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Monday, October 19, 2020

शब्दों के घास , फूस की खटमिट्ठी खेती हूँ .....

कुछ लिखने का मन होता है तो
कुछ भी लिख देती हूँ
हाँ ! मैं शब्दों के घास, फूस की खटमिट्ठी खेती हूँ
यदि चातक आकर खुशी-खुशी चर ले तो
खूब लहालोट होकर लहलहाती हूँ
न चरे तो भी अपने आप में ही हलराती हूँ
अपना बीज है, अपना खाद है
न राजस्व चुकाना है, न ही कर देना है
बदले में बस भूरि-भूरि प्रशंसा लेना है
ख्याति, कीर्ति का क्या कहना
सिरजते ही चारों ओर से बरस पड़ती है
जिसे देख कर यह परती भी सोना उगलती है
न संचारण , संप्रेषण की कोई चिन्ता
न ही प्रकाशक, संपादक की तनिक भी फिकर
हाँ ! कुछ कम नहीं है हमारी लेखनी महारानी जी की अकड़
विनम्रता कहती है-अर्थ अर्जित करना है जिन्हें
वे अत्याधुनिक मिश्रित खेती को अपनाये
पर हमें तो हृदय से बस विशुद्ध खेती ही भाये .

13 comments:

  1. एक दशक से तो मैं आपकी कविता पढ़ रहा हूँ। अद्भुत जीवन के रंग, आपकी कविता के संग।

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 19 अक्टूबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. एक और लजवाब कृति। लिखते रहें।

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  4. अद्भुत सृजन अमृता जी ! आपका सृजन सदैव मंत्रमुग्ध करता है ।


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  5. वही तो. विशुद्ध खेती की ही तो दरकार होती है पाठकों को. बाकी सब कॉम्प्लीमेंट्री होता है.

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  6. बहुत बढ़िया सृजन।

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  7. हाँ ! कुछ कम नहीं है हमारी लेखनी महारानी जी की अकड़
    विनम्रता कहती है-अर्थ अर्जित करना है जिन्हें
    वे अत्याधुनिक मिश्रित खेती को अपनाये
    पर हमें तो हृदय से बस विशुद्ध खेती ही भाये .


    क्या बात है

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  8. लहलहाती रहे यह विशुद्ध खेती और आपकी कलम का जादू यूँही सिर चढ़ कर बोलता रहे

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  9. बेहतरीन रचना। एक कविमन का क्या कहना! बस लिखते रहना, लिखते रहना, रचते रहना मन का गहना। अपनी खेती अपना अंगना....
    श्रेष्ठ ...विशुद्ध कविमन को नमन।।।।।।

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