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Sunday, September 18, 2022

इल्तिजा............

आजकल आप बहुत लिख रहे हैं भाई!

क्या आप क़लमकार हैं या क़लमकसाई!


लिखने से पहले जरा सोच भी लिजिए

निकले लफ़्ज़ों में जरा लोच भी दिजिए


यूँ बंदूक से निकली गोली की तरह फायर हैं

और कहते हैं कि आप नामचीन शायर हैं


क्या आप बस नाम के लिए ही लिखते हैं?

पर वैसे नाम वाले भी आप कहाँ दिखते हैं?


आपके अल्फ़ाजों की अदा तो निराली है

क्या आपने लिखने वाली भांग खा ली है?


आप ऐसे शोहरती नशे में हैं तो रहिए न

आपके जी में जो भी आए आप कहिए न


पर आपसे सब इत्तेफ़ाक़ ही रखे ज़रूरी है?

वाह! वाह! कर देना तो सबकी मज़बूरी है


जितनी जल्दी समझ जाएँगे तो अच्छा होगा

हमारी तरह ये कहने वाला कौन सच्चा होगा?


इल्तिजा इतनी ही है कि जरा-सा थम जाइए

ज़मानें भर का न सही पर अपना तो गम़ खाइए


किसी भी मुद्दे पर बस ऐसे शुरू ही हो जाते हैं

रहम कीजिए क़लम पर क्यों इतना तड़पाते हैं?


इतनी ही तड़प है तो कुछ जमीन पर कर दिखाइए

नहीं तो कंबल ओढ़कर खुद में ही सही बड़बड़ाइए


बदगुमानी से गुमराह करना भी तो इक गुनाह ही है

गोया सोचते भी नहीं कि उनमें ही कचरा बेपनाह है


क़लमकारों! यूँ बुरा न मानें आप तो बस बहाना हैं

हाँ! ये क़लमकसाई ही तो इसका असली निशाना है 


अपना मज़ाक़ बनाने के लिए भी हुजूर हिम्मत चाहिए

अरे! चुप न रहिए मुस्कुरा के ओठों को तो फैलाइए


क्यूंकि उम्रे-दराज यूँ ही मिल गया है कुछ दिन हमें तो

कुछ क़लम घसीटी में काटे हैं कुछ क़लम तोड़ी में काटेंगे।



                   अक्सर कुछ भी "लिखो फोबिया" के चक्कर में क़लम घसीटी का आलम ही जुदा हो जाता है। तब तो तड़प-तड़प कर क़लम के दिल से ऐसी ही इल्तिजा वाली आह निकलती है। पर हम तो ठहरे आला दर्जे का क़लमकसाई। अब क्या फर्क पड़ता है कि क़लम हमें घसीटती है या हम क़लम को। इसी घसीटाघसीटी में जुमला-बाज़ी तो हो गई। अब हमपर जिन्हें खुलकर फ़िकऱा-बाज़ी करनी है तो वे शौक़ से कर सकते हैं। तब तक हम इस्तक़बाल के लिए लफ़्ज़ तलाशते हैं। ताकि कुछ और जुमला-बाज़ी हो।                    

                                  "सुम्मा आमीन"

Sunday, February 27, 2022

का पर करूँ लेखन कि पाठक मोरा आन्हर !...........

                       सबसे पहले ये लेखक अपने परम पूज्य पाठक परमेश्वरों को भारी हृदय से बारंबार प्रणाम करते हुए आभार प्रकट करता है। फिर वह उन के श्री चरणों में लोट-पोट कर अपने इस धृष्टता भरे लेख के लिए क्षमा याचना करता है। वह अपनी कलम की गवाही में कुबूल करता है कि ये क्षमा याचिका भी उस की मन मारी हुई मजबूरी है। साथ ही हाथ जोड़कर दरख़्वास्त करता है कि इसे किसी खास मकसद के लिए कृपया पैंतराबाजी हरगिज न समझा जाए। हाँ! अगर इस लेखक के हिमाकत भरी मूर्खता पर व्यंग्य-क्रोध मिश्रित हँसी आती है तो कृपया इसे लेखक की लाचारी की खिल्ली उड़ाते हुए न रोका जाए। क्योंकि वह खुद इसतरह से अपनी जगहँसाई करवा रहा है। वह इकरार करता है कि ये सब कहते हुए उसे जरूरत से ज्यादा शर्म आ रही है और डर भी लग रहा है। पर यदि वह न कहे तो, जो इक्का-दुक्का इच्छाधारी पाठक इसे गलती से पढ़ लेते हैं, वे भी कहीं इस अक्ल के आन्हर से खुलेआम नाराज होकर बिदक न जाएँ। आजकल भला डर की महिमा से कौन अंजान है? हर तरफ सिर्फ डर का ही तो राज है। वैसे ये लेखक डर का गुणगान कर विषयांतर नहीं होना चाहता है। बाकी तो पाठक खुद ही अपने चारों तरफ देख ही रहें हैं। तो मुद्दे की बात ये है कि जहाँ कोई पाठक किसी भी लेखक को अब पढ़ने के लिए राजी नहीं है तो शायद कहा जा सकता है कि पाठकों का "डर बिनु लेखन न होई"। 

                                            जाहिर है कि लेखन भी सिर्फ उन विलुप्त प्रजाति के अदृश्य पाठकों की पसंद-नापसंद का मोहताज हो गया है जो अब सच में आन्हर हो गये हैं। वे भला आन्हर क्यों न हों? आखिर कब तक उन भोले-भाले पाठकों की आँखों में इसतरह के कचरा-लेखन को झोंक-झोंक कर, अपने शौक और सनक से आन्हर हुए, तथाकथित लेखक गण ऐसे वैचारिक शोषण कर सकते हैं? आखिर कब तक सीधे-सादे पाठक, जानबूझकर उनपर थोपे हुए मानसिक विलासितापूर्ण लेखन की गुलामी करते रहेंगे? इसलिए अब वें अपने पढ़ने की तलब को ही अपना त्रिनेत्र खोल कर आग लगा रहें हैं। वें अपना विद्रोही बिगुल भी जोर-जोर से फूँक कर अपने आन्हर और बहिर होने का डंका भी पीट रहें हैं। तब तो वें लेखकों के लाख लुभावने वादे या गरियाने- गिरगिराने के बावजूद भी उन्हें पढ़ने नहीं आ रहें हैं। न चाहते हुए भी अब लेखक गण अपना लेखन-खाल उतार कर संन्यास लेने को मजबूर हैं। आखिर पापी प्रतिष्ठा का भी तो सवाल है। फिर अपने रुदन-सम्मेलन में सामूहिक रूप से विलाप भी कर रहें हैं कि- "का पर करूँ लेखन कि पाठक मोरा आन्हर।"

                       मजबूरन कुकुरमुत्ते-से उग आए लेखक ही एक-दूसरे को मन-ही-मन कोसते हुए त्वरणीय पाठक का स्वांग रच रहे हैं(अपने लेखन पर कुछ ज्यादा ही गुरूर करते हुए)। पर मजाल है कि बतौर पाठक वें किसी की आलोचना कर दें। वैसे भी आलोचना तो अब लेखन-पाठन के उसूलों के खिलाफ ही हो गया है। अब वे पूरे होशो-हवास में दोधारी तलवार पर चलते हुए, बस तारीफों के गाइडलाइंस का पालन भर कर रहें हैं। यदि कभी अपने गुमान के बहकावे में आकर, वें फिसल गये तो तय है कि सीधे लेखक-पाठक बिरादरी से बाहर ही गिरेंगे। फिर तो उन्हें उठाने वाला भी कोई नहीं मिलेगा। बस इसी डर से इस माफीनामा का ऐसा मस्का माननीय पाठकों को मारा जा रहा है। वर्ना कोई नामचीन लेखक होता तो अपना मूर्खई लेखन-लट्ठ सीधे-सीधे उनके सिर पर ही दे मारता। चाहे उनको ब्रेन स्ट्रोक क्यों न हो जाता। चाहे वें कोमा में ही क्यों न चले जाते। खैर..... 

                                      तो उसके इस बेबाकी को बस पूज्यनीय पाठक गण दिल पर न लें। उन्हें दिमाग पर भी लेने की कतई जरूरत है ही नहीं (वैसे नामचीनों को भी कौन पाठक दिलो-दिमाग पर लेता है, बस वे ही नामचीन होने का वहम दिलो-दिमाग पर लिए फिरते हैं )। ये कुबूलनामा इस दीन-हीन, खिसियानी बिल्ली की तरह, खार खाए हुए लेखक का वो दर्द है, जिसे लिए वह पाठकों का बात-लात खा-पीकर भी हासिए से बाहर होना नहीं चाहता है। वह अपने जुनून में लेखकों की पिछली कतार का पूँछ पकड़े हुए है। वह बड़ी मुश्किल से अपने नाम की घिसी-पिटी तख्ती को दिखाने के वास्ते ऐसा जद्दोजहद कर रहा है। इसलिए उसके इस कुबूलनामा को हाजिर-नाजिर मानते हुए उसे खैरात में ही सही फेंकी हुई माफी जरूर मिलनी चाहिए। साथ ही उसे अपनी बात थोड़ी-बहुत बेइमानी वाली ईमानदारी से कहने की, पूरी आजादी भी मिलनी चाहिए। बशर्ते उसकी ये नादान गुस्ताखी उसी के सिर का इनाम न हो जाए। 

                             फिर से ये लेखक अपने परम पूज्य पाठक परमेश्वरों को अपना फटेहाल हाल कह कर अब हल्के हृदय से बारंबार प्रणाम करते हुए आभार प्रकट करता है। हार्दिक आभार।

Sunday, January 30, 2022

सर्जक का श्राप ! .........

                   कभी-कभी इस सर्जक का क्रोध सातवें आसमान से भी बहुत-बहुत ऊपर चला जाता है। शायद बहुत-बहुत ऊपर ही कोई स्वर्ग या नर्क जैसी जगह है, बिल्कुल वहीं पर। हालाँकि उस जगह को यह सर्जक कभी यूँ ही तफरीह के लिए जाकर अपनी आँखों से नहीं देखा है। वह इसका कारण सोचता है तो उसके समझ में यही बात आती है कि वह दिन-रात अपने सृजन-साधना में इतना ज्यादा व्यस्त रहता है कि वहाँ जाने का समय ही नहीं निकाल पाया है। वर्ना वह भला रुकने वाला था। आये दिन वह बस यूँ ही मौज-मस्ती के लिए वहाँ जाता रहता और यहाँ आकर,  मजे से आपको आँखों देखा हाल लिख-लिख कर बताता। हाँ! उस जगह के बारे में उसने बहुत-कुछ पढ़ा-सुना जरूर है। जिसके आधार पर उसने खूब कल्पनाएँ की है, खूब कलम घसीटी है और खूब वाद-विवाद भी किया है। फिर अपनी बे-सिर-पैर वाली तर्को से सबसे जीता भी है। वैसे आप भी जान लें कि यह वही जगह है जहाँ हमारे देवताओं-अप्सराओं के साथ-साथ हमारी पूजनीय पृथ्वी-त्यक्ताएँ आत्माएँ भी रहती हैं। अब कौन-सी आत्मा कहाँ रहती है ये तो सर्जक को सही-सही पता नहीं है। इसलिए वह मान रहा है कि सारी विशिष्ट आत्माएँ स्वर्ग में ही रहती होंगी और सारी साधारण आत्माएँ  नर्क में होंगी। जैसी हमारी पृथ्वी की व्यवस्था है। अमीरों के लिए स्वर्ग और गरीबों के लिए नर्क।

                               अब सवाल यह उठता है कि आखिर इस सर्जक को हमारे ऋषियों-मुनियों से भी बहुत ज्यादा क्रोध क्यों आता है? वैसे आप ये भी जान लें कि हमारे वही पूर्वपुरुष, श्रद्धेय ऋषि-मुनि जो प्रथम सर्जक भी हैं और जिनकी हम संतान हैं। तो उनका थोड़ा-बहुत गुण-दोष हममें रहेगा ही। साथ ही उनके बारे में ये भी पढ़ने-सुनने में आता है कि वे यदा-कदा, छोटी-छोटी बातों पर भी अत्यधिक रुष्ट हो कर बड़ा-बडा श्राप दे दिया करते थे। वो भी बिना सोचे-समझे कि ये हो जाओ, वो हो जाओ, ऐसा हो जाएगा या वैसा हो जाएगा वगैरह-वगैरह। अब लो! क्षणिक क्रोध के आवेश में तो जन्म-जन्मान्तर का श्राप दे डाले और बाद में अपने किये पर बैठकर पछता रहे हैं। फिर तो श्रापित पात्र उनका पैर पकड़ कर, क्षमा याचना कर-कर के उन्हें मनाये जा रहा है, मनाये जा रहा है। तब थोड़ा-सा क्रोध कम करके, वे ही श्राप-शमन का उपाय भी बताए जा रहे हैं। हाँ तो! बिल्कुल वैसा ही क्रोध लिए यह सर्जक भी स्वर्ग पहुँच कर अपने क्षणिक नहीं वरन् दीर्घकालिक क्रोध-शमन हेतु कुछ विशिष्ट आत्माओं को कुछ ऐसा-वैसा श्राप दे ही देना चाहता है। जिससे उसकी भी अव्यक्त आत्मा को थोड़ी-बहुत शांति मिल सके।

                   अब अगला सवाल यह उठता है कि सर्जक आखिर श्राप क्यों देना चाहता है? तो इस सर्जक का जवाब यह है कि उन विशिष्ट आत्माओं में से जितनी भी अति विशिष्ट साहित्यिक आत्माएंँ हैं, पूर्व नियोजित षड्यंत्र कर के इस सर्जक से शत्रुतापूर्ण व्यवहार कर रहीं हैं। वो भी पिछले हजारों सालों से। या फिर ये कहा जाए कि जबसे लिपि अस्तित्व में आई है तबसे ही। वेद-पुराण, उपनिषद, रामायण, महाभारत जैसे सारे महाग्रन्थों की रचना हों या उसके बाद की समस्त महानतम रचनाएँ हों। सब-के-सब में, वो सारी-की-सारी सर्वश्रेष्ठ बातें लिखी जा चुकी हैं, जिसे यह सर्जक भी आप्त-वाणी की तरह कहना चाहता था। वैसे अब भी कहना चाहता है पर कैसे कहे? अपने कहने में या तो वह चोरी कर सकता है, या तो नकल कर सकता है या फिर लाखों-करोड़ों बार कही गई बातों को ही दुहरा-तिहरा सकता है। या फिर कुछ नयापन लाने के लिए अपनी बलबलाती बुद्धि और कुड़कुड़ाती कल्पना को खुली छूट दे कर, थोड़ा-सा उलट-पलट कर सकता है। लेकिन मूल बातों से खुलेआम छेड़छाड़ तो नहीं कर सकता है। आखिर उसकी भी तो एक बोलती हुई आत्मा है जो निकल कर पूछेगी कि सृजन के नाम पर तुम क्या कर रहे हो? अब आप ही बताइए कि यह क्रोध से उबलता सर्जक कैसे उन सबसे भी महान ग्रन्थ की रचना करे? अब वह ऐसा क्या लिखे कि युगों-युगों तक अमर हो जाए? आपको भी कुछ सूझ नहीं रहा होगा, ठीक वैसे ही जब इसे भी कुछ नहीं सूझता है तो असीमित क्रोधित होता है। फिर अपने क्रोध के कारण के मूल में जाकर बस श्राप ही देना चाहता है।

                           इसलिए यह सर्जक सीधे स्वर्ग जाकर उन अति विशिष्ट साहित्यिक आत्माओं को चुन-चुनकर, उनके मान-सम्मान के अनुरूप, श्राप देते हुए कहना चाहता है कि इस कलि-काल में उन सबों को पुनर्जन्म लेना होगा। कारण हममें से किसी ने उन पूर्वकालीन सृजन को देखा तो नहीं है इसलिए सबकी आँखों के सामने फिर से कोई महानतम ग्रन्थ को रचना होगा। साथ ही आज के स्थापित सर्जनात्मक धुरंधरों से साहित्यार्थ कर जीतना भी होगा। अर्थात उन्हें वो सबकुछ करना होगा जिससे उनकी महानतम अमरता की मान्यता फिर से प्रमाणित हो सके। यदि वें ऐसा नहीं करेंगे तो उनके अर्थों का अनर्थ सदा होता रहेगा और उन्हें इस सर्जक के श्राप से कभी मुक्ति नहीं मिलेगी। 

                                 शायद तब उन्हें पता चले कि इस अराजक काल में बकवादियों से जीतने के लिए या सर्वश्रेष्ठ सृजन के लिए कैसा-कैसा और कितना पापड़ बेलना पड़ता है। या फिर वें ये समझ जाएंगे कि पापड़ बेलना ही साहित्य से ज्यादा अर्थपूर्ण है। शायद उन्हें ये भी पता चले कि "भूखे सृजन न होई कृपाला"। तब शायद वें अति खिन्नता में, साहित्य से ही विरक्त हो कर कलम रूपी कंठी माला का त्याग कर, पेट के लिए कोई और व्यवसाय ढूँढ़ने लगेंगे। फिर तो यह सर्जक, इस चिर-प्रतीक्षित सुअवसर का झट से लाभ उठा कर, वेद-उपनिषद से भी उत्कृष्ट कृति का, यूँ चुटकी बजाकर सृजन कर देगा। क्या बात है ! क्या बात है ! उसे यह सोच कर ही इतनी प्रसन्नता हो रही है कि वह बावला हो कर, खट्-से अपनी कलम को ही तोड़ डाला है। फिर भी सोचे ही जा रहा है कि उसका बस एक श्राप फलित होते ही, वह कम-से-कम एक सर्वोत्कृष्ट सृजन कर, युगों-युगांतर तक उन अति विशिष्ट साहित्यिक आत्माओं से भी कुछ ज्यादा अमर हो जायेगा।

Sunday, September 19, 2021

कल्पना का खजाना .........

                              कल्पना करें यदि आपके सामने एक तरफ कुबेर का खजाना हो और दूसरी तरफ कल्पना का खजाना हो तो आप किसे चुनेंगे ? गोया व्यावहारिक तो यही है कि कुबेर का खजाना ही चुना जाए और बुद्धिमत्ता भी यही है ।  तिसपर महापुरुषों की मोह-माया-मिथ्या वाले जन्मघुट्टी से इतर बच्चा-बच्चा जानता है कि इस अर्थयुग में परमात्मा को पाने से ज्यादा कठिन है अर्थ को पाना । क्योंकि अर्थ के बिना जीवन ही अनर्थ है । इसलिए जो कुबेर के खजाने को चुनते हैं उनको विशुद्ध रूप से आदमी होने की मानद उपाधि दी जा सकती है । यदि कोई दोनों ही हथियाने के फिराक में हैं तो उन्हें बिना किसी विवाद के ही महानतम आदमी माना जाएगा । और जो ..... खैर !

                        पर कोई तो इस लेखक-सा भी महामूर्ख होना चाहिए जो रबर मैन की तरह दोनों बाँहों को बड़ा करके लपलपाते जिह्वा से लार की नदियाँ बहाते हुए कल्पना के खजाना को पूरे होशो-हवास में चुने । कारण लिखनेवाला एक तो तोड़-मरोड़ वाला लेखक है ऊपर से जोड़-घटाव वाला कवि भी है । तो कल्पना के खजाने का रूहानियत उससे ज्यादा भला कोई और कैसे जान सकता है । कल्पना करते हुए वह खुद को कुबेर से भी ज्यादा मालामाल समझता है । यकीन न हो तो उसके कल्पना से कुछ भी माँग कर देखें । यदि महादानी कर्ण भी रणछोड़ न हुआ तो नया महाभारत लिख दिया जाएगा इसी लेखक के काल्पनिक करों से ।

                               तो कल्पना करते हुए लेखक वो सब कुछ बन जाता है जो वो कभी हक़ीक़त में बन नहीं सकता है । अक्सर वह स्पाइडर-मैन की तरह महीन और खूबसूरत जाला बुनता है जिसमें खुद तो फँसता ही है , औरों को भी झाँसा देकर ही खूब फँसाता है । फिर शक्तिमान की तरह अपने काल्पनिक किल्विष को हमेशा हराता रहता है । अपनी कल्पनाओं की दुनिया में ही वह एक बहुत ही सुन्दर दुनिया बसाता है । जिसमें वास्तविक रूप से सुख, समृद्धि और शांति ले आता है । जो उसे कुछ पल के लिए ही सही पर बहुत सुकून देता है । जो इस दुनिया में अब कहीं ढ़ूँढ़ने से भी उसे नहीं मिलता है । शायद उसके लिए सारी सतयुगी बातें अब काल्पनिक हो गई हैं या फिर सच में विलुप्त होने के कगार पर ही है । 

                           तो अब सवाल ये है कि कल्पना के बिना इस बर्दाश्त से बाहर वाली दुनिया में दिल लगाए भी तो कैसे लगाए । जहाँ कुछ भी दिल के लायक होता नहीं और जो होता है उसके लायक लेखक होता नहीं है । तो ऐसे में सच्चाई को स्वीकार करते-करते हिम्मत बाबू अब उटपटांग-सा जवाब देने लगें हैं । तो फिर जन्नत-सी आजादी की बड़ी शिद्दत से दरकार होती है जो सिर्फ कल्पनाओं में ही मिल सकती है । एक ऐसी आजादी जिसे किसी से न माँगनी पड़ती है और न ही छीननी पड़ती है । तब तो वह कल्पना के खजाने को खुशी से चुनता है और उसकी महिमा का बखान भी एकदम काल्पनिक अंदाज में करता है । 

                           फिर से कल्पना करें कि यदि सब हीरे-जवाहरातों में ही उलझ जाएंगे तो सबके ओंठों पर काल्पनिक ही सही पर मुस्कान कौन खिलाएगा ? आखिर मुस्कान खिलाने वाले प्रजातियों को भी थोड़ी तवज्जो ज़रूर मिलनी चाहिए । ताकि मुंगेरी लालों के काल्पनिक दुनिया में एक से एक हसीन सपने अवास्तविक और अतार्किक रूप से और भी ऊँची-ऊँची कुलाँचे भर सके । जिन्हें नहीं पता है तो वे अच्छी तरह से पता कर लें कि इस छोटी-सी जिंदगी में महामूर्खई करके हँसी-दिल्लगी भी न किया तो फिर क्या किया । इसलिए हमारे जैसे महामूर्खों की कल्पनाओं की दुनिया तो कुछ ज्यादा ही आबाद होनी चाहिए ।

                                      वैसे भी इस सिरफिरे को बेहतर इल्म है कि कभी इसे सूरज पर बैठ कर चाय की चुस्कियाँ लेने की जबरदस्त तलब लगी तो बेचारा कुबेर का खजाना कुछ भी नहीं कर पाएगा । पर कल्पना का खजाना ही वो चिराग वाला जिन्न है जो इस तुर्रेबाज तलब को पूरा करके पूरी तरह से तबीयत खुश कर सकता है । ऐसे ही बेपनाह आरजुओं की लंबी-चौड़ी फेहरिस्त है जो सिर्फ कल्पनाओं में ही पूरी हो सकती है । तो कोई भी अपने सुतर्कों से लेखक के चुनाव को कमतर साबित करके तो दिखाएं । या फिर अपनी ही कल्पनाओं को हाजी-नाजी बना कर देख लें ।

                                                यदि इस कल्पनानशीन ने और भी मुँह खोला तो ख़ुदा कसम पृथ्वी बासी जैसे कल्पना के बाहरी दुनिया के जालिम लोग सरेआम उसे पागल-दीवाना जैसे बेशकीमती विशेषणों से नवाजेंगे । फिर तो इज्ज़त-आबरू जैसी भी कोई चीज है कि नहीं जिसे थोड़ा-बहुत बचा लेना लेखक का फ़र्ज़ तो बनता है । इसलिए खामखां अपनी कल्पनाओं की खिंचाई न करवा कर बस इतना ही कहना है कि जो कोई भी कुबेर के क़ातिल क़फ़स में फँसना चाहे शौक से फँसें । उन्हें ख़ालिस आदमी होने के लिए मुबारकबाद देने में भी ये महामूर्ख सबसे आगे रहेगा ।               

                       *** एक हास्यास्पद चेतावनी ***

 *** यदि किसी महामानव को इस महामूर्ख पर हल्की मुस्कान भी आ रही हो तो वह अट्टहास कर सकता है किन्तु आभार व्यक्त करते हुए ***

Sunday, August 8, 2021

कृपया गरिमा बनाए रखें! ........

ठक! ठक! ठक!

कृपया गरिमा बनाए रखें!

कृपया मर्यादा बनाए रखें!

अन्यथा सख्त कार्यवाही होगी

हमारे हर एक, झुठफलाँग-उटपटाँग सा

भ्रांतिकारी-क्रांतिकारी, क्रियाकलापों का

हमारे ही, कलह-क्लेशी कुनबे के, कटघरे में 

तुरत-फुरत वाली, आँखों देखी, गवाही होगी!

ठक! ठक! ठक!

कृपया गरिमा बनाए रखें!

कृपया मर्यादा बनाए रखें!

अन्यथा सख्त कार्यवाही होगी!


इसलिए हमें मिल-बैठकर, पद की प्रतिष्ठा बचाकर

अपने परिजनों के, बेहतर आज के लिए, कल के लिए

नागरिक, भूगोल और इतिहास फाड़ू फैसला लेना है

और सबको चौंकाऊ-सा, चकाचौंध भरा हौसला देना है

ताकि हम संसार के, माथे पर, उचक कर बैठ सके

फिर चकाचक-झकाझक, फर्राटेदार विकास गति पर 

अपनी पीठ थपथपाते हुए, आव-ताव देकर, खूब ऐंठ सके! 


इसलिए कृपया कोई भी, जिंदा या मरे मुर्दों को, न उखाड़ें

और बेकार के बहाने से, बहिष्कार की रणनीति पर

न ही अपनी, चिंदी-चिंदी मानसिकता को 

हल्के-फुल्के या गंभीर, मुद्दों पर भी, इस तरह से उघाड़ें!

अन्यथा सख्त कार्यवाही होगी

कृपया मर्यादा बनाए रखें!

कृपया गरिमा बनाए रखें!


रूकें! रूकें! रूकें!

बहुत ही, हीं-हीं, ठीं-ठीं, हो रहा है

बहुत ही, खों-खों, खीं-खीं, हो रहा है

ओह!  ये किसने? किसको? किस अदा से आँख मारा?

और इतने सारे, कागजों को, किसने है फाड़ा?

ये मेजें-कुर्सियां, ऐसे क्यों उठ रही हैं?

उफ्फ! मेरी आवाज भी, इसमें घुट रही है

कृपया सब, अपनी जगहों पर, संतों की भांति, बैठ जाएँ

कानफाड़ू शोर-शराबा न करें, कोशिश करके ही सही, पर शांति लाएँ!


फिर अपनी, बादाम-अखरोट खायी हुई

याददाश्त को, फिर से, याद दिलाए कि

हम कुनबा चलाने वाले हैं, या उसको डूबाने वाले हैं

इस तरह से, आलतु-फालतू मुद्दों पर, जब आप सब

एक साथ ही, उलट कर, सड़क पर, ऐसे उतर जाएंगे 

तो बताइए, सड़क पर रहने वाले, भला कहाँ जाएंगे?

तब, उनके लिए ही वर्षों से, अटकी-लटकी हुई सैकड़ों-हजारों

झोलझाली योजनाओं को, हम लोग, कैसे लागू करायेंगे?


यदि ईमानदारी से, आप सबों को, याद आ जाए 

कि आखिर परिजनों ने, हमें किसलिए चुना है?

तो आइए, विकास की चाल को, सब मिलकर

जोर से, धक्का लगा-लगा कर, आगे बढ़ायें

बिना बात के ही, विरोध में, इस तरह से, काम रोक कर

कृपया परिजनों के, समय और संसाधनों को

इतनी निर्लज्जता से, राजनीति के गटर में, न डूबायें!

अन्यथा सख्त कार्यवाही होगी

कृपया मर्यादा बनाए रखें!

कृपया गरिमा बनाए रखें!


अरे! अरे! अरे!

अचानक से, ये क्या हो रहा है?

क्यों सबका, खोया हुआ आपा भी, खो रहा है?

इस तरह से, जुबानी जंग में, जुमलों का चप्पल-जूता

बिना सोचे-समझे, एक-दूसरे पर, यूँ ना उछालें

और अपने पैने-नुकीले, सवालो-जवाबों से

न ही ऐसे छिलें, एक-दूसरे की, नरम-मुलायम छालें!


हो सके तो, अपने-अपने हाथों-पैरों को 

हाथ जोड़ कर, या प्यार-मोहब्बत से, जरा समझाएँ

कि बात-बेबात ही, भड़क कर कहीं, इधर-उधर न भिड़ जाए

फिर आपस में, इसतरह से, गुत्थम-गुत्थी कर के 

आप सब मिलकर, इसे ओलंपिक जैसा विश्व स्तरीय 

कुश्ती प्रतियोगिता का, चलता हुआ, अखाड़ा न बनाएँ

कृपया संयम बरतें, और मेरे आसन के सामने, ऐसे उछाल मारकर

यूँ दहाड़ते हुए, तख़्त विरोधी तख़्तियां,  दिन-दिहाड़े न दिखाएँ!


आपसे हार्दिक अनुरोध है कि, अपने आसनों पर ही 

बाकी सब लोग, विराजमानी जमाते हुए, मेजों को भी

अपने कोमल हथेलियों का, कुछ ज्यादा ख्याल रखते हुए

ढ़ोलक जान, जोर-शोर से, इतना ज्यादा न थपथपायें

न ही थोथेबाजी में, फिजुल का, नारेबाजी करते हुए

चलते सत्र को, बीच में ही छोड़कर, सब बाहर निकल जाएँ!

अन्यथा सख्त कार्यवाही होगी

कृपया मर्यादा बनाए रखें!

कृपया गरिमा बनाए रखें!


सुनें! सुनें! सुनें!

हमारे कुनबे से, बाहर के लोग सुनें! 

आपके लिए है, करजोरी-बलजोरी, क्षमा याचना के साथ

एक अत्यन्त आवश्यक, सूचना एवं वैधानिक चेतावनी

कि हम अपने कुनबे में, एक ही चट्टे-बट्टे के, सब लोग 

चाहे कितना भी, और कैसा भी, करते रहें मनमानी

पर कृपया दूर-दूर तक, कोई भी चरित्र अथवा पात्र

आगे बढ़कर इसे, बिल्कुल अन्यथा न लें 

और इस कुपितरोगी-भुक्तभोगी, दृश्यकाव्य के

किसी भी, हिस्से से चुराकर, कोई भी कथा न लें!


कारण, इसका प्रत्यक्ष और प्रामाणिक संबंध 

केवल और केवल, हमारे निहायत निजी, कुनबे से है 

क्योंकि संसार के, बड़े-बड़े अलोकतांत्रिक देश, की तरह ही 

हम अपने, छोटे-से कुनबे में भी, नियम-कानून बनाने के लिए

कुछ ऐसे ही, चिल्ल-पों कर-करके, शासन चलाते हैं 

और काम-काज के बीच में ही, हुड़दंग मचा-मचाकर

ऐसे ही, कुढ़गा कुक्कुटासन, लगाते हैं!


इसलिए इसका, मुँह और दिल खोलकर

केवल और केवल, कृपया आनन्द उठाएँ 

और गलती से भी, किसी दूसरे से, हमें जोड़कर

अथवा अन्यथा लेकर, हमारी जगहँसाई, न करवाएँ!

अन्यथा सख्त कार्यवाही होगी 

कृपया मर्यादा बनाए रखें!

कृपया गरिमा बनाए रखें!

Sunday, August 1, 2021

एक कालजयी कविता के लिए .....

एक कालजयी कविता के लिए
असली काव्य-तत्त्व की खोज में
जब-जब जहाँ-तहाँ भटकना हुआ
तब-तब अपने ही शातिर शब्दों के 
मकड़जाल में बुरी तरह से अटकना हुआ

न जाने कैसी-कैसी और कितनी बातों को
गुपचुप राज़ सा या खुलेआम ख्यालातों को
जाने-अनजाने से या किसी-न-किसी बहाने से
चोरी-छुपे पढ़ती, सुनती और गुनती रही
शायद हीरा-जवाहरात मानकर ही सही
पूरे होशो-हवास और दम-खम से
अपने कलमकीली कबाड़ झोली में 
बस कंकड़-पत्थर ही बीनती रही

अब तक के उन तमाम नामी-गिरामी
कलमतोड़ों और कलमकसाइयों के
पदछापों पर मजे से टहलते हुए
अपने ख्याली पुलावों को 
बड़े चाव से कलमबंद करते हुए
उसी कबाड़ झोली का सारा जमा-पूंजी को
आज का अँधाधुँध सत्य जानकर
मन ही मन में खुद को कलम का उस्ताद मानकर
शब्दों में आयातित गोंद और लस्सा लगाकर
उसे उसके संदर्भ से जोड़ना चाहा

पर मेरी उधाड़ी जुगाड़ी कोशिशों को भाँपकर 
बरबादी की ऐसी सत्यानाशी सनक से काँपकर
अपनी ही रूह की होती मौत देख बेचारी कविता 
सिर धुनती हुई बन गई रूई का फाहा

तिस पर भी उसको मनाने के वास्ते मैंने
बाजार जाकर खरीद-फरोख्त की गई
वर्जनाओं को, उत्तेजनाओं को, अतिरंजनाओं को
इधर-उधर से माँगी-चाँगी हुई, छिनी-झपटी हुई
अन्तर्वेदनाओं को, संवेदनाओं को, परिवेदनाओं को
शोहरती तमन्नाओं की आग में ख़ूब तपाया
पर निर्दयी कविता तो जरा-सी भी न पिघली 
लेकिन शब्दों और अर्थों का डरावना-सा
लुंज-पुंज अस्थि-पंजर जरूर हाथ आया

फिर उसको रिझाने-लुभाने के वास्ते मैंने
अपनी सारी बे-सिर-पैर की तुकबंदियों को भी 
ग़ज़लों-छंदों का सुन्दर-सा आधुनिक परिधान पहनाया
और उसे उसके अर्थो से भी एकदम आजाद करके
कसम से आज़माईश का सारा गुमान चलाया

अब जी मैं आता है कि 
किसी भी काव्य-तत्त्व की खोज में
प्रेतों-जिन्नों की तरह भटकना छोड़ कर 
प्राणों से फूटती कविता के इंतजार में
चुपचाप सबकी नजरों से कहीं दूर जाकर
खुद से भी छुपकर धूनी रमाए बैठ जाऊँ

पर नालायक कवि मन कहता है कि
गलती से ही सही पर जब तेरे माथे पर
लिखा जा चुका है कि तू कवि है तो
जो जी में आए बस तू लिखता रह, लिखता रह
ज्यादा न सही पर कुछ तो शोहरत-नाम मिलेगा
झटपट लिखो-छापो के इस जादुई जमाने में
फटाफट ढ़ेर सारा ज़हीर कद्रदान मिलेगा
अगर मेहरबानों की नजरें इनायत हुई तो
झोली भर-भर कर भेंट और इनाम मिलेगा

तो कवि मन के झांसे में आकर मैंने भी सोचा कि
कोई मुझे एक-एक शब्द पर पढ़-पढ़ कर सराहे 
या शेखचिल्ली समझ कर खूब खिल्ली उड़ाए
या मुझे मुँह भर-भरकर गाली-आशीर्वाद दे
या फकत कलमघिस्सी जान ज़ायका-आस्वाद ले

पर लिखने वाला हर बेतरतीब-सी बिखरी चीजों को
बुहारी मारते हुए समेट कर लिखता है
जिसमें किसी को सुन्दर कविता तो
किसी को बस रद्दी का टुकड़ा ही दिखता है
इसलिए मैं भी क्यों कहीं दूर जाकर
प्राणों की कविता के इंतजार में बैठ जाऊँ
कवि हूँ तब तो ईमानदारी से या बेइमानी से 
अगड़म बगड़म कुछ भी लिख-लिख कर क्यों नहीं
रद्दियों का ही सही बड़ा-सा अंबार लगाऊँ .

Thursday, January 7, 2021

"ब्लॉगिंग-सा दिल पर" ........

"पहले जी" गये "दूसरे जी" के घर 

"दूसरे जी" गये थे "तीसरे जी" के घर 

धत् ! पता चला कि 

"तीसरे जी" भी गये हुए हैं "चौथे जी" के घर

फिर "पहले जी" जब गये "चौथे जी" के घर पर

तो वो "महाशय जी" भी थे सिरे से नदारद.…...


तो क्या करते बेचारे "पहले जी"

अपना मुँह लटकाए वापस चले आए अपने घर 

और बाट जोहने लगे अपने खिड़की-किवाड़ों को पकड़

कि भूले भटके ही सही "कोई तो" आए उनके घर 

थोड़ा-सा ही सही मगर दौड़े तो "आह-वाह" की लहर

और किसी भी "जी" के ना आने पर 

"पहले जी" मायूस होते रहे जी भर-भर कर

कुछ ऐसा ही है अपने ब्लॉगिंग का सफर .....


अगर "सबके-सब" बिन बुलाए ही तांता लगा कर

शौक से जब आने लगें आपके घर 

तो आप भी बड़े आराम से खुद को समझिए

अपने आपको एकदम से बड़का "कलक्टर"

और खूब करते रहिए बकर-बकर

सब लगाते रहेंगे आपको तरह-तरह से बटर

ताकि आप लुढ़कते रहें फिसल-फिसल कर

फिर सब मजा लेते रहेंगे ताली पीट-पीट कर

कुछ ऐसा ही है अपने ब्लॉगिंग का सफर........


अजी! हम भी अपनी बात कह देते हैं 

जरूरत से कुछ ज्यादा ही खुलकर 

लेकिन साथ में दोनों हाथों को जोड़ कर

प्यार से वैधानिक चेतावनी भी देकर 

कि इस हल्के-फुल्के मजाक को

कृपया कोई न लें अपने "ब्लॉगिंग-सा दिल पर"

कभी-कभी हँसना और हँसाना भी चाहिेए

अपने-आप को सबसे बड़ा "कलक्टर" बनाना भी चाहिए.…...


तो आइए ! सब हँसे खूब लोट-पोट कर

और जो-जो न हँसे उन्हें भी हँसाएं टोक-टोक कर

उनका नाक-कान , पैर-हाथ पकड़-पकड़ कर

अगर फिर भी वो न हँसे तो भी हँसाएं

उनके पेट को जोरदार गुदगुदी से जकड़-जकड़ कर

क्योंकि कुछ ऐसा ही है अपने ब्लॉगिंग का सफर . 

Monday, September 12, 2016

अपना ही पोस्टमार्टम कराना है ...........

क्या पता कि मैं आदमी ही झक्की हूँ
या अपने इरादे की पूरी पक्की हूँ
सुखरोग टाइप बीमार हूँ
फ्री में मिलती सहानुभूति की शिकार हूँ
सबके सामने बस अपना दुखड़ा रोती हूँ
नई बीमारियों को अपने लम्बे लिस्ट में पिरोती हूँ ....

मुझपर रिसर्च करते कई - कई डॉक्टरों की टीम है
और हाथ साफ करते बड़े - बड़े नीम - हकीम हैं
मेरा घर ही जैसे कोई बड़ा अस्पताल है
पर सुधार से एकदम अनजान मेरा हाल है .....

नींद आती है तो मजे से सो जाती हूँ
आँख खुलती है तो जग जाती हूँ
पैर बढ़ाती हूँ तो चलने लगती हूँ
रुकती हूँ तो रुक जाती हूँ ........

मुँह खोलती हूँ तो बोलने लगती हूँ
बंद करती हूँ तो चुप हो जाती हूँ
भूख लगती है तो भरपेट खा लेती हूँ
प्यास लगती है तो भर मन कुछ पी लेती हूँ
हद है , हँसती हूँ तो हँसने लगती हूँ
जो रोती हूँ तो रोने लगती हूँ .......


और तो और , सही करती हूँ तो सही होती हूँ
जो गलत करती हूँ तो गलत होती हूँ
आखिर कैसी ये मेरी बीमारी है ?
जिसे समझने में , सब समझ भी हारी है ......

वैसे उटपटांग हरकतों से मैं कोसों दूर हूँ
शायद आदमी ही होने के लिए मजबूर हूँ
जब लोगों को देखती हूँ , वे मुझे भरमाते हैं
जो मेंटल हेल्थ प्रूफ दिखा , क्या से क्या हो जाते हैं ......

डॉक्टर बार - बार मेरा सारा टेस्ट करा रहे हैं
पर हाय ! मेरी बीमारी को ही लापता बता रहे हैं
ई.सी.जी. , एम.आर.आई. , अल्ट्रासाउंड , सी.टी. स्कैन
सब मेरा बॉयकाट कर , मुझपर लगा दिए हैं बैन
मेडिकल साइंस इसे एक क्रिटिकल केस बता रहा है
और मुझपर लगातार बीमारी का दौरा आ रहा है .....

क्या पता कि मैं आदमी ही झक्की हूँ
पर अपने इरादे की पूरी पक्की हूँ
अब अपना इलाज मुझे खुद ही करना है
या तो ठीक होकर जीना है या फिर मरना है
इसलिए किसी भी कीमत पर बीमारी का पता लगाना है
हाँ , अपनी आँखों के आगे अपना ही पोस्टमार्टम कराना है .

Thursday, March 3, 2016

चुम्मा पर चुम्मा .......

राजा जी !
आपके रोज-रोज के
ये आम सभा वो खास सभा
ये पक्षी भाषण तो वो विपक्षी भाषण
कभी ये उद्घाटन तो कभी वो समापन ....
फिर कभी ये मीटिंग तो कभी वो सेमीनार
नहीं तो ये पार्टी-फंक्शन नहीं तो वो तीज -त्यौहार
कुछ नहीं तो ये बीयर बार नहीं तो वो डांस बार
ऊपर से आये दिन जनता दरबार
तिस पर बहस , बयान , ब्रेकिंग न्यूज और समाचार .....
दिखाने के लिए ये गाँव और वो देहात
देखने के लिए ओवर ब्रिज और वो दस लेन वाला पाथ
फिर बात -बेबात पर भर लेते हैं फॉरेन उड़ान
जैसे ठप पड़ा हो वहां का भी सब काम...........

राजा जी !
दिन-रात यही सब देखकर मैं पक गयी हूँ
आपकी महिमा सुन ऊबकर , चिढ़कर मैं थक गयी हूँ
बहुत हुआ , अब यही कहूँगी -
राजा जी ! मत मरो राज में
अब मुझको दो न चुम्मा
मैं तो बस तुमसे चुम्मा मांगू
मत पकड़ाओ अपना नौटंकी वाला झुनझुन्ना ........
पता है ये जो गहना , जेवर , गाड़ी , बँगला हैं न
उसे तुम हमारे लिए ही करते रहते हो
हर साल दुगुना , तिगुना , चौगुन्ना
पर उससे मैं नहीं खुश हूंगी , होगा बस आपका मुन्ना
मैं तो मांगू तुमसे , अब तो बस चुम्मा
राजा जी ! मत मरो राज में
मुझको दो न चुम्मा

ओ मेरी हठीली रानी जी !
हो भी जाओ थोड़ी सयानी जी
कभी राजा जी नहीं मरते हैं राज में
बस जनता मरती है उनके राज में
और हमें तो व्यस्त रहना पड़ता है
बस दिखावे के लिए काम काज में
फिर तो हमारी रोजी या मर्जी जब चाहे हम
उनको ही पकड़ा देते हैं कोई भी झुनझुन्ना ............
बस दो-चार उटपटांग बोलने भर की देरी है
उसी को वे खींचातानी करते-करते
बढ़ा देते हैं कई-कई गुन्ना
फिर अपने में ही मरते-कटते हैं
और तेरे राजा जी को ही रटते हैं
जैसे वे हों कोई दूधपीते मुन्ना ........... 

कुछ तो समझो , मेरी भड़कीली रानी जी !
हम तो बस अपने फॉरेन वाले फादर के
रूल -ऑडर को थोड़ा आगे बढ़ाते हैं
उनमें ही फूट डालकर बस अपने फुट पर नचाते हैं
वे ही तो हैं हमारे एकदम से असली झुनझुन्ना ........

अब तुम ही बताओ , मेरी भोली रानी जी !
भला राजा क्यों मरे राज में
भले राज मरे हमारे ही राज में
वो भगवान भी तो नहीं जान सके हैं कि
हम होते हैं कितने भीतरगुन्ना

अत: हे नखरीली रानी जी !
मेरे लिए तुम लगी रहो या तो दिन -रात पूजा -पाठ में
या मर्जी तेरी ऐश -मौज करो अपने ठाठ में
चुन कर कोई भी पसंद का अपना झुनझुन्ना
और हम हर बार यूँ ही राजा बनकर
करते रहे धुम-धुम-धुम्मा-धुम्मा .............

फिर तुम अगर ख़ुशी-राजी हो तो
एक तुमको ही क्या
इसको , उसको , उसको , सबको
बस दिन -रात हम देते रहे
चुम्मा पर चुम्मा .

Monday, February 22, 2016

नहीं अट पायेगी मेरी कविता.......

कोई बम फोड़े या गोली छोड़े
या आग लगाये
अपनी ही बस्ती में
मैं तो डूबी रहती हूँ
बस अपनी मस्ती में ....
लिखती रहती हूँ प्रेम की कविता
कभी आधा बित्ता कभी एक बित्ता
कभी कोरे पन्नों को
कह देती हूँ कि भर लो
जो तुम्हारे मन में आए -
भावुकता , आत्मीयता , सरलता , सुन्दरता
या भर लो विलासिता भरी व्याकुलता
या फिर कोई भी मधुरता भरी मूर्खता .....
कैसे कह दूँ कि नहीं पता -
कि नप जाएगी मेरी कविता
किसी भी शाल या शंसनीय पत्रों के फीता से
या फिर मुझे ये कहना चाहिए
कि पता है मुझे -
बहुत ही छोटा है सारा फीता
जिनमें कभी भी नहीं अट पायेगी
मेरी कविता .

Monday, September 14, 2015

''हिन्दी-हिन्दी'' दियो पुकार ........

नाऊ माडर्न हिन्दी उपजै इन मीडिया
लाइक मल्टीब्रांड हर साइट बिकाय |
चायनीज-जापानीज़-जर्मन जेहि रुचै
ये हिन्दी-रूप देख मुख फिंगर दबाय ||
 
'मदर-टंग' में न कभी कोई कीजिये
सो-कॉल्ड मंकी-फंकी स्टाइलिश बात |
एप्प-नप्प , कूल-फूल कल्चर के आगे
कितनी है अपनी हिन्दी की औकात ?

जहाँ हिन्दी पढ़ि-पढ़ि सब गँवार हुआ
और रोजी-रोजगार भी मिले न कोई |
वहाँ बाई स्टिक-स्टिच जो अंग्रेजन बने
अप-टू-डेट स्टेटस का फूल गारंटी होई ||

अब तन-मन-दर्पण में अंग्रेजी को ही
आनेस्टली, बस सब कोई लिओ उताड़ |
जब हिन्दी-दिवस निज मुख उठाये तो
मुख से ही ''हिन्दी-हिन्दी'' दियो पुकार ||

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राष्ट्रभाषा से
स्वाभाविकता , शब्द-सहानुभूति और सौंदर्य-शक्ति जब खोती है |
संभवतः भाषा-पीड़ा की भावोन्मत्त भंगिमा ऐसी ही होती है ||
संभवतः सोया हुआ हिन्दी-प्रेम आज पुनः जाग रहा है |
हाँ! जीतेगी हमारी हिन्दी और 'वो' कोई तो हार रहा है  ||

                     !!!शुभकामनाएं !!!

Friday, April 18, 2014

खरी दोटूक .....

                जिनको दिन में भी नहीं सूझता
                  ऐसे- ऐसे भी महान उलूक हैं
                  मुक्तकंठ से जो करते रहते
                   हरदम बात खरी दोटूक हैं

                  इतराकर तो वे ऐसे चलते
               जैसे मानसरोवर के हों राजहंस
                   उनके रुकने से ही मानो
                रुक जाता हो ज्ञान का वंश

               मुक्तावलियों सी ही उनकी बातें
               कौवों-बगुलों को मुक्त कराती है
                चीलों-गिद्धों को भी दीक्षित कर
                 राजहंस की उपाधि दिलाती है

                  उनके राह-प्रदर्शन में कभी
              कोई रास्ता भटक नहीं पाता है
                 नालों- डबरों से भी बह कर
               उनके सागर में मिल जाता है

                उनके ही जयजयकार में सब
               राजी-ख़ुशी शामिल हो जाते हैं
               झाड़-फूंक, दवा-दारु या ताबीज
                जो भी मिल जाए उसे पाते हैं .

Saturday, January 25, 2014

मज़बूरी की सौगंध ....

हे सुलोचन ! एवं हे सुलोचना !
ये अच्छी बात नहीं कि
आप सब मिलकर ही करने लगे
अब मेरी आलोचना पर आलोचना.....

माना कि मेरे साथ-साथ
कईयों के किस्मत से छींका तोड़कर
कितने ही गंगुएं अवाख़िर राजा भोज हुए हैं
पर हमारे सर मौरी चढ़े भी तो
फकत ही चाँद रोज हुए हैं....

इतनी जल्दी चाँदनी के गाढ़े स्वाद को
हम नवेले जीह्वा पर कैसे चढ़ा ले ?
इससे पहले सूत काटने के बहाने ही सही
आप सबों को अपना चरखा तो पढ़ा दे....

आप सब हमारे गवाह हैं कि
ये चाँद किसतरह से हमारे हाथ आया है
फिर से कहूँ तो अपनी बहती गंगा में
कुछ भी धुल और घुल सकता है
उसी हिट फार्मूला को हमने भी आजमाया है....

अब कई छोटे-बड़े सुर को भी मिलाने पर भी
हमारा एक सुर नहीं है पर तराना वही है
और फाइव जी वाला स्पीड तो है मगर
स्पेक्ट्रम का फ़साना भी वही है
लेकिन अब हम जो कहते या करते हैं
कम-से-कम आप तो कहिये कि सही है....

मत भूलिए कि आप ने ही बड़े लाड़ से
हमें अपना लाट-साहब बनाया है
सच्चे हैं सो फिर से कह देते हैं कि
उस झाड़ पर चढ़ने के लायक न थे
मगर आपने ही उकसा कर हमें चढ़ाया है....

अब प्लीज!
मत खोलिए अपने दिमाग का कोई भी फाटक
पॉपकॉर्न कुरकुराते हुए ड्रिंक्स गुड़गड़ाते हुए
बस देखते रहिये अपने दिल्ली का नाटक पर नाटक
यदि आगे भी आप सब मेहरबान होंगे तो
पूरी दुनिया मेरी ही मजलिस को सजाएगी
और मेरे साथ धरना-प्रदर्शन कर-करके
मजनूयित का वही तराना भी गायेगी.....

सच तो यही है कि हमारा ये फ़िल्म भी
अपन वो आदम युग के राजनीति का ही
फोर-डी , फाइव-डी वाला ही संस्करण है
पर मंगल से आगे बढ़कर हमारा विकास
आपके ही सामने का प्रत्यक्ष उदाहरण है.....

अब कैसे कहें हम कि सच में
गद्दी की राजनीति ही बहुत गन्दी है
और मुझपर गाहे-बगाहे भोंपू लेकर
अपना भड़ास निकालने पर सख्त पाबंदी है....

पर हमने बासी कुर्कुटों को साफ़ करने का
गुलकंद-इलायची वाला बड़ा बीड़ा उठाया है
और आपके कुर्ते पर पारदर्शी बनकर
सफ़ेद-सफ़ेद सा ही छींटा पराया है....

आगे भी सच्चे दिल से हम हमेशा
आपकी मज़बूरी की सौगंध लेते रहेंगे
बस आप प्लीज!
हमपर अपना डियो-परफ्यूम छिड़कते रहिये
तो अपने मिश्रित धातुओं से भी जबर्दस्ती करके
आपको वो खालिस सोना वाला ही
मिलावटी न ..न.. सुंधावटी सुगंध देते रहेंगे .

Wednesday, January 15, 2014

ओ! मेरी मैडम अभिव्यक्ति जी ....

हर साल की तरह ही
कड़ाके की ठण्ड है
कोहरे का कहर है
ठण्डी हवाओं के आगे
गरम से गरम कपड़ा भी
खुद में सिमट कर बेअसर है.....
वो अपना सूरज भी
चल देता है कहीं
अपनी महबूबा के साथ
उन बदमाश बादलों के पीछे
समेट कर किरणों का हाथ.....
ये ओस है या
कुमकुमा बर्फ का टुकड़ा है
चरणपादुका जी तो अभी
दिखे नहीं है पर
ऐसा तमतमाया हुआ
हाय! ठण्ड जी का मुखड़ा है....

तब तो मुआ तापमान भी
लुढक-लुढ़क कर सबको
विनम्रता का पाठ पढ़ा रहा है
और कमजोर ह्रदय के
ठमकते रफ्तार पर
इमरजेंसी ब्रेक लगा रहा है......
जो उसके छिया-छी के हर दांव पर
दहला मारना जानते हैं
उन्हें थोड़ा घुड़की देकर
घरों में ही दुबका रहा है
पर खुले आसमान की गोद में
रहने वालों में से कइयों को
बिन बताये ही
परलोक भी पहुंचा रहा है
और वो जो अपना
सरकारी अलाव है न उसपर तो
मौसम विभाग बड़े मिलीभगत से
लिट्टी-चोखा पका रहा है......

मेरी मैडम अभिव्यक्ति जी
कोट-जैकेट , मोजा-मफलर
सर से पाँव तक लपेट कर
रजाई और कम्बल के अंदर भी
दांत पर दांत किटकिटा रही है
और अपनी मेड सी
मुझसे चाय पर चाय
कॉफी पर कॉफी बनवा रही है....
नरम-गरम खाना की तो
बात ही मत पूछिए
कैसे झपट्टा मार आंत तक
सड़ाक से सरका रही है
और मैं
एक गरम रचना के लिए
गिड़गिड़ा रही हूँ तो
कोरा आश्वासन दे देकर
बस मुझे तरसा रही है.....

और तो और
बड़े मजे से अपने चारों तरफ
हीटर , ब्लोअर लगातार चलवा कर
मुझ आम आदमी का
बिजली बिल बढ़वा रही है
यदि मैं
अति आम आदमी बनकर
अलाव जलाऊं तो मुझे ही
पर्यावरण का भाषण पिला रही है....
जानती है वह कि उसके
पापा जी का क्या जाता है
और इस ठिठुरन भरी ठण्ड में तो
उसका लॉटरी ही लग जाता है.....

ओ! मेरी मैडम अभिव्यक्ति जी
इस रिकार्डतोडू ठण्ड का
वास्ता देकर कहती हूँ कि
मुझ गरीबन पर
आप अब थोड़ा रहम कीजिये
और जिससे आपको गरम सुख मिले
वही-वही करम बस खुद से कीजिये
और ये जो आपका
सब हुकुम बजा रही हूँ वह तो
मेरी नजाकत की नफासत है
वरना मुझे तो
इस ठण्ड और आप
दोनों से ही
विशेष सावधानी बरतने की
बहुत विशेष जरुरत है .

Tuesday, December 3, 2013

मैं कालिदास बन जाती.......

कल की रात
थोड़ा सा और जोश आ जाता तो
या थोड़ा सा और होश खो जाता तो
निधड़क ही मैं कालिदास बन जाती
और उनके जैसा बहुत सारा तो नहीं
पर कम-से-कम एक काव्य तो
निश्चित ही लिख पाती....

झटके से उठकर मैं मंदिर भागी और
माँ के मुख पर थोड़ा कालिख लगा आई थी
रास्ते में मिले छोटे-बड़े झाड़ियों पर चढ़कर
दो-चार कोमल टहनियाँ भी गिरा आई थी
फिर घर के अखबार से लेकर बिल तक
हर कागजनुमा पदार्थ को सहला दिया था
मानती हूँ कि इस फिरे हुए सिर को
श्री कालिदास ने और भी फिरा दिया था....

मेरे आस-पास मेरी लेखनी थी , मसि थी
मेरी इच्छा की मुट्ठी भी सच में बहुत कसी थी
स्वर्णपत्र , ताम्रपत्र , भोजपत्र आदि का
अच्छा खासा लगा अम्बार था
और रत्न जड़ित पीठिका पर
उत्तेजित हर एक उच्चार था
एक कोने से पर्याप्त प्रकाश करता हुआ
मेरा दिया भी कितना सुकुमार था
शायद मुझसे ज्यादा उसको ' मुझ-रचित '
एक चिर जीवन्त काव्य का इन्तजार था.....

मेरी कल्पनाशीलता भी कुछ
दिव्य दिग्दर्शन करके शब्दातीत थी
और सर्वश्रेष्ठता के शिखर पर पालथी मारकर
बैठी मेरी चेतना भी कालातीत थी
ऊपर से मेरा ' सख्य-भाव ' सबसे मिलकर
अपनी श्रेष्ठ भूमिका का उल्लेख चाहता था
और एक उत्कट प्रकृति प्रदत्त प्रेम का
मुझसे उल्लिखित लेख चाहता था.....

प्रसंगों-उपाख्यानों का समन्वयन के लिए
विहंगम अवलोकन का स्थापित आधार था
और अलकापुरी से रामगिरि की यात्रा के लिए
मेरा बोरिया-बिस्तर भी तैयार था
जब पूरे राग-रंग में बुरी तरह से डूबा हुआ
अलकेश्वर का राज्य और दरबार था
और भोगी चाटुकारों के बीच रहते-रहते
कुछ ऐसा शाप देने से उन्हीं को इनकार था....

फिर यक्ष-यक्षिणी को भी तो अलकेश्वर का
कोई भी फरमान कहाँ स्वीकार था ?
और विरह-वियोग का पुराना चलन
अब उनके लिए भी बेकार था
पद-प्रमादवश गलतियां किससे नहीं होती ?
उनका यही सीधा सरल सवाल था
वैसे भी आज के उपद्रवों के बवंडर में
उनका तो बहुत छोटा सा बवाल था.....

साथ ही इस गुनगुनी-कुनकुनी ठण्ड में
मेरी बादलों से हुई सारी वार्ताएं विफल रही
और लपलपाती हुई लेखनी उन पत्रों को
बस छेड़छाड़ करने में ही सफल रही
फिर अपने काव्य में किसी नये चरित्र को
पात्र बनाती , मुझमें कहाँ इतना दम था?
और सच कहने में लाज या संकोच कैसा
कि मुझमें ही वो पानी कम था .....

अकस्मात ही मेरी स्मृति-पटल को सूझा
कि एक ही कालिदास हैं नास्ति दूजा
तब तो सौंदर्य-वियोग , वैराग्य-वेदना आदि का
स्व्प्न सा ही सही फैला हुआ वितान था
उनको थोड़ा-बहुत अनुभूत करने के लिए
मेरे पास उपलब्ध सारा अनुमान था
पर मेरी भाषा में कहाँ उतना प्राण था ?
न ही देववाणी संस्कृत का ही मुझे ज्ञान था.....

अब इस दिन के उजाले में
आदरणीय कालिदास जी के आदरणीय भूत जी को
अति सम्मान के साथ भगा रही हूँ
और अंदर बैठे हीन भाव से ग्रस्त कवि को
ऐसी ही चलताऊ कविता के लिए जगा रही हूँ
और तो और आँख खोलकर इस साधना-स्थली को
किसी कबाड़खाना सा देख रही हूँ
और उन पत्रों की रद्दियों को
टोकड़ी में भर-भरकर बाहर फेंक रहीं हूँ
उनके साथ ही मेरा सारा शौक , सारा अरमान
ख़ुशी-ख़ुशी मुझे छोड़ कर जा रहा है
और श्री कालिदास जी मुझे कह रहे हैं कि
भई! चलताऊ कवि जी , हमें तो बड़ा मजा आ रहा है .


Saturday, November 16, 2013

प्रशस्ति-गान...

सब तरफ से
भलभल करता हुआ
प्रशस्ति-गान को सुन-सुनकर
आज मेरा मन भी
भाट हुआ जा रहा है.....
जैसे कोई रूमानी रेशम
टट्टर को देख-देखकर
खुद ही टाट हुआ जा रहा है....
अब तक के इतिहास का
आह! क्या रोमांचक पल है
इसलिए तो छलियन शब्दों से
आज छँटा हुआ सारा छल है
और अपनी छटकती अनेकता में
असली एकता का नारा लगाते हुए
सब भावुक हो-हो कर
कुछ- न-कुछ कहे जा रहे है
साथ ही उनमे से कुछ तो
प्रशंसकों की खुली प्रतियोगिता में
अव्वल आने की लिए
अजीबों-गरीब हरकत भी किये जा रहे हैं....
क्या महावीर के कैवल्य का
या बुद्ध के निर्वाण का
ऐसा लुभावना दृश्य रहा होगा ?
जो आज के इस अवतारी भगवान के
महाभिनिष्क्रमण का दृश्य है ...
आजतक के सारे रिकार्ड को तोड़कर
नया रिकार्ड बन रहा है
और जिनका कार्ड लकी है उन्हें
मीडिया भी बड़ा से बड़ा फुटेज दे रहा है ...
जो सिरे से नास्तिक हैं
वे अपने शक-शुबहा को
गधे के सिंग से तुलना कर रहे हैं
और जो आस्तिक हैं
वे अपने नये क्रीड़क भगवान के
इस क्रांतिकारी क्रीड़ा को
अविश्वसनीय बनाने का बीड़ा उठा रहे हैं.....
सच में धन्य हुई जा रही है धरती
उससे भी कहीं ज्यादा
धन्य हुए जा रहे हैं हम
और सामूहिक प्रशस्ति-गान से
जैसे-तैसे नये भगवान का
स्तुति पर स्तुति किये जा रहे हैं....
वैसे भाटों के भाड़ में भरभरा कर
अबतक मैंने कोई
विशेष महारथ तो हासिल नहीं किया है
लेकिन मेरी भी यही तमन्ना है कि
मेरा ये प्रशस्ति-गान ही
चारो तरफ से उठता हुआ शब्द-भाटा में
सब गान को कोरस में धकेल कर
सबसे ऊँचा तान हो जाए
और अपने इस अनजान प्रशंसक से
अपनी इतनी सुन्दर प्रशंसा को सुनकर
सबका नया भगवान भी
न चाहते हुए ही हैरान हो जाए .

Thursday, September 5, 2013

टेंशन का वेट घटाया जाए....


आज की इस अर्थव्यवस्था पर
की जा रही कोई भी टिप्पणी
मुझे टीन एजर सा कन्फ्यूज कर रही है
और मजेदार से मजेदार व्यंग भी
हाई डोज कोकीन सा बरगला रहा है
सेंसेटिव कविता तो सीधे
डांस-बार में ही पैर पटकवा रही है
ऊपर से ये विश्लेष्ण-विमर्श
उफ्फ! डेंगू सा कंपकंपा कर डरा रहा है....

जब हम पर चारों तरफ से
मार ही मार पड़ रही हो तो
कुछ भी समझ में नहीं आता है
बस मंदी के चक्रव्यूह में
देश का विकास दिख रहा है
और दिख रहा है दिवालियेपन का मुहाना
जो मुँह मोड़ने को राजी नहीं है....

इससे कैसे बचकर हम कहाँ जाएँ ?
क्या माडर्न मंहगाई को ही चबा-चबा कर खूब खाएँ ?
और तो और अपने रुपया को कैसे डॉलर बनाएँ ?
कैसे सबके हिस्से का गुलछर्रे उड़ायें ?

इस राष्ट्रीय संकट की चपेट में
धीरे-धीरे हम सब आ रहे हैं
और एक-दूसरे को कुछ भी
उल्टा-सीधा कहकर समझा रहे हैं
जबकि तस्वीर बिल्कुल साफ़ है
इसपर झूठ बोलना तो और भी माफ़ है...

भ्रम फैला रही बहसों के बीच
टी.वी. का चैनल बदल-बदल कर
खुद को उबा और थका रही हूँ
फिर दिल को थोड़ा बहलाने के लिए
मोबाईल मैसेजिंग व नेट चैटिंग पर
ज्यादा से ज्यादा समय लगा रही हूँ
साथ ही आऊट डेटेड डेट पर जा-जा कर
इंटरटेनमेंट का न्यू-न्यू आईडिया बुला रही हूँ...

पर लगता है कि इस मंदी में
बुद्धि भी बहुत मंद हो चली है
आगे मंडराते चुनाव में
वो एटम बम वाला नहीं बल्कि
किसी ऐसे हिटलर को देख रही है
जो हार्ड डिसीजन को अप्लाई करके
इस लड़खड़ाते देश को थोड़ा संभाल ले
और अर्थव्यवस्था को गर्त से निकाल दे...

पर इस मंद बुद्धि में कोई 'बुद्धिमान जी'
आकर बार-बार कहते हैं कि
'मैडम बुद्धू ' बैलेट से ऐसे पिकुलियर चेंजेज
बस आपके माइंड में ही पलते हैं....

बहुत टेंशन हो रहा है सच में
सोच रही हूँ कि अब नया क्या किया जाए ?
या कुछ नया करने के लिए किचन में चला जाए
देशी-विदेशी सारी कुकरी किताब खोलकर
ग्लोबलाइज्ड डिशेज को आजमाया जाए...

बॉडी का वेट बढे तो उसका टेंशन
पर खा-खा कर ही सही
औनेस्टली टेंशन का वेट घटाया जाए .


Tuesday, July 9, 2013

सुमन-शय्या और मालपुआ...

'' सुमन-शय्या पर लेटे-लेटे
मालपुआ चाभने वालों के
श्री मुख से केवल
मेवा-मिष्ठान ही झड़ता है ''
भला बताइए तो
इसकी व्याख्या का प्रसंग निर्देश
अनिवार्य अंग है या नहीं ?
साथ ही इसके कार्य-कारण का
पुर्न-पुर्न व्याख्या करने हेतु
हममें-आपमें अब भी वो उमंग है या नहीं?

ये प्रश्न हमें हर प्रसंग में
स्वयं से करते रहना चाहिए
व सत्य से विमुख हुए बिना
स्वीकार भी करते रहना चाहिए कि
हमसे-आपसे समीक्षित
संदर्भगत संक्षिप्त भूमिका भी
उसके मूलभाव से कोसों दूर रहती है
और हम देखते रहते हैं कि
हमारी बेबस व्याख्या
सुमन-शय्या और मालपुए के
व्यूह में ही कैसे उलझती है ....

तब तो बस यही कहा जा सकता है कि
अपने कर्मक्षेत्र में बिन वंशी के हम
ता-ता थय्या करने वाले क्या जाने
वो सुमन-शय्या कैसे सजता है ?
और सिर के ऊपर बहते अभाव में
बस कलम चला-चला कर क्या माने
कि वो मालपुआ कैसा दिखता है ?

आइये ! हम इन बड़ी-बड़ी बातों में
अपने लिए छोटी बात छाँट लेते हैं
मज़बूरी का नाम कहीं शब्द न हो जाए
इसलिए ये छोटी बात यूँ ही बाँट लेते हैं-
कि हम अपना पसीना भी उनपर बहाए
और शब्दों को भी उनके लिए बरगलाये
पर वे खूब फले-फूले
व अपने आस-पास को भी फुलाए ...
अब तो हमें भी कुछ तय करना चाहिए
कि अपना शब्द किसपर खर्चना चाहिए ?

वैसे भी इस खण्डन-मण्डन से
उनका तो कुछ बिगड़ता नहीं है
और हमपर भी छप्पड़ फाड़ कर
सुमन-शय्या और मालपुआ बरसता नहीं है...
हाँ! आप अपनी जाने
कि आपके अन्दर क्या-क्या चलता है
पर उन सुमन-शय्या और मालपुए को
सोच-सोच कर मेरे मुँह में तो
इस किल्लती-युग में भी
दस-बीस गैलन पानी आ भरता है .

 
 

Tuesday, May 21, 2013

ये ब्लॉगिंग है जनाब !


ये ब्लॉगिंग है जनाब !
जैसे हड्डी-शोरबा मिला शोख़ क़बाब
या गज़क लाजवाब
पर यहाँ नहीं है कोई नवाब
एक-दूजे का जोरदार हुकुम बजाइये
और नजराना में वही आह-वाह पाइये
नहीं तो चोर-रास्ते भी हैं , उसी से आइये
पृष्ठ-दर्शकों की संख्या इजाफा करके
उनके अंकों में ग़ुम हो जाइये
मज़ाल है कि कोई आपको टोक दे
या कहीं भी आने-जाने से रोक दे

ये ब्लॉगिंग है जनाब !
जैसे पर लगा हुआ कोई सुरखाब
या मुश्कबू बेहिसाब
यहाँ पर उठा हुआ हरएक हिजाब है
आप भी तूफानी रफ़्तार से
किसी भी विधा में खूब गर्दा उड़ाइए
गर नजरें भींचे तो नाक-कान में घुसाइये
खुद भी अपने साफ़ी से मनमुताबिक़ छानिये
दिल जितना कहे उतना भर ही मानिए
व मिजराब से छेड़कर एक-दूजे का गुण गाइये
और संगी-साथी को भी कोरस में बिठाइये

ये ब्लॉगिंग है जनाब !
जैसे उँगलियों पर नाचता हुआ सैलाब
या करामाती ख़्वाब
यहाँ पर बस चलता है तो वह है आदाब
ख़ामख़ा अपना रौब-दाब न दिखाइये
व खुद को दूज का माहताब भी न बनाइये
नज़ाकत से नाजुकख्याली में घूमिये
नफ़ासत से नाजुककलामी कीजिये
गर मीठे बोल हो तो ही मुँह खोलिए
व तखालुक को भी शालीन लफ़्जों में बोलिए
और जितना हो सके ज़ज्ब-ए-इश्क ही घोलिये

ये ब्लॉगिंग है जनाब !
जैसे न डूबने वाला आफ़ताब
या न मुरझाने वाला गुलाब
या तोहफ़ा नायाब
पर यहाँ नहीं है कोई नबाब
ये ब्लॉगिंग है जनाब !

Wednesday, June 30, 2010

मसालेदार लजीज कविता .......

कुछ अति साधारण से
लोकल चलताऊ शब्दों में
दो - चार नहीं
पाँच - दस अर्थों को भर कर
मेकओवर , कॉस्टमेटिक सर्जरी करवाकर    
किसी बड़े  फैशन डिजायनर के
लेटेस्ट मॉडल का ड्रेस पहनाकर
आज की मेनकाओं की तरह
नग्नता के ठुमके लगवाकर
अवार्ड विनिंग संगीतकार के
चोरी किये गए धुन पर
कुछ बे- ताल से ताल मिलाकर
किसी बड़े ओपन स्टेडियम में 
सेलेब्रेटियों के बीच  नचवाकर
कविता तो बनाई जा सकती  है 
मसालेदार  लजीज  कविता 
देखने  सुनने  वालों  के मुँह में 
कोल्ड ड्रिंक्स  वाली लार भर 
बूंद - बूंद से  प्यास  मिटा  सकती  है 
साहित्य  अकादमी  वाले  
सभ्यता  संस्कृति  के नाम पर 
शर्म की  झीनी  चदरिया  ओढ़  भी  ले
पर  ग्लोबलाइज्ड   पुरस्कारों  को
महान  कवियों  के  लाल  में भी  दम  नहीं
कि  कीर्तिमान  बनाने  से  रोक  ले