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Wednesday, September 23, 2015

क्षणिकाएँ .......

जिन सुन्दर भ्रमों को रात फैलाते हैं
उन्हीं से दिन भी दिग्ध होता है
और उन भ्रमों का टूटना भी
केवल भ्रम ही सिद्ध होता है

               ***

मिथ्या-मदक की चमक के आगे
सत्य-सुर तो केवल लुप्तप्राय होता है
और संतत सूर्य को खोज लेने का
एक किरण-मार्ग भी उपाय होता है

               ***

यथार्थ में सत्य के पीछे हम सभी
कभी भी खड़े होना नहीं चाहते
और ' मैं और तू ' के समस्त विवाद में
' मेरा सत्य ' से कभी बड़े होना नहीं चाहते

               ***

स्थापित ' मैं ' की परितृप्त परिभाषाएँ
केवल पन्नों पर ही गरजती रहती है
बाहर अति व्यक्तित्व खड़े हो जाते हैं
और भीतर चिता सजती रहती है

               ***

आलाप में अर्थ भरने की कोई क्रिया
सहज न होकर हठात होती है
और दो के बीच कोई अंतर न हो
तो ही अंतर की बात होती है
         

16 comments:

  1. तमाम सामाजिक और विशेषकर राजनीतिक हालातों, पात्रों व अभिनयों को अपनी वैचारिक अग्नि में जलाकर ही आपने ये क्षणिकाएं प्रस्‍तुत की हैं, जिनमें जीवन के हर क्षेत्र के प्रति गहन अंतदृष्टि समाहित है।

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  3. और दो के बीच कोई अंतर न हो
    तो ही अंतर की बात होती है.

    बहुत सुंदर.

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  4. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 25 सितम्बर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  5. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 24-09-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2108 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  6. और दो के बीच कोई अंतर न हो
    तो ही अंतर की बात होती है

    कम शब्दों में बहुत कुछ !! बहुत सुंदर भाव !!

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  7. सत्य , भ्रम , यथार्थ और परिकल्पनाओं को समेटते हुए बहुत हीं सूक्ष्म और गहन चिंतन अभिव्यक्त किया है आपने ।

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  8. बहुत गहरी नजर से देखे गये सत्य....

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  9. यथार्थ में सत्य के पीछे हम सभी
    कभी भी खड़े होना नहीं चाहते
    और ' मैं और तू ' के समस्त विवाद में
    ' मेरा सत्य ' से कभी बड़े होना नहीं चाहते

    ...बिलकुल सच कहा है...सभी क्षणिकाएं बहुत गहन और सटीक...

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  10. मुझे यह क्षणिका बहुत अच्छी लगी-
    यथार्थ में सत्य के पीछे हम सभी
    कभी भी खड़े होना नहीं चाहते
    और 'मैं और तू' के समस्त विवाद में
    'मेरा सत्य' से कभी बड़े होना नहीं चाहते-

    'मेरा सत्य' के दायरे से बाहर निकलना बहुत कठिन कवायद है.

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  11. …और भीतर से जब सत्य उमड़ता है तो कोई मिथ्या-भ्रम नहीं, कोई अन्धकार नहीं, बस यथार्थ की अमृता बहती है. यही सच है न ?

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  12. बहुत ही अच्छी सोच की अभिव्यक्ति। बधाई।

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  13. बहुत बढ़िया लेख हैं

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  14. सुन्दर शब्द रचना
    http://savanxxx.blogspot.in

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