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Saturday, August 27, 2016

खोल रही हूँ खुद को ........

खोल रही हूँ खुद को
खाली खोल से
खोल कर
खोखले खोल को ......
ओह !
खोल में कितने खोल ?
खोल पर कितने खोल ?
क्या खोल का खोट है
या खोल ही खोट है ?
आह !
खोट ही खोट
और खोट पर
ये कैसा नोंच खसोंट ?
फिर खसोंट से खून
या खून का ही खून ?
खोज रही हूँ खुद को
या खो रही हूँ खुद को ?
हाँ !
खाली खोल से
खोल रही हूँ खुद को .

26 comments:

  1. बहुत कष्टप्रद होता है अपने आप को खोलना।
    बहुत सुन्दर

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  2. सार्थक और सारगर्भित कटाक्ष! नियमित लिखिए अब ...!!

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  3. कितना कमाल ....वाह ये तो बहुत ही दिलचस्प शैली है आनंदम आन्दम | लिखती रहें यूं ही आप , शुभकामनायें

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  4. परत दर परत हम खोल ओढ़ के जीते हैं...खुद अपनी परतें खोलना सबसे बड़ी चुनौती है...सुंदर रचना...

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  5. Kya baat hai ..... Behad gahan bhav !

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  6. आह !
    खोट ही खोट
    और खोट पर
    ये कैसा नोंच खसोंट ?
    ओह! क्या कहूँ …………निशब्द कर दिया…

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  7. खोज रही हूँ खुद को
    या खो रही हूँ खुद को ?
    अबूझ पहेली !

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  8. कितनी परतों के भीतर हम .... और वहां भी हैं कि नहीं यह भी बड़ा सवाल ... खूब लिखा

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  9. खोल के अंदर खोल- कितनी खोलों में छिपा बैठा है अपना निजत्व !

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  10. स्वयं को खोजना, खोल से निकालना... मुश्किल तो है ...

    ~सादर
    अनिता ललित

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  11. Its a great composition. Awesome

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  12. हमेशा की तरह गहन.
    शब्दों की जादूगरी.
    _______________विशाल

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  13. हमेशा की तरह गहन.
    शब्दों की जादूगरी.
    _______________विशाल

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  14. हमेशा की तरह गहन.
    शब्दों की जादूगरी.
    _______________विशाल

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  15. प्याज की परते,,,,आया कंहाँ से रे ,,,,,

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  16. प्याज की परते,,,,आया कंहाँ से रे ,,,,,

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  17. पीड़ा भी एक खोल है. खोल खुलते जाते हैं और खोल में होने का अहसास ही असीम होने का अहसास बन छा जाता है. आपका ब्लॉग पर लौटना बहुत अच्छा लगा.

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  18. मन को सचमुच खोल देने वाली रचना . वाह .

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  19. 'खाली खोल से
    खोल रही हूँ खुद को' .

    बाहर के खोल में खोट और खसोंट

    अन्दर की खोज में खुद नजर आये

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  20. पोस्टमार्टम सरीखा। बस। . पीड़ा।। वेदना।

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