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Friday, April 9, 2021

एक चोट की मन:स्थिति में .......

                               चोट लगी है, बहुत गहरी चोट लगी है । चोट किससे लगी है, कितनी लगी है,  कैसे लगी है, क्यों लगी है, कहाँ लगी है जैसे कारण गौण है ।  न तो कोई पीड़ा है न ही कोई छटपटाहट है, बस एक टीस है जो रह-रहकर बताती है कि गहरी चोट लगी है । न कोई बेचैनी है, न ही कोई तड़प और फूलों के छुअन से ही कराह उठने वाला दर्द भी मौन है । शून्यता, रिक्तता, खालीपन पूरे अस्तित्व में पसरा है । सारा क्रियाकलाप अपने लय और गति में हो रहा है पर कुछ है जो रुक गया है । कोई है जिसको कुछ हो गया है और बता नहीं पा रहा है कि उसको क्या हुआ है । 

                                     गहरे में कहीं इतना नीरव सन्नाटा है कि आती-जाती हुई साँसें विराम बिंदु पर टकराते हुए शोर कर रही है । हृदय का अनियंत्रित स्पंदन चौंका रहा है । शिराओं में रक्त-प्रवाह सर्प सदृश है । आँखें देख रही है पर पुतलियां बिंब विहीन हैं । स्पर्श संवेदनशून्य है । गंध अपने ही गुण से विमुख है । कहीं कोई हलचल नहीं है और न ही कोई विचलन है । किसी सजीव वस्तु के परिभाषा के अनुसार शरीर यंत्रवत आवश्यक कार्यों को संपादित कर रहा है । पर तंत्रिकाओं का आपसी संपर्क छिन्न-भिन्न हो गया है जैसे उनमें कभी कोई पहचान ही नहीं हो ।

                               हृदय के बीचों-बीच कहीं परमाणु विखंडन-सा कुछ हुआ है और सबकुछ टूट गया है ।  उस सबकुछ में क्या कुछ था और क्या कुछ टूटा है, कुछ पता नहीं है । बस सुलगता ताप है, दहकती चिंगारियां हैं और भस्मीभूत अवशेष हैं । उसी में कोई नग्न सत्य अपने स्वभाव में प्रकट हो गया है । उस चोट से आँखें खुली तो लगा जैसे लंबे अरसे से गहरी नींद में सोते हुए, मनोनुकूल स्वप्नों का किसी काल्पनिक पटल पर प्रक्षेपण हो रहा हो और उसी को सच माना जा रहा हो । एक ऐसा सच जो शायद कोई भयानक, सम्मोहक भ्रम या कोई भूल-भुलैया जैसा, जिससे निकलने का कोई रास्ता नहीं हो । सोने वाला भी मानो उससे कभी निकलना नहीं चाहता हो । फिर उसी गहरी नींद में अचानक से कोई बहुत जोरों की चोट देकर जगा दिया ।

                                  किंकर्तव्यविमूढ़ वर्तमान, अतीत और भविष्य को साथ लिए स्वयं ही आकस्मिक अवकाश लेकर कहीं चला गया है । इच्छाएं किसी अंधेरी गुफा में जाकर छिप गई हैं । आशाएं भय से कांप रही हैं । पारे-सी लुढकती हुई स्मृतियां किसी भी प्रतिक्रिया से इन्कार कर रही है । सारे भाव अपने वैचारिक लहरों के साथ अपनी ही तलहटी में बैठ गये हैं । जैसे कोई तथाकथित कुबेर अचानक से दिवालिया हो गया है और उसके चेहरे को भी एक झटके में ही मिटा दिया गया हो । कोई है जो तटस्थ और मूकदर्शक है । अनायास आये बवंडर से या तो वह हतप्रभ है या निर्लिप्त है । पर जो हो रहा है उसके अनुसार मन:स्थिति की गतिविधियां इतना तो बता रही है कि गहरी चोट लगी है । 

                                     बार-बार क्यों लग रहा है कि जैसे किसी बड़े-से मेले में कोई बहुत छोटा-सा बच्चा खो गया है । वह अबोध बच्चा ठीक से बोल भी नहीं पा रहा है और अपनों को खोज रहा है । किसी भी अपने के नहीं मिलने पर सबसे इशारों में ही घर पहुंचाने की जिद करते हुए लगातार रोये जा रहा है । कुछ ऐसी ही जिद में कोई है जो अब रो रहा है । शायद उसे भी अपने घर की बहुत याद आ रही है और कोई गोद में उठा कर उसे उसके घर पहुंचा दे । 

                     

Sunday, April 4, 2021

ये चिट्ठा कवि क्या कह रहा है ...

                          हर व्यक्तित्व का अपना स्वभाव, अपना संस्कार, अपना व्यवहार होता है और बहुआयामी व्यक्तित्व वो होता है जो किसी भी बौद्धिक आयामी सांचे में न बंधकर, जीवन जनित समस्त अनुभवों को स्वतंत्र रूप से आत्मसात करता है। जब कभी उसके भीतर छिपा हुआ कवि उसे आवाज देता है तो वह अपनी ही सारी सीमाओं को तोड़कर शब्दों में गढ़ देता है । वो खुद ही प्रथम पाठक के रूप में उस कविता की खोज में सतत् लगा रहता है जो उसके नितांत व्यक्तिगत प्रतिक्रिया के परिणाम स्वरूप जन्म लेती है । संभवत उस कविता में कहने वाला मौन हो जाता है और जीवन का गहरा अर्थ अपने आप प्रकट हो जाता है । जो किसी भी संकुचित दायरा को विस्तार देने के लिए कटिबद्ध होता है ।

                     लेकिन शब्द और शब्द की अन्तरात्मा का ज्ञान भी शब्दों की सीमा का अतिक्रमण नहीं कर पाते है जब अर्थ अनंत हो तो । उन अनंत अर्थों की भावनाओं में कुछ भावनाएं ऐसी भी होती है जो किसी के लिए अनायास होती है और प्रकट होकर भार मुक्त होना चाहती है । मानो वह कहना चाह रही हो कि मुझ हनुमान के तुम ही जामवंत हो और तुम न मिलते तो अपनी ही पहचान नहीं हो पाती । फिर कविता रूपी सिंधु पार करना तो असंभव ही था। यदि यह प्रकटीकरण किसी अंतर्मुखी चेतना के द्वारा हो तो शब्द और भी स्वच्छंद हो जाते हैं अपनी महत्ता स्थापित करने के लिए । फिर उन्हें संप्रेषण के लिए मनाना किसी पहाड़ पर चढ़ने के जैसा हो जाता है । पर पहाड़ चढ़े बिना भी तो कैलाश नहीं मिलता है और कैलाश के बिना आप्त शिव नहीं मिलता । 

                         वह अंतर्मुखी व्यक्तित्व अपने लेखन के यायावरी यात्रा को पलट कर देखता है तो पाता है कि जैसे वह अपने ही खदान से निकला हुआ कोई बेडौल , बेढंगा, अनगढ़-सा रंगीन पत्थर हो । जिस पर कुछ जौहरियों की नजर पड़ती है, जो बड़े प्यार से उसे छेनी और हथौड़ी थमा देते हैं और प्रेरित करते हैं कि खुद ही अपने को काटो, छांटो और तराशो । साथ में ये भी बताते हैं कि तुम हीरा हो ।  वो रंगीन पत्थर प्रेमपूर्ण प्रेरणा और संबल पाकर खुद को धार देते हुए संवारने लगता है । कालांतर में वह अपने ही निखार से चकित और विस्मित भी होता रहता है । तब उसे पता चलता है कि वह भी एक कोहिनूर हीरा है । अक्सर कुछ जौहरी जरूरत के हिसाब से खुद छेनी और हथोड़ी भी चला दिया करते हैं ताकि उस हीरा में और भी निखार आ सके ।  तब वह हीरा उन जौहरियों के आगे बस नतमस्तक होता रहता है ।

                        उस यात्रा में काव्य तत्व की तलाश में भटकने का अपना एक अलग ही रोमांच है । कल्पना के कल्पतरू पर नया प्रयोग, नयी शैली, नया जीवन संदर्भ जैसे मौलिक फूलों को उगाना भी अपने आप में रोचक है । किसी की बातें उसके मुंह से छीन लेने की इच्छा, किसी के सत्य से खुद को जोड़ लेने की लालसा, किसी की संवेदना में खुद को तपा देने की आकांक्षा परकाया गमन को अनुभव करने जैसा ही है । फिर ये कहना कि चेतना के तल पर हम एक ही तो हैं पूर्णता को पाने के जैसा ही है । उसे जब एक-एक शब्द पर सराहते हुए पढ़ा जाता है तो वह और भी विनयशील होकर अपने को नये ढंग से संस्कारित करता है । पर वह अपने मनोवेगों को अधिक मुखर नहीं होने देता है और संतुलन के साथ वाक्-संयम के तप में लीन रहता है । जिससे कुछ गलतफहमियां भी होती रहती है, कुछ नाराजगी भी होती होती रहती है और वह हाथ जोड़कर क्षमा मांगने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर पाता है । 

                        अंत में सारे दृश्य और अदृश्य सम्माननीय पाठकों को हार्दिक आभार प्रकट करते हुए ये चिट्ठा कवि कहना चाहता है कि आंतरिक इच्छा होती है कि अपने ही उन अव्यक्त भावों को शब्दों में बांध कर अंकुरित करता रहे जो स्नेह-बूंदों से पल्लवित-पुष्पित होकर सर्वग्राही होता रहे । साथ ही उत्साहित होकर अपनी ही बनाई हुई सीमाओं को लांघने के लिए उत्सुक भी है । जिसे देखना उसके लिए भी काफी दिलचस्प होगा ।

ये चिट्ठा कवि कह रहा है ...

Wednesday, March 31, 2021

सब नवाब हैं बाबू ! .......

कोई महल बेचता है तो कोई खोली

कोई बारूद बेचता है तो कोई बोली

कोई कटार बेचता है तो कोई रोली

कोई गुलाब बेचता है तो कोई गोली


सब बाजार हैं बाबू ! सब ऐयार हैं बाबू !

सब मालदार हैं बाबू ! सब खरीदार हैं बाबू !


यहाँ हर दाम पर चाम भी बिकता है

यहाँ हर चाम पर ईमान भी बिकता है

यहाँ हर ईमान पर नाम भी बिकता है

यहाँ हर नाम पर ईनाम भी बिकता है


सब चालबाज हैं बाबू ! सब दगाबाज हैं बाबू !

सब अंटीबाज हैं बाबू ! सब धोखेबाज हैं बाबू ! 


अब ये मत पूछिए कि खरा कौन है

अब ये मत पूछिए कि हरा कौन है

अब ये मत पूछिए कि भरा कौन है

अब ये मत पूछिए कि मरा कौन है


सब कसाव हैं बाबू ! सब बचाव हैं बाबू !

सब ऐराब हैं बाबू ! सब नवाब हैं बाबू ! 

Friday, March 26, 2021

फागुन की रातें हैं ........

ललछौंहाँ लगन लगी है , उकसौंहाँ बातें हैं

पर कुछ कहते हुए अधर क्यों थरथराते है ?

फागुन की रातें हैं


यह किस बेबुझ-सा गान पर थिरक रहा मन ?

भ्रमरावलियों बीच कौन है वो अछूता सुमन ?

जो छू कर बेसुध स्वरों में रागों को है जगाता 

उसकी छुअन से सारे फूल भी खिल जाते हैं

फागुन की रातें हैं


अपने मधु-गंध से ही साँसों को महकाने वाला

अहम् रूप को भी पिघला कर पी जाने वाला

कमनीय कामनाओं को है जगाकर उकसाता 

पर बड़ी मीठी कटारी-सी ही उसकी ये घातें हैं

फागुन की रातें हैं


हवाओं की बाँहें फैला कर वो ऐसे बुलाता है

न चाहते हुए भी मन उसी ओर खींच जाता है

रंगरलियों की ये गलियां , बहार और मधुमास

अजब अनोखा भास में उलझाकर ललचाते हैं

फागुन की रातें हैं


उसकी निखरी निराली छवि कितनी न्यारी है

तरल-चपल सी गतिविधियां भी सबसे प्यारी है

उसके आगे संसार का सब रंग-रूप है फीका

उसको प्रतिपल अर्पित मृदु नेह मन को भाते हैं

फागुन की रातें हैं


जैसे शाश्वत वर सज-संवर कर उतर आता है

सप्तपदी पर अनगिन-सा भाँवर पड़ जाता है

और षोडशी षोडश-श्रृंगार करके है लजाती 

दोनों आलिंगित हो श्वासोच्छवास मिलाते हैं

फागुन की रातें हैं


लचकौंहाँ लगन लगी है, उलझौंहाँ बातें हैं

पर कुछ कहते हुए अधर क्यों थरथराते हैं ?

फागुन की रातें हैं . 

    

            *** होली की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

*** फगुनाये आनन्द से उन्मत्त जनों को हार्दिक आभार ***

Sunday, March 21, 2021

मन हुआ विहंग ....

उड़-उड़ बैठना 

बैठ-बैठ पैठना

पैठ-पैठ ऐंठना

ऐंठ-ऐंठ ईठना


अमृत-सी तरंग 

रोम-रोम उमंग

फड़के अंग-अंग

मन हुआ विहंग


वश-अवश कल्पना

तिक्त-मृदु जल्पना

बंध-निर्बंध कप्पना

सीम-असीम मप्पना


विकस रही कला

राग रंग चला

भव फूला-फला

लगे जीवन भला


मद मत दर्पना

नित निज अर्पना

सोई सर्व समर्पना

रीत-रीत सतर्पना

*** विश्व कविता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

   *** कविता के रसिकों को हार्दिक आभार ***

Monday, February 22, 2021

रति और पार्वती संवाद ......

रति की मूर्च्छा टूटी तो एक तरफ गूंज रही थी देववाणी की छलना

दूसरी तरफ उसकी उत्कट वेदना का सूझ रहा था कोई भी हल ना

व्याघातक दुर्भाग्य दंड से हत , गलित , व्यथित , शोकाकुल रति को

झुला रहा था विकट , विकराल , विभत्स , विध्वंसक मायावी पलना


तत्क्षण ही वह निज प्राण को तज दे या कि वह चिर प्रतीक्षा करे

या हृदय में अभी देवों और ॠतुपति के द्वारा दिए कल्प शिक्षा धरे

या कि उसके अंगस्वामी कामदेव जब तक पूर्ण सुअंग को न पाए

तब तक वह पतिव्रता निज अंग को पति के लिए क्यों न रक्षा करे


अकस्मात क्षीण-सी स्मृति भी कौंध आई माँ-पिता और बहन की

शापवश ही सही पर हश्र का कारण तो हुए है जो उसके मदन की

निश्चय किया कि जाकर पूछूं कि क्यों अकेले यहाँ मुझे वे छोड़ गए

क्रोधबल को पा उसकी बलवती हुई संचित क्षमता संताप सहन की


मदन-दहन सुन कर शैलराज हिमालय क्योंकर दौड़े-दौड़े आए थे

पिनाकपाणि के भय से भयभीत सुता की दशा देख के घबराये थे

क्या मेरी सुधि तनिक भी न आई कि मैं भी तो उनकी ही जाया हूँ

क्या निज अभिलाष को टूटा हुआ देखकर मन ही मन वे घबराये थे


मेरी आंखों के सामने ही उस एक क्षण में ही ये कैसा अनर्थ हो गया

गौरा की काया का पुलक पूर्ण अवयवों का विक्षेप भी व्यर्थ हो गया

पर यदि शूलपाणि का ही चित्त चंचल नहीं होता तो मैं भी मान लेती 

कि पुरुषार्थ के समक्ष मूल्यविहीन , आकर्षणविहीन स्त्र्यर्थ हो गया


सृष्टि साक्षी है कि जितेंद्रियों का भी वश नहीं चला है स्त्रियों के आगे

तीनों लोक डोल जाता है जब स्त्रियों का सुप्त पड़ा अहंकार जो जागे

पार्वती के दृढ़ संकल्प , विश्वास और निश्चय को कौन नहीं है जानता

भूतनाथ अपने भूतों और गणों के संग जब तक भागना चाहें तो भागे


यदि लज्जा वश , संकोच वश स्त्रियां खुल कर कुछ नहीं कह पाती हैं

तो उसे निर्बल , असहाय , निरुपाय कह-कहकर ही जगती बुलाती है

क्यों पुरुषत्व को भी स्त्रीत्व के ही शरण में पुनः-पुन: आना पड़ता है 

तब तो समर्पित स्त्रीत्व अपना होना भी त्याग कर सृष्टि आगे बढ़ाती है


ये सोचकर अपने कंधों पर अपना ही क्षत-विक्षत हुआ शव को ढोकर

थरथराते-लड़खराते , गिरते-पड़ते मग से पग-पग पर खाते हुए ठोकर

पथराई-सी आंखों में अविश्वसनीय-सा उस दारूण दृश्य को लिए हुए

चल पड़ी विह्वल रति विंध नव वैधव्य के व्यसनार्त में मूर्छित हो-होकर


उस क्षण दिनकर के रहते ही चहुंओर घिर आया था घोर तम का बसेरा

ह:! ह:! विलाप ! उसके सम्मुख ही कैसे डूब गया था उसका ही सबेरा

रह-रह कर उभरता त्रिपुरान्तकारी त्रिलोचन का वो क्रुद्ध कोपानल ही

उसके हर डग पर द्रुत बिजली की भांति ही जैसे कर रहा था उग्र उजेरा


चलो माना !  इस सृष्टि की रक्षा हेतु निमित्त हुआ पंचपुष्प शर सन्धानी

दैवीय प्रपंच के कुटिल व्यूह में फंस मेरा मनोज हुआ आत्म बलिदानी

पर अंतिम श्वास तक मेरा साथ निभाने का मुझको अटूट वचन देकर 

हाय ! हाय ! हाय ! क्यों मेरे इस करुण दुःख से वही ऐसे हुआ अज्ञानी


मेरी आर्त हृदय की ऐसी चित्कार से निष्ठुर परमात्मा भी क्यों नहीं पसीजे

क्षमा करो अब आ भी जाओ , मुझे छोड़कर कहाँ चले गए मेरे मनसिजे 

मेरी न सुनो न सही पर अपने सखा को सोचो कि बिन तुम्हारे क्या होगा

हे मन्मथ ! अभिमान रूप ॠतुराज की आंखें भी वर्षाकाल के जैसे भीजे


मेरे मनोभव ! दुःख है तेरे संग संसार का सुख के उद्गम का नाश हो गया

कल जो तुमने कुसुम शय्या सजाया था आज शोक-सर्प का पाश हो गया

अब तो स्मृतियों में ही तेरा दिव्य रूप दिखेगा और सब का समागम होगा

हे पंचशायक ! पापी दैव और काल के चाल में कैसा ये सत्यानाश हो गया


विदग्धा रति मायके पहुंची यूं ही अनर्गल प्रलाप और विलाप करते-करते 

झुकी हुई आंखों से शैलराज ने उसे देखा मगर भीतर-ही-भीतर डरते-डरते

मरण-शय्या पर लेटी पार्वती थी और सिराहने में माँ मैना भी बुझी बैठी थी

सबके गले लग कर बिलख उठी रति और बोली क्यों वह बच गई मरते-मरते


जो मेरे आत्मभू का सृष्टि हेतु शुभ प्रयोजन न जाने स्वयंभू वे कैसे अन्तर्यामी हैं 

काम से मुख फेर लिया किन्तु क्रोध को जो जीत न पाए तो वे भी वृत्तिगामी हैं

ब्रम्ह विधान में विघ्न डालना कोई उनसे जा के पूछे कि क्या यही है पुरुषोचित 

इतना सबकुछ होने पर भी जग उनको ही पूजेगा क्योंकि वे तो औढरदानी हैं 


जी भर सुनने के बाद गौरा बोली चाहे जो हो जाए पर प्रण मैं निभा कर रहूंगी

जिसको मैंने मन में वरण किया है अब उसी को अपना पति बना कर रहूंगी

मुझ पर आंख बंद करके भरोसा रख और जरा धीरज धर मेरी प्यारी बहना

उसी भोले-भाले त्रिलोचन के प्रसाद से ही तेरे पति को भी जिला कर रहूंगी.


Tuesday, February 16, 2021

बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया ! ...

बड़ी मुश्किल से , मैंने हवाओं से 

होड़म-होड़ करना छोड़ा था

फिरी हुई सिर लेकर , सबसे यूँ ही

बिन बात के भी , टकराना छोड़ा था

अपने बौड़मपन को , बड़े प्यार से 

समझा-बुझाकर , बहला-फुसलाकर

शांत , गूढ़ और गंभीर बनाया था

पर ये क्या ? किसने मुझे भरमा दिया ?

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


अल्हड़ , नवयौवना , रूप-गर्विता बनकर

मैं इधर-उधर , यूँ ही इतराने लगी हूँ

अपने सौंदर्य में ही केसर , कुमकुम , चंदन

घोल-घोल कर , सबपर लुटाने लगी हूँ

मेरी आंखें क्यों हो रही है नशीली ?

और बातें भी क्यों हो रही है रसीली ?

क्या मुझे मत्त मदिरा पिला , मदकी बना दिया ?

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


सुबह ने मेरे माथे को , चूम-चूम कर ऐसे जगाया

और अंगड़ाईयों से मुझे , खींच जैसे-तैसे छुड़ाया

मैं भी अलस नयनों की , बेसुध खुमारियों को

गरम-गरम चुसकियों से , जगाए जा रही थी

कि सूरज की उतावली किरणों ने हरहराकर

मुझे ही , हर कोने-कोने तक , बिखरा दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


यूँ ही टहलते हुए , झील पर , पंछियों से 

अपने को , हँसना-बोलना , सिखा रही थी

पिघलती हुई पहाड़ियों के , नरम-नरम ओंठो पर

अपनी मन बांसुरिया को , रख कर बजा रही थी

कि आप ही आप , मधुरतम मिलन का स्वर

गा-गा कर मुझे , सब दिशाओं में , गूंजा दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


फिर मैं तो , खेल-खेल में ही , ऊंगलियों को

अपने लटों से , उलझा-पुलझा रही थी

जानबूझकर उधेड़-बुन में पड़ी हुई

कुछ पहेलियों को , समझा-बुझा रही थी

कि हजारों फूलों की सुगंधि , आलिंगन में भर कर

यहाँ-वहाँ , जहाँ-तहाँ , मुझे ही बिखेरकर , महका दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


दौड़ते-भागते , गिरते-पड़ते ,  दिन को रोक कर

सोचा कि , थोड़ा आंचल का छांव दे दूँ , इसलिए

दादी-नानी वाली , बात-बात पर टोकारा से , टोक कर

कहा कि दम भर सुस्ता ले , थोड़ा पांव दबवा ले

उससे कलेऊ का  , बियालु का , आग्रह कर रही थी 

कि मुझे ही कंधे पर बिठा कर , सब छोर घुमा दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


ठिठोली में ही , साँझ की बड़री कजरारी , आंखों को 

करपचिया काजलिया से , आंज कर मैं सजा रही थी

झीनी-झीनी बदरिया की भी , भोली-भाली अलकों को

रोल-रोल कर , मुकुलित मुखड़े पर , छितरा रही थी

कि अचानक चारों ओर , शत-शत दीप जल गये

मुझे ही उजालों से भरकर , सारे जग में जगमगा दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


मैं तो बड़ी मीठी , कुनकुनी , अपनी ही नींद को

हाथों के हिंडोले में , हिला कर सुला रही थी 

किसी उस अनजाने को भी , सपनों में बुला रही थी 

कि रात ने आकर , बड़े प्यार से , ऐसे जगाया और

मुझे ही अपनी गोद में उठा , बाहर ले जाकर 

चांद-तारों के , अछूते सौंदर्य से , पूरा नहला दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


अब मेरे बचाव में , बसंत को ही , कुछ कहना पड़ेगा

सारे करतबी करतूतों का , भंडाफोड़ भी , करना पड़ेगा

कि बड़ी मुश्किल से , कैसे अपने को , संभाले हुई थी

और रटा-रटा कर , शालीनता का पाठ , पढ़ाए हुई थी

मैं इतना ही कह सकती हूँ , इसमें मेरा कोई दोष नहीं है

सच में ! किसी ने मुझपर , काला जादू चलवा दिया

या शायद बसंत ने ही मुझे फिर से बहका दिया ! 

*** बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

Friday, February 12, 2021

कोई इरादा नहीं है ......

किसी की

आँखों में उंगलियाँ डालने का

कोई इरादा नहीं है

कानों पर जमें पहाड़ों को

सरकाने का भी कोई इरादा नहीं है

नाकों में उगे घने जंगलों की

छंटाई का भी कोई इरादा नहीं है

मरे हुए चमड़ों को बहते खून तक

खुरचने का भी कोई इरादा नहीं है

और लपलपाते जीभ से टपकते जहर को 

बुझाने का भी कोई इरादा नहीं है

कोई इरादा नहीं है कि 

मृतप्राय जीवाश्मों-सा

कोई भी अन्य लोलुप इन्द्रियाँ 

मुझे देखे , सुने , सूंघे या छुए

मेरी इजाजत के बगैर

क्योंकि मेरा होना , हँसना , बोलना

किसी प्रमापक पर आश्रित नहीं है

उन आश्रितों पर तो

हरगिज आश्रित नहीं है

जो खुद अभिशप्त हैं

अमृत को ही जहर को बनाने के लिए 

और प्रतिगत जहर ही पाने के लिए

जिन्हें ये भी पता नहीं चलता है कि

वे अपनी जीवन दायिनी को भी

उसी जहर से विषाक्त कर देते हैं 

फिर भी उन्हें क्षमा दान मिलता रहता है .


Tuesday, February 9, 2021

क्षणिकाएँ .........

दर्द के दरारों से 

रिसते जख्मों को 

वक्त के मलहम से छुपाना

नाकाम कोशिशें ही

साबित होती है


     ***


कभी-कभी 

कतरनों को कुतरने में

दिल को जितना सुकून मिलता है

उतना तो पूरा मज़मून

हज़म कर के भी नहीं मिलता है 


     ***


दूसरों के अफवाहों में

अपनी मौजों का

घुसपैठ कराना

रेत पर गुस्ताखियों का

सैलाब लाने जैसा है


     ***


हर हारे हुए खेल को

ताउम्र खेलने में

जो मजा है

वो किसी भी

जबर जीत में नहीं है 


     ***


छिने हुए को

वापस छिनने की 

खूबसूरत जिद भी

दिल को गुमराह 

करने के लिए काफी है .

Friday, February 5, 2021

प्रेम कलह के इस रुत में ........

प्रेम कलह के इस रुत में

मधुर , तिक्त , अगन अहुत में

नियति ने ही जलाया है तो

मेरे प्यारे परदेशी पिया !

भलमानसता से , नेम निष्ठा से

मिलन रुत आने तक

निजदेशी हो , परदेश ही रहना 

हाँ ! वर्णज्वर मैं सहती हूँ 

वर्णज्वर तुम भी सहना !


आते भी तो , दीर्घ कचोट कलह से

जानी-बूझी , सोची-समझी , अलह से

तुमसे न बोलती-बतियाती

अनदेखा कर के , सारा प्रणय उपक्रम

भीतर ही रिझती , सिझती और तुम्हें खीझाती

पर न तुम्हारा , कोई पुचकारी पतियाती


मुँह फुलाये , भौं चढ़ाए , लट बिखराये

सोई रहती , उस ऊँची अटारी 

और तुम , लाख मान-मनौव्वल , करके न थकते

किंतु ! मैं कल कलही , रार ठानकर

प्रेम मिलन के , उस रुत में भी , खोलती नहीं 

अपने रंग महल का , कोई किवाड़ी


प्रेम कलह के इस रुत में

पल-पल , कलकल , लगन आयुत में

हास-उपहास , राग-उपराग हुआ है

कल्प कलेवरों का , खेल-खिलौना

जैसे कनखी ही कनखी में 

हो रहा हो , कोई नेही टोटका-टोना

या चहुंओर एक-दूजे का , हो खुला आमंत्रण

या मोहन-सम्मोहन का , हो जंतर-मंतर 

या कि कर गया हो कोई , विवश-सा वशीकरण


मुझ पर भी , छाया भरम या कि खुमारी है

या कि बहकी-बहकी बातें , मेरी लाचारी है

जबसे पिया तुम परदेशी हुए 

तबसे क्यों लगता है मुझको ?

कि नित प्रात से , लड़ती रहती रात है

हो न हो , कहीं मेरी ही कोई बात हो

तब तो पपीहों का , यूँ बदला-सा गान है 

चिड़ियों की चहचहाहट भी , मेरे उलाहनों का तान है 


संभवतः प्रेम कलह से ही , आकाश से अवनी भी है रूठी

क्यों प्रेम और विरह की , हर कथा है अनूठी

पर परदेशी पिया !  तुम भी हो अनूठे , पर हो झूठे

क्या जानूं कि ,  मैं हूँ रूठी , या कि तुम हो रूठे

जो भी हो , बस समझो , जो हृदय की बात है 

इस रुत पर , बड़ा भारी , विरही आघात है 


प्रेम कलह के इस रुत में

हर पल रहती हूँ ,  तेरे ही युत में

तुमसे मैं भी लड़ती , मन ही मन में

क्या कहूँ ? तेरे बिना , कुछ नहीं है जीवन में

मेरे प्राणप्यारे परदेशी पिया !

जितनी जल्दी हो सके , तुम आना

अपनी सौं , कोई कलह न करूं मैं तुमसे

बस ,  मिलन रुत संग लिए आना . 

Sunday, January 31, 2021

बसंत आने का लक्षण है ? .......

पात-पात फुदकन 

गात-गात मुदकन 


हर शोक का हरण है

बसंत आने का लक्षण है ?


बिखरी-बिखरी कस्तूरी

निखरी-निखरी अंकूरी


रस-रूप का उपकरण है

बसंत आने का लक्षण है ?


देहरी-देहरी सिंदुरी

रेहरी-रेहरी अबीरी


उल्लास का उच्चरण है

बसंत आने का लक्षण है ? 


सिकुड़ी-सकुड़ी साँसें

उखड़ी-उखड़ी टाँसें


बड़ा मीठा-सा मरण है

बसंत आने का लक्षण है ?


अंग-अंग गदरीला

संग-संग सुरभीला


बावले युगलकों का वरण है

बसंत आने का लक्षण है ?


ताल-ताल थिरकन

चाल-चाल बहकन


विगत का विस्मरण है

बसंत आने का लक्षण है ?


राग-राग मल्हार

फाग-फाग विहार


पुलक का प्रस्फुरण है

बसंत आने का लक्षण है ? 

Thursday, January 28, 2021

अनुरागी चित्त ही जाने .......

अनुरागी चित्त ही जाने 

अनुरागी चित्त की गति

श्रृंगारित स्नेहित स्पंदन  

मंद-मंद मद-मत्त मति


ऊब उदधि नैनों से उद्गत 

ॠतंभरा की ॠणि उदासी

मख-वेदी में मन का मरम

हिय बीच हिलग प्यासी


सोन चिरैया सुख सपना

विकट विदाही विकलता

कली से कमलिनी का क्लेश

क्षण-क्षण क्षत हो छलकता


रस रसिकों को ज्ञात कहाँ

कि रचना रक्त से रचती है

चिर-वियोगी चित्त की चिंता

प्रघोर पीड़ाओं से गुजरती है .

Sunday, January 24, 2021

पर काल से परे हो ......

जो तुम्हें रचे

कहो तो भी बचे

जो बचे उसे रचो

रचो तो मत बचो

स्वयं संकल्प हो

विपुल विकल्प हो

अनंत उद्गार हो

अनुभूति की टंकार हो

सबकी कसौटी पर खरी हो

सापेक्ष सत्य पर अड़ी हो

शब्द छोटे हो 

अर्थ बड़े हो

काल की बात हो

पर काल से परे हो .


Wednesday, January 20, 2021

अवशेष .....

मानसिक विलासिता के 

सोने के जंजीरों से 

सिर से पांव तक बंधे हुए 

अमरत्व को ओढ़कर

मरे हुए इतिहास के पन्नों पर 

अपने नाम के अवशेष से

चिपकने की बेचैनी

खुद को मुख्य धारा में

लाने की छटपटाहट

चाय की चुस्कियां

आराम कुर्सियां

वैचारिक उल्टियां

प्रायोजित संगोष्ठियां

मुक्ति की बातें

विद्रुप ठहाके

इन सबमें

एक दबी हुई हँसी 

मेरी भी है .

Thursday, January 14, 2021

पुनः प्रथम मिलन ..........

 इस शीत ॠतु में भी , स्वेद-कण ऐसे चमक रहे हैं

हृदय से ह्लादित होकर , रोम-रोम जैसे दमक रहे हैं

यह अद्भुत संयोग भी हो रहा है , हमारा ही आभारी 

और हमारी सुगंध से , गहक कर कैसे गमक रहे हैं


कैसे आवेशित हो गया ,  इस जगती का कण-कण

जैसे प्रचंड कंपन से ,  डोल गया हो यह धरती-गगन

साक्षी होकर सृष्टि भी ,  अचंभित हो गई होगी ऐसे

जैसे शिव-शक्ति का ही , हुआ हो पुनः प्रथम मिलन


अब आत्मस्मरण ओढ़ रहा है , क्षीणता का आवरण

तरंग हीन हो कर , कहीं और अंतर्धान हुआ यह मन 

विश्रांति की इस बेला में , वज्र नींद आकर कह रही 

संयोग श्रम से ही श्लथ हुआ है ,  तेरा तंद्रित यह तन


अब तो एक तरफ है , पलकों पर , नींद की प्रबलता

और दूसरी तरफ है , तुम्हारे इन हाथों की कोमलता

जो तुम ऐसे सहला-सहला कर , मुझे यूँ सुला रहे हो 

तो अधरों को भी रोको न , अब इतना क्यों है चूमता


माथे , आँखों , गालों , अधरों पर ,  तेरा स्मित चुंबन

इन लटों में , फिरती हुई सी उंगलियों की ये थिरकन

वो बैठी नींद भी आँखें खोलकर , देख रही है हमें ही

और मुस्कुराये जा रही है , पोरों की मीठी-सी थकन


छोड़ो भी , अब झूठ-मूठ का मुझे , यूँ ही न सहलाओ

बाहों में छुप कर सोने दो मुझे , औ' तुम भी सो जाओ

सरस , सम्मोहक सपने भी , सज-संवर कर आने को

प्रतीक्षारत हैं , उनका भी नींद से मधुर मिलन कराओ


हा! तुम्हें ऐसे लय लोरी गाने को , अब कौन बोल रहा है

जैसे उत् शीतलता में , कोई उष्ण मादकता घोल रहा है

ये चुंबन और ये सहलाना , ऊपर से ये उन्मुग्ध लोरी गाना

अठखेलियां तो कह रही है , तुम्हारा मन फिर डोल रहा है


मुझे सुला रहे हो , या सच-सच कहो कि सुलगा रहे हो

चंदन-सा तन हुआ है , फिर से क्यों अगन लगा रहे हो

अगन जब लग जाएगी तो , आहुत तुम्हें ही होना होगा

क्यों अनंगीवती को फिर से छेड़ ,  तुम ऐसे जगा रहे हो


अनंगीवती जो जागेगी तो , फिर उसे सुला न पाओगे

सब जान-बूझकर भी , अनंगदेव को फिर से हराओगे

जानती हूँ , हमसे हार के भी तुम्हें सत् सुख मिलता है 

पर इस तरह जीताकर , मुझे दुष्पुर दुख ही पहुँचाओगे


ये निंदासी निशी भी , अब कुहरे से लिपट कर सो रही है

शनै: शनै: आनाकानी , मनमानी की अनुगामी हो रही है

पुनः ये पुण्यतम क्षण , निछावर हो रहा है चरणों पर तेरे

औ' सौंदर्य लहरियां संयोगक्रीड़ा में घुल-घुल कर खो रही है .


Sunday, January 10, 2021

क्षणिकाएँ .......

आज कल शब्दों में          

अर्थो की अधिकता

यह बताता है कि 

हम कितने 

चतुर और चालाक

हो गए हैं .


*****


शब्दों के अर्थ

जब अनर्थ होने लगे

तो साफ है कि

बाजार ज्यादा से ज्यादा 

घातक हथियारों की 

आपूर्ति चाह रहा है .


*****


शब्द जब-तब

अपशब्दों के सहारे

शक्ति प्रदर्शन करे तो

सोची-समझी रणनीतियां

अपना दांव 

खेल चुकी होती है .


*****


शब्द जब

गणित के सूत्रों को

हल करने लगे तो

अपेक्षित परिणाम

सौ प्रतिशत से

कुछ ज्यादा ही होता है .


*****


अनचाहे शब्द 

पीछे लौटकर

पछताने से इंकार करे तो

उसकी पीठ ठोंकने वालों में

समझदारों का 

हाथ ज्यादा होता है .

*** विश्व हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

Thursday, January 7, 2021

"ब्लॉगिंग-सा दिल पर" ........

"पहले जी" गये "दूसरे जी" के घर 

"दूसरे जी" गये थे "तीसरे जी" के घर 

धत् ! पता चला कि 

"तीसरे जी" भी गये हुए हैं "चौथे जी" के घर

फिर "पहले जी" जब गये "चौथे जी" के घर पर

तो वो "महाशय जी" भी थे सिरे से नदारद.…...


तो क्या करते बेचारे "पहले जी"

अपना मुँह लटकाए वापस चले आए अपने घर 

और बाट जोहने लगे अपने खिड़की-किवाड़ों को पकड़

कि भूले भटके ही सही "कोई तो" आए उनके घर 

थोड़ा-सा ही सही मगर दौड़े तो "आह-वाह" की लहर

और किसी भी "जी" के ना आने पर 

"पहले जी" मायूस होते रहे जी भर-भर कर

कुछ ऐसा ही है अपने ब्लॉगिंग का सफर .....


अगर "सबके-सब" बिन बुलाए ही तांता लगा कर

शौक से जब आने लगें आपके घर 

तो आप भी बड़े आराम से खुद को समझिए

अपने आपको एकदम से बड़का "कलक्टर"

और खूब करते रहिए बकर-बकर

सब लगाते रहेंगे आपको तरह-तरह से बटर

ताकि आप लुढ़कते रहें फिसल-फिसल कर

फिर सब मजा लेते रहेंगे ताली पीट-पीट कर

कुछ ऐसा ही है अपने ब्लॉगिंग का सफर........


अजी! हम भी अपनी बात कह देते हैं 

जरूरत से कुछ ज्यादा ही खुलकर 

लेकिन साथ में दोनों हाथों को जोड़ कर

प्यार से वैधानिक चेतावनी भी देकर 

कि इस हल्के-फुल्के मजाक को

कृपया कोई न लें अपने "ब्लॉगिंग-सा दिल पर"

कभी-कभी हँसना और हँसाना भी चाहिेए

अपने-आप को सबसे बड़ा "कलक्टर" बनाना भी चाहिए.…...


तो आइए ! सब हँसे खूब लोट-पोट कर

और जो-जो न हँसे उन्हें भी हँसाएं टोक-टोक कर

उनका नाक-कान , पैर-हाथ पकड़-पकड़ कर

अगर फिर भी वो न हँसे तो भी हँसाएं

उनके पेट को जोरदार गुदगुदी से जकड़-जकड़ कर

क्योंकि कुछ ऐसा ही है अपने ब्लॉगिंग का सफर . 

Monday, January 4, 2021

उधार का ज्ञान बहुत है ........

मेरे पास भी इधर-उधर से उधार का ज्ञान बहुत है 

उसे भांति-भांति से सत्य साबित करने के लिए

उल्टा-पुल्टा , आड़ा-तिरछा , टेढ़ा-मेढ़ा प्रमाण भी बहुत है 

पोथा पर पोथा यूँ ही नहीं लिख कर दे मारी हूँ

नये-पुराने सारे विषयों का अधकचरा खान बहुत है

अगर किसी सभा में अंधाधुंध जो बांचने लगूं तो

देखने-सुनने वाले की नजरों में मान-सम्मान भी बहुत है....

तब तो मानद उपाधियां मेरे चरणों तले

रंग-बिरंगे कालीनों के जैसे बिछी रहती हैं

और सारे पुरस्कारों की लंबी-लंबी कतारें 

हर अगले को धक्का लगा-लगा कर गिनती है ....

ये हाल है कि छोटे-बड़े राजा-महाराजा मुझे 

अपनी दरबार की सुन्दरतम शोभा बनाना चाहते हैं

मेरे छींकने से ही बिखरे हुए मोती जैसे ज्ञान को भी

अपने , उसके , सबके सिर-माथे पर सजाना चाहतें हैं .....

देख रही हूँ अभी से ही मेरे लिए जगह-जगह पर

किसिम-किसिम के अभिलेख , शिलालेख खुदवाये जा रहे हैं

और सब भयंकर ज्ञानियों को छोड़ कर ज्ञानी नम्बर एक पर

मेरे ही नाम , सर्वनाम , उपनाम गुदवाये जा रहे हैं ......

जब सबसे ज्यादा बिकाऊ उधारी ज्ञान का ये हाल है तो

सोचती हूँ अपना ज्ञान जो होता तो और क्या-क्या होता

अरे ! कोई तो मेरा अपना ज्ञान मुझे सूद समेत लौटा दो

ऐसा जबरदस्त घाटा लगाकर मेरा मन बहुत जोर-जोर से है रोता .


Thursday, December 31, 2020

सुना है कि ---

                                 ॐ शांति: शांति: शांति: ॐ


                 सुना है जो हम हैं वही हमें चारों तरफ दिखाई पड़ता है । हमें जो बाहर दिखता है ,  वह हमारा ही प्रक्षेपण होता है ।  स्वभावत: हमारी चेतना जो जानती है उसी का रूप ले लेती है । इसलिए हम सुंदर को देखते हैं तो सुंदर हो जाते हैं , असुंदर को देखते हैं तो असुंदर हो जाते हैं । हमारे सारे भाव भी अज्ञात से आते हैं और हमें ही यह निर्णय करना होता है कि हम किस भाव को चुनें ।  ये भी सुना है कि संतुलन प्रकृति का शाश्वत नियम है । जैसे दिन-रात , सुख-दुख , अच्छाई-बुराई , शुभ-अशुभ , सुंदर-असुंदर आदि । बिल्कुल पानी से आधे भरे हुए गिलास की तरह । गिलास को हम कैसे देखते हैं वो हमारी दृष्टि पर निर्भर करता है ।  

                           ये भी सुना है कि इन दृश्य और अदृश्य के बीच भी बहुत कुछ है जो तर्कातीत है । काव्य उन्हीं को देखने और दिखाने की कला है । तब तो साधारण से कुछ शब्द आपस में जुड़ कर असाधारण हो जाते हैं और इनका उद्गार हमें रससिक्त करता है । साथ ही हमारा अस्तित्व आह्लादित होकर और प्रगाढ़ होता है ।  हम किन भावों को साध रहे हैं इतनी दृष्टि तो हमारे पास है ही । आइए ! उन्हीं भावों का हम खुलकर आदान-प्रदान करें हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ।

न जाने कितनी भावनाऐं , भीतर-भीतर ही

उमड़-घुमड़ कर , बरस जाती हैं

जब तक हम समझते , तब तक

शब्दों के छतरियों के बिना ही

हमें भींगते हुए छोड़कर , बह जाती है

आओ ! मिलकर हम

छतरियों की , अदला-बदली करें

भाव बह रहें हैं , थोड़ा जल्दी करें

एक-दूसरे के हृदय को , खटखटाएं

कुछ हम सुने , कुछ कहलवाएं

बांधे हर बिखरे मन को

उन के हर एक सूनेपन को

आओ ! सब मिलकर , साथ-साथ शब्द साधें 

गुमसुम , गुपचुप यह जीवन कटे

छाई हुई उदासियों का , आवरण हटे

शब्द-शब्द से मुस्कानों को , गतिमय बनाएं

आओ ! हर एक भाव में , पूरी तरह तन्मय हो जाएं .

Monday, December 28, 2020

तुम्हें बाँहों में भर लेंगी स्मृतियाँ हमारी .......

जब आंँखें अंधकार से भर जाएंगी

दृष्टि स्वयं में ही असहाय हो जाएंगी

प्रतिमित प्रतिमाएं सारी खंडित हो जाएंगी

असह्य हो जाए जब वेदना तुम्हारी

तुम्हें बाँहों में भर लेंगी स्मृतियांँ हमारी


जब चूकना ही चूकना सहज क्रम हो जाए

प्रति फलित परिष्कृति बरबस भ्रम हो जाए

अकल्पित संघर्षों में क्षुद्रतम सारा श्रम हो जाए

दुष्कल्पनाएं , शंकाएं जब सहचरी हो तुम्हारी

तुम्हें बाँहों में भर लेंगी स्मृतियाँ हमारी


जब अनजानी , अपरिचित सब राहें होंगी

विवशता की अचरज से भरी आहें होंगी

अति यत्न से सिंचित , संचित दम तोड़ती चाहें होंगी

निरपवर्त नियति हो जब परवश पराजय तुम्हारी

तुम्हें बाँहों में भर लेंगी स्मृतियाँ हमारी


जब शांति का आगार सब अंगार हो जाए

सारा मधुकलश ही विष का सार हो जाए

क्लेश , शोक हर उत्सव का प्रतिकार हो जाए

संकुचित , व्यथित विचलन हो जब डगर तुम्हारी

तुम्हें बाँहों में भर लेंगी स्मृतियाँ हमारी


उन स्मृतियों में मेरी संतृप्ति का स्नेहिल स्पर्श होगा

तुम्हारे अस्तित्व को मुझ तक खींचता , प्रबल आकर्ष होगा

सोखती हूँ समूचा तुम्हें मैं , सोचकर भी अपार हर्ष होगा

सह्य हो जाएंगी तब वेदना तुम्हारी

तुम्हें बाँहों में भर लेंगी स्मृतियाँ हमारी .


Tuesday, December 22, 2020

जोबन ज्वार ले के आउँगी ........

फिर से सांँझ हो रही है कहांँ हो मेरे हरकारे

कब से अब तक यूँ बैठी हूंँ मैं नदिया किनारे

फिर आज भी कहीं प्यासी ही लौट न जाऊं

तड़के उनींदे नयनों के संग फिर यहीं आऊं


थका सूरज किरणों को जैसे-तैसे समेट रहा है

धुँधलका भी जल्दी से क्षितिज को लपेट रहा है

चारों ओर एक अजीब- सी बेचैनी पिघल रही है

मेरी भी लालिमा अब तो कालिमा में ढल रही है


बगुला , बत्तख सब जा रहे अपने ठिकाने पर

शायद मछलियाँ भी चली गईं उस मुहाने पर

पंछियों ने तो नीड़ो तक यूँ मचाई होड़ाहोड़ी है 

पर मैंने अब तक लंबी- लंबी सांँसे ही छोड़ी है


ओ! बालू के बने घरों को कोई कैसे फोड़ गया है

ओ! बिखरे सारे कौड़ियों को भी ऐसे तोड़ गया है

शंख , सीपियों की उदासी और देखी नहीं जाती

तुम जो ले आते मेरा पाती तो इन्हें पढ़के सुनाती


दूर कहीं मछुआरे कुछ गीले-गीले गीत गा रहें हैं

हुकती कोयलिया से ही पीर संगीत मिला रहे हैं

जैसे तरसती खीझ तिर- तिर कर कसमसाती है

मुझसे भी टीस लहरियां आ- आकर टकराती है


पीपल का पत्ता एक बार भी न झरझराया है

मंदिर का घंटा भी अब तक नहीं घनघनाया है

अंँचल की ओट में भी दीप बुझ-बुझ जाता है

मेरे भी पलकों के तट पर कुछ छलछलाता है


लहरों पर सिहरी-सिहरी सी ये कैसी परछाईं है

मँझधारों की भी अकड़ी-तकड़ी सी अँगराई है

तरुणी- सी तरणी बिन डोले ही सकुचा रही है

पल- पल रूक कर पुरवा भी पिचपिचा रही है


उन्मन चांँद का चेहरा क्यों उतरा- उतरा सा है

बादलों का बाँकपन कुछ बिसरा-बिसरा सा है

सप्तर्षियों की चल रही कौन-सी गुप्त मंत्रणा है

उनसे भी छुपाए नहीं छुप रही ये कैसी यंत्रणा है


इसी हालत में ही मेरे हरकारे घर तो जाना होगा

स्वागत में फिर नये-नये रूपों में वही ताना होगा

कैसे तोड़ूं उसकी सौं साखी है यह नदी किनारा

यदि आस जो छोड़ूं तो आखिरी सांँस हो हमारा 


रात भर प्रीत जल-जलकर अखंड ज्योति बनेगी

इन नयनों से झर-झरकर बूंँदें मंगल मोती गढ़ेंगी

कल फिर जोबन ज्वार ले के आउँगी इसी किनारे

उस जोगिया का पाती ले जरूर आना मेरे हरकारे .


Thursday, December 17, 2020

कुछ रूठ गए कुछ छूट गए .......

कुछ रूठ गए कुछ छूट गए
अनकिये से वादे थे टूट गए

हाथ थामे कभी हम थे चले
आँखों में एक से सपने पले
संग-संग सब हंसे और खेले
पीड़ाओं में भी थे घुले-मिले

कुछ रूठ गए कुछ छूट गए
अनकिये से वादे थे टूट गए

रंगो के थे क्या मनहर मेले
बतकहियों के अनथक रेले
एक से बढ़के एक अलबेले
हर पीछे को बस आगे ठेले

कुछ रूठ गए कुछ छूट गए
अनकिये से वादे थे टूट गए

उलझाते सुलझाते हुए झमेले
फाग आग सब मिलकर झेले
हुए कभी न हम ऐसे अकेले
उन दिनों को अब कैसे भूलें 

कुछ रूठ गए कुछ छूट गए
अनकिये से वादे थे टूट गए 

हर रूठे को आवाज लगाऊं
रोऊं गाऊं और उन्हें मनाऊं
पर अब ये तो समझ न पाऊं
कि उन छूटे को कैसे बुलाऊं

कुछ रूठ गए कुछ छूट गए
अनकिये से वादे थे टूट गए 


यह पावन भाव उन समस्त पथगामियों एवं पथप्रदर्शकों को निवेदित है जिन्होंने इस ब्लॉग जगत को विपुल समृद्धि प्रदान किया है । आज जो दृष्टिगत हैं वे निःसंदेह ह्रदयग्राही हैं पर हृदय दौर्बल्यता दबंग यादों को लिए हुए बारंबार उस कल्पतरु की छांव में जाना चाहता है जहां पुनः यह कहने की इच्छा बलवती होती जाती है --- ये ब्लॉगिंग है जनाब !

Sunday, December 13, 2020

हजारों-लाखों चुंबन है .....

 मेरे रोएं-रोएं पर तो तुम्हारा ही वो हजारों-लाखों चुंबन है 

मेरी सांस-सांस पर सुमरनी-सा कसा तेरा ही आलिंगन है 

अब कैसे बताऊं कि तुम उपहार में ही तो मिले हो हमको 

औ' हमारी नस-नस में दौड़ रहा तुम्हारा छिन-छिन संगम है 


हाँ! अब तो चौंकती भी नहीं किसी भी अनजान आहट पर 

लगाम लिए फिरती हूँ पल-पल की उस विरही घबराहट पर

न जानूं कि कैसे अपने-आप उछलती लहरें सरि तल हो गई 

हाय! चकित हूँ ,विस्मित हूँ ,बहकी हुई सी इस बदलाहट पर 

 

सारी छूटी सखियाँ सब अब मुझे, बहुत ही भाने लगी हैं 

हिल-मिल कर हिय-पिय की वो बतिया बतियाने लगी हैं

कैसे कहूं कि मेरी सारी समझ भरी भारी-भरकम बातों पे

सब मिल पेट पकड़-पकड़कर जोर-जोर से ठठाने लगी हैं 

   

 कहती- हमने तो देखा है तेरे हर एक उस पागलपन को

 जल-जल कर जल के लिए मछली की चिर तड़पन को 

 कैसे हम सब तब तनिक भी न भाती सुहाती थी तुझको

 औ' तेरी अंखियांँ तो खोजती थी बस अपने ही प्रीतम को

     

ना जाने किससे , कब और कैसे लग गई तुझे ये प्रेम अगन

सब कुछ भूल-भाल कर तू तो बस प्रीतम में हो गई मगन

पगली ! तब तू बस गली-गली ऐसे मारी-मारी फिरती थी

छोड़-छाड़ कर सब मान-मर्यादा और लोक-लाज का सरम


हम समझाती थी ऐसे मत हो बावली , कुछ तो धीरज धर

प्रीतम तेरा है तेरा ही रहेगा , तिल-तिल कर तू यूं न मर

मिथ्या बोल तब तो थे न हमारे अब जाकर तुमने जाना है

माना कि भूल थी तेरी पर तू क्षमा मांग और कान पकड़


उन्हें कैसे बताऊं कि प्रीत ने ही मुझे तो स्नेही बना दिया

तुम्हारा आँखो से ओझल हो-हो जाना संदेही बना दिया

पर अब संभोगी संगम के चुंबनों और आलिंगनों ने मुझे

रोएं-रोएं को चिर तृप्ति देकर दीपित दिव्यदेही बना दिया


कभी विदेही तो कभी सैदेही मेरा अजब-गजब सा होना है

प्रीतम को पाया तो ही पाया कि क्या पाना है क्या खोना है

प्रपंची अँखियो से अब सखियों में भी प्रीतम ही दिखता है 

उन्हें कैसे बताऊं कि अब बस हँसना है मुझे न कि रोना है .


Monday, December 7, 2020

शांतिक्षेत्र में ये क्या हो रहा है ......

मीलों दूर बैठा मन

उत्सुक है , बहुत आतुर है

जानने को पीड़ित है

क्रांतिक्षेत्र / शांतिक्षेत्र में ये क्या हो रहा है

सत्य और न्याय के लिए अब और युद्ध नहीं होना चाहिए

इसलिए मनुपुत्रों ने लाखों- करोड़ों युद्धों को 

सफलतापूर्वक संपन्न कराने के बाद 

लिए गए अघोषित सौगंध और शांति से किये अनुबंध के कारण 

कुरुक्षेत्र का बहिष्कार कर रहे हैं और शांतिक्षेत्र में जमें हैं

शांति समर्थक और उनके विरोधी क्या- क्या कर रहे हैं

ये जानने के लिए मन बड़ा व्यग्र है इसलिए वह

कभी टीवी खोलता तो कभी अखबार पलटता है

मोबाइल में न्यूज नोटिफिकेशन पर पल- पल नजर रखता है

चौबीसों घंटे सोशल मीडिया का खाक छानते रहता है

विदेशी न्यूज़ एजेंसी पर भी ताका-झांकी करके 

सेंसर किया गया गुप्त जानकारियां पाना चाहता है

परिचितों को भी फोन लगाकर आँखो देखा हाल जानना चाहता है

चाहे वो हमारी तरह मीलों दूर ही क्यों न हो

भले ही ऊपर- ऊपर से दिखाई पड़ती आँखे हैं

पर हम अंधों की जिज्ञासाओं का कोई अंत नहीं है

बात यदि शांति स्थापित करने की हो तो अशांति स्वभाविक है

हम तक छन- छन कर जो खबरें आ रही है 

उसके आधार पर यही लग रहा है कि

चारों ओर शांति के मुक्तसैनिक मोर्चा संभाले हुए है

बड़ी ही शांति पूर्वक एक नई दुनिया बनाने की पहल करते हुए

मानव को पहले के वनिस्पत कुछ अधिक सभ्य , सुसंस्कृत दिखाते हुए

युगों- युगों से शोषण के शिकार स्वार्थ के शासन के

कदमों में श्रद्धा से चढ़ाए गए वर्तमान और भविष्य को

चक्रवृद्धि ब्याज सहित लौटाने के आग्रहों का भेंट देकर

बदले में सभ्येतर प्रतीक्षा को सलीका से ओढ़कर सब डटे हुए हैं

युगों- युगों से चढ़ी कई- कई परतों वाली संतुष्टि के प्लास्टर के भीतर

भरभराते दरारों की दबायी- छुपायी हुई 

दमन की गाथाओं को चुन- चुनकर चिन्हित कर रहे हैं

परंपराओं की जमी सीमेंट को क्रांति की नोंक से खुरच रहे हैं

रूढ़िग्रस्त चिंतनों की नींव से धीरे- धीरे एक- एक ईंट निकाल रहे हैं

संरक्षित खंडहरों को सम्मानित ढंग से सलामी देकर विदा कर रहे हैं

उन शांति के मुक्तिसैनिकों में शामिल होने की हमारी भी पूरी अर्हता है

पर परंपराओं का क्रुर कानून इजाजत नहीं देता है शांतिपूर्ण क्रांति का

मन का देश आज भी गुलाम है युद्धरत शांतिदूतों के आगे .


Friday, December 4, 2020

भला मुझसे कोई आकर यह न पूछे कि ---

भला फूलों से कोई जाकर यह पूछता है कि ---

तुम कैसे खिले हो , क्यों खिले हो , किसके लिए खिले हो 

किस रूप से खिले हो , किस ढंग से खिले हो

किसी विवशता में खिले हो या मलंग से खिले हो

किसी के तदनुरूप खिले हो या अपने अनुरूप खिले हो

ये खिलना तुम्हारा स्वभाव है या किसी का प्रभाव है

क्षणजीवी हो या दीर्घजीवी  ,  उपयोगी हो या अनुपयोगी

तुम्हारा अपना कितना जमीन है , कितना आसमान है

तुम्हारे खिलने का अनुमानित कितना मान- सम्मान है


भला फूलों से कोई जाकर यह पूछता है कि ---

क्यों तुमसे उठी हुई तुम्हारी सुगंध , सुवास , मिठास

हवाओं में तैर कर मीलों दूर तक फैल- फैल जाती है 

क्यों तेरे पराग- परिमल की कणी- कणी छिटक- छिटक कर

सबके नासपुटों को जाने- अनजाने में भी फड़काती है 

क्यों तेरे मदिर मादकता से स्वयं पर किसी का वश न रहता है 

भँवरा- सा मचल- मचल कर वह तुम तक आ- आ बहता है 

क्यों मधुछत्तों से मधुमक्खियां भागी- भागी तुम तक आती है 

क्यों तितलियां तुम पर ही नाचती,  डोलती,  गाती , मंडराती है 


फूलों- सी ही मेरी कविताएं  मुझसे झर- झर झरती हैं

कभी शब्द से तो कभी शून्य से सब कुछ कहती है

किसी से कोई दुराग्रह नहीं है कोई आग्रह नहीं है

विक्षुब्ध , विक्षिप्त सा कोई विकट विग्रह नहीं है

भीतर- भीतर जो बात उमंग में उमड़ती- घुमड़ती रहती है

निर्झरिणी- सी कविता बन अल्हड़ अठखेलियां करती है

कविता बहाने वाली बह- बह कर चुपके से कहीं हट जाती है

मैं भी देखती हूँ कि कविता कुछ- कुछ उपनिषद- सी ही घट जाती है


भला मुझसे कोई आकर यह न पूछे कि ---


Monday, November 30, 2020

बहिर्अंतस की उन्मत्त अमा है .......

अभी- अभी पूर्णिमा का चांद 

आकर मुझसे मिला है

अभी- अभी मेरे भी मौन अँधियारे में 

मेरा भी चांद खिला है

आज गगन में फूट रहा है कोई अमृत गागर

मेरे अंतर्गगन में भी फैल गया किरणों का सागर 

मधुमयी चांदनी ज्यों बरस रही है 

मुझसे भी मेरी ज्योति परस रही है

चकोर- चकोरी एकनिष्ठ हो छुप- छुपकर दहक रहे हैं

वहीं नीरंजन बादल कहीं- कहीं चुपचाप थिरक रहे हैं

मुखर हो रही है मन बांसुरी , शब्द- शब्द झरझरा रहे हैं

भाव- भाव अमर रस को पी- पीकर अनंत प्यास बुझा रहे हैं

सोलह कलाओं से सजी आसक्तियां निखरने लगी है

इच्छाऐं रससिक्त होकर जहां- तहां बिखरने लगी हैं

जैसे ये महत क्षण हो अपनापन खोने का

हर्षोन्माद में भींगने और भिंगोने का

जैसे शीतल सौंदर्य के सुगंध को पहली बार कोई मनुहारा हो

सारी रात सांस रोककर कोई चांद को निर्निमेष निहारा हो

जैसे अभी- अभी मिला कोई नवल वय है

लग रहा है कि मैं सबमें और सब मुझमें ही तन्मय है

बस उत्फुल्ल चांद है , उद्दीप्त चांदनी है , उद्भूत पूर्णिमा है

और अमृत में तन्मय हो रही बहिर्अंतस की उन्मत्त अमा है .

*** देव दीपावली एवं कार्तिक पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

Thursday, November 26, 2020

उग्रतर होता परिताप है ......

यह कैसी पीड़ा है

यह कैसा अनुत्ताप है

प्रिय-पाश में होकर भी 

उग्रतर होता परिताप है


जाना था मिलन ही

प्रेम इति होता है

प्रिय को पाकर भी

संताप कहां खोता है


प्रेम के आगे भी

क्या कुछ होता है

प्रिय से कैसे पूछुँ

हृदय क्यों रोता है


यदि मधुर , रस डूबी

प्रेमपगी पीड़ा होती

तो प्रिय-मिलन ही

केलि- क्रीड़ा होती


अनजाना सा कोई है

जो खींचे अपनी ओर

तब तो इस पीड़ा का 

न मिलता कोई छोर


मेरा कुछ दोष है या

शाश्र्वत अभिशाप है

प्रिय तो देव सदृश

निश्छल , निष्पाप है


पीड़ा मुझको ताके

और मैं पीड़ा को

कोई तो संबल दे

मुझ वीरा अधीरा को


अब तो प्रिय से ही

अपनी आँखें चुराती हूँ

हर क्षण उसको पी-पीकर

पीड़ा की प्यास बुझाती हूँ


बलवती होती जा रही

पीड़ा की छटपटाहट

अब तो मुक्ति का प्रभु

कुछ तो दो न आहट


आस की डोर को थामे

श्वास से तो पार पा जाऊँ

पर लगता है कि कहीं

पीड़ा से ही हार ना जाऊँ 


प्रेम लगन को मेरे प्रभु

और अधिक न लजवाओ

प्रिय को पाया , पीड़ा पायी

बस पहेली को सुलझाओ .

Sunday, November 22, 2020

ऐसे हड्डियों को ना फँसाइये .......

काफी सुना था हमने आपकी बड़ी-बड़ी बातों को

खुशनसीबी है कि देख लिया आपकी औकातों को 

कैसे आप इतना बड़ा-बड़ा हवा महल यूँ बना लेते हैं 

और खुद को ही शहंशाहों के भी शहंशाह बता देते हैं


माना कि ये सिकंदरापन होना कुछ हद तक सही है

पर आप में सिकंदर वाली कोई एकबात भी नहीं है

कैसे आप बातों में ही सोने के घोड़ों को दौड़ा देते हैं 

और सारी सल्तनतों को यूँ आपस में लड़वा देते हैं


आपके दरबार में अनारकलियों का क्या जलवा है

अकबर भी सलीम मियां का चाटते रहते तलवा है

कैसे आप ख्वाबों, ख्यालों की दुनिया बसा लेते हैं

और खट्टे अंगूरों को भी देख- देख कर मजा लेते हैं


कभी-कभार खुद को इंसान की तरह भी दिखलाइए

ये नाजुक हलक है हमारा ऐसे हड्डियों को ना फँसाइये

कैसे आप सरेआम नुमाइश कर अपना कद बढ़ा देते हैं

और अपने मुखौटों पर भी असलियत को यूँ चढ़ा लेते हैं .


Wednesday, November 18, 2020

रात बीत गई तब पिया जी घर आए ........

रात बीत गई 

तब पिया जी घर आए

उनसे अब हम क्या बोले , हम क्या बतियाये

जब यौवन ज्वाला की छटपटाहट में झुलस रही थी

पिया जी के एक आहट के लिए तरस रही थी

तब पिया जी ने एक बार भी न हमें निरखा

उल्टे आँखों में भर दिया सावन की बरखा

सूनी रह गई सजी- सँवरी सेज हमारी

क्या कहूँ कि कैसे बीती हर घड़ी हमपर भारी

कितनी आस से भरकर आई थी पिया जी के द्वारे

पर जब- जब हमने चाहा, वो हुए न हमारे

अपने रूप पर स्वयं ही इठलाती , इतराती रही

प्रेम- दान पाने को अपनी मृतिका ही लजवाती रही

अब तो सूरज सिर पर नाच रहा है

दिनचर्या व्यस्तता के कथा को

बढा- चढ़ा कर बाँच रहा है

सास , ननद का वही घिसा- पिटा ताना

बूढ़े , बच्चों का हर दिन का नया- नया बहाना

देवर , भैंसुर की दिन- प्रतिदिन बढ़ती मनमानी

देवरानी , जेठानी की हर बात में रूसा- फुली , आनाकानी

दाई , नौकरों का अजब- गजब लीला

हाय ! चावल फिर से आज हो गया गीला

तेल- मसालों से बह रही है चटनी, तरकारी

सेहत को खुलेआम आँख मारे दुर्लभ , असाध्य बीमारी

फिर भी जीवन- मक्खन का रूक न रही मथाई

और सुख सपनों में ही रह गयी सारी मलाई

उधर पिया जी बैठे मुँह लटकाए , गाल फुलाये

रह- रह कर बस हमें ही जलाये , और अपनी चलाये

संझावती की इस बेला में थकान ले रही कमरतोड़ अँगराई

इसी आपाधापी में तो हमने सारी उमरिया गँवाई

बहुत पास से अब टेर दे रहा है निघट मरघट

हाय ! छूँछा का छूँछा रह गया यह जीवन- घट

अरे ! अरे ! साँझ बीत गयी, अब तक जला नहीं दिया

रात हो रही है , फिर से रूठ कर कहीं चले गए पिया . 


Saturday, November 14, 2020

अपने करूण दीपों को फिर से जलायें ......

    आनंद का सहज स्फूर्त पुलक उठ कर

    व्याप्त हो गया है लोक-लोकांत में

    विराट अस्तित्व आज फिर से

    श्रृंगारित हुआ सृष्टि के दिग-दिगांत में

    

    निज अनुभूतियाँ फिर से प्राण पाकर

    प्रकाशधार में बलक कर बह रही है

    चौंधियायी आँखों से अंधकार की

    कृतज्ञता झुक कर कुछ कह रही है

    

    हर कान में फुसफुसा रहा है हर हृदय

    सुन प्रणय की इस मधुर मनुहार को

    अपने-अपने संचित उत्साह से सफल करें

    कल के विफलता की हर एक पुकार को

    

    आओ इस दीपोत्सव में सब मिलकर

    अपने करूण दीपों को फिर से जलायें

    जग की विषमता को आत्मसात करके

    हर कसकते घावों को सदयता से सहलायें . 


   *** दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

    

Tuesday, October 27, 2020

क्षणिकाएँ ........

आटा मुंँह में लेते ही
पता चलता है कि कांँटा है
तब तक मछली जाल में होती है
लुभावनी तरकीबें तो
केवल आदम खाल में होती है

     ***

कड़वी दवा भी
लार टपकाने वाले स्वादों के
परतों में लिपटी होती है
जिस पर डंक वाली हजारों
चापलूस चींटियांँ चिपटी होती है

     ***

प्यासे को पानी का
सूत्र मिलता है
भूखे को पाक शास्त्र
नव सुधारकों का
अचूक है ब्रह्मास्त्र

     ***

पुराने पत्थर ही है
जो कभी बदलते नहीं हैं
बदलाव के सारे प्रयास तो
सब कसौटी पर
सौ फ़ीसदी सही है

     ***

लोकप्रिय पटकथाएँ तो
अंधेरे में ही लिखी जाती है
हर झूठ को सच 
मानने और मनवाने से ही
अभिनय में कुशलता आती है .

Monday, October 19, 2020

शब्दों के घास , फूस की खटमिट्ठी खेती हूँ .....

कुछ लिखने का मन होता है तो
कुछ भी लिख देती हूँ
हाँ ! मैं शब्दों के घास, फूस की खटमिट्ठी खेती हूँ
यदि चातक आकर खुशी-खुशी चर ले तो
खूब लहालोट होकर लहलहाती हूँ
न चरे तो भी अपने आप में ही हलराती हूँ
अपना बीज है, अपना खाद है
न राजस्व चुकाना है, न ही कर देना है
बदले में बस भूरि-भूरि प्रशंसा लेना है
ख्याति, कीर्ति का क्या कहना
सिरजते ही चारों ओर से बरस पड़ती है
जिसे देख कर यह परती भी सोना उगलती है
न संचारण , संप्रेषण की कोई चिन्ता
न ही प्रकाशक, संपादक की तनिक भी फिकर
हाँ ! कुछ कम नहीं है हमारी लेखनी महारानी जी की अकड़
विनम्रता कहती है-अर्थ अर्जित करना है जिन्हें
वे अत्याधुनिक मिश्रित खेती को अपनाये
पर हमें तो हृदय से बस विशुद्ध खेती ही भाये .

Monday, October 12, 2020

मेरी कविताएँ अपरंपार ......

तुम कहते हो कि

मेरी कविताएंँ

तुम्हारे लिए

प्यार भरा बुलावा है

शब्दों के व्यूह में फँसकर

तुम स्वयं को

पूरी तरह भूल जाते हो

कुछ ऐसा ही

सम्मोहक भुलावा है


मेरे शब्दों से बंध कर

तुम खींचे चले आते हो

और तपती दुपहरिया में

तनिक छाया पाते हो

पर कैसे ले जाएंँगी

तुम्हीं को तुमसे पार

मेरी कविताएंँ

अपरंपार


औपचारिक परिचय भर से ही

शब्द अर्थ नहीं हो जाते

और आरोपित अर्थों से

शब्द अनर्थ होकर

व्यर्थ हो जाते


शब्दों से शब्दों तक

जितनी पहुंँच है तुम्हारी

केवल वहीं तक 

तुम पहुंँच पाओगे

शब्दों के खोल से

जो भी अर्थ निकले

अपने अर्थ को ही पाओगे


मेरे शब्दों के सहारे

घड़ी भर के लिए ही सही

तुम अपने ही अर्थ को पाओ तो

कुछ-ना-कुछ 

घटते-घटते घट जाएगी

मेरी कविताएँ

तुम्हारी ही प्रतिसंवेदना है

तुम्हारे अर्थों से भी

इस छोर से उस छोर तक

बँटते-बँटते बँट जाएगी .

Tuesday, October 6, 2020

छठे सातवें फ़रेब में ......

जिंदगी के वस्ल वादों में 

मेरे इतराते इरादों में

कुछ ऐसी ठनी

कि हर बिगड़ी हुई बात 

नाज़ुक सी नाज़ की 

बदसूरत बर्बादी बनी

भागते गुबारों ने

आहिस्ते से कहा

जिंदगी को तो

हाथ से छूटना ही है

ख्वाबों का क्या

पूरा होकर भी

टूटना ही है

पर रूठी उम्मीदों को

मनाने का अपना एक 

अलग ही मजा है

छठे सातवें फ़रेब में

खुद को खुदाई तक

फिर से फँसाने का

उससे भी ज्यादा मजा है

तब तो मुद्दत पहले

उदास ग़ज़लों को

छूटी हुई राहों में

छोड़ आई हूं

मत्तला और क़ाफ़िया को

प्यार से आज़ाद कर

नज़्म बन पाई हूं 

खुद को ही ख़बर लगी कि

अभी भी बहुत कुछ है

मेरे तिलिस्मी ख्यालों में

ऐ जिंदगी ! 

तुझको ही मैंने

अब भर दिया है

एतबार के टूटे प्यालों में .

Wednesday, September 30, 2020

हाँ ! ये रक्तबीजों का आसन है संजय......

संजय , पीलिया से पीड़ित समाज को देखकर
इस घिनौना से घिनौना आज को देखकर
चाहे क्रोध के ज्वालामुखी को फोड़ लो
या घृणा के बाँध को तोड़ दो
चाहे विरोधों का बवंडर उठाओ
या सिंहासन का ईंट से ईंट बजाओ
पर नया-नया सिर उग-उग आएगा
और वही दमन-शोषण का अगला अध्याय पढ़ायेगा
सब भूलकर तुम वही पाठ दोहराते रहोगे
और नंगी पीठों पर अदृश्य कोड़ों की चोट खाते रहोगे
ये विराट जनतंत्र का भीषण प्रहासन है संजय
ये सिंहासन है संजय
हाँ ! ये रक्तबीजों का आसन है संजय

संजय , अपनी आँखे बंद कर लो
या अपने ही हाथों से फोड़ लो
या देख कर भी कुछ ना देखो
देखो भी तो मत बोलो
यदि बोलोगे भी तो क्या होगा ? 
जो होता आया है वही होता रहेगा
जहाँ बधियाया हुआ सब कान है
और तुम्हारी आवाज बिल्कुल बेजान है
तो तुम भी मूक बधिर हो जाओ
सारे दुख-दर्द को चुपचाप पीते जाओ
ये सिर्फ रामराज्य का भाषण है संजय
ये सिंहासन है संजय
हाँ ! ये रक्तबीजों का आसन है संजय

संजय ,  करते रहो आग्रह , सत्याग्रह या उपवास
या फिर आत्मदाह का ही सामूहिक प्रयास
कहीं सफेद कबूतरों को लेकर बैठ जाओ
या सब सड़कों पर उतर आओ
नारा लगाओ, पुतला जलाओ
या आंदोलन पर आंदोलन कराओ
या चिल्ला- चिल्ला कर खूब दो गालियाँ
या फिर जलाते रहो हजारों-लाखों मोमबत्तियाँ
उन पर जरा सी भी आँच ना आने वाली है
क्योंकि उनकी अपनी ही जगमग दिवाली है
ये बड़ा जहर बुझा डाँसन है संजय
ये सिंहासन है संजय
हाँ ! ये रक्तबीजों का आसन है संजय 

संजय , चाहो तो पीड़कों को भेजवाओ कारा
और पीड़ितों को देते रहो सहानुभूतियों का सहारा
पर जब तक तुम ना रुकोगे कुछ ना रुकेगा
और मानवता का माथा ऐसे ही कुचलेगा
चाहे कितना भी सिंहासन खाली करो का लगाओ नारा
या फिर जनमत-बहुमत का उड़ाते रहो गुब्बारा
सिंहासन है तो खाली कैसे रह पाएगा
एक उतरेगा कोई दूसरा चढ़ जाएगा
तुम खुशियांँ मनाओगे कि रामराज्य आएगा
पर सिंहासन तो सिर्फ अपना असली चेहरा दिखाएगा
ये चतुरों का चुंबकीय फाँसन है संजय
ये सिंहासन है संजय
हाँ ! ये रक्तबीजों का आसन है संजय .

Tuesday, September 22, 2020

शब्द - प्रसुताओं के हो रहे हैं पाँव भारी ........

 एक तो विकट महामारी

ऊपर से जीवाणुओं , विषाणुओं और कीटाणुओं के

प्रजनन -गति से भी अधिक तीव्रता से

शब्द -प्रसुताओं के हो रहे हैं पाँव भारी 


प्रसवोपरांत जो शब्द जितना ज्यादा

आतंक और हिंसा फैलाते हैं 

वही युग -प्रवर्तक है , वही है क्रांतिकारी 

शब्दों के संक्रमण का

देश -काल से परे ऐसा विस्फोटक प्रसार

जितना मारक है , उतना ही है हाहाकारी


कुकुरमुत्ता हो या नई -पुरानी समस्याएँ 

यूँ ही उगते रहना है लाचारी

ऐसे में शब्द -प्रसुताओं के द्वारा

उनके जड़ों पर तीखे , जहरीले , विषैले

शब्द -प्रक्षालकों का सतत छिड़काव

बड़ा पावन है , पुनीत है , है स्वच्छकारी


अति तिक्तातिक्त बोल -वचनों से

जो सर्वाधिक संक्रमण फैलाते हैं 

वही रहते हैं आज सबसे अगाड़ी

आह -आह और वाह -वाह कहने वाले

खूब चाँदी काट -काट कर

लगे रहते हैं उनके पिछाड़ी

बाकी सब उनके रैयत आसामी होते हैं

जिनपर चलता है दनादन फौजदारी


मतलब , मुद्दा , मंशा व गरज के खेल में

तर्क  , कुतर्क , अतर्क , वितर्क के मेल में

चिरायता नीम कर रहें हैं मगज़मारी

रत्ति भर भी भाव के अभाव में

गाल फुला कर मुँह छिपा रही है

करैला के पीछे मिर्ची बेचारी


जहाँ आकाशीय स्तर पर

चल रहे इतने सारे सुधार अभियानों से

पूर्ण पोषित हो रही है हमारी भुखमरी , बेकारी

वहाँ आरोपों -प्रत्यारोपों के

शब्दाघातों को सह -सह कर और भी

बलवती हो रही है मँहगाई , बेरोजगारी

पर ऐसा लगता है कि

शब्द -प्रसुताओं के वाद -विवाद में ही

सबका सारा हल है , सारा  समाधान है

आखिर इन शब्दजीवियों का भी हम सबके प्रति 

कुछ तो दायित्व है , कुछ तो है जिम्मेवारी


इसतरह उपेक्षित और तिरस्कृत होकर

चारों तरफ चल रहे तरह -तरह के

नाटक और नौटंकी को देख - देख कर

माथा पीट रही है महामारी

उसके इस विकराल रूप में रहते हुए भी

न ही किसी को चिन्ता है न ही परवाह है

वह सोच रही है कि आखिर क्यों लेकर आई बीमारी

लग रहा है वह बहुत दुखी होकर

भारी मन से बोरिया -बिस्तर समेट कर

वापस जाने का कर रही है तैयारी .


Tuesday, September 15, 2020

कल भाग गई थी कविता .......

कल भाग गई थी कविता लिपि समेत

पन्नों के पिंजड़े को तोड़कर

लेखनी की आँखों में धूल झोंककर

सारे शब्दों और भावों के साथ

शुभकामनाओं और बधाइयों के 

अत्याधुनिक तोपों से

अंधाधुंध बरसते 

भाषाई प्रेम- गोलों से

खुद को बचाते हुए

अपने ही झंडाबरदारों से

छुपते हुए , छुपाते हुए

कानफोड़ू जयकारों से

न चाहकर भी भरमाते हुए

सच में ! कल भाग गई थी कविता

आज लौटी है 

विद्रुप सन्नाटों के बीच

न जाने क्या खोज रही है .

Saturday, May 30, 2020

मुझे निमित्त बना कर........

उन सारे सामान्य शब्दों से
एक असामान्य -सी , कविता कहना है 
उन्हीं साधारण -से शब्दों के जोड़ से
असाधारण से भी कुछ ज्यादा गहना है......

जैसे प्रेम से छुआ कोई स्पर्श
स्वयं ही आतुरता को कह जाए
जैसे श्वास के सहारे
कोई हृदय तक उतर आए.......

जैसे बंद आँखों से ही
वो अनदेखा दिख जाता है
जैसे मौनावलंबन भी
कुछ अनकहा कह जाता है.......

जैसे गहन अंधकार के बीच
एक बिजली कौंध जाती है 
जैसे बादलों को परे हटाकर
चाँदनी बाँहे फैला कर मुस्काती है ......

जैसे वीणा के तार पर मीठा छुअन
ध्वनियों के पार हो जाता है
जैसे नृत्य में नर्तक एकमेक हो
तन्मय हो जाता है.....

जैसे चित्रफलक पर
रंगों और कूचियों का मिलना
जैसे अनगढ़ पत्थरों को पूजने के लिए
प्राण भर- भरकर गढ़ना ......

जैसे कोई अद्भुत रहस्य
अनायास ही उद्घाटित हो जाता है
जैसे खुली मुट्ठी में भी
अनंत ऐश्वर्य भर आता है.....

जैसे व्यक्त होकर भी 
वो अव्यक्त रह जाता है
जैसे मुझे निमित्त बना कर
स्वयं कविता कह जाता है .....

निस्संदेह मेरे कहने में
कहने से भी कुछ ज्यादा है
पर जो कहा न जा सका
वो और भी बहुत ज्यादा है .





Friday, September 27, 2019

तो जाओ , तुम पर छोड़ा ..........

जब जाना ही है तो
विदा न लो , सीधे जाओ
हम रोये या गाये
पत्थर- सा हो जाओ
चुप रहो , कुछ नहीं सुनना
लो , प्राण खींच ले जाओ
अब हमारा ही है भाग्य निगोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा ......

छोड़ो भी , इन आहत आहों को
कस के बाहों में न भरो
असह , असहाय अँसुवन से
बह- बह के बातें न करो
सिसकी का मन जैसे सिसके
न बोलेगी कि तुम ठहरो
सब वचन भुला तुमने मुख मोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा .....

क्यों बोले थे
इस तरह से छोड़ कर
कभी तुम न जाओगे
पल -पल के उपहार को
सारी उमर लुटाओगे
सप्तपदी के सौगंधो को भी
जन्मों - जन्मों तक निभाओगे
सारा भरम तुमने ऐसे तोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा .....

जब जाना ही था तो
बिन बताए चले जाते
न ऐसे तुम भी रोते
न ही हमको रुलाते
इस विदाई बेला की पीड़ा पर
तनिक भी तो तरस खाते
हम नहीं बनते राह का रोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा ......

क्यों हमसे विदा लेकर
तुम्हें दूर जाना है
या दूर जाने का
कोई और बहाना है
जल्दी ही आओगे कह कर
बस यूँ ही फुसलाना है
चलो माना , विरह विपुल है मिलन थोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा ....

बरबस भींचोगे ओठों को
मचलेगा जब अंगारा- सा चुंबन
झुठला देना , जब दहकेगा
ज्वाला- सा अलज्ज आलिंगन
पर कैसे रोकोगे जब
रति- रस चाहेगा तन- मन
कुछ इतर ही ने है हमें जोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा ......

उड़ो , ऊँचाई पर उड़ो
अपने सारे पंख पसार कर
जग को जीत भी गये तो
यहीं आओगे स्वयं से हारकर
हमारा क्या , इन चलती साँसों के संग
रहना है बस तेरे लिए , मन मार कर
निष्ठुर , निर्दय , मिर्मम , निर्मोही , निखोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा .



Thursday, September 19, 2019

मत करो विवश .......

मत करो विवश
कहने को
झिझक की कँटीली राह की
लड़खड़ाती हुई कहानी
गहरे अँधियारे को चीर कर
अतल तक डुबाती है
स्मृतियाँ नई - पुरानी ......

मत जगाओ
हृदय में सुप्त है
व्यग्र , व्यथातुर व्याकुलता
विषम संघर्ष है
है बूझहीन
अनायत आतुरता ......

मत बतलाओ
तुमसे ही
कल्पित , अकल्पित जो सुख मिला
मेरे जीवन की
सहज ही
विकसित हुई हर कला .....

मत दोहराओ
मधुमय अधरों से
बहती रही जो मधुर धारा
मिलन के अमर क्षणों का
वो सुहावना गीत प्यारा .....

अब अपने
इसतरह होने का
क्या आशय बताऊँ
या क्षितिज पर
अटकी साँसों का
केवल संशय सुनाऊँ .....

न जाने
जीवन ही
क्यूँ इसतरह मौन है
और सन्नाटे के
टूटे छंदो को
सुनता कौन है ?

व्यर्थ की दुष्कल्पनाओं से
अनमनी हूँ मैं
मत झझकोरो मुझे
अपनी ही चुप्पी से
कनकनी हूँ मैं .....

जानती हूँ मैं
मेरा ये निष्ठुर व्यवहार है
क्या तुम्हें
ये अति स्वीकार है ?

तुम तक
जो न पहुँचे
कुछ ऐसी ये पुकार है
भूल मेरी है
ये प्रतिकूल प्रतिकार है ....

मत करो विवश
कहने को
इस चुप्पी की
विरव कहानी
नहीं कहना मुझे
कि कैसे सोखे रखा है
मैंने अपने ही
समंदर का सारा पानी .


Saturday, December 29, 2018

संतों ! संत हुई मैं .......

रोआँ - रोआँ हुआ कवि
साँस - साँस कविता
अब तुझको कैसे मैं कहूँ ?
आखिर , अकिंचन आखर की
है अपनी भी , कुछ विवशता !

ये विवशता भी बड़ी निराली है
जिसको जी कर , जीती ये शिवाली है
चाहो तो , मौन से आखर महकाओ
या आखर को मूक बनाओ
ये समरसता तुझपर बलिहारी है !

बना कर अपनी पोगड़िया
ले लिया सब लकुटी - कमरिया
धड़कन के मँजीरा पर अब
नचाओ , मुझे खूब नचाओ
पहना अपनी धानी लहरिया !

चतुर हुई , निश्चिंत हुई मैं
ना डोलूँ अब , संत हुई मैं
संतो ! समझ सको तो समझ लो
मेरे अकिंचन आखर की विवशता
कह कर , ना कह कर भी अनंत हुई मैं !

संतों ! संत हुई मैं .

Sunday, April 29, 2018

स्वार्थ ........

मेरे लिए मेरी हर रात महाभिनिष्क्रमण है
और मेरा हर दिन महापरिनिर्वाण है
स्वअर्थ में अपना दीप मैं स्वयं हूँ
बस इतना ही ध्यान है , इतना ही भान है ...

जहाँ सस्ती से सस्ती बोली में बिकती स्वतंत्रता है
चारों ओर एक गहन संघर्ष है , खींचातानी है
वहाँ जीवन में स्वयं का बड़ा भाव भी बड़ा न्यून है
और परतंत्रता में ही सबसे बड़ी बुद्धिमानी है ....

कल तक उधार में जो मैंने लिया था
वो बहुत ही सुंदर शब्दों का भरा- पूरा संसार है
पर अब हर क्षण अपने ही स्वार्थ में ही सधना
मेरे मौलिक होने का मूल आधार है ...

दूसरों को कारण बना स्वयं विचलित होना
अब मेरे लिए अहितकारी है , अशुभ है
आत्मानुभूति और आत्माभिमान के आलोक में रहना
परम दुष्कर तो है पर मेरे लिए शुभ है ....

केवल अपने अर्थ की महत्ता को समझकर ही
सहज रूप से स्वयं के सत्य को पाना है
उसी स्वार्थ में ही तो परार्थ का प्रज्वलित दीप है
अपना दीप स्वयं होकर ही मैंने जाना है .


*** अपना अर्थ स्वयं पाना है ***
*** अपना दीप स्वयं जलाना है ***
*** अपना बुद्ध स्वयं जगाना है ***
      *** शुभकामनाएँ ***

Wednesday, April 18, 2018

तुझको सौंपे बिना ....

तुझसे ही है क्यों अनलिखा अनुबंध ?
तुझको सौंपे बिना जो जिऊं
मुझको है सौगंध !

जब केसर रंग रंगे हैं वन
सुरभि- उत्सव में डूबा है उपवन
गंधर्व- गीतों से गूँजे ये धरती- गगन
दूर कहीं अमराई में जो कोयल कूके
तो क्यों न गदराये मेरा सुंदर तन- मन ?

तुझसे ही है क्यों अनजाना आबंध ?
तुझको सौंपे बिना जो रहूं
मुझको है सौगंध !

पुलकमय हर अंग है होने को समर्पित
देखो , प्राण का यह दीप है प्रज्वलित
अंतर पिघल हो रहा आप्लावित
कान अपना ध्यान हर आहट पर लगाये
तो क्यों न पलक पांवड़े बिछाऊं ओ ! चिर- प्रतीक्षित ?

तुझसे ही है क्यों अनकहा उपबंध ?
तुझको सौंपे बिना जो झड़ूं
मुझको है सौगंध !

स्वीकार करो ओ ! मनप्रिय अज्ञात प्रीतम
अंगीकार करो ओ ! तनप्रिय अतिज्ञात प्रीतम
उद्धार करो ओ ! हृतप्रिय अभिज्ञात प्रीतम
तुझे छू हुआ मन धतूरा , सुरती धड़कन व कर्पूरी तन
तो क्यों न सौगंध लूं ओ ! आत्मप्रिय ज्ञात प्रीतम ?

तुझसे ही है क्यों अनदेखा संबंध ?
तुझको सौंपे बिना जो मरूं
मुझको है सौगंध !


Wednesday, April 4, 2018

जो थोड़ा- सा .........

जो थोड़ा- सा
संसार का एक छोटा- सा कोना
मैंने घेर रखा है
वहाँ मेरे बीजों से
नित नये सपने प्रसूत होते हैं
मेरी कलियों में
नव साहस अंकुरित होता है
तब तो मेरा फूल
पल प्रति पल खिलता रहता है .......

जो थोड़ी- सी
मेरी सुगंध है , वो उड़ती रहती है
जो थोड़ा- सा
मेरा रंग है , वो बिखरता रहता है
जो थोड़ा- सा
मेरा रूप है , वो निखरता रहता है
तो और बीजों को भी
थोड़ी- सी स्मृति आती है
और उनकी कलियाँ
उत्सुक हो साहस जुटाती हैं
और फूल भी पंखुड़ियों को
थोड़ा और , थोड़ा और फैलाते हैं
जो थोड़ा- सा
मेरा संसार है , उसमें
कितने ही फूल खिल जाते हैं .......


बाँध हृदय का तोड़ कर
बह चलती है एक प्रेमधारा
और जल भरे सब मेघ काले
मुझ पर झुक- झुक कर
पाते हैं सहर्ष सहारा
थोड़े चाँद- तारे भी
खिल- खिल जाते हैं
थोड़ा धरा- अंबर भी
भींग- भींग जाते हैं
जो थोड़ा- सा
मेरा संसार है , उसमें
सुख की वर्षा होती है .......

जो थोड़ा- सा
संसार का एक छोटा- सा कोना
मैंने घेर रखा है
वहाँ मैं ही अंतः रस हूँ
और मैं ही हूँ अंतः सलिला
मैं जो स्वयं को सुख से मिली
तो सब सुख सध कर स्वयं ही मिला
तब तो
मेरे फूल के संक्रमण से
और फूल भी
स्वतः सहज ही है खिला .

Monday, January 1, 2018

यदि मैं भी कभी गुनगुना दूँ .......

बड़ा सुख था वीणा में
पर उत्तेजना से
फिर पीड़ा हो गई ......
संगीत बड़ा ही मधुर था
सुंदर था , प्रीतिकर था
हाँ ! गूँगे का गुड़ था
पर आघात से
फिर पीड़ा हो गई .....
तार पर जब चोट पड़ी
कान पर झनकार था
शब्दों के नाद से
हृदय में मदभरा हाहाकार था
पर चोट से
फिर पीड़ा हो गई .......
अनाहत का संगीत
अब सुनाओ कोई
चोट , आघात से भी
अब बचाओ कोई .....
न उँगलियाँ हो , न ही कोई तार हो
न ही उत्तेजना का कोई भी उद्गार हो
उस नाद से बस एक ओंकार हो
शून्य का , मौन का वही गुंजार हो .....
अनंत काल तक जिसे मैं
सुनती रहूँ , सुनती रहूँ
यदि मैं भी कभी गुनगुना दूँ
तो तुम्हें भी
उसी झीना - झीना ओंकार में
अनंत काल तक मैं
बुनती रहूँ , बुनती रहूँ .

Wednesday, October 18, 2017

मन रे !

मन रे , भीतर कोई दीवाली पैदा कर !
अँधेरा तो केवल
उजाला न होने का नाम है
उससे मत लड़
बस उजाला पैदा कर !

कभी दीया मत बुझा
हर क्षण जगमगा कर
आँखों को सुझा !
जो दिखता है
कम - से - कम उतना तो देख
और मत पढ़ अँधेरे का लेख !

कर हर क्षण उमंग घना
बसंत सा - ही उत्सव मना !
मत रुक - क्योंकि तू तो
गति के लिए ही है बना !

मत देख - आगत या विगत
तू ही है संपूर्ण जगत !
जगत यानी जो गत है
जो जा रहा है
जो भागा जा रहा है
उत्सव मना , उत्सव मना
अर्थ अनूठा बतलाये जा रहा है !

हर क्षण बसंत हो !
हर क्षण दीवाली हो !
मंद - मंद ही मगर
हर क्षण , हर क्षण
तेरी लौ में लाली हो !

अँधेरा तो केवल
उजाला न होने का नाम है
मन रे , भीतर कोई दीवाली पैदा कर !


*** दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

Tuesday, August 15, 2017

शाश्वत झूठ ........

हर पल
मैं अपने गर्भ में ही
अपने अजन्मे कृष्ण की
करती रहती हूँ
भ्रूण - हत्या
तब तो
सदियों - सदियों से
सजा हुआ है
मेरा कुरुक्षेत्र
हजारों - हजारों युद्ध - पंक्तियाँ
आपस में बँधी खड़ी हैं
लाखों - लाख संघर्ष
चलता ही जा रहा है
और मेरा
हिंसक अर्जुन
बिना हिचक के ही
करता जा रहा है
हत्या पर हत्या
क्योंकि
वह चाहता है
शवों के ऊपर रखे
सारे राज सिंहासनों पर
अपने गांडिव को सजाना
और महाभारत को ही
महागीता बनाना
इसलिए
वह कभी
थकता नहीं है
रुकता नहीं है
हारता नहीं है
पर उसकी जीत के लिए
मेरे अजन्मे कृष्ण को
हर पल मरना पड़ता है
मेरे ही गर्भ में .......
मैं अपने इस
शाश्वत झूठ को
बड़ी सच्चाई से सबको
बताती रहती हूँ
कि मेरा कृष्ण
कभी जनमता ही नहीं है
और मैं
झूठी प्रसव - पीड़ा लिए
प्रतिपल यूँ ही
छटपटाती रहती हूँ
कि मेरा कृष्ण
कभी जनमता ही नहीं है .

Friday, August 11, 2017

काफी हो ..........

जितने मिले हो
मेरे लिए , तुम उतने ही काफी हो
ख्वाहिशें जो गुस्ताखियां करे तो
तहेदिल से मुझे , शर्तिया माफी हो

बामुश्किल से मैंने
तूफां का दिल , बेइजाज़त से हिलाया है
कागज की किश्ती ही सही मगर
बड़ी हिम्मत से , उसी में चलाया है

जरूरी नहीं कि , जो मैंने कहा
तेरे दिल में भी वही बात हो
पर मेरी तकरीर की लज्जत में
मेरे वजूद के जज़्ब जज़्बात हो

तेरे चंद लम्हों की सौगात में मैंने
इत्तफ़ाक़न इल्लती सौदाई को जाना है
गर इरादतन खुदकुशी कर भी लूं तो
ये मेरे शौक का ही शुकराना है

सोचती हूँ , कहीं तो तेरे दिल से मिल जाए
ये सहराये - जिंदगी के गुमशुदा से रास्ते
तो पूरी कायनात के दामन को निचोड़ दूँ
बस तेरी बदमस्त बंदगी के वास्ते .

Thursday, August 3, 2017

सच्चाई .........

मेरी अंतरात्मा की आवाज में
बहुत - बहुत रूप हैं , बड़े - बड़े भेद हैं
और जो - जो कान उसे सुन पाते हैं
बेशक , उनमें भी बहुत बड़े - बड़े छेद हैं

मेरी अंतरात्मा की आवाज में
बड़ी - बड़ी समानताएं हैं , बड़ी - बड़ी विपरितताएं हैं
और इनके बीच मजे ले - लेकर झूलती हुई
सुनने वालों की अपनी - अपनी चिंताएँ हैं

मेरी अंतरात्मा की आवाज में
बड़े - बड़े संवाद हैं , बड़े - बड़े विवाद हैं
जिसमें कुछ कहकर तो कुछ चुप - सी
वही ओल - झोल वाली फरियाद है

मेरी अंतरात्मा की आवाज से
खुल - खुल कर पलटी मारती हुई
एक - सी ही जानी - पहचानी परिभाषा है
उसकी हाज़िर - जवाबी का क्या कहना ?
वह पल में तोला तो पल में ही माशा है

मेरी अंतरात्मा की आवाज में
सामयिक सिधाई है , दार्शनिक ढिठाई है
उसकी ओखली में , जो - जो बीत जाता है
उसी की रह - रह कर ,  कुटाई पर कुटाई है

मेरी अंतरात्मा की आवाज में
एक - सा ही छलावा है , एक - सा ही (अ) पछतावा है
उसकी गलती मानने के हजार बहानों में भी
एक - सा ही ढल - मल दावा है

मेरी अंतरात्मा की आवाज
अपने - आप में ही इतनी है लवलीन
तब तो अन्य आत्माओं की आवाज को
लपलपा कर लेती है छीन

अतः हे मेरी अंतरात्मा की आवाज !
जबतक तुम संपूर्ण ललित - कलाओं से लबालब न हुई तो
तुम्हारी कोई भी ललकित आवाज , आवाज नहीं होगी
और तुम में लसलसाती हुई सच्चाई नहीं हुई तो
तुमसे गिरती हुई कोई ग़रज़ी गाज , गाज नहीं होगी .

Friday, July 21, 2017

प्रासंगिकता ......

सूक्ष्म से
सूक्ष्मतर कसौटी पर
जीवन दृष्टि को
ऐसे कसना
जैसे
अपने विष से
अपने को डसना ....
गहराई की
गहराई में भी
ऐसे उतरना
जैसे
अपनी केंचुली को
अपनापा से कुतरना .....
महत्वप्रियता
सफलता
लोकप्रियता
अमरता आदि को
रेंग कर
ऐसे
आगे बढ़ जाना
जैसे
जीवन - मूल्यों की
महत्ता को
प्रेरणा स्वरूप पाना .....
जैसी होती है
कवित्त - शक्ति
वैसी ही
होती है
अंतःशून्यता की
भाषिक अभिव्यक्ति .....
जब
प्रश्न उठता है
कि प्रासंगिक कौन ?
तब
कवि तो
होता है मौन
पर कविता तो
हो जाती है
सार्वजनिक
सार्वकालिक
सार्वभौम .

Saturday, July 15, 2017

कहो तो ..........

कहो तो
तुम्हारे लिए
रचने को तो मैं रच दूँ
रूप- यौवन का नित नया संसार
तुम्हें स्वयं में , ऐसे डुबा लूँ कि
मैं ही हो जाऊँ माँझी और मैं ही मँझधार........

कहो तो , तुम्हारे लिए
नित नये गीतों को दे दूँ मैं उत्तेजित उद्गार
कहो तो , नित नई वीणा पर छेड़ दूँ रति- राग अनिवार
कहो तो , नित नये बाँसुरी पर उठा दूँ
अनउठी कामनाओं को बारंबार
कहो तो , इस मेघावरण में मृदंग पर
थाप दे- देकर थिरका दूँ मैं मदकल मल्हार
और कहो तो
तुम्हारी थरथराती वासनाओं को
दे दूँ मैं तड़फती हुई तृप्ति की धार.......

कहो तो
तुम्हारे लिए
अपने प्रत्येक पंखुड़ी पर मैं
प्राणपण से परिमल पराग पसार दूँ
कहो तो , कमलिनी को कलि से फूल बनने में
जो क्लेश होता है , उसे मैं बिसार दूँ
कहो तो , तुम्हारे प्रत्येक याम के कसक को
मैं मतवाली मधु- यामिनी से संवार दूँ
या कहो तो
संकल्पित स्तंभन बन कर मैं
संभ्रांत स्खलन से तुम्हें मैं उबार लूँ ...........

कहो तो
तुम्हारे लिए
रचने को तो मैं रच दूँ
रंग- यौवन का नित नया संसार
पर प्रिय !
मैं हूँ इस पार और तुम हो उस पार
और बीच में है , अलंघ्य वासनाओं का पारापार
तब भी तुम कहो तो
तुम्हारे लिए
मैं ही कर लेती हूँ पार
या कर लेती हूँ सब सहज स्वीकार .

Sunday, July 9, 2017

अतिश्योक्ति की दिशा में गतिमान हो गई हूँ ......

गुणियों ! गुरु - गुण गा - गा कर मैं तो गुण - गान हो गई हूँ
सुधियों ! सुध खो - खो कर अधिक ही सावधान हो गई हूँ
मुनियों ! मन - मधु पीते - पीते मैं भी मधुर मुस्कान हो गई हूँ 
अरे ! अतिश्योक्ति की दिशा में अब तो गतिमान हो गई हूँ 

मुस्कान में है तन्मय , तन्मय में है अमृतायन
अमृतायन में है नर्त्तन , नर्त्तन में है गायन
गायन में है वादन , वादन है बड़ा पावन
पावन सा है रमण , रमण से है जीवन

मधु - मन में जब न यह मेरा है , न वह मेरा है
तब ठहराव कहाँ ? जो है बस गति का फेरा है
अलियों- कलियों की गलियों में रास का डेरा है
गुरु में हुई मैं अब तन्मय जो अमृत का घेरा है 

परिधि में है प्राण , प्राण में है उड़ान
उड़ान से है आकाश , आकाश है वरदान
वरदान से है अवधुपन , अवधुपन में है ध्यान
ध्यान में है दर्शन , दर्शन में अभिराम

संगम पर समेट रही मैं मद की मधुर उफान
गुरु- रस से भीगी- भागी है हिय- कोकिल की तान
मैंने खोला है बाँहों को , आलिंगन में है प्राण
तब तो सहस्त्र सिंगार रच- रच के मुस्काये मुस्कान 

गुणियों ! गुरु - गुण गा - गा कर मैं तो गुण - गान हो गई हूँ
सुधियों ! सुध खो - खो कर अधिक ही सावधान हो गई हूँ .

Tuesday, June 27, 2017

कोई हलन - चलन नहीं है ..........

कोई हलन - चलन नहीं है
कोई चिंतन - मनन नहीं है
कोई भाव - गठन नहीं है
कोई शब्द - बंधन नहीं है

स्वरूप है कोई क्रिया - रहित
बिन साधना हुआ है अर्जित
स्वभाव से ही स्वभाव निर्जित
बोध - मात्र से ही है कृतकृत्य

शांत क्षणों को कोई गढ़ा है
अनंत अर्थों को जिसमें मढ़ा है
अहो दशा में जिसे मैंने पढ़ा है
पाठ - रस और - और बढ़ा है

चिंतना टूटी - मैं कैसी हूँ !
अचिंत्य हुई - मैं कैसी हूँ ?
उसी में हूँ , जो हूँ , जैसी हूँ
वो है जैसा - मैं भी वैसी हूँ

अब क्या सुनना , अब क्या कहना ?
प्रश्नों से भी क्या अब प्रश्न वाचना ?
आप्त उत्तर को ही है अब आँकना
हाँ ! अशेष दिखा , उसी में झाँकना .

Tuesday, January 31, 2017

विकल्पहीनता में .......

इस विगंधी वातावरण में
कितना कठिन हो गया है
कवि- हृदय को बिकसाना
यदि बिकस भी गया तो
और भी कठिन हो गया है
उसे मिलावट व बनावट से बचाना

जहाँ अर्थ है , काम है , भोग ही मनबहलाव है
वहाँ प्रेम भी बाड़ी- झाड़ी में उग- उग कर
बड़े प्रेम से हाट- खाट पर बिक- बिक जाता है
तब बौखलाया- सा कवि- हृदय
बेकार ही कड़वाहट को पी- पीकर
शब्दों की कालकोठरी में छुपकर छटपटाता है

क्या सपनों से सूखा , बंजर खेत है हरियाता ?
या सिर्फ कल्पनाओं से ही वसंत है आता ?
या भावनाओं से जीवन- तत्व है बदल जाता ?
तब कवि- हृदय चाहता है कि चुप रह जाए
विकल्पहीनता में जो हो रहा है , देखता जाए
और बिना आहट के , अनजान- सा निकल जाए

आग्रहों- दुराग्रहों का चश्मा कैसे तोड़ा जाए ?
शंकाओं- संदेहों के गोंद को कैसे छोड़ा जाए ?
कथ्यों- तथ्यों को कैसे सहलाया जाए ?
और आयोजनों- प्रयोजनों को कैसे समझाया जाए ?
या तो कवि- हृदय को ही है बना- ठना कर बहलाना
या फिर सीख लिया जाए बस बेतुकी बातें बनाना .

Sunday, January 22, 2017

रस तो ...........

जानती हूँ , इस प्राप्त वृहद युग में
कैसे बहुत छोटा- सा जीवन जीती हूँ
रस तो अक्ष है, अद्भुत है , अनंत है
पर अंजुरी भर भी कहाँ पीती हूँ ?

विराट वसंत है , विस्तीर्ण आकाश है
चारों ओर मलयज- सा मधुमास है
पर सीपी से स्वाति ही जैसे रूठ गई है
औ' आर्त विलाप से ही वीणा टूट गई है

सुमन- वृष्टि है , विस्मित- सी सृष्टि है
पर भविष्योन्मुख ही सधी ये दृष्टि है
आँखें मूंदे- मूंदे हर क्षण बीत जाता है
औ' स्वप्न जीवन से जैसे जीत जाता है

विद्रुप हँसी हँस लहलहाती है ये लघुता
कभी तो किसी कृपाण से कटे ये कृपणता
विकृत विधान है , असहाय स्वीकार है
छोटा- सा जीवन जैसे बहुत बड़ा भार है

बस व्यथा है , वेदना है , दुःख है , पीड़ा है
भ्रम है , भूल है , पछतावा है , पुनरावृत्ति है
स्खलन है , कुढ़न है , अटकाव है , दुराव है
अतिक्रामक निर्लज्जता से निरुपाय कृति है

मानती हूँ , इस प्राप्त वृहद युग में
कैसे बहुत छोटा- सा जीवन जीती हूँ
रस तो अक्ष है, अद्भुत है , अनंत है
पर अंजुरी भर भी कहाँ पीती हूँ ?

Saturday, December 31, 2016

कि मौन सर्जन प्रक्रिया है .....

सूक्ष्म- चित् ऐसे सोया है
कि मौन सर्जन प्रक्रिया है
पुनः कोई रस- गीत गा दो
प्राण! तुम अब मुझे जगा दो

इंद्रधनुओं के रंग छूकर
हों कोमल भाव मुखर
उर- विषाद को गिरा दो
प्राण! तुम मुझे सिरा दो

ताप तुमसे कहूँ मैं गोपन
धूम से भरा- भरा है मन
लदा हुआ तमस हटा दो
प्राण! तुम संशय मिटा दो

है ऊब बाहर के जगत से
या भीतर रार है सत से
ऊब- रार में न उलझा दो
प्राण! तुम मुझे सुलझा दो

प्राण! तुम शब्दों को सहला दो
अनभिव्यक्त भाषा ही कहला दो
कि मौन सर्जन प्रक्रिया है
औ' सूक्ष्म- चित् सोया है .


*** नव वर्ष संपूर्ण वैभव से सुशोभित हो***
            ***शुभकामनाएँ***

Tuesday, November 29, 2016

लिखती रहूँ प्रेमपत्र .........

शब्दों के आँखों में
भरे आँसुओं को छुपाकर
उसके हृदय का
सारा दुःख दबाकर
ओठों पर बस
सुंदर मुस्कान लाकर
तुम्हें लिखती रहूँ
प्रेमपत्र .........

उस प्रेमपत्र में मैं लिखूँ
घर- आँगन की बातें
अपने गली- मोहल्ले की बातें
और देश- दुनिया की बातें
बातें ही बातें
ढेर सारी बातें ..........

भूली- बिसरी स्मृतियों में
डूबते हुए , उतराते हुए
हँसते हुए , मुस्कुराते हुए
तुम उन सब बातों में
कभी मत पढ़ना
अनलिखे प्रेम को .....

अगर पढ़ने लगे तो
शब्द स्वयं पर
अपना वश न रख पायेंगे
ओंठों से तो न सही
पर अपने आँसुओं से
न जाने
क्या- क्या कह जाएँगे ........

अब तुम ही कहो
कहीं प्रेमपत्र में
कभी आँसुओं का हाल
लिखकर कहा जाता है ?
ये अलग बात है कि
अब तुम्हारे बिना
एक पल भी
नहीं रहा जाता है ......

बस शब्दों के ओंठों पर
तुम अपने ओंठों को
मत धर देना
और उनके आँसुओं को
अपनी आँखों में
मत भर लेना ........

तब शब्दों के
हृदय का सारा दुःख
दुख- दुख कर
उसी पल बह जाएगा
और मेरा प्रेमपत्र
प्रेमपत्र न रह पाएगा .

Monday, November 21, 2016

बसंत आ गया ? .......

अरे !
बिन बुलाए , बिन बताए
बिन रुत के ही ऐसे कैसे
बसंत आ गया ?
आया तो आया पर
कौए और कोयल का भेद
बिन कहे ही ऐसे कैसे
सबको बता गया ?

कोयल तो
नाच कर , स्वागत गान कर
चहुँओर कूक रही है
और कौए ?
आक्रोश में हैं , अप्रसन्न हैं
जैसे उनपर दुःखों का आसमान
अचानक से टूट पड़ा हो
और उनकी आत्मा
चिचिया कर हूक रही है ......

बेचारे कौए
बड़ी चेष्टारत हैं कि
कोयल से भी गाली उगलवाये
और वे बोले तो
सब ताली बजाये ...
ताली तो बजती है
जहाँ वे मुँह खोलते हैं तो
अपने- आप बजती है
लेकिन उन्हें उड़ाने के लिए
कि भागो , जाओ
कि अब दुबारा इधर न आओ .......

कुछ कौए उड़े जा रहे हैं
बसंत को ही अंट- संट
कहे जा रहे हैं
पर वे पूरब जाए या पश्चिम
उत्तर जाए या दक्षिण
सबसे ढेला ही खायेंगे अनगिन ........

जबतक वे कंठ नहीं बदले तो
उनके गीत का
कहीं भी गान नहीं होगा
वे कितना भी
अंटिया- संटिया जाए
तो भी बसंत का
कभी अपमान नहीं होगा .

Sunday, October 30, 2016

तो ऐ दीये ! ........

तुम्हारे हृदय में भी
आग तो सुलगती होगी
चेतना की चिंगारी
अपने चरम को
छूना चाहती होगी
तुम्हारी लवलीन लपटें
मुझसे तो कह रही है कि
तुम भी खो जाना चाहते हो .....
तो ऐ दीये !
मुझ अंधियारी की
तुम साधना करो
जिससे
तुम्हारा प्रकाश
तुमसे भी पार हो जाए
और मेरे पास !
मेरे पास तो
हर पल है तुम्हारा
और है
प्रेम भरी अनंत प्रतीक्षा
अंधकार सा ही
स्रोतहीन , शाश्वत .



दीपोत्सव की स्वर्णिम रश्मियाँ बहुविध आलोकित हो ।
               ***शुभ दिवाली***

Friday, October 7, 2016

तू मधुपान कर माँ !

हे मधुरी, हे महामधु, हे मधुतर
तू सबका त्राण कर माँ !
सबपर प्रसन्न होकर
तू मधुपान कर माँ !

मेरे पथ की सुपथा !
वाचालता मेरी नहीं है वृथा
असमर्थ स्तुति रखती हूँ यथा
तू मत लेना इसे अन्यथा
नत निवेदन है, आदान कर माँ !
प्रसन्न हो, प्रसन्न हो, प्रसन्न हो
प्रतिपल प्रसन्नता प्रदान कर माँ !

सबपर प्रसन्न होकर
तू मधुपान कर माँ !

गदा, शूल, फरसा, वाण, मुदगर
तनिक तू इन सबको बगल में धर
और अपने अत्यंत हर्ष से
रोम- रोम को रोमांचित करके
अदग अभिलाषाओं का आधान कर माँ !

सबपर प्रसन्न होकर
तू मधुपान कर माँ !

तेरा मुख मन्द मुस्कान से सुशोभित है
तू कमनीय कान्ति से कीलित है
तू मंगला है, शिवा है, स्वाहा है
तू ही अक्षय, अक्षर प्रणव- प्रकटा
प्रतिदेय प्रतिध्वान कर माँ !

सबपर प्रसन्न होकर
तू मधुपान कर माँ !

तेरी ही निद्रा से खींचे हुए
पुण्यात्माओं का चित्त भी
तेरी महामाया में फँस जाता है
और दुरात्माओं का क्या कहना ?
उनका तो प्रत्येक कृत्य ही
पाप- पंक में धँस जाता है
क्षमा कर, क्षमा कर, क्षमा कर
सबको क्षमादान कर माँ !

सबपर प्रसन्न होकर
तू मधुपान कर माँ !

पुण्य घटा है, पाप बढ़ा है
तब तो तुझे क्रोध चढ़ा है
उदयकाल के चन्द्रमा की भाँति
अपने मुख को लाल न कर
तू तनी हुई भौहों को
और अधिक विकराल न कर
तेरे भय से भयभीत हैं सब
सबको अभयदान कर माँ !

सबपर प्रसन्न होकर
तू मधुपान कर माँ !

तेरे हृदय में कृपा
और क्रोध में निष्ठुरता
केवल तुझमें ही दोनों बातें हैं
इसलिए जगत का कण- कण मिलकर
क्षण- क्षण तेरी स्तुति गाते हैं
हे सुन्दरी, हे सौम्या, हे सौम्यतर
तनिक अपने सिंह से उतर कर
सबका कल्याण कर माँ !

सबपर प्रसन्न होकर
तू मधुपान कर माँ !

Friday, September 30, 2016

खालिस पंडिताऊ बोल .......

सबका अपना तबेला
सबकी अपनी दौड़
लँगड़ी मारे लँगड़ा
लड़बड़ाये कोई और

अब्दुल्ला का ब्याह
बेगाने माथे मौर
बारूद मारे माचिस
धुँधुआये कोई और

कोई बजाये पोंगली
कोई फाड़े ढोल
पोंगा बढ़कर बाँचे
खालिस पंडिताऊ बोल

कोई चटाये चूना
कोई चबकाये पान
कथ्था मारे कनखी
थूक फेंके पीकदान

कोई दबाये कद्दू
कोई बढ़ाए नीम
पिटारा भर बीमारी
चुप्पी साधे हकीम

कोई कबूतर झपटे
कोई उड़ाये बाज
छिछला छुड़ाये छिलका
गुदा छुपाये राज

आजादी माँगे आजादी
जंजीर पहने जंजीर
नट भट मिलकर
खेले एक खेल

इसकी उसकी डफली
बस अपना राग
कोई मनाये मातम
कोई फैलाये फाग .

Saturday, September 24, 2016

गुमान .......

खामोश रहने में भी
तीर हो सकते हैं
काँटे हो सकते हैं
जहर हो सकता है
व कलंदरों के
रोशन कलाम में भी
हौलनाक तल्ख़िए- होश
या फिर ये कहिए कि
कातिल कलह हो सकता है ......

यूँ ही कुछ भी हो सकने
व न हो सकने के
बीच का फ़ासला
किसी फ़ासिद का शिकार
न होता तो
क्या कहना था
जख्मों की जलन को भूला कर
ख़ामोशी में खलल डाले बगैर
ज़ियादती सह कर
किसी तरह रहना था ......

किसी असर के लिए
उम्रभर की दुहाई
गुजरे जमाने का था बहाना
गोया आह ने सीख लिया हो
ख़ता पर ख़ता करके
खुद-ब-खुद मुस्कुराना .....

किस्मत व फितरत की राजदारी में
कोई तख़्त बनाता है
तो कोई तख़्त बचाता है
गरजे कि
अक्ल के इस दौर में
तौबा मचा कर भी
दुनिया पे जन्नत का
खूबसूरत गुमान हो आता है .

Monday, September 19, 2016

पियहद ही बिसराम .........

तृषा जावै न बुंद से
प्रेम नदी के तीरा
पियसागर माहिं मैं पियासि
बिथा मेरी माने न नीरा

सहज मिले न उरबासि
आसिकी होत अधीर
घर उजारि मैं आपना
हिरदै की कहूँ पीर

दीपक बारा प्रेम का
विरह अगिन समाय
तलहिं घोर अँधियारा
किन्हुं न पतियाय

जो बोलैं सो पियकथा
दूजा सबद न कोय
सबद- सबद पियहिं पुकारिं
पिय परगट न होय

सुमिरन मेरा पिय करे
कब आवै ऐसों ठाम
पिय कलपावै आतमा
पियहद ही बिसराम .

Wednesday, September 14, 2016

हे देवी हिन्दी ! .....

" या देवि सर्वभूतेषु हिन्दीरूपेण संस्थिता ।
  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः "


हे सृष्टिस्वरूपिणी !
हे कामरूपिणी !
हे बीजरूपिणी !
जो जिस भाव और कामना से
श्रद्धा एवं विधि के साथ
तेरा परायण करते हैं
उन्हें उसी भावना और कामना के अनुसार
निश्चय ही फल सिद्धि होती है .......

हे भाषामयी !
हे वांङमयी !
हे सकलशब्दमयी !
हृदय में उदित भव भाव रूप से
मन में संकल्प और विकल्प रूप से
एवं संसार में दृश्य रूप में
अब तुम्हारे स्वरूप का ही दर्शन है .....

हे ज्योत्सनामयी !
हे कृतिमयी !
हे ख्यातिमयी !
अब बिना किसी प्रयत्न के ही
संपूर्ण चराचर जगत में
मेरी यह स्थिति हो गई है कि
मेरे समय का क्षुद्रतम अंश भी
तुम्हारी स्तुति , जप , पूजा
अथवा ध्यान से रहित नहीं है .....

हे शक्तिमयी !
हे कान्तिमयी !
हे व्याप्तिमयी !
इस बात को स्वीकार कर
मैं अति आह्लादित हूँ कि
मेरे संपूर्ण जागतिक आचार और व्यवहार
तुम्हारे प्रति यथोचित रूप से
व्यवहृत होने के कारण
तुम्हारी ही पूजा के रूप में
पूर्णतः परिणत हो गये हैं .

हे देवी हिन्दी !

Monday, September 12, 2016

अपना ही पोस्टमार्टम कराना है ...........

क्या पता कि मैं आदमी ही झक्की हूँ
या अपने इरादे की पूरी पक्की हूँ
सुखरोग टाइप बीमार हूँ
फ्री में मिलती सहानुभूति की शिकार हूँ
सबके सामने बस अपना दुखड़ा रोती हूँ
नई बीमारियों को अपने लम्बे लिस्ट में पिरोती हूँ ....

मुझपर रिसर्च करते कई - कई डॉक्टरों की टीम है
और हाथ साफ करते बड़े - बड़े नीम - हकीम हैं
मेरा घर ही जैसे कोई बड़ा अस्पताल है
पर सुधार से एकदम अनजान मेरा हाल है .....

नींद आती है तो मजे से सो जाती हूँ
आँख खुलती है तो जग जाती हूँ
पैर बढ़ाती हूँ तो चलने लगती हूँ
रुकती हूँ तो रुक जाती हूँ ........

मुँह खोलती हूँ तो बोलने लगती हूँ
बंद करती हूँ तो चुप हो जाती हूँ
भूख लगती है तो भरपेट खा लेती हूँ
प्यास लगती है तो भर मन कुछ पी लेती हूँ
हद है , हँसती हूँ तो हँसने लगती हूँ
जो रोती हूँ तो रोने लगती हूँ .......


और तो और , सही करती हूँ तो सही होती हूँ
जो गलत करती हूँ तो गलत होती हूँ
आखिर कैसी ये मेरी बीमारी है ?
जिसे समझने में , सब समझ भी हारी है ......

वैसे उटपटांग हरकतों से मैं कोसों दूर हूँ
शायद आदमी ही होने के लिए मजबूर हूँ
जब लोगों को देखती हूँ , वे मुझे भरमाते हैं
जो मेंटल हेल्थ प्रूफ दिखा , क्या से क्या हो जाते हैं ......

डॉक्टर बार - बार मेरा सारा टेस्ट करा रहे हैं
पर हाय ! मेरी बीमारी को ही लापता बता रहे हैं
ई.सी.जी. , एम.आर.आई. , अल्ट्रासाउंड , सी.टी. स्कैन
सब मेरा बॉयकाट कर , मुझपर लगा दिए हैं बैन
मेडिकल साइंस इसे एक क्रिटिकल केस बता रहा है
और मुझपर लगातार बीमारी का दौरा आ रहा है .....

क्या पता कि मैं आदमी ही झक्की हूँ
पर अपने इरादे की पूरी पक्की हूँ
अब अपना इलाज मुझे खुद ही करना है
या तो ठीक होकर जीना है या फिर मरना है
इसलिए किसी भी कीमत पर बीमारी का पता लगाना है
हाँ , अपनी आँखों के आगे अपना ही पोस्टमार्टम कराना है .

Friday, September 2, 2016

एक खुली कविता - श्री श्री श्री मोदी जी के लिए ..........तुम तो अमर हो गए .

क्या तुम
सबके वमन किए विष को
प्रेम से पी - पी कर
सच में हर हो गए ?
या अभिन्न होने के लिए
हर एक अंश के नीचे होकर
यथातथ हर हो गए ?

हो न हो , कहीं तुम
आधार और आधेय में
संबंध बनाते - बनाते
सबके बीच के
प्रयोगी पर हो गए
या कि लगातार - लगातार
हर बाद में लग - लग कर
पूरी तरह से
प्रसक्त पर हो गए ....

हाँ , कहीं ऋण रूप में
तो कहीं धन रूप में
कोने - कोने में बस
तुम्हारी ही
कहन और कहानी है
जो तुम पानी बचाते हो तो
पाहनों से भी
परसता पानी है
या स्वयं तुम
इतिहास में इसतरह से
अमर होने के लिए
कर्मतत्पर , कर्मपूरक और कर्मयोगी
हो रहे हो और
वर्तमान से कहला रहे हो कि
तुम वरणीय वर हो गए ......

ऐसे में तुम तो
अमर हो गए ....

तब तो दुधारी दंड से
साम , दाम , दंड , भेद को ही
भूचाली भेदिया की तरह
भेद - भेद कर तुम
इस कलुषित कलियुग में भी
युगपत् द्वापर हो गए .....

हाँ ! तुम तो
अमर हो गए ........

अब तनिक
त्रेता के त्रुटियों को भी
अभिमंत्रित करके
कुछ तो असार कर दो
वो पूर्ण रामराज्य
न आए न सही
कम - से - कम एक
प्रचंड पूर्य हुंकार भर दो ....

देखते ही देखते
अशंक आशाओं के
तुम अगिन लहर हो गए
अरे ! तुम तो
अमर हो गए ....

सब सुंदर सपनों को
सब आँखों में भर दो
शिव - शक्ति को
सब पाँखों में जड़ दो
सत्य है , सत्य है
तुम स्नेहिल , स्तुत्य सा
सतयुगी डगर हो गए
अहा ! तुम तो
अमर हो गए ....

अब तुम भी
अपना सत्य कहो
कि सच में तुम
अमर होना चाहते हो
या समय ने है तुम्हें चुना ?
दिख तो रहा है कि
तुम्हारे लिए ही
बहुत महीनी से
महीन - महीन
ताना - बाना है बुना.....

तब तो
चारों युगों के समक्ष
तुम सम्मोहक समर हो गए....

सच में , तुम तो
अमर हो गए .

Saturday, August 27, 2016

खोल रही हूँ खुद को ........

खोल रही हूँ खुद को
खाली खोल से
खोल कर
खोखले खोल को ......
ओह !
खोल में कितने खोल ?
खोल पर कितने खोल ?
क्या खोल का खोट है
या खोल ही खोट है ?
आह !
खोट ही खोट
और खोट पर
ये कैसा नोंच खसोंट ?
फिर खसोंट से खून
या खून का ही खून ?
खोज रही हूँ खुद को
या खो रही हूँ खुद को ?
हाँ !
खाली खोल से
खोल रही हूँ खुद को .

Friday, March 18, 2016

आँखों में सरसों फूला .....

आँखों में सरसों फूला
फागुन अपना रस्ता भूला
पहुँच गया मरुदेश में
जित जोगी के वेश में 

चिमटा बजाता , अलख जगाता
मस्ती में प्रेम - धुन गाता
प्रेम माँगता वह भिक्षा में
जित जोगिन की प्रतीक्षा में

कभी तो झोली भर जाएगी
जोगिनिया उसकी दौड़ी आएगी
अंबर से या पाताल से
वर लेगी उसे वरमाल से

हरा , गुलाबी , नीला , पीला
प्रेम का रंग हो इतना गीला
सब बह जाए उसी धार में
सुख सागर के विस्तार में

धुनिया का बस एक ही धुन
हर द्वार पर करता प्रेम सगुन
इस फागुन में सब रस्ता भूले
औ' आँखों में बस सरसों फूले .

Friday, March 11, 2016

हरफ़ों में ........

बहुत दफ़न हैं हरफ़ों में , हम भी हो जायेंगे
उन बहुतों के बीच , कभी-कभी दिख भी जायेंगे

कुछ हरफ़ उठा वे लेंगे तो कुछ हरफ़ पकड़ लाएंगे
कुछ हरफ़ खुद आएंगे तो वे कुछ हरफ़ ले आएंगे

यक़ीनन हरफ़-हरफ़ हम न कभी पढ़े जाएंगे
व उनके हरफ़ों से ही हरफ़-बहरफ़ गढ़े जायेंगे

अगरचे ये हमाक़त ही तो हमारी जिंदगी है
गोया हरफ़ों के बंदीखाने में अक़दस बंदगी है

बखत की बंदिशें हैं और ये ख़यालात बेमिजाज़ी है
आज और अभी हरफ़ों की जीती हुई हर बाजी है

दफ़न हो जाएंगे हम पर ये हरफ़ ख़ाक न होंगे
अजी !शोला-ये-शौक है ये जो कभी शाक न होंगे . 

Thursday, March 3, 2016

चुम्मा पर चुम्मा .......

राजा जी !
आपके रोज-रोज के
ये आम सभा वो खास सभा
ये पक्षी भाषण तो वो विपक्षी भाषण
कभी ये उद्घाटन तो कभी वो समापन ....
फिर कभी ये मीटिंग तो कभी वो सेमीनार
नहीं तो ये पार्टी-फंक्शन नहीं तो वो तीज -त्यौहार
कुछ नहीं तो ये बीयर बार नहीं तो वो डांस बार
ऊपर से आये दिन जनता दरबार
तिस पर बहस , बयान , ब्रेकिंग न्यूज और समाचार .....
दिखाने के लिए ये गाँव और वो देहात
देखने के लिए ओवर ब्रिज और वो दस लेन वाला पाथ
फिर बात -बेबात पर भर लेते हैं फॉरेन उड़ान
जैसे ठप पड़ा हो वहां का भी सब काम...........

राजा जी !
दिन-रात यही सब देखकर मैं पक गयी हूँ
आपकी महिमा सुन ऊबकर , चिढ़कर मैं थक गयी हूँ
बहुत हुआ , अब यही कहूँगी -
राजा जी ! मत मरो राज में
अब मुझको दो न चुम्मा
मैं तो बस तुमसे चुम्मा मांगू
मत पकड़ाओ अपना नौटंकी वाला झुनझुन्ना ........
पता है ये जो गहना , जेवर , गाड़ी , बँगला हैं न
उसे तुम हमारे लिए ही करते रहते हो
हर साल दुगुना , तिगुना , चौगुन्ना
पर उससे मैं नहीं खुश हूंगी , होगा बस आपका मुन्ना
मैं तो मांगू तुमसे , अब तो बस चुम्मा
राजा जी ! मत मरो राज में
मुझको दो न चुम्मा

ओ मेरी हठीली रानी जी !
हो भी जाओ थोड़ी सयानी जी
कभी राजा जी नहीं मरते हैं राज में
बस जनता मरती है उनके राज में
और हमें तो व्यस्त रहना पड़ता है
बस दिखावे के लिए काम काज में
फिर तो हमारी रोजी या मर्जी जब चाहे हम
उनको ही पकड़ा देते हैं कोई भी झुनझुन्ना ............
बस दो-चार उटपटांग बोलने भर की देरी है
उसी को वे खींचातानी करते-करते
बढ़ा देते हैं कई-कई गुन्ना
फिर अपने में ही मरते-कटते हैं
और तेरे राजा जी को ही रटते हैं
जैसे वे हों कोई दूधपीते मुन्ना ........... 

कुछ तो समझो , मेरी भड़कीली रानी जी !
हम तो बस अपने फॉरेन वाले फादर के
रूल -ऑडर को थोड़ा आगे बढ़ाते हैं
उनमें ही फूट डालकर बस अपने फुट पर नचाते हैं
वे ही तो हैं हमारे एकदम से असली झुनझुन्ना ........

अब तुम ही बताओ , मेरी भोली रानी जी !
भला राजा क्यों मरे राज में
भले राज मरे हमारे ही राज में
वो भगवान भी तो नहीं जान सके हैं कि
हम होते हैं कितने भीतरगुन्ना

अत: हे नखरीली रानी जी !
मेरे लिए तुम लगी रहो या तो दिन -रात पूजा -पाठ में
या मर्जी तेरी ऐश -मौज करो अपने ठाठ में
चुन कर कोई भी पसंद का अपना झुनझुन्ना
और हम हर बार यूँ ही राजा बनकर
करते रहे धुम-धुम-धुम्मा-धुम्मा .............

फिर तुम अगर ख़ुशी-राजी हो तो
एक तुमको ही क्या
इसको , उसको , उसको , सबको
बस दिन -रात हम देते रहे
चुम्मा पर चुम्मा .

Friday, February 26, 2016

बालम बोलो क्यों वाम हुए ? .......

मैंने नहीं जगाया
सूरज खुद किरण कुँज ले कर आ गया
अपनी वेदी पर घुमा कर कोई मंतर बुलवा गया
और मुझे गले लगा कर तुझमें पिघला गया
मैंने कुछ नहीं किया फिर तो
बालम बोलो क्यों वाम हुए ?
क्या इस वामा से बदनाम हुए ?

मैंने नहीं खिलाया
कलियाँ खुद ही खिल कर कसमसाने लगी
वो कुआंरी कोपलिया भी कसक कर कुनकुनाने लगी
तब सब अपने रज से तेरा नाम मुझपर गुदाने लगी
मैंने कुछ नहीं किया फिर तो
बालम बोलो क्यों वाम हुए ?
क्या इस वामा से बदनाम हुए ?

मैंने नहीं चहकाया
चिड़ियाँ खुद ही चसक कर चहचहाने लगी
फिर मेरी डाली कंपा कर पत्तियों को दरकाने लगी
और मेरी अमराई को अंगराई दे दे कर तुझे बिखराने लगी
मैंने कुछ नहीं किया फिर तो
बालम बोलो क्यों वाम हुए ?
क्या इस वामा से बदनाम हुए ?

मैंने नहीं बहाया
हवा खुद कहीं से उठी और बहक गयी
एक सिहरी सनसनाहट मन-प्राणों में मानो छिटक गयी
और तुझसे झड़कर तेरी ये कस्तूरी भी महक गयी
मैंने कुछ नहीं किया फिर तो
बालम बोलो क्यों वाम हुए ?
क्या इस वामा से बदनाम हुए ?

मैंने नहीं बरसाया
भरा बादल आया और खुद ही बरस गया
फिर मुझसे धुला पुँछा कर भीतर से ऐसे हरस गया
सहसा चौंका , स्तब्ध हो मुझमें जैसे तुझे परस गया
मैंने कुछ नहीं किया फिर तो
बालम बोलो क्यों वाम हुए ?
क्या इस वामा से बदनाम हुए ?

मैंने नहीं गवाया
गीत खुद ही अधरों पर आ गाने लगा
एक सुमनित सुमिरनी से गूँथ कर नया प्राण पाने लगा
और सब दिशाओं से गूँज-गूँज कर तेरा ही स्वर आने लगा
मैंने कुछ नहीं किया फिर तो
बालम बोलो क्यों वाम हुए ?
क्या इस वामा से बदनाम हुए ?

मैंने नहीं नचाया
नाच खुद ही खुद को नचाने लगा
फिर मेरी लाज को सतरंगी चुनर बना कर लहराने लगा
और मेरे मना करने पर भी रोम-रोम में तुझे ही थिरकाने लगा
मैंने कुछ नहीं किया फिर तो
बालम बोलो क्यों वाम हुए ?
क्या इस वामा से बदनाम हुए ?

तेरी सौं सच कहती हूँ-
मैंने नहीं बुलाया
चाँद खुद ही घर आ गया
और मतवाला मधु से मुझे ऐसे नहला गया
जैसे वही मदनलहरी से लहरा लहरा कर मधुयामिनी को पा गया
मैंने कुछ नहीं किया फिर तो
बालम बोलो क्यों वाम हुए ?
मेरी सौं सच सच कहो -
इस वामा के ही तो तुम नाम हुए . 

Monday, February 22, 2016

नहीं अट पायेगी मेरी कविता.......

कोई बम फोड़े या गोली छोड़े
या आग लगाये
अपनी ही बस्ती में
मैं तो डूबी रहती हूँ
बस अपनी मस्ती में ....
लिखती रहती हूँ प्रेम की कविता
कभी आधा बित्ता कभी एक बित्ता
कभी कोरे पन्नों को
कह देती हूँ कि भर लो
जो तुम्हारे मन में आए -
भावुकता , आत्मीयता , सरलता , सुन्दरता
या भर लो विलासिता भरी व्याकुलता
या फिर कोई भी मधुरता भरी मूर्खता .....
कैसे कह दूँ कि नहीं पता -
कि नप जाएगी मेरी कविता
किसी भी शाल या शंसनीय पत्रों के फीता से
या फिर मुझे ये कहना चाहिए
कि पता है मुझे -
बहुत ही छोटा है सारा फीता
जिनमें कभी भी नहीं अट पायेगी
मेरी कविता .

Tuesday, February 16, 2016

बीनी बीनी बसंत बानी ......

बीनी बीनी बसंत बानी
तरसे तरसे तन्वी तेवरानी
अंग अंग अजबै अंखुआनी
पोर पोर पुरेहिं पिरानी
सिरा सिरा सिगरी सिकानी
रुंआ रुंआ रुतै रूमानी
सांस सांस सौंधे सोहानी
रिझै रिझै रमनी रतिरानी
मनहिं मनहिं मयूर मंडरानी
कहैं कहैं कइसे कहानी ?
सीझै सीझै सुलगे सधुआनी
तरसे तरसे तन्वी तेवरानी
बीनी बीनी बसंत बानी

बीनी बीनी बसंत बानी
सरसे सरसे सजनी सयानी
उड़ि उड़ि उछाह उसकानी
झूमत झूमत झनके झलरानी
सरकै सरकै समूचा सावधानी
बोलत बोलत बिहंसे बौरानी
अपने अपने अति अभिमानी
चिहुंक चिहुंक चले चपलानी
हुमकत हुमकत हेराये हुलरानी
चंपई चंपई चारुचाह चुआनी
बुंदन बुंदन बास बरसानी
सरसे सरसे सजनी सयानी
बीनी बीनी बसंत बानी .

Wednesday, February 10, 2016

सुनो रे आली ! .......

सुनो रे आली !

मेरे प्रिय की
हर बात है निराली !
वो मतवाला
मैं भी मतवाली
मतवाली हो कर मैं
कण- कण में
उस को ही पा ली !

सुनो रे आली !

प्रिय अलिक तो
मैं कुंचित अलका
प्रिय अधर तो
मैं अंचित अधर का !

प्रिय मनहर नयन
तो दृष्टि हूँ मैं
प्रिय है कल्पवृक्ष
तो इष्टि हूँ मैं !

प्रिय पद्म -कपोल
सुमन -वृष्टि हूँ मैं
प्रिय सौंदर्य -मुकुर
तो नव -सृष्टि हूँ मैं !

प्रिय ह्रदय तो
पुकार हूँ मैं
प्रिय श्वास तो
तार हूँ मैं !

प्रिय प्रकृति तो
श्रृंगार हूँ मैं
प्रिय प्राण तो
संचार हूँ मैं !

प्रिय शून्य तो
आधार हूँ मैं
प्रिय पिंड तो
भार हूँ मैं !

प्रिय रूप तो
मैं काया हूँ
प्रिय धूप तो
मैं छाया हूँ !

प्रिय सावन तो
घटा हूँ मैं
प्रिय इन्द्रधनुष तो
छटा हूँ मैं !

प्रिय है मलयज तो
सुगंध हूँ मैं
प्रिय प्रसुन तो
मकरंद हूँ मैं !

प्रिय सरस नीर
मैं गम्भीरा सरिता
प्रिय लोल लहर
मैं मृदु पुलकिता !

प्रिय वन कुञ्ज तो
मैं मुग्धा बयार
प्रिय जलकण तो
मैं मधुर फुहार !

प्रिय स्वर्ण निकष
तो मैं कनक -कामिनी
प्रिय गंभीर गर्जन
तो मैं स्निग्ध दामिनी !

प्रिय है अम्बर
तो विस्तार हूँ मैं
प्रिय है धरा
तो आकार हूँ मैं !

प्रिय प्रकाश तो
मैं झलमल हूँ
प्रिय रात तो
मैं कलकल हूँ !

प्रिय अरुण तो
अरुणिमा हूँ मैं
प्रिय चन्द्र तो
मधुरिमा हूँ मैं !

प्रिय स्वप्न तो
जागरण हूँ मैं
प्रिय चित्त तो
चिंतवन हूँ मैं !

प्रिय उत्सव तो
उद्गार हूँ मैं
प्रिय प्रलय तो
हाहाकार हूँ मैं !

प्रिय आनन्द तो
मुदित हास हूँ मैं
प्रिय विषाद तो
अटूट आस हूँ मैं !

प्रिय अर्घ तो
अर्पण हूँ मैं
प्रिय तृषा तो
तर्पण हूँ मैं !

प्रिय रामरस तो
खुमारी हूँ मैं
प्रिय बाबरा तो
तारी हूँ मैं !

प्रिय यौवन मद तो
क्रीड़ा हूँ मैं
प्रिय परिरम्भन तो
व्रीड़ा हूँ मैं !

प्रिय राग तो
गीत हूँ मैं
प्रिय पुलक तो
प्रीत हूँ मैं !

प्रिय बिंदु तो
मैं रेखा हूँ
प्रिय लिखे तो
मैं लेखा हूँ !

प्रिय मौन तो
मैं वाणी हूँ
प्रिय वैभव तो
मैं ईशानी हूँ !

प्रिय मिलन तो
वियोग हूँ मैं
प्रिय जप तो
योग हूँ मैं !

प्रिय नाद तो
वाद्य हूँ मैं
प्रिय ओंकार तो
आद्य हूँ मैं !

प्रिय ध्यान तो
अभ्यर्चना हूँ मैं
प्रिय तप तो
प्रार्थना हूँ मैं !

प्रिय संकल्प तो
सिद्धि हूँ मैं
प्रिय विषय तो
वृद्धि हूँ मैं !

प्रिय रत्न तो
कनि हूँ मैं
प्रिय शंख तो
ध्वनि हूँ मैं !

प्रिय अपरिमित तो
परिधि हूँ मैं
प्रिय निरतिशय तो
निधि हूँ मैं !

सुनो रे आली !

मैं प्रिय की प्रिया !
प्रतिपल एक ही हैं
कहने को दो हम !
महासुख ने ही
हर घड़ी , हर घड़ी
हमें किया है वरण !
तब तो हर बात है
इतनी निराली !

सुनो रे आली !