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Saturday, August 3, 2013

हाय! हाय!



हाय! हाय!
सूरज की छाती पर
दिनदहाड़े ये कैसी फड़-फड़ ?

जो चमगादड़ों में मची है चूँ-चपड़
घुग्घूओ में भी हो रही धर-पकड़...
झींगुरों का मनमाना शोर
मेंढकों में भी मीठा रोर...
सियारों में गुप्त मुलाक़ात
श्वानों का घुन्ना उत्पात...
सांप-चील का षड्यंत्र
छुछुंदर-नेवला सा ये तंत्र...
गिरगिटों का घुमड़ी परेड
मकड़ियों पर पड़ता रेड...

मधुमक्खियों में जो पड़ी फूट
मक्खियों को मिल गयी बम्पर छूट...
खच्चर-टट्टूओं में खटास
बन्दर-रीछों का लुभावना नाच...
चींटियों की ताबड़तोड़ तालियाँ
मच्छरों से छुपती नहीं गालियाँ...
चूहों में प्लेग विलायती
बिल्लियाँ बनी फिरती हिमायती...

हाईब्रिड हाथियों का मेला
शेर के हिस्से में कच्चा केला...
मगरमच्छों का आँसू-दर्शन
गोरिल्लाओं का अंग-प्रदर्शन...
ऊँटों का अनुभव ज्ञान
घोड़ों का बिना रुके सलाम...
अन्धेरा से होती फरमाइश
काले झंडों की चलती रहे नुमाइश...

हाय! हाय!
सूरज की छाती पर ही लट्ठम-लट्ठ
गड़बड़झाला भी है गड्डम-मड्ड...
देखो! बेल्ट में फँसाकर अपना पतलून
कितना मज़े में है सब नियम-क़ानून .

Sunday, July 28, 2013

चुपचाप ही सही ....




आँधियाँ तो चल रही है
चुपचाप ही सही
बोझिल-सी , डगमगाती-सी
बिना सन सन सन के
तुम्हारे ही बंद दिशाओं में...

प्राणों में पुंजित पीर है
नयन में नेही नीर है
हिम-दंश सहता ये ह्रदय-हवि
अभी तक जमा नहीं है
साँसों का गीत भी थमा नहीं है...
जो तुम्हारे सागर पर
उत्पीड़ित धूप-सा जलता रहेगा
अपने काँधे पर तुम जाल फैलाए रहो
तो भी तुम्हारे सतह पर पिघलता रहेगा....

आँधियाँ कल जो इधर आ रही थी
अब भी उड़ती है , फड़फड़ाती है
तुम्हारे ही बंद आकाश में
कबतक रोके रहोगे उसे प्रस्तर-पाश में ?

चाहो तो मना कर दो
उन पत्तियों को कि चुटकियाँ न बजाये
उन डालियों को कि चुटकियाँ न ले
और उन तरु-वृंदों को कि चुटकियों में न उड़ाये
आँधियों के इंगित को
इंगित के उन अंत:स्वर को
जो मन्त्र-भेद करता है ...

आँधियाँ है बहती रहेंगी
चुपचाप ही सही
तुम्हारा दिया पीर भी सहती रहेंगी
चुपचाप ही सही
जिसकी पड़पड़ाहट सुन कर
चिड़ियों से चुक-चुक , चिक-चिक चहकेंगी ही
उन मुरझाई कलियों से
किलक कर कुसुमावलि फूटेंगी ही....

तुम लाख उन्हें रोकने की ठानो
या उनके इंगित को मानो न मानो
पर चुपचाप ही सही
आँधियों का धर्म ही है बहना
जो जानती नहीं है कभी थमना...

यदि थम गयी तो स्वयं ही हाँफने लगेंगी
और उस अंतगति की उपकल्पना मात्र से ही
ये पूरी सृष्टि कलप कर काँपने लगेगी .



Tuesday, July 23, 2013

सावन है आया अब चले आओ ....





                   आज कोई भी बहाना न बनाओ
                   पुकारा है तुम्हें, अब चले आओ

                     तप्त सूरज  सागर में समाये
                     गो-रज से गोधूलि डगमगाए
                     एक दूरी से विहग लौट आये
                    दीप भी देहरी पे निकल आये

                    जब विकल नेह है अनुराग है
                   क्यों शलभ से विमुख आग है ?

                   आज तारों में भी कुछ तनी है
                    चाँद की किस से यूँ ठनी है ?
                    न बादलों की बात ही बनी है
                   नदियाँ भी चलती अनमनी है

                    जब अपने राह चलती चाह है
                    क्यों भ्रम में भटकती आह है ?

                   बैरिन बिंदिया भी विरहन गाये
                    सुन , चूड़ियाँ भी चुप्पी लगाए
                    मेंहदी पर न  वह रंग ही आये
                    आंसू में ही  महावर धुल जाए

                  जब प्राण से प्राण मोल है लिया
                  क्यों यह व्यथा  अनमोल दिया ?

                   साँसें सिमटी जाती सुनसान में
                   धड़कन धूल-सी उड़ी वितान में
                   ह्रदय कुछ कहता है यूँ कान में
                   आँखें घूम जाती है अनजान में

                  जब आस पर ही तो विश्वास है
                  क्यों चातक से  चूकी प्यास है ?

                  अब मेघ घिर रहे हैं  चले आओ
                  फूल खिल भर रहे हैं चले आओ
                  सब झूले तन गये हैं चले आओ
                  देखो!सावन है आया चले आओ

                  जब विवश-सा नेह है अनुराग है
                   तो मिलन से ही बुझती आग है

                  पुकारा है तुम्हें, अब चले आओ
                  आज कोई भी बहाना न बनाओ .



Saturday, July 20, 2013

निद्रा है टूटेगी ....

                   

                    निद्रा है टूटेगी , तीव्र घात करो
                    कोमल अंगों पर वज्राघात करो

                    पर उससे पहले तुम तो जागो
                   ऐसे कंबल ओढ़ कर मत भागो

                     जब चारो ओर आग लगी है
                    आलोड़नों से हर प्राण ठगी है

                    झकोरों की चपेटें हैं घनघोर
                    खोजो! उसी में छिपा है भोर

                 उस भोर से चिनगियाँ छिटकाओ
                  हर बुझी मशाल को फिर जलाओ

                   जब बुझी मशाल पुन: जलती है
                  तब रुढियों की हड्डियां गलती है

                अंधविश्वास भस्मासुर बन जाता है
                 स्वयं अपनी आँच में जल जाता है

                किया जा सकता है तभी बहुत कुछ
                 यहीं तय करो तुम अभी सब कुछ

                आशा-ही-आशा में ओंठ न सुखाओ
               कमजोरी कुचल कर अलख जगाओ

                समय की शंकाओं पर विवाद करो
                 समाधान सोच कर नव नाद करो

                 स्व उत्थान से ही नवयुग आता है
                 औ' कल्पित स्वर्ग सच हो जाता है

                   निद्रा है टूटेगी , तीव्र घात करो
                   कोमल अंगों पर वज्राघात करो .

Wednesday, July 17, 2013

मिड डे मील से बच्चों की मौत पर ....

ओ ! आसमान के रखवाले
तुम्हारे मौसम तक
जमीन को किया है
तुम्हारे ईमान के हवाले...

चाहे तो तू
जमीन का खून पी ले
या उसे पूरा ही खा ले
पर उनकी बददुआ
तुम तक ही जायेगी
और तुम्हें जब
जख्म मिलेगा तो
कोई भी मरहम-पट्टी
तुम्हारे काम न आएगी....

थोड़ी शर्म कर !
अपनी जमीर की सुन !
इन्सानियत के नाते ही सही
तू उनकी बददुआ ना ले...

याद रख !
जमीन जब फटेगी तो
तुझे ही निगल जायेगी
तब उस खिचड़ी की याद
तुम्हें बहुत रूलायेगी
जिससे ललचाकर
तुम आसमान बन जाते हो
और भरे मौसम में भी
जमीन पर सिर्फ
सूखा ही उगाते हो....

ऐसी पढ़ाई से तो
वो अनपढ़ भला
जो खिचड़ी न खा कर
अपने घास-पात पर है पला...

अब जाओ !
उन सूनी गोद को
कुछ मुआवजा से भर दो
अगले मौसम की भी
तैयारी करनी है तो
हर लाश पर
एक झाड़ूमार नौकरी के साथ
खून टपकाता हुआ
एक घर दो .

Sunday, July 14, 2013

मैं भी........


तुम कुछ भी कहो या करो
मैंने अबतक बस इतना ही जाना है
कि अस्तित्व के दो छोर हैं हम
और तुम मुझे लुढ़का रहे हो
किसी ऐसे ढ़लान पर
जो कि अनजाना है....

हो न हो कहीं किसी घाटी तले
तुम्हारा ही कोई ठीकाना हो
जहाँ ले जाकर मुझे
मेरा ही शिखर दिखाना हो
ये मानकर मैं कितना भरूँ खुद को ?

मैं भी जानती हूँ कि
मेरा कितना ही खाली खाना है
हो सकता है कि
ये लालायित लालित्य का
कोई लोकातीत ताना-बना हो
पर ऐसे अतृप्त अदेखा सच को
मैंने अबतक नहीं माना है...

इसलिए रहने दो
अपने स्वर्गीय स्नेहित स्पर्शन को
रहने दो सारी दिव्य दृप्त दर्शन को
जो मेरी इस छोटी सी समझ से बाहर है..

मैं भी बस अपनी कहना चाहती हूँ
कि मेरे लिए तो प्रिय है
चौंधियाया हुआ सुखों का आकर्षण
मर्त्य इच्छाओं का घनिष्ठ घर्षण
और उससे उत्पन्न दुःख-ताल के
उन्माद की गतियों के बीच
मैं भी झूमकर नाचना चाहती हूँ...

ह्रदय पर हथौड़े सी पड़ती
हर चोटों पर मुस्कुराना चाहती हूँ...
हर छलनामय क्षितिज के छंदों पर
छुनन-मुनन कर गुनगुनाना चाहती हूँ
और आखिरी साँस तक
बिना रुके पन्ने-पन्ने पर खुद को
लिख जाना चाहती हूँ ....

और तुम !
तुम्हें तो अविचिलित रहना है - रहो
मेरे आवेग और आक्रोश को
निरावृत निर्वात में
निखारते रहना है - निखारो
पर मैं भी
नश्वरता और संघर्ष के क्लेशों के बीच
तुम्हारी तरह ही अविचिलित रहूँगी .


Tuesday, July 9, 2013

सुमन-शय्या और मालपुआ...

'' सुमन-शय्या पर लेटे-लेटे
मालपुआ चाभने वालों के
श्री मुख से केवल
मेवा-मिष्ठान ही झड़ता है ''
भला बताइए तो
इसकी व्याख्या का प्रसंग निर्देश
अनिवार्य अंग है या नहीं ?
साथ ही इसके कार्य-कारण का
पुर्न-पुर्न व्याख्या करने हेतु
हममें-आपमें अब भी वो उमंग है या नहीं?

ये प्रश्न हमें हर प्रसंग में
स्वयं से करते रहना चाहिए
व सत्य से विमुख हुए बिना
स्वीकार भी करते रहना चाहिए कि
हमसे-आपसे समीक्षित
संदर्भगत संक्षिप्त भूमिका भी
उसके मूलभाव से कोसों दूर रहती है
और हम देखते रहते हैं कि
हमारी बेबस व्याख्या
सुमन-शय्या और मालपुए के
व्यूह में ही कैसे उलझती है ....

तब तो बस यही कहा जा सकता है कि
अपने कर्मक्षेत्र में बिन वंशी के हम
ता-ता थय्या करने वाले क्या जाने
वो सुमन-शय्या कैसे सजता है ?
और सिर के ऊपर बहते अभाव में
बस कलम चला-चला कर क्या माने
कि वो मालपुआ कैसा दिखता है ?

आइये ! हम इन बड़ी-बड़ी बातों में
अपने लिए छोटी बात छाँट लेते हैं
मज़बूरी का नाम कहीं शब्द न हो जाए
इसलिए ये छोटी बात यूँ ही बाँट लेते हैं-
कि हम अपना पसीना भी उनपर बहाए
और शब्दों को भी उनके लिए बरगलाये
पर वे खूब फले-फूले
व अपने आस-पास को भी फुलाए ...
अब तो हमें भी कुछ तय करना चाहिए
कि अपना शब्द किसपर खर्चना चाहिए ?

वैसे भी इस खण्डन-मण्डन से
उनका तो कुछ बिगड़ता नहीं है
और हमपर भी छप्पड़ फाड़ कर
सुमन-शय्या और मालपुआ बरसता नहीं है...
हाँ! आप अपनी जाने
कि आपके अन्दर क्या-क्या चलता है
पर उन सुमन-शय्या और मालपुए को
सोच-सोच कर मेरे मुँह में तो
इस किल्लती-युग में भी
दस-बीस गैलन पानी आ भरता है .

 
 

Sunday, June 30, 2013

आने वाला युग पढेगा हमें...

आने वाला युग भी पढ़ता रहेगा हमें
जैसा कि अबतक पढ़ते आ रहे हैं हम
प्रकारान्तर में हर पिछले युग को
या तो विरोधों पर आपत्तिजनक विरोध दर्ज करके
या फिर एक जटिल साम्य की खोज करके

उन अनपढ़ी लिपियों पर चिपके हुए
भुरभुरे भावाश्मों को खुरच-खुरच कर
एक संकीर्ण शोध की सतत प्रक्रिया से
अपने व्याख्यायों के परिणाम को
अपने ही तर्कों से प्रमाणित करते हुए
या फिर वतानुकूलीय विभिन्नताओं में पैदा होते
अनचीन्हे जीवाणुओं-विषाणुओं से उत्पन्न
प्रतिलिपियों के सूक्ष्म संक्रमण के
वस्तुनिष्ठ तथ्यों को यथासंभव प्रस्तुत करके
या फिर सांस्कृतिक गरिमा के प्रति
बहुआयामी भावनाओं को स्फुरित करने वाले
नई लिपियों के प्रतिरोधक तंत्रों को
अपनी गली उँगलियों पर ही सही
समय की स्याही से ठप्पा लगाते हुए

आने वाला युग भी पढ़ता रहेगा हमें
जैसा कि अबतक पढ़ते आ रहे हैं हम
एक विश्लेष्णात्मक औपचारिकता का निर्वाह करके
अनुकरण-पुनरावृत्तियों में घुले लवणों को
अपने बौद्धिकीय चुम्बक से सटाते हुए
संभवत: कुछ दूर तक ही सही
समकालीन नैतिकता को नई परिभाषा मिले
या फिर नियति के त्रासदी को कोई
प्रमाणिक हस्ताक्षर ही मिल जाए
और बुढ़ाई खांसियों का इतिहास
अपने गले के खरास से निजात पाए
व यहाँ-वहाँ फेंके अपने बलगम पर
सूखे हुए खून के धब्बों की गवाही में
हर अगला युग को वैसे ही खड़ा पाए
जैसे कि आज हम खड़े हैं .



Saturday, June 22, 2013

हे महाकाल !

ताण्डवमत्त हे महाकाल !
प्रत्येक शिरा को
चकित-कम्पित करता हुआ
तेरा ये कैसा अट्टहास है?
कि शत-शत योजनों तक
हिम पिघल कर तेरे चरणों पर ही
ऐसे लोट रहा है
देखो तो ! विध्वंस का उद्दाम लीला
हर व्याकुल-व्यथित ह्रदय को
स्मरण मात्र से ही कैसे कचोट रहा है....
तुम्हारा दिया ये घोर दु:ख
तुम्हारे ही प्रसन्न मुख को
इसतरह से क्लांत कर रहा है
कि प्रत्यक्ष महाविनाश
तेरे अप्रत्यक्ष महासृजन को ही
रौंदता- सा दिख रहा है
और समस्त अग-जग को
बड़ी वेदना में भरकर
तुमसे ही पूछने के लिए
विवश भी कर रहा है कि
तेरा ये कैसा उद्दत पौरुषबल है ?
जो अपने ही आश्रितों से ऐसा
अवांछनीय व्यवहार करता है....
क्यों निर्मम , निर्मोही-सा
क्षण भर में ही सबको
जिसतरह से नष्ट कर देता है कि
ठठरी कांपती रह जाती है
त्राहि-त्राहि करती रह जाती है....
एक तरफ तुम्हार कठोर चित्त
दूसरी तरफ सम्पूर्ण चराचर सृष्टि का
केवल उद्भव और विनाश के लिए ही
विवशता और बाध्यता....
ओ!अँधेरी गुफा में भी पथ दिखाने वाले
फिर तू ही ऐसा अन्धेरा क्यों करता है ?
रुको महाकाल !
क्षण भर के लिए ही रुको!
कातर भाव की पुकार सुनो!
अपने उन्मत्त शक्ति को सहज गति दो!
उस गति के अनुरूप ही सबको मति दो!
रक्षा करो! रक्षा करो!
हे महाकाल !
तुम्हारा जो प्रसन्न मुख है
उसी के अनुग्रह द्वारा
सबकी रक्षा करो !


  

Saturday, June 15, 2013

इसलिए मैं रुकी हूँ ...

इसलिए मैं रुकी हूँ
कि मुझे तेल से पोसा हुआ
एक मजबूत डंडा चाहिए
और शोर-विहीन
बड़ा सा डंका चाहिए...
अपना हुनर तो दिखा ही दूंगी
व बड़े-बड़े महारथियों को
धकिया कर धूल चटा ही दूंगी..
हाँ! अपनी हिम्मत को बटोरने में
बस थोड़ी हिम्मत ही जुटानी है
फिर तो
अपना और अपने बाप का
टैक्स चोरी करने के लिए
किसी से कुछ पूछना थोड़े ही है
इसके लिए अपने को
कोई कच्चा-पक्का सा
आश्वासन ही तो देना है
और दुनिया को दिखाने के लिए
किसी भी नकली कार्ड पर
लम्बी लाईन में लगकर
सड़ा हुआ राशन ही तो लेना है.....
साथ ही उन आयकर वालों को
भुना हुआ चना बनाकर चबाना है
और किसी विशेष श्रेणी की
सारी सुविधाओं को कैसे भी जुटा कर
अपना एक सुरक्षा घेरा बनाना है
ताकि मैं दम भर चोरी कर सकूँ
सबके हिस्से का भी मजा लूट सकूँ....
दिल की कहूँ तो
विशुद्ध ईमानदारी भी तो कोई चीज़ है
इसलिए एक-दूसरे को
उस कटघरे से भी बचाना है
फिर तो हमारी तिजोरी देखकर
सब ज्यादा से ज्यादा यही कहेंगे कि
अपने सीधे किये आँगन में
हम खूबसूरत पैर वाले
ठुमकते-मटकते मोर हैं
और हमें भी अपना सच कहने में
कोई शर्म नहीं है कि
अब अपने हयादार हमाम में
हम सब वैसे नंगे तो नहीं हैं
पर चिलमन पर चिलमन चढ़ाकर
खुले चरागार में चरते हुए
बड़े ही चालाक चोर हैं .


Monday, June 10, 2013

ऐसी की तैसी ....




उनकी प्रवीणता ही ऐसी है कि
जहाँ काँटा न भी हो
वहाँ भी तकनीक को घुसाकर
ऐसे गड़ा देते हैं कि
पैर तो आपस में उलझते ही हैं
साथ में अंग-प्रत्यंग भी
बहिष्कार का कोमल हथियार
हवा में यूँ ही लहरा लेते हैं

मुद्दे की तो ऐसी की तैसी
ये बहस ही है तो फिर सार्थक कैसी ?

उनकी कुशलता ही ऐसी है कि
मेजों-कुर्सियों को ऐसे सरका देते हैं
कि भारी बहुमत देखकर ही
कथ्य-प्रयोजन भी चुप्पी लगा जाते हैं
फिर तो अगल-बगल के सब
आत्मबलिदानी-सा आगे बढ़कर
अपने माथे पर कलंक-टीका
बड़े गर्व से सजा लेते हैं

विरोधों के नक्कारखाने की ऐसी की तैसी
जहाँ जूता-जूती हो वहाँ तूती कैसी ?

उनकी सफलता ही ऐसी है कि
मजाक में भी बेमेल तालमेल
मिल-बैठकर बिठा लेते हैं
और मजबूती से खड़े ढाँचे से
अपने हिसाब से ईंटों को खिसका देते हैं
जब बेचारी बेबस बुनियाद
बुबकार मारती है तो
नकली चाँद से भी बहला लेते हैं

बन्दरबाँट नियत की ऐसी की तैसी
फिर तो नक्कालों से उम्मीद ही कैसी ?

उनकी सरलता ही ऐसी है कि
संतगिरी के जूसी जुमले से भी
जेबकतरों को सहला देते हैं
जब गिट-पिट हद तोड़ने लगती है तो
जुलाब की गोलियाँ भी खुद ही
चुपके से चबा ऐसे लेते हैं
फिर तो गाली-गुफ़्ता थोक में मिले
या कि मिलती रहे तालियाँ
सबको ही ठिकाने लगा आते हैं

उन जीती मक्खी खाने वालों की ऐसी की तैसी
और उनके लिए तो ये है बस चंडूखाने की गप जैसी .



Wednesday, June 5, 2013

वह प्रसून-प्रसूता है ...




वह अकेली है
छबीली है
निगरी है
निबौरी है
जितनी कोमल
उतनी जटिल
जितनी सहज
उतनी कुटिल
तरल-सी है
पर जमी हुई
पिघला कर
बहा देती है
अपने किनारे
लगा लेती है
निचुड़ कर
निचोड़ लेती है
शब्द-सिन्धु में
अक्षर-हंस सा
छोड़ देती है...

वह अकेली है
हठीली है
निहत्थी है
निरंकुश है
विरोधी यथार्थ का
प्रतिरोध करती है
जोखिम उठाकर
शिकार बनाती है
मुटभेड़ से
कोहराम मचाती है
घमासान का
घाव सहलाती है
विवशताओं के बीच
जगह बनाती है
असहमत होकर
उम्मीद जगाती है
व्यवहार-आग्रह से
नया छंद खोजती है
घोर असंतोष में
संतोष-गीत गाती है
नितांत बंजर पर
अमरबेल उगाती है...

वह अकेली है
उर्वीली है
नियोगी है
निरति है
हर चिंता की
वह चुनौती है
हारे मन की
वह मनौती है
पर काँटों के लिए
वह करौती है
वह प्रसून-प्रसूता है
हाँ! वह कविता है .

Saturday, June 1, 2013

अँगारा को जगाना है ...




निरे पत्थर नहीं हो तुम
अतगत अचल , निष्ठुर , कठोर
आँखें मूंदे रहो , युग बीतता रहे
किसी सिद्धि की प्रतीक्षा में
या किसी पुक्कस पुजारी की दया-दृष्टि
तुम पर ऐसे पड़े कि तुम सहज ही
अवगति को उपलब्ध हो जाओ
और उसके ओट में अपने खोट का
खुलेआम बोली लगाओ
फिर उसके बाजारू वरदान से
उसके मंदिरों की शोभा बढ़ाओ
ताकि पत्थर ह्रदय जरूर खींचे आयें
फूलों से तुम्हें ही चोट दे जाए

या तुम वो पत्थर भी नहीं हो
जो अपना भविष्य , प्रतिभा और शक्ति लिए
किसी के चरण पर लोट जाए
उसकी अवांछित ठोकर से बस चोट खाए
वह तुम्हारा उपयोग करते हुए
अपने रास्ते पर सजा ले
व तुमपर मुधा मुक्ति का
चीवर चढ़ा कर खुद भोग का मजा ले
तुम उसकी भक्ति में सब भूलकर
उसकी मदारीगिरी की महिमा का गान करो
उसके बजाये डमरू पर खूब नाचो
और उसके फूंके मंत्र से राख समेटो

यदि सभ्यता और संस्कृति का पूर्ण अभ्यास करके
आत्मपीड़न हेतु पत्थर ही होना चाहते हो तो
वो पारस पत्थर नहीं हो पाओ
तो कोई बात नहीं
खुद को परख लो तो हीरा हो जाओ
यदि नहीं तो अपने कोने-कातर में दबी
चिंगारियों को रगड़ तो सकते हो
एक आग तो पैदा कर सकते हो
और जड़ पत्थर के छाती को कुरेद कर
अपने धुंधकारी आँच से धधका तो सकते हो
या तो वह अपनी कुरूपताओं की अंगीठी में
अँधेरा समेत पूरी तरह से जल जाए
या फिर उल्कापाती अँगारा हो जाए

आज ही इस महाप्रलयी अँधेरा को हराना है
हाँ ! अँगारा होकर अँगारा को जगाना है .



Wednesday, May 29, 2013

अनसुनी है नहीं ...



अहर्निश आतुरता
कहती है तुमसे आज ये
अनसुनी है नहीं
मेरी अनसुनी आवाज ये

पृक्ति से उठती प्रतिध्वनि में
तुम अपनी गहनता दे दो
पूर्व पगी प्रतीति की
साध्यंत सघनता दे दो

चाहो तो आन फेरकर
मेरी आधारशिला खींच लो
और जो निसर्ग शेष है
उसे भी तुम भींच लो

इस विसर्जन से नहीं माँगती मैं
तुमसे सर्जन का कोई वरदान
जो मेरा मूल्य खंडित कर
मुझे ही बना दिया मूल्यवान

बस मेरे मूल में
मौलिक गंध बन मिले रहो
और कल्पना के कल्पतरु पर
कामित कमल बन खिले रहो

प्रस्फुटन की पीर प्रिय है मुझे
तेरी कान्तिमयी कमलिनी बनने के लिए
मेरे रचयिता! जानती हूँ कि रचना
रची ही जाती है रक्त से सनने के लिए .


Saturday, May 25, 2013

भ्रूणमेध यज्ञ करते हुए ...


जननी जो जानती कि
वह किसी
मलेच्छ की माँ बनने जा रही है
जो जनि (स्त्री) पर ही
अत्याचार की सीमाओं का
भयानक अतिक्रमण करेगा
और अपने ऐसे घोरतम अपराध से
उसे मुँह दिखाने के लायक नहीं छोड़ेगा
तो वह स्वयं ही
अपना नाक-कान काटकर
शूर्पनखा बनना स्वीकार कर लेती .....
यदि वह जानती कि
जिसे गोद में रख
अपने आँचल का ओट देकर
अमृत-जीवन दे रही है
वही आँचल तार-तार करके
जहाँ- तहाँ विष-वमन करेगा
और जघन्यता-से कई गोद उजारेगा
तो वह स्वेच्छा से
पूतना ही बनना स्वीकार कर लेती ....
यदि वह जानती कि
थोड़े-से कागज़ के टुकड़ों के लिए
उसके मातृत्व का टुकड़ा-टुकड़ा कर
उसी के माथे पर
वह कुकृत्यों का इतिहास लिखेगा
तो वह स्वयं ही
अपने गर्भ में
वेदों-उपनिषदों का वेदी बनाती
और भ्रूणमेध यज्ञ करते हुए
एक नया वेद का सृजन कर देती
पर किसी मलेच्छ की माँ बनना
किसी कीमत पर स्वीकार नहीं करती .

Tuesday, May 21, 2013

ये ब्लॉगिंग है जनाब !


ये ब्लॉगिंग है जनाब !
जैसे हड्डी-शोरबा मिला शोख़ क़बाब
या गज़क लाजवाब
पर यहाँ नहीं है कोई नवाब
एक-दूजे का जोरदार हुकुम बजाइये
और नजराना में वही आह-वाह पाइये
नहीं तो चोर-रास्ते भी हैं , उसी से आइये
पृष्ठ-दर्शकों की संख्या इजाफा करके
उनके अंकों में ग़ुम हो जाइये
मज़ाल है कि कोई आपको टोक दे
या कहीं भी आने-जाने से रोक दे

ये ब्लॉगिंग है जनाब !
जैसे पर लगा हुआ कोई सुरखाब
या मुश्कबू बेहिसाब
यहाँ पर उठा हुआ हरएक हिजाब है
आप भी तूफानी रफ़्तार से
किसी भी विधा में खूब गर्दा उड़ाइए
गर नजरें भींचे तो नाक-कान में घुसाइये
खुद भी अपने साफ़ी से मनमुताबिक़ छानिये
दिल जितना कहे उतना भर ही मानिए
व मिजराब से छेड़कर एक-दूजे का गुण गाइये
और संगी-साथी को भी कोरस में बिठाइये

ये ब्लॉगिंग है जनाब !
जैसे उँगलियों पर नाचता हुआ सैलाब
या करामाती ख़्वाब
यहाँ पर बस चलता है तो वह है आदाब
ख़ामख़ा अपना रौब-दाब न दिखाइये
व खुद को दूज का माहताब भी न बनाइये
नज़ाकत से नाजुकख्याली में घूमिये
नफ़ासत से नाजुककलामी कीजिये
गर मीठे बोल हो तो ही मुँह खोलिए
व तखालुक को भी शालीन लफ़्जों में बोलिए
और जितना हो सके ज़ज्ब-ए-इश्क ही घोलिये

ये ब्लॉगिंग है जनाब !
जैसे न डूबने वाला आफ़ताब
या न मुरझाने वाला गुलाब
या तोहफ़ा नायाब
पर यहाँ नहीं है कोई नबाब
ये ब्लॉगिंग है जनाब !

Friday, May 17, 2013

रिश्वत न धराओ ...


मुझे किसी ऊँचे मंच पर
यूँ ही खड़ा न कराओ
खड़ा कराओ भी तो चुप रहने के लिए
राजस्व से ही रिश्वत न धराओ ....
बड़ी मुश्किल में हूँ मैं
जबसे चींटियाँ लगातार
मेरी साँसों की सच्चाई पर संदेह कर रही है
मच्छड़ खून में ही विद्रोह ढूंढ़ रहे हैं
व मक्खियाँ मेरी आत्मा का पुचारा कर रही है
और कीड़े मेरी कट्टरता से पिल रहे हैं
तो भला चुप कैसे रहूँ ?
कैसे काले चश्मे की आड़ में
अपने अंधेपन को सार्वजनिक करूँ ?
या अपने होंठों को खींचकर
उस अहिंसक मुद्रा के नीचे
कैसे युद्धखोर भाषा को छिपा लूँ ?
अब मुझे किसी भी मंच से
कूटनीति के आदर्शों का
सुन्दर शब्दों में बचाव या समर्थन नहीं चाहिए
या हर मूढ़ता के मौके पर
बेवकूफी भरी हँसी नहीं चाहिए
बल्कि तंत्र-परम्परा के प्रभाव का
विश्लेष्ण करने की पूरी स्वतंत्रता चाहिए
केवल विश्लेष्ण ही नहीं
बल्कि परिवर्तन की पुकार चाहिए
और गुप्त-पेटियों से पुच्छल सरकार नहीं
बल्कि भीषण ललकार चाहिए ....
हाँ ! मुझे तो
दहाड़ता-चीग्घारता हुआ हरएक वोट चाहिए
या कहूँ तो केवल वोट ही नहीं
बल्कि हर मंच पर बदलाव का विस्फोट चाहिए
इसलिए मुझे तमाशा बनाकर
किसी मंच पर खड़ा न कराओ
यदि खड़ा कराओ भी तो
मूर्ति बने रहने के लिए रिश्वत न धराओ .



Friday, May 10, 2013

कौन ले जाता है ?


कोई तो बता दे मुझे
कौन ले जाता है ?
मेरी नींद
सेंध कुछ ऐसी लगती है
मानो कोई
अशर्फियों से भरी संदूकड़ी को
मेरे सिरहाने ही लगा जाता है
और समुचित संरक्षण के लिए
मुझे जोगिन-सा जगा जाता है

कोई तो बता दे मुझे
कौन ले जाता है ?
मेरा चेत
चिन्हार-सा चारु हास कर
मानो कोई
एक चितवन चमक नयन में भर
मुझे मुझसे ही चुराता है या
उस सेंधिया की सिधाई कहूँ तो
मुझे मुझको ही चुकाता है

कोई तो बता दे मुझे
कौन ले जाता है ?
मेरा काँटों का सेज
रग-रोयें में एक गंध घोलकर
मनो कोई
बिखरा कर क्वांरी कलियों को
मुझे भी बहुरिया बना जाता है
और एक धुकधुकी धधकाकर
स्पर्शइन्द्रियों को उकसा जाता है

कोई तो बता दे मुझे
कौन ले जाता है ?
मेरा अंगदान
अनंग- क्रीड़ा को क्रियमाण कर
मानो कोई
लोकोपवाद को लज्जित करके
अंगलेप-सा मुझे लेस जाता है
और मेरे अंगविन्यास को उलझाकर
मुझे भी लोकातीत बना जाता है

कोई तो बता दे मुझे
कौन ले जाता है ?
मेरा............


Monday, May 6, 2013

क्षणिकाएँ ...


जैसे सूक्ष्म की शल्य-चिकित्सा का
कोई विलिखित , विख्यायित प्रमाण नहीं है
वैसे ही श्वास-सेतु से जुड़ा हरेक कण है
कोई भी अज्ञात आयाम नहीं है


          ***


जैसे सतत प्रवाह में
कोई भी अंतराल संभव नहीं है
वैसे ही इस काल में गति के लिए
कोई भी स्थान अथवा प्रतिकाल संभव नहीं है


          ***


जैसे मन के क्रकच आयत पर
जो विभाजित , विस्थापित हो सत्य नहीं होता
वैसे ही सोये अक्षरों से निस्कृत अर्थ
कभी भी नित्य नहीं होता


          ***


जैसे शीर्ण शब्दों के मध्य में
मनवांछित मौन महिमावान नहीं होता
वैसे ही आरोपित आधान में अवधान से
कोई जागतिक विराम नहीं होता


          ***


जैसे पार की अभिव्यक्ति
पार हुए बिना नहीं होती
वैसे ही भावक भावों की आप्त अनुभूति
निराकार हुए बिना नहीं होती .



क्रकच आयत ---- प्रिज्म
आधान --- प्रयत्न
अवधान --- ध्यान

Thursday, May 2, 2013

मैराथन करते हुए ...


शुक्र है कि
अनगिनत आँखों वाली जिन्दगी की
अनगिनत दिशाओं की दौड़ में
कोई डोपिंग टेस्ट-वेस्ट नहीं है
और कोई मानक मापदंड भी नहीं है...
जो जैसा चाहे , दौड़ लगा सकता है
पर जिन्दगी की इस बेमेल दौड़ में
अपने अनुकूल दौड़ का चुनाव
न कर पाने की गहरी टीस
मुझे घुन की तरह खा रही है ...
उसपर जो चाहे उस दौड़ में भी
धकिया कर दर्द ही दे जाता है
तिसपर सबसे पीछे रहकर
अपना मैराथन करने का
गम बहुत सालता है ...
काश! कोई रेफरी ही बना देता
या फिर दर्शक-दीर्घा में ही
एक सीट आरक्षित करवा देता
नहीं तो मेरे हाथों जीत का
पुरस्कार ही बंटवाता तो
अपने मैराथन से राहत मिलती....
मैं अपने प्रदर्शन में सुधार के लिए
कोशिश पर कोशिश किये जा रही हूँ
रामबाण-सीताबाण नुस्खा के साथ में
कई टोना-टोटका भी आजमा रही हूँ...
शक्तिवर्धक गोली-चूरण का
डेली हाई डोज ले रही हूँ
यदि इसी का बही-खाता बनाती तो
मेरे नाम एक रिकार्ड भी बन जाता
साथ ही उस दो बूंद को पी-पीकर
सारी बीमारियाँ उड़न-छू हो गयी
पर ये मुआ पैर है कि सीधे पड़ते ही नहीं...
कई बार तो लबालब आस्था लिए
सट्टेबाजों के चरण पर साष्टांग समर्पित कर आई
और उन मादक-द्रव्यों का भी
भरपूर सेवन कर देख लिया
पर मेरा मैराथन अपनी ही चाल में
ठुमक-ठुमक कर चल रहा है....
वैसे मैं भी पूरी तरह से
मैदान छोड़ने वालों में से नहीं हूँ
मन में विश्वास लिए
मतलब पूरा का पूरा विश्वास लिए
मैराथन किये जा रही हूँ,  किये जा रही हूँ..
वैसे.... कहने में तो अभी के अभी
अपना झंडा लहराकर
अपनी जीत की दुंदभी बजा दूँ
और आप सबको बरगला कर हरा दूँ
पर सच में मैराथन करते हुए
सबसे पीछे और सबके पीछे रहने का
गम बहुत सालता है .



Sunday, April 28, 2013

सो जाओ चुपचाप ...


कुछ नहीं
हवा का झोंका है
सो जाओ चुपचाप !
भारी मन है तो
बत्तियां बुझाकर
कर लो
जी भर विलाप !
नींद नहीं आ रही ?
तो करते रहो अपने
शपित शब्दों से संलाप...
जाने भी दो
हाँ! जिसके पंजे में
जो पड़ आता है  
उसी का गला घोंटने में
वह अड़ जाता है
व दर्द का दौरा
ये हमारा हिमवत ह्रदय
पिघल कर भी
सह जाता है..
कोई हर्जा नहीं
कि रक्तचाप
थोड़ा बढ़ा जाता है
और खून को
खौला-खौला कर
लज्जा - घृणा में
उड़ा जाता है...
कोई फिक्र नहीं
सब ठीक हो जाएगा
कल नहीं तो अगले महीने
नहीं तो अगले साल..
हाँ ! कभी न कभी
सब ठीक हो जाएगा
देर है पर अंधेर नहीं..
कुछ नहीं है ये
बस हवा का झोंका है
जो कहीं न कहीं
हर मिनट बहता रहता है
और पतित पंजों से
पंखनुचा कर
संतप्त संघात को
सहता रहता है ...
अब तो
हर अगले मिनट की
आँखों पर
काली पट्टी चढ़ाकर
लड़खड़ाती जीभ को
समझा - बुझाकर
कहना पड़ता है कि -
इसपर इतना
मत करो
प्रमथ प्रलाप
कुछ नहीं
बस हवा का झोंका है
सो जाओ चुपचाप !


Thursday, April 18, 2013

सब कुछ हाय! बहा जा रहा है ...


               उसके उन्मद में ऊभ-चूभ हूँ या कि
               सचमुच ये तन-मन दहा जा रहा है
              देखो न ! इस लघुपात्र के ऊपर से ही
               कैसे सब कुछ हाय! बहा जा रहा है

               उखड़ी-पुखड़ी साँसों से लगता है कि
                मेरा कोई संयोगी सजन आ रहा है
                पर कौन है वो जो इसतरह से मुझे
               किसलिए और कहाँ लिए जा रहा है

               मैं भरी हूँ या यूँ ही उलट दी गयी हूँ
               मुझसे कुछ भी , न कहा जा रहा है
              उपहास-उपराग रोक , टोके तब भी
              अपने उपसरण में न सुना जा रहा है

               हाय! कितना अंगड़-खंगड़ था बांधा
              एक- एक करके सब छूटा जा रहा है
              और हीरा जान जिसे जतन से गांठा
              वह भी तो अब देखो! लुटा जा रहा है

               ऐसे लुट- पीट कर ही तो , मैंने जाना
               वो लूटेरा ,  मुझमें ही भरा जा रहा है
              इस भराव से इतनी हलकी हो गयी कि
               ये उपल- सा हिया उड़ा ही जा रहा है

                मैं सिक्ता....उसको संचय करूँ कैसे ?
               यूँ बरस कर जो भिगाए जा रहा है या
               कितना उलाहना दूँ अपने पात्र को ही
               जो मुझे लघुताबोध कराये जा रहा है

               देखो न ! इस लघुपात्र के ऊपर से ही
                कैसे सब कुछ हाय! बहा जा रहा है
                मैं भरी हूँ या यूँ ही उलट दी गयी हूँ
                मुझसे कुछ भी , न कहा जा रहा है .



Saturday, April 13, 2013

दीवारों की भाषा ...


न उसने मुझे
कभी पढ़ना चाहा
न ही उसे पढने की
मैंने कोशिश की...
इस फ़रक के दरम्यान
पनपती रही
हमारी ही
दीवारों की भाषा
जो देती रही
हमारे शहतीरों को
कुछ अलग-सा अर्थ
व चौखटों-दरवाजों को
मढ़ी हुई मजबूती...
बनाती रही
हमारे अहाते में
थोड़ी-सी जगह
धूप के लिए
और बिखेरती रही
अँधेरी गुफाओं से चुने
कुछ दाने
चिड़ियों के लिए...
दीवारों की भाषा
उपेक्षित कोनों में
बनते-बिगड़ते
अनपेक्षित दरारों में
उग आये
तिनका-पातों को
खुरच-खुरच कर देती रही
हद से ज्यादा हरापन
और फूंक-फूंककर
भरती रही अपनी ही
सिहरती साँसें
हमारे चुम्बकीय घेरे में
घुमती हवा के फेफड़ों में...
साथ ही आराम से
आदिम अगियारी को
घेरकर बैठी रात को
बताती रही
अपनी ही उत्पत्ति
फिर उधेड़े लिपियों के
उधेड़-बुन से रेशों से
खींचती रही रेखाचित्र....
दीवारों की भाषा
अब झूलते चित्रों को
नीचे की खाई में
झाँकने नहीं देती है
बस कुछ
उलझे समीकरणों के बीच
बराबर का लम्बा-सा
चिह्न देकर
खींचती जा रही है
अपने अनंत तक
ताकि
अब कोई भाषांतर न हो .



Tuesday, April 9, 2013

आक्रांत हूँ ...


विभिन्न विधियों से
चलती रहती है
मेरी चरित्र-योजना ...
मैं अपनी अस्मिता को
निजता तथा विशिष्टा के
लचीले अनुपातों को
घटा-बढ़ा कर
समायोजित करती रहती हूँ
जिसके प्रभावगत प्रस्तुति से
निर्धारित भी करती हूँ कि
किस स्तर पर
अथवा किस सीमा तक
तादात्म्य स्थापित करना है ....
अनेक शैलियों में
ये चरित्र रचना-विधान
ढूंढ़ती रहती है
अपनी अभिव्यक्ति
जैसे कि -
विशेषताओं के लिए
वर्णात्मक शैली
चित्त-वृतियों के लिए
आत्मकथनात्मक शैली
आपको आकृष्ट करने के लिए
संवादात्मक शैली
वाग्जाल में क्रीड़ा हेतु
प्रसाद अथवा समास शैली
आदि-आदि
पर सच कहूँ तो
मुझे तो यही लगता है कि
मेरे अति विशिष्ट यथार्थ के
प्रभावी प्रक्षेपण के लिए
अथवा आचरण-व्यवहार के
विश्वसनीय संयोजन के लिए
केवल और केवल
अति नाटकीय शैली ही
जीवंत सम्प्रेषण का
माध्यम रह जता है
और मैं
अपनी नाटकीय मुस्कराहट की
जटिलता से आक्रांत हूँ .
 

Saturday, April 6, 2013

किसकी और कितनी बात करूँ ?





बेजुबान लुटने वालों की
कुछ बात करूँ या कि
बेख़ौफ़ लूटने वालों की...
बेकुसूर नुचे खालों की या
बेरहमी से खाल नोचने वालों की...

बेदाम पर बिकने वालों की या
बेहुरमती बेचने वालों की...
लश्करे-जुल्म सहने वालों की या कि
जुल्म-दर-जुल्म बाँटने वालों की...
शीशों के दरकते कतारों की या फिर
उन पत्थर के दिलदारों की...

किसकी और कितनी बात करूँ ?

तबक-दर-तबक बात कर लेने से
ये सिलसिला जो थम जाता तो
बेहयाई से गम खिलाने वाले
ख़ामोशी से खुद ही गम खाते...
अपने खाल के दर्द को
जिस शिद्धत से वे पहचानते
हर खाल के दर्द को भी
उसी शिद्धत से मुजर्र्ब दर्द मानते...

पर इक साँस भी चलती है तो
तेज़ , तड़पती तलवार की तरह...
काफिर बलाएँ यहाँ बढ़ती हैं
खौफ़नाक आजार की तरह...
हवा में हरवक्त मौत है मंडराती
बेदर्दी से बेदाम खालों पर ही
पुरजोर आँधियाँ है बरसाती...

कौन किससे पूछे कि
हाय! ये क्या हो रहा है ?
कहकहा लगा कहर खुद बता रहा है...

अब तो हमारे हिस्से बस यही है
कि पीटे छाती , फाड़े गला
बस बचाते हुए अपना खाल
और निकालते रहें बातों से माल...
उसे खींच कर दूर तक ले जाएँ
मजमा लगाएँ , महफ़िल सजाएँ
कफ़न फाड़कर क़यामत को बुलाएँ...

खुद को ज़िंदा रखते हुए
या तो लुटने वालों में या फिर
लूटने वालों में शामिल हो जाएँ .



Sunday, March 31, 2013

कौन यहाँ मिलनातुर नहीं है ?


                   सब ऋतुओं से गुजर कर
                  तुम ऐसे मेरे करीब आना
                  कि अपने मन के पके सारे
                  धूप-छाँव को मुझे दे जाना

                 कुछ भार तुम्हारा जाए उतर
                 कुछ तो हलका तुम हो जाओ
                  और मेरे उर के मधुबन में
                 अमृत घन बनकर खो जाओ

                  इस चितवन पथ से आकर
                 पीछे का कोई राह न रखना
                  रचे स्वप्न का सुख यहीं है
                आगे की कोई चाह न रखना

                 अक्षम प्रेम का तो आभास यही
                 आओ!अति यत्न से संचित करे
                  जीवन- स्वर के पाँव को हम
                 नुपुर बन कर ऐसे गुंजित करे

               पदचाप पुलककर नृत्य बन जाए
               रुनक- झुनक कर रोम- रोम में
                 देखो! है कैसे नटराज उजागर
                अपने इस धरा से उस व्योम में

                 हरएक अविराम गति उमंग की
               उससे छिटक-छिटक कर आती है
                तरंग- तरंग में तिर- तिर कर
                 बस उसी रंग में रंग जाती है

                 कौन यहाँ मिलनातुर नहीं है ?
                 सुनो! पूछता है यही प्रतिक्षण
             फिर मैं उत्कंठिता,तुझे क्यों न बुलाऊं ?
                उत्प्रेरित जो है ये उर्मिल आलिंगन .

Wednesday, March 20, 2013

तुमसे होली खेलना है ....


पिचकारी को कड़ाही में तला
बाल्टी में मालपुए को घोल दिया
गुब्बारे पर दही-मसाला छिड़ककर
बड़े में सब रंग भर दिया ....

अबकी बार जमकर जो
तुमसे होली खेलना है .....

ठंडई से फर्श को धो दिया
गुलाल से मिठाई बना दिया
मेवा से झालर टांग कर
गुझिया से सारा घर सजाया ....

अबकी बार जमकर जो
तुमसे होली खेलना है ....

जानती हूँ
सबकुछ उल्टा-पुल्टा हो रहा है
और सही करने के चक्कर में
कॉफी में सुबह को उबाल दिया
धूप का पकौड़ा बना कर
शाम को चटनी के लिए पीसा
और गिलास में रात को भर दिया ....

मानती हूँ
सबकुछ उल्टा-पुल्टा हो रहा है
पर अबकी बार जमकर जो
तुमसे होली खेलना है .

Saturday, March 16, 2013

पर मिट्टी नहीं है ...


आओ !
आकाश में
उड़ती हुई आँधियों !
बादलों जोर से गरजो !
बिजलियों थोड़ा और कड़को !
मैं ललकारती हूँ तुम्हें
जितना बन पड़े
तुम उतना भड़को !
अब
मेरी मजबूती को
तुम्हें सहना होगा
यदि नहीं सह सकते तो
अपनी राह में बहना होगा ...
भले ही
मिट्टी से हुआ है
मेरा निर्माण
पर मिट्टी नहीं है
ये प्राण ...
अडिग हूँ
तुम्हें ही डिगा दूंगी
प्रज्वलित प्राण से
तुम्हें ही पिघला दूंगी ...
माना कि
तुम भी हो
विकट व्यवधान , पर
अब मुझसे चलता है
मेरे विधि का
हर एक विधान .

Tuesday, March 12, 2013

एक युगंकर बन जाने दो ...


अनुभूति से
शब्द तक की
यायावरी यात्रा में
यंत्रणा-व्यूह में ही
उलझ जाने वालों ...
पंक्तियों के मध्य बचे
खालीपन में भी
याचित यातना को
ठूंस-ठूंस कर भरने वालों ...
कभी किसी शाम
अपनी यातना-यंत्रणा को
समय के सटर-पटर से
बलात छीनो , ले जाओ
अपने ही श्मशान घाट पर ...
कलेजे पर पत्थर डालो
मंत्रोच्चार करो , मुखाग्नि दो
अपनी नदी में डुबकी लगाकर
जितना हो सके शुद्ध हो ...
ओ! मेज़ के कोरों पर
सिर रखकर रोने वालों
फिर समय से संवाद करके
उसी की गोद में सोने वालों ...
कबतक यूँ ही
समय से
संपीडक संवाद करोगे ?
अपने साँसों के अंतराल को
व्यर्थ सुग-सुग से भरोगे ?
छोड़ो भी ये सब और
अपने विचार-पत्थरों को
जैसे-तैसे तैर जाने दो
चिंतन-कगारों को आपस में
कैसे भी टकराने दो
और हर एक आवेग को
उफनकर उलझ जाने दो ...
ये यायावरी यात्रा है तो
दिशा-भ्रम होगा ही
इसलिए दिशा को भी
यूँ ही भटक जाने दो ...
यदि कहीं
मील के पत्थर मिले तो
आकुल-व्याकुल भावों को
जरा सा अटक जाने दो ...
ये अनुभूति की जो
कई-कई योजन की दूरियाँ है
ये बामन मन
लांघ जाना चाहता है
मत रोको!
उसे लांघ जाने दो और
अपनी यायावरी यात्रा को
जितना हो सके
एक युगंकर बन जाने दो .

Friday, March 8, 2013

रोक लेते हो जो तुम मुझे ...


रोक लेते हो जो तुम मुझे
विहगों के स्वर पर
सहसा अधरों से फूट पड़ते हैं
बेसुध रागों में निर्झर गान
पल झपते ही नव छंदों से
आह्लादित हो जाता है आसमान
मन मसोस कर प्रिया की गोद से
निकल आता है विजर विहान ...

रोक लेते हो जो तुम मुझे
पंखुड़ियों के कर पर
परवश मदिर पराग उड़-उड़ कर
ह्रदय-कालिका को खुलकाता है
उस इन्द्रधनु से रोहित रंग उतर कर
सस्मित सौरभ से मिल जाता है
और मन-प्राणों में महक-महक कर
इक कस्तूरिया कुमुद खिल जाता है ...

रोक लेते हो जो तुम मुझे
सागर की लहर पर
मेरे स्वप्नलोक के राजमहल में
मेरा इच्छित मंडप सज जाता है
शुभ आशीष बरस-बरस कर
एक स्वयंवर रचा जाता है
और वेदी के मंगल मन्त्रों से
भंवरों पर ही भांवर पर जाता है ...

रोक लेते हो जो तुम मुझे
चन्द्रमा के डगर पर
इस सेज-सी बिछी रात पर
गगन ऐसे गिर सा जाता है
कि चंदराई सी चंदनिया चिलकती है
और पुलकित स्पर्श चमक जाता है
बस फैली-फैली चुनर देख कर
बेबस चाँद भी ठहर जाता है ...

रोक लेते हो जो तुम मुझे
अपने ही पहर पर
नभगंगायें , नीहारिकाएं , नक्षत्र सभी
अपनी गति ही भूल जाते हैं
और मेरा पथ भी मोड़-मोड़ कर
बस तुम तक ही ले आते हैं
मैं भोली ,न समझूँ तब भी
मुझे , तेरा अभेद भेद ही समझाते है ...

रोक लेते हो जो तुम मुझे
मेरे अगर-मगर पर
कण-कण में कुतूहली जगा कर
मुझसे कुछ आगे बढ़ जाता है
तुम जो भी न कहना चाहो
उस उस को भी वह पढ़ जाता है
ये सृष्टि अपना मुख ढक लेती है
और प्रेम उघड़-उघड़ जाता है ...

रोक लेते हो जो तुम मुझे ...

Tuesday, March 5, 2013

सुनवाई चल रही है ...


अर्थ है
तब तो अनर्थ है
जिसपर
व्याख्याओं की परतें हैं
और उन परतों की
कितनी ही व्याख्याएं हैं ...
कहीं शून्य डिग्री पर
उबलता-खौलता पानी है
तो कहीं बर्फ की जिद है
सौ डिग्री पर ही जमें रहने की ...
उँगलियों की सहनशीलता
गेस-पेपर को फाड़ कर
चिट-पुर्जियां बना रही है
तो कहीं बचा-खुचा सच
समझौतावादियों से
सांठ-गांठ में है
जहां वाद-प्रतिवाद
सुरक्षाकर्मी बने हैं ...
और तो और
सभी रडार से ही फ्यूज को
निकाल दिया गया है
उसी की टोह में
मिसाइल-ड्रोन भी हैं ...
खुला समझौता के तहत
खुले हाथों पर
कर्फ्यू लगा दिया गया है
और आत्मसमर्पण करके अर्थ
मुट्ठियों में बंद होकर
कुछ ज्यादा ही सुरक्षित हैं ...
तब तो
प्रतिबंधित नारों की
बंद कमरे में ही
सुनवाई चल रही है .

Friday, March 1, 2013

इक प्रेत बैठा है ...


इक प्रेत बैठा है
इस सजायाफ्ता सीने में
जैसे कोई
नायाब अंगूठी फंसी हो
किसी नामुनासिब नगीने में ...
बड़ी बेतकल्लुफी से वह
मुझे ही कहता है कि
बड़ा मजा है
फ़स्लेबहार सा ही
फैंटेसी में जीने में
व अपने अस्ल सूरत को
छिपाकर ऐसे रखा करो
किसी भी आफ़ताबी आईने में
कि रूमानियत ही रूमानियत
नजर आता रहे
हर एक कयास के करीने में ...
गर कभी वो नाख़ुशी जताए तो
अदब से ले जाओ
भंवर पड़े मँझधार में
और बिठा आओ
किसी डूबते सफीने में
फिर चुरट सुलगाओ
हुक्का गुड़गुड़ाओ
और अपनी तमन्नाओं में
विह्स्की या रम मिला कर
पूरी मस्ती से
लग जाओ पीने में ...
वो जो प्रेत है न
और भी क्या-क्या कह कर
वक्त-बेवक्त मुझे बहकाता है
कसम से बताते हुए मैं
लथपथ हूँ ठन्डे पसीने में ...
वैसे गौर फरमाया जाए तो
जब प्रेत ही बैठा है
इस सनकी सीने में
तो हर्ज ही क्या है ?
उसी के कहे सा ही जीने में .
 


Sunday, February 24, 2013

क्षणिकाएँ ...


धर्मिष्ठा ने
धरा पर धर दिया
योगस्थ यश को
धरा के समान ही
सागर सुखाती हुई
बनी रही धरोहर

     ***

धर्षिता ने
धूल को रोक लिया
अपने यश के घेरे में
धरा सींचती रही
एक यश-वट
सिद्ध होते अर्थों से

     ***

धरनी ने
ग्रह-गोचर चलने दिया
योगात्मक गति में
अपनी ग्रह-यात्रा को
स्थिर कर , करती रही
उसके लिए ग्रह-यज्ञ

     ***

धर्माभिमानिनी ने
अर्थ अपना सिद्ध किया
राहु-स्पर्श से
सिद्धांतहीन यश
ग्रहण मुक्त होकर
धरा पर बिखरा है

     ***

धन्या ने
धन गंवाया , धन्य किया
सिद्ध अर्थ के यश को
इसीलिए तो धरा पर
यशोधरा धरती है देह
अपने बुद्ध के लिए .



धर्मिष्ठा - धर्म पर स्थित रहने वाली
योगस्थ - योग में स्थित
धर्षिता - पराजित स्त्री
धरनी - हठी , जिद्दी
ग्रह-यज्ञ - ग्रहों को शांत करने के लिए किया जाने वाला यज्ञ
धर्माभिमानिनी - अपने धर्म पर अभिमान करने वाली
राहु-स्पर्श - कोई भी ग्रहण
धन्या - श्रेष्ठ कर्म करने वाली

Wednesday, February 20, 2013

जरा पूछना तो ...


जरा पूछना तो
बनजारिन-सी बसंती बयार से
कि यूँ लट लहराकर ,बलखाकर
बिंदिया , कजरा , महावर रचाकर
जोर-जोर से चूड़ियाँ खनकाकर
खुशबू-सा यौवन लुटाती हुई
अपने मोहक क्वांरी जाल में
किसे फंसाए फिर रही है ?

जरा पूछना तो
फगुनाई-सी फागुनी फुहार से
कि क्यों कभी आती-पाती खेलती है
तो कभी लुका-छिपी करती है
कभी फाहा-सा फहर-फहर कर
किससे हंसी-ठिठोली कर कर के
किसके बांहों को दहका जाती है ?

जरा पूछना तो
उन तितलियों के तकरार से
कि चुपके-से पनघट पर
जो गुलाबी धुप उतर आती है
तो ऐसा क्या कर जाती है कि
चुटकी में ही उनकी चुगली
क्यों उन्हें ही लड़ा देती है ?

जरा पूछना तो
इन फूलों के इकरार से
कि किसके लिए वे
पंखुड़ियों से पथ बुहारते हैं
और मंदिम-मंदिम मादक गान से
किसको पास बुलाते हैं
कि किरन-किरन चीर उतार कर
क्यों सबको ही लजा जाती है ?

जरा पूछना तो
हर साँझ के मनुहार से
कि किस मौन पाहुन से
मोरपंखी चाह लगा लेती है
चौंक-चौंक कर कभी चौक पूरती
कभी नये-नये बंदनवार बनाती
और सौंधी-सौंधी धानी पीर लिए
किसका बाट जोहती जाती है ?

जरा पूछना तो
हर सुबह के इनकार से
कि रात की बेचैन सिलवटों पर
क्यों है सतरंगी सपन खुमारी
कुछ कहती आँखें पर पलकें हैं भारी
और होंठों पर जो धरी उंगलियाँ
हौले-हौले हलचल करके
क्यों भोलेपन को भड़का जाती है ?

जरा पूछना तो
अपने भी इस हाल से
कि किसके लिए बौराया ,फगुनाया सा है ?
क्यों तिलमिल तारों पर टकटकी है ?
क्यों आतिश-अनारों सा कुछ फूटता है ?
क्यों कोई जादू-सा घेरे रहता है ?
क्यों वही मन में ही फेरे लेता है ?
क्यों हाल ऐसे बेहाल होता है ?
जरा पूछना तो .

Wednesday, February 13, 2013

इतना न पुकार ...


इतना न पुकार , मुझे
ओ! पुकारती हुई पुकार ...

मुझ अनाधार को देकर
इक अनहोता-सा अनुराग-भार
अनबोले हिया में क्यों ?
मचाया है हाही हाहाकार
अनमना ये मन है
विचित्र-सा हर क्षण है
और है विस्मित क्षितिज तक
केवल वेदना-विस्तार...

इतना न पुकार , मुझे
ओ! पुकारती हुई पुकार...

अंधियारी-सी सींखचों में
अनजाने ही घूम रहा
अबतक मेरा सहज संसार
मुंदी पलकों पर पग-पग कर
पड़ती रही तेरी चमकार
चट चिराग जलाकर क्यों ?
तुमने खोल दिया
अपना निश्छल नेह-द्वार...

इतना न पुकार , मुझे
ओ! पुकारती हुई पुकार...

प्रतिपल छीजती जाती
जो है ये जीवन-डोर
मैं न जानूं खींचे क्यों ?
मुझे बस तेरी ही ओर
जो नहीं है , शेष कुछ भी
कैसे कहूँ ? वही मेरी निधि
मैं अभिसारिका तेरी
अभिसार कर , चाहे जिस विधि
मंजुल मुख फेर , मत कर
तू , मुझसे निठुर व्यवहार...

इतना न पुकार , मुझे
ओ! पुकारती हुई पुकार...

सब कहते हैं कि
ये बिछोह की पीड़ा ही
प्रेम की सतत प्रतीति है
और विषाद की रीती घड़ियों में
अनबुझ मिलन की ही रीति है
ये चिर प्यास भी है तुझसे
संतृप्ति रसमय भी है तुझसे
तू भी , बासंतिक बावरा सा
बरसा मुझपर अपना रसधार...

इतना न पुकार , मुझे
ओ! पुकारती हुई पुकार .

Saturday, February 9, 2013

कोई खोपड़ा-फिरा खोट है ...


               मनुष्यता में ही मनचला-सा
                कोई खोपड़ा-फिरा खोट है
                या सभी खोपड़ियाँ पर ही
                एक-सी लगी कोई चोट है

                सारे के सारे स्मृति के तंतु
                जो ऐसे अस्त-व्यस्त से हैं
                मानो बेहोशी- कोमा में ही
               जैसे कि सब सन्यस्त से हैं

                या कोई स्मृति-चोर कहीं
                सबों को ऐसे ही लूट गया
               कि होश से ही सारा संबंध
               लगता तो है कि टूट गया
             
                होश की सच्ची कहानियां
               अब बेहोशी ही लिख रही है
               तब तो मलकाए मीडिया में
               एक हलचल-सी दिख रही है

               चारों तरफ हैं वेंटिलेटर लगे
              पर सांस भी लेना मुहाल हुआ
              मिनरल-वाटर अभियान देख
               होश का भी है अब होश उड़ा

              खोई विस्मृति गली-कूचों से
              अपना नाम-पता पूछ रही है
              तल्खी से हर खुदे तख्ते को
              दादा-परदादा का बूझ रही है

               होश को भी हाइजैक करते
               स्मृति के इतने हैं तंग तंतु
              क्लोरोफार्म के विज्ञापन में
              ज्यों जौंकते से हैं जीव-जंतु

               सब तो एक- दूसरे को ही
              कैसे बेहोश-सा बता रहे हैं
             हाय! अब कौन यह कहे कि
           बताकर ही कितना सता रहे हैं .


Monday, February 4, 2013

कविता गढ़ डालूंगी ...


यूँ ही कुछ भी छेड़िए मत
नहीं तो मैं भी यूँ ही
दुहराते-तिहराते हुए
दो-चार-दस
कविता गढ़ डालूंगी
और अपने तहखाने में
तहियाये खटास/भड़ास को भी
आपके ही सिर मढ़ डालूंगी ...

लबड़ धोंधों के लेन-देन में
ऐसा ही कुछ तो होता है
सलज्ज साहित्यिकता
अपना ही सिर पकड़ रोता है ...

न!न!ऐसे सिर झटकने से
अब काम न चलेगा
आपकी ठंडी आंच में ही सही
ये गला दाल और भी गलेगा ...

कहिये तो इसमें
जोरदार तड़का लगा देती हूँ
व टमाटर-धनिया से
और भी सजा देती हूँ
अदि आप चाहे तो इसमें
मेवा-केसर भी मिला सकते हैं
अपने बिलोये मक्खन के सहारे
गले के नीचे भी पहुंचा सकते हैं ...

ये भी जानती हूँ कि
फ़ाइव स्टार वाली कविता ही
अब आपको ज्यादा लुभाती है
पर ये खटास/भड़ास भी तो
कुछ जुदा स्वाद ही लाती है ...

ऐसे मुंह मोड़ने से
अब काम न चलेगा
कविता के मना करने पर भी
ये स्वाद तो घुलता रहेगा ...

ओहो! क्या हुआ ?
जो मैं सीधी-सी बात
आपसे यूँ ही कह दे रही हूँ
और कविता के बहाने
आपके भी तहियाये भड़ास को
जो सव्यंग सह दे रही हूँ ...

आप भी जानते हैं कि
केवल मिठास कितना घातक है
और हर जगह पेप्सी-कोला को
गट-गट गटकता हुआ चातक है ...

चाटुपटु तो हमेशा से ही
कविता की बिंदी के समान है
आइये! मिल कर हम कहें -
सांगोपांग सौन्दर्य से सज्जित
हिंदी ही हमारा अभिमान है .

Thursday, January 31, 2013

खुशबूदार बदलाव ...


कुर्सियां है तब तो
व्यवस्था की बातें हैं
व हर दरवाजे पर
जोर की दस्तक है ...
पस्त-परेशान-सा
पसीना है
वातानुकूलित कमरे के
फर्श-कगारों पर
कैट-वॉक करती
चहलकदमियाँ हैं
रूम-फ्रेशनर सा
खुशबूदार बदलाव है...
उबासियाँ-जम्हाइयां तो
विश्वविद्यालयों से
बड़ी डिग्री पाने की
जुगत में हैं
और झपकियाँ
घड़ी की सुइयों की
रसबतिया में बीजी है...
कुर्सियां हैं तब तो
पायों में छिपी-सी
अराजकता भी है
टांगों के पीछे-नीचे
कबड्डी खेलती हुई
जिसे देखकर
झाड़-फ़ानूस से
झूलता हुआ युग
कल्पनाओं में उड़ता है
स्पाइडरमैन की तरह
और कुर्सियों से
जुते घोड़ें
हिनहिनाना छोड़कर
उन कौओं को
खोज रहे हैं
जिनके पास हैं
गिरवी बतौर
उनके कान .

Sunday, January 27, 2013

प्रेम का ही आभार है ...


               कुछ कह नहीं सकती यह कि
                 ह्रदय की जीत है या हार है
                  ये पीड़ा है मुझे बड़ी प्रिय
                  जो प्रेम का ही आभार है

               आभार इतना कि हर भार से
                अतिगत ही जैसे अछूती हूँ
                 अछूती-अछूती ही हरपल
                  प्रिय को ऐसे मैं छूती हूँ

               वह अलबेला कितना अनछुआ
                  छू-छू कर अब मैंने जाना है
                    पाया-पाया सा है लगता
                    पर उतना ही उसे पाना है

                कुछ कह नहीं सकती यह कि
                  पाकर भी उसे पा ही लूँगी
                   जो पा भी लिया उसे तो
                  सबसे मैं तो छिपा ही दूँगी

                 उस अनजाने-अनपहचाने को
                 अनजाने में ऐसे जान लिया है
                  प्रीति लगी बस उस नाम की
                  जो इतना मैंने नाम लिया है

                  अब वही नाम इक गीत बन
                 इन साँसों से बस टकराता रहे
                 और उखड़ी-उखड़ी धड़कन को
                   इक विरह-धुन पकड़ाता रहे

                 कुछ कह नहीं सकती यह कि
                 यही धुन उसने भी गाया होगा
                मतवाली-मतवाली फिरती देख
                मुझपर उसका मन आया होगा

                अभी उसे तो देखा भी नहीं है
               जो मिले भी तो मैं पहचानूँ ना
               बस प्रीति लगी है उस नाम की
                कैसे लगी यह भी मैं जानूँ ना

                बस जानने से जी भरता नहीं
                जान-जान कर मैंने जाना है
                वह अनजान रहे तब भी उसे
                इन साँसों का अर्घ चढ़ाना है

                कुछ कह नहीं सकती यह कि
              ये अर्घ है या अलख प्रतिकार है
                 ये पीड़ा है मुझे बड़ी प्रिय
                 जो प्रेम का ही आभार है .


Tuesday, January 22, 2013

देखो न मुझे ...



एक छोटी-सी
कोठरी का अँधेरा
देखो कैसे
बाहर निकल आया है
जैसे ही
कोई जलता दीया
इस बुझे दीये के
बेहद करीब आया है ...
एक गहरे-काले
घोल की-सी रात
दहककर
पिघलने लगी है
जिसमें
एक स्वप्नातीत
स्वरुपातीत-सी
गहरी नींद
स्तब्धता में भी
जगने लगी है
और
एक चिर-संचित
सुशोभित,सुसज्जित
मेरी प्रतिमा सी-ही
मुझमें ही कुछ
ऐसे ढहने लगी है ...
मानो
सहसा हाथ बढ़ाकर
कोई खींच लिया है
गले लगाकर मुझे
कसकर भींच लिया है ...
वही
लावा-सा बहकर
मेरे शिराओं में
ऐसे भीग रहा है ...
देखो न मुझे
मेरा रोम-रोम भी
उसी में
कैसे सीझ रहा है .

Monday, January 14, 2013

तुम गा लेना...


जब शब्द-भ्रम पुरत:
तिमिर की घनी छाँव बन जाए
धुँधली-धुँधली सी सब ज्योति पड़ जाए
और आँखों में अश्रुघन उमड़ आये
तो प्रच्युत प्रतिनाद को तुम पा लेना
बस उसी गीत को तुम गा लेना...

शब्द-बोध , शब्द-श्लेष
भेद कर बुद्धि जन्य क्लेश
लख स्निग्ध उर-तल उन्मेष
उस प्रतिध्वनि को तुम पा लेना
बस उसी गीत को तुम गा लेना...

जब शब्द-व्यूह पुन:
अपने मूल स्रोत में समा जाए
तब जो भी अर्थ शेष रह जाए
वही तुमसे कोई गीत रचा जाए
उस शेषनाद को तुम पा लेना
बस उसी गीत को तुम गा लेना...

शब्द-शून्य , शब्द-रिक्त
उसी भाव में हो दृढ़ चित्त
थिरकता हुआ ये जीवन-नृत्य
उस धुन को तुम पा लेना
बस उसी गीत को तुम गा लेना...

जब शब्द-ब्रह्म पुन:-पुन:
उसी राग-रंग के संग गाये
एक मुक्त प्रार्थना नभ छू आये
और वेदना भी गंगा-यमुना बन जाए
उस अविरल धार को तुम पा लेना
बस उसी गीत को तुम गा लेना...

शब्द-शमित , शब्द-हीन
तुम-तुम-तुम बजे शाश्वत-बीन
क्षण-क्षण हो जिसमें लवलीन
उस हृत्प्रिय क्षण को तुम पा लेना
बस उसी गीत को तुम गा लेना . 

Wednesday, January 9, 2013

केवल एक युक्ति है ...


मैंने अब धारा की
उस प्रचंडता को पहचान लिया है
व अपने अनुरूप ही
हर ढाल का भी निर्माण किया है...
ये भी माना कि
प्रवाह-शक्ति बड़ी मद से भरी है
पर सामने भी तो
कई भीमकाय बाधाएँ भी खड़ी है...
जहाँ निषेध है
वहाँ उद्रेकता में उछल जाती हूँ
और मूल से ही
हर पाषाण को रेत-रेत कर जाती हूँ...
ऐसे न बहूँ तो
ये जो तृषा है शांत कैसे होगी ?
कुछ कमल व हंसों में
मानसरोवर की गति जैसे होगी...
गर्जन-तर्जन करके
सारी वर्जनाओं को तोड़ देना है
पोखरों में ही सिमटी हुई
अन्य धाराओं को भी जोड़ लेना है...
सच! बहने में ही
हम सबों की अंतिम मुक्ति है
यही नियति है और
यही एक और केवल एक युक्ति है .


Friday, January 4, 2013

प्यार के साथी ! सच मानो ...


प्यार के साथी ! सच मानो
अपनी चुप-सी पतझड़ को , मैं
बस तुमसे ही गुदगुदाना चाहती हूँ
और इस बासित बगिया में
तेरा ही , बांका बसंत खिलाना चाहती हूँ ...

कहो तो ! हवाओं को सनसनाकर
हर पत्तियों की चुटकियाँ झट से बजा दूँ
अलसाई सी हर कलियों की
आँखों को चूम-चूमकर जगा दूँ ...

यूँ बलखाती डालियों-सी
तुझपर ही , मैं ढुलमुलाना चाहती हूँ
ओ! मेरे सघन तरु , मैं
लता सी ही , तुझसे लिपट जाना चाहती हूँ ...

इस लगन को प्रिय!
बस पागलपन मत कहो तुम
प्रीत पुरातन है मेरा
निरा आकर्षण मत कहो तुम ...

प्यार के साथी ! सच मानो
अपने हर रोदन को
तुमसे अमर गान बनाना चाहती हूँ
और थामकर हाथ तेरे
मुश्किलों को भी आसान बनाना चाहती हूँ ...

कहो तो ! इस उफनते यौवन को
मैं , तुममें अभी ऐसे समा दूँ
कि तुमसे ही उघड़कर
तुम्हे ही मैं , घूँघट भी बना लूँ ...

तेरे लहरों में सिहर कर
अंग-अंग को भिंगाना चाहती हूँ
और तुम्हारे ही सहारे
तुममें ही , डूब जाना चाहती हूँ ...

इस नेह-हिलोर को
बस लड़कपन मत कहो तुम
बड़ी बेबूझ ये चित्त है
रुत का चलन मत कहो तुम ...

प्यार के साथी ! सच मानो
अपनी गहरी प्यास को
तुममें ही , तृप्ति बनाना चाहती हूँ
और वासनाओं के पार कहीं
निर्वासना का रस भी बहाना चाहती हूँ ...

प्यार के साथी ! सच मानो .

Tuesday, January 1, 2013

अति आवश्यकता है ...


अति आवश्यकता है
समस्त शुभकामना की
सही समय भी है
हालांकि अपने अनुसार समय
हमेशा सही ही होता है पर
गलती से ही कभी वह
जो झपकी लेता है तो
गलत भी अपनी परिभाषाओं का
अतिक्रमण कर देता है
और आदमी अपनी ही
परिभाषाओं की परिधि पर
सर पटक-पटक कर रोता है ...
अति आवश्यकता है
शुभकामना लेने और देने की
हर छटपटाते ह्रदय को
अमृत-वृष्टि में भिंगोने की
उस छुई-मुई सी निराशा को
जड़ से उखाड़ कर फेंकने की
और आशा के अक्षयवट को
पुन: जतन से संजोने की ...
अति आवश्यकता है
शुभाकांक्षी शुभकामना की
शुभ हो! शुभ हो! शुभ हो!

Thursday, December 27, 2012

नजरबन्द ...


आजकल
शब्दों की हिम्मत भी
हवा देखकर बढ़ सी गयी है ...
न जाने क्यूँ वे
अपना आक्रोश मुझपर ही
अजीब तरह से व्यक्त कर रहे हैं
मैं निकल जाने को भी कहूँ तो
कुछ बुदबुदाते हुए उबल रहे हैं ....
तब तो शब्दों की छाती पर
मैंने भी तान दिया है पिस्तौल
अब तो उन्हें राजद्रोह स्वीकारना होगा
साथ में गिरफ्तारी भी देनी होगी
अपना बॉडी- वारंट देखे बिना ....
अब वे करते रहे अपना वकील
लिखवाते रहे अपने लिए हिदायतें
छाँटते रहे सही-गलत बातों को
अपना छाती दुखा-दुखा कर
करते रहे अपना जिरह
व अपनी पैरवी के लिए
करते रहे सारे प्रबंध-कुप्रबंध
और अपने धारदार बहसों से
काटते रहे गले के फंदों को ....
पर मैं तो एकदम से इन शब्दों की
बौराई हुयी सरकार सी हो गयी हूँ
अति आक्रोश में हूँ
इसलिए कुछ गिरगिटी शब्दों को छोड़कर
बाकी उन सभी रुष्ट शब्दों को
एक-एक करके
नजरबन्द कर देना चाहती हूँ
अपने कलम में ही .


Friday, December 21, 2012

हंसा , उड़ चल न ...


उड़ - उड़ कर , बहुत छान लिया
हमने कई , अम्बर - भूतल
कितने पंख , गिर गये हमारे
अबतक , तिल- तिल कर जल
अंगारों पर ही , चल रहा है
बंदी -सा , हर छिन - पल

क्यों किसी द्वार पर
नहीं रुकते ये शिथिल चरण ?
क्यों व्याकुल प्रश्नों से
बोझिल है ये धरती - गगन ?
क्यों संझियाई उदासी लिए
उत्तर के ताके है नयन ?

अब तो निर्लक्ष्य , न उड़
विकल खग -सा ,  रे! मन
देख , मरू के मग पर
क्षण भर को ही , लहराया है घन
भाग , उठ , उस रस का
भींग कर , कर आलिंगन

कबतक जड़वत जीवन से
खाता रहेगा , तू ठेस रे!
ठगिनी माया है , तुझे रिझाए
धर , हंसिनी का वेश रे!
हंसा , उड़ चल न
अपने ही , उस देश रे!

जिस देश का दुर्गम पथ भी
बने हमारा , पावन बंधन
उस बंधन से ही , बंध जाए
इस मन का , सब सूनापन
और सूनेपन में भी , खिल जाए
कमल - पंखुड़ियों सा , ये जीवन

तब ताकता रह जाएगा , तू ही
उन पंखुड़ियों को , अनिमेष रे!
सबकुछ अपना , निछावर करके
न रखेगा  , कुछ भी शेष रे!
हंसा , उड़ चल न
अपने ही , उस देश रे!

Monday, December 17, 2012

लिखो , लिखो , खूब लिखो ...


लिखो , लिखो , खूब लिखो
खुरदरे , संकरे किनारे से भी धकेले हुए
पीछे के पन्नों पर बनाए गये
कँटीले बाड़ों में बिलबिलाते
उन वंचितों के लिए
लिखो , लिखो , खूब लिखो

लिख भर देने से ही
झख मारते हुए इतिहास बदल जाता है
इसी झांसे में आकर
इतिहास का भूगोल भी बदल जाता है
और कितनी ही कुवांरी क्रांतियाँ
गर्भ बढाए हुए अजन्मे परिवर्तन का
नामाकरण संस्कार करवाती है
फिर अचानक से यूँ ही
भरे दिन में गर्भपात करा लेती है

ऐसी वंचनाओं का आदि इतिहास
इस आदि इतिहास का अमर इतिहास
उन्हीं वंचितों को कोसता रह जाता है

लिखो , लिखो , खूब लिखो
शेषनाग सा फन फैलाए हुए
अपने सम्पूर्ण सामर्थ्य से चूसते हुए
उन शोषणों के खिलाफ
और नैसर्गिक निरीहता में भी
अर्थवत्ता को सुलगाते हुए
उन शोषितों के लिए

लिखो ,लिखो , खूब लिखो
उनके दर्द से कलपते देह को
और काल के कोड़ों से
फव्वारे की तरह फूटते खून को
उनके ही खंडहर के दीवारों से टकराती हुई
चमगादड़-सी डरी हुई उनकी आत्मा को
उनके ही भुरभुरे भग्नावशेषों को
और उनके जीजिविषा के अवशेषों को

लिखो , लिखो , खूब लिखो
उन अपढ़ ,निरक्षरों के लिए
जिनके लिए आज भी
काला अक्षर मरी हुई भैंस ही है
जिसके थनदुही में लगे हुए हैं
अक्षरों के थानेदार और हवलदार

लिखो ,लिखो , खूब लिखो
विवश विचारों की आँधियाँ उठाओ
कुचक्रों के चक्रवातों में उन्हें फँसाओ
और अपने काले- उजले अक्षरों को
घसीट-घसीट कर ही सही
अपंग- अपाहिज सा इतिहास बनाओ .  

Thursday, December 13, 2012

मैं तुम्हें दे दूँ...


ये किनारा भी , मैं तुम्हें दे दूँ
वो किनारा भी , मैं तुम्हें दे दूँ
ये गझिन गारा भी , मैं तुम्हें दे दूँ
और ये धवल धारा भी , मैं तुम्हें दे दूँ

मेट कर अपनी बनावट , मैं ढह जाऊँ
तेरे अपरिमित ज्वार को , मैं सह जाऊँ

ये तनु तरलता भी , मैं तुम्हें दे दूँ
ये मृदु मधुरता भी , मैं तुम्हें दे दूँ
ये चटुल चपलता भी , मैं तुम्हें दे दूँ
और ये उग्र उच्छ्रिंखलता भी , मैं तुम्हें दे दूँ

तेरी हर साँस में ,  ऐसे मैं बह जाऊँ
हर साँस की गाथा , हर किसी से कह जाऊँ

ये परिप्लव प्राण भी , मैं तुम्हें दे दूँ
ये निरवद्द निर्वाण भी , मैं तुम्हें दे दूँ
ये अमित अभिमान भी , मैं तुम्हें दे दूँ
और ये अमर आत्मदान भी , मैं तुम्हें दे दूँ

तनिक भी इस मैं में , न मैं रह जाऊँ
बस और बस तुम्हीं में,  मैं सब गह पाऊँ .



गझिन - गाढ़ा और मोटा
गारा - मिट्टी( जैसे नदी के तल की )
तनु - सुकुमार
चटुल - चंचल
परिप्लव - तैरता हुआ , बहता हुआ
निरवद्द - दोषरहित , विशुद्ध

Saturday, December 8, 2012

ऐ ! आलोचना के बाबुओं ...


क्या कहूँ ?
इस मुख से कहते हुए
बड़ी ही लज्जा सी आती है
कि कैसे
आज की कविता अपना चीरहरण
खुद ही करवाती है
और अपनी सफाई देते हुए
बात-बात में
गीता या सीता को
बड़ी बेशर्मी से ले आती है ...
और तो और
आल्वेज हॉट राम-कृष्ण का
कलरफुल कॉकटेल बनाकर
सबको उकसाती है , लुभाती है ...
ऐ ! आलोचना के बाबुओं
आप अपने को बचाए रखिये
बामुश्किल से चलती परम्परा को
किसी भी कीमत पर निभाये रखिये
यदि आपको कोई
ऑफर पर ऑफर दे भी तो
अपनी नजरें फिराए रखिये
और आपके कम्बल के भीतर
भला झाँकता कौन है ?
ये जो आज की नशीली कविता
कुछ ज्यादा ही बहकने लगे तो
उसी गीता या सीता को
हाजिर-नाजिर करके
जोर-जबरदस्ती से ही सही
अपना नीबूं-अचार चटाते रहिये .

Tuesday, December 4, 2012

डर मत मन ...



               इति-इति पर अड़ मत मन
               नेति-नेति से लड़ मत मन
                दुगुना दुःख कर मत मन
               वेदना से तू , डर मत मन

              गहन कोमलता जब लुटती है
                इक टीस सी तब उठती है
                मधुघट भी फूट जाता है
              मृदुमिटटी में मिल जाता है
               मृत्यु पूर्व ही मर मत मन
               वेदना से तू , डर मत मन

                 ह्रदय खोल और हुक उठा
              पुण्य प्रबल है , बस उसे लुटा
               जतन से चुभन को सहेज ले
                अगन को सूरज का तेज दे
               उत उलझन में पड़ मत मन
                वेदना से तू , डर मत मन

               व्यर्थ ही मिलती नहीं पीड़ा
              शैवाल तले बहती सदानीरा
              उपल के अवरोधों को सहती
               जल से ही जलधि है बनती
               अंजुली छोटी कर मत मन
                वेदना से तू , डर मत मन

               दुगुना दुःख कर मत मन
               वेदना से तू , डर मत मन .



Saturday, November 24, 2012

मैं मनचली ...

जबसे प्रिय प्यारे के
तीखे नयन ने कुछ यूँ छुआ
मुझ रूप-गर्विता को
न जाने क्या और कुछ क्यूँ हुआ ?

अपने रूप पर ही
और इतना इतराने लगी हूँ
लुटे तन-मन की
निधि सहसा ही बिखराने लगी हूँ...

आज बस में नहीं कुछ
खो गया है सारा नियंत्रण
पा प्रिय का
पल-प्रतिपल मोहक नेह निमंत्रण...

मैं किरण-किरण भेद
कुटिल कुतूहल जगाने लगी हूँ
बड़े भोलेपन से ही
बजर बिजलियाँ गिराने लगी हूँ...

गगन को ही छुपा कर
बिरंगी बदरिया बन घिर रही हूँ
उस गंध की गंगा सी
हवाओं के संग मैं फिर रही हूँ...

जैसे कोई क्वांरी कली
प्रथम आलिंगन से खुद को छुड़ा रही हो
उस प्रणय ज्वाला को  
हर पात से लजा कर बता रही हो...

और दे भी क्या सकती हूँ
हवाला या प्रमाण अपनी बात का
बस छलिया का
छुअन ही सब हाल कहे मेरे गात का...

मैं मनचली ,मचल-मचल
अपने प्रिय को ऐसे लुभाने लगी हूँ
और मचलते प्राण से
बस प्रिय! प्रिय! प्रिय! गुनगुनाने लगी हूँ .

Sunday, November 18, 2012

सिरा खोज लूं ...



कोई
मेरे गले में
घंटी बाँध
आँखों पर पट्टियाँ चढ़ा
न जाने कहाँ
लिए जा रहा है...
पांव थककर
रुके तो पीछे से
कोड़े बरसा रहा है
कहीं दौड़ना चाहूँ तो
चारों तरफ
खाई बना रहा है...
पराई गलियों के
अनजान रोड़े भी
तरस खाने लगे हैं
सपनों में चुभे
काँटों को
सहलाने लगे हैं...
घर की महक
वापस बुलाती हैं
इसीलिए मैं
अपने समय के भीतर
खुदाई कर रही हूँ
ताकि
इन्द्रजालों के
महीन बानों को
काटकर
कोई भी
सिरा खोज लूं .

Saturday, November 10, 2012

तो ये है -


आपको दमा का दौरा दिला
हर बेहया सुबह को फूंक-फूंक सुलगाती हुई
रोटियों को हथेलियों से पीट-पीट कर
अपने स्टाईल में जलाती-पकाती हुई
सहमें नमक-प्याज संग पेट खोले गठरी में रख
पगडंडियों या रस्ते पर बदहवास दौड़ती हुई
आपको हर रोज कविता जो दिखे तो
आप उसे गुड मॉर्निंग कह सकते हैं और
अपनी च्वायस माफिक सौन्दर्य भी ढूंढ़ सकते हैं

फिर नजरें घुमाए तो
टेलर या लॉरी पर अजीब सी लटकी हुई
बसों-रेलगाड़ियों के छतों पर भी चिपकी हुई
कहीं तगारी-ईंटों से हंसी-ठिठोली करती हुई
या फिर फैक्ट्रियों के धुएँ को हराने वास्ते
ओंठों के बीच कसकर बीड़ी दबाये हुए
सारे टेंशन को छल्लों में घुमाकर
अपने हौसले से छेड़कानी करती हुई
कोई बिंदास सी कविता दिखे तो, आप
ईजिली अपने अन्दर भटकती कला को
नेशनल हाईवे पर दौड़ा सकते हैं

या फिर आपके इर्द-गिर्द
अपने झिल्लीदार आँखों से झुर्रियों के बीच फंसे
नन्हे-नन्हे जीवों को पुचकारती हुई
या अपने असली आंतो और दांतों को
किसी सेठ-साहूकार के यहाँ गिरवी लगाती हुई
या फिर किसी इंटरनेशनल ब्रांड के वास्ते
अपने गंजेपन का फोटो खिंचवाती हुई
और किसी फुटपाथ पर बिकते हुए
उताड़े कपड़ों की मजबूती जांचती हुई
उस ब्लैक एंड व्हाईट पीरीयड टाईप की
कोई कविता दिख जाए तो, बेशक आप
अपने आँखों पर काला चश्मा चढ़ाकर
न देखने का रियल एक्टिंग कर सकते हैं

या फिर गाहे-बगाहे
उस रंग-बिरंगे बीप करते बटनों पर
मक्खियों सी भिनभिनाती हुई
या किसी भी पॉलिश्ड पॉलिसी पर
छिपकलियों सी फिसल जाती हुई
और उस स्ट्रांग इकोनॉमी के नीचे
लाईटली, चींटियों सी दब जाती हुई
और तो और , हमारे-आपके
चारों तरफ दिन-रात उगते हुए
प्लास्टिक-पालीथीन को चबाती हुई
चुकरती , रंभाती वही कैटल क्लास सी
कोई कविता जो दिखे तो, आप
किसी भी पतली गली से निकल लेंगे
नहीं तो हाथी के दांतों से उलझ जायेंगे

और अक्सर रात गए
कहीं अपनी ही बोली लगाती हुई
या सामूहिक रूप से लुट जाती हुई
या फिर अपने गले के लिए फंदा बनाती हुई
कोई भी अगली सी , डर्टी सी कविता दिखे तो
आप राम-राम रटते हुए
अपने-अपने घरों में दुबक जायेंगे
और किसी फ्लॉप फिल्म की स्टोरी मान
उसको एकदम से भूल जायेगे
तो ये है -
   '' अपरिवर्तनीय और अछूत भारत की कविता ''

  ( इनकन्वर्टिबल और शनिंग इण्डिया की कविता )



Wednesday, November 7, 2012

तो ये है -


सुबह-सुबह
आँख मलते हुए आप सैर को जाएँ
वहाँ दौड़ती-भागती , चक्कर लगाती
चेहरे पर ताज़ी लालिमा उगाये
कोई कविता दिख जाए तो
बेशक ! हैरानी की कोई बात नहीं होगी
आखिर सोशलिस्ट सेहत का जो मामला है

या फिर कभी
किसी ब्यूटी पार्लर में
फेशियल-मसाज़ करवाती हुई
या बालों को रंगने के वास्ते
कुछ अलग-सा डाई चुनती हुई
या किसी बुटीक में
डिजायनर परिधानों को ट्राई करती हुई
एक गर्माहट बिखेरती जो कविता मिले
तो घबराने वाली भी
ऐसी कोई घटना नहीं होगी
चिर-युवा दिखना कौन नहीं चाहता ?

हो सकता है किसी दिन
किसी नामी-गिरामी डेंटिस्ट के यहाँ
अपने जबड़े को दुरुस्त करवाती हुई
नकली दांतों में हीरे-मोती जड़वाती हुई
यूँ ही खिलखिलाती हुई कविता मिले तो
आप भी लुढकने को तैयार हो जाएँ
आखिर खनकती चमकीली हँसी पर
कौन नहीं मर-मिटता है ?

फिर किसी शाम
हाई-प्रोफाइल सब्जी-मंडी में
आँखों को रोकती हुई
किसी बड़ी लग्जरी गाड़ी की डिक्की में
ढेरों साक-सब्जियां लदवाती हुई
जीरो-फिगर वाली कोई कविता दिखे तो
आप बस इतना ख़याल रख सकते हैं
कि अपनी दसों उँगलियाँ
कुछ ज्यादा ही चबा न लें

और फिर किसी रात
भरपूर हेल्थ-ड्रिंक्स के साथ-साथ
हेल्थ-पिल्स फांक कर
किसी सॉफ्ट म्यूजिक पर
योग-ध्यान लगाती हुई
और पूरे चैन की नींद लेती हुई
कोई कविता दिखे तो
आप जरूर पूरे जल-भुन कर
उससे रश्क खा सकते हैं
तो ये है -
'' इनक्रेडिबल और शाइनिंग इंडिया की कविता ''




...और भारत की कविता अगली कड़ी में .

Saturday, November 3, 2012

क्षणिकाएँ ...


क्षणों की लहरों ने तो
विभीषिकाओं का पाठ पढ़ाया है
पर मैंने भी हर लहर के लिए
डांड तोड़ कर डोंगा बनाया है

           ***

अमानुषिक ऊँचाइयों की परछाईयाँ
मैंने चतुराई से चापा है
और हरेक चीज़ों को बस
अपने सिर के हिसाब से नापा है

           ***

धीरे-धीरे सरक कर
सपनों के छोरों को जोड़ा है
और अस्तित्व के गिने पन्नों में
मैंने चोरी से कुछ को मोड़ा है

           ***

दो जोड़ दो को हरबार
मैंने तीन या पाँच कहा है
और निन्यानवे का फेरा लगा-लगाकर
शून्य से ही तिजोड़ी को भरा है

           ***

आईने में जैसी भी तस्वीर मिली
मैंने बस उसी को जाना है
ओर पीछे पुता कलई ने जो कुछ कहा
उसी को आँख बंद करके माना है .



Tuesday, October 30, 2012

जिन्हें तकलीफ है किसी से ...


भीखमंगा बनकर सबसे
मोती मांगने का चलन है
बोनस में मिलते दुत्कार का
करता कौन आकलन है...

अपने ही प्राणों में दौड़ती
कड़वाहटों का जलन है , पर
एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप
करने में ही सभी मगन हैं...

मारे शर्म के पाताल में
कहीं छुप गया गगन है
भागीरथी-कतार देखकर तो
उसका बढ़ रहा भरम है...

भूल-चूक से भूल हो तो
ऐसी कोई बात नहीं है
अँधेरे को भी जो छलता है
वो तो कोई रात नहीं है...

कालिख से पुता उजाला
अपने ब्रांड को भजा रहा है
सफेदी की चमकार का हवाला दे
हाट-घाट पर दूकान सजा रहा है...

मछली तो फंसने के लिए होती है
और मल्टी-चारा भी कमाल है
मुँह में चूहे का दांत दबाये हुए
सबके कंधे पर एक जाल है...

सुख तो कोई दुर्लभ चीज नहीं
बस नीचे गिरते जाना है
बिन सोचे वो सब कर के
इस दुनिया का कर्ज चुकाना है...

जिन्हें तकलीफ है किसी से
चुपचाप जगह खाली कर दे
और भीखमंगों की झोली को
अपने आत्मसम्मान से भर दे .

Sunday, October 21, 2012

शुभ शक्तिपात करो !


जीवन-नृत्य को
द्रुत गति से कराने वाली
सचेतन संगीत से
स्वर्णाभ सुर-लहरी लहराने वाली
गीतातीत मेघ-गर्जना के
पार्श्व ताल को थपकाने वाली
स्नेहिल विद्युत्-स्पर्श से
पुनीत-पुलक जगाने वाली...

हे माँ!
विहिंसक वृत्तियों पर वज्रपात करो!
और सब पर शुभ शक्तिपात करो!

मधुरित पुष्प-मंजरी सी
उप्त उल्लास खिलाने वाली
चिर चाहना के चषक में
अमृत-पय पिलाने वाली
इंद्रधनुषी इच्छाओं में
नख-शिख तक उलझाने वाली
मोहिनी-मुग्धा सी
पुन: माया को लील जाने वाली...

हे माँ!
अनृत , मिथ्यात्व पर कठोर आघात करो!
और सब पर शुभ शक्तिपात करो!

अपने सम्पूर्ण सौन्दर्य में
अर्धरात्री को उकसाने वाली
इस संकटापन्न संसार को
स्वर्गीय स्वानुभूति कराने वाली
घोर तमस के तृषा को भी
अंतत: त्राण दिलाने वाली
संकल्पित संकाश से
जगत को नित्यश: नहलाने वाली...

हे माँ!
अपने वैभव-विलास युत वक्ष से
अजात प्रकृति-शिशुओं को दीर्घजात करो !
और सब पर शुभ शक्तिपात करो!

Tuesday, October 16, 2012

कि पीर-सी लगे जुन्हाई...





                               ये कौन-सी रुत है आई 
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                             चाँद चुट-चुट चुटकी बजाए
                           मंद,मदिर-सा मलय लहराए
                           पर मेरे व्याकुल मन के लिए 
                            मेरे प्रीत की पुकार न आये
                           न ही बाजे प्राणों की शहनाई 
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                       नदियाँ पतुरिया-सी पायल बजाये
                          रात की रानी चूड़ियाँ खनकाए
                        बगिया में बिरही-बहार छिपकर 
                            गोपन-बिध से मुझे रिझाए
                             पर बेसुधी है मुझपर छाई 
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                             मन नहीं लगता क्या करूँ ?
                            प्रण नहीं निभता क्या करूँ ?
                           कुंठित-शंकित हर साँस लिए
                             दिन नहीं उगता क्या करूँ ?
                            न ही आई सुधि की पुरवाई
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                              आँखों में सपनों का खेला
                             अधर तक है अश्रु का रेला
                             कान में मेरे कोई ये कहता
                            कि लागूँ मैं खुद को ही मेला
                             खीजकर चेतना कसमसाई
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                               मेरे गीतों को जग गाये
                             अपना सौ-सौ अर्थ लगाए
                            जिसके लिए प्राण गीत रचे 
                             बस उसे ही समझ न आये
                          आह! मेरी आह उसे छू न पाई 
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                                ये कौन-सी रुत है आई 
                               कि पीर-सी लगे जुन्हाई .


          ( जुन्हाई - चाँदनी )

Saturday, October 13, 2012

पर भाव तो निरा निरक्षर है...


               वर्णमाला के बिखरे-बिखरे
                 बस थोड़े से ही अक्षर हैं
                कुछ और मैं कहना चाहूँ
             पर भाव तो निरा निरक्षर है

             क्षर-क्षर को लिखा बहुत है
             पर वह अक्षर रहा अलेखा
             अदेखे को मैं लिखना चाहूँ
              जो इस अंतरदृग ने देखा

               ऊर्ध्व वेग कोई उठता है
              भेद कर बुद्धि सूक्ष्म तार
          मुक्ताभ मुक्तक मैं बहना चाहूँ
             तन -मन के क्षितिज पार

            खोजती खोकर उसे खोने हेतु
             यह कैसी पागल प्यास है ?
             उस जिस को मैं गहना चाहूँ
             क्या मेरा अछूता उल्लास है ?

             मैं सांवरिया बनी किसी की
              बनाकर वेदना को वरदान
           अब तिल-तिल मैं सधना चाहूँ
             अनोखी आस की लिए भान

            जिह्वा पर मधु-बूँद गिराकर
            कोई छाया बना है मेरा छाज
              गपक गरल मैं पीना चाहूँ
              इतना ह्रदय भरा है आज

              इतना ह्रदय भरा है आज
             पर बिखरे-बिखरे अक्षर हैं
           बस उसको ही मैं भजना चाहूँ
            पर भाव तो निरा निरक्षर है .

Saturday, October 6, 2012

तुम मेरे हो कौन ?


विरवा में अनुक्षण अँखुआते
हर पंखड़ी , पात से पूछूं
भोर की सुकुमार किरणों सी
गंध बिखराती हर गात से पूछूं
अल्हड़ , आतुर चाहना की
फूलझड़ियों सी बरसात से पूछूं
तुम मेरे हो कौन ?

शिशिरा के हलके हिलोरे से
झिर-झिर झिलमिलाते मूंजों से पूछूं
कनखी ही कनखी में कुछ कह
सकुचाते सघन कुंजों से पूछूं
प्राण-पिकी की मतवाली सी
मरमराती मधुर गूंजों से पूछूं
तुम मेरे हो कौन ?

इन निर्झर नलिन-नयनों में तिरते
पल-पल की पिपासा से पूछूं
दूर-दूर तक विस्तीर्ण नीलिमा में
विस्तारित , विस्मित जिज्ञासा से पूछूं
झिर्रियों की झलक से चौंधियाकर
चुलबुलाते पंखों की अभिलाषा से पूछूं
तुम मेरे हो कौन ?

तुझ पाहुन की पगध्वनि पाने को
धमा-धम धमकते धड़कनों से पूछूं
तन पर तारकावलियों सा जड़ने को
तप्त , तत्पर चुम्बनों से पूछूं
देह की देहरी पर दुहाई देते
कसकते , कसमसाते आलिंगनों से पूछूं
तुम मेरे हो कौन ?

मुझे पूरब , पश्चिम और दक्षिण
दिखा- दिखा कर न जाने
उत्तर कहाँ है गौण ?
जब तुमसे जो पूछूं तो
रहस्य भरी मुस्कान लिए
बस रहते हो मौन...
अब कोई तो मुझे बताये
मैं किससे जाकर पूछूं कि
तुम मेरे हो कौन ?
 

Monday, October 1, 2012

न जाने क्यों ... ?


अपनी  ही  कुछ बंदिश में  न जाने क्यों
सीमित -दमित से ही रहते हैं कुछ लोग
इक  छोटा -सा अपना ही  आकाश लिए
क्यों  भ्रमित-चकित  रहते हैं कुछ लोग

चाँद -सूरज भी  पल दो पल के लिए ही
रोज तो  आते  हैं  पर यूँ ही चले जाते हैं
ख़ामोश -सी स्याह रात  को  ओढ़े लोग
अपनी जिक्र-फिक्र में ही भटक जाते हैं

उफ़ ! अकेलेपन का ये कैसा इन्तहां कि
दिल के धड़कने की , कोई आवाज़ नहीं
रोग तो लाखों हैं  ,यूँ  ही जीने के वास्ते
पर ग़म भूलाने को , कोई साज ही नहीं

बवंडर की तरह  और  तूफ़ान की तरह
हर तरफ ही देखो तो ,ये  क्या उठ रहा है?
अपने ही सींखचों  में ऐसे घूम -घूमकर
सब आकाश ही  इतना क्यों घुट रहा है ?

पानी के  बबूलों से बस  मोहब्बत करके
कलक कर  कागज की किश्ती बनाते हैं
अपने-अपने आग को ही अंदर छुपाकर
दावे से  दूसरों पर , कैसे तिलमिलाते हैं

छलावा और दिखावा की  ऐसी नुमाईश
करने वाला  खुद ही  क्या कह सकता है ?
चालाकी से चंद चांदमारी किये बगैर ही
ऐसा आकाश तो भला कैसे रह सकता है ?

अपनी  सारी महफ़िल को  वीराना करके
सबब पूछते  हैं  सब , हर एक से  रोने का
किस्मत  की किलाबंदी करने के बावजूद
खौफ़ रहता ही है  उन्हें  खुद को खोने का

बंदिशों के बंदिखाने में , बंधकर आकाश
सच -सच कहो तो  कितना तड़फड़ाता है
भ्रमों के रेशमी जालों को ही बुन -बुनकर
उसी में खुद ही इतना जो उलझ जाता है

अकेलेपन से कभी अपना दामन छुड़ाकर
अस्ल इंसानियत का भरकर एकअहसास
जब नजरें मिलेंगी उस बड़े आकाश से तो
सीमित न  रह  पायेगा  कोई  भी आकाश .


Wednesday, September 26, 2012

आओ , भेंट ले हम ...


हर रात को
पूनो की रात की तरह
आओ , भेंट ले हम ...
टुकड़े -टुकड़े में
फैली चांदी को
श्वास -श्वास में
श्लोकबद्ध कर फेंट ले हम ...
बिखरे -बिखरे से
सन्न सन्नाटे में जरा -जरा सा
लंगर कर लेट ले हम ...
और छिटकी -छिटकी
पारे की तरह बातों को
उँगलियों के पोरों से
सटा -सटा कर समेट ले हम ...
फिर उलटे -पलटे
कांच के कंचे से
अयाचित अनुभवों को
इसी क्षण के धागे में
मजबूती से लपेट ले हम ...
व तरल -तरल में
आश्चर्य के बहते लावा को
जमने से पहले ही
चट -पट चहेट ले हम ...
अहा! कितनी सुन्दर रात है
चूकती सन्नाटे में भी कुछ बात है ...
स्निग्ध -स्नेह बरसा -बरसा कर
रह -रह मुस्काता आसमान है ...
कणभर की तृप्ति ही सही
कण -कण से फूट -फूट कर
हर ओर भासमान है ...
अचानक
हमारी ही सीपी खुल जाती है ...
इक बूँद ही सही
उसमें गिर जाती है ...
जो हमारा ही
अनमोल मोती बन जाता है
और उस बरसते रस को
इक उसी क्षण में
खुलकर ग्रहण करना
बड़ी सहजता से
हमें ही सिखलाता है . 

Saturday, September 22, 2012

परितप्ता मैं ...


तुमसे है
मेरा स्वाभिमान
जो सबको
अभिमान सा दिखता है
और मुझे
अभिमानी दिखने पर
अभिमान सा हो जाता है...
जबकि मैं जानती हूँ कि
तुम किसी बच्चे की तरह
या किसी पूर्व नियोजित
आघातक झटका की तरह
मेरे स्वाभिमान को भी
एकदम से तोड़ देते हो...
जब वह
किसी मदमायी कली से
गदराया फूल बनने को
आतुर होता है ...
क्या लगता है तुम्हें ?
कि अपनी सुगंध में
मैं ही बहक जाउँगी
तुम्हें ही भरमा कर
और भड़क जाऊँगी ...
आह ! राग का ऐसा विरूपण
यंत्रणा का ऐसा निपीड़न
अभिमान का तो अंत: अनुपतन
पर स्वाभिमान का सतत सुबकन....
ये तुम्हें भाता होगा , मुझे नहीं ...
हाँ ! मैंने कब तुम्हें मना किया
कि अपने तपौनी में
मुझे इतना मत तपाओ
मेरे हर उद्यम से
उभरते छल को
मुझे ही मत दिखाओ
और अनजाने में उठते
किसी भी अभिमान को तोड़कर
मुझे मत जगाओ...
पर
तुमसे जो है
मेरा स्वाभिमान
उसकी तो
हरसंभव लाज बचाओ...
आखिर
तेरी ही परितप्ता मैं
मुझे विचुम्बित करके
गहरी वापिका में भी
हाथ को थामकर
वार पार तो कराओ . 


Sunday, September 16, 2012

कुछ तो नाम चाहिए ...


आओ , कोई भी मुद्दा लो
प्यार से चीरा लगाओ
जितना अंट सके , उससे ज्यादा ही
उसमें विस्फोटक पदार्थों को भरो...
उसे अफवाहों से कसकर लपेटो
पूरा दम लगाकर
हवा में जोर से उछाल दो...
स्वर्णपदक पाए निशानेबाज़ की तरह
निशाना साधो , गोली दागो
धारदार धमाका होगा
और मुद्दा
न जाने कितने ही टुकड़ों में
जगह -जगह बिखर जाएगा...
चिनगियाँ लपकने वाले तो
यूँ ही लार टपकाए फिरते हैं
थूक -खखार लपेट -लपेट कर
मुद्दे पर आग उगलते हैं...
आग की लपटें आपस में ही
लड़-झगड़कर लिपट जाती हैं
और मुद्दई मुद्दे पर
मुरौवत दिखा कर
मुनासिब मुलम्मा चढ़ा आती है....
भई ! सच तो यही है
कि सबको मीठा , रसीला
सदाबहार आम चाहिए
खाली बैठने से बेहतर है
कि कोई तो काम चाहिए
और  आग उगलने में अव्वल होकर
नामाकूल ही सही
पर कुछ तो नाम चाहिए .

Thursday, September 13, 2012

कवि का क्या भरोसा ?


कवि का क्या भरोसा ?
कब क्या कह दे
मात खायी बाज़ी पर भी
शह पर शह दे...
कविता का क्या मोल है ?
हिसाब में बड़ा झोल है...
क्या ये नारियल का खोल है ?
या फूटी हुई ढोल है ?
इससे न तो पेट भरता है
न ही तन ढकता है
न ही छप्पड़ बन कर
किसी के सर पर लटकता है
तो कोई कवि कविता क्यों कहता है ?
बर्दाश्त की सारी हदों को
बार-बार जानबूझकर तोड़ता है
आह-वाह सुनने के लिए
लार बनकर टपकता है...
उससे कुछ पूछो तो -
स्वांत: सुखाय रटता है ...
ये कवि -जमात बड़ा ही
ख़तरनाक मालूम होता है
दिनदहाड़े सबके दर्द पर
डाका डालकर रोता है
हँसने की बात करो तो
ऐसे आपा खोता है
और रक्त-निचुड़े शब्दों पर ही
अपनी कविता को ढ़ोता है .

Sunday, September 9, 2012

मैं बोझिल बदरिया ...


तुमने तार क्या छेड़े
पुकार क्या दे दी
सोया गीत जाग उठा...
मेरे सँभलने के पहले ही
उनींदे नयन-पाटल
ऐसे खुले कि
इस मन-मधुबन से
मेरा ही मधुमास लुटा...
आह !
निश्च्छल नेह की प्रतीति ऐसी होगी
तो प्रिय ! मृदु-मिलन की
रास - रीति कैसी होगी ?
ये सोच -सोचकर
बड़ी दुविधा में प्राण है
और दाँव पर तेरा मान है...
घुट-घुट कर विरह अधीर है
भर-भर जाती कैसी यह पीर है ?
अब तो घुमड़कर ह्रदय में ही
रागिनी है कंपकंपाती
अधर तक पहुँच कर भी
लुटी हुई सी लौट जाती..
कहो ! ये कैसी कलियाँ
तुमने बिछाई है सहेज कर
कि नुपुर बन झनक रहा है
शूल प्रतिपल सेज पर...
अपने कसक की बात , बोलो
किससे कहूँ मैं ?
और बिन कहे तो और भी न
रह सकूँ मैं ...
मेरा गीत क्यूँ डगमगा रहा है ?
बंदी- सा क्यूँ अकुला रहा है ?
मौन की भाषा तो अनजान है
बड़ी दुविधा में प्राण है...
प्रिय ! हो सके तो
आज तुम
अपने शब्दों को ही
इन गीतों में भर आने दो
मैं बोझिल बदरिया
मुझे बरबस ही
बहक- बहक कर बरस जाने दो .


Wednesday, September 5, 2012

मेरे होने का ...


मेरे भावों के समंदर में
तरह-तरह की लहरें
तरह-तरह की तरंग है ...

मेरे होने का
यही ढंग है

कभी बांसों-बांस
उछल जाती लहरें
कभी किनारे से लग
चुप हो जाती लहरें
कभी अपने ही तल में जा
छुप जाती लहरें
विपरीत से ही जीवन में
सारा उधम और उमंग है...

मेरे होने का
यही ढंग है

कभी हवाओं की धड़कन पर
थिरक जाती लहरें
कभी बादलों को देख
ललच जाती लहरें
कभी चाँद के छुअन से
सिहर जाती लहरें
सरपट समय जो सरका दे
बस वही मेरे संग है ...

मेरे होने का
यही ढंग है

कभी मुक्त राग में
गुनगुनाती लहरें
कभी पगुराए पत्थरों पर
कमल खिलाती लहरें
कभी मोतीवलियों से ही
सज जाती लहरें
लहर-लहर पर तिरता
पल-पल बदलता रंग है ...

जिसे देखकर
झलझलाया समंदर खुद ही
चकित और दंग है ...

क्या कहूँ ?

मेरे होने का
यही ढंग है .

Saturday, September 1, 2012

ये मधुर अनुहार है...


अब प्रेम की
जैसी भी गली हो
सहसा बढ़ गये हैं
पाँव मेरे...
अब तेरा
पता- ठिकाना
किसी से क्या पूछना ?
बस चलते-चलते
पहुँच जाना है
गाँव तेरे...
पंथ अपरिचित है तो क्या ?
दूरी अपरिमित है तो क्या ?
तुम जानते हो
मेरी वेदना सुकुमार है
और तुमसे ही तो
ये मधुर अनुहार है...
अब तुम चाहे
मुझे आँख दिखाओ
चाहे तो कसमें खिलाओ
पर लौट कर
कहीं न जाऊँगी...
बस
तेरी पलकों की
छबीली छाँव तले
सुध-बुध खोकर
खुद को भी बिसराउंगी .