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Wednesday, March 31, 2021

सब नवाब हैं बाबू ! .......

कोई महल बेचता है तो कोई खोली

कोई बारूद बेचता है तो कोई बोली

कोई कटार बेचता है तो कोई रोली

कोई गुलाब बेचता है तो कोई गोली


सब बाजार हैं बाबू ! सब ऐयार हैं बाबू !

सब मालदार हैं बाबू ! सब खरीदार हैं बाबू !


यहाँ हर दाम पर चाम भी बिकता है

यहाँ हर चाम पर ईमान भी बिकता है

यहाँ हर ईमान पर नाम भी बिकता है

यहाँ हर नाम पर ईनाम भी बिकता है


सब चालबाज हैं बाबू ! सब दगाबाज हैं बाबू !

सब अंटीबाज हैं बाबू ! सब धोखेबाज हैं बाबू ! 


अब ये मत पूछिए कि खरा कौन है

अब ये मत पूछिए कि हरा कौन है

अब ये मत पूछिए कि भरा कौन है

अब ये मत पूछिए कि मरा कौन है


सब कसाव हैं बाबू ! सब बचाव हैं बाबू !

सब ऐराब हैं बाबू ! सब नवाब हैं बाबू ! 

24 comments:

  1. बेहतरीन.. समकालीन स्थिति तो दर्शाती कविता....

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  2. तीखा तंज़ , ज़ोरदार कटाक्ष , जबदस्त व्यंग्य ।
    कुछ नहीं बचा बाबू , सब लिख दिया बाबू।

    तुम्हारे असली तेवर वाली रचना

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  3. वाह बहुत खूब सुंदर रचना के लिए ढेरों बधाई हो

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  4. बहुत कुछ है जो गड़बड़ झाला है ...
    करार तंज़ है ... बिकता हर कुछ है खरीदार चाहिए ... बेचने वाला चाहिए जो सब है आस-पास ...

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  5. अब ये मत पूछिए कि खरा कौन है

    अब ये मत पूछिए कि हरा कौन है

    अब ये मत पूछिए कि भरा कौन है

    अब ये मत पूछिए कि मरा कौन है----गहरा कटाक्ष है...बहुत गहरी रचना।

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  6. लोगों की मानसिकता शानदार तंज।

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  7. यहाँ हर दाम पर चाम भी बिकता है

    यहाँ हर चाम पर ईमान भी बिकता है

    यहाँ हर ईमान पर नाम भी बिकता है

    यहाँ हर नाम पर ईनाम भी बिकता है

    बहुत सटीक ..धारदार ...
    लाजवाब सृजन।

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  8. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 01-04-2021 को चर्चा – 4,023 में दिया गया है।
    आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी।
    धन्यवाद सहित
    दिलबागसिंह विर्क

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  9. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" ( 2085...किसी की याद से कितना जुड़ी हैं दीवारें ) पर गुरुवार 01 अप्रैल 2021 को साझा की गई है.... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  10. बढ़िया तंज़। स्वादिष्ट गीत। इसे तो कोई फिल्मकार ले जाए। 😊😊

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    1. बहुत तीखा और मार्मिक व्यंग अमृता जी। देश काल, समाज और इंसान के दोहरे आचरण का अवलोकन करती रचना संवेदनाओं का विशाल वितान रचती है।
      यही कहूँगी-------

      यही जीवन का सार है बाबू
      फूल नहीं सब खार है बाबू,
      बाहर से सब हँसते दिखते
      पर भीतर गुबार है बाबू!
      जाना कहाँ, किधर की धुन है
      नज़रें पथराई, चेहरे गुमसुम हैं
      सब होकर भी दामन खाली
      वही व्यर्थ की रार है बाबू!
      हार्दिक शुभकामनाएं🙏🙏

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    2. वाह! नहले पे दहला!!

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  11. मजा आ गया पढ़कर

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  12. वाह बेहतरीन रचना।

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  13. वाह !! धारदार व्यंग्य वाली बेहतरीन कविता ।

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  14. लाजवाब सृजन। आपको शुभकामनाएँ।

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  15. वाह, बहुत ख़ूब

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  16. बहुत ही शानदार तीखा व्यंग,सच्चाई से लबालब, हर आलम पे छींटे पड़ रहे हैं,सुंदर रचना के लिए बधाई हो अमृता जी ।

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  17. वाह!गज़ब का सृजन।
    निशब्द।

    कोई महल बेचता है तो कोई खोली

    कोई बारूद बेचता है तो कोई बोली..वाह!

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  18. वाह! बिम्ब की बहार! तंज की धार!!!

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  19. इस समय व्यस्तता के कारण इधर कम ही आना होता|
    बहुतही ख़ूबसूरत लिखा है अमृता| बधाई|

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