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Thursday, May 26, 2022

किसकी आई प्यारी चीठी? ........

किसकी आई प्यारी चीठी?

उठी लालसा मीठी-मीठी

मीठा-मीठा दर्द उठा है

सुलगी है प्रीत की अँगीठी

किसकी आई प्यारी चीठी?


बहका फिर से तन और मन

मचला फिर से ये नव यौवन

उखड़ी ऐसी चढ़ती उमरिया

कहती बात काठ-सी कठेठी

किसकी आई प्यारी चीठी?


जब नैन लड़े तो कैसी लाज

चाहे गिर जाए कोई भी गाज

प्रीत ज्वाल धधक-धधक कर

भसम करे उमर की अमेठी

किसकी आई प्यारी चीठी?


जैसे सोलहवाँ साल लगा है

अकारथ सब मनोरथ जगा है

उँगलियाँ अनामिका से ही पूछे

किस अनामा का है ये अँगूठी?

किसकी आई प्यारी चीठी?


जबसे ऐसी-वैसी बात हुई है

विरह की भी लंबी रात हुई है

मिले वो तो हो मेरा भी सबेरा

अब रह न पाऊँ यूँ ही ठूँठी

किसकी आई प्यारी चीठी?


मन क्यों माने उमर की बात

चाहे कोई कहे उसे विजात

हाँ! प्रीत हुआ है मान लिया

जो ना मानूँ तो हो जाऊँ झूठी

किसकी आई प्यारी चीठी?


अब कोई दे कान कनेठी

या कह दे ये है मेरी हेठी

पर दर्द भी है कितना मीठा

लालसा भी है बड़ी मीठी

किसकी आई प्यारी चीठी?

Monday, February 14, 2022

शून्य लिख दो ....….

ढाई आखर के

प्रेम की चिट्ठी में

शून्य लिख दो

जो विरह होगा

प्रतीक्षा करो

कभी तो 

वो मिलन 

पढ़ा जाएगा

और तुम्हारा

प्रेम स्वयं ही

तुम तक

चला आएगा.

     ***

तुमने

तनिक जो

भरे नयनों से

देख क्या लिया

अज्ञात ॠचाएँ

ऊर्ध्व वेग से

हृदय- व्योम में

गूँजने लगी है

अब ये भी बता देते

कि क्षर-अक्षर सबमें

क्या प्रेमवेद

और प्रेमोपनिषद् 

प्रकट हो रहा है ?

     ***

प्रेम प्रलय में

जब कुछ भी

नहीं बचेगा

सबकुछ

खो जाएगा

पीड़ा के प्रवाह में

तब भी एक 

उत्तप्त हृदय

बचा रहेगा

डोंगी बन कर

वह प्रेम का ही होगा.

Thursday, February 3, 2022

कल्पवासी बसंत........

हमारी निजन निजता से नि:सृत

प्रीछित प्रीत की गाथाएँ हैं विस्तृत

उसे अब अनकहा ही मत रहने दो

यदि तुम कहो तो वो हो जाए अमृत


कह दो कि इन्द्रियों पर वश नहीं चलता

कह दो कि संयम ऐसे अधीर हो उठता

है बारहों मास तन-मन का रुत बसंती

मदमाया प्राण रह-रह कर है मचलता


कह दो हर क्षण बिना रंग का खेले होली 

क्ह दो बिना भांग के ही बहकती है बोली 

जो कहा न जाए वो सब भी कहलवाना

कहो कि कैसी होती है प्रीत की ठिठोली 


कह दो कि मुझको आलिंगन में भर कर

कह दो कि मुझको चुंबनों से जकड़ कर

औचक ही चेतना भी क्यों चौंक जाती है ?

क्यों सुप्त चंचलता आ जाती है उभर कर ?


कैसे कल्प प्रयाग में हुआ है अनोखा संगम ?

कहो कैसे स्खलन हो गया कालजयी स्तंभन ?

कह भी दो कि प्रेम-यज्ञ में ही आहुत होकर

कैसे प्रेमिक कल्पवास को किया हृदयंगम ?


कह दो कि कौन करे अब किसी और की पूजा

कहो कैसे मुझमें डूबे कि अब रहा न कोई दूजा

वरदाई अभिगमन के भेद भरे सब राज खोलो

कह दो कि हमने जो जिया कितना है अदूजा


अब तो इन अधरों पर धर ही दो अधरों को

कहीं सब कह कर के कँपा न दे धराधरों को

क्या प्रीत की गरिमा इतनी होती है श्लाघी ?

या चुहल में यूँ ही चसकाती है सुधाधरों को ?


क्या हम पर प्रेम-भंग का असर हुआ है ?

या अभिसारी बसंत ही अभिसर हुआ है ?

या इस माघ-फागुनी प्रेमिक कल्पवास में

उधरा-उधरा कर परिमल ही प्रसर हुआ है ?


कह दो वो अनकहा ही कण-कण खिला है

कहो खुला देहबंध तो प्रेम-समाधि मिला है

जो तुम न कह पाओ तो श्वास-श्वास कहेगा

कि कल्पवासी बसंत कैसे बूँद-बूँद पिघला है .


Thursday, January 20, 2022

कैसे भेंट करूँ? ........

गुलाब नहीं मिला 

तो पंँखरियाँ ही लाई हूँ !

बाँसुरी नहीं मिली

तो झंँखड़ियाँ ही लाई हूँ !

कैसे भेंट करूँ ?

सुवासित हुई तो

सुगंधियाँ लाई हूँ !

गुनगुन उठा तो

ध्वनियाँ ही लाई हूँ !

कैसे भेंट करूँ ?

देखो !

प्रेम प्रकट है

निज दर्श लाई हूँ !

तुम्हें छूने के लिए

कोमल से कोमलतम 

स्पर्श लाई हूँ !

कैसे भेंट करूँ ?

संग-संग इक

झिझक भी लाई हूँ !

ये मत कहना कि

विरह जनित

मैं झक ही लाई हूँ !

कैसे भेंट करूँ ?

तुम ही कहो !

तुम्हें देने के लिए

बिन कुछ भेंट लिए

कैसे मैं चली आती ?

लाज के मारे ही

कहीं ये धड़कन 

धक् से रूक न जाती !

यूँ निष्प्राण हो कर भला

जो सर्वस्व देना है तुम्हें

कहो कैसे दे पाती ?

मेरे तेजस्व !

हाँ ! निज देवस्व

देना है तुम्हें

अब तो कहो !

कैसे भेंट करूँ ?

Tuesday, November 29, 2016

लिखती रहूँ प्रेमपत्र .........

शब्दों के आँखों में
भरे आँसुओं को छुपाकर
उसके हृदय का
सारा दुःख दबाकर
ओठों पर बस
सुंदर मुस्कान लाकर
तुम्हें लिखती रहूँ
प्रेमपत्र .........

उस प्रेमपत्र में मैं लिखूँ
घर- आँगन की बातें
अपने गली- मोहल्ले की बातें
और देश- दुनिया की बातें
बातें ही बातें
ढेर सारी बातें ..........

भूली- बिसरी स्मृतियों में
डूबते हुए , उतराते हुए
हँसते हुए , मुस्कुराते हुए
तुम उन सब बातों में
कभी मत पढ़ना
अनलिखे प्रेम को .....

अगर पढ़ने लगे तो
शब्द स्वयं पर
अपना वश न रख पायेंगे
ओंठों से तो न सही
पर अपने आँसुओं से
न जाने
क्या- क्या कह जाएँगे ........

अब तुम ही कहो
कहीं प्रेमपत्र में
कभी आँसुओं का हाल
लिखकर कहा जाता है ?
ये अलग बात है कि
अब तुम्हारे बिना
एक पल भी
नहीं रहा जाता है ......

बस शब्दों के ओंठों पर
तुम अपने ओंठों को
मत धर देना
और उनके आँसुओं को
अपनी आँखों में
मत भर लेना ........

तब शब्दों के
हृदय का सारा दुःख
दुख- दुख कर
उसी पल बह जाएगा
और मेरा प्रेमपत्र
प्रेमपत्र न रह पाएगा .

Monday, September 19, 2016

पियहद ही बिसराम .........

तृषा जावै न बुंद से
प्रेम नदी के तीरा
पियसागर माहिं मैं पियासि
बिथा मेरी माने न नीरा

सहज मिले न उरबासि
आसिकी होत अधीर
घर उजारि मैं आपना
हिरदै की कहूँ पीर

दीपक बारा प्रेम का
विरह अगिन समाय
तलहिं घोर अँधियारा
किन्हुं न पतियाय

जो बोलैं सो पियकथा
दूजा सबद न कोय
सबद- सबद पियहिं पुकारिं
पिय परगट न होय

सुमिरन मेरा पिय करे
कब आवै ऐसों ठाम
पिय कलपावै आतमा
पियहद ही बिसराम .

Wednesday, February 10, 2016

सुनो रे आली ! .......

सुनो रे आली !

मेरे प्रिय की
हर बात है निराली !
वो मतवाला
मैं भी मतवाली
मतवाली हो कर मैं
कण- कण में
उस को ही पा ली !

सुनो रे आली !

प्रिय अलिक तो
मैं कुंचित अलका
प्रिय अधर तो
मैं अंचित अधर का !

प्रिय मनहर नयन
तो दृष्टि हूँ मैं
प्रिय है कल्पवृक्ष
तो इष्टि हूँ मैं !

प्रिय पद्म -कपोल
सुमन -वृष्टि हूँ मैं
प्रिय सौंदर्य -मुकुर
तो नव -सृष्टि हूँ मैं !

प्रिय ह्रदय तो
पुकार हूँ मैं
प्रिय श्वास तो
तार हूँ मैं !

प्रिय प्रकृति तो
श्रृंगार हूँ मैं
प्रिय प्राण तो
संचार हूँ मैं !

प्रिय शून्य तो
आधार हूँ मैं
प्रिय पिंड तो
भार हूँ मैं !

प्रिय रूप तो
मैं काया हूँ
प्रिय धूप तो
मैं छाया हूँ !

प्रिय सावन तो
घटा हूँ मैं
प्रिय इन्द्रधनुष तो
छटा हूँ मैं !

प्रिय है मलयज तो
सुगंध हूँ मैं
प्रिय प्रसुन तो
मकरंद हूँ मैं !

प्रिय सरस नीर
मैं गम्भीरा सरिता
प्रिय लोल लहर
मैं मृदु पुलकिता !

प्रिय वन कुञ्ज तो
मैं मुग्धा बयार
प्रिय जलकण तो
मैं मधुर फुहार !

प्रिय स्वर्ण निकष
तो मैं कनक -कामिनी
प्रिय गंभीर गर्जन
तो मैं स्निग्ध दामिनी !

प्रिय है अम्बर
तो विस्तार हूँ मैं
प्रिय है धरा
तो आकार हूँ मैं !

प्रिय प्रकाश तो
मैं झलमल हूँ
प्रिय रात तो
मैं कलकल हूँ !

प्रिय अरुण तो
अरुणिमा हूँ मैं
प्रिय चन्द्र तो
मधुरिमा हूँ मैं !

प्रिय स्वप्न तो
जागरण हूँ मैं
प्रिय चित्त तो
चिंतवन हूँ मैं !

प्रिय उत्सव तो
उद्गार हूँ मैं
प्रिय प्रलय तो
हाहाकार हूँ मैं !

प्रिय आनन्द तो
मुदित हास हूँ मैं
प्रिय विषाद तो
अटूट आस हूँ मैं !

प्रिय अर्घ तो
अर्पण हूँ मैं
प्रिय तृषा तो
तर्पण हूँ मैं !

प्रिय रामरस तो
खुमारी हूँ मैं
प्रिय बाबरा तो
तारी हूँ मैं !

प्रिय यौवन मद तो
क्रीड़ा हूँ मैं
प्रिय परिरम्भन तो
व्रीड़ा हूँ मैं !

प्रिय राग तो
गीत हूँ मैं
प्रिय पुलक तो
प्रीत हूँ मैं !

प्रिय बिंदु तो
मैं रेखा हूँ
प्रिय लिखे तो
मैं लेखा हूँ !

प्रिय मौन तो
मैं वाणी हूँ
प्रिय वैभव तो
मैं ईशानी हूँ !

प्रिय मिलन तो
वियोग हूँ मैं
प्रिय जप तो
योग हूँ मैं !

प्रिय नाद तो
वाद्य हूँ मैं
प्रिय ओंकार तो
आद्य हूँ मैं !

प्रिय ध्यान तो
अभ्यर्चना हूँ मैं
प्रिय तप तो
प्रार्थना हूँ मैं !

प्रिय संकल्प तो
सिद्धि हूँ मैं
प्रिय विषय तो
वृद्धि हूँ मैं !

प्रिय रत्न तो
कनि हूँ मैं
प्रिय शंख तो
ध्वनि हूँ मैं !

प्रिय अपरिमित तो
परिधि हूँ मैं
प्रिय निरतिशय तो
निधि हूँ मैं !

सुनो रे आली !

मैं प्रिय की प्रिया !
प्रतिपल एक ही हैं
कहने को दो हम !
महासुख ने ही
हर घड़ी , हर घड़ी
हमें किया है वरण !
तब तो हर बात है
इतनी निराली !

सुनो रे आली !

Saturday, February 14, 2015

उस कल्पतरु की छाँव में .....

अंतर के सुप्तराग को जगाकर
कामनाओं को अति उद्दीप्त कराकर
नभ से प्रणयोतप्त जलकण टपकाकर
इस अमा की घनता को और बढ़ाकर
पूर्ण उद्भट चन्द्र सा तुम आना नहीं
यदि आना भी तो मुझे अपनी
चाँदनी से उकसाकर चमचमाना नहीं
यदि मैं चमचमा भी गयी तो नहीं ले जाना तुम
उस कल्पतरु की छाँव में
और मत ही भरना मुझे अपनी बाँह में

उस कल्पतरु की छाँव में
आलिंगनयुत तेरे बाँहबन्धों में
संधित कल्पनायें रति-रत होने लगेंगी
औ' आतुर मन की चिर सेवित संचित
प्रणय-पिपासा भी सदृश्य हो खोने लगेंगी
एक कुतूहल भरा मालिन्य मुखावरण में
दो देह भी कथंचित् अदृश्य होना चाहेंगे
पर अमा-विहार की हर एक गति-भंगिमा से
कई-कई गुणित विद्युतघात छिटक जाएंगे

उस कल्पतरु की छाँव में
चिर-प्रतीक्षित वांछक का हर वांछन
क्षण में तड़ित-गति से पूरा होगा
पर प्रखर जोत से ओट की वांछा लिए
इस निराकुल निरावृता का तो
हर यत्न ही मानो अधूरा होगा
निखरी हुई दिखावे की अस्वीकृति में
निहित होगी पूर्ण मौन स्वीकृति
औ' लालायित लज्जित प्रणय-अभिनय भी
प्रिय होंगे सम्मोहक स्वाभाविक सहज कृति

उस कल्पतरु की छाँव में
वर्ण-वर्ण के कल्प-पुष्पों से
मेरी वेणी को मत गूँधित करना
औ' इन अंगों पर पुष्प-पराग का लेप लगा
संशुद्ध सौंदर्य को मत सुगंधित करना
माणिक-मणियों-रत्नों या स्वर्णाभूषणों को
संयोगी-बेला का बाधा मत ही बनाना
कुछ अन्य प्रमाण यदि शेष रह जाए तो
तुम यथासंभव उसे निर्मूल मिटाना

उस कल्पतरु की छाँव में
उन्मत हो रतिफल-मदिरा मत ही चखना
औ' मेरी मदिरा से भी दूर ही रहना
यदि मदमोहित होकर तुम मधुमय हुए तो
यदि मुझसे    -क्रीड़ा में जो तन्मय हुए तो
तुम्हें या स्वयं को भला मैं कैसे सम्भालूंगी ?
विदित हो जाएगा कोई भी साक्ष्य तो
केवल मैं ही अभिसारिका कहलाउंगी

हाँ! प्रेम है तुमसे पर लोगों में
किसी भी संक्रामक अचरज को न  जगने दूंगी
औ' कोई भी अनुमान सहज न लगने दूंगी
इसलिए मत भरना मुझे अपनी बाँह में
उस कल्पतरु की छाँव में .

Saturday, January 31, 2015

पीवत जो बसंतरस लगी खुमारी .....

बसंत कियो जो हिय में बसेरा
आपुई मगन भयो मन मेरा

आओ पिय अब हमारे गाँव
बसंत को दियो अमरपुरी ठाँव

फिर कोंपलें फूट-फूट आई
फिर पत्तों ने पांजेब बजाई

झरत दसहुँ दिस मोती
मुट्ठी भर हुलास भयो होती

झीनी-झीनी परत प्रेम फुहार
चेति उड़ियो पंख पसार

कहा कहूँ इस देस की
प्रेम-रंग-रस ओढ़े भेस की

चहुंओर अमरित बूंद की आंच
सांच सांच सो सांच

जस पनिहारिन धरे सिर गागर
नैनन ठहरियो तो पेहि नागर

सब कहहिं प्रेम पंथ ऐसो अटपटो
तो पिय आओ , मोसे लिपटो

दांव ऐसो ही है दासि की
मद पिय करे सहज आसिकी

पिय मिलन की भई सब तैयारी
पीवत जो बसंतरस लगी खुमारी .

Friday, December 26, 2014

प्रेम-प्रवण .........

आर्य प्रिय वो
जो तीक्ष्ण पीड़ा से
तृण तोड़कर
त्राण दे सके
और सुरभित कस्तूरी को
तेरे गोपित नाभि से
नीलिन होकर ले सके

निज क्लेश न्यून कर
और अपनी प्रीति
प्रदान उसे कर
जो तेरी सुधि में
नित पुष्पित हो
नित सुष्मित हो
निज सुध-बुध खोकर

उसे अवश्य
तुम सुख पहुँचाना
जो सदा रहे
अपने सुख से
सहर्ष अंजाना
और तेरे दुःख को
निज श्वास भूलकर
केवल अपना जाना

प्रेम दृढ
श्रद्धा अक्षय
हो अटूट अनुराग
तुमपर जिसका
निश्चय ही
भ्रमकारी देह से परे
प्राण एक होगा उसका

हो हरक्षण
उसकी भंगिमा मनोहर
सहज ही नैन
उठ जाते हों
मृदुल भाव से
हर्षित ये चित्त
सदा ही चैन पाते हों

हो नित्य नवीन जो
प्रेम-प्रवीण जो
विधाता की हो
पहली कृति
जिसे कोई देखे
तो कभी न लगे
कोई भी अतिश्योक्ति

अनायास ही
अहैतुक ही
जब हृदयंगम
होता है ये लक्षण
तब अहोभाग्य से
रहता सदैव ह्रदय
केवल और केवल
प्रेम-प्रवण .

Thursday, October 3, 2013

लोग जान जायेंगे....

इतना न लिखो मुझे
लोग जान जायेंगे
फिर अर्थों के अधीर अधरों पर
अपना कान लगायेंगे
व शब्दों में घुली सुरभि से ही मुझे
ऐसे पहचान जायेंगे
कि रिक्त स्थानों में भी
अबुध अनुमान लगायेंगे....

बेरोक-टोक फिर तो मैं
बह न पाऊँगी
कोई टोक दे तो कुछ
कह न पाऊँगी
उन चुभती नजरों को तब मैं
सह न पाऊँगी
और बिन चिढ़े भी तो
रह न पाऊँगी.....

मेरी चिढन की चिनक से भी
लोग जान जायेंगे
फिर प्रचल पीड़ा के पदचाप में भी
अपना कान लगायेंगे
और गुप-चुप रोती वेदना को भी
ऐसे पहचान जायेंगे
कि सुषुप्त साँसों के शुष्क-गान में भी
अयुक्त अनुमान लगायेंगे....

बोलने से उथली हो हर बात
बह जाती है
जो न भी कहना चाहो वो भी
कह जाती है
कौड़ियों के उलाहना को भी जाने कैसे
सह जाती है
और न कहो तो ही वह कीमती
रह जाती है....

इसलिए इतना न लिखो मुझे
लोग जान जायेंगे
फिर अर्थों के अधीर अधरों पर
अपना कान लगायेंगे .


    

Tuesday, September 17, 2013

मैं प्रतीक्षा करूँ ....

                        तेरे ही बगल में मैं बैठ कर
                       तेरी ही कितनी प्रतीक्षा करूँ?
                         कभी तो थामेगा तू मुझे
                        बस इतनी ही इच्छा करूँ

                      दिवस-दिवस मधुर आशा में
                        हर एक दंश को चूमती हूँ
                      निराशा में विश्वास पालकर
                       पल-प्रतिपल मैं झूमती हूँ

                       छोटी-छोटी उर्मियाँ उठकर
                      एक अनोखी आस जगाती है
                      विलग-विलग किनारा छूकर
                     उस पार की झलक दिखाती है

                       एक धागा पिरोती रहती हूँ
                      मन के अन्स्युत मनकों में
                       सहन तक ही तुम आते हो
                      सुनती हूँ अस्फूट भनकों में

                     यह जो जीवन का तिमिर है
                      वह खोजता तेरा उजास है
                     स्नेह-ज्योति सहज ही घिर
                      ले आता मुझे तेरे पास है

                      तू जला दे शत दीपावलियाँ
                       मेरे प्रेम के कोने -कोने में
                      या बुझाकर मेरी ज्वाला को
                        बस हो जा मेरे ही होने में

                         बैठी हूँ, यूँ ही बैठी रहूँगी
                    चाहे जितना जन्म कम जाये
                  या अनियंत्रित रिसना घावों का
                       बह-बह कर यूँ थम जाए

                    कब परस करोगे जी को प्रिय!
                    क्यूँ ऐसी कोई मैं पृच्छा करूँ?
                      तेरे बगल में ही बैठकर
                    बस तेरी ही मैं प्रतीक्षा करूँ .


Friday, August 23, 2013

प्रेम को कौन कब समझ सका है....



कुछ न कुछ कचोटती-सी
ग्रथित गूँज जरूर रह गयी होगी
सुधि से एक गंध उठकर
संचारित साँसों से बह गयी होगी !

उन्हीं अभिभूत अनुस्मृतियों को
मैं अनंतक अभिसार दे रही हूँ
हाँ! जन्मों-जन्मों के बाद भी
तुम्हें फिर से पुकार दे रही हूँ !

यह जो निगूढ़ नाद है
न मालूम कबसे चल रहा है
हो-न-हो दो बिछुड़े शून्यों में
अश्लेष अर्थ-सा पल रहा है !

उन्हीं अर्थों को तबसे कितने ही
संभृत शब्दों में घोल रही हूँ
और तेरी स्मृति-मंजूषा को
मैं बोल-बोल कर खोल रही हूँ !

कहीं उन शंसित शब्दों की कौंध में
तुम्हें कुछ स्मरण आ जाए
और चिर-वंचित विस्मृतियाँ
अपने अवगुंठित अर्थों को पा जाए !

इस जीवन का अर्थ तुम्हीं से
औ' सौभाग्य का क्षण-क्षण प्रयोजन है
धूप-दीप , अर्चा , फूल , बंदनवार लिए
ह्रदय-महल का सजा ये सिंहासन है !

कितनी आकांक्षाओं-अभीप्साओं को ले
इस दुर्लभ जन्म को हमने पाया है
अब दिवस-रात निष्फल न बीते
इसलिए तो तुम्हें फिर से बुलाया है !

कुछ महत होने के है करीब आया
कोई विधि-विधान मत खोजो तुम
अनघट घटना ही घट रही है
सरस होकर उसे सहेजो तुम !

प्रेम को कौन कब समझ सका है
प्रयत प्रतीति है केवल खोने में
ये जन्मों-जन्मों की गंधवाही गूँज भी
सुन , कहती है  हो जा  मेरे होने में .
 

Sunday, January 27, 2013

प्रेम का ही आभार है ...


               कुछ कह नहीं सकती यह कि
                 ह्रदय की जीत है या हार है
                  ये पीड़ा है मुझे बड़ी प्रिय
                  जो प्रेम का ही आभार है

               आभार इतना कि हर भार से
                अतिगत ही जैसे अछूती हूँ
                 अछूती-अछूती ही हरपल
                  प्रिय को ऐसे मैं छूती हूँ

               वह अलबेला कितना अनछुआ
                  छू-छू कर अब मैंने जाना है
                    पाया-पाया सा है लगता
                    पर उतना ही उसे पाना है

                कुछ कह नहीं सकती यह कि
                  पाकर भी उसे पा ही लूँगी
                   जो पा भी लिया उसे तो
                  सबसे मैं तो छिपा ही दूँगी

                 उस अनजाने-अनपहचाने को
                 अनजाने में ऐसे जान लिया है
                  प्रीति लगी बस उस नाम की
                  जो इतना मैंने नाम लिया है

                  अब वही नाम इक गीत बन
                 इन साँसों से बस टकराता रहे
                 और उखड़ी-उखड़ी धड़कन को
                   इक विरह-धुन पकड़ाता रहे

                 कुछ कह नहीं सकती यह कि
                 यही धुन उसने भी गाया होगा
                मतवाली-मतवाली फिरती देख
                मुझपर उसका मन आया होगा

                अभी उसे तो देखा भी नहीं है
               जो मिले भी तो मैं पहचानूँ ना
               बस प्रीति लगी है उस नाम की
                कैसे लगी यह भी मैं जानूँ ना

                बस जानने से जी भरता नहीं
                जान-जान कर मैंने जाना है
                वह अनजान रहे तब भी उसे
                इन साँसों का अर्घ चढ़ाना है

                कुछ कह नहीं सकती यह कि
              ये अर्घ है या अलख प्रतिकार है
                 ये पीड़ा है मुझे बड़ी प्रिय
                 जो प्रेम का ही आभार है .


Friday, January 4, 2013

प्यार के साथी ! सच मानो ...


प्यार के साथी ! सच मानो
अपनी चुप-सी पतझड़ को , मैं
बस तुमसे ही गुदगुदाना चाहती हूँ
और इस बासित बगिया में
तेरा ही , बांका बसंत खिलाना चाहती हूँ ...

कहो तो ! हवाओं को सनसनाकर
हर पत्तियों की चुटकियाँ झट से बजा दूँ
अलसाई सी हर कलियों की
आँखों को चूम-चूमकर जगा दूँ ...

यूँ बलखाती डालियों-सी
तुझपर ही , मैं ढुलमुलाना चाहती हूँ
ओ! मेरे सघन तरु , मैं
लता सी ही , तुझसे लिपट जाना चाहती हूँ ...

इस लगन को प्रिय!
बस पागलपन मत कहो तुम
प्रीत पुरातन है मेरा
निरा आकर्षण मत कहो तुम ...

प्यार के साथी ! सच मानो
अपने हर रोदन को
तुमसे अमर गान बनाना चाहती हूँ
और थामकर हाथ तेरे
मुश्किलों को भी आसान बनाना चाहती हूँ ...

कहो तो ! इस उफनते यौवन को
मैं , तुममें अभी ऐसे समा दूँ
कि तुमसे ही उघड़कर
तुम्हे ही मैं , घूँघट भी बना लूँ ...

तेरे लहरों में सिहर कर
अंग-अंग को भिंगाना चाहती हूँ
और तुम्हारे ही सहारे
तुममें ही , डूब जाना चाहती हूँ ...

इस नेह-हिलोर को
बस लड़कपन मत कहो तुम
बड़ी बेबूझ ये चित्त है
रुत का चलन मत कहो तुम ...

प्यार के साथी ! सच मानो
अपनी गहरी प्यास को
तुममें ही , तृप्ति बनाना चाहती हूँ
और वासनाओं के पार कहीं
निर्वासना का रस भी बहाना चाहती हूँ ...

प्यार के साथी ! सच मानो .

Tuesday, October 16, 2012

कि पीर-सी लगे जुन्हाई...





                               ये कौन-सी रुत है आई 
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                             चाँद चुट-चुट चुटकी बजाए
                           मंद,मदिर-सा मलय लहराए
                           पर मेरे व्याकुल मन के लिए 
                            मेरे प्रीत की पुकार न आये
                           न ही बाजे प्राणों की शहनाई 
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                       नदियाँ पतुरिया-सी पायल बजाये
                          रात की रानी चूड़ियाँ खनकाए
                        बगिया में बिरही-बहार छिपकर 
                            गोपन-बिध से मुझे रिझाए
                             पर बेसुधी है मुझपर छाई 
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                             मन नहीं लगता क्या करूँ ?
                            प्रण नहीं निभता क्या करूँ ?
                           कुंठित-शंकित हर साँस लिए
                             दिन नहीं उगता क्या करूँ ?
                            न ही आई सुधि की पुरवाई
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                              आँखों में सपनों का खेला
                             अधर तक है अश्रु का रेला
                             कान में मेरे कोई ये कहता
                            कि लागूँ मैं खुद को ही मेला
                             खीजकर चेतना कसमसाई
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                               मेरे गीतों को जग गाये
                             अपना सौ-सौ अर्थ लगाए
                            जिसके लिए प्राण गीत रचे 
                             बस उसे ही समझ न आये
                          आह! मेरी आह उसे छू न पाई 
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                                ये कौन-सी रुत है आई 
                               कि पीर-सी लगे जुन्हाई .


          ( जुन्हाई - चाँदनी )

Saturday, October 6, 2012

तुम मेरे हो कौन ?


विरवा में अनुक्षण अँखुआते
हर पंखड़ी , पात से पूछूं
भोर की सुकुमार किरणों सी
गंध बिखराती हर गात से पूछूं
अल्हड़ , आतुर चाहना की
फूलझड़ियों सी बरसात से पूछूं
तुम मेरे हो कौन ?

शिशिरा के हलके हिलोरे से
झिर-झिर झिलमिलाते मूंजों से पूछूं
कनखी ही कनखी में कुछ कह
सकुचाते सघन कुंजों से पूछूं
प्राण-पिकी की मतवाली सी
मरमराती मधुर गूंजों से पूछूं
तुम मेरे हो कौन ?

इन निर्झर नलिन-नयनों में तिरते
पल-पल की पिपासा से पूछूं
दूर-दूर तक विस्तीर्ण नीलिमा में
विस्तारित , विस्मित जिज्ञासा से पूछूं
झिर्रियों की झलक से चौंधियाकर
चुलबुलाते पंखों की अभिलाषा से पूछूं
तुम मेरे हो कौन ?

तुझ पाहुन की पगध्वनि पाने को
धमा-धम धमकते धड़कनों से पूछूं
तन पर तारकावलियों सा जड़ने को
तप्त , तत्पर चुम्बनों से पूछूं
देह की देहरी पर दुहाई देते
कसकते , कसमसाते आलिंगनों से पूछूं
तुम मेरे हो कौन ?

मुझे पूरब , पश्चिम और दक्षिण
दिखा- दिखा कर न जाने
उत्तर कहाँ है गौण ?
जब तुमसे जो पूछूं तो
रहस्य भरी मुस्कान लिए
बस रहते हो मौन...
अब कोई तो मुझे बताये
मैं किससे जाकर पूछूं कि
तुम मेरे हो कौन ?
 

Friday, July 20, 2012

मेरा पद्म तुम्हें भर लेगा...


गिरने   दो  अपनी   अहं - दीवारें
सम्पूर्ण - समर्पण   की   राहों  में
तब   मेरा  पद्म   तुम्हें  भर  लेगा
मूक -मिलन  के  मधुर  बाँहों  में

तुम  चाहे  जिस -जिस   देश रहो
जब -जब  चाहे   कोई  वेश   धरो
पल -पल की प्रतिच्छाया  बनकर
ये   अम्बुज  अंक   लगा  जायेगा

इन अधरों  के  इति  इंद्रधनु  बनो
और  बस भोले दृग की  बात सुनो
तरल -चपल  गतिविधियाँ  न्यारी
ये कलित कंज कर भरमा जाएगा

ज्यों   धरा   तरसे  तुम  भी  तरसो
उस   धाराधर  सा  जमकर  बरसो
तन - मन -प्राण से  भींग जाने को
ये जलज  भी  खिल-खिल जाएगा

विगत -आगत  से तुम  विरत रहो
जिधर मैं खींचू  बस  उधर ही बहो
मंद -मदिर  सा  अधीर  समीर में
ये  पुलकित  पंक  लहरा   जाएगा

माना  एक  से  बढ़  एक  चुभन  है
चंचल चित्त उद्वेलित  चिंतन  है
पर  कोई  सुन्दर  स्वप्न  सुनहला
ये  कमल  किलक  दिखा  जाएगा

शब्द - शब्द  से  कुछ  भी  न कहो
असह्य  वेदना  का  अनुताप सहो
तेरी   धड़कनों  की  आह का स्वर
ये  सरसिज  स्वयं  में  पा जाएगा

कोमल कितने प्रिय!चरण तुम्हारे
कि काँटे हिल -मिल  बसुधा बुहारे
और   तेरे   पथ  पर  पंखुड़ियों को
ये  शतदल  सदा  बिखरा  जाएगा

कितना  मृदुल - मोहक है  ये पाश
चहुँ ओर प्रिय! लखे  तेरा  ही भास
जिसपर गर्वित  रूप  कर निछावर
ये  नंदित नलिन  निखरा  जाएगा

मत  घबराओ  निज  हाथ  बढ़ाओ
मिट जाओ इन्हीं  शाश्वत चाहों में
तब   मेरा   पद्म   तुम्हें   भर  लेगा
मूक -मिलन   के   मधुर  बाँहों  में .

Sunday, June 17, 2012

प्रेम-वरदान


माना कि हर समय
पलड़े का झुका काँटा है
और दैविक सुअवसरों ने
केवल दुःख ही दुःख बाँटा है....
पर सच देखा जाए तो
हीरे ने ही हीरे को काटा है
चाहे जितना भी खींचता हुआ
त्रासदियों का ज्वार-भाटा है....
कौन कहता है कि
जिसे तिरना नहीं आता
हर लहरों से वह हारा है
उसका भी क्षिति से क्षितिज तक
क्षण प्रति क्षण का सहारा है....
अनुक्त अनुभूतियों का भी
विस्तृत विसदृश्य किनारा है..
जिसने अतल गहराइयों से भी
हर बार , हर बार उबारा है.......
ये भी माना कि
जिसे जीवन की नदी में
अपना द्वीप बनाना नहीं आता...
गंभीर ग्रीष्म को देखकर भी
मेघ बन उफन जाना नहीं आता...
और सूर्य की दीप्त किरण से
विमल हो मिल जाना नहीं आता....
पर वे भी एक
अकल्प अद्भुत संयोग ही हैं
विषम व्यवधान हेतु
एक विलक्ष वियोग ही हैं......
किन्तु ये तो बस समय की बात है
जिसमें संभवत: नियति के
खलनायक का भी बड़ा हाथ है.....
ह्रदय तो बस
ह्रदय की भाषा जानता है..
काल-दूरी से परे जाकर
बस धड़कनों को पहचानता है....
कहीं से तनिक भी
पाकर अनमोल प्रेम-वरदान
निर्मल सरोवर सा
बन जाता है हर सूखा प्राण....
जी उठती है जिसमें असीमित धार
छोड़ सारे अहम् व वहम को
कर ही लेता है वो
अभिनव,अभिभूत,अपरिमित प्यार .

Thursday, May 10, 2012

प्रीतम का संदेशा


रोम-रोम को
अकस्मात सुख ने सिहराया है
चिर प्रतीक्षा की
व्याकुलता ने मानो वर पाया है
टिमटिमाते लौ से
जित ज्वाला सा जगमगाया है...

लगता है कि
मेरे प्रीतम का संदेशा आया है

ठहरी हवाओं को
प्रेम पंखो पर झुलाया है
पीपल पातों ने
ये कैसा कोलाहल मचाया है
चुप चातकी ने
चहक-चहक कर चौंकाया है...

हाँ ! प्रीतम का
प्यारा संदेशवाहक ही आया है

मरू नभ पर
घनघोर घन लहराया है
मोर मोरनी के
नयन में नयन दे मुस्काया है
नए-नए गीत
नई ध्वनियों ने मिल गाया है...

हुलस कर जिसे
मैंने भी निज-हाल सुनाया है

हर पल पर
लिखी पाती उसे थमाया है
कि ह्रदय को
कैसे मैंने उपासना-गृह बनाया है
अपने प्रीतम को
उसमें देव सदृश बिठाया है...

हठचेती ह्या ने
हठात भेद उगलवाया है कि

बिन मदिरा के
बेसुध सी रात ने मुझे भरमाया है
और भोर तक
जगते सपने ने निर्मोही को दिखाया है
हर तत्पर दिन
पुन: सूनी संध्या में समाया है...

हलाहल पी कर
मैंने भी ये संदेशा भिजवाया है

कि उसका दिया
विरह उपहार भी बड़ा मनभाया है
और हर्षोन्माद में
बस उसी को तो मैंने पाया है
दुःख देकर भी
आखिर उसी ने तो दुलराया है...

हाय ! प्रीतम तक
कैसा संदेशा उसने पहुँचाया  है .