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Wednesday, August 4, 2021

उन भ्रूण बेटियों के लिए.........

अहा! चहुँओर आज तो मंगल गान हो रहा है
बची हुई नाक का देखो ना यशोगान हो रहा है
सदियों से एक सिरे से उन सारी उपेक्षितों का भी
इतना ज्यादा अनपेक्षित मान-सम्मान हो रहा है

भूरि-भूरि प्रशंसाओं के हैं काले-सफेद बोल
सब खजाना भी लुटा रहे हैं हृदय को खोल
हर चेहरे पर ओढ़ी हुई है लंबी-चौड़ी मुस्कानें
हर कोई जीते पदकों से खुश होकर रहा है डोल

पर आज उन कोखों की भी कुछ बात की जाए
जिनपर दबाव होता है कि वे बेटी को ही गिराये
कोई समाज के सारे पाखंडी परंपराओं को तोड़
उन भ्रूण बेटियों के लिए भी सुरक्षित घर बनाये

क्यों बेटों के लिए बेटियों को कुचला जाता है ?
कोई क्यों बेटियों का ही भ्रूण हत्या करवाता है ?
घरेलू हिंसा की पीड़िता सबसे है पूछना चाहती 
क्या इस तरह ही समाज गौरवशाली बन पाता है ?

यदि सारी बेटियां अपने ही घर में बच जाएँगी
तो वे विरोध से नहीं बल्कि प्रेम से बढ़ पाएँगी
तब तो दो-चार ही क्यों अनगिनत पदकों का भी
अंबार लगाकर ढ़ेरों नया-नया इतिहास बनाएँगी .

      *** बेटी खेलाओ पदक जिताओ ***

Sunday, August 1, 2021

एक कालजयी कविता के लिए .....

एक कालजयी कविता के लिए
असली काव्य-तत्त्व की खोज में
जब-जब जहाँ-तहाँ भटकना हुआ
तब-तब अपने ही शातिर शब्दों के 
मकड़जाल में बुरी तरह से अटकना हुआ

न जाने कैसी-कैसी और कितनी बातों को
गुपचुप राज़ सा या खुलेआम ख्यालातों को
जाने-अनजाने से या किसी-न-किसी बहाने से
चोरी-छुपे पढ़ती, सुनती और गुनती रही
शायद हीरा-जवाहरात मानकर ही सही
पूरे होशो-हवास और दम-खम से
अपने कलमकीली कबाड़ झोली में 
बस कंकड़-पत्थर ही बीनती रही

अब तक के उन तमाम नामी-गिरामी
कलमतोड़ों और कलमकसाइयों के
पदछापों पर मजे से टहलते हुए
अपने ख्याली पुलावों को 
बड़े चाव से कलमबंद करते हुए
उसी कबाड़ झोली का सारा जमा-पूंजी को
आज का अँधाधुँध सत्य जानकर
मन ही मन में खुद को कलम का उस्ताद मानकर
शब्दों में आयातित गोंद और लस्सा लगाकर
उसे उसके संदर्भ से जोड़ना चाहा

पर मेरी उधाड़ी जुगाड़ी कोशिशों को भाँपकर 
बरबादी की ऐसी सत्यानाशी सनक से काँपकर
अपनी ही रूह की होती मौत देख बेचारी कविता 
सिर धुनती हुई बन गई रूई का फाहा

तिस पर भी उसको मनाने के वास्ते मैंने
बाजार जाकर खरीद-फरोख्त की गई
वर्जनाओं को, उत्तेजनाओं को, अतिरंजनाओं को
इधर-उधर से माँगी-चाँगी हुई, छिनी-झपटी हुई
अन्तर्वेदनाओं को, संवेदनाओं को, परिवेदनाओं को
शोहरती तमन्नाओं की आग में ख़ूब तपाया
पर निर्दयी कविता तो जरा-सी भी न पिघली 
लेकिन शब्दों और अर्थों का डरावना-सा
लुंज-पुंज अस्थि-पंजर जरूर हाथ आया

फिर उसको रिझाने-लुभाने के वास्ते मैंने
अपनी सारी बे-सिर-पैर की तुकबंदियों को भी 
ग़ज़लों-छंदों का सुन्दर-सा आधुनिक परिधान पहनाया
और उसे उसके अर्थो से भी एकदम आजाद करके
कसम से आज़माईश का सारा गुमान चलाया

अब जी मैं आता है कि 
किसी भी काव्य-तत्त्व की खोज में
प्रेतों-जिन्नों की तरह भटकना छोड़ कर 
प्राणों से फूटती कविता के इंतजार में
चुपचाप सबकी नजरों से कहीं दूर जाकर
खुद से भी छुपकर धूनी रमाए बैठ जाऊँ

पर नालायक कवि मन कहता है कि
गलती से ही सही पर जब तेरे माथे पर
लिखा जा चुका है कि तू कवि है तो
जो जी में आए बस तू लिखता रह, लिखता रह
ज्यादा न सही पर कुछ तो शोहरत-नाम मिलेगा
झटपट लिखो-छापो के इस जादुई जमाने में
फटाफट ढ़ेर सारा ज़हीर कद्रदान मिलेगा
अगर मेहरबानों की नजरें इनायत हुई तो
झोली भर-भर कर भेंट और इनाम मिलेगा

तो कवि मन के झांसे में आकर मैंने भी सोचा कि
कोई मुझे एक-एक शब्द पर पढ़-पढ़ कर सराहे 
या शेखचिल्ली समझ कर खूब खिल्ली उड़ाए
या मुझे मुँह भर-भरकर गाली-आशीर्वाद दे
या फकत कलमघिस्सी जान ज़ायका-आस्वाद ले

पर लिखने वाला हर बेतरतीब-सी बिखरी चीजों को
बुहारी मारते हुए समेट कर लिखता है
जिसमें किसी को सुन्दर कविता तो
किसी को बस रद्दी का टुकड़ा ही दिखता है
इसलिए मैं भी क्यों कहीं दूर जाकर
प्राणों की कविता के इंतजार में बैठ जाऊँ
कवि हूँ तब तो ईमानदारी से या बेइमानी से 
अगड़म बगड़म कुछ भी लिख-लिख कर क्यों नहीं
रद्दियों का ही सही बड़ा-सा अंबार लगाऊँ .

Wednesday, July 28, 2021

रूठी रहूंगी सावन से ......

तुम्हारे आने तक 
रूठी रहूंगी सावन से

हिय रुत मनभावन से
बूंदों के सरस अमिरस गावन से
अगत्ती अगन लगाने वाला 
छिन-छिन काया कटावन से
नव यौवनक उठावन से
कनि-कनि कनेरिया उमगावन से
ऐसे में मुझ परकटी को छोड़ कर
पीड़क परदेशी तेरे जावन से
तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से

घिर-घिर आएंगी कारी बदरिया
बन कर तेरी बहुरूपिनी खबरिया
कभी गरज कर, कभी अरज कर
कभी चमका कर बिजई बिजुरिया
बरस-बरस कर मुझे मनावेंगी
पर मुझपर न चलेगा
कोई भी तेरा जोर जबरिया
न मानूंगी किसी भी लुभावन से
तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से

ढोल, मंजीरों पर थाप पड़ेंगी
मृदंग संग झांझे झमकेंगी
घुंघरू पायल की रुनझुन में
सब सखियन संग झूलुआ झूलेंगी
सबके हाथों सजन के लिए मेंहदी रचेंगी
और हरी-भरी चूड़ियां खन-खन खनकेंगी
पर मुझ बिरहिन, बैरागिन को
बिरती है सब सिंगार सजावन से
तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से

कली-कली चहक कर चिढ़ाती
अकड़ कर डाली-डाली अँगड़ाती
फूल-फूल कंटक-सा चुभता
क्यारी-क्यारी यों कुबानी सुनाती
जलहीन मीन सी अँखियां अँसुवाती
और उर अंतर चिंता ज्वाल से धुँधुवाती
हाय! बड़ा बेधक है ये बिलगना
पर क्या हो अब पछतावन से
तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से

पंथ है बड़ा कठिन ज्यों जानती
परदेशी तुमको बस पाहुन ही मानती
हर रुत परझर सा है लगता
तुम्हें हिरदेशी बना मैं ऐसे न कानती
और तेरी जोगनिया बन हठजोग न ठानती 
तब अंधराग तज सावन का संदेसा पहचानती
तन-मन से हरियाती, झुमरी-कजरी गाती
बस एक तेरे आवन से
तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से

तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से .

***सुस्वागतम्***

Friday, July 23, 2021

गुरुक्रम हो तुम .......

पहले प्यास हुए
अब तृप्ति की आवृत्ति हो तुम
मेरी प्रकृति की पुनरावृत्ति हो तुम

पहले उद्वेग हुए
अब आसक्ति के आवेग हो तुम
मेरी अभिसक्ति के प्रत्यावेग हो तुम

पहले आकर्ष हुए
अब भक्ति के अनुकर्ष हो तुम
मेरी आकृति के उत्कर्ष हो तुम

पहले श्रमसाध्य हुए
अब आप्ति के साध्य हो तुम
मेरी प्रवृत्ति के अराध्य हो तुम

पहले साकार हुए
अब अनुरक्ति के आकार हो तुम
मेरी अतिश्योक्ति के अत्याकार हो तुम

पहले अलंकार हुए
अब अभिव्यक्ति के शब्दालंकार हो तुम
मेरी गर्वोक्ति के अर्थालंकार हो तुम

पहले भ्रम हुए
अब जुक्ति के उद्भ्रम हो तुम
मेरी मुक्ति के गुरुक्रम हो तुम .

*** गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ ***
*** हार्दिक आभार समस्त गुणी जनों को ***

Sunday, July 18, 2021

मोह लगा है ........

जबसे सोने के पिंजरे से मोह लगा है

अपना ही ये घर खंखड़ खोह लगा है

सपना टूटे , अब अपना ही सच दिखे

दिन- रात एक यही ऊहापोह लगा है


इस घर में अब उदासी-सी छाई रहती है

मेरे सुख-चैन को ही दूर भगाई रहती है

मन तो बस , बंद हो गया उसी पिंजरे में

उसे पाने की इच्छा , फनफनाई रहती है


स्तब्ध हूँ कि कैसे मैं अबतक हूँ यहाँ

जो दिखता था जीवन , यहाँ है कहाँ

छल करता हर एक सुख है , पर अब

आँखों को दिखता साक्षात स्वर्ग वहाँ


अब वही , सोने का स्वर्ग मुझे चाहिए

मदाया हुआ , उन्मत्त गर्व मुझे चाहिए

दुख में ही तो बीता हीरा जनम , अब

क्षण-क्षण छंदित मेरा पर्व मुझे चाहिए


अपना होना भी मिटाना पड़े मिटा दूंगी

सबकुछ लुटाना पड़े तो , सब लुटा दूंगी

हँसते-हँसते उस सोने के पिंजरे के लिए

पर कटाना पड़े तो , खुशी से कटा लूंगी


अभी तो उस झलकी का संयोग लगा है

जीर्ण- जगत गरल सम प्रतियोग लगा है

असमंजस में प्राण है बीते न बिताए पल

जबसे उस सोने के पिंजरे से मोह लगा है .

Sunday, July 11, 2021

प्रसन्न हूँ तो.........

प्रसन्न हूँ तो पानी हूँ

अप्रसन्न हूँ तो पहाड़ हूँ


पकड़ लो तो किनारा हूँ

छोड़ दो तो मँझधार हूँ


संग बहो तो धारा हूँ

रूक गये तो कछार हूँ


सम्मुख हो तो दर्पण हूँ

विमुख हो तो अँधार हूँ


चुप रहो तो मौन हूँ

बोलो तो विचार हूँ


फूल हो तो कोमल हूँ

शूल हो तो प्रहार हूँ


छाया हो तो व्यवधान हूँ

मौलिक हो तो आधार हूँ


संशय हो तो दुविधा हूँ

श्रद्धा हो तो उद्धार हूँ


झूठ हो तो विभ्रम हूँ

सच हो तो ओंकार हूँ .


 " दारिद्र्यदु: खभयहारिणि का त्वदन्या 

सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता । "

*** गुप्त नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

Friday, May 14, 2021

एक और इतिहास ......

यह युग 

बीत ही जाएगा

और

एक और युग भी आएगा

जो बीत रहा है वह भी

इतिहास बन जाएगा

पर दोनों कल के

पलड़ों के बीच

शीतयुद्ध जैसा फिर से

कुछ ठन जाएगा

और

ऊँघते काल के प्रवाह में

उबाल और उलार को

नापने के लिए

अनगिनत आँख जड़ा 

असंख्य चँदोवा 

तन कर, तन जाएगा

तब फिर से

सहमतियों की

आँखों की कृपा पर

हर अगले पन्ने की छपाई

निर्भर करेगा

उनका रंगाई-पुताई

बीते हुए सारे

कानाफूसियों का रहना

दूभर करेगा

और फिर सबमें

एक चुपचाप

शब्दयुद्ध ठन जाएगा 

भूलाने लायक

बहुत सारी बातें

कहीं हाशिए में

नामोनिशान मिटा कर

दफन कर दिया जाएगा

कुछ बातों को

सौंदर्य प्रसाधनों से

लीपा-पोती करके

और भी आकर्षक

बना दिया जाएगा

फिर से

इस युग के भी बीतने पर

वही गड्ड-मड्ड सा 

एक और

इतिहास बन जाएगा 

जिसमें ढूंढने पर भी

इस आज की सच्चाई

कभी नहीं मिलेगी . 


Saturday, May 8, 2021

कठपुतली होने की विवशता .........

                  जीवन को कुछ अलग हटकर देखने से यही लगता है कि यह आजीवन केवल सहन करने का ही काम है । जैसे बोझ ढोने वाले जानवरों पर उनसे पूछे बिना किसी भी तरह का और कितना भी वजन का बोझ डाल दिया जाता है । फिर पीछे से हुड़का कर, डरा कर या डंडा मार-मारकर बिना रूके हुए चलाया जाता है, ठीक ऐसा ही जीवन है । यदि वह जानवर रूकना चाहे या बोझ उतारना चाहे या कुछ और करना चाहे,  तो भी कर नहीं सकता है या कर नहीं पाता है । कारण उसे लगता है कि उसपर डाला गया बोझ और वह एक ही है और यही उसका जीवन भी है । कभी-कभार उस जानवर को ये बात समझ में आ भी जाती है तो भी वह उस बोझ को हटा नहीं पाता है क्योंकि उसे उसकी आदत हो गई होती है । वह स्वयं भी खाली होने की कल्पना मात्र से ही डर जाता है । उसे लगता है कि उसका जीवन भी खो जायेगा और वह मर जाएगा । 

                           फिर से देखा जाए तो जीवन, जीवन पर्यन्त सब कुछ हमारे विपरीत होने का ही नाम है । हम पल-प्रतिपल अपनी सहनशीलता को अपनी ही कसौटी पर कसते रहते हैं । साथ ही उसके अनुरूप हो रहे सारे अनुकूल-प्रतिकूल बदलावों के अनुसार अपने-आपको ढालने के उबाऊ और थकाऊ प्रयासों के चक्रव्यूह में फँसते रहते हैं । पर उन विपरीतों में अचानक से कुछ ऐसा भी होता रहता है कि हम सहज भरोसा नहीं कर पाते हैं कि हमारे अनुकूल भी कुछ होता है । जो कि केवल संयोगावशात ही होता है । पर हम अति प्रसन्न होकर अपनी ही पीठ थपथपा लेते हैं । हम स्वयं को समझा लेते हैं कि हमारे करने से ही हुआ है पर उन असफलताओं को उस क्षण कैसे भूल जाते हैं जिसके लिए हमने कभी स्वयं को भी दांव पर लगा दिया था । लेकिन हमारा मन इतना चालाक होता है कि वो हमसे पहले ही अपने तर्कों को तैयार कर लेता है और अपने अनुसार हमसे मनवा भी लेता है ।

                                            हालांकि हमारे अनुरूप कुछ भी होने की मात्राओं में बड़ा अंतर हमें आशा-निराशा के द्वंद में उलझाता रहता है और हम स्वयं से ही प्रश्न पूछने पर विवश होते रहते हैं कि आखिर हमारा होना क्या है ? तब हमें थोड़ा-थोड़ा पता चलता है कि सच में हम मात्र एक कठपुतली ही हैं और हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है, स्वयं को सहन करने के अतिरिक्त । पर हमारा अहंकार यह मानना नहीं चाहता है जबकि हम देखते रहते हैं कि हम जीवन में जो करना चाहते हैं वो कर नहीं पाते हैं । यदि कर भी पाते हैं तो वो आंशिक रूप में ही होता है । परन्तु जो हम कभी करना नहीं चाहते थे, वही सबकुछ हमें न चाहते हुए भी करते रहना पड़ता है । उन अनचाहे कर्मों को करते हुए हम इतने विवश होते हैं कि आत्म-विरोध के अतिरिक्त कुछ नहीं कर पाते हैं । कारण हमें उन जानवरों की तरह ही सिखा-पढ़ाकर इतना अभ्यास करा दिया गया होता है कि हम अपने ही कोल्हू पर घुमते रहने के आदी हो जाते हैं । 

                                        फिर जीवन क्या है ? संभवतः अपने ही हवन-कुंड में अपनी ही समिधा को सुलगाना । या किसी ऐसे आत्म-संकल्प को अपने विचार-यज्ञ में स्वयं होता बनकर सतत आहुत करते रहना जिसको हम ही कभी नहीं जान पाते हैं । या अपनी ही बलि-वेदी पर अपने श्वास-श्वास को चढ़ाकर जीवन का प्रसाद पाना । या सुनी-सुनाई हुई, तथाकथित कर्म और मुक्ति के सिद्धांतों के जलेबी जैसी बातों से थोड़ा-थोड़ा रस चाट-चाटकर कर आत्म-संतोष के झूठे आश्वासन में तबतक श्वास लेते रहना जबतक वह स्वयं ही रूक नहीं जाए । 

                                  इस वर्तमान में प्रश्नों के अंबार हैं पर उत्तर की कोई भी चाह या आवश्यकता नहीं है । जो दिख रहा है वही इतना अधिक है कि बहुत सारी बातें  अपने-आप इस मूढ़ बुद्धि को बहुत-कुछ समझा रही है । चला-चली के इस बेला में अपनों से बिछुड़ते हुए आत्म-सांत्वना के शब्द या जीवन से पुनः जुड़ाव का कोई प्रयास करना,  छलावा मात्र लग रहा है । जो हो रहा है सो हो रहा है । जिसे देखता हुआ मूकदर्शक बहुत कुछ कहना चाहता है पर कहने मात्र से ही कुछ हो जाता तो वह अवश्य कहता रहता । वह अपने कठपुतली होने की विवशता को अच्छी तरह से जानता है । हाँ! वह भीतर-ही-भीतर दुखी हो सकता है, वह दहाड़े मारकर रो सकता है, वह छाती भी पीट सकता है,  किसी को जी भर कर कोस भी सकता है और जीवन से विमुख भी हो सकता है ।

                                   पर वह सामूहिक कल्याण के लिए अनवरत आर्त्त प्रार्थना ही करता रहता है । बाह्य रूप से वह इतना तो कर ही सकता है कि आशा का दीपक जलाकर औरौं को भी प्रदीप्त करता रहे , बिखर गए धीरज की पूंजी को दोनों हाथों से समेट कर लुटाता रहे ।  किसी को संबल का दृढ़ और स्नेह भरा हाथ बढ़ा सके । किसी को सिर रखने के लिए वह अपना मजबूत कंधा दे सके । वह दुःख के गीत को कम गाए और सुख के गीतों से कण-कण को गूंजा दे । वह सबके ओंठो पर उम्मीदों की हँसी न सही मुस्कान ही खिला दे । वह मानव जीजिविषा के हठ को पुनर्जीवित कर सके । करने को बहुत-कुछ है जिसे वह कर सकता है । पर यह कैसे कह सकता है कि ये समय भी बीत जाएगा और सबकुछ ठीक हो जाएगा । जबकि वह देख रहा है कि बहुत-कुछ ऐसा हो गया है कि वह कभी पूर्व गति को प्राप्त नहीं हो सकता है साथ ही वह भी स्वयं को उस बीत जाने वाली पंक्ति में ही पाता है । 

Friday, April 30, 2021

बलात् ही क्यों न हो .....

साधारण हूँ

साधारण ही होना चाहती हूँ

इन्द्रियों को वश में करना नहीं आता है

इन्द्रियों की दासता भी नहीं आती है

बस इतना ही होना चाहती हूँ कि

जब क्रोध आये तो बिना प्रतिरोध के

सहजता से स्वीकार करके प्रकट करूं

और जब प्रेम आये तो

उसे भी सरलता से कर सकूं

बस उतना ही साधारण होना है

कि भावों के परिवर्तित प्रवृत्तियों में भी

स्वयं को मैं कभी न रोकूं

और यदि कोई रोके तो

उसे रोकने भी नहीं दूं 

चाहे वह प्रतिरोध

बलात् ही क्यों न हो .


Sunday, April 25, 2021

यकीनन तड़प उठते हैं हम ......

जुनूं हमसे न पूछिए हुजूर कि हमसे क्या-क्या हुआ है ताउम्र

उलझे कभी आसमां से तो कभी बडे़ शौक़ से ज़मींदोज़ हुए 


अपनी ही कश्ती को डूबो कर साहिल से इसकद उतर आए हम

अब आलम यह है कि इब्तदाए-इश्क का गुबार भी देखते नहीं


जो सांस की तरह थे उनसे तौबा कर लिया सीने को ठोक कर 

बेशर्मी से मांग लिया दिल भी जो कभी नाजो-अदा से दिया था 


उन्होंने मुरव्वत न सीखी तो तहज़ीब ही सही सीख लेते हमसे

हसरतें थी उनपर मिट जाने की और वही अदावत सिखा गये


इक-दूजे को शुक्रे-कर्दगार करके जुदा हो गए गर्मजोशी से हम

जिंदगी का क्या नई चाहतें जिधर ले जाएंगी उधर ही चल पड़ेंगे 


माना कि इश्क सूफियाना था शायद है और आगे भी यूं ही रहेगा 

गर गलती से भी वो याद करते हैं तो यकीनन तड़प उठते हैं हम .


Friday, April 9, 2021

एक चोट की मन:स्थिति में .......

                               चोट लगी है, बहुत गहरी चोट लगी है । चोट किससे लगी है, कितनी लगी है,  कैसे लगी है, क्यों लगी है, कहाँ लगी है जैसे कारण गौण है ।  न तो कोई पीड़ा है न ही कोई छटपटाहट है, बस एक टीस है जो रह-रहकर बताती है कि गहरी चोट लगी है । न कोई बेचैनी है, न ही कोई तड़प और फूलों के छुअन से ही कराह उठने वाला दर्द भी मौन है । शून्यता, रिक्तता, खालीपन पूरे अस्तित्व में पसरा है । सारा क्रियाकलाप अपने लय और गति में हो रहा है पर कुछ है जो रुक गया है । कोई है जिसको कुछ हो गया है और बता नहीं पा रहा है कि उसको क्या हुआ है । 

                                     गहरे में कहीं इतना नीरव सन्नाटा है कि आती-जाती हुई साँसें विराम बिंदु पर टकराते हुए शोर कर रही है । हृदय का अनियंत्रित स्पंदन चौंका रहा है । शिराओं में रक्त-प्रवाह सर्प सदृश है । आँखें देख रही है पर पुतलियां बिंब विहीन हैं । स्पर्श संवेदनशून्य है । गंध अपने ही गुण से विमुख है । कहीं कोई हलचल नहीं है और न ही कोई विचलन है । किसी सजीव वस्तु के परिभाषा के अनुसार शरीर यंत्रवत आवश्यक कार्यों को संपादित कर रहा है । पर तंत्रिकाओं का आपसी संपर्क छिन्न-भिन्न हो गया है जैसे उनमें कभी कोई पहचान ही नहीं हो ।

                               हृदय के बीचों-बीच कहीं परमाणु विखंडन-सा कुछ हुआ है और सबकुछ टूट गया है ।  उस सबकुछ में क्या कुछ था और क्या कुछ टूटा है, कुछ पता नहीं है । बस सुलगता ताप है, दहकती चिंगारियां हैं और भस्मीभूत अवशेष हैं । उसी में कोई नग्न सत्य अपने स्वभाव में प्रकट हो गया है । उस चोट से आँखें खुली तो लगा जैसे लंबे अरसे से गहरी नींद में सोते हुए, मनोनुकूल स्वप्नों का किसी काल्पनिक पटल पर प्रक्षेपण हो रहा हो और उसी को सच माना जा रहा हो । एक ऐसा सच जो शायद कोई भयानक, सम्मोहक भ्रम या कोई भूल-भुलैया जैसा, जिससे निकलने का कोई रास्ता नहीं हो । सोने वाला भी मानो उससे कभी निकलना नहीं चाहता हो । फिर उसी गहरी नींद में अचानक से कोई बहुत जोरों की चोट देकर जगा दिया ।

                                  किंकर्तव्यविमूढ़ वर्तमान, अतीत और भविष्य को साथ लिए स्वयं ही आकस्मिक अवकाश लेकर कहीं चला गया है । इच्छाएं किसी अंधेरी गुफा में जाकर छिप गई हैं । आशाएं भय से कांप रही हैं । पारे-सी लुढकती हुई स्मृतियां किसी भी प्रतिक्रिया से इन्कार कर रही है । सारे भाव अपने वैचारिक लहरों के साथ अपनी ही तलहटी में बैठ गये हैं । जैसे कोई तथाकथित कुबेर अचानक से दिवालिया हो गया है और उसके चेहरे को भी एक झटके में ही मिटा दिया गया हो । कोई है जो तटस्थ और मूकदर्शक है । अनायास आये बवंडर से या तो वह हतप्रभ है या निर्लिप्त है । पर जो हो रहा है उसके अनुसार मन:स्थिति की गतिविधियां इतना तो बता रही है कि गहरी चोट लगी है । 

                                     बार-बार क्यों लग रहा है कि जैसे किसी बड़े-से मेले में कोई बहुत छोटा-सा बच्चा खो गया है । वह अबोध बच्चा ठीक से बोल भी नहीं पा रहा है और अपनों को खोज रहा है । किसी भी अपने के नहीं मिलने पर सबसे इशारों में ही घर पहुंचाने की जिद करते हुए लगातार रोये जा रहा है । कुछ ऐसी ही जिद में कोई है जो अब रो रहा है । शायद उसे भी अपने घर की बहुत याद आ रही है और कोई गोद में उठा कर उसे उसके घर पहुंचा दे । 

                     

Sunday, April 4, 2021

ये चिट्ठा कवि क्या कह रहा है ...

                          हर व्यक्तित्व का अपना स्वभाव, अपना संस्कार, अपना व्यवहार होता है और बहुआयामी व्यक्तित्व वो होता है जो किसी भी बौद्धिक आयामी सांचे में न बंधकर, जीवन जनित समस्त अनुभवों को स्वतंत्र रूप से आत्मसात करता है। जब कभी उसके भीतर छिपा हुआ कवि उसे आवाज देता है तो वह अपनी ही सारी सीमाओं को तोड़कर शब्दों में गढ़ देता है । वो खुद ही प्रथम पाठक के रूप में उस कविता की खोज में सतत् लगा रहता है जो उसके नितांत व्यक्तिगत प्रतिक्रिया के परिणाम स्वरूप जन्म लेती है । संभवत उस कविता में कहने वाला मौन हो जाता है और जीवन का गहरा अर्थ अपने आप प्रकट हो जाता है । जो किसी भी संकुचित दायरा को विस्तार देने के लिए कटिबद्ध होता है ।

                     लेकिन शब्द और शब्द की अन्तरात्मा का ज्ञान भी शब्दों की सीमा का अतिक्रमण नहीं कर पाते है जब अर्थ अनंत हो तो । उन अनंत अर्थों की भावनाओं में कुछ भावनाएं ऐसी भी होती है जो किसी के लिए अनायास होती है और प्रकट होकर भार मुक्त होना चाहती है । मानो वह कहना चाह रही हो कि मुझ हनुमान के तुम ही जामवंत हो और तुम न मिलते तो अपनी ही पहचान नहीं हो पाती । फिर कविता रूपी सिंधु पार करना तो असंभव ही था। यदि यह प्रकटीकरण किसी अंतर्मुखी चेतना के द्वारा हो तो शब्द और भी स्वच्छंद हो जाते हैं अपनी महत्ता स्थापित करने के लिए । फिर उन्हें संप्रेषण के लिए मनाना किसी पहाड़ पर चढ़ने के जैसा हो जाता है । पर पहाड़ चढ़े बिना भी तो कैलाश नहीं मिलता है और कैलाश के बिना आप्त शिव नहीं मिलता । 

                         वह अंतर्मुखी व्यक्तित्व अपने लेखन के यायावरी यात्रा को पलट कर देखता है तो पाता है कि जैसे वह अपने ही खदान से निकला हुआ कोई बेडौल , बेढंगा, अनगढ़-सा रंगीन पत्थर हो । जिस पर कुछ जौहरियों की नजर पड़ती है, जो बड़े प्यार से उसे छेनी और हथौड़ी थमा देते हैं और प्रेरित करते हैं कि खुद ही अपने को काटो, छांटो और तराशो । साथ में ये भी बताते हैं कि तुम हीरा हो ।  वो रंगीन पत्थर प्रेमपूर्ण प्रेरणा और संबल पाकर खुद को धार देते हुए संवारने लगता है । कालांतर में वह अपने ही निखार से चकित और विस्मित भी होता रहता है । तब उसे पता चलता है कि वह भी एक कोहिनूर हीरा है । अक्सर कुछ जौहरी जरूरत के हिसाब से खुद छेनी और हथोड़ी भी चला दिया करते हैं ताकि उस हीरा में और भी निखार आ सके ।  तब वह हीरा उन जौहरियों के आगे बस नतमस्तक होता रहता है ।

                        उस यात्रा में काव्य तत्व की तलाश में भटकने का अपना एक अलग ही रोमांच है । कल्पना के कल्पतरू पर नया प्रयोग, नयी शैली, नया जीवन संदर्भ जैसे मौलिक फूलों को उगाना भी अपने आप में रोचक है । किसी की बातें उसके मुंह से छीन लेने की इच्छा, किसी के सत्य से खुद को जोड़ लेने की लालसा, किसी की संवेदना में खुद को तपा देने की आकांक्षा परकाया गमन को अनुभव करने जैसा ही है । फिर ये कहना कि चेतना के तल पर हम एक ही तो हैं पूर्णता को पाने के जैसा ही है । उसे जब एक-एक शब्द पर सराहते हुए पढ़ा जाता है तो वह और भी विनयशील होकर अपने को नये ढंग से संस्कारित करता है । पर वह अपने मनोवेगों को अधिक मुखर नहीं होने देता है और संतुलन के साथ वाक्-संयम के तप में लीन रहता है । जिससे कुछ गलतफहमियां भी होती रहती है, कुछ नाराजगी भी होती होती रहती है और वह हाथ जोड़कर क्षमा मांगने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर पाता है । 

                        अंत में सारे दृश्य और अदृश्य सम्माननीय पाठकों को हार्दिक आभार प्रकट करते हुए ये चिट्ठा कवि कहना चाहता है कि आंतरिक इच्छा होती है कि अपने ही उन अव्यक्त भावों को शब्दों में बांध कर अंकुरित करता रहे जो स्नेह-बूंदों से पल्लवित-पुष्पित होकर सर्वग्राही होता रहे । साथ ही उत्साहित होकर अपनी ही बनाई हुई सीमाओं को लांघने के लिए उत्सुक भी है । जिसे देखना उसके लिए भी काफी दिलचस्प होगा ।

ये चिट्ठा कवि कह रहा है ...

Wednesday, March 31, 2021

सब नवाब हैं बाबू ! .......

कोई महल बेचता है तो कोई खोली

कोई बारूद बेचता है तो कोई बोली

कोई कटार बेचता है तो कोई रोली

कोई गुलाब बेचता है तो कोई गोली


सब बाजार हैं बाबू ! सब ऐयार हैं बाबू !

सब मालदार हैं बाबू ! सब खरीदार हैं बाबू !


यहाँ हर दाम पर चाम भी बिकता है

यहाँ हर चाम पर ईमान भी बिकता है

यहाँ हर ईमान पर नाम भी बिकता है

यहाँ हर नाम पर ईनाम भी बिकता है


सब चालबाज हैं बाबू ! सब दगाबाज हैं बाबू !

सब अंटीबाज हैं बाबू ! सब धोखेबाज हैं बाबू ! 


अब ये मत पूछिए कि खरा कौन है

अब ये मत पूछिए कि हरा कौन है

अब ये मत पूछिए कि भरा कौन है

अब ये मत पूछिए कि मरा कौन है


सब कसाव हैं बाबू ! सब बचाव हैं बाबू !

सब ऐराब हैं बाबू ! सब नवाब हैं बाबू ! 

Friday, March 26, 2021

फागुन की रातें हैं ........

ललछौंहाँ लगन लगी है , उकसौंहाँ बातें हैं

पर कुछ कहते हुए अधर क्यों थरथराते है ?

फागुन की रातें हैं


यह किस बेबुझ-सा गान पर थिरक रहा मन ?

भ्रमरावलियों बीच कौन है वो अछूता सुमन ?

जो छू कर बेसुध स्वरों में रागों को है जगाता 

उसकी छुअन से सारे फूल भी खिल जाते हैं

फागुन की रातें हैं


अपने मधु-गंध से ही साँसों को महकाने वाला

अहम् रूप को भी पिघला कर पी जाने वाला

कमनीय कामनाओं को है जगाकर उकसाता 

पर बड़ी मीठी कटारी-सी ही उसकी ये घातें हैं

फागुन की रातें हैं


हवाओं की बाँहें फैला कर वो ऐसे बुलाता है

न चाहते हुए भी मन उसी ओर खींच जाता है

रंगरलियों की ये गलियां , बहार और मधुमास

अजब अनोखा भास में उलझाकर ललचाते हैं

फागुन की रातें हैं


उसकी निखरी निराली छवि कितनी न्यारी है

तरल-चपल सी गतिविधियां भी सबसे प्यारी है

उसके आगे संसार का सब रंग-रूप है फीका

उसको प्रतिपल अर्पित मृदु नेह मन को भाते हैं

फागुन की रातें हैं


जैसे शाश्वत वर सज-संवर कर उतर आता है

सप्तपदी पर अनगिन-सा भाँवर पड़ जाता है

और षोडशी षोडश-श्रृंगार करके है लजाती 

दोनों आलिंगित हो श्वासोच्छवास मिलाते हैं

फागुन की रातें हैं


लचकौंहाँ लगन लगी है, उलझौंहाँ बातें हैं

पर कुछ कहते हुए अधर क्यों थरथराते हैं ?

फागुन की रातें हैं . 

    

            *** होली की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

*** फगुनाये आनन्द से उन्मत्त जनों को हार्दिक आभार ***

Sunday, March 21, 2021

मन हुआ विहंग ....

उड़-उड़ बैठना 

बैठ-बैठ पैठना

पैठ-पैठ ऐंठना

ऐंठ-ऐंठ ईठना


अमृत-सी तरंग 

रोम-रोम उमंग

फड़के अंग-अंग

मन हुआ विहंग


वश-अवश कल्पना

तिक्त-मृदु जल्पना

बंध-निर्बंध कप्पना

सीम-असीम मप्पना


विकस रही कला

राग रंग चला

भव फूला-फला

लगे जीवन भला


मद मत दर्पना

नित निज अर्पना

सोई सर्व समर्पना

रीत-रीत सतर्पना

*** विश्व कविता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

   *** कविता के रसिकों को हार्दिक आभार ***

Monday, February 22, 2021

रति और पार्वती संवाद ......

रति की मूर्च्छा टूटी तो एक तरफ गूंज रही थी देववाणी की छलना

दूसरी तरफ उसकी उत्कट वेदना का सूझ रहा था कोई भी हल ना

व्याघातक दुर्भाग्य दंड से हत , गलित , व्यथित , शोकाकुल रति को

झुला रहा था विकट , विकराल , विभत्स , विध्वंसक मायावी पलना


तत्क्षण ही वह निज प्राण को तज दे या कि वह चिर प्रतीक्षा करे

या हृदय में अभी देवों और ॠतुपति के द्वारा दिए कल्प शिक्षा धरे

या कि उसके अंगस्वामी कामदेव जब तक पूर्ण सुअंग को न पाए

तब तक वह पतिव्रता निज अंग को पति के लिए क्यों न रक्षा करे


अकस्मात क्षीण-सी स्मृति भी कौंध आई माँ-पिता और बहन की

शापवश ही सही पर हश्र का कारण तो हुए है जो उसके मदन की

निश्चय किया कि जाकर पूछूं कि क्यों अकेले यहाँ मुझे वे छोड़ गए

क्रोधबल को पा उसकी बलवती हुई संचित क्षमता संताप सहन की


मदन-दहन सुन कर शैलराज हिमालय क्योंकर दौड़े-दौड़े आए थे

पिनाकपाणि के भय से भयभीत सुता की दशा देख के घबराये थे

क्या मेरी सुधि तनिक भी न आई कि मैं भी तो उनकी ही जाया हूँ

क्या निज अभिलाष को टूटा हुआ देखकर मन ही मन वे घबराये थे


मेरी आंखों के सामने ही उस एक क्षण में ही ये कैसा अनर्थ हो गया

गौरा की काया का पुलक पूर्ण अवयवों का विक्षेप भी व्यर्थ हो गया

पर यदि शूलपाणि का ही चित्त चंचल नहीं होता तो मैं भी मान लेती 

कि पुरुषार्थ के समक्ष मूल्यविहीन , आकर्षणविहीन स्त्र्यर्थ हो गया


सृष्टि साक्षी है कि जितेंद्रियों का भी वश नहीं चला है स्त्रियों के आगे

तीनों लोक डोल जाता है जब स्त्रियों का सुप्त पड़ा अहंकार जो जागे

पार्वती के दृढ़ संकल्प , विश्वास और निश्चय को कौन नहीं है जानता

भूतनाथ अपने भूतों और गणों के संग जब तक भागना चाहें तो भागे


यदि लज्जा वश , संकोच वश स्त्रियां खुल कर कुछ नहीं कह पाती हैं

तो उसे निर्बल , असहाय , निरुपाय कह-कहकर ही जगती बुलाती है

क्यों पुरुषत्व को भी स्त्रीत्व के ही शरण में पुनः-पुन: आना पड़ता है 

तब तो समर्पित स्त्रीत्व अपना होना भी त्याग कर सृष्टि आगे बढ़ाती है


ये सोचकर अपने कंधों पर अपना ही क्षत-विक्षत हुआ शव को ढोकर

थरथराते-लड़खराते , गिरते-पड़ते मग से पग-पग पर खाते हुए ठोकर

पथराई-सी आंखों में अविश्वसनीय-सा उस दारूण दृश्य को लिए हुए

चल पड़ी विह्वल रति विंध नव वैधव्य के व्यसनार्त में मूर्छित हो-होकर


उस क्षण दिनकर के रहते ही चहुंओर घिर आया था घोर तम का बसेरा

ह:! ह:! विलाप ! उसके सम्मुख ही कैसे डूब गया था उसका ही सबेरा

रह-रह कर उभरता त्रिपुरान्तकारी त्रिलोचन का वो क्रुद्ध कोपानल ही

उसके हर डग पर द्रुत बिजली की भांति ही जैसे कर रहा था उग्र उजेरा


चलो माना !  इस सृष्टि की रक्षा हेतु निमित्त हुआ पंचपुष्प शर सन्धानी

दैवीय प्रपंच के कुटिल व्यूह में फंस मेरा मनोज हुआ आत्म बलिदानी

पर अंतिम श्वास तक मेरा साथ निभाने का मुझको अटूट वचन देकर 

हाय ! हाय ! हाय ! क्यों मेरे इस करुण दुःख से वही ऐसे हुआ अज्ञानी


मेरी आर्त हृदय की ऐसी चित्कार से निष्ठुर परमात्मा भी क्यों नहीं पसीजे

क्षमा करो अब आ भी जाओ , मुझे छोड़कर कहाँ चले गए मेरे मनसिजे 

मेरी न सुनो न सही पर अपने सखा को सोचो कि बिन तुम्हारे क्या होगा

हे मन्मथ ! अभिमान रूप ॠतुराज की आंखें भी वर्षाकाल के जैसे भीजे


मेरे मनोभव ! दुःख है तेरे संग संसार का सुख के उद्गम का नाश हो गया

कल जो तुमने कुसुम शय्या सजाया था आज शोक-सर्प का पाश हो गया

अब तो स्मृतियों में ही तेरा दिव्य रूप दिखेगा और सब का समागम होगा

हे पंचशायक ! पापी दैव और काल के चाल में कैसा ये सत्यानाश हो गया


विदग्धा रति मायके पहुंची यूं ही अनर्गल प्रलाप और विलाप करते-करते 

झुकी हुई आंखों से शैलराज ने उसे देखा मगर भीतर-ही-भीतर डरते-डरते

मरण-शय्या पर लेटी पार्वती थी और सिराहने में माँ मैना भी बुझी बैठी थी

सबके गले लग कर बिलख उठी रति और बोली क्यों वह बच गई मरते-मरते


जो मेरे आत्मभू का सृष्टि हेतु शुभ प्रयोजन न जाने स्वयंभू वे कैसे अन्तर्यामी हैं 

काम से मुख फेर लिया किन्तु क्रोध को जो जीत न पाए तो वे भी वृत्तिगामी हैं

ब्रम्ह विधान में विघ्न डालना कोई उनसे जा के पूछे कि क्या यही है पुरुषोचित 

इतना सबकुछ होने पर भी जग उनको ही पूजेगा क्योंकि वे तो औढरदानी हैं 


जी भर सुनने के बाद गौरा बोली चाहे जो हो जाए पर प्रण मैं निभा कर रहूंगी

जिसको मैंने मन में वरण किया है अब उसी को अपना पति बना कर रहूंगी

मुझ पर आंख बंद करके भरोसा रख और जरा धीरज धर मेरी प्यारी बहना

उसी भोले-भाले त्रिलोचन के प्रसाद से ही तेरे पति को भी जिला कर रहूंगी.


Tuesday, February 16, 2021

बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया ! ...

बड़ी मुश्किल से , मैंने हवाओं से 

होड़म-होड़ करना छोड़ा था

फिरी हुई सिर लेकर , सबसे यूँ ही

बिन बात के भी , टकराना छोड़ा था

अपने बौड़मपन को , बड़े प्यार से 

समझा-बुझाकर , बहला-फुसलाकर

शांत , गूढ़ और गंभीर बनाया था

पर ये क्या ? किसने मुझे भरमा दिया ?

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


अल्हड़ , नवयौवना , रूप-गर्विता बनकर

मैं इधर-उधर , यूँ ही इतराने लगी हूँ

अपने सौंदर्य में ही केसर , कुमकुम , चंदन

घोल-घोल कर , सबपर लुटाने लगी हूँ

मेरी आंखें क्यों हो रही है नशीली ?

और बातें भी क्यों हो रही है रसीली ?

क्या मुझे मत्त मदिरा पिला , मदकी बना दिया ?

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


सुबह ने मेरे माथे को , चूम-चूम कर ऐसे जगाया

और अंगड़ाईयों से मुझे , खींच जैसे-तैसे छुड़ाया

मैं भी अलस नयनों की , बेसुध खुमारियों को

गरम-गरम चुसकियों से , जगाए जा रही थी

कि सूरज की उतावली किरणों ने हरहराकर

मुझे ही , हर कोने-कोने तक , बिखरा दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


यूँ ही टहलते हुए , झील पर , पंछियों से 

अपने को , हँसना-बोलना , सिखा रही थी

पिघलती हुई पहाड़ियों के , नरम-नरम ओंठो पर

अपनी मन बांसुरिया को , रख कर बजा रही थी

कि आप ही आप , मधुरतम मिलन का स्वर

गा-गा कर मुझे , सब दिशाओं में , गूंजा दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


फिर मैं तो , खेल-खेल में ही , ऊंगलियों को

अपने लटों से , उलझा-पुलझा रही थी

जानबूझकर उधेड़-बुन में पड़ी हुई

कुछ पहेलियों को , समझा-बुझा रही थी

कि हजारों फूलों की सुगंधि , आलिंगन में भर कर

यहाँ-वहाँ , जहाँ-तहाँ , मुझे ही बिखेरकर , महका दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


दौड़ते-भागते , गिरते-पड़ते ,  दिन को रोक कर

सोचा कि , थोड़ा आंचल का छांव दे दूँ , इसलिए

दादी-नानी वाली , बात-बात पर टोकारा से , टोक कर

कहा कि दम भर सुस्ता ले , थोड़ा पांव दबवा ले

उससे कलेऊ का  , बियालु का , आग्रह कर रही थी 

कि मुझे ही कंधे पर बिठा कर , सब छोर घुमा दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


ठिठोली में ही , साँझ की बड़री कजरारी , आंखों को 

करपचिया काजलिया से , आंज कर मैं सजा रही थी

झीनी-झीनी बदरिया की भी , भोली-भाली अलकों को

रोल-रोल कर , मुकुलित मुखड़े पर , छितरा रही थी

कि अचानक चारों ओर , शत-शत दीप जल गये

मुझे ही उजालों से भरकर , सारे जग में जगमगा दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


मैं तो बड़ी मीठी , कुनकुनी , अपनी ही नींद को

हाथों के हिंडोले में , हिला कर सुला रही थी 

किसी उस अनजाने को भी , सपनों में बुला रही थी 

कि रात ने आकर , बड़े प्यार से , ऐसे जगाया और

मुझे ही अपनी गोद में उठा , बाहर ले जाकर 

चांद-तारों के , अछूते सौंदर्य से , पूरा नहला दिया

या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !


अब मेरे बचाव में , बसंत को ही , कुछ कहना पड़ेगा

सारे करतबी करतूतों का , भंडाफोड़ भी , करना पड़ेगा

कि बड़ी मुश्किल से , कैसे अपने को , संभाले हुई थी

और रटा-रटा कर , शालीनता का पाठ , पढ़ाए हुई थी

मैं इतना ही कह सकती हूँ , इसमें मेरा कोई दोष नहीं है

सच में ! किसी ने मुझपर , काला जादू चलवा दिया

या शायद बसंत ने ही मुझे फिर से बहका दिया ! 

*** बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

Friday, February 12, 2021

कोई इरादा नहीं है ......

किसी की

आँखों में उंगलियाँ डालने का

कोई इरादा नहीं है

कानों पर जमें पहाड़ों को

सरकाने का भी कोई इरादा नहीं है

नाकों में उगे घने जंगलों की

छंटाई का भी कोई इरादा नहीं है

मरे हुए चमड़ों को बहते खून तक

खुरचने का भी कोई इरादा नहीं है

और लपलपाते जीभ से टपकते जहर को 

बुझाने का भी कोई इरादा नहीं है

कोई इरादा नहीं है कि 

मृतप्राय जीवाश्मों-सा

कोई भी अन्य लोलुप इन्द्रियाँ 

मुझे देखे , सुने , सूंघे या छुए

मेरी इजाजत के बगैर

क्योंकि मेरा होना , हँसना , बोलना

किसी प्रमापक पर आश्रित नहीं है

उन आश्रितों पर तो

हरगिज आश्रित नहीं है

जो खुद अभिशप्त हैं

अमृत को ही जहर को बनाने के लिए 

और प्रतिगत जहर ही पाने के लिए

जिन्हें ये भी पता नहीं चलता है कि

वे अपनी जीवन दायिनी को भी

उसी जहर से विषाक्त कर देते हैं 

फिर भी उन्हें क्षमा दान मिलता रहता है .


Tuesday, February 9, 2021

क्षणिकाएँ .........

दर्द के दरारों से 

रिसते जख्मों को 

वक्त के मलहम से छुपाना

नाकाम कोशिशें ही

साबित होती है


     ***


कभी-कभी 

कतरनों को कुतरने में

दिल को जितना सुकून मिलता है

उतना तो पूरा मज़मून

हज़म कर के भी नहीं मिलता है 


     ***


दूसरों के अफवाहों में

अपनी मौजों का

घुसपैठ कराना

रेत पर गुस्ताखियों का

सैलाब लाने जैसा है


     ***


हर हारे हुए खेल को

ताउम्र खेलने में

जो मजा है

वो किसी भी

जबर जीत में नहीं है 


     ***


छिने हुए को

वापस छिनने की 

खूबसूरत जिद भी

दिल को गुमराह 

करने के लिए काफी है .

Friday, February 5, 2021

प्रेम कलह के इस रुत में ........

प्रेम कलह के इस रुत में

मधुर , तिक्त , अगन अहुत में

नियति ने ही जलाया है तो

मेरे प्यारे परदेशी पिया !

भलमानसता से , नेम निष्ठा से

मिलन रुत आने तक

निजदेशी हो , परदेश ही रहना 

हाँ ! वर्णज्वर मैं सहती हूँ 

वर्णज्वर तुम भी सहना !


आते भी तो , दीर्घ कचोट कलह से

जानी-बूझी , सोची-समझी , अलह से

तुमसे न बोलती-बतियाती

अनदेखा कर के , सारा प्रणय उपक्रम

भीतर ही रिझती , सिझती और तुम्हें खीझाती

पर न तुम्हारा , कोई पुचकारी पतियाती


मुँह फुलाये , भौं चढ़ाए , लट बिखराये

सोई रहती , उस ऊँची अटारी 

और तुम , लाख मान-मनौव्वल , करके न थकते

किंतु ! मैं कल कलही , रार ठानकर

प्रेम मिलन के , उस रुत में भी , खोलती नहीं 

अपने रंग महल का , कोई किवाड़ी


प्रेम कलह के इस रुत में

पल-पल , कलकल , लगन आयुत में

हास-उपहास , राग-उपराग हुआ है

कल्प कलेवरों का , खेल-खिलौना

जैसे कनखी ही कनखी में 

हो रहा हो , कोई नेही टोटका-टोना

या चहुंओर एक-दूजे का , हो खुला आमंत्रण

या मोहन-सम्मोहन का , हो जंतर-मंतर 

या कि कर गया हो कोई , विवश-सा वशीकरण


मुझ पर भी , छाया भरम या कि खुमारी है

या कि बहकी-बहकी बातें , मेरी लाचारी है

जबसे पिया तुम परदेशी हुए 

तबसे क्यों लगता है मुझको ?

कि नित प्रात से , लड़ती रहती रात है

हो न हो , कहीं मेरी ही कोई बात हो

तब तो पपीहों का , यूँ बदला-सा गान है 

चिड़ियों की चहचहाहट भी , मेरे उलाहनों का तान है 


संभवतः प्रेम कलह से ही , आकाश से अवनी भी है रूठी

क्यों प्रेम और विरह की , हर कथा है अनूठी

पर परदेशी पिया !  तुम भी हो अनूठे , पर हो झूठे

क्या जानूं कि ,  मैं हूँ रूठी , या कि तुम हो रूठे

जो भी हो , बस समझो , जो हृदय की बात है 

इस रुत पर , बड़ा भारी , विरही आघात है 


प्रेम कलह के इस रुत में

हर पल रहती हूँ ,  तेरे ही युत में

तुमसे मैं भी लड़ती , मन ही मन में

क्या कहूँ ? तेरे बिना , कुछ नहीं है जीवन में

मेरे प्राणप्यारे परदेशी पिया !

जितनी जल्दी हो सके , तुम आना

अपनी सौं , कोई कलह न करूं मैं तुमसे

बस ,  मिलन रुत संग लिए आना . 

Sunday, January 31, 2021

बसंत आने का लक्षण है ? .......

पात-पात फुदकन 

गात-गात मुदकन 


हर शोक का हरण है

बसंत आने का लक्षण है ?


बिखरी-बिखरी कस्तूरी

निखरी-निखरी अंकूरी


रस-रूप का उपकरण है

बसंत आने का लक्षण है ?


देहरी-देहरी सिंदुरी

रेहरी-रेहरी अबीरी


उल्लास का उच्चरण है

बसंत आने का लक्षण है ? 


सिकुड़ी-सकुड़ी साँसें

उखड़ी-उखड़ी टाँसें


बड़ा मीठा-सा मरण है

बसंत आने का लक्षण है ?


अंग-अंग गदरीला

संग-संग सुरभीला


बावले युगलकों का वरण है

बसंत आने का लक्षण है ?


ताल-ताल थिरकन

चाल-चाल बहकन


विगत का विस्मरण है

बसंत आने का लक्षण है ?


राग-राग मल्हार

फाग-फाग विहार


पुलक का प्रस्फुरण है

बसंत आने का लक्षण है ? 

Thursday, January 28, 2021

अनुरागी चित्त ही जाने .......

अनुरागी चित्त ही जाने 

अनुरागी चित्त की गति

श्रृंगारित स्नेहित स्पंदन  

मंद-मंद मद-मत्त मति


ऊब उदधि नैनों से उद्गत 

ॠतंभरा की ॠणि उदासी

मख-वेदी में मन का मरम

हिय बीच हिलग प्यासी


सोन चिरैया सुख सपना

विकट विदाही विकलता

कली से कमलिनी का क्लेश

क्षण-क्षण क्षत हो छलकता


रस रसिकों को ज्ञात कहाँ

कि रचना रक्त से रचती है

चिर-वियोगी चित्त की चिंता

प्रघोर पीड़ाओं से गुजरती है .

Sunday, January 24, 2021

पर काल से परे हो ......

जो तुम्हें रचे

कहो तो भी बचे

जो बचे उसे रचो

रचो तो मत बचो

स्वयं संकल्प हो

विपुल विकल्प हो

अनंत उद्गार हो

अनुभूति की टंकार हो

सबकी कसौटी पर खरी हो

सापेक्ष सत्य पर अड़ी हो

शब्द छोटे हो 

अर्थ बड़े हो

काल की बात हो

पर काल से परे हो .


Wednesday, January 20, 2021

अवशेष .....

मानसिक विलासिता के 

सोने के जंजीरों से 

सिर से पांव तक बंधे हुए 

अमरत्व को ओढ़कर

मरे हुए इतिहास के पन्नों पर 

अपने नाम के अवशेष से

चिपकने की बेचैनी

खुद को मुख्य धारा में

लाने की छटपटाहट

चाय की चुस्कियां

आराम कुर्सियां

वैचारिक उल्टियां

प्रायोजित संगोष्ठियां

मुक्ति की बातें

विद्रुप ठहाके

इन सबमें

एक दबी हुई हँसी 

मेरी भी है .

Thursday, January 14, 2021

पुनः प्रथम मिलन ..........

 इस शीत ॠतु में भी , स्वेद-कण ऐसे चमक रहे हैं

हृदय से ह्लादित होकर , रोम-रोम जैसे दमक रहे हैं

यह अद्भुत संयोग भी हो रहा है , हमारा ही आभारी 

और हमारी सुगंध से , गहक कर कैसे गमक रहे हैं


कैसे आवेशित हो गया ,  इस जगती का कण-कण

जैसे प्रचंड कंपन से ,  डोल गया हो यह धरती-गगन

साक्षी होकर सृष्टि भी ,  अचंभित हो गई होगी ऐसे

जैसे शिव-शक्ति का ही , हुआ हो पुनः प्रथम मिलन


अब आत्मस्मरण ओढ़ रहा है , क्षीणता का आवरण

तरंग हीन हो कर , कहीं और अंतर्धान हुआ यह मन 

विश्रांति की इस बेला में , वज्र नींद आकर कह रही 

संयोग श्रम से ही श्लथ हुआ है ,  तेरा तंद्रित यह तन


अब तो एक तरफ है , पलकों पर , नींद की प्रबलता

और दूसरी तरफ है , तुम्हारे इन हाथों की कोमलता

जो तुम ऐसे सहला-सहला कर , मुझे यूँ सुला रहे हो 

तो अधरों को भी रोको न , अब इतना क्यों है चूमता


माथे , आँखों , गालों , अधरों पर ,  तेरा स्मित चुंबन

इन लटों में , फिरती हुई सी उंगलियों की ये थिरकन

वो बैठी नींद भी आँखें खोलकर , देख रही है हमें ही

और मुस्कुराये जा रही है , पोरों की मीठी-सी थकन


छोड़ो भी , अब झूठ-मूठ का मुझे , यूँ ही न सहलाओ

बाहों में छुप कर सोने दो मुझे , औ' तुम भी सो जाओ

सरस , सम्मोहक सपने भी , सज-संवर कर आने को

प्रतीक्षारत हैं , उनका भी नींद से मधुर मिलन कराओ


हा! तुम्हें ऐसे लय लोरी गाने को , अब कौन बोल रहा है

जैसे उत् शीतलता में , कोई उष्ण मादकता घोल रहा है

ये चुंबन और ये सहलाना , ऊपर से ये उन्मुग्ध लोरी गाना

अठखेलियां तो कह रही है , तुम्हारा मन फिर डोल रहा है


मुझे सुला रहे हो , या सच-सच कहो कि सुलगा रहे हो

चंदन-सा तन हुआ है , फिर से क्यों अगन लगा रहे हो

अगन जब लग जाएगी तो , आहुत तुम्हें ही होना होगा

क्यों अनंगीवती को फिर से छेड़ ,  तुम ऐसे जगा रहे हो


अनंगीवती जो जागेगी तो , फिर उसे सुला न पाओगे

सब जान-बूझकर भी , अनंगदेव को फिर से हराओगे

जानती हूँ , हमसे हार के भी तुम्हें सत् सुख मिलता है 

पर इस तरह जीताकर , मुझे दुष्पुर दुख ही पहुँचाओगे


ये निंदासी निशी भी , अब कुहरे से लिपट कर सो रही है

शनै: शनै: आनाकानी , मनमानी की अनुगामी हो रही है

पुनः ये पुण्यतम क्षण , निछावर हो रहा है चरणों पर तेरे

औ' सौंदर्य लहरियां संयोगक्रीड़ा में घुल-घुल कर खो रही है .


Sunday, January 10, 2021

क्षणिकाएँ .......

आज कल शब्दों में          

अर्थो की अधिकता

यह बताता है कि 

हम कितने 

चतुर और चालाक

हो गए हैं .


*****


शब्दों के अर्थ

जब अनर्थ होने लगे

तो साफ है कि

बाजार ज्यादा से ज्यादा 

घातक हथियारों की 

आपूर्ति चाह रहा है .


*****


शब्द जब-तब

अपशब्दों के सहारे

शक्ति प्रदर्शन करे तो

सोची-समझी रणनीतियां

अपना दांव 

खेल चुकी होती है .


*****


शब्द जब

गणित के सूत्रों को

हल करने लगे तो

अपेक्षित परिणाम

सौ प्रतिशत से

कुछ ज्यादा ही होता है .


*****


अनचाहे शब्द 

पीछे लौटकर

पछताने से इंकार करे तो

उसकी पीठ ठोंकने वालों में

समझदारों का 

हाथ ज्यादा होता है .

*** विश्व हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

Thursday, January 7, 2021

"ब्लॉगिंग-सा दिल पर" ........

"पहले जी" गये "दूसरे जी" के घर 

"दूसरे जी" गये थे "तीसरे जी" के घर 

धत् ! पता चला कि 

"तीसरे जी" भी गये हुए हैं "चौथे जी" के घर

फिर "पहले जी" जब गये "चौथे जी" के घर पर

तो वो "महाशय जी" भी थे सिरे से नदारद.…...


तो क्या करते बेचारे "पहले जी"

अपना मुँह लटकाए वापस चले आए अपने घर 

और बाट जोहने लगे अपने खिड़की-किवाड़ों को पकड़

कि भूले भटके ही सही "कोई तो" आए उनके घर 

थोड़ा-सा ही सही मगर दौड़े तो "आह-वाह" की लहर

और किसी भी "जी" के ना आने पर 

"पहले जी" मायूस होते रहे जी भर-भर कर

कुछ ऐसा ही है अपने ब्लॉगिंग का सफर .....


अगर "सबके-सब" बिन बुलाए ही तांता लगा कर

शौक से जब आने लगें आपके घर 

तो आप भी बड़े आराम से खुद को समझिए

अपने आपको एकदम से बड़का "कलक्टर"

और खूब करते रहिए बकर-बकर

सब लगाते रहेंगे आपको तरह-तरह से बटर

ताकि आप लुढ़कते रहें फिसल-फिसल कर

फिर सब मजा लेते रहेंगे ताली पीट-पीट कर

कुछ ऐसा ही है अपने ब्लॉगिंग का सफर........


अजी! हम भी अपनी बात कह देते हैं 

जरूरत से कुछ ज्यादा ही खुलकर 

लेकिन साथ में दोनों हाथों को जोड़ कर

प्यार से वैधानिक चेतावनी भी देकर 

कि इस हल्के-फुल्के मजाक को

कृपया कोई न लें अपने "ब्लॉगिंग-सा दिल पर"

कभी-कभी हँसना और हँसाना भी चाहिेए

अपने-आप को सबसे बड़ा "कलक्टर" बनाना भी चाहिए.…...


तो आइए ! सब हँसे खूब लोट-पोट कर

और जो-जो न हँसे उन्हें भी हँसाएं टोक-टोक कर

उनका नाक-कान , पैर-हाथ पकड़-पकड़ कर

अगर फिर भी वो न हँसे तो भी हँसाएं

उनके पेट को जोरदार गुदगुदी से जकड़-जकड़ कर

क्योंकि कुछ ऐसा ही है अपने ब्लॉगिंग का सफर . 

Monday, January 4, 2021

उधार का ज्ञान बहुत है ........

मेरे पास भी इधर-उधर से उधार का ज्ञान बहुत है 

उसे भांति-भांति से सत्य साबित करने के लिए

उल्टा-पुल्टा , आड़ा-तिरछा , टेढ़ा-मेढ़ा प्रमाण भी बहुत है 

पोथा पर पोथा यूँ ही नहीं लिख कर दे मारी हूँ

नये-पुराने सारे विषयों का अधकचरा खान बहुत है

अगर किसी सभा में अंधाधुंध जो बांचने लगूं तो

देखने-सुनने वाले की नजरों में मान-सम्मान भी बहुत है....

तब तो मानद उपाधियां मेरे चरणों तले

रंग-बिरंगे कालीनों के जैसे बिछी रहती हैं

और सारे पुरस्कारों की लंबी-लंबी कतारें 

हर अगले को धक्का लगा-लगा कर गिनती है ....

ये हाल है कि छोटे-बड़े राजा-महाराजा मुझे 

अपनी दरबार की सुन्दरतम शोभा बनाना चाहते हैं

मेरे छींकने से ही बिखरे हुए मोती जैसे ज्ञान को भी

अपने , उसके , सबके सिर-माथे पर सजाना चाहतें हैं .....

देख रही हूँ अभी से ही मेरे लिए जगह-जगह पर

किसिम-किसिम के अभिलेख , शिलालेख खुदवाये जा रहे हैं

और सब भयंकर ज्ञानियों को छोड़ कर ज्ञानी नम्बर एक पर

मेरे ही नाम , सर्वनाम , उपनाम गुदवाये जा रहे हैं ......

जब सबसे ज्यादा बिकाऊ उधारी ज्ञान का ये हाल है तो

सोचती हूँ अपना ज्ञान जो होता तो और क्या-क्या होता

अरे ! कोई तो मेरा अपना ज्ञान मुझे सूद समेत लौटा दो

ऐसा जबरदस्त घाटा लगाकर मेरा मन बहुत जोर-जोर से है रोता .