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Tuesday, April 10, 2012

कहीं ऐसा न हो ....


कहीं ऐसा न हो ....

अत्युक्ति में
सुन्दरतम सत्यों का
कुरूपतम उपयोग
अदम्य अभियान न हो जाए

अतुष्टि से
भाग्य के ढाँचे में
अकर्मण्यता ढलकर
सतत अनुष्ठान न हो जाए

अति स्वप्न में
बड़ी आशा से
छलक कर मनोबल
साश्चर्य ढलान न हो जाए

आत्म प्रवंचना में
सागर का दंभ भर
भ्रमित तालाब सा
ग्रंथित ज्ञान न हो जाए

अति विनम्रता भी
सम्मान पा कर
अहंकार का
सुसज्जित परिधान न हो जाए

किसी वसंत में
खिलेगा कोई फूल
सोच-सोच कर
भविष्य वर्तमान न हो जाए

और अंत में...

सतयुग के आने की
आहट पाकर
कहीं कलयुगी मानव
सयत्न सावधान न हो जाए .




 

Friday, April 6, 2012

घिर बदरा कारे...


गर्मी  का उत्ताप
धरा  करे विलाप
पड़   गयीं   दरारें
सूखे   ओंठ  सारे
उड़     रहीं   धूल
मूर्झा   गये  फूल
पीड़ा    सी   हूकी
कोयल जब कूकी
अमिया  है उदास
बुझ   रही   आस
मन  विकल खग
बाट   जोहे   जग

घिर  बदरा  कारे
आ रे आ रे आ रे !

अँखियाँ न  मींचो
प्राणों  को   सींचो
कर   बूँदा - बाँदी
तृप्ति  की  आँधी
शीतल  हो अगन
भींगे   तन - मन
बगिया  में  बहार
यौवन  का खुमार
मंगल  बेला आये
घट  - घट    गाये
तेरे     संग   झूले
सब   दुःख   भूले

घिर   बदरा  कारे
आ रे आ रे आ रे  !

Tuesday, April 3, 2012

अनागत कुसुम


हवा के झझकोरे से
बिखरे पत्तों को देखकर
बच्चों की भाँति
ठिठक जाता है - भीरु मन
और चलने से मना करता है
एक भी कदम...
फिर उसी हवा के झोंके में
देखता है भर अचरज - मन
कोरा कोंपल -कलियन
कि प्रस्तुत होता है अप्रस्तुत मन
पूरे अकड़ और जकड़ के साथ...
मजबूर करता है सामने पड़े
धारणाओं के चट्टानों को
मजबूती से परे लुढकाने को...
अपने तले कुचल कर
आती सारी अड़चनों को...
भुलाकर अबतक की सभी
भूलों और पछतावों को
व्यर्थ की शंकाओं एवं दुष्कल्पनाओं को..
अचानक से इसी पल में
न जाने कहाँ से
आ जाती है इतनी शक्ति कि
घुमावदार मोड़ों पर भी
आत्मबल का लेकर छाँव
सीधे पड़ने लगते हैं टेढ़े पाँव....
सधने लगती है दृष्टि भविष्योन्मुख
विषम संघर्ष से अनुभावी सुख.....
शांत हो कहता है - मन
-- यही है जीवन
भला रुकी है हवा किसी क्षण...
माना कि है
अनुभवों का बीहड़ वन
पर इसी में एक दिन
खिल उठते है
अति सौरभ बिखेरता हुआ
अति सुन्दर अनागत कुसुम .

 

Saturday, March 31, 2012

मेक-ओवर


इस 'आज' की
बौखलाई कविता से
( समाचारवाचिका सी )
संतुलित संवेदना भी जाहिर होती तो
सहनीय होती उसकी बौखलाहट
शब्द वाया भावों की
थोपी जिम्मेदारियों से
कटघरे में घेर कर भी
बरी कर दी जाती
( समाचार सी पढ़ ली जाती )
इस 'आज' के
हालातों - ज़ज्बातों को वह
बिना लाग-लपेट के कहती रहती
ख़ुशी-गम से निकली आह-वाह को
ख़ुशी-ख़ुशी सहती रहती....
पर इस 'आज' की
बौखलाई कविता
एकालाप से त्रस्त कविता
कंठ के आक्षेप से ग्रस्त कविता
अब चुप ही रहना चाहती है
कोई लाख बोलवाये पर
मुँह नहीं खोलना चाहती है....
जबकि इस 'आज' का
बौराया कवि ( मैं भी )
सब रसों का रस चूस-चूस कर
अपना रस टपका-टपका कर
कविता कहता है
और खुद ही इतना बोल जाता है
कि बड़ी मुश्किल से
इस 'आज' की कविता में
ढूंढी गयी रही-सही
खूबसूरती भी
खुद कवि के ही काया-क्लिनिक में
अत्यधिक रंग-रोगन करके
शब्दित मेक-ओवर की
सुलभ शिकार हो जाती है .

Tuesday, March 27, 2012

लिख सको तो...


मेरे प्रेम में
लिख सको तो
महाकाव्य लिखना
आसमानी भाव के
अंतहीन पन्नों पर...
कह सको तो
अपने तप के
बादलों को कहना
झूम-झूम कर
बरसता रहे
अनवरत
अमृत धार बनके
और
हर प्रेमाकुल
तप्त ह्रदय को
सींचता रहे
प्रतिपल
पतित-पावन
संस्कार बनके...
जो केवल
शब्दों की शोभा
न बनकर
शंखनाद सा
बजता रहे
बारबार
प्राणों के तारों पर
शाश्वत ओंकार बनके .
लिख सको तो...

Wednesday, March 21, 2012

बस कोई ...


सत्यश :
जो जैसा है
समर्पित है
स्वयं सत्य को
बस कोई
पूर्ण प्रमाण
देने वाला चाहिए...

सुना है
रोशनी तो
पलक पर ही
विराजती है
बस कोई
दक्ष दस्तक
देने वाला चाहिए....

गिरि पर
गर्भिणी गंगोत्री में
दिखती नहीं गंगा
बस कोई
सूक्ष्म नयन
देखने वाला चाहिए....

कुछ बूंदें
जैसे-तैसे
हाथ तो लगी है
बस कोई
सागर का
पक्का पता
बताने वाला चाहिए...

कहते हैं
काव्य में
मधुरता और
मादकता होती है
बस कोई
संज्ञा सिद्ध
करने वाला चाहिए....

अभी भी
बस एक
जरा सी कड़ी
खोई-खोई सी है
बस कोई
एक आखिरी बात
जोड़ने वाला चाहिए .  

Sunday, March 18, 2012

भीड़


मेरे भीतर
बहुत ही बुरी हालत में
ठेलम-पेल करती हुई
एक बदहवास भीड़
अजीब चाल में मुझे चिढाती हुई
हरवक्त रेंगती रहती है.....
मेरे ही नाक के नीचे
सभाएं आयोजित करती है , रैलियां निकालती हैं
मजे की बात है - मुझे नेता बनाती है
भावुकता के अतिवादी क्षणों में
ऊंचे-ऊंचे वादे करवाती है
आश्वासनों के दीये जलवाती है....
अपने खुले पेट पीट-पीट कर दिखाती है
मांगों की लम्बी फेहरिस्त भी थमाती है
जिसे पूरा करना मेरे बस की बात नहीं
उसी में मैं भी हूँ,कोई मुकुट धारी नहीं...
उम्मीदों के टूटने पर वे मुझे ही
विनष्ट करने की योजना बनाती हैं
और मैं चौबीसों घंटे
पीछे से अनेक -अनेक रूपों में
खुद पर अज्ञात हमलों के डर से
असहाय , निरुपाय महसूसती हूँ....
पूरी हिम्मत जुटाकर उन वादों से
सरेआम मुकर जाना चाहती हूँ
और उस दीये को भी
फूंक मार बुझा देना चाहती हूँ.....
मैंने तो जन्म नहीं दिया है
किसी भी राजशाही या तानाशाही को
बल्कि आत्मबल को थपकियाँ देकर सुलाया है
कमजोरियों के साथ जीना सीखा है
कतार में लगने का अभ्यास किया है
बिना प्रतिवाद के धक्का-मुक्की खाकर
और पीछे होना भी स्वीकारा है
लाल कालीन को घृणा से ही देखा है
जिसके नीचे बहती है खून की नदियाँ....
तो फिर मेरे भीतर
किस क्रान्ति के नाम पर
केवल मशालची ही दिखते हैं
जो मुझे ही मंच पर पटक कर
मेरे हड्डी-मांस-मज्जा से खेलते हैं....
सिर्फ एक वहशत , पागलपन
आशंकाओं का उफनता सैलाब
जैसे कि केवल मैंने ही
उन्हें बना दिया है
बंधुआ मजदूर सा आम आदमी
और धोखे से दिखा दिया है
राजमार्ग के उस छोर का राजमहल.....
मुझमें तो इतनी ताकत नहीं कि
किसी इतिहास को दुहराने से रोक दूँ
या फिर भीड़ को उकसा कर
कोई नया इतिहास रच दूँ.....
विकल्प के अभाव में
अभावों को सहती हूँ
उसी भीड़ के साथ जीती हूँ
और उसी भीड़ में मरती हूँ .




 

Wednesday, March 14, 2012

सृजन बेल


चकित हूँ / चिंतित भी
कलम - कागज़ के बीच
कसमसाती सृजनशीलता को देखकर
जी करता है हरवक्त उसे
हौले - हौले सहलाती रहूँ
विवशताओं की कमजोरियों को
अक्षरों से गुदगुदाती रहूँ........
अब तो इस कलम के सहारे
छोटे - बड़े हर पहाड़ को
जड़ से ही काट लेती हूँ
भूगर्भीय भूकंप के झटकों से
फिर बनते पहाड़ों को भी
झटके में भांप लेती हूँ........
माना कि गेंद बनाकर
शब्दों से खेलते रहना
कोई खूबसूरत शगल नहीं है
पर चोटील दर्द के डर से
चुप्पी की खाई में गिरकर
घुटनों पर घिसटते रहना भी
कोई खुशगवार हल नहीं है......
मन तो ललचता ही है कि
आँखों में जरा खुमार भरकर
सर पर कई-कई पाँव धरकर
अकल्पित/ अपरिचित ओर-छोर को
इस छोटी सी कलम की
छोटी सी नोक से नापती रहूँ
और अति यत्न से संचित
उत्साह को बेझिझक /बेवजह
बस बेहिसाब बांटती रहूँ........
मुझे क्या पता था कि
ये उत्सुकता / आकर्षण ही
सृजन बेल सी लतर जायेगी
और काँटों पर भी ललककर
खुद ही अपना आशय बताएगी .


Wednesday, March 7, 2012

मेरे सांवरे


हाय ! रंगों को भी
कुछ न समझ में आये
मेरा भोला फागुन भी भरमाये..
मैं न जानूं मेरे बावरे
तुझे मेरा कौन सा रंग भाये
जिसमें तू रंग-रंग जाये..
और मुझे भी ऐसे अंक लगाये
कि अंग-अंग केसर बन जाये....
फिर देख पड़ोसन जल-भुन जाये
भरदम कानाफूसी करके
आपस में उलझ-सुलझ जाये.....
सुनो न ! मेरे सांवरे
सब नाजो-नखरा छोड़ कर
तेरी बावरी क्या बोली-
तेरे संग खेलेगी वह होली
और वे झिलमिल तारे
नभ की डोली सजायेंगे
सारे बादल कहार बन जायेंगे
बस तुम मेरे रंग महल में आओ
मदिरा सा अपना प्यार लुटाओ....
मैं भी फागुनी बयार बनके
बेला ,चंपा ,चमेली से
सोलहों श्रृंगार करके
प्राणों से प्रणय की मनुहार करके
खुशबु सी यौवन लिए सकुचाउंगी
और सांस भर-भर कर
मेरे सांवरे
बस तेरे ही रंग में रंग जाउंगी .

Thursday, March 1, 2012

लाजवंती


न जाने
किस बात पर आज
उनसे ही उनकी
ठनी हुई है
जो मेरे प्राणों-पंजर पर
विपदा सी बनी हुई है...
उनकी आँखें
इसतरह से है नम
कि बरस रहे हैं
मेरे भी घनघोर घन....
रूठे जो होते तो
बस मना ही लेती
अपने रसबतियों में
उन्हें उलझा ही लेती....
पर हवाओं से भी
वे कुछ न बोले
अपने पीर का भी
घूँघट न खोले.........
कोई बताये किस विधि
उनसे उनकी सुलह कराऊँ
और विह्वलता के
बूँद-बूँद को पी जाऊँ.....
ये ह्रदय -फूल
क्षण-क्षण मुरझाये
प्रस्तर-प्रतिमा से
जब वे हो जाए......
आखिर कब लेंगे
सुधि हमारी
मैं भी तो हूँ
बस उनकी ही प्यारी....
जब प्रीत किया है
तो क्यूँ न उनकी
दीवानी कहाऊँ
और मैं लाजवंती
लाज की हर मर्यादा को
बस उनके लिए ही
लाँघ -लाँघ जाऊँ .

Saturday, February 25, 2012

क्षणिकाएँ...

सुबह से ही
खोल - खोलकर
खाली किताबों को 
बोल - बोलकर 
पढ़ती हूँ
और रात ढलने तक 
अदृश्य लिखाई से 
अपने पन्नों पर 
केवल तुम्हें ही 
भरती हूँ .

    ***

मर्म की बात
ओठों से कहूँ 
या कि न कहूँ
तुम ही कहो
कि कैसे मौन की 
शेष भाषा में 
केवल  तुम्हें ही गहूँ .

      ***

कुछ साधारण से 
शब्दों को 
जोड़ - जोड़कर
अपने गीतों में 
केवल तुम्हें ही 
रचा है 
पर मुझ सीपी में 
गिरने को 
वो स्वाति बूंद
अभी भी बचा है .

     ***

मोतियों की 
मंडी में तो
एक से बढ़ एक 
मोती चमक रहे हैं
पर मेरी 
चुंधियाई आँखें 
केवल तुमसे ही 
दमक रहे हैं .

Tuesday, February 21, 2012

साबूत


सूक्ष्म  उलझाव  की  गलियों  में
तन-मन   भटक-भटक जाता है
देख उद्विग्न  जगत का उपद्रव
अपने  को  असहाय  ही  पाता है

असंग भाव  में  बह-बह कर भी
संगी-साथी  हिल-मिल जाते  हैं
प्रेम-विरह  के  शाश्वत क्रीड़ा में
ठिठक-ठिठक , रुक  से  जाते हैं

प्राणों  को  कौंधाने  वाली  पीड़ा
क्यूँ   तड़क -तड़क  तड़पाती  है
सह-सह  के मर्माघात अनवरत
किंतु अभ्यस्त कहाँ  हो पाती है

बस  एक बवंडर बन के  धूल का
आँखों  में  यूँ  घिर-घिर आता है
शांत - शिथिल  हो  जाने पर भी
गहरे चिह्न  कोई  छोड़ जाता है

लहक-लहक   कर  आग  उसे तो
पूरी तरह  राख नहीं  कर पाती है
वह  आकाश तो  उड़  ही जाता है
बस एक  बंद मुट्ठी  रह जाती है

छोर  नाप-नाप  थके  पल -छिन
कभी भी, चैन  तनिक  न पाते हैं
बढ़ ग्लानि से  गलबहियाँ कर के
सिसक-सिसक  के  सिसकाते हैं

कई-कई  पर्तों में  वही  एक घाव
उभर -उभर कर  चला  आता  है
कई पाटों  में  पिस-पिस कर भी
साबूत  का  साबूत  बच जाता है  .



Friday, February 17, 2012

द्यूत- बिसात


मन के
हस्तिनापुर में
हमेशा बिछी रहती है
द्यूत - बिसात ..
तार्किक अड़चनों में
उलझा अर्जुन
चुप है
हारे हुए हर दाँव की
लगती ऊँची बोली पर
और शातिर के
पक्ष में घोषित
शापित परिणाम पर ...
फिर भी
इस द्वन्द-युद्ध में
गांडीव उठाकर
कर रहा है वह
कृष्ण की प्रतीक्षा
जो कहीं मगन है
अपने ही रासलीला में .



द्यूत---जुआ 

Monday, February 13, 2012

उसी ढलान पर ...


फिसलन भरी
हर ढलान पर
बस मुस्कुराते हुए तुम
मेरे अनाड़ी किन्तु
अटल अभिमान पर...
हर रुत में मुझसे
करके बाँहाँ-जोड़ी
हलके से उठाकर
मेरी लटकी ठोड़ी
और माथे को चूमकर
तुम कहते हो - यही प्यार है..
संदेह के परे
बड़ी-बड़ी फैलती
भौचक्क मेरी आँखे
देखती है तुम्हें अपलक
और बिजली की गिरती
हर कौंध में
छिटकती है तुमसे
बस मेरी ही झलक...
तुम्हारी मनमोहक निश्छलता
अचंभित करती दृढ़ता
थामे है मुझे
उस ढलान पर भी
जिसपर फिसल रहा है
समय पर सवार जीवन
व सुख-दुःख का हरक्षण.....
अनायास कई बार
उन्हें लपकने को
बढती है मेरी चपलता
पर हर बार
रोक लेती है मुझे
तुम्हारी तीक्ष्ण सतर्कता...
फिर माथे को चूमकर
कहते हो मुझे - यही प्यार है
उसी ढलान पर .

Wednesday, February 8, 2012

गरीबी - रेखा


गरीबी के अंतिम दुर्भाग्य से
पूरी तरह कुचला हुआ
न जाने किस सपनीली उम्मीद पर
हताशा के आखिरी छोर पर भी
मजबूती से टिका हुआ
लिपटे कफ़न में भी जिन्दा गरीब...
चुटकी भर नमक से भी सस्ती
अपनी जान को चुटकी में दबाये
गरीबी के नशे में लड़खड़ाता हुआ
क्यों दिखता है न हमें आपको हर जगह...
जिनके लिए हमने -आपने तो
बिल्कुल ही नहीं ....तो
कहीं इस काल-कुचक्र ने तो नहीं
जबरन खिंचवा रहा है हमसे -आपसे
वही एक रेखा - गरीबी रेखा......
हाँ ! उसी लक्ष्मण रेखा की तरह
हम-आप बातें करते हैं उसे उठाने की
उठ आते हैं कितने ही भाव चुपके से
हमारे ह्रदय के मरघटी कोने में...
जब निकलता है संवेदना के बोल तो
अपने लिए धन्यवाद ज्ञापन उपरवाले को
उनके लिए दिखाते-भींचे ओठ के पीछे
दबा लेते हैं हम राहत की मुस्कान..
चेहरे पर बनाई गयी चिंता-रेखा पर
गुलाबी सुगंध से फड़कते हमारे नथुने..
उपहासी नजरों से खाई को देखना
पुल बनाने का आडम्बर करना
जिसे अँधेरे में गिरा भी देना
इतना काम कम है क्या
अपनी पीठ थपथपाने के लिए....
साथ ही गरीबी-विमर्श से हम
चालाकी से छुपा लेते हैं उस
मारामारी के प्रतिस्पर्धात्मक डर को
जो रेखा मिटने से हो जाएगा बेकाबू
हाँ ! समय बदल गया है
और समय से ज्यादा हम.....
उस रेखा के उस पार हैं वे गरीब
और इस पार हम आधुनिक रावण जो
हरण सा कुकृत्य भला क्यों करने लगे
बस उन्हें थोड़ा खींच कर
उसी गरीबी रेखा पर खड़ा करके
उन्हें यूँ ही जलते देखे .


एक सवाल खुद से ही---- कि हम गरीबी रेखा बढ़ाने के लिए क्या कर रहे हैं ?
 

Saturday, February 4, 2012

मरिचिजल


क्यों भर आता है
उन्मुग्ध नयन
जब ठहर जाता है
शीतल उच्छ्वास भर
उत्कंठित पवन...
घेर लेती है मुझे
कहीं से आकर  
कोई कोमल किरण...
अचानक से
झिलमिला उठता है
बोझिल मन....
धीरे-धीरे पसरता है वही
कुछ अन्तरंग क्षण
जिसमें
खिल उठते हैं असंख्य
व्यथा - सुमन
चहुँ ओर गूँजने लगता है
करुण - कूजन
ओह !
बड़ा बेचैन हो जाता है मन
और वही
यादें हो जाती हैं
इतनी सघन
कि बहने लगती है
व्याकुल नदियाँ बन
तब दृष्टि-परिधि तक
दिखता है केवल
विरह - वन....
और क्या कहूँ ...?
या कैसे कहूँ....
कि मैं विरक्ता
तुम्हारे होने के
हर मरिचिजल पर
भरने लगती हूँ
विकल - कुलाँचे
निरीह मृगी बन .

Wednesday, February 1, 2012

स्वप्नांत


स्वप्नों ने
क्या खोया ,क्या पाया
अपने रंग-बिरंगापन पर
क्या खूब इतराया..
खुद को खींच-खींच कर
न जाने कितना
अजूबा क्षितिज बनाया..
वही भाग-भाग कर
हैरत भरी नजरों से
उसे देख भी आया..
जब पकड़ना चाहा तो
कभी पास तो कभी
बहुत दूर पाया....
तब शायद
खुद पर खूब पछताया
सर पर हाथ रख
घुटनों में मुँह छिपाकर
दो-चार आँसू भी बहाया
तो कभी उस क्षितिज को
धक्का दे-देकर
दूर कहीं अपने ही किसी
अन्तरिक्ष में फेंक आया...
जिसे फिर वह
स्व्प्नगत ही पाया....
स्वप्नों ने
खुद को जिलाया तो
कितना कुछ गंवाया
और वो जो
कितना कुछ बचाया तो
अंतत: स्वप्नांत ही पाया .

Saturday, January 28, 2012

मनतारा


चिड़ियों  की  चीं-चीं , चन-चन
भ्रमरों  का  है  गुन-गुन , गुंजन
कलियों की  चट-चट , चटकन
मानो  मंजरित हुआ  कण-कण

न  शीत की  वह प्रबल कठोरता
न ही  ग्रीष्म की है  उग्र उष्णता
मद्धम- मद्धम   पवन  है  पगता
मधुर- मधुर  है मलय महकता

मधुऋतु का  फैला है सम्मोहन
मंगल- मँजीरा  बाजे  झन-झन
ताल पर  थिरके  बदरा सा तन
मन-मयूर संग नाचे  छम-छम

प्रकृति  से  मुखरित  हुआ गीत
मदिर- मादक  बिखरा   संगीत
अँगराई  लिए  कह  रही है  प्रीत
स्वर साधो , मनतारा  छेड़े मीत .

Tuesday, January 24, 2012

जानती हूँ...


बन कर मेरी छाया तुमने
अनुराग से दुलराना चाहा
पर उलझा सा बाबरा मन
तुम्हें कहाँ समझ पाया...
भूल मेरी ही है जो
अपना इक जाल बनाया है
तुम्हीं से खिले फूल को
तुमसे ही छुपाया है.....
चाहती तो हूँ कि प्रिय !
तुम्हारे अन्त:करण की तेज़ से
अपनी ही प्रतिमा उकेर लूँ
गहरी धुंध के इस बाँध को
झटके में बिखेर दूँ ....
साहस जगे तो स्वीकार करूँ
और तेरी धारा में बह चलूँ ...
हाँ ! तुमने तो
भरना चाहा झोली मेरी
पर रह गयी मैं कोरी की कोरी
कैसा भराव हुआ है... प्रिय !
खाली-खाली रह गया है कहीं..
स्तब्ध ह्रदय में जब झाँका है
तब निज दुर्बलता को आँका है..
उजियारे में नैन मूंदकर
कौतुक भरा बाल-क्षण जीकर
रह-रह कर आँख डबडबाया है
जानती हूँ...
अनमोल सा इस जीवन में
कैसे अपना मोल घटाया है .


Friday, January 20, 2012

फरमा

एक ही फरमा में
भली-भांति कसकर
कितनी कुशलता से
सभी सम्पादित करते हैं
दैनंदिन दैनिक-चर्या
सेंटीमीटर , इंच से
नाप - नाप कर..
कांटा - बटखरा से
तौल - तौल कर..
रात को शुभरात्रि
कहने से पहले ही
करते हैं हिसाब-किताब
नफ़ा - नुकसान का
वही चित्रगुप्त वाला
बही-खाता पर
वही-वही लेखा-जोखा....
भावी योजना पर विचार
ज़रूरी फेर - बदल
कुछ ठोस उपाय
कुछ तय - तमन्ना
कल को और
बेहतर बनाने का....
आँख लगने के पहले ही
आँख खुलने के बाद के
कार्यक्रम को तय करना...
वाह रे ! माडर्न युगीन
मशीनी मानव
फिर -फिर
खुद को ही
फ़रमान जारी करते रहो
उसी फिक्स फरमा में
फिर से फ़िट होने का .

Tuesday, January 17, 2012

मान


मन की मजबूरियों की
क्या कीमत लगाओगे
या बात-बात पर
नपे-तुले व्यावहारिकता की
चादर ओढाओगे...
ध्रुवों पर कील गाड़कर
आस्था-विश्वास को
बाँध आओगे और
उन्हें जोड़ने के लिए
कच्चा-पक्का पुल बनाओगे
फिर आग्रहों का सहारा लेकर
भारी पाँव को घसीटोगे
तो सारी जुगत भीड़ जायेगी
खुद को बचाते हुए
मुझ तक आने में ही...
जैसे-तैसे आ तो जाओगे
पर सोच लो क्या दोगे
रास्ते का जोखिम भरा ब्योरा
या जुगत का दांव-पेंच
या फिर उसी चादर की
देने लगोगे दुहाई पर दुहाई..
जबकि मैं उसी ध्रुव पर
हर चादर उताड़े खड़ी हूँ
हर कीमत या जुगत को
आग्रहों के अलाव में झोंक कर
बस थोड़ी सी गर्मी के लिए...
जो थोड़ी सी गर्मी
तुम्हारी गर्म साँसों की
और तुम्हारी नर्म बाहों की मिले
तो सदियों तक यूँ ही
यहीं खड़ी रहूँगी
क्योंकि मैंने
मान दिया है
मन की मजबूरियों को
और जान लिया है तुम्हें .

Saturday, January 14, 2012

हैया-हो ...


हर तूफान  से जीत जाना है
हैया-हो  ,  हैया-हो  गाना  है

नहीं गिरने में  क्या  सौरभ
गिर कर  उठने  में है गौरव
जितना  आये  बाधा  रौरव
ललकारे हैया-हो का आरव

विकराल  सा भँवर  का  डर
घेरता   रहे  कहीं  से आकर
जीतना  है  उन से  लड़ कर
हैया-हो  , हैया-हो   गा  कर

लहरों में  बस उतर  आना है
तूफानों के  बीच में  जाना है
सदा  पतवार  को चलाना है
हैया-हो ,  हैया-हो   गाना  है

किनारे पर  है सूखा सौन्दर्य
निर्जीव शांति,निष्क्रिय धैर्य
लहरों से  खेलने  में  है शौर्य
तब  हैया-हो  देता है  ऐश्वर्य

जिसे लहरों में उतरना  आता
उस साहस से सब  है  थर्राता
लहरों  के पार  वही  है  जाता
और झूम के हैया-हो है गाता

हर तूफान  से  जीत जाना है
हैया-हो ,  हैया-हो   गाना   है .



रौरव - भयंकर
आरव - तीव्र ध्वनि



Tuesday, January 10, 2012

नकेल


अतृप्त अतीत ने
परिचय बताने से
क्या इनकार किया
कि भारग्रस्त भविष्य भी
पाला बदल कर हो लिया
अतीत के साथ ...
पहले रंग के पहले का
व सातवें रंग के बाद के रंग को
मिल गया सुनहरा मौका
चाँदी काटने का और
चहक कर भर लिया है
अपने अँधेरे आलिंगन में
इस आज को...
स्पर्श इन्द्रियाँ फड़फड़ा रही है
अपने ही दीवारों के अन्दर..
वीरानी पलकों में ही
सपनों के दर्प टूट रहे हैं..
यादों के हिमखंड भी
हिमरेखा पर पिघल रहे हैं...
सांसों के गाँव में
मरघट सा सन्नाटा है..
संबंधों-अनुबंधों के बीच
स्मृति-धागा टूट सा गया है..
भरे बाज़ार ने खोटे सिक्के को
संदेह की नजरों में घेर लिया है..
जिसे देखकर
उदासी की छाँव भी चुपचाप
अपने में सिमट गयी है..
उफ्फ़ ! मुश्किल हो रहा है
व्यर्थता के बोध को संभालना..
अब क्या करना चाहिए...?
चलो समेटा जाए
सुन्दर भ्रांतियों के सूक्ष्म संवेगों को...
बस मिल तो जाए
ये खोया हुआ ' आज '
तो अतीत-भविष्य को
धोबी-पाट लगा ही देना है
उनका नकेल कसकर
अपने हाथ में करके उन्हें
बस अपने हिसाब से चलाना है .


Saturday, January 7, 2012

तरंगों में...


मेरे आशा के अनुरूप
सुलझाया तुमने
आपस में उलझे
मेरे अव्यक्त विचारों को
न चाह कर भी
उलझ रहे हैं उन्हीं में
मेरे अहसास...
अब न जाने क्यूँ
मौन होकर तुम
सुलझाना चाहते हो मुझे
जबकि उसे भरते-भरते
और भी मैं
उलझ ही रही हूँ...
अभिव्यक्ति दो तो
परिणति चाहता
वो परितप्त विचार
मुक्त हो सके
उन्मुक्त गगन में...
मौन तो होना ही है
चाहे सो जाए
चाँद की गोद में
या छू ले
उस दहकते सूरज को...
पर प्रिय !
रोक सकते हो तो रोक लो
उन तरंगो को
जो तुमसे निकल कर
आती है मुझतक...
तुम मुझे
अपने तरंगो में
इसतरह उलझा कर
कितना सुलझाओगे
या मुझसे भी
निकलती तरंगो में
तुम भी
मेरी तरह ही
उलझ जाओगे..?

Tuesday, January 3, 2012

कर्फ्यु


मेरे मन के
शांत संसार में
कुछ असामाजिक
विचारों ने अनायास
कर दिया है
बम - धमाका
पुनर्शान्ति के लिए
लगा दिया है
मैंने भी कर्फ्यु..
पर कविता तो
छूट गयी है
उन्हीं विचारों के
अभेद्य दुर्ग में..
न जाने कैसे
लुट-पीट रही होगी
और उसे
बचाने के लिए
रोक रही हूँ
मैं भी कलम .

Saturday, December 31, 2011

स्वर्ण दिन आये क्या , लो गये ...


तिथियों को कई रूप में  ढल जाते  देखा
क्षण को अगले क्षण में धँस  जाते  देखा
दुःख को घर में ही एक घर  बनाते देखा
सुख को बस क्षितिज सा  लहराते  देखा

   जाग्रत स्मृतिओं में  सब  सो गये
   स्वर्ण दिन  आये  क्या  ,  लो गये

हरे-हरे  पत्ते  झटके में यूँ  झड़  जाते  हैं
खिले सुन्दर फुल  भी  यहाँ  मुरझाते  हैं
तरु-कंकाल तो  मिटने से  भय खाते  हैं
बिन  हवा  के  ही  घोंसले उजड़ जाते  हैं

   अनऋतु में भी रुत सारे बदल गये
   स्वर्ण दिन  आये   क्या  ,  लो गये

झूठ को  बैसाखियों से  दौड़  लगाते देखा
सच के खँडहर को यूँ  ही  भरभराते देखा
पंछीमन को तो जाल में  फँस जाते देखा
और जाल लिए दूर कहीं  उड़ जाते  देखा

   जो नहीं हैं हाय !  हम वही हो गये
   स्वर्ण दिन  आये  क्या  ,  लो गये

काल के अजनबी भँवर  जब पड़  जाते हैं
कई-कई शिखर अनजीते  ही रह  जाते हैं
पाँव तले  हर  पड़ाव भी  खिसक  जाते हैं
और  हार को  हार बना  गले  लटकाते  हैं

   पानी देखते ही वाह! प्यास हो गये
   स्वर्ण दिन  आये  क्या  ,   लो गये .






Tuesday, December 27, 2011

मीठा-मीठा

जमाने से जमा
जमाने भर की
शिकवा - शिकायतों को
बड़ी सी गठरी में डाल
जोरदार गाँठ लगा
पीठ पर लादकर
जमाने से जमा
सारी खीज और झल्लाहटों को
पीसकर भांग सा गोली बना
झटके में हलक से उताड़ने पर
धीरे-धीरे चढ़ता है जो सुरूर
फुर्र हो जाता है सारा ग़रूर
अपने ही पिंजरे को तोड़
कोई उड़ जाता है
आसमानी जहाँ में पहुँच
आसमान सा हो जाता है
बादलों पर बैठ कर
हवा संग बलखाता है
कौंधते बिजली को पकड़
चाँद को मुँह चिढ़ाता है
लाख मना के बावजूद
अजीब सा दाढ़ी - मूँछ
उसके मुँह पर बनाता है
ऊँघते हुए सूरज के
सातों घोड़े की पूंछ में
जलता पटाखा बाँध आता है
बिखरे सितारों को भी
एक कतार में खड़ा कर
थोड़ा वर्जिश करवाता है
ओह ! वह चुहलबाज़
दम भर सबके
नाक में दम कर देता है
इसी भागा-दौड़ी में
पीठ पर लदी गठरी भी
कहीं गिर जाती है
सारी खीज और झल्लाहट
मीठी-मीठी शरारत में
बदल जाती है
और जमाने भर से
जमाने भर के लिए
दबा कर रखा हुआ
कुछ मीठा-मीठा सा
उभर आता है .
 
  
  

Saturday, December 24, 2011

पहुनाई


घुमता हुआ चाक
ठहरी    है   कील
बौराया सा वर्तुल
नापे    है     मील
इतरा -इतरा कर
बहके    है  नागर
माटी  का पुतला
है  राज़  उजागर
कंचन  की   बेड़ी
सपनों की झाँकी
आँसू  की लड़ियाँ
पाँसी   में   पाँखी
भर आये  मनवा
उलाहना के बोल
फूट     न     पाए
बूझे   तब    मोल
बिन   बताये   ही
जो  हाँक   लगाई
दुविधा में पथिक
क्षण  की पहुनाई
न - नुकुर     करे
भंग   होवे   शील
घूम    रहा   चाक
ठहरी    है    कील .



Wednesday, December 21, 2011

झणत्कार


कभी वो करीब से गुजर गया
कभी वह और करीब हो गयी
कभी वो छेड़ गया आहिस्ते से
कभी वह भी चिढ़ा गयी उसे
कभी वो सिहरा गया प्यार से
कभी वह गुदगुदा गयी उसे
कभी वो भर लिया बाँहों में
कभी वह फिसल गयी उससे
कभी वो बना गया उसे नया
कभी वह निखर गयी उससे
कभी वो छलक गया उससे
कभी वह छिप गयी उसी में
कभी वो बह गया उससे
कभी वह समा गयी उसमें
कभी वो रच दिया उसको
कभी वह हवा सी हो गयी
यूँ ही अनवरत चलता रहता है
उनका प्रणय- सृजन और
जन्म लेती हैं कवितायें
मैं तो तन्मय हुई जाती हूँ
शब्द और चेतना के बीच
इस अद्भुत समागम में
और केवल पहनाती रहती हूँ
कविताओं के पाँव में पायल
झनक-मनक करती हुई वह
जिस ह्रदय तक पहुँचती है
अपनी निरी झणत्कार से
क्षण भर के लिए ही सही
उसे झंकृत कर जाती है .


Friday, December 16, 2011

मिट्टी की सेज

नहीं चाहा कभी
मिट्टी की सेज पर बिछना
और मिट्टी हो जाना
बस गंधी से कुछ गंध
उधार लेकर
भर दिया कल्पनाओं में
कर दिया हवा के हवाले
नहीं पता था कि
पंख समेट कर हवा भी
चल देगी अपने रस्ते
मिट्टी पर गिरकर वो
गंध जायेगी उसी गंध में....
वही भभका देगा
फूल बनने के स्वांग को और
कन्नी काटकर निकल लेंगे
भंवरे , तितलियाँ ....
बैठकखाने के सजावट को भी
खिल्ली उड़ाने का
मिलेगा मौका भरपूर...
नहीं पता था कि
मिट्टी में गड़कर
मरना होता है , सड़ना होता है
फूटती हैं तब कोंपले
चाहतों का क्या
बस चाहना काम है...
अभी भी बस
भनक ही लगी है कानों को
पता चलते - चलते
पतझड़ में तो
जरुर मिलना होगा उससे..
अभी दिख रहा है
भागता हुआ बसंत
पतझड़ के पीछे...
कल्पनाओं में ही खिले रहे
अमरबेलों पर फूल
न मुरझाने वाला
गंधी को उधार लौटाने का
जी नहीं कर रहा है ... 
हाँ , नहीं बिछना चाहती हूँ
मिट्टी की सेज पर
नहीं होना चाहती हूँ मिट्टी
खुद से जो प्यार हो गया है .

 

Tuesday, December 13, 2011

विरह - गीत


हमारे - तुम्हारे  विरह  ने पिया
दर्द के गीत को जनम  दे दिया


अनदेखे से परदेश में , हो  तुम
न जाने किस वेश में  , हो तुम
तेरी स्मृतियों में   ही , मैं  घूमूँ
नाम तेरा  ही ,  ले  लेकर  झूमूँ
जोगन को मैंने भी  जोग लिया
बेमोल ही दर्द  को , मोल लिया

हमारे - तुम्हारे  विरह  ने पिया
दर्द के गीत को  जनम दे दिया


हियरा   रह - रह   के   हहराये
भीतर- भीतर   घुट- घुट  जाये
हर आहट पर  ऐसे चिहुंक  उठे
लाख मनाऊँ फिर भी क्यों रूठे
नेह ने जाने कैसा हिलोर लिया
आँधी बन  मुझे झझकोर दिया

हमारे - तुम्हारे  विरह  ने पिया
दर्द के गीत को  जनम दे दिया


कैसे बाँधूँ अपने  बिखरे मन को
सूली के जैसे ,  इस  सूनेपन को
मुझको यूँ , अब  भटकाओ  मत
साँसों की कथा  लिखवाओ  मत
शब्दों में बस मुझे ही ताना दिया
गीतों का तो , बस  बहाना लिया

हमारे - तुम्हारे   विरह  ने पिया
दर्द के गीत  को  जनम दे दिया


कैसे  तुझ  तक ,  इन्हें  पहुँचाऊँ
इतनी पीड़ा  से ,  मैं  ही  लजाऊँ
मृग - जल मन को  है  भरमाता
मेघों से जुड़ गया  है  इक  नाता
क्या तुने ऋतुओं को  बोल दिया
इन पलकों में सावन घोल दिया

हमारे - तुम्हारे  विरह  ने पिया
दर्द के गीत को  जनम दे दिया .  






Friday, December 9, 2011

चमत्कार

भूगोल की बात होती तो
जरुर होता
कोई न कोई नक्शा
नहीं तो अवश्य ही होता
कोई भी सूक्ष्म सुराग
तहों के पार का ...
कार्य - कारण के
प्रतिपादित सिद्धांतों के बीच
अकारण घटित अनपेक्षित तथ्यों का
कोई न कोई मिलान बिंदु तो
जरुर होता और
इस बिंदु से उस बिंदु पर
उस बिंदु से फिर उस बिंदु पर
पहुँचने का कोई संकेत-सूत्र
अवश्य ही होता...
अपरिचित नियमों से
सरक जाता घना आवरण
निरपेक्ष नियमों से
उम्मीद की जाती
पक्षपाती सख्ती कम होने की....
फिर तो व्यथा से होते
सतत उल्कपातों का भी
मिल जाता कोई ठोस कारण....
ये सब होता तो कोई
चमत्कार नहीं ही होता
पर सच में अगर
ऐसा हो जाता तो यक़ीनन
चमत्कार ही होता .

Monday, December 5, 2011

मेरी मटकी

मैं चतुरी
एक मेरी मटकी
उस मटकी में
भर कर
अपने संसार को
सिर पर रख
चला करती हूँ
मटक मटक कर
अपनी ही राह पर.....
आँखों में बनते
मन में बसते संसार को
उसी मटकी में
भरती जाती हूँ...
अपने संसार में
ऐसे मगन होती हूँ कि
उड़-उड़ कर
छूने लगती हूँ
अपने गगन को...
अचानक से
टकराती भी हूँ
किसी संदिग्ध
संक्रमित संसार से
गिरती हूँ औंधे मूँह
टूट जाती है
मेरी मटकी
और बिखर जाता है
मेरा संसार भी....
मूढ़ता या बुद्धिमत्ता में
मैं चपला
उसी क्षण
अपनी मटकी में
एक और संसार भरती हूँ
फिर सिर पर रख
फिर उसी राह पर
चलने लगती हूँ
मटक मटक कर .

 

Friday, December 2, 2011

आयोजन

मैंने लिखना चाहा
केवल एक गीत
तुम्हारे लिए...
हर बार
सबकुछ हार कर
वही एक गीत लिखती हूँ
पर तुम्हारा रूप
और विस्तार पा जाता है
जो मेरे गीतों में
नहीं समा पाता है...
हर बार
मेरा गीत हार जाता है....
मैं फिर लिखती हूँ
नए गीतों को
जिसमें तुम्हें
पिरो देना चाहती हूँ..
लेकिन कुछ
शेष रह जाता है
जिसे मेरा गीत
नहीं अटा पाता है....
जो शेष रह जाता है
वही मुझसे
बार-बार
नये गीत लिखवाता है
मुझे स्तब्ध कर
फिर से
वही शेष रह जाता है ....
तुम्हारे लिए
मैंने लिखना चाहा था
केवल एक गीत
पर यूँ ही
मेरा सारा आयोजन 
धरा का धरा रह जाता है .

Tuesday, November 29, 2011

आहों में ..


चलते-चलते थक जाती
पाती  न   पंथ की सीमा
अवरोधों से डिगता धैर्य
फिर भी  न  होता धीमा

प्यासी  आँखे  बहती  है
बूंद-बूंद   में हुआ जीना
चिर अतृप्त  सा जीवन
अंजुरी  भर  चाहूँ  पीना

न मिले  तृप्ति  कणभर
सागर और भी तरसाया
इक आकाश  की चाह ने
मुझको  है बस भरमाया

अंतरदृग  में  वही  छवि
हर  इक  पल   रहती  है
जो वह  कह  नहीं  पाया
वो सबकुछ ही कहती है

हाथ  बढ़ा  छू  लूँ  उसको
भींच  लूँ  अपनी बांहों में
पाने में तो  खो दिया उसे
खोकर पा लिया आहों में  .




Friday, November 25, 2011

म्यान

अपनी तरफ से मैंने

कभी कोई पहल नहीं किया

उसने किया भी तो, मैं

अनजान बन गयी

उसी के साथ म्यान में हूँ

अनजाने, अनचीन्हे रिश्ते लिए

और हमेशा बीच में देती रही

अनबन को ज्यादा जगह....

हालाँकि कोई घोषित दुश्मनी

या कोई धर्मयुद्ध है

ऐसा भी नहीं पर हरवक्त

होती रहती है तलवारबाजी...

सम्मानजनित सामंजस्य

सभ्य सुरक्षित वार

घाव भी ऐसे देना कि

प्रतिरक्षण प्रणाली

आप ही कर ले दुरुस्त....

कोई शर्त या बाध्यता नहीं

रण में डटे रहने की

संवेदनशील भावहीनता

भाषा जनित संवादहीनता

संकेतो या तरंगों के बीच भी

अनजानी अर्थहीनता........

बस पुतलियाँ बड़ी- बड़ी कर

एक- दूसरे को घूरना

उबन कम करने के लिए

उबासियाँ ले ले कर

थपकियाँ दे दे कर

एक- दूसरे को जगाते रहना.....

या फिर मुँह फेरकर

अनजाने रिश्ते में

थोड़ी और खटास घोलना.....

मुझपर हावी है वो और

भारी भी पर, मैं भी

कुछ कम तो नहीं.....

ये म्यान मेरा है

उसकी अपनी मजबूरियां है

तो फिर वायदा- कायदा को

तोड़- ताड़ करने में

कुछ जाता भी नहीं है.......

ज्यादा चिढेगा वो, भागेगा

और इस खोखले म्यान को तो

खाक होना ही है

फिर बाँचने वाले बाँचते रहेंगे

खोखले म्यान की

खोखली महिमा .

 

Tuesday, November 22, 2011

द्वार तुम्हारा खुला नहीं...


इक  झलक  तेरी  जो  मिली
चली  आई  तेरे  द्वार   तक
बड़ी  देर से साँकल बजा रही
प्राणों से  भी  खूब  थपकाया
पर द्वार तुम्हारा खुला नहीं

जोर - जोर से  तुम्हें  पुकारा
रुंधा गला तो विवश  निहारा
तुमने कैसे  मुझे  सुना  नहीं
या अनसुना कर अस्वीकारा
पर द्वार तुम्हारा खुला नहीं

व्यथा - पुष्पों  से  सजा कर
वेदना का  वंदनवार बनाया
साँसों  की   वेद - ध्वनि   से  
आर्तनाद  कर  तुम्हें बुलाया
पर द्वार तुम्हारा खुला नहीं

आँसुओं का  अर्घ  चढ़ा  कर
नैनों का अखंड दीप जलाया
भावों का  ह्रदय - थाल लिए
विरव समर्पण कर मनुहारा
पर द्वार तुम्हारा खुला नहीं

मैं  अलबेली   हार   न  मानूं
द्वार पड़ी  बस  तुझे  पुकारूं
इक  झलक  पाने   के   लिए
अब तो अपना मान भी वारा
पर द्वार तुम्हारा खुला नहीं

मैं  विरहिणी  आस  न  छोडूं
कर तो  रही  हूँ  सारा  जतन
रूठे  हो   क्यूँ   मेरे   प्रियतम
क्यूँ  तुमने  है  मुझे  नाकारा
पर द्वार तुम्हारा खुला नहीं .

Saturday, November 19, 2011

सर्द राते हैं


कंपकंपाते अधरों पर , तुमसे कहने को
कितनी  ही  बातें  हैं ,    सर्द   राते    हैं

बादल के गीतों पर ,चाँदनी थिरकती है
ओस की बूंदे , जलतरंग  सी  बजती  हैं
हवाओं की थाप से तारे झिलमिलाते हैं
कितनी   ही  बातें  हैं ,    सर्द   राते    हैं

धीरे से कोहरा अपनी चादर फैलाता  है
थरथराते वृक्ष-समूहों को  ढक जाता  है
पत्ते की ओट लिए फूल सिमट जाते हैं
कितनी  ही   बातें   हैं ,   सर्द   राते    हैं

हिलडुल कर झुरमुट कुछ में बतियाते हैं
दूबों को झुकके बसंती कहानी सुनाते  हैं
जल-बुझ कर जुगनू  कहकहा लगाते  हैं
कितनी   ही   बातें   हैं ,   सर्द   राते    हैं

थपेड़ों को थपकी में,नींद उचट जाती है
बिलों में सोई ,  जोड़ियाँ कसमसाती  हैं
नीड़ों में दुबके , पंछी  भी  जग जाते  हैं
कितनी   ही  बातें  हैं ,   सर्द    राते    हैं

ठिठुरी सी नदियाँ ,सागर में समाती  हैं
लहरों के मेले  में ,   ऐसे   खो जाती  हैं
उठता है ज्वार  और  गिरते  प्रपातें   हैं
कितनी   ही   बातें   हैं  ,   सर्द  राते   हैं

कोई नर्म  बाहों का  , घेरा  बनाता   है
गर्म पाशों में,  सर्द और उतर आता  है
घबराते, सकुचाते ,  नैन झुक जाते  हैं
कितनी  ही  बातें  हैं ,    सर्द   राते   हैं

तुमसे  कहने को  ,   जो  भी  बातें    हैं
इन अधरों  से ही ,क्यों लिपट जाते   हैं .
           
 

Tuesday, November 15, 2011

उसे जगाओ !

जरा देखो  तो !    ये   अचरज
कहीं ठहरा तो  नहीं है   सूरज
 
मौन  अँधियारे के  उस  छोर पर
सुन्दर  सी  सुबह  लाने  के लिए
अहर्निश,अहैतुक,अक्षय उर्जा को
अहो ! तुममें भर  जाने के  लिए
 
सपनों की   गहरी   सी   नींद में
द्वार - दरवाजे  सब  बंद  किये
और  करवट बदल - बदल  कर
सोया  है  कौन ,   उसे   जगाओ
 
कल्पनाओं  की  छद्म  नगरी  में
चुम्बकीय   मायावी  महल  को
हीरे - जवाहरातों   से  जड़ने  में
खोया है  कौन  ,  उसे  जगाओ
 
बंदी  बन    बाँगुर   में   फँसकर
बुद्धि पर चढ़ाए  मोटा  प्लस्तर
आँखों  में  स्वयं  कील  गड़ाकर
रोया  है  कौन ,    उसे   जगाओ
 
देखो असंख्य फूल खिल रहे है
अनगिनत  खग   चहक  रहे हैं
निज को  दुःख की लड़ियों  में
पिरोया है  कौन,  उसे  जगाओ
 
अब तो जागो  !  जाग भी जाओ
आसमानी मन पर सूरज उगाओ
 
परोक्ष   मार्ग  से   आती  पुकार
ये जीवन  है   अनमोल  उपहार
कण - कण का  ऋण  चुकाकर
कर लो  अपनी  जय - जयकार.

Friday, November 11, 2011

दुर्निवार दर्द

एक तो भीषण मानवता का वीभत्स सत्य
और विचलित करने वाला दुर्निवार दर्द
जिसका विशेषीकरण करने के क्रम में
संभ्रमित संवेदनाओं का पुट तो ठीक है
पर लगाए गये जोरदार छौंक से
जो उठता है दमघोंटू धुँआ
घुस जाता है नथुनों से फेफड़ों में
मरोड़ने लगता है पूरा कलेजा
उलझ जाती है अतड़ियाँ और भी
आने लगती है उबकाई पर उबकाई
नसों में दौड़ता विद्रोही ख़ून भी
रुकने लगता है जहाँ - तहाँ
तापक्रम के अति चरम पर
खलबलाने लगता है खूब
अपनी ही नदियाँ बहाने के लिए 
उताड़ू रहता है बात बात पर
कितना भी समझाया- बुझाया जाए
उल्टा करने लगता है शास्त्रार्थ
अपने सवालों के बवंडर में
कोमल भावनाओं को फँसा कर
तिरोहित कर देता है
इन्द्रधनुषी तृष्णा व तृप्ति को
सहज , सुन्दर आकर्षण को
जीवन के सारे तारतम्य को
जो आकाश-कुसुम सा खिला रहता है
जिलाए रखता है हमें और हम
उसी को ताकते - ताकते
कृत्रिम सुगंधों से ही सही
भरते रहते हैं प्राण - वायु
अपने अस्तित्व के तुरही में...
दर्द और संवेदना जरुरी है
खुशियों का मोल समझने के लिए
पर अति क्यूँ इति सा लगता है ..
सभी इन्द्रियों से तुरही को सुनने पर    
संवेदना का स्वर तो निकलता ही है
साथ ही खुशियों-आशाओं का
ऐसा मधुर गीत भी निकलता है कि
दुर्निवार दर्द बन जाता है
भरपूर जीने की प्रेरणा और शक्ति .

Saturday, November 5, 2011

बातें हैं ...

बातें हैं , बातों का क्या
हवा सी डोलती - फिरती
आड़ी - तिरछी दिशाओं में
उल्टा - सीधा कोण बनाती हुई
ज्यामितीय परिभाषाओं को
तोड़ती-मरोड़ती, बनाती-बिगाड़ती
छूना चाहूँ तो अपने ही केंद्र में
चुपचाप सी दुबकती बातें
पकड़ना चाहूँ तो परिधि पर
घुमती- घामती , नाचती- भागती
मुझे ही लट्टू बनाती बातें
बलात कोई चक्रवात
खींच ले मुझे अपने पाताल में
और उसके परतों का करना पड़े
अध्ययन दर अध्ययन .. ओह !
बातें हैं , बातों का क्या
बादलों की तरह
सर्द होऊं कि बरस जाती है
इतना कि डूबती-उतराती रहूँ और
बनाती रहूँ डोंगी ,नैया ,जहाज
या फिर उसे उलीचती रहूँ
डूबी रहती हूँ पूरी तरह
बातें हैं , बातों का क्या
अटक कर , कुरेदती हुई
बना देती है रिसता घाव
उसे छलनी में डालूँ भी तो
छलनी सी हो जाती है
बात पर जो आऊँ तो
उड़ा देती है अपनी बातों में
बिखरी पड़ी है बरकती बातें
ये भोथरी- बरछी सी बातें
खुलती- गाँठ सी बंध जाती बातें
बातें हैं , बातों का क्या
कितना भी पलट दूँ
फिर भी निकलती हैं बातें .
 

  

Sunday, October 30, 2011

शून्य दिमाग़ में

शून्य दिमाग़ में
अचानक दौड़ पड़ता है
रेस लगाता घोड़ा
पछाड़ खाकर
गिरता है 
धड़ाम !
शून्य दिमाग में
उग आती है
हरी-हरी घासें 
कहीं से गाय बकरी
आकर चरने लगती हैं
कर देती हैं 
सपाट !
शून्य दिमाग़ में
रेंग पड़ते हैं
असंख्य कीड़े
मुँह मारते , स्वाद लेते
चूसते हुए कर जाते
सड़ाक !
शून्य दिमाग़ में
अंडे तोड़कर
निकलते हैं मेढ़क
उड़ने की चाह में
फुदकते हुए 
गिरते हैं उसी में
छपाक !
शून्य दिमाग़ में  
प्रेम करते हैं
शेर और शेरनी
एक-दूसरे को
काटते-नोचते हुए
गूँज उठती है उनकी
दहाड़ !
शून्य दिमाग़ में
टकराते हैं बादल
नसें चटकती हैं
बीजली चमक कर
गिरती हैं 
तड़ाक !
शून्य दिमाग़ में
उफनता है समंदर
उठते लहरों को
एक-एक कर
अपने में ही 
कर जाता है
गड़ाक !
 

Tuesday, October 25, 2011

मैं...तन्मय

1.
मेरी मौन
साधना में
गूंजते हो तुम
ओSSम बनकर
मेरे साध्य
साधती हूँ तुम्हें
हर साँस पर
मैं तन्मय होकर .
 
 
२.
मैं मात्र
हूँ एक पात्र
जिसमें
भरे हो तुम
मैं तन्मय
हो गयी चिन्मय
और अमृत
मेरे हो तुम .
 
 
३.
तुम्हें
शब्दों में
बाँधने की
युक्ति है या
स्वयं से मुक्त
होने की है
याचना ज्योतिर्मय
जिससे मैं हो जाऊं
तुममें केवल तुममें
..................तन्मय .
 
 
4.
 
हर क्षण
जलती हूँ मैं
तन्मय होकर
आलोकित
होते हो तुम
मेरी
आभा बनकर.
 
 
                    ***  शुभ दीपावली ***
 
 
 

Saturday, October 22, 2011

सार - वृत

जब एकोsहं बहुष्यामि
बहुष्यामि एकोsहं
तब केवल
''अहं ब्रह्माष्मी '' का 
हम क्यों पाले हैं भरम...
हम क्यों नहीं जानते
निज से औरों का मरम..
सब पोल खुली है फिर भी
हमें नहीं आती हाय! शरम..
काहे का ये झगड़ा - टंटा
फिर काहे कोई अनबन.........
तेरी - मेरी का ये चक्कर
क्यों नहीं बूझे लाल बुझक्कर
बड़े - बड़े भी यहाँ पर
खुद में है महा फक्कड़......
काहे का ये लटका - झटका
फिर काहे कोई उपक्रम....
जब सार- वृत
यही है जीवन का ---
शिवो s हं  शिवो s हं
सच्चिदानन्दों s s s हं
अप्रिय बात शुरू करने से पहले
सारी बात करो खतम .
   

Tuesday, October 18, 2011

ब्लॉग जगत

आम  लोगों  का   ये     ब्लॉग जगत
हर किसिम  के लोग   यहाँ आते  हैं
हर किसिम का आम खिलाते ही हैं
और  उसका  गुठली   भी  गिनाते हैं

ख़ास   लोगों  का  ये   ब्लॉग जगत
बेहद   ख़ास   लोग  यहाँ    आते   हैं
खुबसूरत   ख़ालिश    ख्यालातों   से
इस  जगत में  कई   चाँद लगाते हैं

वाद -प्रिय लोगों का ये ब्लॉग जगत
अनेकों  वाद    लिए      यहाँ   आते  हैं
कलम की  तअब -ताकत    दिखाकर
सशक्त  उपस्थिति  दर्ज      कराते  हैं

विवाद-प्रिय लोगों का ये ब्लॉग जगत
अनर्गल बातों  से  बक -वाद कराते हैं
वाद - प्रतिवाद  को   हवा  दे  दे    कर
ऐसा वैसा चाहे जैसा टिप्पणी पाते हैं

खिचड़ी-खीर  सा   ये      ब्लॉग जगत
पिज्जा- बर्गर सा   ये     ब्लॉग जगत
पेप्सी - कोला सा   ये     ब्लॉग जगत
या भंग मिले ठंडई सा ब्लॉग जगत .


मुझे भी लत लग गयी है --ठंडई की . 


    

Friday, October 14, 2011

झंकार

कौन अपनी अकुलाहट को जानता है
काल-व्यूह से निकलने को ठानता है
कुछ अस्पष्ट सी ध्वनि को टानता है
परिवर्तन की आहट को पहचानता है

लग गयी किस को ये कैसी लगन है
काल-चिंतन में ही जो बस  मगन है
बड़वानल- सा हर क्षण जो  चेतन है
सुगन्धित हो रहा कनक -चन्दन है

एक- एक कर संगी - साथी छूटते हैं
अभंग जिसकी सीमाएं , भी टूटते हैं
जब ह्रदय से यूँ ही फव्वारे  छूटते हैं
तब मरू- भूमि में भी अंकुर फूटते हैं

क्यूँ भीतर- भीतर मचा  हाहाकार है
किसलिए मुझे देता कोई ललकार है
न जाने कौन -सी सत्य की पुकार है
संभवत: मेरे मैं की  पहली  झंकार है

अदृश्य- सी डोर से खींचता  है   कोई
अज्ञात - अब्धि में  सींचता  है  कोई
अनवगत - सा पथ दिखाता है  कोई
अप्रति मैं ही हूँ वही या है इष्ट कोई.  
  
 

Sunday, October 9, 2011

तुम्हें लगता है....

तुम्हें लगता है
बहती हूँ मैं
हवाओं की तरह
भरता रहता है
तुममें प्राण.......
तुम्हें लगता है
लहराती हूँ मैं
नदियों की तरह
भींगे-भीगें से
तरंगित होते हो तुम......
तुम्हें लगता है
महकती हूँ मैं
फूलों की तरह
मादकता से
उन्मत्त होते हो तुम......
तुम्हें लगता है
चहकती हूँ मैं
चिड़ियों की तरह
नाच उठता है
तुम्हारा मन-मयूर........
तुम्हें लगता है
चमकती हूँ मैं
सूरज की तरह
रोशनी से
भरे रहते हो तुम.......
तुम्हें लगता है
छिटकती हूँ मैं
चाँदनी की तरह
शीतलित होता है
तुम्हारा रोम-रोम.......
प्रिय !
ये प्रेमातिरेक है या
उसकी सहज प्रवृति
पर मुझे लगता है
कि ये है तुम्हारी
आत्म-विस्मृति...
या फिर
तुमने मान लिया है
कि मैं हूँ तुम्हारी
कोई निगूढ़ प्रकृति .
 

Wednesday, October 5, 2011

मेरे शब्द

मेरे शब्द
जिससे मैं कहती हूँ
दुनिया भर की
बेसिर-पैर की हर
छोटी-बड़ी बातें......
कभी खड़ी करती हूँ
बहुमंजली इमारतें
ताशों के मानिंद
तो कभी गढ़ती हूँ
रेशमी धुआँ से
लच्छेदार छल्लेदार इबारत...
अक्सर उसी में छुपकर
कर लेती हूँ चुपके से
उसी की इबादत..........
मेरे शब्द
जिसे मैं महसूसती हूँ
अत्यंत आंतरिक स्तर पर
जो अपने आवरण में
कभी शराफ़त से
तो कभी शरारत से
लपेटे रहता है मुझे.......
कभी वह किसी सच के
बेहद करीब जाकर
अड़ जाता है
तो कभी खुद पर बिठा
न जाने कौन-कौन सी
जहान की सैर
करा देता है मुझे.........
मेरे शब्द
शायद शब्द भी
कम पड़ रहे हैं
या मैं ही हूँ कोई
निःशब्द शब्द .

Thursday, September 29, 2011

ख़जाना

कल्पनाओं के पंख लग गये
मैं देखती रह गयी उन्हें
असीम फलक पर उड़ते हुए...
सपनों में रंग भरने लगे
मैं देखती रह गयी उन्हें
स्याह सिक्त होते हुए.......
आशाओं की कोख उजड़ गयी
मैं देखती रह गयी उन्हें
बेबस बाँझ होते हुए......
सोच को मार गया लकवा
मैं देखती रह गयी उन्हें
जब्रन जड़ होते हुए........
विचारों में युद्ध छिड़ गया
मैं देखती रह गयी उन्हें
धड़ा-धड़ धराशायी होते हुए...
मुझसे एक - एक कर
सब छुट रहे हैं या फिर
साज़िश तहत रूठ रहे हैं.....
अपने खालीपन को कैसे भरूँ
कुछ तो बहाना चाहिए
जिसमें मैं बहूँ .........
अब बिना बहाना किये
इस खालीपन के खज़ाने को
बाँटे जा रही हूँ
बस ...बाँटे ही जा रही हूँ...
मुआ कैसा ख़जाना है कि
खाली होने के बजाय
और भरता ही जा रहा है .

Friday, September 23, 2011

क़िस्मत

जब गद्दाफी की गद्दी  लुट  गयी
तो आप किस खेत  की  मूली हैं

अपने भूलभुलैया में हमें भुला दें
ग्रह-नक्षत्र आपको नहीं  भूली है

तिरेसठ को जरा छतीस होने दें
आपका चुराया सुख  ही सूली है

महामाया  लक्ष्मी  रास   रचाए
एक ही बाँह में   कहाँ  झूली   है

आसमाँ  से जमीं  पर  गिराकर
नाज़ो-नख़रा  पर खूब  फूली है

कब किस माथे तिलक सजा है
कब वहीं कालिख  और धूलि है

दुनिया देख रही  उस  राजा  को
जो अब  मामूली से  मामूली  है

अपने हक़-हिस्सा से ज्यादा लेंगे
तो किस्मत भी कीमत वसूली है .




 

Monday, September 19, 2011

गवारा

काँपी धरती
ह्रदय भी काँपा
मौत के ख़तरे को
हम सभी ने भाँपा
तन-मन जोर से डोला
फिर सच ने
वही अपना राज़ खोला
जिस घर के लिए
दुश्मन हुए भाई
नाते-रिश्तों की
खूब कीमत लगाई
या आजीवन खर्च किया
खून-पसीने की
गाढ़ी कमाई
कौन सा किया नहीं
तेरी - मेरी
उसी घर को
छोड़ने में तनिक भी
लगाई नहीं देरी
जान बचा भाग चले
खड़े हो गए
आसमान तले
ओह ! कैसा उभरा
दृश्य निराला
उस अपने घर में
एक पल किसी को
रहना हुआ न गवारा .
 
 
 
भूकंप को मैंने इतनी अच्छी तरह महसूस किया कि पोस्ट डालने से खुद को रोक नहीं पायी .

Friday, September 16, 2011

बोलो हे !....

वाक् मेरे वाग्बद्ध हो

क्यूँ सुर में झंकृत होने लगा है

वेदना अब वंदना बन

क्यूँ अश्रु सा बहने लगा है

व्यथा भी वितृण वाट्य बन

क्यूँ पुष्प सा खिलने लगा है...


बोलो हे ! विधि के विधायक

सघन वीथिका में दृग हमारे

क्यूँ कर दिए वृहद् इतना

उभरती हैं जो वृत्तियाँ आज ये सहसा

उन्हें कुछ भिन्न सा दिखने लगा है ....


बोलो हे ! सर्व सत्व के सर्जक

गहन संवेदना में संस्पर्श हमारे

क्यूँ कर दिए सूक्ष्म इतना

उमड़ती है जो अनुभूतियाँ आज ये सहसा

उन्हें कुछ भिन्न सा छूने लगा है....


बोलो हे ! प्रणय के प्रदीपक

प्रेम की कैसी ये धारा

बह रही है मुझमें अब

निज है जो मेरा आज ये सहसा

क्यूँ निज में ही खोने लगा है।

 

 

 

वाग्बद्ध -- मौन ,   वितृण --- तृष्णा रहित ,  विधायक -- नियम बनाने वाला ,
सत्व -- अस्तित्व  , प्रणय -- प्रेम    
प्रदीपक -- प्रकाश फैलानेवाला 

Sunday, September 11, 2011

हे ! त्रायमाण .

अब   तो   मनु    नहीं     नादान
सृष्टि-ध्वंस   का   है  उसे  ज्ञान
जब प्रकृति पर भारी   है विज्ञान
तब तो प्रलय की आहट पहचान
 
भय   भी   हो   रहा  है   भयभीत
किसकी   हार  है  किसकी  जीत
कौन किसका कर रहा है उपहास
या चेतना का हुआ अकल्प ह्रास
 
पुनः  चीख   रही   है     चीत्कार
वही मांसल-चीथड़ों का व्यापार
फैला   लहू  है   दृश्य   विकराल
बह रही  है  आँसुओं  की    धार
 
कैसा   मचा   हुआ  है  हाहाकार
स्नेही-जन   की   अधीर  पुकार
तेरे   विश्व   में   हे !    भगवान्
निज प्राणों का  शत्रु  हुआ  प्राण
 
क्या कलियुग का यही अभिशाप
हर  ह्रदय   कर  रहा   है   विलाप
कैसा घृणित, कुत्सित अभियान
मानवता  का   है   घोर   अपमान
 
वासना-लिप्सा पर लगाओ लगाम
आगामी विस्फोटों को  दो  विराम
शरणागत हैं तेरे करो सबका त्राण
त्राहि   -  त्राहि       हे !    त्रायमाण . 
  

Friday, September 2, 2011

पिया जो नहीं...

साँझ     फिर   उदास     है
जिया जो   नहीं   पास   है
सब   लौट   रहे   घर   को
कोई कह दे   बेखबर   को
राह कहीं   भटक न   जाए
या   वहीँ   अटक न    जाए


रात     फिर      बेआस       है
पिया    जो    नहीं   पास   है
सब रीझती औ रिझाती होंगी
पिया संग  हँसती- गाती  होंगी
मैं   अँखियों में   तारा भरती
और चंदा को   निहारा करती


प्रात:    पिघलता      आस   है
धुँधला - धुँधला   उजास   है
हाय ! कैसा    ये   खग्रास है
कबतक   का      वनवास    है
जिया    आये   न    रास   है
पिया     जो   नहीं   पास   है.

Friday, August 26, 2011

कैसे मैं...

कैसे मैं कह दूँ
कि तुम क्या जानो
प्रेम की तीव्रता को
जबकि हर बार
मैंने छुआ है
तुम्हारे प्रबल वेग से
टूटती उसकी सीमाओं को...

कैसे मैं कह दूँ
कि मैं न बोलूं तुमसे
जबकि हर बार
मैंने देखा है
उलाहना के बोल को
मनुहार में बदलते हुए ....

कैसे मैं कह दूँ
कि तुम क्या जानो
ह्रदय में उठती हूक को
जबकि हर बार
मैंने सोखा है
तुम्हारे तुलनात्मक ताप से
कई गुणित प्रवाहित प्रेम को...

कैसे मैं कह दूँ
कि मैं न रूठूँ तुमसे
जबकि हर बार
मैंने चाहा है
मिलन की मधुर घड़ी
कभी न बदले
विदाई की बेला में....

अब कैसे मैं कहूँ
अनगिना अनकहा को
जबकि तुमने जो
धर दिया है
अधर को
........अधर पर .

Friday, August 19, 2011

अंधेरनगरी में....

अंधेरनगरी में भी
चलता है अंधेरखाता
अक्ल पर पड़े पहाड़ को
क्यूँ है उठाता
ये उल्टी गंगा
कौन है बहाता
खरी - खरी
किसको है सुनाता ?

अंधेरनगरी के
कानों में
तेल और घी भरा है
जूं - चीलड़ तक
नहीं रेंग रहा है
नाक तो कटी हुई है
पगड़ी भी उतरी हुई है .

अंधेरनगरी का कानून
अँधा बनकर अँधा बनाना
अंटी मारना , अंगूठा दिखाना
जूते चाटना , गाल बजाना
चूड़ियाँ पहनना , मक्खियाँ मारना .

अंधेरनगरी का है काम
सीधा उल्लू को सीधा करना
पकी खिचड़ी फिर-फिर पकाना
घोड़े बेच-बेच कर सोना
और कुत्ते की मौत मर जाना .

अंधेरनगरी में
नहीं निकलते चींटियों के पर
फटा करता है यूँ ही छप्पड़
एक ही लाठी से सभी हँकाते
अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बन जाते .

अंधेरनगरी है अपनी नगरी
छलकत जाए अधजल गगरी .


( मुहावरा का खेल )



क्षणिकाएँ

अपराध-बोध

अब तो हर वक़्त
अपराध-बोध होता है
हक़ की बात करूँ तो
संविधान का
पन्ना खुल जाता है.

बुनियाद

यह ऊँचे आदर्शों का
है तिलस्मी महल या
रंग-रोगन किया हुआ
है कोई भरभराता खँडहर
बुनियाद की न लें खबर
वर्ना फ़ैल जायेगा जहर.

बहुमत

दबंग पहलू से दबका पहलू
है अंगूठा दिखा रहा
माना कि तू बहुमत में है
पर मैंने तेरा चूल हिला दिया.

Friday, August 12, 2011

प्रीत की रीत

ऊँघता चाँद
ऊभ - चुभ तारे
ठिठका सा बादल
ठहरी हवाएँ
सिमटा अँधेरा
सहमी सी दिशाएं
साँस रोके हैं
बेला-चमेली
संग उनके
मौलीश्री भी हो ली..
नदी किनारे
चकवा उदास
अजब सी
अनबुझी प्यास
हीरे सा पल
यूँ ही बीता जाये
राह तक तक
वह रीता जाये.....
कलंक की मारी
चकई बिचारी
दे जी भर भर
रात को गाली...
कोसे कभी
भाग के लिखान को
कभी कोसे
विधना के विधान को..
प्रीत की रीत
यही जब होई
चकवा को
न मिले चकई
तब भी प्रीत
करे क्यूँ कोई ?


Friday, August 5, 2011

मेरा सावन

मैं बावरी
ढूँढती फिरूँ
मारी - मारी
उस बावरे को
जो न जाने
कहाँ है मगन..
किसकी प्रीत
बनी है बैरन...
हाय ! कैसा
पड़ा है बिघन
जो न लेता
मेरा सुमिरन...
बिछोही बिना
सूना - सूना है
ये चित - वन
बिसाहा बन बेधे
शीतल पवन
बिछुवा लगे
अपनी धड़कन...
मैं बावरी
बौराती फिरूँ
उपवन से मरू वन
विदाही मिले न
करूँ क्या जतन...
बरबस ताकूँ
वितत गगन
टंगा है जिसपर
काला - काला घन
मिलने को आतुर
विकल बसुधा से
अमृत बूँद बन
पर बावरे बिन
कैसे बरसे
मेरा सावन .

बैरन - शत्रु बिघन - बाधा
सुमिरन - याद , ध्यान
बिसाहा - जहरीला
विदाही - जलाने वाला
वितत - फैला हुआ

Friday, July 29, 2011

आत्म - रस

उगते सूरज को प्रणाम करूँ
जो डूब जाए तो राम-राम करूँ

क्यों किसी का कल्याण करूँ
बस अपना ही उत्थान करूँ

ये सोच सुबह से शाम करूँ
और सोच-सोच बिहान करूँ

बस इतना ही मैं काम करूँ
और तान चदरिया आराम करूँ

कोई टोके तो तुम-ताम करूँ
अपनी ऊँचाई पर बस मान करूँ

उपदेशों का केवल दान करूँ
और अपना ही गुणगान करूँ

काया - कष्टं का बलिदान करूँ
और आत्म रस का पान करूँ

जो माने उसका सम्मान करूँ
न माने तो घमासान करूँ .

Friday, July 22, 2011

पूर्णविराम

प्रायश:
मेरे पूर्णविराम का
परकाया गमन
प्रायोगिक नहीं
प्रायोजित होता है
कभी अल्पविराम में
कभी योजक चिह्न में
कभी प्रश्नवाचक चिह्न में
कभी विस्मयाधिबोधक चिह्न में
तो कभी किसी उद्धरण चिह्न में..
कभी तो नियमों के पार जाकर
अपने स्थान पर
क्रमागत बिन्दुओं को
इसतरह सजा देता है कि
उसे भरने में
मैं शून्य हुए जाती हूँ
और न जाने
कहाँ से आ जाता है
उस शून्य के भी आगे
अनंत का चिह्न......
ये कौन सी पहेली है
ये कैसा खेल है
कोई भूलभुलैया भी होता तो
पता होता कि इसी में
खोया है कहीं पूर्णविराम
या मेरा परकाया गमन
अनंत में हो जाता तो
मिल जाता पूर्णविराम.......
इस नयी-नयी काया में
आत्मा के साथ यात्रा का
हो जाता सुखद अवसान
दम साध , दम भर
कर लेती मैं आराम
पर न जाने क्यूँ
सारे चिह्न
प्रायोजित होकर
बारम्बार मेरी काया में ही
प्रवेश कर जाते हैं
मैं सोचती रह जाती हूँ कि
क्यों मेरा गमन
फिर किसी
पर काया में हो जाता है
और हर बार की तरह
एक बार फिर
मेरा पूर्णविराम
मुझसे ही
कहीं खो जाता है.

Saturday, July 16, 2011

उद्यम

कम नहीं हैं
अपेक्षाएं
खुद से ही....
चुनौती की
दोधारी तलवार
आतंरिक एवम
बाह्यरूप से....
खुद को
साबित करने का
एक जूनून भी....
घड़ी-घड़ी घुड़की
घुड़दौड़ में
अव्वल न सही
जगह सुरक्षित कर
दौड़ते रहने का...
साथ ही
लंगड़ी मारने में भी
कुशल होने का......
आखिर
आँख खोलने से
अब तक
पिलाया गया
हर घुट्टी का
असर है.....
जो मूर्च्छा में भी
दोहरे दबाव को
घुसपैठ करा
किसी भी कीमत पर
ऊँच-नीच करके
सफलता के झंडे को
ऊँचा किये रहता है...
और
तराजू के पलड़े को
बराबर करने के लिए
राज़ी-ख़ुशी से
खुद को ही
काट-काट कर
बोटी-बोटी करना
सफल उद्यम
बन जाता है .

Friday, July 8, 2011

नियत ताप पर

नियत ताप पर
उबलते विचार
भाप बन उड़ जाते
या जल जाते तो
मर जाता मन
नौ रसों के साथ..
और छूट जाता
बेकार सा करते रहना
निरर्थक जतन...
जीवन सरल हो जाता
झोपड़ी महल हो जाता.
शून्य भी दिखता
कुछ भरा-भरा
सांय-सांय करती
हवाएं भी
एक छोर से दूसरे छोर तक
करती रहती अठखेलियाँ
जिसके संग
मन भी हवा बन जाता
और रह जाता
अपने बालपन में ही.
सच! सबकुछ
कितना सरल हो जाता.
पर
नियत ताप पर भी
उबलते विचार
उफन-उफन कर
लगते हैं गिरने
बूंदों में ही सही
और हर बूंद
बराबर हो जाता है
एक-एक
परमाणु बम के.....
अपने अन्दर दबाये हुए
उस विध्वंसात्मक
विपुल ऊर्जा को..
जो परिवर्तन के लिए
हर हाल में तत्पर है
अपने नियमानुसार...
उसी नियत ताप पर
उसे बदलना भी होगा
सृजनात्मकता में...
ताकि
नियत ताप पर भी
जनमती रहे
कालजयी-कृतियाँ.

Saturday, July 2, 2011

अर्पण

अभिसंयोग के
उन अभिभूत क्षणों में
उन....उन..... क्षणों में
अभिज्ञात होता है मुझे
अतिशय अलौकिक स्पर्श
मानो मुझमें ही कोई
या.....या......या ....वही
आकार लेता है
वह अद्भुत,मृदु छवि
वह..... मनोहर काया
प्रेम करता है.... मुझे...
...प्रेम.....प्रेम.....प्रेम....
...हाँ.....वही... दिव्य प्रेम.
...बरसती रहती है...
....बूंदे......बूंदे.......बूंदे....
..बूंदे.....आनंद की बूंदे..
..भींगता रहता है..
...तन...........मन....
..और.......और......
........और.............
मैं.........रहती हूँ
..उन्ही क्षणों में...
............हर क्षण .
.......वह क्षण है........
हर क्षण......हर क्षण....
....उस क्षण पर.....
हो गया है...मेरा....मेरा....
..ये.............. जीवन
....समस्त .......जीवन
.................अर्पण .




 

Friday, June 24, 2011

प्रेरणा

अज्ञात किसी क्षण सहसा
क्यों बेचैन हो उठता है मन
और अचानक कहीं गहरे में
उभरकर बिखरने लगती है
संवेदनाएं बेतरतीब.....
मैं उन्हें समेटना चाहती हूँ
तुम्हारे आशा के अनुरूप
अभिव्यक्ति देना चाहती हूँ
उन अव्यक्त विचारों को
जो अभिशप्त है मौन के लिए
और नियति बन जाती है जिनकी
वेदना-कुछ अजीब........
मैं उन्हें सहेज लेना चाहती हूँ
आत्मस्वरूप अहसास के
गहरे अनुभूतियों से
परन्तु अभिव्यक्ति कैसे दूँ?
जब मुझमें मैं ही न रही
क्योंकि आज जो सोचती हूँ
वो चिंतन तुम्हारे हैं
लिखती हूँ तो
शब्द भी तुम्हारे हैं
जीना चाहती हूँ तो
जीवन की शक्ति भी
या यूँ कह लो कि
सम्पूर्ण जीवन में
समा गए हो तुम
प्रेरणा बन कर .
 

Friday, June 17, 2011

दिवा-फिल्म

माना कि
खुदा मेहरबान है
तो.................है...
ये भी माना कि
आपसे मिली है मुझे
चार दिनों की चाँदनी...
पर अब
मेरी लाठी मेरा सूरज
और मेरा चाबुक देख
ऊँट करवट बदलेगा.....
बाली सा वरदान है
जगत जनार्दन से
गजब गठबंधन है
बहुमत है बहुबल भी है....
चाहे तो ग्रह-नक्षत्र
इधर से उधर हो जाए
ग्रहण लगने की कोई
गुँजाइश ही नहीं है......
अनहोनी के अंदेशा से ही
मदमस्त हाथी बन
रात गए रौंद सकता हूँ
आपके अरमानों को.......
मेरे इस
हास्यास्पद,लज्जास्पद लीला से
भले ही आपकी
आँखे या छाती
फटे तो आपकी बला से.......
बेलगाम घोड़ा हूँ तो क्या
आपका नकेल कसता रहूँगा...
हमारा लोकतंत्र फले-फूले
सो जंगल-नीति अपनाना है
मिश्री-मलाई से चुपड़ कर
आपको बहलाना-फुसलाना है... 
एक बार फिर
ये चाँदनी हमें ही दें आप
ऐसा दिवा-फिल्म दिखलाना है...
हम भी क्या करे
ये साम,दाम,दंड, भेद
का ही तो ज़माना है.
 

Saturday, June 11, 2011

परमारथ


मेरे अंधे अनुचरों
मैं अति महत्वाकांक्षी  
सिद्धि सिद्ध कर
मैंने दिया तुम्हें
वो दिव्य दृष्टि
जिससे तुम मुझे
देख सको
अपनी-अपनी
आकांक्षा के आईने में....
मेरी महानता है कि
आईने के पीछे चढ़ा
केसरिया मुलम्मे को
रगड़-पोछ कर
हो गया मैं
थोड़ा पारदर्शी......
देखो मेरा विशाल साम्राज्य
कब्र में लेटा सिकंदर भी    
रश्क करता होगा
इसे देखकर.......
थोड़ा और
पारदर्शी हो जाऊं तो
कब्ज़ा ही न जमा लूँ
पहले पायदान पर......
आओ कुछ कर्म करें
एक लम्बी सांस
अपने अंदर करो
तुम अपनी तिजोरी से
और तुम
अपनी अंटी से
परमारथ के  लिए
कुछ बाहर करो.........
बाजार में
बड़ी मारामारी है
देश में या तो बेकारी है
या केवल भ्रष्टाचारी हैं...
मेरे पीछे चलना
तुम्हारी लाचारी है.....
और तो और    
विरोधियों के हाथ
सान धरा आड़ी है......
हमें मिलकर
संभलकर चलना है
काले-गोरे का
भेद मिटा
परमारथ के लिए
एक-दूसरे को
छलना है.


         

Friday, June 3, 2011

अंगूठा

मेरे बारे में
बहुत कुछ पता रहता है
दूसरों को ......
जो अति गुप्त होता है या
अतिरेक का शिकार होता है...
और मैं
सशंकित रहती हूँ हमेशा
अपने ही बारे में....
न जाने किस
बेतार के तार से
जुड़ें हैं सभी.......
बिंदास होकर
कह देते हैं मुझे ही
मेरे बारे में......
जो दिखता है वो भी
जो नहीं दिखता है,वो भी
और मुझे
चुप होना पड़ता है.....
सोच की मरियल घोड़ी को
थोडा इधर,थोडा उधर
दौड़ना पड़ता है....
वाकई!
क्या वे सही है
जो अपनी राय से
तय करते हैं मुझे.....
फिर मैं ?
मैं क्या करती हूँ
अंगूठा ही तो लगाती हूँ
जो मैं नहीं हूँ
उसपर भी .