकना ही चूकना सहज क्रम हो जाए

प्रति फलित परिष्कृति बरबस भ्रम हो जाए

अकल्पित संघर्षों में क्षुद्रतम सारा श्रम हो जाए

दुष्कल्पनाएं , शंकाएं जब सहचरी हो तुम्हारी

तुम्हें बाँहों में भर लेंगी स्मृतियाँ हमारी


जब अनजानी , अपरिचित सब राहें होंगी

विवशता की अचरज से भरी आहें होंगी

अति यत्न से सिंचित , संचित दम तोड़ती चाहें होंगी

निरपवर्त नियति हो जब परवश पराजय तुम्हारी

तुम्हें बाँहों में भर लेंगी स्मृतियाँ हमारी


जब शांति का आगार सब अंगार हो जाए

सारा मधुकलश ही विष का सार हो जाए

क्लेश , शोक हर उत्सव का प्रतिकार हो जाए

संकुचित , व्यथित विचलन हो जब डगर तुम्हारी

तुम्हें बाँहों में भर लेंगी स्मृतियाँ हमारी


उन स्मृतियों में मेरी संतृप्ति का स्नेहिल स्पर्श होगा

तुम्हारे अस्तित्व को मुझ तक खींचता , प्रबल आकर्ष होगा

सोखती हूँ समूचा तुम्हें मैं , सोचकर भी अपार हर्ष होगा

सह्य हो जाएंगी तब वेदना तुम्हारी

तुम्हें बाँहों में भर लेंगी स्मृतियाँ हमारी .


Tuesday, December 22, 2020

जोबन ज्वार ले के आउँगी ........

फिर से सांँझ हो रही है कहांँ हो मेरे हरकारे

कब से अब तक यूँ बैठी हूंँ मैं नदिया किनारे

फिर आज भी कहीं प्यासी ही लौट न जाऊं

तड़के उनींदे नयनों के संग फिर यहीं आऊं


थका सूरज किरणों को जैसे-तैसे समेट रहा है

धुँधलका भी जल्दी से क्षितिज को लपेट रहा है

चारों ओर एक अजीब- सी बेचैनी पिघल रही है

मेरी भी लालिमा अब तो कालिमा में ढल रही है


बगुला , बत्तख सब जा रहे अपने ठिकाने पर

शायद मछलियाँ भी चली गईं उस मुहाने पर

पंछियों ने तो नीड़ो तक यूँ मचाई होड़ाहोड़ी है 

पर मैंने अब तक लंबी- लंबी सांँसे ही छोड़ी है


ओ! बालू के बने घरों को कोई कैसे फोड़ गया है

ओ! बिखरे सारे कौड़ियों को भी ऐसे तोड़ गया है

शंख , सीपियों की उदासी और देखी नहीं जाती

तुम जो ले आते मेरा पाती तो इन्हें पढ़के सुनाती


दूर कहीं मछुआरे कुछ गीले-गीले गीत गा रहें हैं

हुकती कोयलिया से ही पीर संगीत मिला रहे हैं

जैसे तरसती खीझ तिर- तिर कर कसमसाती है

मुझसे भी टीस लहरियां आ- आकर टकराती है


पीपल का पत्ता एक बार भी न झरझराया है

मंदिर का घंटा भी अब तक नहीं घनघनाया है

अंँचल की ओट में भी दीप बुझ-बुझ जाता है

मेरे भी पलकों के तट पर कुछ छलछलाता है


लहरों पर सिहरी-सिहरी सी ये कैसी परछाईं है

मँझधारों की भी अकड़ी-तकड़ी सी अँगराई है

तरुणी- सी तरणी बिन डोले ही सकुचा रही है

पल- पल रूक कर पुरवा भी पिचपिचा रही है


उन्मन चांँद का चेहरा क्यों उतरा- उतरा सा है

बादलों का बाँकपन कुछ बिसरा-बिसरा सा है

सप्तर्षियों की चल रही कौन-सी गुप्त मंत्रणा है

उनसे भी छुपाए नहीं छुप रही ये कैसी यंत्रणा है


इसी हालत में ही मेरे हरकारे घर तो जाना होगा

स्वागत में फिर नये-नये रूपों में वही ताना होगा

कैसे तोड़ूं उसकी सौं साखी है यह नदी किनारा

यदि आस जो छोड़ूं तो आखिरी सांँस हो हमारा 


रात भर प्रीत जल-जलकर अखंड ज्योति बनेगी

इन नयनों से झर-झरकर बूंँदें मंगल मोती गढ़ेंगी

कल फिर जोबन ज्वार ले के आउँगी इसी किनारे

उस जोगिया का पाती ले जरूर आना मेरे हरकारे .


Sunday, December 13, 2020

हजारों-लाखों चुंबन है .....

 मेरे रोएं-रोएं पर तो तुम्हारा ही वो हजारों-लाखों चुंबन है 

मेरी सांस-सांस पर सुमरनी-सा कसा तेरा ही आलिंगन है 

अब कैसे बताऊं कि तुम उपहार में ही तो मिले हो हमको 

औ' हमारी नस-नस में दौड़ रहा तुम्हारा छिन-छिन संगम है 


हाँ! अब तो चौंकती भी नहीं किसी भी अनजान आहट पर 

लगाम लिए फिरती हूँ पल-पल की उस विरही घबराहट पर

न जानूं कि कैसे अपने-आप उछलती लहरें सरि तल हो गई 

हाय! चकित हूँ ,विस्मित हूँ ,बहकी हुई सी इस बदलाहट पर 

 

सारी छूटी सखियाँ सब अब मुझे, बहुत ही भाने लगी हैं 

हिल-मिल कर हिय-पिय की वो बतिया बतियाने लगी हैं

कैसे कहूं कि मेरी सारी समझ भरी भारी-भरकम बातों पे

सब मिल पेट पकड़-पकड़कर जोर-जोर से ठठाने लगी हैं 

   

 कहती- हमने तो देखा है तेरे हर एक उस पागलपन को

 जल-जल कर जल के लिए मछली की चिर तड़पन को 

 कैसे हम सब तब तनिक भी न भाती सुहाती थी तुझको

 औ' तेरी अंखियांँ तो खोजती थी बस अपने ही प्रीतम को

     

ना जाने किससे , कब और कैसे लग गई तुझे ये प्रेम अगन

सब कुछ भूल-भाल कर तू तो बस प्रीतम में हो गई मगन

पगली ! तब तू बस गली-गली ऐसे मारी-मारी फिरती थी

छोड़-छाड़ कर सब मान-मर्यादा और लोक-लाज का सरम


हम समझाती थी ऐसे मत हो बावली , कुछ तो धीरज धर

प्रीतम तेरा है तेरा ही रहेगा , तिल-तिल कर तू यूं न मर

मिथ्या बोल तब तो थे न हमारे अब जाकर तुमने जाना है

माना कि भूल थी तेरी पर तू क्षमा मांग और कान पकड़


उन्हें कैसे बताऊं कि प्रीत ने ही मुझे तो स्नेही बना दिया

तुम्हारा आँखो से ओझल हो-हो जाना संदेही बना दिया

पर अब संभोगी संगम के चुंबनों और आलिंगनों ने मुझे

रोएं-रोएं को चिर तृप्ति देकर दीपित दिव्यदेही बना दिया


कभी विदेही तो कभी सैदेही मेरा अजब-गजब सा होना है

प्रीतम को पाया तो ही पाया कि क्या पाना है क्या खोना है

प्रपंची अँखियो से अब सखियों में भी प्रीतम ही दिखता है 

उन्हें कैसे बताऊं कि अब बस हँसना है मुझे न कि रोना है .


Monday, November 30, 2020

बहिर्अंतस की उन्मत्त अमा है .......

अभी- अभी पूर्णिमा का चांद 

आकर मुझसे मिला है

अभी- अभी मेरे भी मौन अँधियारे में 

मेरा भी चांद खिला है

आज गगन में फूट रहा है कोई अमृत गागर

मेरे अंतर्गगन में भी फैल गया किरणों का सागर 

मधुमयी चांदनी ज्यों बरस रही है 

मुझसे भी मेरी ज्योति परस रही है

चकोर- चकोरी एकनिष्ठ हो छुप- छुपकर दहक रहे हैं

वहीं नीरंजन बादल कहीं- कहीं चुपचाप थिरक रहे हैं

मुखर हो रही है मन बांसुरी , शब्द- शब्द झरझरा रहे हैं

भाव- भाव अमर रस को पी- पीकर अनंत प्यास बुझा रहे हैं

सोलह कलाओं से सजी आसक्तियां निखरने लगी है

इच्छाऐं रससिक्त होकर जहां- तहां बिखरने लगी हैं

जैसे ये महत क्षण हो अपनापन खोने का

हर्षोन्माद में भींगने और भिंगोने का

जैसे शीतल सौंदर्य के सुगंध को पहली बार कोई मनुहारा हो

सारी रात सांस रोककर कोई चांद को निर्निमेष निहारा हो

जैसे अभी- अभी मिला कोई नवल वय है

लग रहा है कि मैं सबमें और सब मुझमें ही तन्मय है

बस उत्फुल्ल चांद है , उद्दीप्त चांदनी है , उद्भूत पूर्णिमा है

और अमृत में तन्मय हो रही बहिर्अंतस की उन्मत्त अमा है .

*** देव दीपावली एवं कार्तिक पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

Thursday, November 26, 2020

उग्रतर होता परिताप है ......

यह कैसी पीड़ा है

यह कैसा अनुत्ताप है

प्रिय-पाश में होकर भी 

उग्रतर होता परिताप है


जाना था मिलन ही

प्रेम इति होता है

प्रिय को पाकर भी

संताप कहां खोता है


प्रेम के आगे भी

क्या कुछ होता है

प्रिय से कैसे पूछुँ

हृदय क्यों रोता है


यदि मधुर , रस डूबी

प्रेमपगी पीड़ा होती

तो प्रिय-मिलन ही

केलि- क्रीड़ा होती


अनजाना सा कोई है

जो खींचे अपनी ओर

तब तो इस पीड़ा का 

न मिलता कोई छोर


मेरा कुछ दोष है या

शाश्र्वत अभिशाप है

प्रिय तो देव सदृश

निश्छल , निष्पाप है


पीड़ा मुझको ताके

और मैं पीड़ा को

कोई तो संबल दे

मुझ वीरा अधीरा को


अब तो प्रिय से ही

अपनी आँखें चुराती हूँ

हर क्षण उसको पी-पीकर

पीड़ा की प्यास बुझाती हूँ


बलवती होती जा रही

पीड़ा की छटपटाहट

अब तो मुक्ति का प्रभु

कुछ तो दो न आहट


आस की डोर को थामे

श्वास से तो पार पा जाऊँ

पर लगता है कि कहीं

पीड़ा से ही हार ना जाऊँ 


प्रेम लगन को मेरे प्रभु

और अधिक न लजवाओ

प्रिय को पाया , पीड़ा पायी

बस पहेली को सुलझाओ .

Wednesday, November 18, 2020

रात बीत गई तब पिया जी घर आए ........

रात बीत गई 

तब पिया जी घर आए

उनसे अब हम क्या बोले , हम क्या बतियाये

जब यौवन ज्वाला की छटपटाहट में झुलस रही थी

पिया जी के एक आहट के लिए तरस रही थी

तब पिया जी ने एक बार भी न हमें निरखा

उल्टे आँखों में भर दिया सावन की बरखा

सूनी रह गई सजी- सँवरी सेज हमारी

क्या कहूँ कि कैसे बीती हर घड़ी हमपर भारी

कितनी आस से भरकर आई थी पिया जी के द्वारे

पर जब- जब हमने चाहा, वो हुए न हमारे

अपने रूप पर स्वयं ही इठलाती , इतराती रही

प्रेम- दान पाने को अपनी मृतिका ही लजवाती रही

अब तो सूरज सिर पर नाच रहा है

दिनचर्या व्यस्तता के कथा को

बढा- चढ़ा कर बाँच रहा है

सास , ननद का वही घिसा- पिटा ताना

बूढ़े , बच्चों का हर दिन का नया- नया बहाना

देवर , भैंसुर की दिन- प्रतिदिन बढ़ती मनमानी

देवरानी , जेठानी की हर बात में रूसा- फुली , आनाकानी

दाई , नौकरों का अजब- गजब लीला

हाय ! चावल फिर से आज हो गया गीला

तेल- मसालों से बह रही है चटनी, तरकारी

सेहत को खुलेआम आँख मारे दुर्लभ , असाध्य बीमारी

फिर भी जीवन- मक्खन का रूक न रही मथाई

और सुख सपनों में ही रह गयी सारी मलाई

उधर पिया जी बैठे मुँह लटकाए , गाल फुलाये

रह- रह कर बस हमें ही जलाये , और अपनी चलाये

संझावती की इस बेला में थकान ले रही कमरतोड़ अँगराई

इसी आपाधापी में तो हमने सारी उमरिया गँवाई

बहुत पास से अब टेर दे रहा है निघट मरघट

हाय ! छूँछा का छूँछा रह गया यह जीवन- घट

अरे ! अरे ! साँझ बीत गयी, अब तक जला नहीं दिया

रात हो रही है , फिर से रूठ कर कहीं चले गए पिया . 


Friday, September 27, 2019

तो जाओ , तुम पर छोड़ा ..........

जब जाना ही है तो
विदा न लो , सीधे जाओ
हम रोये या गाये
पत्थर- सा हो जाओ
चुप रहो , कुछ नहीं सुनना
लो , प्राण खींच ले जाओ
अब हमारा ही है भाग्य निगोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा ......

छोड़ो भी , इन आहत आहों को
कस के बाहों में न भरो
असह , असहाय अँसुवन से
बह- बह के बातें न करो
सिसकी का मन जैसे सिसके
न बोलेगी कि तुम ठहरो
सब वचन भुला तुमने मुख मोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा .....

क्यों बोले थे
इस तरह से छोड़ कर
कभी तुम न जाओगे
पल -पल के उपहार को
सारी उमर लुटाओगे
सप्तपदी के सौगंधो को भी
जन्मों - जन्मों तक निभाओगे
सारा भरम तुमने ऐसे तोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा .....

जब जाना ही था तो
बिन बताए चले जाते
न ऐसे तुम भी रोते
न ही हमको रुलाते
इस विदाई बेला की पीड़ा पर
तनिक भी तो तरस खाते
हम नहीं बनते राह का रोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा ......

क्यों हमसे विदा लेकर
तुम्हें दूर जाना है
या दूर जाने का
कोई और बहाना है
जल्दी ही आओगे कह कर
बस यूँ ही फुसलाना है
चलो माना , विरह विपुल है मिलन थोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा ....

बरबस भींचोगे ओठों को
मचलेगा जब अंगारा- सा चुंबन
झुठला देना , जब दहकेगा
ज्वाला- सा अलज्ज आलिंगन
पर कैसे रोकोगे जब
रति- रस चाहेगा तन- मन
कुछ इतर ही ने है हमें जोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा ......

उड़ो , ऊँचाई पर उड़ो
अपने सारे पंख पसार कर
जग को जीत भी गये तो
यहीं आओगे स्वयं से हारकर
हमारा क्या , इन चलती साँसों के संग
रहना है बस तेरे लिए , मन मार कर
निष्ठुर , निर्दय , मिर्मम , निर्मोही , निखोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा .