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Saturday, July 2, 2011

अर्पण

अभिसंयोग के
उन अभिभूत क्षणों में
उन....उन..... क्षणों में
अभिज्ञात होता है मुझे
अतिशय अलौकिक स्पर्श
मानो मुझमें ही कोई
या.....या......या ....वही
आकार लेता है
वह अद्भुत,मृदु छवि
वह..... मनोहर काया
प्रेम करता है.... मुझे...
...प्रेम.....प्रेम.....प्रेम....
...हाँ.....वही... दिव्य प्रेम.
...बरसती रहती है...
....बूंदे......बूंदे.......बूंदे....
..बूंदे.....आनंद की बूंदे..
..भींगता रहता है..
...तन...........मन....
..और.......और......
........और.............
मैं.........रहती हूँ
..उन्ही क्षणों में...
............हर क्षण .
.......वह क्षण है........
हर क्षण......हर क्षण....
....उस क्षण पर.....
हो गया है...मेरा....मेरा....
..ये.............. जीवन
....समस्त .......जीवन
.................अर्पण .




 

40 comments:

  1. और वो क्षण ही सबकुछ होता है , और इस अद्बुत क्षण में घटित होता है सिर्फ प्रेम ..

    बहुत सुन्दर कविता जी

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  2. भावविभोर कर देने वाली कविता है.

    सादर

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  3. मधुर काव्य अभिव्यक्ति.

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  4. क्या बात है, अद् भुत

    आपको बधाई

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  5. क्यों न हो ...दिव्य प्रेम पर जीवन अर्पण ...है मन आपका दर्पण ...
    मन उल्लासित कर रही है आपकी कृति....
    बधाई ..एवं शुभकामनायें ...!!

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  6. प्रेम की दिव्य ज्योति से आलोकित है संसार , बस देखने की दृष्टि और महसूस करने के लिए ह्रदय होना चहिये .. तेरा तुझको अर्पण .सुँदर भावप्रवण रचना .

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  7. यह तो बस वही ..चरम आनंद की अनुभूति है -अध्यात्मी इसे ही सत चित आनंद कहते नहीं अघाते ...

    तनिक अभिसंयोग और अभिज्ञात में से अभि हटाकर तो देखें!

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  8. वाह! क्या सुन्दर अर्पण है, अमृता जी.
    आनंद ही आनंद है बस.
    अदभुत 'तन्मयता' का अनुभव हो रहा है.
    बहुत बहुत आभार.

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  9. कविता का फ़ॉर्मेट ऐसा है जो काव्य के भावभूमि के अनुरूप है और रचयिता के भाव को अभिव्यक्त कर रहा है। शब्द शिल्प और भाव एक दिव्य ज्योति का प्रदर्शन कर रहे हैं।
    बहुत अच्छी रचना।

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  10. ऐसे क्षण आपके जीवन में बार-बार आयें...जीवन बहुत बड़ा है...और हर क्षण का अपना महत्व...दुःख के भी और सुख के भी...

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  11. Prem kuchh is tarah hi abhibhoot kar deta...ki swa twa me vileen hokar swatwa ho jata...ya fir tatva sa udbhasit...

    Behad darshnik aur prem ras se pagi kavita...prem ko anubhooti ko tanmayata se likha hai tumne Amrita...Badhayee.

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  12. Prem ka adbhut arpan...kamal

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  13. .हर क्षण .
    .......वह क्षण है........
    हर क्षण......हर क्षण....
    ....उस क्षण पर.....
    हो गया है...मेरा....मेरा....
    ..ये.............. जीवन
    ....समस्त .......जीवन
    .................अर्पण .

    बहुत सुन्दर ...

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  14. एक नए अंदाज में प्रस्तुत किया भाव ...क्या अर्पण है ..बस समर्पण ही समर्पण है ...आनंद है ..!

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  15. अद्भुत रचना है आपकी,
    बधाई,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  16. सोचती....और.....सोचती सोच जहाँ पहुँची वहीं तो पहुँचना था. बहुत अच्छी कविता.

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  17. प्रेम होता ही ऐसा है जिसमें न चाह कर भी अपना सब कुछ अर्पित हो जाता है. बहुत सुन्दर अनुभव बधाइयाँ

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  18. आपका स्वागत है "नयी पुरानी हलचल" पर...यहाँ आपके पोस्ट की है हलचल...जानिये आपका कौन सा पुराना या नया पोस्ट कल होगा यहाँ...........
    नयी पुरानी हलचल

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  19. उस ऐसे क्षण में जब बूँद अमृत बन जाती है ... जीवन प्रेम अमर हो जाता है ..

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  20. बहुत गहन अनुभूति को शब्दों में बांधने का सामर्थ्य दिखाया है आपने......पर कुछ भाव शब्दों से परे ही जिए जाते है.........ये तीन...तीन बार का प्रयोग हिमेश रेशमिया की याद दिला गया :-)

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  21. bahut sundar samarpan bhav se bhari kavita amrita ji aabhar.

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  22. सुन्दर काव्यात्मक अभिव्यक्ति !

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  23. सुन्दर रचना....

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  24. बहुत सुन्दर अमृता जी - कमाल का भाव प्रेषण - शुभकामनाएं.
    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    http://www.manoramsuman.blogspot.com
    http://meraayeena.blogspot.com/
    http://maithilbhooshan.blogspot.com/

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  25. पूर्णानंद ,पूर्ण -समर्पण ,दिव्यअनुभूति की कविता .इन ही क्षणों में दिनकर ने कहा होगा -सत्य ही रहता नहीं ये ध्यान तुम कविता कुसुम या कामिनी हो .

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  26. गहन अभिव्यक्ति.

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  27. सुन्दर प्रस्तुति

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  28. अंतर्मन से उपजी सम्वेदन शीलरचना.

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  29. रिक्त स्थान में भी गहन अर्थ छिपा है

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  30. आपकी किसी पोस्ट की चर्चा शनिवार ( 09-07-11 )को नयी-पुरानी हलचल पर होगी |कृपया आयें और अपने बहुमूल्य सुझावों से ,विचारों से हमें अवगत कराएँ ...!!

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  31. bahut hi gahan abhiwykti...........jai hind jai bharat

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  32. Amritajee, mata aur putra , pati ewam patnee , mitra aur mitra tathaa bhakta aur ishwar ke beech prem hee to pradhaan tatwa hai . apanee rachanaa premanjali se :

    yahee prem sachchidaanand hai ,
    yahee prem amrit hai ;
    jismen milataa naheen
    manuj wah jeewit hokar mrit hai.


    aur Kabeer ne to prem ko hee panditya kee kasautee banaa diyaa .

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