मेरे पास भी इधर-उधर से उधार का ज्ञान बहुत है
उसे भांति-भांति से सत्य साबित करने के लिए
उल्टा-पुल्टा , आड़ा-तिरछा , टेढ़ा-मेढ़ा प्रमाण भी बहुत है
पोथा पर पोथा यूँ ही नहीं लिख कर दे मारी हूँ
नये-पुराने सारे विषयों का अधकचरा खान बहुत है
अगर किसी सभा में अंधाधुंध जो बांचने लगूं तो
देखने-सुनने वाले की नजरों में मान-सम्मान भी बहुत है....
तब तो मानद उपाधियां मेरे चरणों तले
रंग-बिरंगे कालीनों के जैसे बिछी रहती हैं
और सारे पुरस्कारों की लंबी-लंबी कतारें
हर अगले को धक्का लगा-लगा कर गिनती है ....
ये हाल है कि छोटे-बड़े राजा-महाराजा मुझे
अपनी दरबार की सुन्दरतम शोभा बनाना चाहते हैं
मेरे छींकने से ही बिखरे हुए मोती जैसे ज्ञान को भी
अपने , उसके , सबके सिर-माथे पर सजाना चाहतें हैं .....
देख रही हूँ अभी से ही मेरे लिए जगह-जगह पर
किसिम-किसिम के अभिलेख , शिलालेख खुदवाये जा रहे हैं
और सब भयंकर ज्ञानियों को छोड़ कर ज्ञानी नम्बर एक पर
मेरे ही नाम , सर्वनाम , उपनाम गुदवाये जा रहे हैं ......
जब सबसे ज्यादा बिकाऊ उधारी ज्ञान का ये हाल है तो
सोचती हूँ अपना ज्ञान जो होता तो और क्या-क्या होता
अरे ! कोई तो मेरा अपना ज्ञान मुझे सूद समेत लौटा दो
ऐसा जबरदस्त घाटा लगाकर मेरा मन बहुत जोर-जोर से है रोता .