यह अंतर्वेदना कैसी है ?
यह अनुताप कैसा है ?
वाणी-विहीन रंध्रों से फूटता
यह आकुल आर्द्र आलाप कैसा है ?
असाध्य क्लेश सा पीर क्यों है ?
नैन-कोर में ठहरा नीर क्यों है ?
अनमनी व्यथा की छटपटाहट
कुछ विरचने को अधीर क्यों है ?
कौन सी इच्छा भाँवरे भर
ऐच्छिक गति से होती मुखर
हत ह्रदय को मड़ोरता हुआ
क्यों टेर देता है कोई स्वर ?
कसकते हूक को शब्दों में कैसे ढालूं ?
या जी को बहलाने को क्या मैं गा लूं ?
बस मेरा वश मुझे ही बता दे
क्या मेरा है जो आज किसी को दे डालूं ?
विह्वल-सा यह वायु क्यों बहता ?
बिंध-बिंधकर मुझको कुछ कहता
गलबहियां दे उसे रोक जो पाती
क्या बैठ पहर भर मुझ संगति करता ?
क्यों कजरा धो-धोकर होता सवेरा ?
क्यों सूरज भी बन जाता है लूटेरा ?
संझा भी झंझा सी रुककर
क्यों करती दग्ध बाहों का घेरा ?
आज अति शोकित धरा-आकाश क्यों है ?
मलिन मुख में क्षितिज भी उदास क्यों है ?
टूटा-सा प्यारा सुख सपना लेकर
सिर टेके बिसुरती आस क्यों है ?
क्यों असंयत हो दहकता है तन-मन ?
क्यों विरह-प्रपीड़ित है ये दृढ आलिंगन ?
तड़प-तड़पकर ही रह जाता है
क्यों विकल अधर युगल का चुम्बन ?
जब लपट ह्रदय से लिपटी हो ऐसे
तो मूढ़ अगन बुझेगी भी कैसे ?
तब जल का आगार भी आक्रान्त होकर
बढ़ाता संताप है निज वड़वानल जैसे.....
तो भी असम्भव सी आकांक्षा भटकती क्यों है ?
निराशाओं के बीच भी अटकती क्यों है ?
शून्य से सुनहरा चित्र खींचकर
शंकित हो उसे ही तकती क्यों है ?
इतनी दारुण दुर्बल अवस्था में
औ' प्रीत की बलबती भावुकता में
क्यों प्राण भी सहज नहीं छूटता
न जाने किस अक्षय विवशता में.....
फिर विवशता की यह अंतर्वेदना कैसी है ?
फिर विवश सा यह अनुताप कैसा है ?
वाणी-विहीन रंध्रों से फूटता
फिर यह विवश आलाप कैसा है ?
यह अनुताप कैसा है ?
वाणी-विहीन रंध्रों से फूटता
यह आकुल आर्द्र आलाप कैसा है ?
असाध्य क्लेश सा पीर क्यों है ?
नैन-कोर में ठहरा नीर क्यों है ?
अनमनी व्यथा की छटपटाहट
कुछ विरचने को अधीर क्यों है ?
कौन सी इच्छा भाँवरे भर
ऐच्छिक गति से होती मुखर
हत ह्रदय को मड़ोरता हुआ
क्यों टेर देता है कोई स्वर ?
कसकते हूक को शब्दों में कैसे ढालूं ?
या जी को बहलाने को क्या मैं गा लूं ?
बस मेरा वश मुझे ही बता दे
क्या मेरा है जो आज किसी को दे डालूं ?
विह्वल-सा यह वायु क्यों बहता ?
बिंध-बिंधकर मुझको कुछ कहता
गलबहियां दे उसे रोक जो पाती
क्या बैठ पहर भर मुझ संगति करता ?
क्यों कजरा धो-धोकर होता सवेरा ?
क्यों सूरज भी बन जाता है लूटेरा ?
संझा भी झंझा सी रुककर
क्यों करती दग्ध बाहों का घेरा ?
आज अति शोकित धरा-आकाश क्यों है ?
मलिन मुख में क्षितिज भी उदास क्यों है ?
टूटा-सा प्यारा सुख सपना लेकर
सिर टेके बिसुरती आस क्यों है ?
क्यों असंयत हो दहकता है तन-मन ?
क्यों विरह-प्रपीड़ित है ये दृढ आलिंगन ?
तड़प-तड़पकर ही रह जाता है
क्यों विकल अधर युगल का चुम्बन ?
जब लपट ह्रदय से लिपटी हो ऐसे
तो मूढ़ अगन बुझेगी भी कैसे ?
तब जल का आगार भी आक्रान्त होकर
बढ़ाता संताप है निज वड़वानल जैसे.....
तो भी असम्भव सी आकांक्षा भटकती क्यों है ?
निराशाओं के बीच भी अटकती क्यों है ?
शून्य से सुनहरा चित्र खींचकर
शंकित हो उसे ही तकती क्यों है ?
इतनी दारुण दुर्बल अवस्था में
औ' प्रीत की बलबती भावुकता में
क्यों प्राण भी सहज नहीं छूटता
न जाने किस अक्षय विवशता में.....
फिर विवशता की यह अंतर्वेदना कैसी है ?
फिर विवश सा यह अनुताप कैसा है ?
वाणी-विहीन रंध्रों से फूटता
फिर यह विवश आलाप कैसा है ?