कल्पना जिसकी संजोयी हूँ
उसे सामने कहीं पा न जाऊं
घड़ी -दो -घड़ी के लिए सही
मैं अधन्या उसे भा न जाऊं
उस की वंशी - धुन सुन कर
शहनाई सी कहीं बज न जाऊं
बिन श्रृंगार - पिटारी के ही
उसके रूप से सज न जाऊं
ठगे से इन नयन के ठांव में
मैं लुंठित कहीं लुट न जाऊं
और लज्जा की लालिमा ओढ़े
नवोढ़ा - सी ही घुट न जाऊं
ह्रदय पर जो हरक्षण छाई है
प्रिय -छवि तो अनोखी होगी
वह मधुर - बेला मिलन की
कितनी चकित चोखी होगी
उसके रंग के छिटके छींटे में
आभा मेरी भी निखरी होगी
मरुदेश सा इस मन मरघट में
इक हरियाली सी बिखरी होगी
हिलोर लेती छुई -मुई घटाएँ
गगन में ऐसे भी घिरती होगी
बन कर दाह की चिनगारियाँ
प्यास अधरों पर तिरती होगी
सरस-सरस स्वर ले -ले कर
अमराई बन छिटक न जाऊं
महक-महक कर मदमाती सी
जूही सी कहीं लिपट न जाऊं
यदि वो घड़ी अभी आ जाए तो
भावना में मैं ही बह न जाऊं
न जाने किस - किस भाषा में
क्या कुछ कहीं कह न जाऊं
ठिठक गये यदि पग मगर
मन लिए ही कहीं बढ़ न जाऊं
लोक - लीकों का तोड़ भरम
सोच के पार ही चढ़ न जाऊं
गरल विरह का पी - पी कर
प्रेम - गीत कहीं गा न जाऊं
कल्पना जिसकी संजोयी हूँ
उसे सामने कहीं पा न जाऊं .