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Sunday, November 13, 2022

मेरे शिव ! तेरी जटा में अब कैसे समाऊँ ? ......

हाँ ! तेरे चरणों पर, बस लोट- लोट जाऊँ

हाँ ! माथा पटक- पटक कर, तुम्हें मनाऊँ

बता तो हृदय चीर- चीर, क्या सब बताऊँ ?

मेरी हरहर- सी वेदना के प्रचंड प्रवाह को

मेरे शिव ! तेरी जटा में अब कैसे समाऊँ ?


भगीरथ- सी पीर है, अब तो दपेट दो तुम

विह्वल व्यथा अधीर है, अब चपेट दो तुम

ये व्याधि ही परिधीर है, अब झपेट लो तुम 

बस तेरी जटा में ही, बँध कर रहना है मुझे 

अपने उस एक लट को भी, लपेट लो तुम 


हाँ ! नहीं- नहीं, अब और बहा नहीं जाता है

हाँ ! विपदा में, अब और रहा नहीं जाता है

इस असह्य विरह को भी, सहा नहीं जाता है

तू बता, कि कैसे और क्या- क्या करूँ- कहूँ ?

वेग वेदना का, अब और महा नहीं जाता है 


कहो तो ! अश्रुओं से चरणों को पखारती रहूँ

क्षतविक्षत- सी लहूलुहान हो कर पुकारती रहूँ

कभी तो सुनोगे मेरी, मानकर मैं गुहारती रहूँ

मेरी वेदना बाँध लो अब अपनी जटा में मेरे शिव !

या दुख-दुखकर ही तुम्हें टेरनि से पुचकारती रहूँ ?


Sunday, November 6, 2022

मुग्ध उन्नत चेतना भी ..........

नई- नई अनुभूतियों का उन्मेष हो रहा है

शत- शत लहरियों के संग कोई खो रहा है

गगन में जैसे निर्बंध बहती वायु डोलती है

मुग्ध उन्नत चेतना भी न जाने क्या बोलती है ?


प्राणों से प्रतिध्वनि सुन कोई ध्वनि खोजता है

प्रणयी पुदगल को कोई निर्वेद-सा सरोजता है 

जैसे उमगित अंग तट के पार कुछ उमड़ती है 

वैसे ही परितृप्त हृदय में भी तृष्णा घुमड़ती है


जैसे रतकूजित कलियाँ चटक कर महमहाती है

जैसे सृष्टि गर्भकेसरिया- सी और फैल जाती है

कण- कण अनगिन स्फुरणाओं से डगमगाता है

एक व्याप्ति- सी छाती है, वय सिमट जाता है 


उस तल पर कुछ और से भी और घट जाता है

तब तो वह अनकहा भी चुप कहाँ रह पाता है ?

सूक्ष्म अनुभूतियाँ किंचित ही स्वर पा जाती हैं 

और विकलता उस अभिव्यक्ति से छा जाती है ।