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Friday, May 14, 2021

एक और इतिहास ......

यह युग 

बीत ही जाएगा

और

एक और युग भी आएगा

जो बीत रहा है वह भी

इतिहास बन जाएगा

पर दोनों कल के

पलड़ों के बीच

शीतयुद्ध जैसा फिर से

कुछ ठन जाएगा

और

ऊँघते काल के प्रवाह में

उबाल और उलार को

नापने के लिए

अनगिनत आँख जड़ा 

असंख्य चँदोवा 

तन कर, तन जाएगा

तब फिर से

सहमतियों की

आँखों की कृपा पर

हर अगले पन्ने की छपाई

निर्भर करेगा

उनका रंगाई-पुताई

बीते हुए सारे

कानाफूसियों का रहना

दूभर करेगा

और फिर सबमें

एक चुपचाप

शब्दयुद्ध ठन जाएगा 

भूलाने लायक

बहुत सारी बातें

कहीं हाशिए में

नामोनिशान मिटा कर

दफन कर दिया जाएगा

कुछ बातों को

सौंदर्य प्रसाधनों से

लीपा-पोती करके

और भी आकर्षक

बना दिया जाएगा

फिर से

इस युग के भी बीतने पर

वही गड्ड-मड्ड सा 

एक और

इतिहास बन जाएगा 

जिसमें ढूंढने पर भी

इस आज की सच्चाई

कभी नहीं मिलेगी . 


20 comments:

  1. सच्चाई मिलने के लिये होती ही कहां है? लाजवाब सृजन।

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  2. गज़ब!
    इतिहास पर मेरे भी यही विचार है।
    बहुत शानदार।

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  3. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार (15-05-2021 ) को 'मंजिल सभी को है चलने से मिलती' (चर्चा अंक-4068) पर भी होगी।आप भी सादर आमंत्रित है।

    चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।

    यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

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  4. बेहतर दर्शन पिरोती इस रचना हेतु बधाई। कौन कल को याद रखता है? इतिहास में रुचि रखने वाले भी विरले ही मिलते हैं। वो दीवाने हैं जो कल को पहले रखते हैं। ।।।

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  5. इस युग के भी बीतने पर
    वही गड्ड-मड्ड सा
    एक और
    इतिहास बन जाएगा
    जिसमें ढूंढने पर भी
    इस आज की सच्चाई
    कभी नहीं मिलेगी .

    एक दम सटीक....

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  6. इतिहास को अपनी सुविधानुसार तोड़-मरोड़ कर पेश करने की प्रथा तो सदा से ही चलती आयी है, सशक्त रचना

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  7. इस युग के भी बीतने पर

    वही गड्ड-मड्ड सा

    एक और

    इतिहास बन जाएगा

    जिसमें ढूंढने पर भी

    इस आज की सच्चाई

    कभी नहीं मिलेगी .
    सही कहा आपने, बहुत सुंदर और सटीक अभिव्यक्ति।

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  8. जी अमृता जी, यही है इतिहास की हक़ीक़त। अपनी मर्जी से लिखा गया और आने वाली पीढियों को परोसा गया इतिहास कुछ कथित दूरदर्शी लोगों की। देन है जिनके हाथ में डोर थी इतिहास को मनचाही। दिशा में मोड़ लिया। अनगिन लोगों में कोई ना कोई अतीतानुरागी इतिहास को पढ़कर बहुत कुछ जानना चाहता है और लिखे गए इतिहास को ही सच मान लेता है। सार्थक सृजन के लिए हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई🙏🙏

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  9. समय की कड़वी यादों के साथ इतिहास को बदलना ही होगा।

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  10. बहुत खूबसूरती से आपने इतिहास की कड़वी सच्चाई को आईना दिखा दिया,साथ में इतिहास के उन होनहार लेखकों को भी सबक लेना चाहिए,जो भविष्य के इतिहासकार बनेंगे ।सुंदर यथार्थपूर्ण सृजन ।

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  11. इस युग के भी बीतने पर
    वही गड्ड-मड्ड सा
    एक और
    इतिहास बन जाएगा
    इतिहास का मर्म परिभाषित करती सशक्त रचना ।

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  12. वाह अमृता जी, आपने अमृत सत्य का उद्घाटन कर दिया है अपनी इस कविता में। बधाई और आभार!!!

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  13. बहुत सुन्दर

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  14. वाह बेहतरीन सृजन

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  15. गहरा कटाक्ष ,समय के चलते इतिहास भी बदल जाता है !!

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  16. इकलौता हासिल वर्तमान है....काल के विस्तृत वितान पर कितनी बातें अंकित हुई और गायब हुई. चंदेल, गुर्जर प्रतिहार।।तुग़लक़। ये बिंदु मात्र है...उनके युग की प्रजा का जीवन गीत...हमें सुनाई नहीं दे सकता।

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  18. इतिहास का यथार्थ सत्य लिखा है ।

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