बड़ी मुश्किल से , मैंने हवाओं से
होड़म-होड़ करना छोड़ा था
फिरी हुई सिर लेकर , सबसे यूँ ही
बिन बात के भी , टकराना छोड़ा था
अपने बौड़मपन को , बड़े प्यार से
समझा-बुझाकर , बहला-फुसलाकर
शांत , गूढ़ और गंभीर बनाया था
पर ये क्या ? किसने मुझे भरमा दिया ?
या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !
अल्हड़ , नवयौवना , रूप-गर्विता बनकर
मैं इधर-उधर , यूँ ही इतराने लगी हूँ
अपने सौंदर्य में ही केसर , कुमकुम , चंदन
घोल-घोल कर , सबपर लुटाने लगी हूँ
मेरी आंखें क्यों हो रही है नशीली ?
और बातें भी क्यों हो रही है रसीली ?
क्या मुझे मत्त मदिरा पिला , मदकी बना दिया ?
या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !
सुबह ने मेरे माथे को , चूम-चूम कर ऐसे जगाया
और अंगड़ाईयों से मुझे , खींच जैसे-तैसे छुड़ाया
मैं भी अलस नयनों की , बेसुध खुमारियों को
गरम-गरम चुसकियों से , जगाए जा रही थी
कि सूरज की उतावली किरणों ने हरहराकर
मुझे ही , हर कोने-कोने तक , बिखरा दिया
या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !
यूँ ही टहलते हुए , झील पर , पंछियों से
अपने को , हँसना-बोलना , सिखा रही थी
पिघलती हुई पहाड़ियों के , नरम-नरम ओंठो पर
अपनी मन बांसुरिया को , रख कर बजा रही थी
कि आप ही आप , मधुरतम मिलन का स्वर
गा-गा कर मुझे , सब दिशाओं में , गूंजा दिया
या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !
फिर मैं तो , खेल-खेल में ही , ऊंगलियों को
अपने लटों से , उलझा-पुलझा रही थी
जानबूझकर उधेड़-बुन में पड़ी हुई
कुछ पहेलियों को , समझा-बुझा रही थी
कि हजारों फूलों की सुगंधि , आलिंगन में भर कर
यहाँ-वहाँ , जहाँ-तहाँ , मुझे ही बिखेरकर , महका दिया
या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !
दौड़ते-भागते , गिरते-पड़ते , दिन को रोक कर
सोचा कि , थोड़ा आंचल का छांव दे दूँ , इसलिए
दादी-नानी वाली , बात-बात पर टोकारा से , टोक कर
कहा कि दम भर सुस्ता ले , थोड़ा पांव दबवा ले
उससे कलेऊ का , बियालु का , आग्रह कर रही थी
कि मुझे ही कंधे पर बिठा कर , सब छोर घुमा दिया
या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !
ठिठोली में ही , साँझ की बड़री कजरारी , आंखों को
करपचिया काजलिया से , आंज कर मैं सजा रही थी
झीनी-झीनी बदरिया की भी , भोली-भाली अलकों को
रोल-रोल कर , मुकुलित मुखड़े पर , छितरा रही थी
कि अचानक चारों ओर , शत-शत दीप जल गये
मुझे ही उजालों से भरकर , सारे जग में जगमगा दिया
या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !
मैं तो बड़ी मीठी , कुनकुनी , अपनी ही नींद को
हाथों के हिंडोले में , हिला कर सुला रही थी
किसी उस अनजाने को भी , सपनों में बुला रही थी
कि रात ने आकर , बड़े प्यार से , ऐसे जगाया और
मुझे ही अपनी गोद में उठा , बाहर ले जाकर
चांद-तारों के , अछूते सौंदर्य से , पूरा नहला दिया
या शायद बसंत ने मुझे फिर से बहका दिया !
अब मेरे बचाव में , बसंत को ही , कुछ कहना पड़ेगा
सारे करतबी करतूतों का , भंडाफोड़ भी , करना पड़ेगा
कि बड़ी मुश्किल से , कैसे अपने को , संभाले हुई थी
और रटा-रटा कर , शालीनता का पाठ , पढ़ाए हुई थी
मैं इतना ही कह सकती हूँ , इसमें मेरा कोई दोष नहीं है
सच में ! किसी ने मुझपर , काला जादू चलवा दिया
या शायद बसंत ने ही मुझे फिर से बहका दिया !
*** बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ ***