मेरे रोम-रोम से
तेरा आरव रँभित
रंच मात्र न
कोई रव दूजा हो
हे परमेशानि !
ऐसे तू मुझसे
प्रकट हो कि
मेरा हर कृत्य ही
तेरी पूजा हो !
मेरे आकुल ताप में
तेरी मधुर कल्पना हो
व उद्वेलित मन में
बस प्रिय भावना हो
और विह्वल तिक्तता में भी
तेरी आलंबित धारणा हो ......
कोई क्षुद्रोल्लास ही
जीवन-ध्येय नहीं हो
व कभी उग्राह्लाद
प्राप्य विधेय नहीं हो
और क्षणिक हर्षोल्लाद में
कुछ भी हेय नहीं हो ........
तेरे दुर्लभ योग की
प्रबल अभिलाषा हो
व गरिमान्वित गर्जन से
बँधती हर आशा हो
और तेरे रहस्यों को बस
पीने की उत्कट पिपासा हो .......
हर रुधिर में रंजित
तेरा आलोड़न हो
व श्वास-श्वास में
एक ही आन्दोलन हो
और विभोर तन-मन में
तुझसे दृढ आलिंगन हो .......
तेरी गति-कंपन से
प्राणों में कलरव
कल-कल कर
सुप्तराग सा गूँजा हो
हे परमेशानि !
ऐसे तू मुझसे
प्रकट हो कि
मेरा हर कृत्य ही
तेरी पूजा हो !
तेरा आरव रँभित
रंच मात्र न
कोई रव दूजा हो
हे परमेशानि !
ऐसे तू मुझसे
प्रकट हो कि
मेरा हर कृत्य ही
तेरी पूजा हो !
मेरे आकुल ताप में
तेरी मधुर कल्पना हो
व उद्वेलित मन में
बस प्रिय भावना हो
और विह्वल तिक्तता में भी
तेरी आलंबित धारणा हो ......
कोई क्षुद्रोल्लास ही
जीवन-ध्येय नहीं हो
व कभी उग्राह्लाद
प्राप्य विधेय नहीं हो
और क्षणिक हर्षोल्लाद में
कुछ भी हेय नहीं हो ........
तेरे दुर्लभ योग की
प्रबल अभिलाषा हो
व गरिमान्वित गर्जन से
बँधती हर आशा हो
और तेरे रहस्यों को बस
पीने की उत्कट पिपासा हो .......
हर रुधिर में रंजित
तेरा आलोड़न हो
व श्वास-श्वास में
एक ही आन्दोलन हो
और विभोर तन-मन में
तुझसे दृढ आलिंगन हो .......
तेरी गति-कंपन से
प्राणों में कलरव
कल-कल कर
सुप्तराग सा गूँजा हो
हे परमेशानि !
ऐसे तू मुझसे
प्रकट हो कि
मेरा हर कृत्य ही
तेरी पूजा हो !