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Tuesday, March 27, 2012

लिख सको तो...


मेरे प्रेम में
लिख सको तो
महाकाव्य लिखना
आसमानी भाव के
अंतहीन पन्नों पर...
कह सको तो
अपने तप के
बादलों को कहना
झूम-झूम कर
बरसता रहे
अनवरत
अमृत धार बनके
और
हर प्रेमाकुल
तप्त ह्रदय को
सींचता रहे
प्रतिपल
पतित-पावन
संस्कार बनके...
जो केवल
शब्दों की शोभा
न बनकर
शंखनाद सा
बजता रहे
बारबार
प्राणों के तारों पर
शाश्वत ओंकार बनके .
लिख सको तो...

43 comments:

  1. इससे कम कुछ नहीं????

    वाह!!!
    अति सुन्दर ....

    अनु

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  2. बहुत सुन्दर सशक्त रचना...

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  3. उम्दा भाव संयोजन्।

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  4. बेहद सुन्दर भावों से सजा प्रेमगीत..

    आभार.

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  5. सुंदर कामना... उत्तम सृजन....
    सादर।

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  6. हर एक इंसान को ऐसा महाकाव्य लिखने वाले/वाली की तलाश! :)

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  7. सुंदर शब्द संयोजन बढ़िया रचना .....

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  8. लिख सको तो..

    मेरे आह की मौन गाथा लिखना

    मेरे संतप्त स्वर का राग लिखना

    लिख सको तो..

    मेरी पवित्र साँसों की

    उम्मीद लिखना

    जो निराकार है

    निर्जन है..

    पर..शाश्वत सरोवर में

    साधना में लीन है...

    हम बहुत हद तक अंदाज लगा सकते हैं कि आपके शब्द कहाँ से जन्म ले रहे हैं.. तारीफ़ के लिए कहाँ से लाये शब्द..

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  9. वाह ...बहुत ही बढिया

    कल 28/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.

    आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


    ... मधुर- मधुर मेरे दीपक जल ...

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  10. मेरे प्रेम को महाकाव्य लिखना......वाह.....बहुत ही सुन्दर।

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  11. वाह! बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति है, निशब्द हूँ इन भावनाओं की प्रसंशा में

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  12. बहुत अच्छी कामना... शुभकामनाएं...

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  13. मेरे प्रेम में
    लिख सको तो
    महाकाव्य लिखना
    आसमानी भाव के
    अंतहीन पन्नों पर...

    ताकि फिर बने इतिहास पद्मावत का , बनो तुम जायसी लिखो महाकाव्य मेरे नाम

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  14. बहुत सुन्दर....

    "लिख सको तो
    मेरे प्रेम में
    महाकाव्य लिखना......."

    इससे कम में काम कहाँ चलने वाला है.....

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  15. फिर वो ही शाम ,तनहा कुछ-कुछ उदास ,

    रोज़ कुछ न कुछ खोने का एहसास .

    हम मंजिल के मोड़ पे आके .

    रुके से हैं ,

    मत समझना हम थके हुए से हैं .

    सम्पूर्ण बिम्ब हैं /मन के कुन्हासे ही नहीं इरादे भी हैं पक्के .......

    बस कुछ लोगों को और साथ ले लें ,फिर चलतें हैं .

    एहसासे ज़िन्दगी ही क्या हाइकु है सचित्र .
    लिखो गीतगोविन्दम कुछ भी न बनकर...

    बहुत अच्छी रचना ...

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  16. लिख सको तो लिखो एक 'ढौला मारुरा '

    गुण सकों तो गुणों बन कबीर निर्गुनिया राम को ...

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  17. बेमिसाल ... !! इसके अलावा और कोई शब्द नहीं सूझ रहा ...

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  18. बहुत खूब, सुन्दर.

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  19. प्रेम के इस संस्कार को.. शाश्वत ओंकार को.... सादर नमन

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  20. बहुत ही अच्छी प्रस्तुति । धन्यवाद ।

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  21. लेखन हो जो सुख पहुँचाये,
    सबको सबकी राह दिखाये।

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  22. बहुत सुन्दर पोस्ट !

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  23. याचना प्रेम की पराकाष्ठा की ....!!
    बहुत सुंदर अमृतमयी अभिव्यक्ति ,अमृता जी ......!!

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    1. waah bahut sunder rachna hardik badhai .

      meri nayi post on

      http://sapne-shashi.blogspot.com

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  24. मधुर कामना है आपकी ... प्रेम में लिखने वाले सच में ग्रन्थ लिख देते हैं... जीवन भी तो एक ग्रन्थ ही है ...

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  25. लिख सको तो ... ओंकार के बाद शेष कुछ नहीं ... सुंदर प्रस्तुति

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  26. बस वही आध्यात्म भाव ....कण से ब्रह्मांड तक प्रेम की अनंत यात्रा !

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  27. जग कल्याण की भावना से लेखन ओंकार का प्रतिबिम्ब सदृश होता है .आप की सिद्धहस्त लेखनी गूढ़ बातों को सहजता से बता जाती है .

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  28. पहली पंक्ति पढ़ते हुए लगा कि कापी बड़ी चुनौती है। किसी के प्रेम में कोई महाकाव्य लिखना। लेकिन आखिर में आपने ही अपने सवालों का जवाब दिया कि कोई शब्द जो अंतिम सत्य को समर्पित हो। तारीफ करना भी बहुत सामान्य सी बात होगी। आपका यह सफर चलता रहे। आप लिखते रहिए। हो सकता है किसी दिन किसी महाकाव्य की नींव पड़ जाए। काफी उम्मीद जगाती कविता। इस तरह के भावों को अभिव्यक्त करने की आपकी क्षमता ध्यान आकर्षित करती है। बहुत-बहुत शुक्रिया।

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  29. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 29-03 -2012 को यहाँ भी है

    .... नयी पुरानी हलचल में ........सब नया नया है

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  30. व्यष्टि से समष्टि तक गुंजायमान रहेगी यह रचना ! और वह महाकाव्य समर्पण का अनहद नाद होगा।

    शाश्वत ओंकार की तरह तरंगित होती रचना !

    नमन !

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  31. bahut sundar bhaavon se saji sashaqt abhivyakti.

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  32. सुंदर रचना,अच्छी प्रस्तुति

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  33. बहुत अच्छी प्रस्तुति

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  34. सिद्धहस्त रचना

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  35. कविता के भाव बहुत अच्छे लगे।
    दु:खों से भरी इस दुनिया में सच्‍चे प्रेम की एक बूंद भी मरूस्‍थल में सागर की तरह है।

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  36. भाव पूर्ण सुन्दर अभिव्यक्ति....

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  37. बड़ी कोमल सी, सुन्दर सी कविता है दीदी!!

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