Social:

Monday, August 27, 2012

नहीं तो ...


इतना भी
घुप्प अँधेरा न करो
कि तड़ातड़ तड़कती
तड़ित-सी विघातक
व्यथा-वेदना में
तुम भी न दिखो...
इस दिए का क्या ?
तेल चूक गया है
बाती भी जल गयी है
बची हुई
चिनकती चिनगारी में
इतना धुआँ भी नहीं
कि भर दे जलन
तुम्हारी आँखों में...
क्या कहूँ ?
बस इतना ही
कि
तुम्हारी मर्जी को
स्वीकारते रहना
इतना आसान नहीं
और मर्जी से
मुकरते जाना
और भी कठिन है...
नहीं तो
पूरी ताकत से
एक धाँस धधकाकर
मिट जाती
वो चिनगारी भी...
ताकि
तुम्हारा अँधेरा
और गहरा जाता
पर तुम्हारे खाँसने की
आवाज भी
पूरी तरह खो जाती
उसी अँधेरी खनखनाहट में .

Friday, August 24, 2012

मिल जाए कुछ ...


आखिरी कसौटी को
छुए बिना
कैसे कहा जाए
कि हवा में
कितनी गर्माहट है
और वह
खुद को ही
उलीचने को
कितनी उतावली है...
पर
विचारों को उबलते
देख रही हूँ
वाष्पीकरण के
उत्ताप बिंदु पर
उद्विग्न होते भी
देख रही हूँ
चेतना के आसमान में
संघनित होते भी
देख रही हूँ
चातक ह्रदय की
विह्वलता को भी
देख रही हूँ
और
भावों को बूंदों में
बदलते हुए भी
देख रही हूँ
बस
मिल जाए कुछ
पिघले-पिघले से
शब्द
तो चट्टान भी
भला खुद को
कैसे रोक सकेंगे
गीला होने से .

Friday, August 17, 2012

अमृत चख...


कितना
सहज,सरल
है डगर
चलता चल

मत कर
अगर-मगर
लग जाए न
कहीं ठोकर
पर
मत रुक
वहीं रोकर

मटक-मटक
चल पनघट
घट भर
और घर चल

जमघट से
बचकर निकल
मत तक
इधर-उधर
तनने दे
टेढ़ी नजर
सर पर
घट रख
तन कर गुजर

तय है
यह सफ़र
मत उलझ
राह पर
रहगीर मिले
या रहबर
शुक्रिया कर
चलता चल

कहीं जाए न
साँझ ढल
घट में ही
रह जाए न
सब जल
और
रीता-रीता
बस तू
हाथ मल

प्यास तू
अमृत भी तू
छक कर
अमृत चख
फिर उगल

देर न कर
मत मचल
इधर-उधर
घट भर
और घर चल .


Monday, August 13, 2012

कुछ न बोलूँ रे!


कभी  निज  संचय न  खोलूँ  रे
और  मुख  से  कुछ न  बोलूँ  रे
लंतरानियों  को  बस   तौलूँ  रे
और   भीतर - भीतर   खौलूँ  रे!

लकड़ी  को चूम  रहा  कुल्हाड़ी
सन्यासी बनकर फिरे  है आड़ी
अकड़ा  लकड़ा  यूँ   गुर्राया करे
हरियाली को  ही धमकाया करे
दांतों  से  ऊँगली  मैं  चबाऊँ  रे
और  पुतली   को  सिकड़ाऊँ  रे!

भेड़ -शेर  में  है गजब की यारी
गड़ागड़  पीकर  मस्त शिकारी
औ ठूँठा बीड़िया बन जाया करे
जंगल को अंगूठा  दिखाया करे
ऐसे ढंढोरियो  से  मैं घबराऊँ रे
भाग डबरा में  उब-डूब  जाऊँ रे!

स्वारथ की  प्रीती  बड़ी नियारी
छतीसा मिलाप की करे तैयारी
ग्रह -नक्षत्तर  सध  जाया  करे
जादुई आँकड़ा यूँ उकसाया करे
चुपचाप सब तमाशा  मैं  देखूँ रे
गठरी में भर- भर  आशा टेकूँ रे!

गड़बड़  गरदन  पर  मौर   भारी
बिदक - बिदक  कर  घोड़ी हारी
निगोड़ा  गद्दी  पर  इतराया करे
गठजोड़ा  सरकार  चलाया  करे
बस  आँख   मैं  अपनी  सेंकूं  रे
दरिया  में   हैरानी  को   फेंकूं रे!

पर  मुख  से कुछ  न ही  बोलूँ रे !
न ही  निज  संचय  को  खोलूँ रे !


Friday, August 10, 2012

चौंको मत !


नये-नये गीत
बार-बार लिखकर भी
अपने को तनिक भी
उसमें समा न सकी
निज आहों के आशय को
इस जगती को समझा न सकी...
सोचती थी
जतन से मैंने जो कहा है
छंदित छंदों से लयबद्ध हो रहा है
अर्थों की परिभाषाओं को तोड़कर
पुलकित पद्य में ढल रहा है....
पर यह क्या ?
चेतना का शाप और
देह के धर्म में ठनी अनबन
बनी की बनी रह गयी
मैं सबसे या जीवन से या
अपने से ही छली गयी......
चाहकर भी
कंचन की जंजीर पहनकर
सपनों की झांकी में भी
क्षण भर को भी मुस्का न सकी
और औचक चाहों में भी
सोई हुई उजली रातों को
अबतक मैं जगा न सकी.....
निशदिन अँधेरे-पाख और
नन्ही परछाईं से भी डरते हुए
रह-रह कर कँप जाती हूँ
बदल-बदल कर लाख मुखौटा
क्यों अपने में ही छिप जाती हूँ...
कितना बेबस है मेरा आकाश
कि बंद दिशाओं में ही
बस उड़ता-फड़फड़ाता है
और क्षितिजों के कँटीले तारों में
उलझ-उलझ कर रह जाता है....
अब तो
हे! खारे आँसू
इन अधरों तक ही रुक जाओ
विधना विमुख है तो भी
करुण उद्गार से न चूक जाओ...
आज फिर
एक बार जी भर के
रचना में दर्द को छटपटाने दो
चौंको मत !
जगह-जगह से फूटी गागर ही सही
तनिक भी तो भर जाने दो .

Wednesday, August 1, 2012

धुंधलके में ...


साँझ के
धुंधलके में
हम तुम
जब मिलते हैं
कोई
गद्गद गीत
उभरता है ...
गा-गा कर
अक्षत अम्बर को
थिरकाता है
तर्षित तारों को
झिलमिलाता है
बातुल बिजुरी को
मचलाता है
और
चंचल चाँद को
और अधिक
दमकाता है ...
साँझ के
धुंधलके में
मंदिम-मंदिम
कहीं दीपक
जल सिहरता है
मंजिम-मंजिम
लौ झुक कर
ऐसे लिपटता है
जैसे
विकल विरह
मानो पिघलता है ...
साँझ के
धुंधलके में
क्षण-क्षण
संकोचित संगम
होता है
और सागर
सागर को ही
डूबोता है ...
प्राणों में
प्रतीक्षातुर
प्रीत लिए दिन
जैसे-जैसे
रात में
खोता है .

Saturday, July 28, 2012

क्षणिकाएँ...


एक जरा सी शुरूआत भी
बला की तूफ़ान ले आती है
फिर तो हलकी सी थपकी भी
जोरदार चपत लगा जाती है .

           ***

कोई कैसे बताये कि
कौन किसपर भारी है
हँस जीते या फिर बगुला
सिक्का-उछालू खेल जारी है .

           ***

गुदड़ी की गुत्थमगुत्थी भी
क्या खूब गुदगुदाती है
और बाँकी बर्बरता बैठकर
मजे में चने चबाती है .

           ***

टिमटिमाती मशालों की टीमटाम
हेठी दिखा कर हेल देती है
बरजोरी में अग्निशिखाओं को भी
एकदम पीछे धकेल देती है .

           ***

अनेक को एक ही सोंटे से
सोंटने में ही एकता है
जो ताखा चढ़ तूंबी बजाये
वो ही तुरुप का पत्ता है .


Tuesday, July 24, 2012

ख़ालिस खिचड़ी ...


आप पकाए क्या  ख़ालिस खिचड़ी
हांडी  को  ताकता  रह  जाए  खीर
बड़ा  नशीला है  ये जालिम नमक
जिसके   आगे   भागे   देखो  भीड़

बारह   मसाला   में   तेरह   स्वाद
लज्ज़त   लुटाये   आपका   चोखा
लार  टपक  कर  लड़ता  रह  जाए
और  जीभ  तो  खाता  रहे  धोखा

चाहे  आप  कुछ   भी  कहें  न  कहें
तनिक न  लगती  किसी को कड़वी
वर्जिश  करना  भी  भूल चुके  सब
आपका  घी  ही  घटाए  जो  चरबी

मिर्च  और   खटाई   खेले  खटराग
तिसपर पर्दापोशी करे  आप अचार
एक   बार  जो  जी  चढ़   जाए  तो
हिचकियाँ  लगाए  हुड़दंगी  विचार

बिन  जामन  के   ही  आप जमाए
कफ़ - वात- पित्त   नाशक    दही
छुआछूत   से  तौबा  कर  जीवाणु
हर  बात  को   बस   ठहराए  सही

कोई   हरजाई  जो  पलटी  मारे  तो
पटेबाज़ी  कर पटाये  आपका पापड़
मुँह पर  मैंने ऊँगली  डाल लिया जी
वर्ना  कहीं  खिचड़ी कर  दे न चापड़ .

Friday, July 20, 2012

मेरा पद्म तुम्हें भर लेगा...


गिरने   दो  अपनी   अहं - दीवारें
सम्पूर्ण - समर्पण   की   राहों  में
तब   मेरा  पद्म   तुम्हें  भर  लेगा
मूक -मिलन  के  मधुर  बाँहों  में

तुम  चाहे  जिस -जिस   देश रहो
जब -जब  चाहे   कोई  वेश   धरो
पल -पल की प्रतिच्छाया  बनकर
ये   अम्बुज  अंक   लगा  जायेगा

इन अधरों  के  इति  इंद्रधनु  बनो
और  बस भोले दृग की  बात सुनो
तरल -चपल  गतिविधियाँ  न्यारी
ये कलित कंज कर भरमा जाएगा

ज्यों   धरा   तरसे  तुम  भी  तरसो
उस   धाराधर  सा  जमकर  बरसो
तन - मन -प्राण से  भींग जाने को
ये जलज  भी  खिल-खिल जाएगा

विगत -आगत  से तुम  विरत रहो
जिधर मैं खींचू  बस  उधर ही बहो
मंद -मदिर  सा  अधीर  समीर में
ये  पुलकित  पंक  लहरा   जाएगा

माना  एक  से  बढ़  एक  चुभन  है
चंचल चित्त उद्वेलित  चिंतन  है
पर  कोई  सुन्दर  स्वप्न  सुनहला
ये  कमल  किलक  दिखा  जाएगा

शब्द - शब्द  से  कुछ  भी  न कहो
असह्य  वेदना  का  अनुताप सहो
तेरी   धड़कनों  की  आह का स्वर
ये  सरसिज  स्वयं  में  पा जाएगा

कोमल कितने प्रिय!चरण तुम्हारे
कि काँटे हिल -मिल  बसुधा बुहारे
और   तेरे   पथ  पर  पंखुड़ियों को
ये  शतदल  सदा  बिखरा  जाएगा

कितना  मृदुल - मोहक है  ये पाश
चहुँ ओर प्रिय! लखे  तेरा  ही भास
जिसपर गर्वित  रूप  कर निछावर
ये  नंदित नलिन  निखरा  जाएगा

मत  घबराओ  निज  हाथ  बढ़ाओ
मिट जाओ इन्हीं  शाश्वत चाहों में
तब   मेरा   पद्म   तुम्हें   भर  लेगा
मूक -मिलन   के   मधुर  बाँहों  में .

Monday, July 16, 2012

गहूँ - गहूँ


पीली  - पीली
उगूँ    -   उगूँ
सीली - सीली
बहूँ    -    बहूँ

चली  -   चली
रुकूँ    -   रुकूँ
कली  -  कली
फिरूँ   -  फिरूँ

मिली -  मिली
कहूँ     -  कहूँ
खिली -खिली
दिखूँ  -  दिखूँ

घड़ी   -   घड़ी
पगूँ    -   पगूँ
भरी   -   भरी
रहूँ     -    रहूँ

दिया  -  दिया
जलूँ   -   जलूँ
पिया  -  पिया
गहूँ     -    गहूँ  .

Friday, July 13, 2012

ग़ाफ़िल ग़ज़ल


जानते हो तुम
कि तुमसे ही है मेरी
मलाहत भरी मुस्कुराहट
बेसबब बेसमझ बेपरवा सी
न थमने वाली खिलखिलाहट....
और तुम खामख़ाह फुरकते ग़म देते हो
व मुद्दत बाद बेहाली से मिलते हो...
मैं रूठूँ तो यूँ न रूठो कहते हो
तिस पर खिलखिलाती रहूँ ख्वाहिश भी करते हो..
क्या कहूँ मैं...
कुछ न भी कहूँ तो
ये पलक ही उठकर
तुमसे हजार बातें कह जाती
और जब गिरती है तो
घबराकर क्यूँ साँसे तुम्हारी अटक जाती....
फिर तुम जबतक
इस माथे की उलझती-सुलझती लकीरों को
चूम-चूम कर सुलझा नहीं लेते
इन गालों की बदलती रंगत को
बड़ी सादगी से सहला नहीं लेते
गीतों के कुछ बेतरतीब पंक्तियाँ
बिन सुर गुनगुना नहीं लेते
उस चाँद के ग़रूर को भी
उसके दागों से आजमा नहीं लेते
और इस रूठी को मना नहीं लेते...
तबतक क़समें दे-देकर
वक़्त को तो रोक ही देते
छुनन-मुनन कर छेड़ती हवा को भी
झींख भरी झिड़क से टोक ही देते...
जैसे कि
मेरी मुस्कराहट की मुहताजी हों सब
जिसे देखकर खिल उठेंगे मोगरे के फूल
ठठा ठठाकर ठिठक जायेंगी
खिदमती खुशबू भी राह भूल....
फिर मानो पूरी कायनात ही
तुम्हारी इस ग़ाफ़िल ग़ज़ल की
गवाही देने को हो जायेगी बेचैन
और ये होंठ हिलते ही
मिल जाएगा सबको आराम-चैन....
ये जानते हुए भी
अजब-गजब अदा दिखा कर
मैं तो मानी हुई ही रूठी रहूँगी
कितने पिंगल पिरो-पिरोकर
तेरी प्रीत है झूठी कहती रहूँगी........
ताकि तुम यूँ ही
बेहिसाब ग़ाफ़िल ग़ज़ल गाते रहो
और बेताबी से बस मुझे मनाते रहो .

Sunday, July 8, 2012

सबकी अपनी मर्जी...


सबकी  अपनी  मर्जी
सबका   अपना   ढंग
कोई     मारे     सीटी
कोई     फोड़े    मृदंग

बेसुरा      छेड़े     सुर
बेताल     देवे     संग
लकवा    मारा   नाच
फड़के      अंग - अंग

दाद,   खाज,  खुजली
खूब     जमाये     रंग
मन-मौजी     मलहम
और    मिलाये    भंग

बेमौसम   फूल   खिले
कौन     करे    शैतानी
कैसे   छिपाए  पतझड़
हँफनी   भरी    हैरानी

मुश्किल  में  मानसून
किससे    माँगे   पानी
छीछालेदर   सुन-सुन
और    बढ़ी   परेशानी

राग-मल्हार    छेड़कर
दुश्मनी   किसने ठानी
अब      नहीं    चलती
उसकी   ही  मनमानी

आसमान    सा   हुआ
दमड़ी      का      दाम
रिश्वत   खाए  बादल
भूले    अपना    काम

कंबल    तले   लेटकर
केवल     करे   आराम
मौसम     पैर    दबाये
ठोंके     जोर   सलाम

दलाल     बन     हवा
खींचे   सबका    चाम
कितना    जहर   बाँटे
राहत   कमाए   नाम

लटापटी    खूब    करे
धागा     बिन    पतंग
झुका      रहे     तराजू
चढ़ा     हुआ    पासंग

दहाड़      मारे     दहाड़
तुनका    हुआ    उमंग
आवाज़   चुप्पी    खाए
गूंगा    मचाये   हुडदंग

सींकिया मलखंभ  चढ़े
दबका    हुआ    दबंग
देख  बदलती  दुनिया
खरबूजा  कितना  दंग

सबकी    अपनी   मर्जी
सबका    अपना    ढंग
कोई       चढ़े      सीढ़ी
कोई        करे       तंग .

Tuesday, July 3, 2012

चिरजीविता


मैं अनवरत
अपनी ही भाषा की खोज में
अपनी प्रकृति से
सतत स्पष्ट-अस्पष्ट
संवाद करती रहती हूँ...
स्वयं ही
दृश्य-अदृश्य गति-तरंगों में
वाक्य-विन्यास सी बनती-बिगड़ती हूँ...
अति आंतरिक किन्तु
जटिल संरचनाओं को उसके
मूलक्रमों में सजाती-संवारती हूँ.....
फिर शब्द-तारों को
सुमधुर स्वरचिह्नों में
समस्वरित-समरसित करती हूँ.....
सरल-विरल भावों के
सुलझे-अनसुलझे
रहस्यों को बुनती-गुनती हूँ.....
उस काव्य-बोध के
चरम-बिंदु का
पहचान-निर्माण करती हूँ....
जिसके द्वारा रचित
चिरजीविता कविता को
उसकी यात्रा पर
अक्षरश: अग्रसर करती हूँ....
सत्यश:
मैं....मैं तो केवल.....
अभिव्यक्ति का व्याकरण बन
नवरसों के नवसृजन का
बस मधुपान-मधुगान करती हूँ .

Monday, June 25, 2012

सच कहो...


मुझे
अपने हाथों की
प्रत्यंचा बना सकते हो...
अपने तरकस से
तीर पर तीर चला सकते हो...
बेध सूर्य-चन्द्र को
अँधेरे को जिता सकते हो...
मेरी ऊँगली से
अपना चक्र भी चला सकते हो...
तुम्हारी विराटता सिद्ध हो तो
कण-कण में
मुझे बिखरा सकते हो....
और अपने जय-घोष में
मुझसे ही
शंख भी फुंकवा सकते हो....
पर जब मैं
तुम्हारा भेद खोलने लगूँ तो
सच कहो
अठारहों अध्याय भी
कम तो नहीं पड़ जायेंगे .

Thursday, June 21, 2012

कहीं पा न जाऊं ...


कल्पना  जिसकी  संजोयी  हूँ
उसे  सामने कहीं  पा  न जाऊं

घड़ी -दो -घड़ी  के  लिए  सही
मैं  अधन्या उसे  भा  न जाऊं

उस की  वंशी - धुन  सुन कर
शहनाई सी कहीं बज न जाऊं

बिन   श्रृंगार - पिटारी  के  ही
उसके रूप  से  सज   न  जाऊं

ठगे से  इन नयन के  ठांव में
मैं लुंठित  कहीं  लुट  न जाऊं

और लज्जा की लालिमा ओढ़े
नवोढ़ा - सी  ही  घुट  न  जाऊं

ह्रदय पर जो हरक्षण  छाई  है
प्रिय -छवि तो  अनोखी होगी

वह  मधुर - बेला  मिलन  की
कितनी   चकित  चोखी  होगी

उसके रंग के छिटके  छींटे  में
आभा  मेरी  भी  निखरी  होगी

मरुदेश सा इस मन मरघट में
इक हरियाली सी बिखरी होगी

हिलोर  लेती  छुई -मुई  घटाएँ
गगन में ऐसे भी  घिरती होगी

बन कर  दाह की  चिनगारियाँ
प्यास अधरों पर  तिरती होगी

सरस-सरस  स्वर   ले -ले कर
अमराई बन  छिटक  न  जाऊं

महक-महक कर मदमाती सी
जूही सी  कहीं  लिपट  न जाऊं

यदि वो घड़ी अभी आ जाए तो
भावना में  मैं  ही  बह  न जाऊं

न जाने  किस - किस भाषा में
क्या  कुछ  कहीं  कह  न जाऊं

ठिठक  गये  यदि  पग   मगर
मन  लिए ही कहीं बढ़ न जाऊं

लोक - लीकों  का  तोड़  भरम
सोच के पार  ही  चढ़  न  जाऊं

गरल  विरह  का  पी - पी कर
प्रेम - गीत  कहीं  गा  न  जाऊं

कल्पना  जिसकी  संजोयी  हूँ
उसे सामने  कहीं  पा न  जाऊं .

Sunday, June 17, 2012

प्रेम-वरदान


माना कि हर समय
पलड़े का झुका काँटा है
और दैविक सुअवसरों ने
केवल दुःख ही दुःख बाँटा है....
पर सच देखा जाए तो
हीरे ने ही हीरे को काटा है
चाहे जितना भी खींचता हुआ
त्रासदियों का ज्वार-भाटा है....
कौन कहता है कि
जिसे तिरना नहीं आता
हर लहरों से वह हारा है
उसका भी क्षिति से क्षितिज तक
क्षण प्रति क्षण का सहारा है....
अनुक्त अनुभूतियों का भी
विस्तृत विसदृश्य किनारा है..
जिसने अतल गहराइयों से भी
हर बार , हर बार उबारा है.......
ये भी माना कि
जिसे जीवन की नदी में
अपना द्वीप बनाना नहीं आता...
गंभीर ग्रीष्म को देखकर भी
मेघ बन उफन जाना नहीं आता...
और सूर्य की दीप्त किरण से
विमल हो मिल जाना नहीं आता....
पर वे भी एक
अकल्प अद्भुत संयोग ही हैं
विषम व्यवधान हेतु
एक विलक्ष वियोग ही हैं......
किन्तु ये तो बस समय की बात है
जिसमें संभवत: नियति के
खलनायक का भी बड़ा हाथ है.....
ह्रदय तो बस
ह्रदय की भाषा जानता है..
काल-दूरी से परे जाकर
बस धड़कनों को पहचानता है....
कहीं से तनिक भी
पाकर अनमोल प्रेम-वरदान
निर्मल सरोवर सा
बन जाता है हर सूखा प्राण....
जी उठती है जिसमें असीमित धार
छोड़ सारे अहम् व वहम को
कर ही लेता है वो
अभिनव,अभिभूत,अपरिमित प्यार .

Tuesday, June 12, 2012

क्रांति...


सक्रिय सहभागिता मेरी
जीवन के हर एक
स्पंदन और विचलन में
उच्छृंखलता और नियमन में
चढ़ान और फिसलन में
अवसाद और थिरकन में...
पर साथ-साथ
फन उठाये एक डर भी
उलझाता एक एहसास भी
परजीवी होने का....
अपने पेट में ही
उलझ-सुलझ कर
अपनी स्वतंत्रता को
कमोवेश निगलते जाना....
अपनी ही बिठाई
निष्पक्ष जाँच की धार पर
संभल-संभल कर चलना....
न जाने कब
अपदस्थ कर दी जाऊं...
अपने ही किसी काल-कोठरी में
नजरबंद कर दी जाऊं...
तब एक चरम बिंदु तय करके
समग्र साधनों को संचित करके
अगुआई करती हूँ
एक आत्मक्रांति की
और हो जाती हूँ - मुक्त
कुछेक पल के लिए...
हाँ! ये मेरी क्रांति ही
झझकोर रही है आज
समस्त संधित
संदीप्त चेतना को .

Sunday, June 3, 2012

पुन:पुन:...


तुममें खोई थी
कुछ बीजों को बोई थी
अब फूल खिलें हैं
काँटों में भी उलझे हैं....
तुममें खोती रही
बस तुम्हें
फूल ही फूल देती रही
और कांटे चुभोती रही....
चुभे काँटे हैं
दर्द देंगे ही
लाख मना करूँ
पर तुमसे कहेंगे ही....
तब तुम बाँहों में मुझे
यूँ घेर लेते हो
उन्हीं फूलों को
बिखेर देते हो
और कहते हो -
भूल जाओ दर्द को....
ये जिद ही है मेरी
कि मैं
तुममें यूँ ही खोती रहूँगी
और काँटे चुभोती रहूँगी
बस तुम्हें फूल देती रहूँगी
पुनर्नव पीड़ा पिरोती रहूँगी
पुन:पुन:
बस तेरे बाँहों के घेरे में
होती रहूँगी और खोती रहूँगी .

Monday, May 28, 2012

इसलिए ...


अक्सर
मेरी कविता
लाँघ जाती है
अनगिनत खींची हुई
लक्ष्मण रेखाओं को...
रावणों को
चकमा देकर
हथिया लेती है
पुष्पक विमान...
विस्मृति में कहीं
भटक रहे हैं
हनुमान...
जटायु को
ज़िंदा रखना है
इसलिए खुद ही
लाती है संजीवनी बूटी...
लम्बी सेवा के बाद
सुरसा को
मिली है छुट्टी...
पर उस
त्रिजटा को
कौन समझाए
जो कर रही है
प्रतिपल प्रतीक्षा
उसी अशोक वाटिका में .

Thursday, May 17, 2012

क्षणिकाएँ



बेझिझक बोलों के अब
पोल खुले ही रहते हैं
जिसपर बेमानी बुद्धिवाद
चिथड़ों में सजे रहते हैं .


बबूला भी बलबलाकर
बड़ा होने में ही फूटता है
पर इन्द्रधनुषी इठलाहटों का
कोई भ्रम कहाँ टूटता है .


भला कौन किसको अब
कोई परामर्श दे सकता है
जहाँ एक घास का तिनका भी
अनुभवों को बाँचते फिरता है .


उपद्रवी ब्योरों का भी
ब्योरा-ये-हाल कोई तो कहे
जो चींटियों की धड़कनों पर भी
धड़कन रोके नजरें चुभाये बैठे हैं .


नगाड़ों में खुदुर-बुदुर कौन सुने
सब समय की ही तो बात है
नक्कारखाना भी अब हैरान है
जिसमें तूती की चलती धाक है .


तूफानी विचारों की आँधी में
बेचारा 'देश'तो वही रह जाता है
पर अक्सर आगे लगा 'उप'
बस 'आ' में बदल जाता है .



Thursday, May 10, 2012

प्रीतम का संदेशा


रोम-रोम को
अकस्मात सुख ने सिहराया है
चिर प्रतीक्षा की
व्याकुलता ने मानो वर पाया है
टिमटिमाते लौ से
जित ज्वाला सा जगमगाया है...

लगता है कि
मेरे प्रीतम का संदेशा आया है

ठहरी हवाओं को
प्रेम पंखो पर झुलाया है
पीपल पातों ने
ये कैसा कोलाहल मचाया है
चुप चातकी ने
चहक-चहक कर चौंकाया है...

हाँ ! प्रीतम का
प्यारा संदेशवाहक ही आया है

मरू नभ पर
घनघोर घन लहराया है
मोर मोरनी के
नयन में नयन दे मुस्काया है
नए-नए गीत
नई ध्वनियों ने मिल गाया है...

हुलस कर जिसे
मैंने भी निज-हाल सुनाया है

हर पल पर
लिखी पाती उसे थमाया है
कि ह्रदय को
कैसे मैंने उपासना-गृह बनाया है
अपने प्रीतम को
उसमें देव सदृश बिठाया है...

हठचेती ह्या ने
हठात भेद उगलवाया है कि

बिन मदिरा के
बेसुध सी रात ने मुझे भरमाया है
और भोर तक
जगते सपने ने निर्मोही को दिखाया है
हर तत्पर दिन
पुन: सूनी संध्या में समाया है...

हलाहल पी कर
मैंने भी ये संदेशा भिजवाया है

कि उसका दिया
विरह उपहार भी बड़ा मनभाया है
और हर्षोन्माद में
बस उसी को तो मैंने पाया है
दुःख देकर भी
आखिर उसी ने तो दुलराया है...

हाय ! प्रीतम तक
कैसा संदेशा उसने पहुँचाया  है .

Sunday, May 6, 2012

एक थकान की मन:स्थिति में


एक थकान की मन:स्थिति में
शरीर के ज्वार-भाटे में
बिना जिद के तिरते रहना....
बेवश विवशता के नियमों को
उसके गतिनुसार चलते देखना...
क्षुद्र स्वार्थों के लिए दौड़ में बनाए
कीर्तिमानों का आकलन करना...
मड़ियल मिश्रित मुस्कान लिए
स्वयं के साथ किये गये
उपघाती उत्पीड़नों का उल्लाप करना
और छटाँक भर राहत के लिए
छद्मावरण तोड़ देने के लिए छटपटाना....
उफ्फ़ !
फिर मन तो मन ही है
उसी थकान की मन:स्थिति में
करता रहता है अपना काम...
मजे से मचल कर वह
विचारों को एक राजसी ठाट-बाट दे
अपने बादशाही बिछौने पर
आराम से लिटा देता है...
हौले-हौले पंखा झलता है
धीरे-धीरे उसके पाँव दबाता है...
कुलबुलाते सवालों व खलबलाते खेदों से
विशेष अनुरोध करता है कि वे
सुबह की ताज़ी हवा का सेवन करें
और एकात्मक एकांत का
मौन अभ्यास व अध्ययन करें....
आह ! उसी मन:स्थिति में
अपनी बुद्धिवादिता पर वह हँसता है
विस्मित होता है , आश्चर्य करता है....
एक आभासी शक्ति से स्वयं को
प्रोत्साहित करता है और देता है
एक खुला आमंत्रण
उस पूर्ण चंद्र को भाँवर रचाने के लिए
उसे कहता है- इन ओठों पर
गहरा व लंबा चुम्बन जड़ने के लिए...
रिझाने व मनाने के लिए
और फिर राव-चाव से
रास-क्रीड़ा करने के लिए....
ताकि सबकुछ भूल कर
इस तिरते ज्वार-भाटे में
तिरते-तिराते हुए सबकुछ
हो जाए पूर्णत: तिरोहित
उसी थकान की मन:स्थिति में .

Tuesday, May 1, 2012

कल्पशून्य


तुमसे प्रेम करके
जितना मैंने
खुद को बदला है
तुम्हारी जरूरतों और इच्छाओं के
प्रमादी प्रमेय के हिसाब से
उतना ही तुम
अनुपातों के नियम को
धता देकर सिद्ध करते रहे
कि चाहतों के गणित को
सही-सही समझना
मेरे वश की बात नहीं.....
जबकि मैंने तो
गणितीय भाषा से
केवल जाना है
एक अनंत को....
और तुम जोड़-तोड़ करके
मुझे बंद कर लेते हो
अपनी चाहतों की
छोटी सी कोष्ठक में......
प्रेम किया है तो
तुमसे कोई शत-प्रतिशत
परिणाम पाने की चाहत भी नहीं
बल्कि तुमसे सूत्रबद्ध होने के लिए
करती रहती हूँ सूचकांक को
शून्य से भी नीचे.....
ताकि पूरी तरह से तुम
होते रहो संतुष्ट
और मैं छू-छू आऊँ
उस अनंत को.....
पर तुम मुझे यूँ ही
गुणा कर लेते हो
किसी शून्य से और
अपने संख्यातीत चाहतों के
आगे-पीछे लगा लेते हो
केवल अपने हिसाब से....
क्या तुम नहीं जानते कि
तुम्हारा गणित भी है सूत्रहीन
या तो मेरे अनंत होने मात्र से
या बस कल्पशून्य होने मात्र से . 

Thursday, April 26, 2012

तदर्थ गढ़ा है ...


आत्म विभोर होकर
सस्ते में मैंने मान लिया कि
हर एक शब्द हीरा है
मंहगा न पड़ जाता कहीं
आत्मभार इसलिए
चुटकी बजा कर उठा लिया
ऐसा-वैसा हर बीड़ा है ....
अब क्षमता से अधिक भार लिए
कलम के नीचे दब रही हूँ
खुद को तो बचाना ही है तो
अपनी स्याही की ताकत को
खोखले शब्दों में भर रही हूँ.....
हैरान हूँ , वही आड़ी बन कर
मुझे ही ऐसे चीरा है
किससे और कैसे कहूँ -
आहत अभिमान बड़ी पीड़ा है ...
उलटे शब्दों ने व्यंग से कहा -
निराशाओं की पगडण्डी
इतनी छोटी होती नहीं
आँखों से चाहे गिरा लो
जितने भी आँसू
पानी ही है कोई मोती नहीं
अब बिचारी गंगा भी
धर्म व नीति के विरुद्ध
आचरणों को धोती नहीं
समय की भी टूटी कमर है
इसलिए सबको वह ढ़ोती नहीं...
और तो और ... मेरे बिना
कोई बात भी तो होती नहीं.....
सीना चौड़ा करके गर्व से
शब्द आगे कहता रहा -
जरा देखो हर तरफ बस
मेरा ही बोलबाला है
हर उजली बातों के पीछे
कहीं तो छिपा कुछ काला है...
मुझसे ही सजे हुए सबके
अपने -अपने अखाड़े हैं
जितना भी खेले गुप्त दाँव-पेंच
लेकिन सब मुझसे ही हारे हैं....
आखिर मुझसे ही तो
हर एक नाम लिखा जाता है
फिर अपने ही जमघट में ही
तड़प-झड़प कर खो जाता है....
नाम वाले कहते हैं - मुझमें
उन्होंने अपना अर्थ भरा है
पर सच तो यही है कि मैंने भी
उनको तदर्थ गढ़ा है .

 

Friday, April 20, 2012

किस भाँति मैंने....


मत पूछो कि
किस भाँति मैंने
निज को लुटाया है

अपने ही बंद झरोखे को
धीरे से खुलते पाया है
मैं न जानूं कौन है वो पर
चुपके से कोई तो आया है....
नींद बड़ी गहरी थी तो
झटके में उसने जगाया है
पसरे चिर सन्नाटे को
हौले-हौले थपकाया है.......

मत पूछो कि
किस भाँति मैंने
मन को लुटाया है

स्फुटित श्वास ,स्तब्ध नयन
हाय ! ये कैसा सौन्दर्याघात है
एक उत्तेजित,उल्लसित किन्तु
स्निग्ध उल्कापात है.....
ढुलमुलायी हवाओं में भी
कोई न कोई तो बात है
क्या ये अतर्कित प्रेम का
उदित,अनुदित उत्ताप है.....

मानो मुंदी-मुंदी रातों में
धूप सा वह उग आया है
मेरे पथरीले पंथों पर
दूब बन कर लहराया है.......
उहूँ ! मेरे विश्व में ये कैसा
संदीप्त सनसनाहट मचाया है
तैर रही हैं लहरें और
सागर को ही डूबाया है......

अब तो ये मत पूछो कि
किस भाँति मैंने
उसको पाया है .




Monday, April 16, 2012

काव्य-धारा


जरूरतों और इच्छाओं के इर्द-गिर्द
नाचती-घुमती दिनचर्या में
जीवन के काव्यात्मक उपकरण
कैसे/कहाँ खो जाते हैं कि
उन्हें खोजने के लिए
लेना पड़ता है सहारा
सूक्ष्मदर्शी/दूरदर्शी यंत्रों का....
फिर भी चारों और से
घेरे रहता है भयानक भय
बाकी सब खो जाने का....
यदि कभी/कहीं वे
मिल भी जाते हैं तो
सारे तार ऐसे तार-तार होते हैं
कि सधे हाथों से भी जोड़ो तो
ऋणात्मक-धनात्मक छोरों में
ठनी होती है अड़ियल अनबन...
व विभिन्न तीव्रता में प्रवाहित धारा
कुछ ज्यादा ही होती है
जोरदार झटका देने के लिए....
उसके जंग लगे कल-पुर्जों से
लगातार होता रहता है
कानफोडू कोलाहल
साथ ही विषैले रिसाव का
दमघोटूं दबाव धमनियों पर...
तब ख्याल आता है कि
ज़िंदा साँसे भी होती है या नहीं
ये भी ख्याल आता है कि
बाज़ार में उछाल पर क्यों है
कृत्रिम ऑक्सीजन की मांग/आपूर्ति...
सब मानते हैं / मैं भी
ज़रूरी है कोई भी ऑक्सीजन
काल्पनिक काव्यशैली में भी
जीने/ जिलाने के लिए
कृत्रिम फूलों की कृत्रिम सुगंध के
आदान/प्रदान के लिए...
सबसे ज्यादा तो ज़रूरी है
खुद को ज़िंदा दिखाना
एक-दूसरे को भरोसा देना
सुन्दर-सा मुस्कान चिपकाए रखना
और ये कहते रहना कि
कृत्रिम काव्य-धारा में भी
कितना सुन्दर बह रहा है जीवन .



Tuesday, April 10, 2012

कहीं ऐसा न हो ....


कहीं ऐसा न हो ....

अत्युक्ति में
सुन्दरतम सत्यों का
कुरूपतम उपयोग
अदम्य अभियान न हो जाए

अतुष्टि से
भाग्य के ढाँचे में
अकर्मण्यता ढलकर
सतत अनुष्ठान न हो जाए

अति स्वप्न में
बड़ी आशा से
छलक कर मनोबल
साश्चर्य ढलान न हो जाए

आत्म प्रवंचना में
सागर का दंभ भर
भ्रमित तालाब सा
ग्रंथित ज्ञान न हो जाए

अति विनम्रता भी
सम्मान पा कर
अहंकार का
सुसज्जित परिधान न हो जाए

किसी वसंत में
खिलेगा कोई फूल
सोच-सोच कर
भविष्य वर्तमान न हो जाए

और अंत में...

सतयुग के आने की
आहट पाकर
कहीं कलयुगी मानव
सयत्न सावधान न हो जाए .




 

Friday, April 6, 2012

घिर बदरा कारे...


गर्मी  का उत्ताप
धरा  करे विलाप
पड़   गयीं   दरारें
सूखे   ओंठ  सारे
उड़     रहीं   धूल
मूर्झा   गये  फूल
पीड़ा    सी   हूकी
कोयल जब कूकी
अमिया  है उदास
बुझ   रही   आस
मन  विकल खग
बाट   जोहे   जग

घिर  बदरा  कारे
आ रे आ रे आ रे !

अँखियाँ न  मींचो
प्राणों  को   सींचो
कर   बूँदा - बाँदी
तृप्ति  की  आँधी
शीतल  हो अगन
भींगे   तन - मन
बगिया  में  बहार
यौवन  का खुमार
मंगल  बेला आये
घट  - घट    गाये
तेरे     संग   झूले
सब   दुःख   भूले

घिर   बदरा  कारे
आ रे आ रे आ रे  !

Tuesday, April 3, 2012

अनागत कुसुम


हवा के झझकोरे से
बिखरे पत्तों को देखकर
बच्चों की भाँति
ठिठक जाता है - भीरु मन
और चलने से मना करता है
एक भी कदम...
फिर उसी हवा के झोंके में
देखता है भर अचरज - मन
कोरा कोंपल -कलियन
कि प्रस्तुत होता है अप्रस्तुत मन
पूरे अकड़ और जकड़ के साथ...
मजबूर करता है सामने पड़े
धारणाओं के चट्टानों को
मजबूती से परे लुढकाने को...
अपने तले कुचल कर
आती सारी अड़चनों को...
भुलाकर अबतक की सभी
भूलों और पछतावों को
व्यर्थ की शंकाओं एवं दुष्कल्पनाओं को..
अचानक से इसी पल में
न जाने कहाँ से
आ जाती है इतनी शक्ति कि
घुमावदार मोड़ों पर भी
आत्मबल का लेकर छाँव
सीधे पड़ने लगते हैं टेढ़े पाँव....
सधने लगती है दृष्टि भविष्योन्मुख
विषम संघर्ष से अनुभावी सुख.....
शांत हो कहता है - मन
-- यही है जीवन
भला रुकी है हवा किसी क्षण...
माना कि है
अनुभवों का बीहड़ वन
पर इसी में एक दिन
खिल उठते है
अति सौरभ बिखेरता हुआ
अति सुन्दर अनागत कुसुम .

 

Saturday, March 31, 2012

मेक-ओवर


इस 'आज' की
बौखलाई कविता से
( समाचारवाचिका सी )
संतुलित संवेदना भी जाहिर होती तो
सहनीय होती उसकी बौखलाहट
शब्द वाया भावों की
थोपी जिम्मेदारियों से
कटघरे में घेर कर भी
बरी कर दी जाती
( समाचार सी पढ़ ली जाती )
इस 'आज' के
हालातों - ज़ज्बातों को वह
बिना लाग-लपेट के कहती रहती
ख़ुशी-गम से निकली आह-वाह को
ख़ुशी-ख़ुशी सहती रहती....
पर इस 'आज' की
बौखलाई कविता
एकालाप से त्रस्त कविता
कंठ के आक्षेप से ग्रस्त कविता
अब चुप ही रहना चाहती है
कोई लाख बोलवाये पर
मुँह नहीं खोलना चाहती है....
जबकि इस 'आज' का
बौराया कवि ( मैं भी )
सब रसों का रस चूस-चूस कर
अपना रस टपका-टपका कर
कविता कहता है
और खुद ही इतना बोल जाता है
कि बड़ी मुश्किल से
इस 'आज' की कविता में
ढूंढी गयी रही-सही
खूबसूरती भी
खुद कवि के ही काया-क्लिनिक में
अत्यधिक रंग-रोगन करके
शब्दित मेक-ओवर की
सुलभ शिकार हो जाती है .

Tuesday, March 27, 2012

लिख सको तो...


मेरे प्रेम में
लिख सको तो
महाकाव्य लिखना
आसमानी भाव के
अंतहीन पन्नों पर...
कह सको तो
अपने तप के
बादलों को कहना
झूम-झूम कर
बरसता रहे
अनवरत
अमृत धार बनके
और
हर प्रेमाकुल
तप्त ह्रदय को
सींचता रहे
प्रतिपल
पतित-पावन
संस्कार बनके...
जो केवल
शब्दों की शोभा
न बनकर
शंखनाद सा
बजता रहे
बारबार
प्राणों के तारों पर
शाश्वत ओंकार बनके .
लिख सको तो...

Wednesday, March 21, 2012

बस कोई ...


सत्यश :
जो जैसा है
समर्पित है
स्वयं सत्य को
बस कोई
पूर्ण प्रमाण
देने वाला चाहिए...

सुना है
रोशनी तो
पलक पर ही
विराजती है
बस कोई
दक्ष दस्तक
देने वाला चाहिए....

गिरि पर
गर्भिणी गंगोत्री में
दिखती नहीं गंगा
बस कोई
सूक्ष्म नयन
देखने वाला चाहिए....

कुछ बूंदें
जैसे-तैसे
हाथ तो लगी है
बस कोई
सागर का
पक्का पता
बताने वाला चाहिए...

कहते हैं
काव्य में
मधुरता और
मादकता होती है
बस कोई
संज्ञा सिद्ध
करने वाला चाहिए....

अभी भी
बस एक
जरा सी कड़ी
खोई-खोई सी है
बस कोई
एक आखिरी बात
जोड़ने वाला चाहिए .  

Sunday, March 18, 2012

भीड़


मेरे भीतर
बहुत ही बुरी हालत में
ठेलम-पेल करती हुई
एक बदहवास भीड़
अजीब चाल में मुझे चिढाती हुई
हरवक्त रेंगती रहती है.....
मेरे ही नाक के नीचे
सभाएं आयोजित करती है , रैलियां निकालती हैं
मजे की बात है - मुझे नेता बनाती है
भावुकता के अतिवादी क्षणों में
ऊंचे-ऊंचे वादे करवाती है
आश्वासनों के दीये जलवाती है....
अपने खुले पेट पीट-पीट कर दिखाती है
मांगों की लम्बी फेहरिस्त भी थमाती है
जिसे पूरा करना मेरे बस की बात नहीं
उसी में मैं भी हूँ,कोई मुकुट धारी नहीं...
उम्मीदों के टूटने पर वे मुझे ही
विनष्ट करने की योजना बनाती हैं
और मैं चौबीसों घंटे
पीछे से अनेक -अनेक रूपों में
खुद पर अज्ञात हमलों के डर से
असहाय , निरुपाय महसूसती हूँ....
पूरी हिम्मत जुटाकर उन वादों से
सरेआम मुकर जाना चाहती हूँ
और उस दीये को भी
फूंक मार बुझा देना चाहती हूँ.....
मैंने तो जन्म नहीं दिया है
किसी भी राजशाही या तानाशाही को
बल्कि आत्मबल को थपकियाँ देकर सुलाया है
कमजोरियों के साथ जीना सीखा है
कतार में लगने का अभ्यास किया है
बिना प्रतिवाद के धक्का-मुक्की खाकर
और पीछे होना भी स्वीकारा है
लाल कालीन को घृणा से ही देखा है
जिसके नीचे बहती है खून की नदियाँ....
तो फिर मेरे भीतर
किस क्रान्ति के नाम पर
केवल मशालची ही दिखते हैं
जो मुझे ही मंच पर पटक कर
मेरे हड्डी-मांस-मज्जा से खेलते हैं....
सिर्फ एक वहशत , पागलपन
आशंकाओं का उफनता सैलाब
जैसे कि केवल मैंने ही
उन्हें बना दिया है
बंधुआ मजदूर सा आम आदमी
और धोखे से दिखा दिया है
राजमार्ग के उस छोर का राजमहल.....
मुझमें तो इतनी ताकत नहीं कि
किसी इतिहास को दुहराने से रोक दूँ
या फिर भीड़ को उकसा कर
कोई नया इतिहास रच दूँ.....
विकल्प के अभाव में
अभावों को सहती हूँ
उसी भीड़ के साथ जीती हूँ
और उसी भीड़ में मरती हूँ .




 

Wednesday, March 14, 2012

सृजन बेल


चकित हूँ / चिंतित भी
कलम - कागज़ के बीच
कसमसाती सृजनशीलता को देखकर
जी करता है हरवक्त उसे
हौले - हौले सहलाती रहूँ
विवशताओं की कमजोरियों को
अक्षरों से गुदगुदाती रहूँ........
अब तो इस कलम के सहारे
छोटे - बड़े हर पहाड़ को
जड़ से ही काट लेती हूँ
भूगर्भीय भूकंप के झटकों से
फिर बनते पहाड़ों को भी
झटके में भांप लेती हूँ........
माना कि गेंद बनाकर
शब्दों से खेलते रहना
कोई खूबसूरत शगल नहीं है
पर चोटील दर्द के डर से
चुप्पी की खाई में गिरकर
घुटनों पर घिसटते रहना भी
कोई खुशगवार हल नहीं है......
मन तो ललचता ही है कि
आँखों में जरा खुमार भरकर
सर पर कई-कई पाँव धरकर
अकल्पित/ अपरिचित ओर-छोर को
इस छोटी सी कलम की
छोटी सी नोक से नापती रहूँ
और अति यत्न से संचित
उत्साह को बेझिझक /बेवजह
बस बेहिसाब बांटती रहूँ........
मुझे क्या पता था कि
ये उत्सुकता / आकर्षण ही
सृजन बेल सी लतर जायेगी
और काँटों पर भी ललककर
खुद ही अपना आशय बताएगी .


Wednesday, March 7, 2012

मेरे सांवरे


हाय ! रंगों को भी
कुछ न समझ में आये
मेरा भोला फागुन भी भरमाये..
मैं न जानूं मेरे बावरे
तुझे मेरा कौन सा रंग भाये
जिसमें तू रंग-रंग जाये..
और मुझे भी ऐसे अंक लगाये
कि अंग-अंग केसर बन जाये....
फिर देख पड़ोसन जल-भुन जाये
भरदम कानाफूसी करके
आपस में उलझ-सुलझ जाये.....
सुनो न ! मेरे सांवरे
सब नाजो-नखरा छोड़ कर
तेरी बावरी क्या बोली-
तेरे संग खेलेगी वह होली
और वे झिलमिल तारे
नभ की डोली सजायेंगे
सारे बादल कहार बन जायेंगे
बस तुम मेरे रंग महल में आओ
मदिरा सा अपना प्यार लुटाओ....
मैं भी फागुनी बयार बनके
बेला ,चंपा ,चमेली से
सोलहों श्रृंगार करके
प्राणों से प्रणय की मनुहार करके
खुशबु सी यौवन लिए सकुचाउंगी
और सांस भर-भर कर
मेरे सांवरे
बस तेरे ही रंग में रंग जाउंगी .

Thursday, March 1, 2012

लाजवंती


न जाने
किस बात पर आज
उनसे ही उनकी
ठनी हुई है
जो मेरे प्राणों-पंजर पर
विपदा सी बनी हुई है...
उनकी आँखें
इसतरह से है नम
कि बरस रहे हैं
मेरे भी घनघोर घन....
रूठे जो होते तो
बस मना ही लेती
अपने रसबतियों में
उन्हें उलझा ही लेती....
पर हवाओं से भी
वे कुछ न बोले
अपने पीर का भी
घूँघट न खोले.........
कोई बताये किस विधि
उनसे उनकी सुलह कराऊँ
और विह्वलता के
बूँद-बूँद को पी जाऊँ.....
ये ह्रदय -फूल
क्षण-क्षण मुरझाये
प्रस्तर-प्रतिमा से
जब वे हो जाए......
आखिर कब लेंगे
सुधि हमारी
मैं भी तो हूँ
बस उनकी ही प्यारी....
जब प्रीत किया है
तो क्यूँ न उनकी
दीवानी कहाऊँ
और मैं लाजवंती
लाज की हर मर्यादा को
बस उनके लिए ही
लाँघ -लाँघ जाऊँ .

Saturday, February 25, 2012

क्षणिकाएँ...

सुबह से ही
खोल - खोलकर
खाली किताबों को 
बोल - बोलकर 
पढ़ती हूँ
और रात ढलने तक 
अदृश्य लिखाई से 
अपने पन्नों पर 
केवल तुम्हें ही 
भरती हूँ .

    ***

मर्म की बात
ओठों से कहूँ 
या कि न कहूँ
तुम ही कहो
कि कैसे मौन की 
शेष भाषा में 
केवल  तुम्हें ही गहूँ .

      ***

कुछ साधारण से 
शब्दों को 
जोड़ - जोड़कर
अपने गीतों में 
केवल तुम्हें ही 
रचा है 
पर मुझ सीपी में 
गिरने को 
वो स्वाति बूंद
अभी भी बचा है .

     ***

मोतियों की 
मंडी में तो
एक से बढ़ एक 
मोती चमक रहे हैं
पर मेरी 
चुंधियाई आँखें 
केवल तुमसे ही 
दमक रहे हैं .

Tuesday, February 21, 2012

साबूत


सूक्ष्म  उलझाव  की  गलियों  में
तन-मन   भटक-भटक जाता है
देख उद्विग्न  जगत का उपद्रव
अपने  को  असहाय  ही  पाता है

असंग भाव  में  बह-बह कर भी
संगी-साथी  हिल-मिल जाते  हैं
प्रेम-विरह  के  शाश्वत क्रीड़ा में
ठिठक-ठिठक , रुक  से  जाते हैं

प्राणों  को  कौंधाने  वाली  पीड़ा
क्यूँ   तड़क -तड़क  तड़पाती  है
सह-सह  के मर्माघात अनवरत
किंतु अभ्यस्त कहाँ  हो पाती है

बस  एक बवंडर बन के  धूल का
आँखों  में  यूँ  घिर-घिर आता है
शांत - शिथिल  हो  जाने पर भी
गहरे चिह्न  कोई  छोड़ जाता है

लहक-लहक   कर  आग  उसे तो
पूरी तरह  राख नहीं  कर पाती है
वह  आकाश तो  उड़  ही जाता है
बस एक  बंद मुट्ठी  रह जाती है

छोर  नाप-नाप  थके  पल -छिन
कभी भी, चैन  तनिक  न पाते हैं
बढ़ ग्लानि से  गलबहियाँ कर के
सिसक-सिसक  के  सिसकाते हैं

कई-कई  पर्तों में  वही  एक घाव
उभर -उभर कर  चला  आता  है
कई पाटों  में  पिस-पिस कर भी
साबूत  का  साबूत  बच जाता है  .



Friday, February 17, 2012

द्यूत- बिसात


मन के
हस्तिनापुर में
हमेशा बिछी रहती है
द्यूत - बिसात ..
तार्किक अड़चनों में
उलझा अर्जुन
चुप है
हारे हुए हर दाँव की
लगती ऊँची बोली पर
और शातिर के
पक्ष में घोषित
शापित परिणाम पर ...
फिर भी
इस द्वन्द-युद्ध में
गांडीव उठाकर
कर रहा है वह
कृष्ण की प्रतीक्षा
जो कहीं मगन है
अपने ही रासलीला में .



द्यूत---जुआ 

Monday, February 13, 2012

उसी ढलान पर ...


फिसलन भरी
हर ढलान पर
बस मुस्कुराते हुए तुम
मेरे अनाड़ी किन्तु
अटल अभिमान पर...
हर रुत में मुझसे
करके बाँहाँ-जोड़ी
हलके से उठाकर
मेरी लटकी ठोड़ी
और माथे को चूमकर
तुम कहते हो - यही प्यार है..
संदेह के परे
बड़ी-बड़ी फैलती
भौचक्क मेरी आँखे
देखती है तुम्हें अपलक
और बिजली की गिरती
हर कौंध में
छिटकती है तुमसे
बस मेरी ही झलक...
तुम्हारी मनमोहक निश्छलता
अचंभित करती दृढ़ता
थामे है मुझे
उस ढलान पर भी
जिसपर फिसल रहा है
समय पर सवार जीवन
व सुख-दुःख का हरक्षण.....
अनायास कई बार
उन्हें लपकने को
बढती है मेरी चपलता
पर हर बार
रोक लेती है मुझे
तुम्हारी तीक्ष्ण सतर्कता...
फिर माथे को चूमकर
कहते हो मुझे - यही प्यार है
उसी ढलान पर .

Wednesday, February 8, 2012

गरीबी - रेखा


गरीबी के अंतिम दुर्भाग्य से
पूरी तरह कुचला हुआ
न जाने किस सपनीली उम्मीद पर
हताशा के आखिरी छोर पर भी
मजबूती से टिका हुआ
लिपटे कफ़न में भी जिन्दा गरीब...
चुटकी भर नमक से भी सस्ती
अपनी जान को चुटकी में दबाये
गरीबी के नशे में लड़खड़ाता हुआ
क्यों दिखता है न हमें आपको हर जगह...
जिनके लिए हमने -आपने तो
बिल्कुल ही नहीं ....तो
कहीं इस काल-कुचक्र ने तो नहीं
जबरन खिंचवा रहा है हमसे -आपसे
वही एक रेखा - गरीबी रेखा......
हाँ ! उसी लक्ष्मण रेखा की तरह
हम-आप बातें करते हैं उसे उठाने की
उठ आते हैं कितने ही भाव चुपके से
हमारे ह्रदय के मरघटी कोने में...
जब निकलता है संवेदना के बोल तो
अपने लिए धन्यवाद ज्ञापन उपरवाले को
उनके लिए दिखाते-भींचे ओठ के पीछे
दबा लेते हैं हम राहत की मुस्कान..
चेहरे पर बनाई गयी चिंता-रेखा पर
गुलाबी सुगंध से फड़कते हमारे नथुने..
उपहासी नजरों से खाई को देखना
पुल बनाने का आडम्बर करना
जिसे अँधेरे में गिरा भी देना
इतना काम कम है क्या
अपनी पीठ थपथपाने के लिए....
साथ ही गरीबी-विमर्श से हम
चालाकी से छुपा लेते हैं उस
मारामारी के प्रतिस्पर्धात्मक डर को
जो रेखा मिटने से हो जाएगा बेकाबू
हाँ ! समय बदल गया है
और समय से ज्यादा हम.....
उस रेखा के उस पार हैं वे गरीब
और इस पार हम आधुनिक रावण जो
हरण सा कुकृत्य भला क्यों करने लगे
बस उन्हें थोड़ा खींच कर
उसी गरीबी रेखा पर खड़ा करके
उन्हें यूँ ही जलते देखे .


एक सवाल खुद से ही---- कि हम गरीबी रेखा बढ़ाने के लिए क्या कर रहे हैं ?
 

Saturday, February 4, 2012

मरिचिजल


क्यों भर आता है
उन्मुग्ध नयन
जब ठहर जाता है
शीतल उच्छ्वास भर
उत्कंठित पवन...
घेर लेती है मुझे
कहीं से आकर  
कोई कोमल किरण...
अचानक से
झिलमिला उठता है
बोझिल मन....
धीरे-धीरे पसरता है वही
कुछ अन्तरंग क्षण
जिसमें
खिल उठते हैं असंख्य
व्यथा - सुमन
चहुँ ओर गूँजने लगता है
करुण - कूजन
ओह !
बड़ा बेचैन हो जाता है मन
और वही
यादें हो जाती हैं
इतनी सघन
कि बहने लगती है
व्याकुल नदियाँ बन
तब दृष्टि-परिधि तक
दिखता है केवल
विरह - वन....
और क्या कहूँ ...?
या कैसे कहूँ....
कि मैं विरक्ता
तुम्हारे होने के
हर मरिचिजल पर
भरने लगती हूँ
विकल - कुलाँचे
निरीह मृगी बन .

Wednesday, February 1, 2012

स्वप्नांत


स्वप्नों ने
क्या खोया ,क्या पाया
अपने रंग-बिरंगापन पर
क्या खूब इतराया..
खुद को खींच-खींच कर
न जाने कितना
अजूबा क्षितिज बनाया..
वही भाग-भाग कर
हैरत भरी नजरों से
उसे देख भी आया..
जब पकड़ना चाहा तो
कभी पास तो कभी
बहुत दूर पाया....
तब शायद
खुद पर खूब पछताया
सर पर हाथ रख
घुटनों में मुँह छिपाकर
दो-चार आँसू भी बहाया
तो कभी उस क्षितिज को
धक्का दे-देकर
दूर कहीं अपने ही किसी
अन्तरिक्ष में फेंक आया...
जिसे फिर वह
स्व्प्नगत ही पाया....
स्वप्नों ने
खुद को जिलाया तो
कितना कुछ गंवाया
और वो जो
कितना कुछ बचाया तो
अंतत: स्वप्नांत ही पाया .

Saturday, January 28, 2012

मनतारा


चिड़ियों  की  चीं-चीं , चन-चन
भ्रमरों  का  है  गुन-गुन , गुंजन
कलियों की  चट-चट , चटकन
मानो  मंजरित हुआ  कण-कण

न  शीत की  वह प्रबल कठोरता
न ही  ग्रीष्म की है  उग्र उष्णता
मद्धम- मद्धम   पवन  है  पगता
मधुर- मधुर  है मलय महकता

मधुऋतु का  फैला है सम्मोहन
मंगल- मँजीरा  बाजे  झन-झन
ताल पर  थिरके  बदरा सा तन
मन-मयूर संग नाचे  छम-छम

प्रकृति  से  मुखरित  हुआ गीत
मदिर- मादक  बिखरा   संगीत
अँगराई  लिए  कह  रही है  प्रीत
स्वर साधो , मनतारा  छेड़े मीत .

Tuesday, January 24, 2012

जानती हूँ...


बन कर मेरी छाया तुमने
अनुराग से दुलराना चाहा
पर उलझा सा बाबरा मन
तुम्हें कहाँ समझ पाया...
भूल मेरी ही है जो
अपना इक जाल बनाया है
तुम्हीं से खिले फूल को
तुमसे ही छुपाया है.....
चाहती तो हूँ कि प्रिय !
तुम्हारे अन्त:करण की तेज़ से
अपनी ही प्रतिमा उकेर लूँ
गहरी धुंध के इस बाँध को
झटके में बिखेर दूँ ....
साहस जगे तो स्वीकार करूँ
और तेरी धारा में बह चलूँ ...
हाँ ! तुमने तो
भरना चाहा झोली मेरी
पर रह गयी मैं कोरी की कोरी
कैसा भराव हुआ है... प्रिय !
खाली-खाली रह गया है कहीं..
स्तब्ध ह्रदय में जब झाँका है
तब निज दुर्बलता को आँका है..
उजियारे में नैन मूंदकर
कौतुक भरा बाल-क्षण जीकर
रह-रह कर आँख डबडबाया है
जानती हूँ...
अनमोल सा इस जीवन में
कैसे अपना मोल घटाया है .


Friday, January 20, 2012

फरमा

एक ही फरमा में
भली-भांति कसकर
कितनी कुशलता से
सभी सम्पादित करते हैं
दैनंदिन दैनिक-चर्या
सेंटीमीटर , इंच से
नाप - नाप कर..
कांटा - बटखरा से
तौल - तौल कर..
रात को शुभरात्रि
कहने से पहले ही
करते हैं हिसाब-किताब
नफ़ा - नुकसान का
वही चित्रगुप्त वाला
बही-खाता पर
वही-वही लेखा-जोखा....
भावी योजना पर विचार
ज़रूरी फेर - बदल
कुछ ठोस उपाय
कुछ तय - तमन्ना
कल को और
बेहतर बनाने का....
आँख लगने के पहले ही
आँख खुलने के बाद के
कार्यक्रम को तय करना...
वाह रे ! माडर्न युगीन
मशीनी मानव
फिर -फिर
खुद को ही
फ़रमान जारी करते रहो
उसी फिक्स फरमा में
फिर से फ़िट होने का .

Tuesday, January 17, 2012

मान


मन की मजबूरियों की
क्या कीमत लगाओगे
या बात-बात पर
नपे-तुले व्यावहारिकता की
चादर ओढाओगे...
ध्रुवों पर कील गाड़कर
आस्था-विश्वास को
बाँध आओगे और
उन्हें जोड़ने के लिए
कच्चा-पक्का पुल बनाओगे
फिर आग्रहों का सहारा लेकर
भारी पाँव को घसीटोगे
तो सारी जुगत भीड़ जायेगी
खुद को बचाते हुए
मुझ तक आने में ही...
जैसे-तैसे आ तो जाओगे
पर सोच लो क्या दोगे
रास्ते का जोखिम भरा ब्योरा
या जुगत का दांव-पेंच
या फिर उसी चादर की
देने लगोगे दुहाई पर दुहाई..
जबकि मैं उसी ध्रुव पर
हर चादर उताड़े खड़ी हूँ
हर कीमत या जुगत को
आग्रहों के अलाव में झोंक कर
बस थोड़ी सी गर्मी के लिए...
जो थोड़ी सी गर्मी
तुम्हारी गर्म साँसों की
और तुम्हारी नर्म बाहों की मिले
तो सदियों तक यूँ ही
यहीं खड़ी रहूँगी
क्योंकि मैंने
मान दिया है
मन की मजबूरियों को
और जान लिया है तुम्हें .

Saturday, January 14, 2012

हैया-हो ...


हर तूफान  से जीत जाना है
हैया-हो  ,  हैया-हो  गाना  है

नहीं गिरने में  क्या  सौरभ
गिर कर  उठने  में है गौरव
जितना  आये  बाधा  रौरव
ललकारे हैया-हो का आरव

विकराल  सा भँवर  का  डर
घेरता   रहे  कहीं  से आकर
जीतना  है  उन से  लड़ कर
हैया-हो  , हैया-हो   गा  कर

लहरों में  बस उतर  आना है
तूफानों के  बीच में  जाना है
सदा  पतवार  को चलाना है
हैया-हो ,  हैया-हो   गाना  है

किनारे पर  है सूखा सौन्दर्य
निर्जीव शांति,निष्क्रिय धैर्य
लहरों से  खेलने  में  है शौर्य
तब  हैया-हो  देता है  ऐश्वर्य

जिसे लहरों में उतरना  आता
उस साहस से सब  है  थर्राता
लहरों  के पार  वही  है  जाता
और झूम के हैया-हो है गाता

हर तूफान  से  जीत जाना है
हैया-हो ,  हैया-हो   गाना   है .



रौरव - भयंकर
आरव - तीव्र ध्वनि



Tuesday, January 10, 2012

नकेल


अतृप्त अतीत ने
परिचय बताने से
क्या इनकार किया
कि भारग्रस्त भविष्य भी
पाला बदल कर हो लिया
अतीत के साथ ...
पहले रंग के पहले का
व सातवें रंग के बाद के रंग को
मिल गया सुनहरा मौका
चाँदी काटने का और
चहक कर भर लिया है
अपने अँधेरे आलिंगन में
इस आज को...
स्पर्श इन्द्रियाँ फड़फड़ा रही है
अपने ही दीवारों के अन्दर..
वीरानी पलकों में ही
सपनों के दर्प टूट रहे हैं..
यादों के हिमखंड भी
हिमरेखा पर पिघल रहे हैं...
सांसों के गाँव में
मरघट सा सन्नाटा है..
संबंधों-अनुबंधों के बीच
स्मृति-धागा टूट सा गया है..
भरे बाज़ार ने खोटे सिक्के को
संदेह की नजरों में घेर लिया है..
जिसे देखकर
उदासी की छाँव भी चुपचाप
अपने में सिमट गयी है..
उफ्फ़ ! मुश्किल हो रहा है
व्यर्थता के बोध को संभालना..
अब क्या करना चाहिए...?
चलो समेटा जाए
सुन्दर भ्रांतियों के सूक्ष्म संवेगों को...
बस मिल तो जाए
ये खोया हुआ ' आज '
तो अतीत-भविष्य को
धोबी-पाट लगा ही देना है
उनका नकेल कसकर
अपने हाथ में करके उन्हें
बस अपने हिसाब से चलाना है .


Saturday, January 7, 2012

तरंगों में...


मेरे आशा के अनुरूप
सुलझाया तुमने
आपस में उलझे
मेरे अव्यक्त विचारों को
न चाह कर भी
उलझ रहे हैं उन्हीं में
मेरे अहसास...
अब न जाने क्यूँ
मौन होकर तुम
सुलझाना चाहते हो मुझे
जबकि उसे भरते-भरते
और भी मैं
उलझ ही रही हूँ...
अभिव्यक्ति दो तो
परिणति चाहता
वो परितप्त विचार
मुक्त हो सके
उन्मुक्त गगन में...
मौन तो होना ही है
चाहे सो जाए
चाँद की गोद में
या छू ले
उस दहकते सूरज को...
पर प्रिय !
रोक सकते हो तो रोक लो
उन तरंगो को
जो तुमसे निकल कर
आती है मुझतक...
तुम मुझे
अपने तरंगो में
इसतरह उलझा कर
कितना सुलझाओगे
या मुझसे भी
निकलती तरंगो में
तुम भी
मेरी तरह ही
उलझ जाओगे..?

Tuesday, January 3, 2012

कर्फ्यु


मेरे मन के
शांत संसार में
कुछ असामाजिक
विचारों ने अनायास
कर दिया है
बम - धमाका
पुनर्शान्ति के लिए
लगा दिया है
मैंने भी कर्फ्यु..
पर कविता तो
छूट गयी है
उन्हीं विचारों के
अभेद्य दुर्ग में..
न जाने कैसे
लुट-पीट रही होगी
और उसे
बचाने के लिए
रोक रही हूँ
मैं भी कलम .

Saturday, December 31, 2011

स्वर्ण दिन आये क्या , लो गये ...


तिथियों को कई रूप में  ढल जाते  देखा
क्षण को अगले क्षण में धँस  जाते  देखा
दुःख को घर में ही एक घर  बनाते देखा
सुख को बस क्षितिज सा  लहराते  देखा

   जाग्रत स्मृतिओं में  सब  सो गये
   स्वर्ण दिन  आये  क्या  ,  लो गये

हरे-हरे  पत्ते  झटके में यूँ  झड़  जाते  हैं
खिले सुन्दर फुल  भी  यहाँ  मुरझाते  हैं
तरु-कंकाल तो  मिटने से  भय खाते  हैं
बिन  हवा  के  ही  घोंसले उजड़ जाते  हैं

   अनऋतु में भी रुत सारे बदल गये
   स्वर्ण दिन  आये   क्या  ,  लो गये

झूठ को  बैसाखियों से  दौड़  लगाते देखा
सच के खँडहर को यूँ  ही  भरभराते देखा
पंछीमन को तो जाल में  फँस जाते देखा
और जाल लिए दूर कहीं  उड़ जाते  देखा

   जो नहीं हैं हाय !  हम वही हो गये
   स्वर्ण दिन  आये  क्या  ,  लो गये

काल के अजनबी भँवर  जब पड़  जाते हैं
कई-कई शिखर अनजीते  ही रह  जाते हैं
पाँव तले  हर  पड़ाव भी  खिसक  जाते हैं
और  हार को  हार बना  गले  लटकाते  हैं

   पानी देखते ही वाह! प्यास हो गये
   स्वर्ण दिन  आये  क्या  ,   लो गये .






Tuesday, December 27, 2011

मीठा-मीठा

जमाने से जमा
जमाने भर की
शिकवा - शिकायतों को
बड़ी सी गठरी में डाल
जोरदार गाँठ लगा
पीठ पर लादकर
जमाने से जमा
सारी खीज और झल्लाहटों को
पीसकर भांग सा गोली बना
झटके में हलक से उताड़ने पर
धीरे-धीरे चढ़ता है जो सुरूर
फुर्र हो जाता है सारा ग़रूर
अपने ही पिंजरे को तोड़
कोई उड़ जाता है
आसमानी जहाँ में पहुँच
आसमान सा हो जाता है
बादलों पर बैठ कर
हवा संग बलखाता है
कौंधते बिजली को पकड़
चाँद को मुँह चिढ़ाता है
लाख मना के बावजूद
अजीब सा दाढ़ी - मूँछ
उसके मुँह पर बनाता है
ऊँघते हुए सूरज के
सातों घोड़े की पूंछ में
जलता पटाखा बाँध आता है
बिखरे सितारों को भी
एक कतार में खड़ा कर
थोड़ा वर्जिश करवाता है
ओह ! वह चुहलबाज़
दम भर सबके
नाक में दम कर देता है
इसी भागा-दौड़ी में
पीठ पर लदी गठरी भी
कहीं गिर जाती है
सारी खीज और झल्लाहट
मीठी-मीठी शरारत में
बदल जाती है
और जमाने भर से
जमाने भर के लिए
दबा कर रखा हुआ
कुछ मीठा-मीठा सा
उभर आता है .
 
  
  

Saturday, December 24, 2011

पहुनाई


घुमता हुआ चाक
ठहरी    है   कील
बौराया सा वर्तुल
नापे    है     मील
इतरा -इतरा कर
बहके    है  नागर
माटी  का पुतला
है  राज़  उजागर
कंचन  की   बेड़ी
सपनों की झाँकी
आँसू  की लड़ियाँ
पाँसी   में   पाँखी
भर आये  मनवा
उलाहना के बोल
फूट     न     पाए
बूझे   तब    मोल
बिन   बताये   ही
जो  हाँक   लगाई
दुविधा में पथिक
क्षण  की पहुनाई
न - नुकुर     करे
भंग   होवे   शील
घूम    रहा   चाक
ठहरी    है    कील .



Wednesday, December 21, 2011

झणत्कार


कभी वो करीब से गुजर गया
कभी वह और करीब हो गयी
कभी वो छेड़ गया आहिस्ते से
कभी वह भी चिढ़ा गयी उसे
कभी वो सिहरा गया प्यार से
कभी वह गुदगुदा गयी उसे
कभी वो भर लिया बाँहों में
कभी वह फिसल गयी उससे
कभी वो बना गया उसे नया
कभी वह निखर गयी उससे
कभी वो छलक गया उससे
कभी वह छिप गयी उसी में
कभी वो बह गया उससे
कभी वह समा गयी उसमें
कभी वो रच दिया उसको
कभी वह हवा सी हो गयी
यूँ ही अनवरत चलता रहता है
उनका प्रणय- सृजन और
जन्म लेती हैं कवितायें
मैं तो तन्मय हुई जाती हूँ
शब्द और चेतना के बीच
इस अद्भुत समागम में
और केवल पहनाती रहती हूँ
कविताओं के पाँव में पायल
झनक-मनक करती हुई वह
जिस ह्रदय तक पहुँचती है
अपनी निरी झणत्कार से
क्षण भर के लिए ही सही
उसे झंकृत कर जाती है .


Friday, December 16, 2011

मिट्टी की सेज

नहीं चाहा कभी
मिट्टी की सेज पर बिछना
और मिट्टी हो जाना
बस गंधी से कुछ गंध
उधार लेकर
भर दिया कल्पनाओं में
कर दिया हवा के हवाले
नहीं पता था कि
पंख समेट कर हवा भी
चल देगी अपने रस्ते
मिट्टी पर गिरकर वो
गंध जायेगी उसी गंध में....
वही भभका देगा
फूल बनने के स्वांग को और
कन्नी काटकर निकल लेंगे
भंवरे , तितलियाँ ....
बैठकखाने के सजावट को भी
खिल्ली उड़ाने का
मिलेगा मौका भरपूर...
नहीं पता था कि
मिट्टी में गड़कर
मरना होता है , सड़ना होता है
फूटती हैं तब कोंपले
चाहतों का क्या
बस चाहना काम है...
अभी भी बस
भनक ही लगी है कानों को
पता चलते - चलते
पतझड़ में तो
जरुर मिलना होगा उससे..
अभी दिख रहा है
भागता हुआ बसंत
पतझड़ के पीछे...
कल्पनाओं में ही खिले रहे
अमरबेलों पर फूल
न मुरझाने वाला
गंधी को उधार लौटाने का
जी नहीं कर रहा है ... 
हाँ , नहीं बिछना चाहती हूँ
मिट्टी की सेज पर
नहीं होना चाहती हूँ मिट्टी
खुद से जो प्यार हो गया है .

 

Tuesday, December 13, 2011

विरह - गीत


हमारे - तुम्हारे  विरह  ने पिया
दर्द के गीत को जनम  दे दिया


अनदेखे से परदेश में , हो  तुम
न जाने किस वेश में  , हो तुम
तेरी स्मृतियों में   ही , मैं  घूमूँ
नाम तेरा  ही ,  ले  लेकर  झूमूँ
जोगन को मैंने भी  जोग लिया
बेमोल ही दर्द  को , मोल लिया

हमारे - तुम्हारे  विरह  ने पिया
दर्द के गीत को  जनम दे दिया


हियरा   रह - रह   के   हहराये
भीतर- भीतर   घुट- घुट  जाये
हर आहट पर  ऐसे चिहुंक  उठे
लाख मनाऊँ फिर भी क्यों रूठे
नेह ने जाने कैसा हिलोर लिया
आँधी बन  मुझे झझकोर दिया

हमारे - तुम्हारे  विरह  ने पिया
दर्द के गीत को  जनम दे दिया


कैसे बाँधूँ अपने  बिखरे मन को
सूली के जैसे ,  इस  सूनेपन को
मुझको यूँ , अब  भटकाओ  मत
साँसों की कथा  लिखवाओ  मत
शब्दों में बस मुझे ही ताना दिया
गीतों का तो , बस  बहाना लिया

हमारे - तुम्हारे   विरह  ने पिया
दर्द के गीत  को  जनम दे दिया


कैसे  तुझ  तक ,  इन्हें  पहुँचाऊँ
इतनी पीड़ा  से ,  मैं  ही  लजाऊँ
मृग - जल मन को  है  भरमाता
मेघों से जुड़ गया  है  इक  नाता
क्या तुने ऋतुओं को  बोल दिया
इन पलकों में सावन घोल दिया

हमारे - तुम्हारे  विरह  ने पिया
दर्द के गीत को  जनम दे दिया .  






Friday, December 9, 2011

चमत्कार

भूगोल की बात होती तो
जरुर होता
कोई न कोई नक्शा
नहीं तो अवश्य ही होता
कोई भी सूक्ष्म सुराग
तहों के पार का ...
कार्य - कारण के
प्रतिपादित सिद्धांतों के बीच
अकारण घटित अनपेक्षित तथ्यों का
कोई न कोई मिलान बिंदु तो
जरुर होता और
इस बिंदु से उस बिंदु पर
उस बिंदु से फिर उस बिंदु पर
पहुँचने का कोई संकेत-सूत्र
अवश्य ही होता...
अपरिचित नियमों से
सरक जाता घना आवरण
निरपेक्ष नियमों से
उम्मीद की जाती
पक्षपाती सख्ती कम होने की....
फिर तो व्यथा से होते
सतत उल्कपातों का भी
मिल जाता कोई ठोस कारण....
ये सब होता तो कोई
चमत्कार नहीं ही होता
पर सच में अगर
ऐसा हो जाता तो यक़ीनन
चमत्कार ही होता .

Monday, December 5, 2011

मेरी मटकी

मैं चतुरी
एक मेरी मटकी
उस मटकी में
भर कर
अपने संसार को
सिर पर रख
चला करती हूँ
मटक मटक कर
अपनी ही राह पर.....
आँखों में बनते
मन में बसते संसार को
उसी मटकी में
भरती जाती हूँ...
अपने संसार में
ऐसे मगन होती हूँ कि
उड़-उड़ कर
छूने लगती हूँ
अपने गगन को...
अचानक से
टकराती भी हूँ
किसी संदिग्ध
संक्रमित संसार से
गिरती हूँ औंधे मूँह
टूट जाती है
मेरी मटकी
और बिखर जाता है
मेरा संसार भी....
मूढ़ता या बुद्धिमत्ता में
मैं चपला
उसी क्षण
अपनी मटकी में
एक और संसार भरती हूँ
फिर सिर पर रख
फिर उसी राह पर
चलने लगती हूँ
मटक मटक कर .

 

Friday, December 2, 2011

आयोजन

मैंने लिखना चाहा
केवल एक गीत
तुम्हारे लिए...
हर बार
सबकुछ हार कर
वही एक गीत लिखती हूँ
पर तुम्हारा रूप
और विस्तार पा जाता है
जो मेरे गीतों में
नहीं समा पाता है...
हर बार
मेरा गीत हार जाता है....
मैं फिर लिखती हूँ
नए गीतों को
जिसमें तुम्हें
पिरो देना चाहती हूँ..
लेकिन कुछ
शेष रह जाता है
जिसे मेरा गीत
नहीं अटा पाता है....
जो शेष रह जाता है
वही मुझसे
बार-बार
नये गीत लिखवाता है
मुझे स्तब्ध कर
फिर से
वही शेष रह जाता है ....
तुम्हारे लिए
मैंने लिखना चाहा था
केवल एक गीत
पर यूँ ही
मेरा सारा आयोजन 
धरा का धरा रह जाता है .

Tuesday, November 29, 2011

आहों में ..


चलते-चलते थक जाती
पाती  न   पंथ की सीमा
अवरोधों से डिगता धैर्य
फिर भी  न  होता धीमा

प्यासी  आँखे  बहती  है
बूंद-बूंद   में हुआ जीना
चिर अतृप्त  सा जीवन
अंजुरी  भर  चाहूँ  पीना

न मिले  तृप्ति  कणभर
सागर और भी तरसाया
इक आकाश  की चाह ने
मुझको  है बस भरमाया

अंतरदृग  में  वही  छवि
हर  इक  पल   रहती  है
जो वह  कह  नहीं  पाया
वो सबकुछ ही कहती है

हाथ  बढ़ा  छू  लूँ  उसको
भींच  लूँ  अपनी बांहों में
पाने में तो  खो दिया उसे
खोकर पा लिया आहों में  .




Friday, November 25, 2011

म्यान

अपनी तरफ से मैंने

कभी कोई पहल नहीं किया

उसने किया भी तो, मैं

अनजान बन गयी

उसी के साथ म्यान में हूँ

अनजाने, अनचीन्हे रिश्ते लिए

और हमेशा बीच में देती रही

अनबन को ज्यादा जगह....

हालाँकि कोई घोषित दुश्मनी

या कोई धर्मयुद्ध है

ऐसा भी नहीं पर हरवक्त

होती रहती है तलवारबाजी...

सम्मानजनित सामंजस्य

सभ्य सुरक्षित वार

घाव भी ऐसे देना कि

प्रतिरक्षण प्रणाली

आप ही कर ले दुरुस्त....

कोई शर्त या बाध्यता नहीं

रण में डटे रहने की

संवेदनशील भावहीनता

भाषा जनित संवादहीनता

संकेतो या तरंगों के बीच भी

अनजानी अर्थहीनता........

बस पुतलियाँ बड़ी- बड़ी कर

एक- दूसरे को घूरना

उबन कम करने के लिए

उबासियाँ ले ले कर

थपकियाँ दे दे कर

एक- दूसरे को जगाते रहना.....

या फिर मुँह फेरकर

अनजाने रिश्ते में

थोड़ी और खटास घोलना.....

मुझपर हावी है वो और

भारी भी पर, मैं भी

कुछ कम तो नहीं.....

ये म्यान मेरा है

उसकी अपनी मजबूरियां है

तो फिर वायदा- कायदा को

तोड़- ताड़ करने में

कुछ जाता भी नहीं है.......

ज्यादा चिढेगा वो, भागेगा

और इस खोखले म्यान को तो

खाक होना ही है

फिर बाँचने वाले बाँचते रहेंगे

खोखले म्यान की

खोखली महिमा .

 

Tuesday, November 22, 2011

द्वार तुम्हारा खुला नहीं...


इक  झलक  तेरी  जो  मिली
चली  आई  तेरे  द्वार   तक
बड़ी  देर से साँकल बजा रही
प्राणों से  भी  खूब  थपकाया
पर द्वार तुम्हारा खुला नहीं

जोर - जोर से  तुम्हें  पुकारा
रुंधा गला तो विवश  निहारा
तुमने कैसे  मुझे  सुना  नहीं
या अनसुना कर अस्वीकारा
पर द्वार तुम्हारा खुला नहीं

व्यथा - पुष्पों  से  सजा कर
वेदना का  वंदनवार बनाया
साँसों  की   वेद - ध्वनि   से  
आर्तनाद  कर  तुम्हें बुलाया
पर द्वार तुम्हारा खुला नहीं

आँसुओं का  अर्घ  चढ़ा  कर
नैनों का अखंड दीप जलाया
भावों का  ह्रदय - थाल लिए
विरव समर्पण कर मनुहारा
पर द्वार तुम्हारा खुला नहीं

मैं  अलबेली   हार   न  मानूं
द्वार पड़ी  बस  तुझे  पुकारूं
इक  झलक  पाने   के   लिए
अब तो अपना मान भी वारा
पर द्वार तुम्हारा खुला नहीं

मैं  विरहिणी  आस  न  छोडूं
कर तो  रही  हूँ  सारा  जतन
रूठे  हो   क्यूँ   मेरे   प्रियतम
क्यूँ  तुमने  है  मुझे  नाकारा
पर द्वार तुम्हारा खुला नहीं .

Saturday, November 19, 2011

सर्द राते हैं


कंपकंपाते अधरों पर , तुमसे कहने को
कितनी  ही  बातें  हैं ,    सर्द   राते    हैं

बादल के गीतों पर ,चाँदनी थिरकती है
ओस की बूंदे , जलतरंग  सी  बजती  हैं
हवाओं की थाप से तारे झिलमिलाते हैं
कितनी   ही  बातें  हैं ,    सर्द   राते    हैं

धीरे से कोहरा अपनी चादर फैलाता  है
थरथराते वृक्ष-समूहों को  ढक जाता  है
पत्ते की ओट लिए फूल सिमट जाते हैं
कितनी  ही   बातें   हैं ,   सर्द   राते    हैं

हिलडुल कर झुरमुट कुछ में बतियाते हैं
दूबों को झुकके बसंती कहानी सुनाते  हैं
जल-बुझ कर जुगनू  कहकहा लगाते  हैं
कितनी   ही   बातें   हैं ,   सर्द   राते    हैं

थपेड़ों को थपकी में,नींद उचट जाती है
बिलों में सोई ,  जोड़ियाँ कसमसाती  हैं
नीड़ों में दुबके , पंछी  भी  जग जाते  हैं
कितनी   ही  बातें  हैं ,   सर्द    राते    हैं

ठिठुरी सी नदियाँ ,सागर में समाती  हैं
लहरों के मेले  में ,   ऐसे   खो जाती  हैं
उठता है ज्वार  और  गिरते  प्रपातें   हैं
कितनी   ही   बातें   हैं  ,   सर्द  राते   हैं

कोई नर्म  बाहों का  , घेरा  बनाता   है
गर्म पाशों में,  सर्द और उतर आता  है
घबराते, सकुचाते ,  नैन झुक जाते  हैं
कितनी  ही  बातें  हैं ,    सर्द   राते   हैं

तुमसे  कहने को  ,   जो  भी  बातें    हैं
इन अधरों  से ही ,क्यों लिपट जाते   हैं .
           
 

Tuesday, November 15, 2011

उसे जगाओ !

जरा देखो  तो !    ये   अचरज
कहीं ठहरा तो  नहीं है   सूरज
 
मौन  अँधियारे के  उस  छोर पर
सुन्दर  सी  सुबह  लाने  के लिए
अहर्निश,अहैतुक,अक्षय उर्जा को
अहो ! तुममें भर  जाने के  लिए
 
सपनों की   गहरी   सी   नींद में
द्वार - दरवाजे  सब  बंद  किये
और  करवट बदल - बदल  कर
सोया  है  कौन ,   उसे   जगाओ
 
कल्पनाओं  की  छद्म  नगरी  में
चुम्बकीय   मायावी  महल  को
हीरे - जवाहरातों   से  जड़ने  में
खोया है  कौन  ,  उसे  जगाओ
 
बंदी  बन    बाँगुर   में   फँसकर
बुद्धि पर चढ़ाए  मोटा  प्लस्तर
आँखों  में  स्वयं  कील  गड़ाकर
रोया  है  कौन ,    उसे   जगाओ
 
देखो असंख्य फूल खिल रहे है
अनगिनत  खग   चहक  रहे हैं
निज को  दुःख की लड़ियों  में
पिरोया है  कौन,  उसे  जगाओ
 
अब तो जागो  !  जाग भी जाओ
आसमानी मन पर सूरज उगाओ
 
परोक्ष   मार्ग  से   आती  पुकार
ये जीवन  है   अनमोल  उपहार
कण - कण का  ऋण  चुकाकर
कर लो  अपनी  जय - जयकार.

Friday, November 11, 2011

दुर्निवार दर्द

एक तो भीषण मानवता का वीभत्स सत्य
और विचलित करने वाला दुर्निवार दर्द
जिसका विशेषीकरण करने के क्रम में
संभ्रमित संवेदनाओं का पुट तो ठीक है
पर लगाए गये जोरदार छौंक से
जो उठता है दमघोंटू धुँआ
घुस जाता है नथुनों से फेफड़ों में
मरोड़ने लगता है पूरा कलेजा
उलझ जाती है अतड़ियाँ और भी
आने लगती है उबकाई पर उबकाई
नसों में दौड़ता विद्रोही ख़ून भी
रुकने लगता है जहाँ - तहाँ
तापक्रम के अति चरम पर
खलबलाने लगता है खूब
अपनी ही नदियाँ बहाने के लिए 
उताड़ू रहता है बात बात पर
कितना भी समझाया- बुझाया जाए
उल्टा करने लगता है शास्त्रार्थ
अपने सवालों के बवंडर में
कोमल भावनाओं को फँसा कर
तिरोहित कर देता है
इन्द्रधनुषी तृष्णा व तृप्ति को
सहज , सुन्दर आकर्षण को
जीवन के सारे तारतम्य को
जो आकाश-कुसुम सा खिला रहता है
जिलाए रखता है हमें और हम
उसी को ताकते - ताकते
कृत्रिम सुगंधों से ही सही
भरते रहते हैं प्राण - वायु
अपने अस्तित्व के तुरही में...
दर्द और संवेदना जरुरी है
खुशियों का मोल समझने के लिए
पर अति क्यूँ इति सा लगता है ..
सभी इन्द्रियों से तुरही को सुनने पर    
संवेदना का स्वर तो निकलता ही है
साथ ही खुशियों-आशाओं का
ऐसा मधुर गीत भी निकलता है कि
दुर्निवार दर्द बन जाता है
भरपूर जीने की प्रेरणा और शक्ति .

Saturday, November 5, 2011

बातें हैं ...

बातें हैं , बातों का क्या
हवा सी डोलती - फिरती
आड़ी - तिरछी दिशाओं में
उल्टा - सीधा कोण बनाती हुई
ज्यामितीय परिभाषाओं को
तोड़ती-मरोड़ती, बनाती-बिगाड़ती
छूना चाहूँ तो अपने ही केंद्र में
चुपचाप सी दुबकती बातें
पकड़ना चाहूँ तो परिधि पर
घुमती- घामती , नाचती- भागती
मुझे ही लट्टू बनाती बातें
बलात कोई चक्रवात
खींच ले मुझे अपने पाताल में
और उसके परतों का करना पड़े
अध्ययन दर अध्ययन .. ओह !
बातें हैं , बातों का क्या
बादलों की तरह
सर्द होऊं कि बरस जाती है
इतना कि डूबती-उतराती रहूँ और
बनाती रहूँ डोंगी ,नैया ,जहाज
या फिर उसे उलीचती रहूँ
डूबी रहती हूँ पूरी तरह
बातें हैं , बातों का क्या
अटक कर , कुरेदती हुई
बना देती है रिसता घाव
उसे छलनी में डालूँ भी तो
छलनी सी हो जाती है
बात पर जो आऊँ तो
उड़ा देती है अपनी बातों में
बिखरी पड़ी है बरकती बातें
ये भोथरी- बरछी सी बातें
खुलती- गाँठ सी बंध जाती बातें
बातें हैं , बातों का क्या
कितना भी पलट दूँ
फिर भी निकलती हैं बातें .
 

  

Sunday, October 30, 2011

शून्य दिमाग़ में

शून्य दिमाग़ में
अचानक दौड़ पड़ता है
रेस लगाता घोड़ा
पछाड़ खाकर
गिरता है 
धड़ाम !
शून्य दिमाग में
उग आती है
हरी-हरी घासें 
कहीं से गाय बकरी
आकर चरने लगती हैं
कर देती हैं 
सपाट !
शून्य दिमाग़ में
रेंग पड़ते हैं
असंख्य कीड़े
मुँह मारते , स्वाद लेते
चूसते हुए कर जाते
सड़ाक !
शून्य दिमाग़ में
अंडे तोड़कर
निकलते हैं मेढ़क
उड़ने की चाह में
फुदकते हुए 
गिरते हैं उसी में
छपाक !
शून्य दिमाग़ में  
प्रेम करते हैं
शेर और शेरनी
एक-दूसरे को
काटते-नोचते हुए
गूँज उठती है उनकी
दहाड़ !
शून्य दिमाग़ में
टकराते हैं बादल
नसें चटकती हैं
बीजली चमक कर
गिरती हैं 
तड़ाक !
शून्य दिमाग़ में
उफनता है समंदर
उठते लहरों को
एक-एक कर
अपने में ही 
कर जाता है
गड़ाक !
 

Tuesday, October 25, 2011

मैं...तन्मय

1.
मेरी मौन
साधना में
गूंजते हो तुम
ओSSम बनकर
मेरे साध्य
साधती हूँ तुम्हें
हर साँस पर
मैं तन्मय होकर .
 
 
२.
मैं मात्र
हूँ एक पात्र
जिसमें
भरे हो तुम
मैं तन्मय
हो गयी चिन्मय
और अमृत
मेरे हो तुम .
 
 
३.
तुम्हें
शब्दों में
बाँधने की
युक्ति है या
स्वयं से मुक्त
होने की है
याचना ज्योतिर्मय
जिससे मैं हो जाऊं
तुममें केवल तुममें
..................तन्मय .
 
 
4.
 
हर क्षण
जलती हूँ मैं
तन्मय होकर
आलोकित
होते हो तुम
मेरी
आभा बनकर.
 
 
                    ***  शुभ दीपावली ***
 
 
 

Saturday, October 22, 2011

सार - वृत

जब एकोsहं बहुष्यामि
बहुष्यामि एकोsहं
तब केवल
''अहं ब्रह्माष्मी '' का 
हम क्यों पाले हैं भरम...
हम क्यों नहीं जानते
निज से औरों का मरम..
सब पोल खुली है फिर भी
हमें नहीं आती हाय! शरम..
काहे का ये झगड़ा - टंटा
फिर काहे कोई अनबन.........
तेरी - मेरी का ये चक्कर
क्यों नहीं बूझे लाल बुझक्कर
बड़े - बड़े भी यहाँ पर
खुद में है महा फक्कड़......
काहे का ये लटका - झटका
फिर काहे कोई उपक्रम....
जब सार- वृत
यही है जीवन का ---
शिवो s हं  शिवो s हं
सच्चिदानन्दों s s s हं
अप्रिय बात शुरू करने से पहले
सारी बात करो खतम .
   

Tuesday, October 18, 2011

ब्लॉग जगत

आम  लोगों  का   ये     ब्लॉग जगत
हर किसिम  के लोग   यहाँ आते  हैं
हर किसिम का आम खिलाते ही हैं
और  उसका  गुठली   भी  गिनाते हैं

ख़ास   लोगों  का  ये   ब्लॉग जगत
बेहद   ख़ास   लोग  यहाँ    आते   हैं
खुबसूरत   ख़ालिश    ख्यालातों   से
इस  जगत में  कई   चाँद लगाते हैं

वाद -प्रिय लोगों का ये ब्लॉग जगत
अनेकों  वाद    लिए      यहाँ   आते  हैं
कलम की  तअब -ताकत    दिखाकर
सशक्त  उपस्थिति  दर्ज      कराते  हैं

विवाद-प्रिय लोगों का ये ब्लॉग जगत
अनर्गल बातों  से  बक -वाद कराते हैं
वाद - प्रतिवाद  को   हवा  दे  दे    कर
ऐसा वैसा चाहे जैसा टिप्पणी पाते हैं

खिचड़ी-खीर  सा   ये      ब्लॉग जगत
पिज्जा- बर्गर सा   ये     ब्लॉग जगत
पेप्सी - कोला सा   ये     ब्लॉग जगत
या भंग मिले ठंडई सा ब्लॉग जगत .


मुझे भी लत लग गयी है --ठंडई की . 


    

Friday, October 14, 2011

झंकार

कौन अपनी अकुलाहट को जानता है
काल-व्यूह से निकलने को ठानता है
कुछ अस्पष्ट सी ध्वनि को टानता है
परिवर्तन की आहट को पहचानता है

लग गयी किस को ये कैसी लगन है
काल-चिंतन में ही जो बस  मगन है
बड़वानल- सा हर क्षण जो  चेतन है
सुगन्धित हो रहा कनक -चन्दन है

एक- एक कर संगी - साथी छूटते हैं
अभंग जिसकी सीमाएं , भी टूटते हैं
जब ह्रदय से यूँ ही फव्वारे  छूटते हैं
तब मरू- भूमि में भी अंकुर फूटते हैं

क्यूँ भीतर- भीतर मचा  हाहाकार है
किसलिए मुझे देता कोई ललकार है
न जाने कौन -सी सत्य की पुकार है
संभवत: मेरे मैं की  पहली  झंकार है

अदृश्य- सी डोर से खींचता  है   कोई
अज्ञात - अब्धि में  सींचता  है  कोई
अनवगत - सा पथ दिखाता है  कोई
अप्रति मैं ही हूँ वही या है इष्ट कोई.  
  
 

Sunday, October 9, 2011

तुम्हें लगता है....

तुम्हें लगता है
बहती हूँ मैं
हवाओं की तरह
भरता रहता है
तुममें प्राण.......
तुम्हें लगता है
लहराती हूँ मैं
नदियों की तरह
भींगे-भीगें से
तरंगित होते हो तुम......
तुम्हें लगता है
महकती हूँ मैं
फूलों की तरह
मादकता से
उन्मत्त होते हो तुम......
तुम्हें लगता है
चहकती हूँ मैं
चिड़ियों की तरह
नाच उठता है
तुम्हारा मन-मयूर........
तुम्हें लगता है
चमकती हूँ मैं
सूरज की तरह
रोशनी से
भरे रहते हो तुम.......
तुम्हें लगता है
छिटकती हूँ मैं
चाँदनी की तरह
शीतलित होता है
तुम्हारा रोम-रोम.......
प्रिय !
ये प्रेमातिरेक है या
उसकी सहज प्रवृति
पर मुझे लगता है
कि ये है तुम्हारी
आत्म-विस्मृति...
या फिर
तुमने मान लिया है
कि मैं हूँ तुम्हारी
कोई निगूढ़ प्रकृति .
 

Wednesday, October 5, 2011

मेरे शब्द

मेरे शब्द
जिससे मैं कहती हूँ
दुनिया भर की
बेसिर-पैर की हर
छोटी-बड़ी बातें......
कभी खड़ी करती हूँ
बहुमंजली इमारतें
ताशों के मानिंद
तो कभी गढ़ती हूँ
रेशमी धुआँ से
लच्छेदार छल्लेदार इबारत...
अक्सर उसी में छुपकर
कर लेती हूँ चुपके से
उसी की इबादत..........
मेरे शब्द
जिसे मैं महसूसती हूँ
अत्यंत आंतरिक स्तर पर
जो अपने आवरण में
कभी शराफ़त से
तो कभी शरारत से
लपेटे रहता है मुझे.......
कभी वह किसी सच के
बेहद करीब जाकर
अड़ जाता है
तो कभी खुद पर बिठा
न जाने कौन-कौन सी
जहान की सैर
करा देता है मुझे.........
मेरे शब्द
शायद शब्द भी
कम पड़ रहे हैं
या मैं ही हूँ कोई
निःशब्द शब्द .