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Thursday, January 20, 2022

कैसे भेंट करूँ? ........

गुलाब नहीं मिला 

तो पंँखरियाँ ही लाई हूँ !

बाँसुरी नहीं मिली

तो झंँखड़ियाँ ही लाई हूँ !

कैसे भेंट करूँ ?

सुवासित हुई तो

सुगंधियाँ लाई हूँ !

गुनगुन उठा तो

ध्वनियाँ ही लाई हूँ !

कैसे भेंट करूँ ?

देखो !

प्रेम प्रकट है

निज दर्श लाई हूँ !

तुम्हें छूने के लिए

कोमल से कोमलतम 

स्पर्श लाई हूँ !

कैसे भेंट करूँ ?

संग-संग इक

झिझक भी लाई हूँ !

ये मत कहना कि

विरह जनित

मैं झक ही लाई हूँ !

कैसे भेंट करूँ ?

तुम ही कहो !

तुम्हें देने के लिए

बिन कुछ भेंट लिए

कैसे मैं चली आती ?

लाज के मारे ही

कहीं ये धड़कन 

धक् से रूक न जाती !

यूँ निष्प्राण हो कर भला

जो सर्वस्व देना है तुम्हें

कहो कैसे दे पाती ?

मेरे तेजस्व !

हाँ ! निज देवस्व

देना है तुम्हें

अब तो कहो !

कैसे भेंट करूँ ?

Sunday, January 16, 2022

स्नेह-शिशु ..........

                                       अविज्ञात, अविदित प्रसन्नता से प्रसवित स्नेह-शिशु हृदय के प्रांगण में किलकारी मारकर पुलकोत्कंपित हो रहा है। कभी वह निज आवृत्ति में घुटने टेक कर कुहनियों के बल, तो कभी अन्य भावावृत्तियों को पकड़-पकड़ कर चलना सीख रहा है। विभिन्न भावों से अठखेलियाँ करते हुए, गिरते-पड़ते, सम्भलते-उठते, स्वयं ही लगी चोटों-खरोंचों को बहलाते-सहलाते हुए, वह बलक कर बलवन्त हो रहा है। कभी वह हथेलियों पर ठोड़ी रख कर, किसी उपकल्पित उपद्रव के लिए, शांत-गंभीर होकर निरंकुश उदंडता का योजना बना रहा है। तो कभी अप्रत्याशित रूप से उदासी को, मृदु किन्तु कम्पित हाथों से गुदगुदा कर चौंका रहा है। कभी वह अपने छोटे-छोटे, मनमोही घुँघरुओं की-सी रुनझुनाहट से, पीड़ित हृदय के बोझिल वातावरण को, मधुर मनोलीला से मुग्ध कर रहा है । तो कभी इधर-उधर भाग-भाग कर, समस्त नैराश्य-जगत् को ही, अपने नटराज होने की नटखट नीति बता रहा है। 

                     स्नेह-शिशु कभी निश्छल कौतुकों से ठिठक कर, इस भर्राये कंठ में जमे सारे अवसाद को पिघलाने के लिए, प्रायोजित उपक्रम कर रहा है। तो कभी वह ओठों के स्वरहीन गति को, निर्बंध गीतों में तोतलाना सिखा रहा है। वह येन-केन-प्रकारेण हृदय को, अपने अनुरागी स्नेह-बूँदों की आर्द्रता देकर, नव रोमांच से अभिसिंचित करना चाह रहा है। उसके नन्हें-नन्हें हाथों का घेराव, उसका यह कोमल आग्रह बड़ी प्रगाढ़ता से, मनोद्वेगों को समेट रहा है। फिर आगे बढ़ कर उसे आगत-विगत के समस्त व्यथित-विचारों से, विलग कर अपने निकट खींच रहा है। संभवतः उसका यह भरपूर लेकिन गहरा स्पर्श, उस अर्थ तक पहुँचने का यत्न है, जो स्वयं ही अवगत होता है। जिसे नैराश्य-जगत् का झेंप और उकताहट, मुँह फेर कर अवहेलना कर रहा है। पर स्नेह-शिशु की प्रत्येक भग्नक्रमित भंगिमाएँ उसे भी सायास मुस्कान से भर रहा है। तब तो उदासी भी अपलक-सी, अवाक् होकर उसका मुँह ताक रही है। जिससे उसपर पड़ी हुई व्यथा की, चिन्ता की काली छाया, विस्मृति के अतल गर्त में उतरने लगी है। 

                             स्नेह-शिशु अयाचित-सा एक निर्दोष अँगराई लेते हुए, विस्तीर्ण आकाश को, बाँहों से फैला रहा है। वह मनोविनोदी होकर, छुपा-छुपाई खेलना चाह रहा है। ऐसा करते हुए वह कभी दु:ख के पीछे, कभी संताप के पीछे छुप रहा है। तो कभी चुपके-से वह व्यथा का, तो कभी हताशा का आड़ ले रहा है। उसे पता है कि वह कितना भी छुपे, पर अब कहीं भी छुप नहीं सकता। फिर भी वह घोर निराशा के पीछे, स्वयं को छुपाने का अनथक प्रयास कर रहा है। पर उसका यह असफल प्रयास, हृदय को अंगन्यास-सा आमोदित कर रहा है। जिसे देखकर वह भी अपने स्वर्ण-दंत-पंक्तियों को निपोड़ते हुए, प्रमोद से खिलखिला रहा है। ऐसा करते हुए वह कभी इधर से तो कभी उधर से, अपने सुन्दर-सलोने मुखड़े को आड़ा-तिरछा करके, उदासी को चिढ़ा रहा है। तो कभी प्रेम-हठ से उसका हाथ पकड़े, चारों ओर चकरघिन्नी की तरह घुमा रहा है। उदासी अपने घुमते सिर को पकड़कर, उसे कोमल किन्तु कृत्रिम क्रोध से देख रही है।

                    स्नेह-शिशु को यूँ ही उचटती दृष्टि से देखते हुए भी चाहना के विपरीत, बस एक अवश भाव से मन बँधा जा रहा है। वह भाव जो प्रसन्नता के भी पार जाना चाहता है। वह भाव जो उसके प्रेम में पड़कर उसी के गालों को, पलकों को, माथे को बंधरहित होकर चूमना चाह रहा है। ऐसा लग रहा है कि जैसे वह भी प्रतिचुम्बन में उदासी के आँखों को, कपोलों को,  ग्रीवा को, कर्णमूल को, ओठों को एक अलक्षित चुम्बन से चूम रहा हो। जिससे अबतक हृदय में जमा हुआ सारा अवसाद द्रवित होकर द्रुत वेग से बहना चाह रहा है। फिर तो उसकी उँगलियाँ भी उदासी के माथे के उलझे बालों से बड़े कोमल स्पर्श में खेलने लगी हैं। ऐसा अविश्वसनीय इन्द्रजाल! ऐसा संपृक्त सम्मोहन! ऐसा आलंबित आलोड़न! जिससे हृदय एक मीठी अवशता से अवलिप्त होकर सारे नकारात्मक भावों को यथोचित सत्कार के साथ विदा करना चाह रहा है। 

                                                 स्नेह-शिशु के लिए एक स्निग्ध, करुण, वात्सल्य-भरा स्पर्श से उफनता हुआ हृदय स्वयं को रोक नहीं पा रहा है। उसकी सम, कोमल थपकियों से, कभी बड़ी-बड़ी सिसकियों से अवरूद्ध हुआ स्वर, पुनः एकस्वर में लयबद्ध हो रहा है। फिर कानों में जीजिविषा की एक अदम्य फुसफुसाहट भी तो हो रही है। फिर से इन आँखों को भी सत्य-सौंदर्य की दामिनी-सी ही सही कुछ झलकियाँ दिख रही है। उदास विचार मन से असम्बद्ध-सा उसाँस लेकर क्षीणतर होने लगा है। अरे! ये क्या ? स्नेह-शिशु के पैरों का थाप चारों ओर तीव्र-से-तीव्रतर होता जा रहा है। मानो स्नेह-शिशु का इसतरह से ध्यानाकर्षण, सहसा स्मृति के बाढ़ को ही इस क्षण के बाँध से रोक दिया हो।

                                     स्नेह-शिशु के इस जीवन से भरपूर, ऐसा प्रगाढ़ चुम्बन और आलिंगन में हृदय हो तो किसी भी अवांछित उद्वेग को, मन मारकर, दबे पाँव ही सही अपने मूल में लौटना ही पड़ेगा। तब चिरकालिक शीत-प्रकोपित अलसाये उमंगों को भी मुक्त भाव से मन में फूटना ही पड़ेगा। मृत-गत विचारों के बाहु-लता की जकड़ को ढीली करके, आकाश के विस्तार में फिर से हृदय को ऊँची छलांग लगाना ही होगा। कोई भी टूटा स्वर ही क्यों न हो सही पर,जीवन-गीत को नित नए सुर से गाना ही होगा। साथ ही जीवन के सरल सूत्रों के सत्य से, आंतरिक सहजता को आदी होना ही होगा। जब क्षण-क्षण परिवर्तित होते भाव-जगत् में भी भावों का आना-जाना होता ही रहता है तो ये उदासी किसलिए ? स्नेह-शिशु भी तो यही कह रहा है कि जब कोई भी भाव स्थाई नहीं है तो उसे पकड़ कर रखना व्यर्थ है और आगे की ओर केवल सस्नेह बढ़ते रहने में ही जीवन का जीवितव्य अर्थ है। 

Monday, January 10, 2022

जात न पूछो लिखने वालों की .........

जात न पूछो

लिखने वालों की

ख्यात न पूछो

न दिखने वालों की


रचना को जानो

जितना मन माने

उतना ही मानो

पर रचनाकार को 

जान कर क्या होगा?

उसको पहचान कर क्या होगा?

परम रचयिता कौन है?

सब उत्तर क्यों मौन है?

प्रश्न तो करते हो पर

उस परम रचनाकार को

क्या तुमने जाना है?

जितना जाने

उतना ही माना है

न जाने तो

बस अनुमाना है


जात न पूछो

लिखने वालों की

मिथ्यात न पूछो

न दिखने वालों की


यदि रचना में

कोई त्रुटी हो तो

निर्भीक होकर कहो

पर नि:सृत रसधार में

रससिक्त होकर बहो

और यदि

स्वाग्रह वश

बहना नहीं चाहते 

तो बस दूर रहो

मन माने तो

रचना को मानो

न माने तो मत मानो

पर रचनाकार को

जान कर क्या होगा?

उसको पहचान कर क्या होगा?


जात न पूछो

लिखने वालों की

अखियात न पूछो

न दिखने वालों की .

                  " भाषा जब सांस्कृतिक अर्थ व्यंजनाओं से निरंतर जुड़ कर समाज को शब्दों के माध्यम से सम्प्रेषित करती है तो सर्जनात्मकता अपने शिखर को पाती है । तब लिखने वाले माध्यम भर ही रह जाते हैं और हमारी भाषा स्वाधीनता की ओर अग्रसर होती है । "

         *** विश्व हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

Wednesday, January 5, 2022

कह तो दे कि वो सुन रहा है .….….

                        नियति के आश्वासन जनित,  अपरिभाषित आत्मीय संबंधों के स्मरणाश्रित अतिरेकी बातें, अस्तित्व विहीन हो कर भी, अकल्पित अर्थों को अनवरत पाती रहतीं हैं । वें पल-पल पर-परिणति को पाते हुए भी बनीं रहतीं हैं एक अपरिचित एकालाप-सी । नितान्त एकाकी होकर भी एकाकार-सी । अन्य विकल्पों से एक निश्चित दूरी बनाए हुए पर समानांतर-सी ।  एक ऐसे प्रश्न की भांति जो प्रश्न होने में ही पूर्ण हो । जिसे सच में कभी भी किसी उत्तर की कोई आवश्यकता होती ही नहीं हो । बस उन आत्मीय संबंधों में स्वयं को असंख्य कणों के आकर्षणों में पाना अविश्वसनीय आश्चर्य ही है ।        

                                  उन संबंधों को जीते हुए किसी से समय रहते हुए वो सब-कुछ नहीं कह पाने का एक गहरा परिताप सदैव सालता रहता है । समय रहते यदि वो सबकुछ कह दिया जाता जो अवश्य कह देना चाहिए था तो ............... । तो क्या नहीं कह पाने के पश्चाताप को दुःख से बचाया जा सकता था ? संभवतः नहीं । कारण वो सबकुछ,  जो आज उसके न होने पर,  कुछ अधिक ही स्पष्ट हुई है,  उसे जीते हुए अस्पष्ट ही थी । तो क्या कह देना चाहिए था उससे ? वो जो उस समय उसे अपनी अस्फुट धुन बनाये हुए जी रहे थे या अब उस धुन के बोलों को समझने में उलझते हुए जो कहना चाहते हैं । हाँ! उस समय भी कह देना चाहिए था और आज भी कह देना चाहिए कि तुम मेरी नियति के आश्चर्य हो, मेरे अस्तित्व-सा ।

                                        सच में, कोई भी रागात्मक संबंध रूपाकार होकर जीवन-छंद-लय को समूचा घेर लेता है । पर जीवन राग का कोई विरागी सहचर,  उससे भी गहरा होकर एक अरूपाकार आवरण बनकर,  कवच की भांति अस्तित्व को ही घेरे रहता है । कोई कैसे सम्वेदना का अनकहा आश्वासन बनकर हमारे भावना-जगत् में हस्तक्षेप करने लगता है । वह हमारी उन मूक संभावनाओं को सतत् सबल बनाता रहता है जिनकी हमें पहचान तक नहीं होती है । हम ऐसा होने के क्रम में  इतने अनजान होते हैं कि इस सूक्ष्म बदलाव के प्रति हमें ही आश्चर्य तक नहीं होता है । जब कभी आँखें खुलती है तो अपने ही इस रूप पर हम अचंभित रह जाते हैं । लेकिन धीरे-धीरे वह निजी जीवन में भी एक निश्चयात्मक स्वर बन कर अस्फुट वार्तालाप करने लगता है । हमें भरोसा दिलाता रहता है कि वह हर क्षण हमें दृढ़ता से थामें है और हम सुरक्षित हैं । 

                                          अब उसके नहीं होने के दुःख के साथ प्रायश्चित का दुःख भी भावों को नम किये रहता है । अब किससे कहना और क्या कहना ? जिससे कुछ कहना था वो मौन हो गया तो अब मौन में ही सबकुछ कहा और सुना जा रहा है । यदि वो अज्ञात से ही सही सुन रहा है तो ये मौन के शब्द उसे अवश्य वो सबकुछ कहते होंगे, जो कभी शब्दों में नहीं कहे जा सकते हैं । पता है, इन भींगे हुए शब्दों में भी उस दुःख की कभी समाई नहीं हो पाएगी । जब हृदय कहना चाहता था तो मस्तिष्क जनित द्वंद्व उसे कहने नहीं दिया । अब वही मस्तिष्क हृदय की पीड़ा को प्रबलता से प्रभावित कर रहा है । अब एक अंतहीन प्रतीक्षा है और एक अनवरत पुकार है । जिसे वह भी चुपचाप अनदेखा तो नहीं कर सकता है । संभवतः वह भी बोल रहा है कि पुनः मिलना होगा, अवश्य मिलना होगा ।  अटूट आस्था तो यही कहती है ‌।  उसकी ओर ही यात्रा भी हो रही है । अब वो सारी बातें उसे समय से कही भी जा रही है । बस एक बार ही सही वह कह तो दे कि वो सुन रहा है .….…

                                                                               

Sunday, September 19, 2021

कल्पना का खजाना .........

                              कल्पना करें यदि आपके सामने एक तरफ कुबेर का खजाना हो और दूसरी तरफ कल्पना का खजाना हो तो आप किसे चुनेंगे ? गोया व्यावहारिक तो यही है कि कुबेर का खजाना ही चुना जाए और बुद्धिमत्ता भी यही है ।  तिसपर महापुरुषों की मोह-माया-मिथ्या वाले जन्मघुट्टी से इतर बच्चा-बच्चा जानता है कि इस अर्थयुग में परमात्मा को पाने से ज्यादा कठिन है अर्थ को पाना । क्योंकि अर्थ के बिना जीवन ही अनर्थ है । इसलिए जो कुबेर के खजाने को चुनते हैं उनको विशुद्ध रूप से आदमी होने की मानद उपाधि दी जा सकती है । यदि कोई दोनों ही हथियाने के फिराक में हैं तो उन्हें बिना किसी विवाद के ही महानतम आदमी माना जाएगा । और जो ..... खैर !

                        पर कोई तो इस लेखक-सा भी महामूर्ख होना चाहिए जो रबर मैन की तरह दोनों बाँहों को बड़ा करके लपलपाते जिह्वा से लार की नदियाँ बहाते हुए कल्पना के खजाना को पूरे होशो-हवास में चुने । कारण लिखनेवाला एक तो तोड़-मरोड़ वाला लेखक है ऊपर से जोड़-घटाव वाला कवि भी है । तो कल्पना के खजाने का रूहानियत उससे ज्यादा भला कोई और कैसे जान सकता है । कल्पना करते हुए वह खुद को कुबेर से भी ज्यादा मालामाल समझता है । यकीन न हो तो उसके कल्पना से कुछ भी माँग कर देखें । यदि महादानी कर्ण भी रणछोड़ न हुआ तो नया महाभारत लिख दिया जाएगा इसी लेखक के काल्पनिक करों से ।

                               तो कल्पना करते हुए लेखक वो सब कुछ बन जाता है जो वो कभी हक़ीक़त में बन नहीं सकता है । अक्सर वह स्पाइडर-मैन की तरह महीन और खूबसूरत जाला बुनता है जिसमें खुद तो फँसता ही है , औरों को भी झाँसा देकर ही खूब फँसाता है । फिर शक्तिमान की तरह अपने काल्पनिक किल्विष को हमेशा हराता रहता है । अपनी कल्पनाओं की दुनिया में ही वह एक बहुत ही सुन्दर दुनिया बसाता है । जिसमें वास्तविक रूप से सुख, समृद्धि और शांति ले आता है । जो उसे कुछ पल के लिए ही सही पर बहुत सुकून देता है । जो इस दुनिया में अब कहीं ढ़ूँढ़ने से भी उसे नहीं मिलता है । शायद उसके लिए सारी सतयुगी बातें अब काल्पनिक हो गई हैं या फिर सच में विलुप्त होने के कगार पर ही है । 

                           तो अब सवाल ये है कि कल्पना के बिना इस बर्दाश्त से बाहर वाली दुनिया में दिल लगाए भी तो कैसे लगाए । जहाँ कुछ भी दिल के लायक होता नहीं और जो होता है उसके लायक लेखक होता नहीं है । तो ऐसे में सच्चाई को स्वीकार करते-करते हिम्मत बाबू अब उटपटांग-सा जवाब देने लगें हैं । तो फिर जन्नत-सी आजादी की बड़ी शिद्दत से दरकार होती है जो सिर्फ कल्पनाओं में ही मिल सकती है । एक ऐसी आजादी जिसे किसी से न माँगनी पड़ती है और न ही छीननी पड़ती है । तब तो वह कल्पना के खजाने को खुशी से चुनता है और उसकी महिमा का बखान भी एकदम काल्पनिक अंदाज में करता है । 

                           फिर से कल्पना करें कि यदि सब हीरे-जवाहरातों में ही उलझ जाएंगे तो सबके ओंठों पर काल्पनिक ही सही पर मुस्कान कौन खिलाएगा ? आखिर मुस्कान खिलाने वाले प्रजातियों को भी थोड़ी तवज्जो ज़रूर मिलनी चाहिए । ताकि मुंगेरी लालों के काल्पनिक दुनिया में एक से एक हसीन सपने अवास्तविक और अतार्किक रूप से और भी ऊँची-ऊँची कुलाँचे भर सके । जिन्हें नहीं पता है तो वे अच्छी तरह से पता कर लें कि इस छोटी-सी जिंदगी में महामूर्खई करके हँसी-दिल्लगी भी न किया तो फिर क्या किया । इसलिए हमारे जैसे महामूर्खों की कल्पनाओं की दुनिया तो कुछ ज्यादा ही आबाद होनी चाहिए ।

                                      वैसे भी इस सिरफिरे को बेहतर इल्म है कि कभी इसे सूरज पर बैठ कर चाय की चुस्कियाँ लेने की जबरदस्त तलब लगी तो बेचारा कुबेर का खजाना कुछ भी नहीं कर पाएगा । पर कल्पना का खजाना ही वो चिराग वाला जिन्न है जो इस तुर्रेबाज तलब को पूरा करके पूरी तरह से तबीयत खुश कर सकता है । ऐसे ही बेपनाह आरजुओं की लंबी-चौड़ी फेहरिस्त है जो सिर्फ कल्पनाओं में ही पूरी हो सकती है । तो कोई भी अपने सुतर्कों से लेखक के चुनाव को कमतर साबित करके तो दिखाएं । या फिर अपनी ही कल्पनाओं को हाजी-नाजी बना कर देख लें ।

                                                यदि इस कल्पनानशीन ने और भी मुँह खोला तो ख़ुदा कसम पृथ्वी बासी जैसे कल्पना के बाहरी दुनिया के जालिम लोग सरेआम उसे पागल-दीवाना जैसे बेशकीमती विशेषणों से नवाजेंगे । फिर तो इज्ज़त-आबरू जैसी भी कोई चीज है कि नहीं जिसे थोड़ा-बहुत बचा लेना लेखक का फ़र्ज़ तो बनता है । इसलिए खामखां अपनी कल्पनाओं की खिंचाई न करवा कर बस इतना ही कहना है कि जो कोई भी कुबेर के क़ातिल क़फ़स में फँसना चाहे शौक से फँसें । उन्हें ख़ालिस आदमी होने के लिए मुबारकबाद देने में भी ये महामूर्ख सबसे आगे रहेगा ।               

                       *** एक हास्यास्पद चेतावनी ***

 *** यदि किसी महामानव को इस महामूर्ख पर हल्की मुस्कान भी आ रही हो तो वह अट्टहास कर सकता है किन्तु आभार व्यक्त करते हुए ***

Tuesday, September 14, 2021

लेखनी चलती रहनी चाहिए .......

                 हिन्द दिवस पर हार्दिक प्रसन्नता के साथ ये स्वीकार करते हुए आत्मगौरव की अनुभूति हो रही है कि जब-जब स्वयं को अभिव्यक्त करना चाहा तब-तब अपनी भाषा के चाक पर गीली मिट्टी की भांति पड़ गई । जैसा स्वयं को गढ़ना चाहा वैसे ही गढ़ गई । हाँ !  मेरी भाषा ने ही मुझे हर एक भाव में व्यक्त कर मुझे आत्मभार से मुक्त किया है । हर बार निर्भार करते हुए हिन्दी ने मुझे ऐसा अद्भुत, अनोखा और अद्वितीय रूप में सँवारा है कि बस कृतज्ञता से नतमस्तक ही हुआ जा सकता है । आज अपनी भाषा के बल पर ही अपनी स्वतंत्रता की ऐसी उद्घोषणा कर सकती हूँ । जिसकी अनुगूँज में हमारी हिन्दी हमेशा गूँजती रहेगी । जिसका खाना-पीना, ओढ़ना-बिछौना हिन्दी ही हो तो उसे बस हिन्दी में जीना भाता है । फिर कुछ और सूझता भी नहीं है । वैसे हिन्दी की दशा-दिशा पर चिंतन-मनन करने वाले हर काल में करते रहेंगे पर जिन्होंने हिन्दी को अपना सर्वस्व दे दिया उनको हिन्दी ने भी चक्रवृद्धि ब्याज समेत बहुत कुछ दिया है । इसलिए हमारी मातृभाषा हिन्दी को बारंबार आभार व्यक्त करते हुए .........

अनुज्ञात क्षणों में स्वयं लेखनी ने कहा है कि -
लेखनी चलती रहनी चाहिए 
चाहे ऊँगलियां किसी की भी हो 
अथवा कैसी भी हो
  
चाहे व्यष्टिगत हो 
अथवा समष्टिगत हो 
चाहे एकल हो 
अथवा सम्यक् हो 
 
चाहे अर्थगत हो 
अथवा अर्थकर हो 
चाहे विषयरत हो 
अथवा विषयविरत हो 
 
चाहे स्वांत: सुखाय हो
अथवा पर हिताय हो
चाहे क्षणजीवी हो
अथवा दीर्घजीवी हो
 
चाहे मौलिक हो
अथवा प्रतिकृति हो
चाहे स्वस्फूर्त हो
अथवा पर प्रेरित हो
 
चाहे मंदगति हो
अथवा द्रुतगति हो
चरैवेति चरैवेति
लेखनी चलती रहनी चाहिए
 
इन ऊँगलियों से न सही
पर उन ऊँगलियों से ही सही
लेखनी चलती रहनी चाहिए 
सतत् लेखनी चलती रहनी चाहिए .

*** हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ***
 

Saturday, September 11, 2021

वो प्रेम ही क्या ........

वो प्रेम ही क्या

जो कहीं के ईंट को

कहीं के रोड़े से मिलाकर

भानुमती का कुनबा जोड़वाए

और उन्हें कोल्हू पर लगातार

तेरे-मेरे का फेरा लगवाकर

दिन-रात महाभारत करवाए


वो प्रेम ही क्या

जो दूसरों के मनोरंजन के लिए

खेल वाला गुड्डा-गुड्डी बनकर

सबको खुश कर जाए

फिर अपने बीच होते

पारंपरिक खटरागी खटर-पटर से

सबों को मिर्च-मसाला दे कर

खूब तालियां बजवाए


वो प्रेम ही क्या

जो जरा-सा ज्वलनक वाले

फुसफुसिया पटाकों की तरह

झट जले पट बुझ जाए

और उसके शोर को भी कोई

कानों-कान सुन न पाए

फिर भरी-पूरी रोशनी में भी

कालिख पोत बस अंधेरा ही फैलाए


वो प्रेम ही क्या

जो उबाऊ-सी घिसी-पिटी

दैनिक दिनचर्या की तरह

अति सरल-सुलभ हो कर

सुख-सुविधा भोगी हो जाए

और बात दर बात पर

अहं कटारी ले एक-दूसरे का

आजीवन प्रतिद्वंद्वी बन जाए


वो प्रेम ही क्या

जो पहले से निर्धारित सुलह के 

परिपाटी पर पूरा का पूरा खरा उतरे

पर जिसमें कोई भी रोमांच न हो

या न हो सैकड़ों-हजारों झन्नाटेदार झंझटें

और जो जान-जहान का रिस्क न लेकर

उठाये न लाखों-करोड़ों खतरे


वो प्रेम ही क्या

जिसको भली-भांति 

ये न पता हो कि

बस कुछ पल का ही मिलना है

और बहुत दूर हो जाना है

फिर मिलने की तड़प लिए

हर पल तड़फड़ाना है


वो प्रेम ही क्या

जिसपर दुनिया एक-से-एक

मजेदार मनगढ़ंत कहानियाँ

बना-बनाकर न हँसे

और एक सुर मिलाते हुए

सही-गलत की कसौटी पर

खूब बाँच-बाँच कर न कसे


वो प्रेम ही क्या

जो आह भरा-भरा कर

सबके सीने पर

जलन का साँप न लोटवाए

काश! उन्हें भी कभी

कोई ऐसा प्रेम मिल पाता

ये सोचवा-सोचवा कर

प्रेम हलाहल न घोटवाए


वो प्रेम ही क्या

जो दहकता अंगार बना कर

हर पल प्रेम दवानल में

बिना सोचे-समझे न कुदवाए

और अल्हड़ अक्खड़ता से

दोधारी तलवार पर चलवाकर

खुशी-खुशी शीश न कटवाए


वो प्रेम ही क्या

जो युगों-युगों तक

साँसों का सुगंध बन

सबके नथुनों को न फड़काए

और जीवित मुर्दों के साथ-साथ

लकीरों के फ़कीरों में भी

भड़भड़ करवा कर न भड़काए


वो प्रेम ही क्या

जो शब्दातीत होकर

शाश्वत न हो जाए

शायद इसीलिए तो

रुक्मिणी के शैलीगत प्रेम पर

राधा का शहद लुटाता प्रेम 

सदा के लिए भारी पड़ जाए .

Sunday, September 5, 2021

जब माँ किलक कर कहती है ...........

जब माँ 

अपनी बेटी से

किलक कर

कहती है कि

अरे !

तू तो 

मेरी ही माँ

हो गई है

तब गदराये गाल

और झुर्रियों की

अलोकिक दपदपाहट

ऊर्जस्वित होकर

सृष्टि और सृजन को

हतप्रभ करते हुए

परम सौभाग्य से

भर देती है.


                                   साधारणतया जो गर्भ धारण कर बच्चे को जन्म देती है वो माँ कहलाती है । माँ अर्थात सृष्टि सर्जना जिसकी सर्वश्रेष्ठता अद्भुत और अतुलनीय होती है । इसलिए मातृत्व शक्ति प्रकृति के नियमों से भी परे होती है जो असंभव को संभव कर सकती है । एक माँ ही है जो आजीवन स्वयं को बच्चों के अस्तित्व में समाहित कर देती है । जो बिना कहे बच्चों को सुनती है, समझती है और पूर्णता भी प्रदान करती है । पर क्या बच्चें अपनी माँ के लिए ऐसा कर पाते हैं ?  क्या बच्चें कभी समझ पाते हैं कि उनकी माँ भी किसी की बच्ची है ? भले ही माँ की माँ शरीरी हो या न हो । पर क्या बच्चें कभी जान पाते हैं कि उनके तरह ही माँ को भी अपनी माँ की उतनी ही आवश्यकता होती होगी ? 

                                   सत्य तो यह है कि माँ का अतिशय महिमा मंडन कर केवल धात्री एवं दात्री के रूप में स्थापित कर दिया गया है । जिसे सुन-सुनकर बच्चों के अवचेतन मन में भी यही बात गहराई से बैठ जाती है । जिससे वे माँ को पूजित पाषाण तो समझने लगते हैं पर वो प्रेम नहीं कर पाते हैं जिसकी आवश्यकता माँ को भी होती है । जबकि वही बच्चें अपने बच्चों को वैसे ही प्रेम करते हैं जैसे उनके माता-पिता उन्हें करते हैं । पुनः उनके बच्चें भी उनको उसी रूप में प्रेम करते हैं तब बात समझ में आती है कि कमी कहाँ है ।

                                 अपने माता-पिता को अपने बच्चों की तरह न सही पर दत्तक की तरह ही प्रेम कर के देखें तो पता चलेगा कि प्रेम का एक रूप यह भी है । जैसे अपने बच्चों को प्रेम करते हुए बिना कुछ कहे ही सुनते-समझते हैं वैसे ही अपने माता-पिता को भी सुनने-समझने का प्रयास कर के तो देखें तो सच में पता चलेगा कि प्रेम का वर्तुल कैसे पूर्ण होता है । सत्यत: प्रेम की आवश्यकता सबों को होती है और अंततः हमारा होना प्रेम होना ही तो है ।


मैंने माँ को 

बच्ची की तरह

कई बार किलकते देखा है

हर छोटी-बड़ी बातों में

खुश हो-होकर

बार-बार चिलकते देखा है

हाँ ! ये परम सौभाग्य

मेरे भाग्य का ही तो 

अकथनीय लेखा है

जो मैंने माँ को भी

सहज-सरल बाल-भाव में

मुझे अनायास ही

माँ कहते हुए देखा है .         

                      *** परम पूज्य एवं परम श्रद्धेय ***

      *** समस्त प्रथम अकाल गुरु (माता-पिता) को समर्पित ***

                   *** हार्दिक शुभकामनाएँ एवं आभार ***           

Thursday, September 2, 2021

क्षणिकाएँ ...........

जहाँ किसी की परवाह भी 

चलन में अब नहीं रहा

वहाँ जिंदा होने की गवाही

लाउडस्पीकर पर 

साँस लेना हो गया है


***


जहाँ फूँक-फूँक कर भी

छाँछ पीने पर

मुँह में फफोले पड़ जाए तो

वाकई हम कुछ ज्यादा ही

संवेदनशीलता की दौर में हैं


***


जहाँ सबों से जुड़ते हुए

खुद से टूटने का

ज्यादा अहसास होता हो

वहाँ भयावह सच्चाइयों से

नजर न मिलाना ही बेहतर है


***


जहाँ भावनाऐं

हाथी के दांत से भी

बेशकीमती हो गई हों

वहाँ वक्त के फटेहाली पर

यकीन कर लेना चाहिए


***


जहाँ दो गज जमीन पर भी

इतनी मार-काट मची हो

वहाँ सभ्येतर ठहाकों की गूंज

शांति की बातों से 

कहीं ज्यादा डराती हैं . 

Sunday, August 29, 2021

साधो, हम कपूर का ढेला !.........

साधो, हम कपूर का ढेला !


कोई पक्का तो कोई कच्चा

कोई असली तो कोई गच्चा

कोई बूढ़ा खोल में भी बच्चा

कोई उत्तम तो कोई हेला !

साधो, हम कपूर का ढेला !


इक चिंगारी भर की दूरी पर

बस नाचे अपनी ही धुरी पर

पर सब हठ मनवाए छूरी पर

हर कोई अपने  में अलबेला !

साधो, हम कपूर का ढेला !


एक-एक चाल में धुरफंदी

समझौता से गांठें संधी

जुगनू से लेकर चकचौंधी

दिखाए रंग-बिरंगा खेला !

साधो, हम कपूर का ढेला !


अबूझ-सा सब लालबुझ्क्कड़

अपनी गुदड़ी में ही फक्कड़

उड़े ऐसे जैसे हो धूलधक्कड़

सज्जन बनकर भी रहे धुधेला !

साधो, हम कपूर का ढेला !


फटे बांस में दे सुरीला तान

करता रहे बस ताम-झाम

अपने से ही सब अनजान

खुद ही गुरु खुद ही चेला !

साधो, हम कपूर का ढेला !


कोई शुद्ध तो कोई मिलावटी

कोई घुन्ना तो कोई दिखावटी

कोई ठोस में भी घुलावटी

कोई बली तो कोई गहेला !

साधो, हम कपूर का ढेला !

Wednesday, August 25, 2021

खीझ-खीझ रह गई रतिप्रीता ............

अबकी सावन भी 

सीझ-सीझ कर बीता

खीझ-खीझ 

रह गई रतिप्रीता


बैरी बालम को 

अब वो कैसे रिझाए

किस विधि अपने 

बिधना को समझाए

अपने बिगड़े बिछुरंता से

ब्यथित बिछिप्त हो हारी

बिख से बिंध-बिंध कर

मुआ बिछुड़न बिछनाग जीता

खीझ-खीझ 

रह गई रतिप्रीता


दिन तो यौवन का

याचनक राग गवाए

नित सूनी सर्पिनी सेज पर 

रो-रो प्रीतरोगिनी रजनी बिताए

अँसुवन संग आस 

बिरझ-बिरझ कर रीता

ओह ! मिलन मास में भी

मुरझ-मुरझ मुरझाए मधुमीता

खीझ-खीझ 

रह गई रतिप्रीता


धधक-धधक कर

ध्वंसी धड़कन धमकावे

धमनियों में रक्त

धम गजर कर थम-थम जावे

न जाने न आवे किस कारन

तन मन प्राण पिरीता

आखिर क्यों बैरी बालम हुआ 

बिन बात के ही विपरीता

खीझ-खीझ

रह गई रतिप्रीता


अंग-अंग को

लख-लख काँटा लहकावे

लहर-लहर कर 

प्रीतज्वर ज्वारभाटा बन जावे

रह-रह मुख पर हिमजल मारे

तब भी होवे हर पल अनचीता

धत् ! अभंगा दुख अब सहा न जाए

कब तक ऐसे ही कुंवारी रहे परिनीता

खीझ-खीझ 

रह गई रतिप्रीता


फुसक-फुसक कर

चुगलखोर भादो भड़कावे

ठुसक-ठुसक कर

बाबला मन धसमसकाए

कासे कहे कि

अरिझ-अरिझ हर धमक बितीता

हाय रे ! सब तीते पर

झींझ-झींझ हिय रह गया अतीता

खीझ-खीझ

रह गई रतिप्रीता


अबकी सावन भी 

सीझ-सीझ कर बीता

खीझ-खीझ

रह गई रतिप्रीता .

Saturday, August 21, 2021

गृह लक्ष्मियाँ ..........

सँझाबाती के लिए
गोधुलि बेला में
जब गृह लक्ष्मियाँ
दीप बारतीं हैं
कर्पूर जलातीं हैं
अगरू महकातीं हैं
अपने इष्ट को
मनवांछित
भोग लगातीं हैं
और आचमन करवातीं हैं
तब टुन-टुन घंटियाँ बजा कर
इष्ट के साथ सबके लिए
सुख-समृद्धि को बुलातीं हैं

ये गृह लक्ष्मियाँ
प्रेम की प्रतिमूर्तियाँ
छुन-छुन घुंघरियाँ बजाते हुए
खन-खन चूड़ियाँ खनका कर
सिर पर आँचल ऐसे सँभालतीं हैं
जैसे केवल वही सृष्टि की निर्वाहिका हों
और अहोभाव से झुक-झुक कर
प्रेम प्रज्वलित करके
घर के कोने-कोने को छूतीं हुई
अपने अलौकिक उजाले से 
आँगन से देहरी तक को
आलोकित कर देतीं हैं
जिसे देखकर सँझा भी
अपने इस पवित्रतम
व सुन्दर स्वागत पर
वारी-वारी जाती है

तब गृह लक्ष्मियाँ
हमारी सुधर्मियाँ
तुलसी चौरा का 
भावातीत भाव से
परिक्रमा करते हुए
दसों दिशाओं में ऐसे घुम जातीं हैं
जैसे जगत उनके ही घेरे में हो
और सबके कल्याण के लिए
मन-ही-मन मंतर बुदबुदा कर
ओंठों को अनायास ही 
मध्यम-मध्यम फड़का कर
कण-कण को अभिमंत्रित करते हुए 
बारंबार शीश नवातीं हैं
फिर दोनों करों को जोड़ कर
सबके जाने-अनजाने भूलों के लिए
सहजता से कान पकड़-पकड़ कर
सामूहिक क्षमा प्रार्थना करते हुए
संपूर्ण अस्तित्व से समर्पित हो जातीं हैं
 
हमारी गृह लक्ष्मियाँ
दया की दिव्यधर्मियाँ
करूणा की ऊर्मियाँ
सदैव सुकर्मियाँ
सिद्धलक्ष्मियाँ
नित सँझा को
पहले आँचल भर-भरकर
फिर उसे श्रद्धा से उलीच-उलीच कर
मानो धरा को ही चिर आयु का
आशीष देती रहतीं हैं .

Tuesday, August 17, 2021

बस हमने यही जीवन जाना ...…..

अदृश्य श्वासों का आना-जाना

अदम्य विचारों का ताना-बाना

अव्यक्त भावों का अकुलाना

बस इसको ही जीवन माना


जब जग से कुछ कहना चाहा

क्वारीं चुप्पियों के बोल न फूटे

बस घिघियाते ही रहे सारे स्वर

और विद्रोही बीज अंतर न टूटे


सुख-सपनों की नीलामी में 

बिकती रही धीरज की पूंजी

जनम-जनम की जमा बिकी

और जुग-जुग की खोई कुंजी


खुशियों के बाजारों में बस

आंसुओं का व्यवसाय हुआ

उभरते रहे नासूर समय के

औ' दर्द बेबस असहाय हुआ


अब तो शाम है ढ़लने वाली

धुंधली-धुंधली सी छाया है

किंतु जीर्ण-जगत से फिर भी

क्यों नहीं छूटता माया है ?


अमरता की कैसी अभिलाषा ?

तिक्त सत्य क्यों झूठा लगता?

अनंत कामनाओं में ही जीना

क्यों बड़ा प्रीतिकर है लगता?


क्यों इतना अब रोना-गाना ?

क्या है वो जिसे खोना-पाना?

भूल-भुलैया में ऐसे भरमाना

बस हमने यही जीवन जाना .

Sunday, August 8, 2021

कृपया गरिमा बनाए रखें! ........

ठक! ठक! ठक!

कृपया गरिमा बनाए रखें!

कृपया मर्यादा बनाए रखें!

अन्यथा सख्त कार्यवाही होगी

हमारे हर एक, झुठफलाँग-उटपटाँग सा

भ्रांतिकारी-क्रांतिकारी, क्रियाकलापों का

हमारे ही, कलह-क्लेशी कुनबे के, कटघरे में 

तुरत-फुरत वाली, आँखों देखी, गवाही होगी!

ठक! ठक! ठक!

कृपया गरिमा बनाए रखें!

कृपया मर्यादा बनाए रखें!

अन्यथा सख्त कार्यवाही होगी!


इसलिए हमें मिल-बैठकर, पद की प्रतिष्ठा बचाकर

अपने परिजनों के, बेहतर आज के लिए, कल के लिए

नागरिक, भूगोल और इतिहास फाड़ू फैसला लेना है

और सबको चौंकाऊ-सा, चकाचौंध भरा हौसला देना है

ताकि हम संसार के, माथे पर, उचक कर बैठ सके

फिर चकाचक-झकाझक, फर्राटेदार विकास गति पर 

अपनी पीठ थपथपाते हुए, आव-ताव देकर, खूब ऐंठ सके! 


इसलिए कृपया कोई भी, जिंदा या मरे मुर्दों को, न उखाड़ें

और बेकार के बहाने से, बहिष्कार की रणनीति पर

न ही अपनी, चिंदी-चिंदी मानसिकता को 

हल्के-फुल्के या गंभीर, मुद्दों पर भी, इस तरह से उघाड़ें!

अन्यथा सख्त कार्यवाही होगी

कृपया मर्यादा बनाए रखें!

कृपया गरिमा बनाए रखें!


रूकें! रूकें! रूकें!

बहुत ही, हीं-हीं, ठीं-ठीं, हो रहा है

बहुत ही, खों-खों, खीं-खीं, हो रहा है

ओह!  ये किसने? किसको? किस अदा से आँख मारा?

और इतने सारे, कागजों को, किसने है फाड़ा?

ये मेजें-कुर्सियां, ऐसे क्यों उठ रही हैं?

उफ्फ! मेरी आवाज भी, इसमें घुट रही है

कृपया सब, अपनी जगहों पर, संतों की भांति, बैठ जाएँ

कानफाड़ू शोर-शराबा न करें, कोशिश करके ही सही, पर शांति लाएँ!


फिर अपनी, बादाम-अखरोट खायी हुई

याददाश्त को, फिर से, याद दिलाए कि

हम कुनबा चलाने वाले हैं, या उसको डूबाने वाले हैं

इस तरह से, आलतु-फालतू मुद्दों पर, जब आप सब

एक साथ ही, उलट कर, सड़क पर, ऐसे उतर जाएंगे 

तो बताइए, सड़क पर रहने वाले, भला कहाँ जाएंगे?

तब, उनके लिए ही वर्षों से, अटकी-लटकी हुई सैकड़ों-हजारों

झोलझाली योजनाओं को, हम लोग, कैसे लागू करायेंगे?


यदि ईमानदारी से, आप सबों को, याद आ जाए 

कि आखिर परिजनों ने, हमें किसलिए चुना है?

तो आइए, विकास की चाल को, सब मिलकर

जोर से, धक्का लगा-लगा कर, आगे बढ़ायें

बिना बात के ही, विरोध में, इस तरह से, काम रोक कर

कृपया परिजनों के, समय और संसाधनों को

इतनी निर्लज्जता से, राजनीति के गटर में, न डूबायें!

अन्यथा सख्त कार्यवाही होगी

कृपया मर्यादा बनाए रखें!

कृपया गरिमा बनाए रखें!


अरे! अरे! अरे!

अचानक से, ये क्या हो रहा है?

क्यों सबका, खोया हुआ आपा भी, खो रहा है?

इस तरह से, जुबानी जंग में, जुमलों का चप्पल-जूता

बिना सोचे-समझे, एक-दूसरे पर, यूँ ना उछालें

और अपने पैने-नुकीले, सवालो-जवाबों से

न ही ऐसे छिलें, एक-दूसरे की, नरम-मुलायम छालें!


हो सके तो, अपने-अपने हाथों-पैरों को 

हाथ जोड़ कर, या प्यार-मोहब्बत से, जरा समझाएँ

कि बात-बेबात ही, भड़क कर कहीं, इधर-उधर न भिड़ जाए

फिर आपस में, इसतरह से, गुत्थम-गुत्थी कर के 

आप सब मिलकर, इसे ओलंपिक जैसा विश्व स्तरीय 

कुश्ती प्रतियोगिता का, चलता हुआ, अखाड़ा न बनाएँ

कृपया संयम बरतें, और मेरे आसन के सामने, ऐसे उछाल मारकर

यूँ दहाड़ते हुए, तख़्त विरोधी तख़्तियां,  दिन-दिहाड़े न दिखाएँ!


आपसे हार्दिक अनुरोध है कि, अपने आसनों पर ही 

बाकी सब लोग, विराजमानी जमाते हुए, मेजों को भी

अपने कोमल हथेलियों का, कुछ ज्यादा ख्याल रखते हुए

ढ़ोलक जान, जोर-शोर से, इतना ज्यादा न थपथपायें

न ही थोथेबाजी में, फिजुल का, नारेबाजी करते हुए

चलते सत्र को, बीच में ही छोड़कर, सब बाहर निकल जाएँ!

अन्यथा सख्त कार्यवाही होगी

कृपया मर्यादा बनाए रखें!

कृपया गरिमा बनाए रखें!


सुनें! सुनें! सुनें!

हमारे कुनबे से, बाहर के लोग सुनें! 

आपके लिए है, करजोरी-बलजोरी, क्षमा याचना के साथ

एक अत्यन्त आवश्यक, सूचना एवं वैधानिक चेतावनी

कि हम अपने कुनबे में, एक ही चट्टे-बट्टे के, सब लोग 

चाहे कितना भी, और कैसा भी, करते रहें मनमानी

पर कृपया दूर-दूर तक, कोई भी चरित्र अथवा पात्र

आगे बढ़कर इसे, बिल्कुल अन्यथा न लें 

और इस कुपितरोगी-भुक्तभोगी, दृश्यकाव्य के

किसी भी, हिस्से से चुराकर, कोई भी कथा न लें!


कारण, इसका प्रत्यक्ष और प्रामाणिक संबंध 

केवल और केवल, हमारे निहायत निजी, कुनबे से है 

क्योंकि संसार के, बड़े-बड़े अलोकतांत्रिक देश, की तरह ही 

हम अपने, छोटे-से कुनबे में भी, नियम-कानून बनाने के लिए

कुछ ऐसे ही, चिल्ल-पों कर-करके, शासन चलाते हैं 

और काम-काज के बीच में ही, हुड़दंग मचा-मचाकर

ऐसे ही, कुढ़गा कुक्कुटासन, लगाते हैं!


इसलिए इसका, मुँह और दिल खोलकर

केवल और केवल, कृपया आनन्द उठाएँ 

और गलती से भी, किसी दूसरे से, हमें जोड़कर

अथवा अन्यथा लेकर, हमारी जगहँसाई, न करवाएँ!

अन्यथा सख्त कार्यवाही होगी 

कृपया मर्यादा बनाए रखें!

कृपया गरिमा बनाए रखें!

Wednesday, August 4, 2021

उन भ्रूण बेटियों के लिए.........

अहा! चहुँओर आज तो मंगल गान हो रहा है
बची हुई नाक का देखो ना यशोगान हो रहा है
सदियों से एक सिरे से उन सारी उपेक्षितों का भी
इतना ज्यादा अनपेक्षित मान-सम्मान हो रहा है

भूरि-भूरि प्रशंसाओं के हैं काले-सफेद बोल
सब खजाना भी लुटा रहे हैं हृदय को खोल
हर चेहरे पर ओढ़ी हुई है लंबी-चौड़ी मुस्कानें
हर कोई जीते पदकों से खुश होकर रहा है डोल

पर आज उन कोखों की भी कुछ बात की जाए
जिनपर दबाव होता है कि वे बेटी को ही गिराये
कोई समाज के सारे पाखंडी परंपराओं को तोड़
उन भ्रूण बेटियों के लिए भी सुरक्षित घर बनाये

क्यों बेटों के लिए बेटियों को कुचला जाता है ?
कोई क्यों बेटियों का ही भ्रूण हत्या करवाता है ?
घरेलू हिंसा की पीड़िता सबसे है पूछना चाहती 
क्या इस तरह ही समाज गौरवशाली बन पाता है ?

यदि सारी बेटियाँ अपने ही घर में बच जाएँगी
तो वे विरोध से नहीं बल्कि प्रेम से बढ़ पाएँगी
तब तो दो-चार ही क्यों अनगिनत पदकों का भी
अंबार लगाकर ढ़ेरों नया-नया इतिहास बनाएँगी .

      *** बेटी खेलाओ पदक जिताओ ***

Sunday, August 1, 2021

एक कालजयी कविता के लिए .....

एक कालजयी कविता के लिए
असली काव्य-तत्त्व की खोज में
जब-जब जहाँ-तहाँ भटकना हुआ
तब-तब अपने ही शातिर शब्दों के 
मकड़जाल में बुरी तरह से अटकना हुआ

न जाने कैसी-कैसी और कितनी बातों को
गुपचुप राज़ सा या खुलेआम ख्यालातों को
जाने-अनजाने से या किसी-न-किसी बहाने से
चोरी-छुपे पढ़ती, सुनती और गुनती रही
शायद हीरा-जवाहरात मानकर ही सही
पूरे होशो-हवास और दम-खम से
अपने कलमकीली कबाड़ झोली में 
बस कंकड़-पत्थर ही बीनती रही

अब तक के उन तमाम नामी-गिरामी
कलमतोड़ों और कलमकसाइयों के
पदछापों पर मजे से टहलते हुए
अपने ख्याली पुलावों को 
बड़े चाव से कलमबंद करते हुए
उसी कबाड़ झोली का सारा जमा-पूंजी को
आज का अँधाधुँध सत्य जानकर
मन ही मन में खुद को कलम का उस्ताद मानकर
शब्दों में आयातित गोंद और लस्सा लगाकर
उसे उसके संदर्भ से जोड़ना चाहा

पर मेरी उधाड़ी जुगाड़ी कोशिशों को भाँपकर 
बरबादी की ऐसी सत्यानाशी सनक से काँपकर
अपनी ही रूह की होती मौत देख बेचारी कविता 
सिर धुनती हुई बन गई रूई का फाहा

तिस पर भी उसको मनाने के वास्ते मैंने
बाजार जाकर खरीद-फरोख्त की गई
वर्जनाओं को, उत्तेजनाओं को, अतिरंजनाओं को
इधर-उधर से माँगी-चाँगी हुई, छिनी-झपटी हुई
अन्तर्वेदनाओं को, संवेदनाओं को, परिवेदनाओं को
शोहरती तमन्नाओं की आग में ख़ूब तपाया
पर निर्दयी कविता तो जरा-सी भी न पिघली 
लेकिन शब्दों और अर्थों का डरावना-सा
लुंज-पुंज अस्थि-पंजर जरूर हाथ आया

फिर उसको रिझाने-लुभाने के वास्ते मैंने
अपनी सारी बे-सिर-पैर की तुकबंदियों को भी 
ग़ज़लों-छंदों का सुन्दर-सा आधुनिक परिधान पहनाया
और उसे उसके अर्थो से भी एकदम आजाद करके
कसम से आज़माईश का सारा गुमान चलाया

अब जी मैं आता है कि 
किसी भी काव्य-तत्त्व की खोज में
प्रेतों-जिन्नों की तरह भटकना छोड़ कर 
प्राणों से फूटती कविता के इंतजार में
चुपचाप सबकी नजरों से कहीं दूर जाकर
खुद से भी छुपकर धूनी रमाए बैठ जाऊँ

पर नालायक कवि मन कहता है कि
गलती से ही सही पर जब तेरे माथे पर
लिखा जा चुका है कि तू कवि है तो
जो जी में आए बस तू लिखता रह, लिखता रह
ज्यादा न सही पर कुछ तो शोहरत-नाम मिलेगा
झटपट लिखो-छापो के इस जादुई जमाने में
फटाफट ढ़ेर सारा ज़हीर कद्रदान मिलेगा
अगर मेहरबानों की नजरें इनायत हुई तो
झोली भर-भर कर भेंट और इनाम मिलेगा

तो कवि मन के झांसे में आकर मैंने भी सोचा कि
कोई मुझे एक-एक शब्द पर पढ़-पढ़ कर सराहे 
या शेखचिल्ली समझ कर खूब खिल्ली उड़ाए
या मुझे मुँह भर-भरकर गाली-आशीर्वाद दे
या फकत कलमघिस्सी जान ज़ायका-आस्वाद ले

पर लिखने वाला हर बेतरतीब-सी बिखरी चीजों को
बुहारी मारते हुए समेट कर लिखता है
जिसमें किसी को सुन्दर कविता तो
किसी को बस रद्दी का टुकड़ा ही दिखता है
इसलिए मैं भी क्यों कहीं दूर जाकर
प्राणों की कविता के इंतजार में बैठ जाऊँ
कवि हूँ तब तो ईमानदारी से या बेइमानी से 
अगड़म बगड़म कुछ भी लिख-लिख कर क्यों नहीं
रद्दियों का ही सही बड़ा-सा अंबार लगाऊँ .

Wednesday, July 28, 2021

रूठी रहूंगी सावन से ......

तुम्हारे आने तक 
रूठी रहूंगी सावन से

हिय रुत मनभावन से
बूंदों के सरस अमिरस गावन से
अगत्ती अगन लगाने वाला 
छिन-छिन काया कटावन से
नव यौवनक उठावन से
कनि-कनि कनेरिया उमगावन से
ऐसे में मुझ परकटी को छोड़ कर
पीड़क परदेशी तेरे जावन से
तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से

घिर-घिर आएंगी कारी बदरिया
बन कर तेरी बहुरूपिनी खबरिया
कभी गरज कर, कभी अरज कर
कभी चमका कर बिजई बिजुरिया
बरस-बरस कर मुझे मनावेंगी
पर मुझपर न चलेगा
कोई भी तेरा जोर जबरिया
न मानूंगी किसी भी लुभावन से
तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से

ढोल, मंजीरों पर थाप पड़ेंगी
मृदंग संग झांझे झमकेंगी
घुंघरू पायल की रुनझुन में
सब सखियन संग झूलुआ झूलेंगी
सबके हाथों सजन के लिए मेंहदी रचेंगी
और हरी-भरी चूड़ियां खन-खन खनकेंगी
पर मुझ बिरहिन, बैरागिन को
बिरती है सब सिंगार सजावन से
तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से

कली-कली चहक कर चिढ़ाती
अकड़ कर डाली-डाली अँगड़ाती
फूल-फूल कंटक-सा चुभता
क्यारी-क्यारी यों कुबानी सुनाती
जलहीन मीन सी अँखियां अँसुवाती
और उर अंतर चिंता ज्वाल से धुँधुवाती
हाय! बड़ा बेधक है ये बिलगना
पर क्या हो अब पछतावन से
तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से

पंथ है बड़ा कठिन ज्यों जानती
परदेशी तुमको बस पाहुन ही मानती
हर रुत परझर सा है लगता
तुम्हें हिरदेशी बना मैं ऐसे न कानती
और तेरी जोगनिया बन हठजोग न ठानती 
तब अंधराग तज सावन का संदेसा पहचानती
तन-मन से हरियाती, झुमरी-कजरी गाती
बस एक तेरे आवन से
तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से

तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से .

***सुस्वागतम्***

Friday, July 23, 2021

गुरुक्रम हो तुम .......

पहले प्यास हुए
अब तृप्ति की आवृत्ति हो तुम
मेरी प्रकृति की पुनरावृत्ति हो तुम

पहले उद्वेग हुए
अब आसक्ति के आवेग हो तुम
मेरी अभिसक्ति के प्रत्यावेग हो तुम

पहले आकर्ष हुए
अब भक्ति के अनुकर्ष हो तुम
मेरी आकृति के उत्कर्ष हो तुम

पहले श्रमसाध्य हुए
अब आप्ति के साध्य हो तुम
मेरी प्रवृत्ति के अराध्य हो तुम

पहले साकार हुए
अब अनुरक्ति के आकार हो तुम
मेरी अतिश्योक्ति के अत्याकार हो तुम

पहले अलंकार हुए
अब अभिव्यक्ति के शब्दालंकार हो तुम
मेरी गर्वोक्ति के अर्थालंकार हो तुम

पहले भ्रम हुए
अब जुक्ति के उद्भ्रम हो तुम
मेरी मुक्ति के गुरुक्रम हो तुम .

*** गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ ***
*** हार्दिक आभार समस्त गुणी जनों को ***

Sunday, July 18, 2021

मोह लगा है ........

जबसे सोने के पिंजरे से मोह लगा है

अपना ही ये घर खंखड़ खोह लगा है

सपना टूटे , अब अपना ही सच दिखे

दिन- रात एक यही ऊहापोह लगा है


इस घर में अब उदासी-सी छाई रहती है

मेरे सुख-चैन को ही दूर भगाई रहती है

मन तो बस , बंद हो गया उसी पिंजरे में

उसे पाने की इच्छा , फनफनाई रहती है


स्तब्ध हूँ कि कैसे मैं अबतक हूँ यहाँ

जो दिखता था जीवन , यहाँ है कहाँ

छल करता हर एक सुख है , पर अब

आँखों को दिखता साक्षात स्वर्ग वहाँ


अब वही , सोने का स्वर्ग मुझे चाहिए

मदाया हुआ , उन्मत्त गर्व मुझे चाहिए

दुख में ही तो बीता हीरा जनम , अब

क्षण-क्षण छंदित मेरा पर्व मुझे चाहिए


अपना होना भी मिटाना पड़े मिटा दूंगी

सबकुछ लुटाना पड़े तो , सब लुटा दूंगी

हँसते-हँसते उस सोने के पिंजरे के लिए

पर कटाना पड़े तो , खुशी से कटा लूंगी


अभी तो उस झलकी का संयोग लगा है

जीर्ण- जगत गरल सम प्रतियोग लगा है

असमंजस में प्राण है बीते न बिताए पल

जबसे उस सोने के पिंजरे से मोह लगा है .

Sunday, July 11, 2021

प्रसन्न हूँ तो.........

प्रसन्न हूँ तो पानी हूँ

अप्रसन्न हूँ तो पहाड़ हूँ


पकड़ लो तो किनारा हूँ

छोड़ दो तो मँझधार हूँ


संग बहो तो धारा हूँ

रूक गये तो कछार हूँ


सम्मुख हो तो दर्पण हूँ

विमुख हो तो अँधार हूँ


चुप रहो तो मौन हूँ

बोलो तो विचार हूँ


फूल हो तो कोमल हूँ

शूल हो तो प्रहार हूँ


छाया हो तो व्यवधान हूँ

मौलिक हो तो आधार हूँ


संशय हो तो दुविधा हूँ

श्रद्धा हो तो उद्धार हूँ


झूठ हो तो विभ्रम हूँ

सच हो तो ओंकार हूँ .


 " दारिद्र्यदु: खभयहारिणि का त्वदन्या 

सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता । "

*** गुप्त नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

Friday, May 14, 2021

एक और इतिहास ......

यह युग 

बीत ही जाएगा

और

एक और युग भी आएगा

जो बीत रहा है वह भी

इतिहास बन जाएगा

पर दोनों कल के

पलड़ों के बीच

शीतयुद्ध जैसा फिर से

कुछ ठन जाएगा

और

ऊँघते काल के प्रवाह में

उबाल और उलार को

नापने के लिए

अनगिनत आँख जड़ा 

असंख्य चँदोवा 

तन कर, तन जाएगा

तब फिर से

सहमतियों की

आँखों की कृपा पर

हर अगले पन्ने की छपाई

निर्भर करेगा

उनका रंगाई-पुताई

बीते हुए सारे

कानाफूसियों का रहना

दूभर करेगा

और फिर सबमें

एक चुपचाप

शब्दयुद्ध ठन जाएगा 

भूलाने लायक

बहुत सारी बातें

कहीं हाशिए में

नामोनिशान मिटा कर

दफन कर दिया जाएगा

कुछ बातों को

सौंदर्य प्रसाधनों से

लीपा-पोती करके

और भी आकर्षक

बना दिया जाएगा

फिर से

इस युग के भी बीतने पर

वही गड्ड-मड्ड सा 

एक और

इतिहास बन जाएगा 

जिसमें ढूंढने पर भी

इस आज की सच्चाई

कभी नहीं मिलेगी . 


Saturday, May 8, 2021

कठपुतली होने की विवशता .........

                  जीवन को कुछ अलग हटकर देखने से यही लगता है कि यह आजीवन केवल सहन करने का ही काम है । जैसे बोझ ढोने वाले जानवरों पर उनसे पूछे बिना किसी भी तरह का और कितना भी वजन का बोझ डाल दिया जाता है । फिर पीछे से हुड़का कर, डरा कर या डंडा मार-मारकर बिना रूके हुए चलाया जाता है, ठीक ऐसा ही जीवन है । यदि वह जानवर रूकना चाहे या बोझ उतारना चाहे या कुछ और करना चाहे,  तो भी कर नहीं सकता है या कर नहीं पाता है । कारण उसे लगता है कि उसपर डाला गया बोझ और वह एक ही है और यही उसका जीवन भी है । कभी-कभार उस जानवर को ये बात समझ में आ भी जाती है तो भी वह उस बोझ को हटा नहीं पाता है क्योंकि उसे उसकी आदत हो गई होती है । वह स्वयं भी खाली होने की कल्पना मात्र से ही डर जाता है । उसे लगता है कि उसका जीवन भी खो जायेगा और वह मर जाएगा । 

                           फिर से देखा जाए तो जीवन, जीवन पर्यन्त सब कुछ हमारे विपरीत होने का ही नाम है । हम पल-प्रतिपल अपनी सहनशीलता को अपनी ही कसौटी पर कसते रहते हैं । साथ ही उसके अनुरूप हो रहे सारे अनुकूल-प्रतिकूल बदलावों के अनुसार अपने-आपको ढालने के उबाऊ और थकाऊ प्रयासों के चक्रव्यूह में फँसते रहते हैं । पर उन विपरीतों में अचानक से कुछ ऐसा भी होता रहता है कि हम सहज भरोसा नहीं कर पाते हैं कि हमारे अनुकूल भी कुछ होता है । जो कि केवल संयोगावशात ही होता है । पर हम अति प्रसन्न होकर अपनी ही पीठ थपथपा लेते हैं । हम स्वयं को समझा लेते हैं कि हमारे करने से ही हुआ है पर उन असफलताओं को उस क्षण कैसे भूल जाते हैं जिसके लिए हमने कभी स्वयं को भी दांव पर लगा दिया था । लेकिन हमारा मन इतना चालाक होता है कि वो हमसे पहले ही अपने तर्कों को तैयार कर लेता है और अपने अनुसार हमसे मनवा भी लेता है ।

                                            हालांकि हमारे अनुरूप कुछ भी होने की मात्राओं में बड़ा अंतर हमें आशा-निराशा के द्वंद में उलझाता रहता है और हम स्वयं से ही प्रश्न पूछने पर विवश होते रहते हैं कि आखिर हमारा होना क्या है ? तब हमें थोड़ा-थोड़ा पता चलता है कि सच में हम मात्र एक कठपुतली ही हैं और हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है, स्वयं को सहन करने के अतिरिक्त । पर हमारा अहंकार यह मानना नहीं चाहता है जबकि हम देखते रहते हैं कि हम जीवन में जो करना चाहते हैं वो कर नहीं पाते हैं । यदि कर भी पाते हैं तो वो आंशिक रूप में ही होता है । परन्तु जो हम कभी करना नहीं चाहते थे, वही सबकुछ हमें न चाहते हुए भी करते रहना पड़ता है । उन अनचाहे कर्मों को करते हुए हम इतने विवश होते हैं कि आत्म-विरोध के अतिरिक्त कुछ नहीं कर पाते हैं । कारण हमें उन जानवरों की तरह ही सिखा-पढ़ाकर इतना अभ्यास करा दिया गया होता है कि हम अपने ही कोल्हू पर घुमते रहने के आदी हो जाते हैं । 

                                        फिर जीवन क्या है ? संभवतः अपने ही हवन-कुंड में अपनी ही समिधा को सुलगाना । या किसी ऐसे आत्म-संकल्प को अपने विचार-यज्ञ में स्वयं होता बनकर सतत आहुत करते रहना जिसको हम ही कभी नहीं जान पाते हैं । या अपनी ही बलि-वेदी पर अपने श्वास-श्वास को चढ़ाकर जीवन का प्रसाद पाना । या सुनी-सुनाई हुई, तथाकथित कर्म और मुक्ति के सिद्धांतों के जलेबी जैसी बातों से थोड़ा-थोड़ा रस चाट-चाटकर कर आत्म-संतोष के झूठे आश्वासन में तबतक श्वास लेते रहना जबतक वह स्वयं ही रूक नहीं जाए । 

                                  इस वर्तमान में प्रश्नों के अंबार हैं पर उत्तर की कोई भी चाह या आवश्यकता नहीं है । जो दिख रहा है वही इतना अधिक है कि बहुत सारी बातें  अपने-आप इस मूढ़ बुद्धि को बहुत-कुछ समझा रही है । चला-चली के इस बेला में अपनों से बिछुड़ते हुए आत्म-सांत्वना के शब्द या जीवन से पुनः जुड़ाव का कोई प्रयास करना,  छलावा मात्र लग रहा है । जो हो रहा है सो हो रहा है । जिसे देखता हुआ मूकदर्शक बहुत कुछ कहना चाहता है पर कहने मात्र से ही कुछ हो जाता तो वह अवश्य कहता रहता । वह अपने कठपुतली होने की विवशता को अच्छी तरह से जानता है । हाँ! वह भीतर-ही-भीतर दुखी हो सकता है, वह दहाड़े मारकर रो सकता है, वह छाती भी पीट सकता है,  किसी को जी भर कर कोस भी सकता है और जीवन से विमुख भी हो सकता है ।

                                   पर वह सामूहिक कल्याण के लिए अनवरत आर्त्त प्रार्थना ही करता रहता है । बाह्य रूप से वह इतना तो कर ही सकता है कि आशा का दीपक जलाकर औरौं को भी प्रदीप्त करता रहे , बिखर गए धीरज की पूंजी को दोनों हाथों से समेट कर लुटाता रहे ।  किसी को संबल का दृढ़ और स्नेह भरा हाथ बढ़ा सके । किसी को सिर रखने के लिए वह अपना मजबूत कंधा दे सके । वह दुःख के गीत को कम गाए और सुख के गीतों से कण-कण को गूंजा दे । वह सबके ओंठो पर उम्मीदों की हँसी न सही मुस्कान ही खिला दे । वह मानव जीजिविषा के हठ को पुनर्जीवित कर सके । करने को बहुत-कुछ है जिसे वह कर सकता है । पर यह कैसे कह सकता है कि ये समय भी बीत जाएगा और सबकुछ ठीक हो जाएगा । जबकि वह देख रहा है कि बहुत-कुछ ऐसा हो गया है कि वह कभी पूर्व गति को प्राप्त नहीं हो सकता है साथ ही वह भी स्वयं को उस बीत जाने वाली पंक्ति में ही पाता है । 

Friday, April 30, 2021

बलात् ही क्यों न हो .....

साधारण हूँ

साधारण ही होना चाहती हूँ

इन्द्रियों को वश में करना नहीं आता है

इन्द्रियों की दासता भी नहीं आती है

बस इतना ही होना चाहती हूँ कि

जब क्रोध आये तो बिना प्रतिरोध के

सहजता से स्वीकार करके प्रकट करूं

और जब प्रेम आये तो

उसे भी सरलता से कर सकूं

बस उतना ही साधारण होना है

कि भावों के परिवर्तित प्रवृत्तियों में भी

स्वयं को मैं कभी न रोकूं

और यदि कोई रोके तो

उसे रोकने भी नहीं दूं 

चाहे वह प्रतिरोध

बलात् ही क्यों न हो .


Sunday, April 25, 2021

यकीनन तड़प उठते हैं हम ......

जुनूं हमसे न पूछिए हुजूर कि हमसे क्या-क्या हुआ है ताउम्र

उलझे कभी आसमां से तो कभी बडे़ शौक़ से ज़मींदोज़ हुए 


अपनी ही कश्ती को डूबो कर साहिल से इसकद उतर आए हम

अब आलम यह है कि इब्तदाए-इश्क का गुबार भी देखते नहीं


जो सांस की तरह थे उनसे तौबा कर लिया सीने को ठोक कर 

बेशर्मी से मांग लिया दिल भी जो कभी नाजो-अदा से दिया था 


उन्होंने मुरव्वत न सीखी तो तहज़ीब ही सही सीख लेते हमसे

हसरतें थी उनपर मिट जाने की और वही अदावत सिखा गये


इक-दूजे को शुक्रे-कर्दगार करके जुदा हो गए गर्मजोशी से हम

जिंदगी का क्या नई चाहतें जिधर ले जाएंगी उधर ही चल पड़ेंगे 


माना कि इश्क सूफियाना था शायद है और आगे भी यूं ही रहेगा 

गर गलती से भी वो याद करते हैं तो यकीनन तड़प उठते हैं हम .


Friday, April 9, 2021

एक चोट की मन:स्थिति में .......

                               चोट लगी है, बहुत गहरी चोट लगी है । चोट किससे लगी है, कितनी लगी है,  कैसे लगी है, क्यों लगी है, कहाँ लगी है जैसे कारण गौण है ।  न तो कोई पीड़ा है न ही कोई छटपटाहट है, बस एक टीस है जो रह-रहकर बताती है कि गहरी चोट लगी है । न कोई बेचैनी है, न ही कोई तड़प और फूलों के छुअन से ही कराह उठने वाला दर्द भी मौन है । शून्यता, रिक्तता, खालीपन पूरे अस्तित्व में पसरा है । सारा क्रियाकलाप अपने लय और गति में हो रहा है पर कुछ है जो रुक गया है । कोई है जिसको कुछ हो गया है और बता नहीं पा रहा है कि उसको क्या हुआ है । 

                                     गहरे में कहीं इतना नीरव सन्नाटा है कि आती-जाती हुई साँसें विराम बिंदु पर टकराते हुए शोर कर रही है । हृदय का अनियंत्रित स्पंदन चौंका रहा है । शिराओं में रक्त-प्रवाह सर्प सदृश है । आँखें देख रही है पर पुतलियां बिंब विहीन हैं । स्पर्श संवेदनशून्य है । गंध अपने ही गुण से विमुख है । कहीं कोई हलचल नहीं है और न ही कोई विचलन है । किसी सजीव वस्तु के परिभाषा के अनुसार शरीर यंत्रवत आवश्यक कार्यों को संपादित कर रहा है । पर तंत्रिकाओं का आपसी संपर्क छिन्न-भिन्न हो गया है जैसे उनमें कभी कोई पहचान ही नहीं हो ।

                               हृदय के बीचों-बीच कहीं परमाणु विखंडन-सा कुछ हुआ है और सबकुछ टूट गया है ।  उस सबकुछ में क्या कुछ था और क्या कुछ टूटा है, कुछ पता नहीं है । बस सुलगता ताप है, दहकती चिंगारियां हैं और भस्मीभूत अवशेष हैं । उसी में कोई नग्न सत्य अपने स्वभाव में प्रकट हो गया है । उस चोट से आँखें खुली तो लगा जैसे लंबे अरसे से गहरी नींद में सोते हुए, मनोनुकूल स्वप्नों का किसी काल्पनिक पटल पर प्रक्षेपण हो रहा हो और उसी को सच माना जा रहा हो । एक ऐसा सच जो शायद कोई भयानक, सम्मोहक भ्रम या कोई भूल-भुलैया जैसा, जिससे निकलने का कोई रास्ता नहीं हो । सोने वाला भी मानो उससे कभी निकलना नहीं चाहता हो । फिर उसी गहरी नींद में अचानक से कोई बहुत जोरों की चोट देकर जगा दिया ।

                                  किंकर्तव्यविमूढ़ वर्तमान, अतीत और भविष्य को साथ लिए स्वयं ही आकस्मिक अवकाश लेकर कहीं चला गया है । इच्छाएं किसी अंधेरी गुफा में जाकर छिप गई हैं । आशाएं भय से कांप रही हैं । पारे-सी लुढकती हुई स्मृतियां किसी भी प्रतिक्रिया से इन्कार कर रही है । सारे भाव अपने वैचारिक लहरों के साथ अपनी ही तलहटी में बैठ गये हैं । जैसे कोई तथाकथित कुबेर अचानक से दिवालिया हो गया है और उसके चेहरे को भी एक झटके में ही मिटा दिया गया हो । कोई है जो तटस्थ और मूकदर्शक है । अनायास आये बवंडर से या तो वह हतप्रभ है या निर्लिप्त है । पर जो हो रहा है उसके अनुसार मन:स्थिति की गतिविधियां इतना तो बता रही है कि गहरी चोट लगी है । 

                                     बार-बार क्यों लग रहा है कि जैसे किसी बड़े-से मेले में कोई बहुत छोटा-सा बच्चा खो गया है । वह अबोध बच्चा ठीक से बोल भी नहीं पा रहा है और अपनों को खोज रहा है । किसी भी अपने के नहीं मिलने पर सबसे इशारों में ही घर पहुंचाने की जिद करते हुए लगातार रोये जा रहा है । कुछ ऐसी ही जिद में कोई है जो अब रो रहा है । शायद उसे भी अपने घर की बहुत याद आ रही है और कोई गोद में उठा कर उसे उसके घर पहुंचा दे । 

                     

Sunday, April 4, 2021

ये चिट्ठा कवि क्या कह रहा है ...

                          हर व्यक्तित्व का अपना स्वभाव, अपना संस्कार, अपना व्यवहार होता है और बहुआयामी व्यक्तित्व वो होता है जो किसी भी बौद्धिक आयामी सांचे में न बंधकर, जीवन जनित समस्त अनुभवों को स्वतंत्र रूप से आत्मसात करता है। जब कभी उसके भीतर छिपा हुआ कवि उसे आवाज देता है तो वह अपनी ही सारी सीमाओं को तोड़कर शब्दों में गढ़ देता है । वो खुद ही प्रथम पाठक के रूप में उस कविता की खोज में सतत् लगा रहता है जो उसके नितांत व्यक्तिगत प्रतिक्रिया के परिणाम स्वरूप जन्म लेती है । संभवत उस कविता में कहने वाला मौन हो जाता है और जीवन का गहरा अर्थ अपने आप प्रकट हो जाता है । जो किसी भी संकुचित दायरा को विस्तार देने के लिए कटिबद्ध होता है ।

                     लेकिन शब्द और शब्द की अन्तरात्मा का ज्ञान भी शब्दों की सीमा का अतिक्रमण नहीं कर पाते है जब अर्थ अनंत हो तो । उन अनंत अर्थों की भावनाओं में कुछ भावनाएं ऐसी भी होती है जो किसी के लिए अनायास होती है और प्रकट होकर भार मुक्त होना चाहती है । मानो वह कहना चाह रही हो कि मुझ हनुमान के तुम ही जामवंत हो और तुम न मिलते तो अपनी ही पहचान नहीं हो पाती । फिर कविता रूपी सिंधु पार करना तो असंभव ही था। यदि यह प्रकटीकरण किसी अंतर्मुखी चेतना के द्वारा हो तो शब्द और भी स्वच्छंद हो जाते हैं अपनी महत्ता स्थापित करने के लिए । फिर उन्हें संप्रेषण के लिए मनाना किसी पहाड़ पर चढ़ने के जैसा हो जाता है । पर पहाड़ चढ़े बिना भी तो कैलाश नहीं मिलता है और कैलाश के बिना आप्त शिव नहीं मिलता । 

                         वह अंतर्मुखी व्यक्तित्व अपने लेखन के यायावरी यात्रा को पलट कर देखता है तो पाता है कि जैसे वह अपने ही खदान से निकला हुआ कोई बेडौल , बेढंगा, अनगढ़-सा रंगीन पत्थर हो । जिस पर कुछ जौहरियों की नजर पड़ती है, जो बड़े प्यार से उसे छेनी और हथौड़ी थमा देते हैं और प्रेरित करते हैं कि खुद ही अपने को काटो, छांटो और तराशो । साथ में ये भी बताते हैं कि तुम हीरा हो ।  वो रंगीन पत्थर प्रेमपूर्ण प्रेरणा और संबल पाकर खुद को धार देते हुए संवारने लगता है । कालांतर में वह अपने ही निखार से चकित और विस्मित भी होता रहता है । तब उसे पता चलता है कि वह भी एक कोहिनूर हीरा है । अक्सर कुछ जौहरी जरूरत के हिसाब से खुद छेनी और हथोड़ी भी चला दिया करते हैं ताकि उस हीरा में और भी निखार आ सके ।  तब वह हीरा उन जौहरियों के आगे बस नतमस्तक होता रहता है ।

                        उस यात्रा में काव्य तत्व की तलाश में भटकने का अपना एक अलग ही रोमांच है । कल्पना के कल्पतरू पर नया प्रयोग, नयी शैली, नया जीवन संदर्भ जैसे मौलिक फूलों को उगाना भी अपने आप में रोचक है । किसी की बातें उसके मुंह से छीन लेने की इच्छा, किसी के सत्य से खुद को जोड़ लेने की लालसा, किसी की संवेदना में खुद को तपा देने की आकांक्षा परकाया गमन को अनुभव करने जैसा ही है । फिर ये कहना कि चेतना के तल पर हम एक ही तो हैं पूर्णता को पाने के जैसा ही है । उसे जब एक-एक शब्द पर सराहते हुए पढ़ा जाता है तो वह और भी विनयशील होकर अपने को नये ढंग से संस्कारित करता है । पर वह अपने मनोवेगों को अधिक मुखर नहीं होने देता है और संतुलन के साथ वाक्-संयम के तप में लीन रहता है । जिससे कुछ गलतफहमियां भी होती रहती है, कुछ नाराजगी भी होती होती रहती है और वह हाथ जोड़कर क्षमा मांगने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर पाता है । 

                        अंत में सारे दृश्य और अदृश्य सम्माननीय पाठकों को हार्दिक आभार प्रकट करते हुए ये चिट्ठा कवि कहना चाहता है कि आंतरिक इच्छा होती है कि अपने ही उन अव्यक्त भावों को शब्दों में बांध कर अंकुरित करता रहे जो स्नेह-बूंदों से पल्लवित-पुष्पित होकर सर्वग्राही होता रहे । साथ ही उत्साहित होकर अपनी ही बनाई हुई सीमाओं को लांघने के लिए उत्सुक भी है । जिसे देखना उसके लिए भी काफी दिलचस्प होगा ।

ये चिट्ठा कवि कह रहा है ...

Wednesday, March 31, 2021

सब नवाब हैं बाबू ! .......

कोई महल बेचता है तो कोई खोली

कोई बारूद बेचता है तो कोई बोली

कोई कटार बेचता है तो कोई रोली

कोई गुलाब बेचता है तो कोई गोली


सब बाजार हैं बाबू ! सब ऐयार हैं बाबू !

सब मालदार हैं बाबू ! सब खरीदार हैं बाबू !


यहाँ हर दाम पर चाम भी बिकता है

यहाँ हर चाम पर ईमान भी बिकता है

यहाँ हर ईमान पर नाम भी बिकता है

यहाँ हर नाम पर ईनाम भी बिकता है


सब चालबाज हैं बाबू ! सब दगाबाज हैं बाबू !

सब अंटीबाज हैं बाबू ! सब धोखेबाज हैं बाबू ! 


अब ये मत पूछिए कि खरा कौन है

अब ये मत पूछिए कि हरा कौन है

अब ये मत पूछिए कि भरा कौन है

अब ये मत पूछिए कि मरा कौन है


सब कसाव हैं बाबू ! सब बचाव हैं बाबू !

सब ऐराब हैं बाबू ! सब नवाब हैं बाबू ! 

Friday, March 26, 2021

फागुन की रातें हैं ........

ललछौंहाँ लगन लगी है , उकसौंहाँ बातें हैं

पर कुछ कहते हुए अधर क्यों थरथराते है ?

फागुन की रातें हैं


यह किस बेबुझ-सा गान पर थिरक रहा मन ?

भ्रमरावलियों बीच कौन है वो अछूता सुमन ?

जो छू कर बेसुध स्वरों में रागों को है जगाता 

उसकी छुअन से सारे फूल भी खिल जाते हैं

फागुन की रातें हैं


अपने मधु-गंध से ही साँसों को महकाने वाला

अहम् रूप को भी पिघला कर पी जाने वाला

कमनीय कामनाओं को है जगाकर उकसाता 

पर बड़ी मीठी कटारी-सी ही उसकी ये घातें हैं

फागुन की रातें हैं


हवाओं की बाँहें फैला कर वो ऐसे बुलाता है

न चाहते हुए भी मन उसी ओर खींच जाता है

रंगरलियों की ये गलियां , बहार और मधुमास

अजब अनोखा भास में उलझाकर ललचाते हैं

फागुन की रातें हैं


उसकी निखरी निराली छवि कितनी न्यारी है

तरल-चपल सी गतिविधियां भी सबसे प्यारी है

उसके आगे संसार का सब रंग-रूप है फीका

उसको प्रतिपल अर्पित मृदु नेह मन को भाते हैं

फागुन की रातें हैं


जैसे शाश्वत वर सज-संवर कर उतर आता है

सप्तपदी पर अनगिन-सा भाँवर पड़ जाता है

और षोडशी षोडश-श्रृंगार करके है लजाती 

दोनों आलिंगित हो श्वासोच्छवास मिलाते हैं

फागुन की रातें हैं


लचकौंहाँ लगन लगी है, उलझौंहाँ बातें हैं

पर कुछ कहते हुए अधर क्यों थरथराते हैं ?

फागुन की रातें हैं . 

    

            *** होली की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

*** फगुनाये आनन्द से उन्मत्त जनों को हार्दिक आभार ***

Sunday, March 21, 2021

मन हुआ विहंग ....

उड़-उड़ बैठना 

बैठ-बैठ पैठना

पैठ-पैठ ऐंठना

ऐंठ-ऐंठ ईठना


अमृत-सी तरंग 

रोम-रोम उमंग

फड़के अंग-अंग

मन हुआ विहंग


वश-अवश कल्पना

तिक्त-मृदु जल्पना

बंध-निर्बंध कप्पना

सीम-असीम मप्पना


विकस रही कला

राग रंग चला

भव फूला-फला

लगे जीवन भला


मद मत दर्पना

नित निज अर्पना

सोई सर्व समर्पना

रीत-रीत सतर्पना

*** विश्व कविता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

   *** कविता के रसिकों को हार्दिक आभार ***

Monday, February 22, 2021

रति और पार्वती संवाद ......

रति की मूर्च्छा टूटी तो एक तरफ गूंज रही थी देववाणी की छलना

दूसरी तरफ उसकी उत्कट वेदना का सूझ रहा था कोई भी हल ना

व्याघातक दुर्भाग्य दंड से हत , गलित , व्यथित , शोकाकुल रति को

झुला रहा था विकट , विकराल , विभत्स , विध्वंसक मायावी पलना


तत्क्षण ही वह निज प्राण को तज दे या कि वह चिर प्रतीक्षा करे

या हृदय में अभी देवों और ॠतुपति के द्वारा दिए कल्प शिक्षा धरे

या कि उसके अंगस्वामी कामदेव जब तक पूर्ण सुअंग को न पाए

तब तक वह पतिव्रता निज अंग को पति के लिए क्यों न रक्षा करे


अकस्मात क्षीण-सी स्मृति भी कौंध आई माँ-पिता और बहन की

शापवश ही सही पर हश्र का कारण तो हुए है जो उसके मदन की

निश्चय किया कि जाकर पूछूं कि क्यों अकेले यहाँ मुझे वे छोड़ गए

क्रोधबल को पा उसकी बलवती हुई संचित क्षमता संताप सहन की


मदन-दहन सुन कर शैलराज हिमालय क्योंकर दौड़े-दौड़े आए थे

पिनाकपाणि के भय से भयभीत सुता की दशा देख के घबराये थे

क्या मेरी सुधि तनिक भी न आई कि मैं भी तो उनकी ही जाया हूँ

क्या निज अभिलाष को टूटा हुआ देखकर मन ही मन वे घबराये थे


मेरी आंखों के सामने ही उस एक क्षण में ही ये कैसा अनर्थ हो गया

गौरा की काया का पुलक पूर्ण अवयवों का विक्षेप भी व्यर्थ हो गया

पर यदि शूलपाणि का ही चित्त चंचल नहीं होता तो मैं भी मान लेती 

कि पुरुषार्थ के समक्ष मूल्यविहीन , आकर्षणविहीन स्त्र्यर्थ हो गया


सृष्टि साक्षी है कि जितेंद्रियों का भी वश नहीं चला है स्त्रियों के आगे

तीनों लोक डोल जाता है जब स्त्रियों का सुप्त पड़ा अहंकार जो जागे

पार्वती के दृढ़ संकल्प , विश्वास और निश्चय को कौन नहीं है जानता

भूतनाथ अपने भूतों और गणों के संग जब तक भागना चाहें तो भागे


यदि लज्जा वश , संकोच वश स्त्रियां खुल कर कुछ नहीं कह पाती हैं

तो उसे निर्बल , असहाय , निरुपाय कह-कहकर ही जगती बुलाती है

क्यों पुरुषत्व को भी स्त्रीत्व के ही शरण में पुनः-पुन: आना पड़ता है 

तब तो समर्पित स्त्रीत्व अपना होना भी त्याग कर सृष्टि आगे बढ़ाती है


ये सोचकर अपने कंधों पर अपना ही क्षत-विक्षत हुआ शव को ढोकर

थरथराते-लड़खराते , गिरते-पड़ते मग से पग-पग पर खाते हुए ठोकर

पथराई-सी आंखों में अविश्वसनीय-सा उस दारूण दृश्य को लिए हुए

चल पड़ी विह्वल रति विंध नव वैधव्य के व्यसनार्त में मूर्छित हो-होकर


उस क्षण दिनकर के रहते ही चहुंओर घिर आया था घोर तम का बसेरा

ह:! ह:! विलाप ! उसके सम्मुख ही कैसे डूब गया था उसका ही सबेरा

रह-रह कर उभरता त्रिपुरान्तकारी त्रिलोचन का वो क्रुद्ध कोपानल ही

उसके हर डग पर द्रुत बिजली की भांति ही जैसे कर रहा था उग्र उजेरा


चलो माना !  इस सृष्टि की रक्षा हेतु निमित्त हुआ पंचपुष्प शर सन्धानी

दैवीय प्रपंच के कुटिल व्यूह में फंस मेरा मनोज हुआ आत्म बलिदानी

पर अंतिम श्वास तक मेरा साथ निभाने का मुझको अटूट वचन देकर 

हाय ! हाय ! हाय ! क्यों मेरे इस करुण दुःख से वही ऐसे हुआ अज्ञानी


मेरी आर्त हृदय की ऐसी चित्कार से निष्ठुर परमात्मा भी क्यों नहीं पसीजे

क्षमा करो अब आ भी जाओ , मुझे छोड़कर कहाँ चले गए मेरे मनसिजे 

मेरी न सुनो न सही पर अपने सखा को सोचो कि बिन तुम्हारे क्या होगा

हे मन्मथ ! अभिमान रूप ॠतुराज की आंखें भी वर्षाकाल के जैसे भीजे


मेरे मनोभव ! दुःख है तेरे संग संसार का सुख के उद्गम का नाश हो गया

कल जो तुमने कुसुम शय्या सजाया था आज शोक-सर्प का पाश हो गया

अब तो स्मृतियों में ही तेरा दिव्य रूप दिखेगा और सब का समागम होगा

हे पंचशायक ! पापी दैव और काल के चाल में कैसा ये सत्यानाश हो गया


विदग्धा रति मायके पहुंची यूं ही अनर्गल प्रलाप और विलाप करते-करते 

झुकी हुई आंखों से शैलराज ने उसे देखा मगर भीतर-ही-भीतर डरते-डरते

मरण-शय्या पर लेटी पार्वती थी और सिराहने में माँ मैना भी बुझी बैठी थी

सबके गले लग कर बिलख उठी रति और बोली क्यों वह बच गई मरते-मरते


जो मेरे आत्मभू का सृष्टि हेतु शुभ प्रयोजन न जाने स्वयंभू वे कैसे अन्तर्यामी हैं 

काम से मुख फेर लिया किन्तु क्रोध को जो जीत न पाए तो वे भी वृत्तिगामी हैं

ब्रम्ह विधान में विघ्न डालना कोई उनसे जा के पूछे कि क्या यही है पुरुषोचित 

इतना सबकुछ होने पर भी जग उनको ही पूजेगा क्योंकि वे तो औढरदानी हैं 


जी भर सुनने के बाद गौरा बोली चाहे जो हो जाए पर प्रण मैं निभा कर रहूंगी

जिसको मैंने मन में वरण किया है अब उसी को अपना पति बना कर रहूंगी

मुझ पर आंख बंद करके भरोसा रख और जरा धीरज धर मेरी प्यारी बहना

उसी भोले-भाले त्रिलोचन के प्रसाद से ही तेरे पति को भी जिला कर रहूंगी.


Tuesday, February 16, 2021

बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया ! ...

बड़ी मुश्किल से , मैंने हवाओं से 

होड़म-होड़ करना छोड़ा था

फिरी हुई सिर लेकर , सबसे यूँ ही

बिन बात के भी , टकराना छोड़ा था

अपने बौड़मपन को , बड़े प्यार से 

समझा-बुझाकर , बहला-फुसलाकर

शांत , गूढ़ और गंभीर बनाया था

पर ये क्या ? किसने मुझे भरमा दिया ?

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


अल्हड़ , नवयौवना , रूप-गर्विता बनकर

मैं इधर-उधर , यूँ ही इतराने लगी हूँ

अपने सौंदर्य में ही केसर , कुमकुम , चंदन

घोल-घोल कर , सबपर लुटाने लगी हूँ

मेरी आंखें क्यों हो रही है नशीली ?

और बातें भी क्यों हो रही है रसीली ?

क्या मुझे मत्त मदिरा पिला , मदकी बना दिया ?

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


सुबह ने मेरे माथे को , चूम-चूम कर ऐसे जगाया

और अंगड़ाईयों से मुझे , खींच जैसे-तैसे छुड़ाया

मैं भी अलस नयनों की , बेसुध खुमारियों को

गरम-गरम चुसकियों से , जगाए जा रही थी

कि सूरज की उतावली किरणों ने हरहराकर

मुझे ही , हर कोने-कोने तक , बिखरा दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


यूँ ही टहलते हुए , झील पर , पंछियों से 

अपने को , हँसना-बोलना , सिखा रही थी

पिघलती हुई पहाड़ियों के , नरम-नरम ओंठो पर

अपनी मन बांसुरिया को , रख कर बजा रही थी

कि आप ही आप , मधुरतम मिलन का स्वर

गा-गा कर मुझे , सब दिशाओं में , गूंजा दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


फिर मैं तो , खेल-खेल में ही , ऊंगलियों को

अपने लटों से , उलझा-पुलझा रही थी

जानबूझकर उधेड़-बुन में पड़ी हुई

कुछ पहेलियों को , समझा-बुझा रही थी

कि हजारों फूलों की सुगंधि , आलिंगन में भर कर

यहाँ-वहाँ , जहाँ-तहाँ , मुझे ही बिखेरकर , महका दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


दौड़ते-भागते , गिरते-पड़ते ,  दिन को रोक कर

सोचा कि , थोड़ा आंचल का छांव दे दूँ , इसलिए

दादी-नानी वाली , बात-बात पर टोकारा से , टोक कर

कहा कि दम भर सुस्ता ले , थोड़ा पांव दबवा ले

उससे कलेऊ का  , बियालु का , आग्रह कर रही थी 

कि मुझे ही कंधे पर बिठा कर , सब छोर घुमा दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


ठिठोली में ही , साँझ की बड़री कजरारी , आंखों को 

करपचिया काजलिया से , आंज कर मैं सजा रही थी

झीनी-झीनी बदरिया की भी , भोली-भाली अलकों को

रोल-रोल कर , मुकुलित मुखड़े पर , छितरा रही थी

कि अचानक चारों ओर , शत-शत दीप जल गये

मुझे ही उजालों से भरकर , सारे जग में जगमगा दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


मैं तो बड़ी मीठी , कुनकुनी , अपनी ही नींद को

हाथों के हिंडोले में , हिला कर सुला रही थी 

किसी उस अनजाने को भी , सपनों में बुला रही थी 

कि रात ने आकर , बड़े प्यार से , ऐसे जगाया और

मुझे ही अपनी गोद में उठा , बाहर ले जाकर 

चांद-तारों के , अछूते सौंदर्य से , पूरा नहला दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


अब मेरे बचाव में , बसंत को ही , कुछ कहना पड़ेगा

सारे करतबी करतूतों का , भंडाफोड़ भी , करना पड़ेगा

कि बड़ी मुश्किल से , कैसे अपने को , संभाले हुई थी

और रटा-रटा कर , शालीनता का पाठ , पढ़ाए हुई थी

मैं इतना ही कह सकती हूँ , इसमें मेरा कोई दोष नहीं है

सच में ! किसी ने मुझपर , काला जादू चलवा दिया

या शायद बसंत ने ही मुझे फिर से बहका दिया ! 

*** बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

Friday, February 12, 2021

कोई इरादा नहीं है ......

किसी की

आँखों में उंगलियाँ डालने का

कोई इरादा नहीं है

कानों पर जमें पहाड़ों को

सरकाने का भी कोई इरादा नहीं है

नाकों में उगे घने जंगलों की

छंटाई का भी कोई इरादा नहीं है

मरे हुए चमड़ों को बहते खून तक

खुरचने का भी कोई इरादा नहीं है

और लपलपाते जीभ से टपकते जहर को 

बुझाने का भी कोई इरादा नहीं है

कोई इरादा नहीं है कि 

मृतप्राय जीवाश्मों-सा

कोई भी अन्य लोलुप इन्द्रियाँ 

मुझे देखे , सुने , सूंघे या छुए

मेरी इजाजत के बगैर

क्योंकि मेरा होना , हँसना , बोलना

किसी प्रमापक पर आश्रित नहीं है

उन आश्रितों पर तो

हरगिज आश्रित नहीं है

जो खुद अभिशप्त हैं

अमृत को ही जहर को बनाने के लिए 

और प्रतिगत जहर ही पाने के लिए

जिन्हें ये भी पता नहीं चलता है कि

वे अपनी जीवन दायिनी को भी

उसी जहर से विषाक्त कर देते हैं 

फिर भी उन्हें क्षमा दान मिलता रहता है .


Tuesday, February 9, 2021

क्षणिकाएँ .........

दर्द के दरारों से 

रिसते जख्मों को 

वक्त के मलहम से छुपाना

नाकाम कोशिशें ही

साबित होती है


     ***


कभी-कभी 

कतरनों को कुतरने में

दिल को जितना सुकून मिलता है

उतना तो पूरा मज़मून

हज़म कर के भी नहीं मिलता है 


     ***


दूसरों के अफवाहों में

अपनी मौजों का

घुसपैठ कराना

रेत पर गुस्ताखियों का

सैलाब लाने जैसा है


     ***


हर हारे हुए खेल को

ताउम्र खेलने में

जो मजा है

वो किसी भी

जबर जीत में नहीं है 


     ***


छिने हुए को

वापस छिनने की 

खूबसूरत जिद भी

दिल को गुमराह 

करने के लिए काफी है .

Friday, February 5, 2021

प्रेम कलह के इस रुत में ........

प्रेम कलह के इस रुत में

मधुर , तिक्त , अगन अहुत में

नियति ने ही जलाया है तो

मेरे प्यारे परदेशी पिया !

भलमानसता से , नेम निष्ठा से

मिलन रुत आने तक

निजदेशी हो , परदेश ही रहना 

हाँ ! वर्णज्वर मैं सहती हूँ 

वर्णज्वर तुम भी सहना !


आते भी तो , दीर्घ कचोट कलह से

जानी-बूझी , सोची-समझी , अलह से

तुमसे न बोलती-बतियाती

अनदेखा कर के , सारा प्रणय उपक्रम

भीतर ही रिझती , सिझती और तुम्हें खीझाती

पर न तुम्हारा , कोई पुचकारी पतियाती


मुँह फुलाये , भौं चढ़ाए , लट बिखराये

सोई रहती , उस ऊँची अटारी 

और तुम , लाख मान-मनौव्वल , करके न थकते

किंतु ! मैं कल कलही , रार ठानकर

प्रेम मिलन के , उस रुत में भी , खोलती नहीं 

अपने रंग महल का , कोई किवाड़ी


प्रेम कलह के इस रुत में

पल-पल , कलकल , लगन आयुत में

हास-उपहास , राग-उपराग हुआ है

कल्प कलेवरों का , खेल-खिलौना

जैसे कनखी ही कनखी में 

हो रहा हो , कोई नेही टोटका-टोना

या चहुंओर एक-दूजे का , हो खुला आमंत्रण

या मोहन-सम्मोहन का , हो जंतर-मंतर 

या कि कर गया हो कोई , विवश-सा वशीकरण


मुझ पर भी , छाया भरम या कि खुमारी है

या कि बहकी-बहकी बातें , मेरी लाचारी है

जबसे पिया तुम परदेशी हुए 

तबसे क्यों लगता है मुझको ?

कि नित प्रात से , लड़ती रहती रात है

हो न हो , कहीं मेरी ही कोई बात हो

तब तो पपीहों का , यूँ बदला-सा गान है 

चिड़ियों की चहचहाहट भी , मेरे उलाहनों का तान है 


संभवतः प्रेम कलह से ही , आकाश से अवनी भी है रूठी

क्यों प्रेम और विरह की , हर कथा है अनूठी

पर परदेशी पिया !  तुम भी हो अनूठे , पर हो झूठे

क्या जानूं कि ,  मैं हूँ रूठी , या कि तुम हो रूठे

जो भी हो , बस समझो , जो हृदय की बात है 

इस रुत पर , बड़ा भारी , विरही आघात है 


प्रेम कलह के इस रुत में

हर पल रहती हूँ ,  तेरे ही युत में

तुमसे मैं भी लड़ती , मन ही मन में

क्या कहूँ ? तेरे बिना , कुछ नहीं है जीवन में

मेरे प्राणप्यारे परदेशी पिया !

जितनी जल्दी हो सके , तुम आना

अपनी सौं , कोई कलह न करूं मैं तुमसे

बस ,  मिलन रुत संग लिए आना . 

Sunday, January 31, 2021

बसंत आने का लक्षण है ? .......

पात-पात फुदकन 

गात-गात मुदकन 


हर शोक का हरण है

बसंत आने का लक्षण है ?


बिखरी-बिखरी कस्तूरी

निखरी-निखरी अंकूरी


रस-रूप का उपकरण है

बसंत आने का लक्षण है ?


देहरी-देहरी सिंदुरी

रेहरी-रेहरी अबीरी


उल्लास का उच्चरण है

बसंत आने का लक्षण है ? 


सिकुड़ी-सकुड़ी साँसें

उखड़ी-उखड़ी टाँसें


बड़ा मीठा-सा मरण है

बसंत आने का लक्षण है ?


अंग-अंग गदरीला

संग-संग सुरभीला


बावले युगलकों का वरण है

बसंत आने का लक्षण है ?


ताल-ताल थिरकन

चाल-चाल बहकन


विगत का विस्मरण है

बसंत आने का लक्षण है ?


राग-राग मल्हार

फाग-फाग विहार


पुलक का प्रस्फुरण है

बसंत आने का लक्षण है ? 

Thursday, January 28, 2021

अनुरागी चित्त ही जाने .......

अनुरागी चित्त ही जाने 

अनुरागी चित्त की गति

श्रृंगारित स्नेहित स्पंदन  

मंद-मंद मद-मत्त मति


ऊब उदधि नैनों से उद्गत 

ॠतंभरा की ॠणि उदासी

मख-वेदी में मन का मरम

हिय बीच हिलग प्यासी


सोन चिरैया सुख सपना

विकट विदाही विकलता

कली से कमलिनी का क्लेश

क्षण-क्षण क्षत हो छलकता


रस रसिकों को ज्ञात कहाँ

कि रचना रक्त से रचती है

चिर-वियोगी चित्त की चिंता

प्रघोर पीड़ाओं से गुजरती है .

Sunday, January 24, 2021

पर काल से परे हो ......

जो तुम्हें रचे

कहो तो भी बचे

जो बचे उसे रचो

रचो तो मत बचो

स्वयं संकल्प हो

विपुल विकल्प हो

अनंत उद्गार हो

अनुभूति की टंकार हो

सबकी कसौटी पर खरी हो

सापेक्ष सत्य पर अड़ी हो

शब्द छोटे हो 

अर्थ बड़े हो

काल की बात हो

पर काल से परे हो .


Wednesday, January 20, 2021

अवशेष .....

मानसिक विलासिता के 

सोने के जंजीरों से 

सिर से पांव तक बंधे हुए 

अमरत्व को ओढ़कर

मरे हुए इतिहास के पन्नों पर 

अपने नाम के अवशेष से

चिपकने की बेचैनी

खुद को मुख्य धारा में

लाने की छटपटाहट

चाय की चुस्कियां

आराम कुर्सियां

वैचारिक उल्टियां

प्रायोजित संगोष्ठियां

मुक्ति की बातें

विद्रुप ठहाके

इन सबमें

एक दबी हुई हँसी 

मेरी भी है .

Thursday, January 14, 2021

पुनः प्रथम मिलन ..........

 इस शीत ॠतु में भी , स्वेद-कण ऐसे चमक रहे हैं

हृदय से ह्लादित होकर , रोम-रोम जैसे दमक रहे हैं

यह अद्भुत संयोग भी हो रहा है , हमारा ही आभारी 

और हमारी सुगंध से , गहक कर कैसे गमक रहे हैं


कैसे आवेशित हो गया ,  इस जगती का कण-कण

जैसे प्रचंड कंपन से ,  डोल गया हो यह धरती-गगन

साक्षी होकर सृष्टि भी ,  अचंभित हो गई होगी ऐसे

जैसे शिव-शक्ति का ही , हुआ हो पुनः प्रथम मिलन


अब आत्मस्मरण ओढ़ रहा है , क्षीणता का आवरण

तरंग हीन हो कर , कहीं और अंतर्धान हुआ यह मन 

विश्रांति की इस बेला में , वज्र नींद आकर कह रही 

संयोग श्रम से ही श्लथ हुआ है ,  तेरा तंद्रित यह तन


अब तो एक तरफ है , पलकों पर , नींद की प्रबलता

और दूसरी तरफ है , तुम्हारे इन हाथों की कोमलता

जो तुम ऐसे सहला-सहला कर , मुझे यूँ सुला रहे हो 

तो अधरों को भी रोको न , अब इतना क्यों है चूमता


माथे , आँखों , गालों , अधरों पर ,  तेरा स्मित चुंबन

इन लटों में , फिरती हुई सी उंगलियों की ये थिरकन

वो बैठी नींद भी आँखें खोलकर , देख रही है हमें ही

और मुस्कुराये जा रही है , पोरों की मीठी-सी थकन


छोड़ो भी , अब झूठ-मूठ का मुझे , यूँ ही न सहलाओ

बाहों में छुप कर सोने दो मुझे , औ' तुम भी सो जाओ

सरस , सम्मोहक सपने भी , सज-संवर कर आने को

प्रतीक्षारत हैं , उनका भी नींद से मधुर मिलन कराओ


हा! तुम्हें ऐसे लय लोरी गाने को , अब कौन बोल रहा है

जैसे उत् शीतलता में , कोई उष्ण मादकता घोल रहा है

ये चुंबन और ये सहलाना , ऊपर से ये उन्मुग्ध लोरी गाना

अठखेलियां तो कह रही है , तुम्हारा मन फिर डोल रहा है


मुझे सुला रहे हो , या सच-सच कहो कि सुलगा रहे हो

चंदन-सा तन हुआ है , फिर से क्यों अगन लगा रहे हो

अगन जब लग जाएगी तो , आहुत तुम्हें ही होना होगा

क्यों अनंगीवती को फिर से छेड़ ,  तुम ऐसे जगा रहे हो


अनंगीवती जो जागेगी तो , फिर उसे सुला न पाओगे

सब जान-बूझकर भी , अनंगदेव को फिर से हराओगे

जानती हूँ , हमसे हार के भी तुम्हें सत् सुख मिलता है 

पर इस तरह जीताकर , मुझे दुष्पुर दुख ही पहुँचाओगे


ये निंदासी निशी भी , अब कुहरे से लिपट कर सो रही है

शनै: शनै: आनाकानी , मनमानी की अनुगामी हो रही है

पुनः ये पुण्यतम क्षण , निछावर हो रहा है चरणों पर तेरे

औ' सौंदर्य लहरियां संयोगक्रीड़ा में घुल-घुल कर खो रही है .


Sunday, January 10, 2021

क्षणिकाएँ .......

आज कल शब्दों में          

अर्थो की अधिकता

यह बताता है कि 

हम कितने 

चतुर और चालाक

हो गए हैं .


*****


शब्दों के अर्थ

जब अनर्थ होने लगे

तो साफ है कि

बाजार ज्यादा से ज्यादा 

घातक हथियारों की 

आपूर्ति चाह रहा है .


*****


शब्द जब-तब

अपशब्दों के सहारे

शक्ति प्रदर्शन करे तो

सोची-समझी रणनीतियां

अपना दांव 

खेल चुकी होती है .


*****


शब्द जब

गणित के सूत्रों को

हल करने लगे तो

अपेक्षित परिणाम

सौ प्रतिशत से

कुछ ज्यादा ही होता है .


*****


अनचाहे शब्द 

पीछे लौटकर

पछताने से इंकार करे तो

उसकी पीठ ठोंकने वालों में

समझदारों का 

हाथ ज्यादा होता है .

*** विश्व हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

Thursday, January 7, 2021

"ब्लॉगिंग-सा दिल पर" ........

"पहले जी" गये "दूसरे जी" के घर 

"दूसरे जी" गये थे "तीसरे जी" के घर 

धत् ! पता चला कि 

"तीसरे जी" भी गये हुए हैं "चौथे जी" के घर

फिर "पहले जी" जब गये "चौथे जी" के घर पर

तो वो "महाशय जी" भी थे सिरे से नदारद.…...


तो क्या करते बेचारे "पहले जी"

अपना मुँह लटकाए वापस चले आए अपने घर 

और बाट जोहने लगे अपने खिड़की-किवाड़ों को पकड़

कि भूले भटके ही सही "कोई तो" आए उनके घर 

थोड़ा-सा ही सही मगर दौड़े तो "आह-वाह" की लहर

और किसी भी "जी" के ना आने पर 

"पहले जी" मायूस होते रहे जी भर-भर कर

कुछ ऐसा ही है अपने ब्लॉगिंग का सफर .....


अगर "सबके-सब" बिन बुलाए ही तांता लगा कर

शौक से जब आने लगें आपके घर 

तो आप भी बड़े आराम से खुद को समझिए

अपने आपको एकदम से बड़का "कलक्टर"

और खूब करते रहिए बकर-बकर

सब लगाते रहेंगे आपको तरह-तरह से बटर

ताकि आप लुढ़कते रहें फिसल-फिसल कर

फिर सब मजा लेते रहेंगे ताली पीट-पीट कर

कुछ ऐसा ही है अपने ब्लॉगिंग का सफर........


अजी! हम भी अपनी बात कह देते हैं 

जरूरत से कुछ ज्यादा ही खुलकर 

लेकिन साथ में दोनों हाथों को जोड़ कर

प्यार से वैधानिक चेतावनी भी देकर 

कि इस हल्के-फुल्के मजाक को

कृपया कोई न लें अपने "ब्लॉगिंग-सा दिल पर"

कभी-कभी हँसना और हँसाना भी चाहिेए

अपने-आप को सबसे बड़ा "कलक्टर" बनाना भी चाहिए.…...


तो आइए ! सब हँसे खूब लोट-पोट कर

और जो-जो न हँसे उन्हें भी हँसाएं टोक-टोक कर

उनका नाक-कान , पैर-हाथ पकड़-पकड़ कर

अगर फिर भी वो न हँसे तो भी हँसाएं

उनके पेट को जोरदार गुदगुदी से जकड़-जकड़ कर

क्योंकि कुछ ऐसा ही है अपने ब्लॉगिंग का सफर . 

Monday, January 4, 2021

उधार का ज्ञान बहुत है ........

मेरे पास भी इधर-उधर से उधार का ज्ञान बहुत है 

उसे भांति-भांति से सत्य साबित करने के लिए

उल्टा-पुल्टा , आड़ा-तिरछा , टेढ़ा-मेढ़ा प्रमाण भी बहुत है 

पोथा पर पोथा यूँ ही नहीं लिख कर दे मारी हूँ

नये-पुराने सारे विषयों का अधकचरा खान बहुत है

अगर किसी सभा में अंधाधुंध जो बांचने लगूं तो

देखने-सुनने वाले की नजरों में मान-सम्मान भी बहुत है....

तब तो मानद उपाधियां मेरे चरणों तले

रंग-बिरंगे कालीनों के जैसे बिछी रहती हैं

और सारे पुरस्कारों की लंबी-लंबी कतारें 

हर अगले को धक्का लगा-लगा कर गिनती है ....

ये हाल है कि छोटे-बड़े राजा-महाराजा मुझे 

अपनी दरबार की सुन्दरतम शोभा बनाना चाहते हैं

मेरे छींकने से ही बिखरे हुए मोती जैसे ज्ञान को भी

अपने , उसके , सबके सिर-माथे पर सजाना चाहतें हैं .....

देख रही हूँ अभी से ही मेरे लिए जगह-जगह पर

किसिम-किसिम के अभिलेख , शिलालेख खुदवाये जा रहे हैं

और सब भयंकर ज्ञानियों को छोड़ कर ज्ञानी नम्बर एक पर

मेरे ही नाम , सर्वनाम , उपनाम गुदवाये जा रहे हैं ......

जब सबसे ज्यादा बिकाऊ उधारी ज्ञान का ये हाल है तो

सोचती हूँ अपना ज्ञान जो होता तो और क्या-क्या होता

अरे ! कोई तो मेरा अपना ज्ञान मुझे सूद समेत लौटा दो

ऐसा जबरदस्त घाटा लगाकर मेरा मन बहुत जोर-जोर से है रोता .


Thursday, December 31, 2020

सुना है कि ---

                                 ॐ शांति: शांति: शांति: ॐ


                 सुना है जो हम हैं वही हमें चारों तरफ दिखाई पड़ता है । हमें जो बाहर दिखता है ,  वह हमारा ही प्रक्षेपण होता है ।  स्वभावत: हमारी चेतना जो जानती है उसी का रूप ले लेती है । इसलिए हम सुंदर को देखते हैं तो सुंदर हो जाते हैं , असुंदर को देखते हैं तो असुंदर हो जाते हैं । हमारे सारे भाव भी अज्ञात से आते हैं और हमें ही यह निर्णय करना होता है कि हम किस भाव को चुनें ।  ये भी सुना है कि संतुलन प्रकृति का शाश्वत नियम है । जैसे दिन-रात , सुख-दुख , अच्छाई-बुराई , शुभ-अशुभ , सुंदर-असुंदर आदि । बिल्कुल पानी से आधे भरे हुए गिलास की तरह । गिलास को हम कैसे देखते हैं वो हमारी दृष्टि पर निर्भर करता है ।  

                           ये भी सुना है कि इन दृश्य और अदृश्य के बीच भी बहुत कुछ है जो तर्कातीत है । काव्य उन्हीं को देखने और दिखाने की कला है । तब तो साधारण से कुछ शब्द आपस में जुड़ कर असाधारण हो जाते हैं और इनका उद्गार हमें रससिक्त करता है । साथ ही हमारा अस्तित्व आह्लादित होकर और प्रगाढ़ होता है ।  हम किन भावों को साध रहे हैं इतनी दृष्टि तो हमारे पास है ही । आइए ! उन्हीं भावों का हम खुलकर आदान-प्रदान करें हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ।

न जाने कितनी भावनाऐं , भीतर-भीतर ही

उमड़-घुमड़ कर , बरस जाती हैं

जब तक हम समझते , तब तक

शब्दों के छतरियों के बिना ही

हमें भींगते हुए छोड़कर , बह जाती है

आओ ! मिलकर हम

छतरियों की , अदला-बदली करें

भाव बह रहें हैं , थोड़ा जल्दी करें

एक-दूसरे के हृदय को , खटखटाएं

कुछ हम सुने , कुछ कहलवाएं

बांधे हर बिखरे मन को

उन के हर एक सूनेपन को

आओ ! सब मिलकर , साथ-साथ शब्द साधें 

गुमसुम , गुपचुप यह जीवन कटे

छाई हुई उदासियों का , आवरण हटे

शब्द-शब्द से मुस्कानों को , गतिमय बनाएं

आओ ! हर एक भाव में , पूरी तरह तन्मय हो जाएं .

Monday, December 28, 2020

तुम्हें बाँहों में भर लेंगी स्मृतियाँ हमारी .......

जब आंँखें अंधकार से भर जाएंगी

दृष्टि स्वयं में ही असहाय हो जाएंगी

प्रतिमित प्रतिमाएं सारी खंडित हो जाएंगी

असह्य हो जाए जब वेदना तुम्हारी

तुम्हें बाँहों में भर लेंगी स्मृतियांँ हमारी


जब चूकना ही चूकना सहज क्रम हो जाए

प्रति फलित परिष्कृति बरबस भ्रम हो जाए

अकल्पित संघर्षों में क्षुद्रतम सारा श्रम हो जाए

दुष्कल्पनाएं , शंकाएं जब सहचरी हो तुम्हारी

तुम्हें बाँहों में भर लेंगी स्मृतियाँ हमारी


जब अनजानी , अपरिचित सब राहें होंगी

विवशता की अचरज से भरी आहें होंगी

अति यत्न से सिंचित , संचित दम तोड़ती चाहें होंगी

निरपवर्त नियति हो जब परवश पराजय तुम्हारी

तुम्हें बाँहों में भर लेंगी स्मृतियाँ हमारी


जब शांति का आगार सब अंगार हो जाए

सारा मधुकलश ही विष का सार हो जाए

क्लेश , शोक हर उत्सव का प्रतिकार हो जाए

संकुचित , व्यथित विचलन हो जब डगर तुम्हारी

तुम्हें बाँहों में भर लेंगी स्मृतियाँ हमारी


उन स्मृतियों में मेरी संतृप्ति का स्नेहिल स्पर्श होगा

तुम्हारे अस्तित्व को मुझ तक खींचता , प्रबल आकर्ष होगा

सोखती हूँ समूचा तुम्हें मैं , सोचकर भी अपार हर्ष होगा

सह्य हो जाएंगी तब वेदना तुम्हारी

तुम्हें बाँहों में भर लेंगी स्मृतियाँ हमारी .


Tuesday, December 22, 2020

जोबन ज्वार ले के आउँगी ........

फिर से सांँझ हो रही है कहांँ हो मेरे हरकारे

कब से अब तक यूँ बैठी हूंँ मैं नदिया किनारे

फिर आज भी कहीं प्यासी ही लौट न जाऊं

तड़के उनींदे नयनों के संग फिर यहीं आऊं


थका सूरज किरणों को जैसे-तैसे समेट रहा है

धुँधलका भी जल्दी से क्षितिज को लपेट रहा है

चारों ओर एक अजीब- सी बेचैनी पिघल रही है

मेरी भी लालिमा अब तो कालिमा में ढल रही है


बगुला , बत्तख सब जा रहे अपने ठिकाने पर

शायद मछलियाँ भी चली गईं उस मुहाने पर

पंछियों ने तो नीड़ो तक यूँ मचाई होड़ाहोड़ी है 

पर मैंने अब तक लंबी- लंबी सांँसे ही छोड़ी है


ओ! बालू के बने घरों को कोई कैसे फोड़ गया है

ओ! बिखरे सारे कौड़ियों को भी ऐसे तोड़ गया है

शंख , सीपियों की उदासी और देखी नहीं जाती

तुम जो ले आते मेरा पाती तो इन्हें पढ़के सुनाती


दूर कहीं मछुआरे कुछ गीले-गीले गीत गा रहें हैं

हुकती कोयलिया से ही पीर संगीत मिला रहे हैं

जैसे तरसती खीझ तिर- तिर कर कसमसाती है

मुझसे भी टीस लहरियां आ- आकर टकराती है


पीपल का पत्ता एक बार भी न झरझराया है

मंदिर का घंटा भी अब तक नहीं घनघनाया है

अंँचल की ओट में भी दीप बुझ-बुझ जाता है

मेरे भी पलकों के तट पर कुछ छलछलाता है


लहरों पर सिहरी-सिहरी सी ये कैसी परछाईं है

मँझधारों की भी अकड़ी-तकड़ी सी अँगराई है

तरुणी- सी तरणी बिन डोले ही सकुचा रही है

पल- पल रूक कर पुरवा भी पिचपिचा रही है


उन्मन चांँद का चेहरा क्यों उतरा- उतरा सा है

बादलों का बाँकपन कुछ बिसरा-बिसरा सा है

सप्तर्षियों की चल रही कौन-सी गुप्त मंत्रणा है

उनसे भी छुपाए नहीं छुप रही ये कैसी यंत्रणा है


इसी हालत में ही मेरे हरकारे घर तो जाना होगा

स्वागत में फिर नये-नये रूपों में वही ताना होगा

कैसे तोड़ूं उसकी सौं साखी है यह नदी किनारा

यदि आस जो छोड़ूं तो आखिरी सांँस हो हमारा 


रात भर प्रीत जल-जलकर अखंड ज्योति बनेगी

इन नयनों से झर-झरकर बूंँदें मंगल मोती गढ़ेंगी

कल फिर जोबन ज्वार ले के आउँगी इसी किनारे

उस जोगिया का पाती ले जरूर आना मेरे हरकारे .


Thursday, December 17, 2020

कुछ रूठ गए कुछ छूट गए .......

कुछ रूठ गए कुछ छूट गए
अनकिये से वादे थे टूट गए

हाथ थामे कभी हम थे चले
आँखों में एक से सपने पले
संग-संग सब हंसे और खेले
पीड़ाओं में भी थे घुले-मिले

कुछ रूठ गए कुछ छूट गए
अनकिये से वादे थे टूट गए

रंगो के थे क्या मनहर मेले
बतकहियों के अनथक रेले
एक से बढ़के एक अलबेले
हर पीछे को बस आगे ठेले

कुछ रूठ गए कुछ छूट गए
अनकिये से वादे थे टूट गए

उलझाते सुलझाते हुए झमेले
फाग आग सब मिलकर झेले
हुए कभी न हम ऐसे अकेले
उन दिनों को अब कैसे भूलें 

कुछ रूठ गए कुछ छूट गए
अनकिये से वादे थे टूट गए 

हर रूठे को आवाज लगाऊं
रोऊं गाऊं और उन्हें मनाऊं
पर अब ये तो समझ न पाऊं
कि उन छूटे को कैसे बुलाऊं

कुछ रूठ गए कुछ छूट गए
अनकिये से वादे थे टूट गए 


यह पावन भाव उन समस्त पथगामियों एवं पथप्रदर्शकों को निवेदित है जिन्होंने इस ब्लॉग जगत को विपुल समृद्धि प्रदान किया है । आज जो दृष्टिगत हैं वे निःसंदेह ह्रदयग्राही हैं पर हृदय दौर्बल्यता दबंग यादों को लिए हुए बारंबार उस कल्पतरु की छांव में जाना चाहता है जहां पुनः यह कहने की इच्छा बलवती होती जाती है --- ये ब्लॉगिंग है जनाब !

Sunday, December 13, 2020

हजारों-लाखों चुंबन है .....

 मेरे रोएं-रोएं पर तो तुम्हारा ही वो हजारों-लाखों चुंबन है 

मेरी सांस-सांस पर सुमरनी-सा कसा तेरा ही आलिंगन है 

अब कैसे बताऊं कि तुम उपहार में ही तो मिले हो हमको 

औ' हमारी नस-नस में दौड़ रहा तुम्हारा छिन-छिन संगम है 


हाँ! अब तो चौंकती भी नहीं किसी भी अनजान आहट पर 

लगाम लिए फिरती हूँ पल-पल की उस विरही घबराहट पर

न जानूं कि कैसे अपने-आप उछलती लहरें सरि तल हो गई 

हाय! चकित हूँ ,विस्मित हूँ ,बहकी हुई सी इस बदलाहट पर 

 

सारी छूटी सखियाँ सब अब मुझे, बहुत ही भाने लगी हैं 

हिल-मिल कर हिय-पिय की वो बतिया बतियाने लगी हैं

कैसे कहूं कि मेरी सारी समझ भरी भारी-भरकम बातों पे

सब मिल पेट पकड़-पकड़कर जोर-जोर से ठठाने लगी हैं 

   

 कहती- हमने तो देखा है तेरे हर एक उस पागलपन को

 जल-जल कर जल के लिए मछली की चिर तड़पन को 

 कैसे हम सब तब तनिक भी न भाती सुहाती थी तुझको

 औ' तेरी अंखियांँ तो खोजती थी बस अपने ही प्रीतम को

     

ना जाने किससे , कब और कैसे लग गई तुझे ये प्रेम अगन

सब कुछ भूल-भाल कर तू तो बस प्रीतम में हो गई मगन

पगली ! तब तू बस गली-गली ऐसे मारी-मारी फिरती थी

छोड़-छाड़ कर सब मान-मर्यादा और लोक-लाज का सरम


हम समझाती थी ऐसे मत हो बावली , कुछ तो धीरज धर

प्रीतम तेरा है तेरा ही रहेगा , तिल-तिल कर तू यूं न मर

मिथ्या बोल तब तो थे न हमारे अब जाकर तुमने जाना है

माना कि भूल थी तेरी पर तू क्षमा मांग और कान पकड़


उन्हें कैसे बताऊं कि प्रीत ने ही मुझे तो स्नेही बना दिया

तुम्हारा आँखो से ओझल हो-हो जाना संदेही बना दिया

पर अब संभोगी संगम के चुंबनों और आलिंगनों ने मुझे

रोएं-रोएं को चिर तृप्ति देकर दीपित दिव्यदेही बना दिया


कभी विदेही तो कभी सैदेही मेरा अजब-गजब सा होना है

प्रीतम को पाया तो ही पाया कि क्या पाना है क्या खोना है

प्रपंची अँखियो से अब सखियों में भी प्रीतम ही दिखता है 

उन्हें कैसे बताऊं कि अब बस हँसना है मुझे न कि रोना है .


Monday, December 7, 2020

शांतिक्षेत्र में ये क्या हो रहा है ......

मीलों दूर बैठा मन

उत्सुक है , बहुत आतुर है

जानने को पीड़ित है

क्रांतिक्षेत्र / शांतिक्षेत्र में ये क्या हो रहा है

सत्य और न्याय के लिए अब और युद्ध नहीं होना चाहिए

इसलिए मनुपुत्रों ने लाखों- करोड़ों युद्धों को 

सफलतापूर्वक संपन्न कराने के बाद 

लिए गए अघोषित सौगंध और शांति से किये अनुबंध के कारण 

कुरुक्षेत्र का बहिष्कार कर रहे हैं और शांतिक्षेत्र में जमें हैं

शांति समर्थक और उनके विरोधी क्या- क्या कर रहे हैं

ये जानने के लिए मन बड़ा व्यग्र है इसलिए वह

कभी टीवी खोलता तो कभी अखबार पलटता है

मोबाइल में न्यूज नोटिफिकेशन पर पल- पल नजर रखता है

चौबीसों घंटे सोशल मीडिया का खाक छानते रहता है

विदेशी न्यूज़ एजेंसी पर भी ताका-झांकी करके 

सेंसर किया गया गुप्त जानकारियां पाना चाहता है

परिचितों को भी फोन लगाकर आँखो देखा हाल जानना चाहता है

चाहे वो हमारी तरह मीलों दूर ही क्यों न हो

भले ही ऊपर- ऊपर से दिखाई पड़ती आँखे हैं

पर हम अंधों की जिज्ञासाओं का कोई अंत नहीं है

बात यदि शांति स्थापित करने की हो तो अशांति स्वभाविक है

हम तक छन- छन कर जो खबरें आ रही है 

उसके आधार पर यही लग रहा है कि

चारों ओर शांति के मुक्तसैनिक मोर्चा संभाले हुए है

बड़ी ही शांति पूर्वक एक नई दुनिया बनाने की पहल करते हुए

मानव को पहले के वनिस्पत कुछ अधिक सभ्य , सुसंस्कृत दिखाते हुए

युगों- युगों से शोषण के शिकार स्वार्थ के शासन के

कदमों में श्रद्धा से चढ़ाए गए वर्तमान और भविष्य को

चक्रवृद्धि ब्याज सहित लौटाने के आग्रहों का भेंट देकर

बदले में सभ्येतर प्रतीक्षा को सलीका से ओढ़कर सब डटे हुए हैं

युगों- युगों से चढ़ी कई- कई परतों वाली संतुष्टि के प्लास्टर के भीतर

भरभराते दरारों की दबायी- छुपायी हुई 

दमन की गाथाओं को चुन- चुनकर चिन्हित कर रहे हैं

परंपराओं की जमी सीमेंट को क्रांति की नोंक से खुरच रहे हैं

रूढ़िग्रस्त चिंतनों की नींव से धीरे- धीरे एक- एक ईंट निकाल रहे हैं

संरक्षित खंडहरों को सम्मानित ढंग से सलामी देकर विदा कर रहे हैं

उन शांति के मुक्तिसैनिकों में शामिल होने की हमारी भी पूरी अर्हता है

पर परंपराओं का क्रुर कानून इजाजत नहीं देता है शांतिपूर्ण क्रांति का

मन का देश आज भी गुलाम है युद्धरत शांतिदूतों के आगे .


Friday, December 4, 2020

भला मुझसे कोई आकर यह न पूछे कि ---

भला फूलों से कोई जाकर यह पूछता है कि ---

तुम कैसे खिले हो , क्यों खिले हो , किसके लिए खिले हो 

किस रूप से खिले हो , किस ढंग से खिले हो

किसी विवशता में खिले हो या मलंग से खिले हो

किसी के तदनुरूप खिले हो या अपने अनुरूप खिले हो

ये खिलना तुम्हारा स्वभाव है या किसी का प्रभाव है

क्षणजीवी हो या दीर्घजीवी  ,  उपयोगी हो या अनुपयोगी

तुम्हारा अपना कितना जमीन है , कितना आसमान है

तुम्हारे खिलने का अनुमानित कितना मान- सम्मान है


भला फूलों से कोई जाकर यह पूछता है कि ---

क्यों तुमसे उठी हुई तुम्हारी सुगंध , सुवास , मिठास

हवाओं में तैर कर मीलों दूर तक फैल- फैल जाती है 

क्यों तेरे पराग- परिमल की कणी- कणी छिटक- छिटक कर

सबके नासपुटों को जाने- अनजाने में भी फड़काती है 

क्यों तेरे मदिर मादकता से स्वयं पर किसी का वश न रहता है 

भँवरा- सा मचल- मचल कर वह तुम तक आ- आ बहता है 

क्यों मधुछत्तों से मधुमक्खियां भागी- भागी तुम तक आती है 

क्यों तितलियां तुम पर ही नाचती,  डोलती,  गाती , मंडराती है 


फूलों- सी ही मेरी कविताएं  मुझसे झर- झर झरती हैं

कभी शब्द से तो कभी शून्य से सब कुछ कहती है

किसी से कोई दुराग्रह नहीं है कोई आग्रह नहीं है

विक्षुब्ध , विक्षिप्त सा कोई विकट विग्रह नहीं है

भीतर- भीतर जो बात उमंग में उमड़ती- घुमड़ती रहती है

निर्झरिणी- सी कविता बन अल्हड़ अठखेलियां करती है

कविता बहाने वाली बह- बह कर चुपके से कहीं हट जाती है

मैं भी देखती हूँ कि कविता कुछ- कुछ उपनिषद- सी ही घट जाती है


भला मुझसे कोई आकर यह न पूछे कि ---


Monday, November 30, 2020

बहिर्अंतस की उन्मत्त अमा है .......

अभी- अभी पूर्णिमा का चांद 

आकर मुझसे मिला है

अभी- अभी मेरे भी मौन अँधियारे में 

मेरा भी चांद खिला है

आज गगन में फूट रहा है कोई अमृत गागर

मेरे अंतर्गगन में भी फैल गया किरणों का सागर 

मधुमयी चांदनी ज्यों बरस रही है 

मुझसे भी मेरी ज्योति परस रही है

चकोर- चकोरी एकनिष्ठ हो छुप- छुपकर दहक रहे हैं

वहीं नीरंजन बादल कहीं- कहीं चुपचाप थिरक रहे हैं

मुखर हो रही है मन बांसुरी , शब्द- शब्द झरझरा रहे हैं

भाव- भाव अमर रस को पी- पीकर अनंत प्यास बुझा रहे हैं

सोलह कलाओं से सजी आसक्तियां निखरने लगी है

इच्छाऐं रससिक्त होकर जहां- तहां बिखरने लगी हैं

जैसे ये महत क्षण हो अपनापन खोने का

हर्षोन्माद में भींगने और भिंगोने का

जैसे शीतल सौंदर्य के सुगंध को पहली बार कोई मनुहारा हो

सारी रात सांस रोककर कोई चांद को निर्निमेष निहारा हो

जैसे अभी- अभी मिला कोई नवल वय है

लग रहा है कि मैं सबमें और सब मुझमें ही तन्मय है

बस उत्फुल्ल चांद है , उद्दीप्त चांदनी है , उद्भूत पूर्णिमा है

और अमृत में तन्मय हो रही बहिर्अंतस की उन्मत्त अमा है .

*** देव दीपावली एवं कार्तिक पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

Thursday, November 26, 2020

उग्रतर होता परिताप है ......

यह कैसी पीड़ा है

यह कैसा अनुत्ताप है

प्रिय-पाश में होकर भी 

उग्रतर होता परिताप है


जाना था मिलन ही

प्रेम इति होता है

प्रिय को पाकर भी

संताप कहां खोता है


प्रेम के आगे भी

क्या कुछ होता है

प्रिय से कैसे पूछुँ

हृदय क्यों रोता है


यदि मधुर , रस डूबी

प्रेमपगी पीड़ा होती

तो प्रिय-मिलन ही

केलि- क्रीड़ा होती


अनजाना सा कोई है

जो खींचे अपनी ओर

तब तो इस पीड़ा का 

न मिलता कोई छोर


मेरा कुछ दोष है या

शाश्र्वत अभिशाप है

प्रिय तो देव सदृश

निश्छल , निष्पाप है


पीड़ा मुझको ताके

और मैं पीड़ा को

कोई तो संबल दे

मुझ वीरा अधीरा को


अब तो प्रिय से ही

अपनी आँखें चुराती हूँ

हर क्षण उसको पी-पीकर

पीड़ा की प्यास बुझाती हूँ


बलवती होती जा रही

पीड़ा की छटपटाहट

अब तो मुक्ति का प्रभु

कुछ तो दो न आहट


आस की डोर को थामे

श्वास से तो पार पा जाऊँ

पर लगता है कि कहीं

पीड़ा से ही हार ना जाऊँ 


प्रेम लगन को मेरे प्रभु

और अधिक न लजवाओ

प्रिय को पाया , पीड़ा पायी

बस पहेली को सुलझाओ .

Sunday, November 22, 2020

ऐसे हड्डियों को ना फँसाइये .......

काफी सुना था हमने आपकी बड़ी-बड़ी बातों को

खुशनसीबी है कि देख लिया आपकी औकातों को 

कैसे आप इतना बड़ा-बड़ा हवा महल यूँ बना लेते हैं 

और खुद को ही शहंशाहों के भी शहंशाह बता देते हैं


माना कि ये सिकंदरापन होना कुछ हद तक सही है

पर आप में सिकंदर वाली कोई एकबात भी नहीं है

कैसे आप बातों में ही सोने के घोड़ों को दौड़ा देते हैं 

और सारी सल्तनतों को यूँ आपस में लड़वा देते हैं


आपके दरबार में अनारकलियों का क्या जलवा है

अकबर भी सलीम मियां का चाटते रहते तलवा है

कैसे आप ख्वाबों, ख्यालों की दुनिया बसा लेते हैं

और खट्टे अंगूरों को भी देख- देख कर मजा लेते हैं


कभी-कभार खुद को इंसान की तरह भी दिखलाइए

ये नाजुक हलक है हमारा ऐसे हड्डियों को ना फँसाइये

कैसे आप सरेआम नुमाइश कर अपना कद बढ़ा देते हैं

और अपने मुखौटों पर भी असलियत को यूँ चढ़ा लेते हैं .


Wednesday, November 18, 2020

रात बीत गई तब पिया जी घर आए ........

रात बीत गई 

तब पिया जी घर आए

उनसे अब हम क्या बोले , हम क्या बतियाये

जब यौवन ज्वाला की छटपटाहट में झुलस रही थी

पिया जी के एक आहट के लिए तरस रही थी

तब पिया जी ने एक बार भी न हमें निरखा

उल्टे आँखों में भर दिया सावन की बरखा

सूनी रह गई सजी- सँवरी सेज हमारी

क्या कहूँ कि कैसे बीती हर घड़ी हमपर भारी

कितनी आस से भरकर आई थी पिया जी के द्वारे

पर जब- जब हमने चाहा, वो हुए न हमारे

अपने रूप पर स्वयं ही इठलाती , इतराती रही

प्रेम- दान पाने को अपनी मृतिका ही लजवाती रही

अब तो सूरज सिर पर नाच रहा है

दिनचर्या व्यस्तता के कथा को

बढा- चढ़ा कर बाँच रहा है

सास , ननद का वही घिसा- पिटा ताना

बूढ़े , बच्चों का हर दिन का नया- नया बहाना

देवर , भैंसुर की दिन- प्रतिदिन बढ़ती मनमानी

देवरानी , जेठानी की हर बात में रूसा- फुली , आनाकानी

दाई , नौकरों का अजब- गजब लीला

हाय ! चावल फिर से आज हो गया गीला

तेल- मसालों से बह रही है चटनी, तरकारी

सेहत को खुलेआम आँख मारे दुर्लभ , असाध्य बीमारी

फिर भी जीवन- मक्खन का रूक न रही मथाई

और सुख सपनों में ही रह गयी सारी मलाई

उधर पिया जी बैठे मुँह लटकाए , गाल फुलाये

रह- रह कर बस हमें ही जलाये , और अपनी चलाये

संझावती की इस बेला में थकान ले रही कमरतोड़ अँगराई

इसी आपाधापी में तो हमने सारी उमरिया गँवाई

बहुत पास से अब टेर दे रहा है निघट मरघट

हाय ! छूँछा का छूँछा रह गया यह जीवन- घट

अरे ! अरे ! साँझ बीत गयी, अब तक जला नहीं दिया

रात हो रही है , फिर से रूठ कर कहीं चले गए पिया . 


Saturday, November 14, 2020

अपने करूण दीपों को फिर से जलायें ......

    आनंद का सहज स्फूर्त पुलक उठ कर

    व्याप्त हो गया है लोक-लोकांत में

    विराट अस्तित्व आज फिर से

    श्रृंगारित हुआ सृष्टि के दिग-दिगांत में

    

    निज अनुभूतियाँ फिर से प्राण पाकर

    प्रकाशधार में बलक कर बह रही है

    चौंधियायी आँखों से अंधकार की

    कृतज्ञता झुक कर कुछ कह रही है

    

    हर कान में फुसफुसा रहा है हर हृदय

    सुन प्रणय की इस मधुर मनुहार को

    अपने-अपने संचित उत्साह से सफल करें

    कल के विफलता की हर एक पुकार को

    

    आओ इस दीपोत्सव में सब मिलकर

    अपने करूण दीपों को फिर से जलायें

    जग की विषमता को आत्मसात करके

    हर कसकते घावों को सदयता से सहलायें . 


   *** दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

    

Tuesday, October 27, 2020

क्षणिकाएँ ........

आटा मुंँह में लेते ही
पता चलता है कि कांँटा है
तब तक मछली जाल में होती है
लुभावनी तरकीबें तो
केवल आदम खाल में होती है

     ***

कड़वी दवा भी
लार टपकाने वाले स्वादों के
परतों में लिपटी होती है
जिस पर डंक वाली हजारों
चापलूस चींटियांँ चिपटी होती है

     ***

प्यासे को पानी का
सूत्र मिलता है
भूखे को पाक शास्त्र
नव सुधारकों का
अचूक है ब्रह्मास्त्र

     ***

पुराने पत्थर ही है
जो कभी बदलते नहीं हैं
बदलाव के सारे प्रयास तो
सब कसौटी पर
सौ फ़ीसदी सही है

     ***

लोकप्रिय पटकथाएँ तो
अंधेरे में ही लिखी जाती है
हर झूठ को सच 
मानने और मनवाने से ही
अभिनय में कुशलता आती है .