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Friday, February 12, 2021

कोई इरादा नहीं है ......

किसी की

आँखों में उंगलियाँ डालने का

कोई इरादा नहीं है

कानों पर जमें पहाड़ों को

सरकाने का भी कोई इरादा नहीं है

नाकों में उगे घने जंगलों की

छंटाई का भी कोई इरादा नहीं है

मरे हुए चमड़ों को बहते खून तक

खुरचने का भी कोई इरादा नहीं है

और लपलपाते जीभ से टपकते जहर को 

बुझाने का भी कोई इरादा नहीं है

कोई इरादा नहीं है कि 

मृतप्राय जीवाश्मों-सा

कोई भी अन्य लोलुप इन्द्रियाँ 

मुझे देखे , सुने , सूंघे या छुए

मेरी इजाजत के बगैर

क्योंकि मेरा होना , हँसना , बोलना

किसी प्रमापक पर आश्रित नहीं है

उन आश्रितों पर तो

हरगिज आश्रित नहीं है

जो खुद अभिशप्त हैं

अमृत को ही जहर को बनाने के लिए 

और प्रतिगत जहर ही पाने के लिए

जिन्हें ये भी पता नहीं चलता है कि

वे अपनी जीवन दायिनी को भी

उसी जहर से विषाक्त कर देते हैं 

फिर भी उन्हें क्षमा दान मिलता रहता है .


28 comments:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (१३-०२-२०२१) को 'वक्त के निशाँ' (चर्चा अंक- ३९७६) पर भी होगी।

    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    अनीता सैनी

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  2. बहुत गहरी अभिव्यक्ति अमृता जी ❗🙏❗

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  3.  जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना आज शनिवार 13 जनवरी 2021 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी सादर आमंत्रित हैं आइएगा....धन्यवाद! ,

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  4. This comment has been removed by the author.

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  5. सुंदर अभिव्यक्ति

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  6. चिंतन से परिपूर्ण आपकी रचना काबिले तारीफ है..आप यूं ही लिखती रहें..शुभ दिवस

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  7. कव‍ित्व भरी चेतावनी...ललकार..क्या कुछ नहीं है इन पंक्त‍ियों में..वाह ..उन आश्रितों पर तो

    हरगिज आश्रित नहीं है

    जो खुद अभिशप्त हैं..बहुत खूब

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  8. उन आश्रितों पर तो

    हरगिज आश्रित नहीं है

    जो खुद अभिशप्त हैं
    एक-एक शब्द में दुःख-दर्द के साथ-साथ एक ललकार भी

    बहुत सुंदर ही अभिव्यक्ति,अमृता जी

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  9. Spice Money Login Says thank You.
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  10. सोच रहा हूँ अच्छी कविता लिखकर निकल लूँ लेकिन ऐसा हो नही पाया। कविता क्रोध, व्यंग और आर्तनाद को समष्टिगत अनुभव बन गई है। स्वर्णपीत वासुकियों,नील हरित कर्कोटकों, और रक्त वर्ण तक्षकों को संबोधित करती अद्भुत रचना।

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  11. घायल निजता माफ़ भले कर दे लेकिन भूलती हरगिज़ नहीं है. कविता पूरी बात कह गई है.

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  12. बहुत सुन्दर व अलहदा सृजन।

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  13. क्योंकि मेरा होना , हँसना , बोलना

    किसी प्रमापक पर आश्रित नहीं है

    उन आश्रितों पर तो

    हरगिज आश्रित नहीं है

    जो खुद अभिशप्त हैं----

    बहुत गहरी कविता...। बहुत गहरे और चुभते शब्द। बधाई आपको।

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  14. जो खुद अभिशप्त हैं

    अमृत को ही जहर को बनाने के लिए

    और प्रतिगत जहर ही पाने के लिए

    जिन्हें ये भी पता नहीं चलता है कि

    वे अपनी जीवन दायिनी को भी

    उसी जहर से विषाक्त कर देते हैं

    फिर भी उन्हें क्षमा दान मिलता रहता .... सारगर्भित और गूढ़ प्रश्न उठाती बेहतरीन रचना..

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  15. लाजवाब बेहतरीन

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  16. अति संवेदनशील रचना। ।।।।।
    विचारणीय प्रस्तुति हेतु बधाई आदरणीया।

    बसंतोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ। ।।।

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  17. चिंतनशील ... प्रतीक और बिम्ब के माध्यम से गहरी बात कही है ...

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    1. कृपया एक बार मेरे ब्लॉग को देख लीजिए और अपनी राय व्यक्त की की अति कृपया होगी🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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  18. Replies
    1. कृपया एक बार मेरे ब्लॉग को देख लीजिए और अपनी राय व्यक्त की की अति कृपया होगी🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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  19. अति उत्तम, बहुत ही सुंदर

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    1. कृपया एक बार मेरे ब्लॉग को देख लीजिए और अपनी राय व्यक्त की की अति कृपया होगी🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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  20. बहुत सुंदर अंदाज़ में लिखी बेहतरीन रचना

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