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Saturday, February 25, 2012

क्षणिकाएँ...

सुबह से ही
खोल - खोलकर
खाली किताबों को 
बोल - बोलकर 
पढ़ती हूँ
और रात ढलने तक 
अदृश्य लिखाई से 
अपने पन्नों पर 
केवल तुम्हें ही 
भरती हूँ .

    ***

मर्म की बात
ओठों से कहूँ 
या कि न कहूँ
तुम ही कहो
कि कैसे मौन की 
शेष भाषा में 
केवल  तुम्हें ही गहूँ .

      ***

कुछ साधारण से 
शब्दों को 
जोड़ - जोड़कर
अपने गीतों में 
केवल तुम्हें ही 
रचा है 
पर मुझ सीपी में 
गिरने को 
वो स्वाति बूंद
अभी भी बचा है .

     ***

मोतियों की 
मंडी में तो
एक से बढ़ एक 
मोती चमक रहे हैं
पर मेरी 
चुंधियाई आँखें 
केवल तुमसे ही 
दमक रहे हैं .

Tuesday, February 21, 2012

साबूत


सूक्ष्म  उलझाव  की  गलियों  में
तन-मन   भटक-भटक जाता है
देख उद्विग्न  जगत का उपद्रव
अपने  को  असहाय  ही  पाता है

असंग भाव  में  बह-बह कर भी
संगी-साथी  हिल-मिल जाते  हैं
प्रेम-विरह  के  शाश्वत क्रीड़ा में
ठिठक-ठिठक , रुक  से  जाते हैं

प्राणों  को  कौंधाने  वाली  पीड़ा
क्यूँ   तड़क -तड़क  तड़पाती  है
सह-सह  के मर्माघात अनवरत
किंतु अभ्यस्त कहाँ  हो पाती है

बस  एक बवंडर बन के  धूल का
आँखों  में  यूँ  घिर-घिर आता है
शांत - शिथिल  हो  जाने पर भी
गहरे चिह्न  कोई  छोड़ जाता है

लहक-लहक   कर  आग  उसे तो
पूरी तरह  राख नहीं  कर पाती है
वह  आकाश तो  उड़  ही जाता है
बस एक  बंद मुट्ठी  रह जाती है

छोर  नाप-नाप  थके  पल -छिन
कभी भी, चैन  तनिक  न पाते हैं
बढ़ ग्लानि से  गलबहियाँ कर के
सिसक-सिसक  के  सिसकाते हैं

कई-कई  पर्तों में  वही  एक घाव
उभर -उभर कर  चला  आता  है
कई पाटों  में  पिस-पिस कर भी
साबूत  का  साबूत  बच जाता है  .



Friday, February 17, 2012

द्यूत- बिसात


मन के
हस्तिनापुर में
हमेशा बिछी रहती है
द्यूत - बिसात ..
तार्किक अड़चनों में
उलझा अर्जुन
चुप है
हारे हुए हर दाँव की
लगती ऊँची बोली पर
और शातिर के
पक्ष में घोषित
शापित परिणाम पर ...
फिर भी
इस द्वन्द-युद्ध में
गांडीव उठाकर
कर रहा है वह
कृष्ण की प्रतीक्षा
जो कहीं मगन है
अपने ही रासलीला में .



द्यूत---जुआ 

Monday, February 13, 2012

उसी ढलान पर ...


फिसलन भरी
हर ढलान पर
बस मुस्कुराते हुए तुम
मेरे अनाड़ी किन्तु
अटल अभिमान पर...
हर रुत में मुझसे
करके बाँहाँ-जोड़ी
हलके से उठाकर
मेरी लटकी ठोड़ी
और माथे को चूमकर
तुम कहते हो - यही प्यार है..
संदेह के परे
बड़ी-बड़ी फैलती
भौचक्क मेरी आँखे
देखती है तुम्हें अपलक
और बिजली की गिरती
हर कौंध में
छिटकती है तुमसे
बस मेरी ही झलक...
तुम्हारी मनमोहक निश्छलता
अचंभित करती दृढ़ता
थामे है मुझे
उस ढलान पर भी
जिसपर फिसल रहा है
समय पर सवार जीवन
व सुख-दुःख का हरक्षण.....
अनायास कई बार
उन्हें लपकने को
बढती है मेरी चपलता
पर हर बार
रोक लेती है मुझे
तुम्हारी तीक्ष्ण सतर्कता...
फिर माथे को चूमकर
कहते हो मुझे - यही प्यार है
उसी ढलान पर .

Wednesday, February 8, 2012

गरीबी - रेखा


गरीबी के अंतिम दुर्भाग्य से
पूरी तरह कुचला हुआ
न जाने किस सपनीली उम्मीद पर
हताशा के आखिरी छोर पर भी
मजबूती से टिका हुआ
लिपटे कफ़न में भी जिन्दा गरीब...
चुटकी भर नमक से भी सस्ती
अपनी जान को चुटकी में दबाये
गरीबी के नशे में लड़खड़ाता हुआ
क्यों दिखता है न हमें आपको हर जगह...
जिनके लिए हमने -आपने तो
बिल्कुल ही नहीं ....तो
कहीं इस काल-कुचक्र ने तो नहीं
जबरन खिंचवा रहा है हमसे -आपसे
वही एक रेखा - गरीबी रेखा......
हाँ ! उसी लक्ष्मण रेखा की तरह
हम-आप बातें करते हैं उसे उठाने की
उठ आते हैं कितने ही भाव चुपके से
हमारे ह्रदय के मरघटी कोने में...
जब निकलता है संवेदना के बोल तो
अपने लिए धन्यवाद ज्ञापन उपरवाले को
उनके लिए दिखाते-भींचे ओठ के पीछे
दबा लेते हैं हम राहत की मुस्कान..
चेहरे पर बनाई गयी चिंता-रेखा पर
गुलाबी सुगंध से फड़कते हमारे नथुने..
उपहासी नजरों से खाई को देखना
पुल बनाने का आडम्बर करना
जिसे अँधेरे में गिरा भी देना
इतना काम कम है क्या
अपनी पीठ थपथपाने के लिए....
साथ ही गरीबी-विमर्श से हम
चालाकी से छुपा लेते हैं उस
मारामारी के प्रतिस्पर्धात्मक डर को
जो रेखा मिटने से हो जाएगा बेकाबू
हाँ ! समय बदल गया है
और समय से ज्यादा हम.....
उस रेखा के उस पार हैं वे गरीब
और इस पार हम आधुनिक रावण जो
हरण सा कुकृत्य भला क्यों करने लगे
बस उन्हें थोड़ा खींच कर
उसी गरीबी रेखा पर खड़ा करके
उन्हें यूँ ही जलते देखे .


एक सवाल खुद से ही---- कि हम गरीबी रेखा बढ़ाने के लिए क्या कर रहे हैं ?
 

Saturday, February 4, 2012

मरिचिजल


क्यों भर आता है
उन्मुग्ध नयन
जब ठहर जाता है
शीतल उच्छ्वास भर
उत्कंठित पवन...
घेर लेती है मुझे
कहीं से आकर  
कोई कोमल किरण...
अचानक से
झिलमिला उठता है
बोझिल मन....
धीरे-धीरे पसरता है वही
कुछ अन्तरंग क्षण
जिसमें
खिल उठते हैं असंख्य
व्यथा - सुमन
चहुँ ओर गूँजने लगता है
करुण - कूजन
ओह !
बड़ा बेचैन हो जाता है मन
और वही
यादें हो जाती हैं
इतनी सघन
कि बहने लगती है
व्याकुल नदियाँ बन
तब दृष्टि-परिधि तक
दिखता है केवल
विरह - वन....
और क्या कहूँ ...?
या कैसे कहूँ....
कि मैं विरक्ता
तुम्हारे होने के
हर मरिचिजल पर
भरने लगती हूँ
विकल - कुलाँचे
निरीह मृगी बन .

Wednesday, February 1, 2012

स्वप्नांत


स्वप्नों ने
क्या खोया ,क्या पाया
अपने रंग-बिरंगापन पर
क्या खूब इतराया..
खुद को खींच-खींच कर
न जाने कितना
अजूबा क्षितिज बनाया..
वही भाग-भाग कर
हैरत भरी नजरों से
उसे देख भी आया..
जब पकड़ना चाहा तो
कभी पास तो कभी
बहुत दूर पाया....
तब शायद
खुद पर खूब पछताया
सर पर हाथ रख
घुटनों में मुँह छिपाकर
दो-चार आँसू भी बहाया
तो कभी उस क्षितिज को
धक्का दे-देकर
दूर कहीं अपने ही किसी
अन्तरिक्ष में फेंक आया...
जिसे फिर वह
स्व्प्नगत ही पाया....
स्वप्नों ने
खुद को जिलाया तो
कितना कुछ गंवाया
और वो जो
कितना कुछ बचाया तो
अंतत: स्वप्नांत ही पाया .

Saturday, January 28, 2012

मनतारा


चिड़ियों  की  चीं-चीं , चन-चन
भ्रमरों  का  है  गुन-गुन , गुंजन
कलियों की  चट-चट , चटकन
मानो  मंजरित हुआ  कण-कण

न  शीत की  वह प्रबल कठोरता
न ही  ग्रीष्म की है  उग्र उष्णता
मद्धम- मद्धम   पवन  है  पगता
मधुर- मधुर  है मलय महकता

मधुऋतु का  फैला है सम्मोहन
मंगल- मँजीरा  बाजे  झन-झन
ताल पर  थिरके  बदरा सा तन
मन-मयूर संग नाचे  छम-छम

प्रकृति  से  मुखरित  हुआ गीत
मदिर- मादक  बिखरा   संगीत
अँगराई  लिए  कह  रही है  प्रीत
स्वर साधो , मनतारा  छेड़े मीत .

Tuesday, January 24, 2012

जानती हूँ...


बन कर मेरी छाया तुमने
अनुराग से दुलराना चाहा
पर उलझा सा बाबरा मन
तुम्हें कहाँ समझ पाया...
भूल मेरी ही है जो
अपना इक जाल बनाया है
तुम्हीं से खिले फूल को
तुमसे ही छुपाया है.....
चाहती तो हूँ कि प्रिय !
तुम्हारे अन्त:करण की तेज़ से
अपनी ही प्रतिमा उकेर लूँ
गहरी धुंध के इस बाँध को
झटके में बिखेर दूँ ....
साहस जगे तो स्वीकार करूँ
और तेरी धारा में बह चलूँ ...
हाँ ! तुमने तो
भरना चाहा झोली मेरी
पर रह गयी मैं कोरी की कोरी
कैसा भराव हुआ है... प्रिय !
खाली-खाली रह गया है कहीं..
स्तब्ध ह्रदय में जब झाँका है
तब निज दुर्बलता को आँका है..
उजियारे में नैन मूंदकर
कौतुक भरा बाल-क्षण जीकर
रह-रह कर आँख डबडबाया है
जानती हूँ...
अनमोल सा इस जीवन में
कैसे अपना मोल घटाया है .


Friday, January 20, 2012

फरमा

एक ही फरमा में
भली-भांति कसकर
कितनी कुशलता से
सभी सम्पादित करते हैं
दैनंदिन दैनिक-चर्या
सेंटीमीटर , इंच से
नाप - नाप कर..
कांटा - बटखरा से
तौल - तौल कर..
रात को शुभरात्रि
कहने से पहले ही
करते हैं हिसाब-किताब
नफ़ा - नुकसान का
वही चित्रगुप्त वाला
बही-खाता पर
वही-वही लेखा-जोखा....
भावी योजना पर विचार
ज़रूरी फेर - बदल
कुछ ठोस उपाय
कुछ तय - तमन्ना
कल को और
बेहतर बनाने का....
आँख लगने के पहले ही
आँख खुलने के बाद के
कार्यक्रम को तय करना...
वाह रे ! माडर्न युगीन
मशीनी मानव
फिर -फिर
खुद को ही
फ़रमान जारी करते रहो
उसी फिक्स फरमा में
फिर से फ़िट होने का .

Tuesday, January 17, 2012

मान


मन की मजबूरियों की
क्या कीमत लगाओगे
या बात-बात पर
नपे-तुले व्यावहारिकता की
चादर ओढाओगे...
ध्रुवों पर कील गाड़कर
आस्था-विश्वास को
बाँध आओगे और
उन्हें जोड़ने के लिए
कच्चा-पक्का पुल बनाओगे
फिर आग्रहों का सहारा लेकर
भारी पाँव को घसीटोगे
तो सारी जुगत भीड़ जायेगी
खुद को बचाते हुए
मुझ तक आने में ही...
जैसे-तैसे आ तो जाओगे
पर सोच लो क्या दोगे
रास्ते का जोखिम भरा ब्योरा
या जुगत का दांव-पेंच
या फिर उसी चादर की
देने लगोगे दुहाई पर दुहाई..
जबकि मैं उसी ध्रुव पर
हर चादर उताड़े खड़ी हूँ
हर कीमत या जुगत को
आग्रहों के अलाव में झोंक कर
बस थोड़ी सी गर्मी के लिए...
जो थोड़ी सी गर्मी
तुम्हारी गर्म साँसों की
और तुम्हारी नर्म बाहों की मिले
तो सदियों तक यूँ ही
यहीं खड़ी रहूँगी
क्योंकि मैंने
मान दिया है
मन की मजबूरियों को
और जान लिया है तुम्हें .

Saturday, January 14, 2012

हैया-हो ...


हर तूफान  से जीत जाना है
हैया-हो  ,  हैया-हो  गाना  है

नहीं गिरने में  क्या  सौरभ
गिर कर  उठने  में है गौरव
जितना  आये  बाधा  रौरव
ललकारे हैया-हो का आरव

विकराल  सा भँवर  का  डर
घेरता   रहे  कहीं  से आकर
जीतना  है  उन से  लड़ कर
हैया-हो  , हैया-हो   गा  कर

लहरों में  बस उतर  आना है
तूफानों के  बीच में  जाना है
सदा  पतवार  को चलाना है
हैया-हो ,  हैया-हो   गाना  है

किनारे पर  है सूखा सौन्दर्य
निर्जीव शांति,निष्क्रिय धैर्य
लहरों से  खेलने  में  है शौर्य
तब  हैया-हो  देता है  ऐश्वर्य

जिसे लहरों में उतरना  आता
उस साहस से सब  है  थर्राता
लहरों  के पार  वही  है  जाता
और झूम के हैया-हो है गाता

हर तूफान  से  जीत जाना है
हैया-हो ,  हैया-हो   गाना   है .



रौरव - भयंकर
आरव - तीव्र ध्वनि



Tuesday, January 10, 2012

नकेल


अतृप्त अतीत ने
परिचय बताने से
क्या इनकार किया
कि भारग्रस्त भविष्य भी
पाला बदल कर हो लिया
अतीत के साथ ...
पहले रंग के पहले का
व सातवें रंग के बाद के रंग को
मिल गया सुनहरा मौका
चाँदी काटने का और
चहक कर भर लिया है
अपने अँधेरे आलिंगन में
इस आज को...
स्पर्श इन्द्रियाँ फड़फड़ा रही है
अपने ही दीवारों के अन्दर..
वीरानी पलकों में ही
सपनों के दर्प टूट रहे हैं..
यादों के हिमखंड भी
हिमरेखा पर पिघल रहे हैं...
सांसों के गाँव में
मरघट सा सन्नाटा है..
संबंधों-अनुबंधों के बीच
स्मृति-धागा टूट सा गया है..
भरे बाज़ार ने खोटे सिक्के को
संदेह की नजरों में घेर लिया है..
जिसे देखकर
उदासी की छाँव भी चुपचाप
अपने में सिमट गयी है..
उफ्फ़ ! मुश्किल हो रहा है
व्यर्थता के बोध को संभालना..
अब क्या करना चाहिए...?
चलो समेटा जाए
सुन्दर भ्रांतियों के सूक्ष्म संवेगों को...
बस मिल तो जाए
ये खोया हुआ ' आज '
तो अतीत-भविष्य को
धोबी-पाट लगा ही देना है
उनका नकेल कसकर
अपने हाथ में करके उन्हें
बस अपने हिसाब से चलाना है .


Saturday, January 7, 2012

तरंगों में...


मेरे आशा के अनुरूप
सुलझाया तुमने
आपस में उलझे
मेरे अव्यक्त विचारों को
न चाह कर भी
उलझ रहे हैं उन्हीं में
मेरे अहसास...
अब न जाने क्यूँ
मौन होकर तुम
सुलझाना चाहते हो मुझे
जबकि उसे भरते-भरते
और भी मैं
उलझ ही रही हूँ...
अभिव्यक्ति दो तो
परिणति चाहता
वो परितप्त विचार
मुक्त हो सके
उन्मुक्त गगन में...
मौन तो होना ही है
चाहे सो जाए
चाँद की गोद में
या छू ले
उस दहकते सूरज को...
पर प्रिय !
रोक सकते हो तो रोक लो
उन तरंगो को
जो तुमसे निकल कर
आती है मुझतक...
तुम मुझे
अपने तरंगो में
इसतरह उलझा कर
कितना सुलझाओगे
या मुझसे भी
निकलती तरंगो में
तुम भी
मेरी तरह ही
उलझ जाओगे..?

Tuesday, January 3, 2012

कर्फ्यु


मेरे मन के
शांत संसार में
कुछ असामाजिक
विचारों ने अनायास
कर दिया है
बम - धमाका
पुनर्शान्ति के लिए
लगा दिया है
मैंने भी कर्फ्यु..
पर कविता तो
छूट गयी है
उन्हीं विचारों के
अभेद्य दुर्ग में..
न जाने कैसे
लुट-पीट रही होगी
और उसे
बचाने के लिए
रोक रही हूँ
मैं भी कलम .

Saturday, December 31, 2011

स्वर्ण दिन आये क्या , लो गये ...


तिथियों को कई रूप में  ढल जाते  देखा
क्षण को अगले क्षण में धँस  जाते  देखा
दुःख को घर में ही एक घर  बनाते देखा
सुख को बस क्षितिज सा  लहराते  देखा

   जाग्रत स्मृतिओं में  सब  सो गये
   स्वर्ण दिन  आये  क्या  ,  लो गये

हरे-हरे  पत्ते  झटके में यूँ  झड़  जाते  हैं
खिले सुन्दर फुल  भी  यहाँ  मुरझाते  हैं
तरु-कंकाल तो  मिटने से  भय खाते  हैं
बिन  हवा  के  ही  घोंसले उजड़ जाते  हैं

   अनऋतु में भी रुत सारे बदल गये
   स्वर्ण दिन  आये   क्या  ,  लो गये

झूठ को  बैसाखियों से  दौड़  लगाते देखा
सच के खँडहर को यूँ  ही  भरभराते देखा
पंछीमन को तो जाल में  फँस जाते देखा
और जाल लिए दूर कहीं  उड़ जाते  देखा

   जो नहीं हैं हाय !  हम वही हो गये
   स्वर्ण दिन  आये  क्या  ,  लो गये

काल के अजनबी भँवर  जब पड़  जाते हैं
कई-कई शिखर अनजीते  ही रह  जाते हैं
पाँव तले  हर  पड़ाव भी  खिसक  जाते हैं
और  हार को  हार बना  गले  लटकाते  हैं

   पानी देखते ही वाह! प्यास हो गये
   स्वर्ण दिन  आये  क्या  ,   लो गये .






Tuesday, December 27, 2011

मीठा-मीठा

जमाने से जमा
जमाने भर की
शिकवा - शिकायतों को
बड़ी सी गठरी में डाल
जोरदार गाँठ लगा
पीठ पर लादकर
जमाने से जमा
सारी खीज और झल्लाहटों को
पीसकर भांग सा गोली बना
झटके में हलक से उताड़ने पर
धीरे-धीरे चढ़ता है जो सुरूर
फुर्र हो जाता है सारा ग़रूर
अपने ही पिंजरे को तोड़
कोई उड़ जाता है
आसमानी जहाँ में पहुँच
आसमान सा हो जाता है
बादलों पर बैठ कर
हवा संग बलखाता है
कौंधते बिजली को पकड़
चाँद को मुँह चिढ़ाता है
लाख मना के बावजूद
अजीब सा दाढ़ी - मूँछ
उसके मुँह पर बनाता है
ऊँघते हुए सूरज के
सातों घोड़े की पूंछ में
जलता पटाखा बाँध आता है
बिखरे सितारों को भी
एक कतार में खड़ा कर
थोड़ा वर्जिश करवाता है
ओह ! वह चुहलबाज़
दम भर सबके
नाक में दम कर देता है
इसी भागा-दौड़ी में
पीठ पर लदी गठरी भी
कहीं गिर जाती है
सारी खीज और झल्लाहट
मीठी-मीठी शरारत में
बदल जाती है
और जमाने भर से
जमाने भर के लिए
दबा कर रखा हुआ
कुछ मीठा-मीठा सा
उभर आता है .
 
  
  

Saturday, December 24, 2011

पहुनाई


घुमता हुआ चाक
ठहरी    है   कील
बौराया सा वर्तुल
नापे    है     मील
इतरा -इतरा कर
बहके    है  नागर
माटी  का पुतला
है  राज़  उजागर
कंचन  की   बेड़ी
सपनों की झाँकी
आँसू  की लड़ियाँ
पाँसी   में   पाँखी
भर आये  मनवा
उलाहना के बोल
फूट     न     पाए
बूझे   तब    मोल
बिन   बताये   ही
जो  हाँक   लगाई
दुविधा में पथिक
क्षण  की पहुनाई
न - नुकुर     करे
भंग   होवे   शील
घूम    रहा   चाक
ठहरी    है    कील .



Wednesday, December 21, 2011

झणत्कार


कभी वो करीब से गुजर गया
कभी वह और करीब हो गयी
कभी वो छेड़ गया आहिस्ते से
कभी वह भी चिढ़ा गयी उसे
कभी वो सिहरा गया प्यार से
कभी वह गुदगुदा गयी उसे
कभी वो भर लिया बाँहों में
कभी वह फिसल गयी उससे
कभी वो बना गया उसे नया
कभी वह निखर गयी उससे
कभी वो छलक गया उससे
कभी वह छिप गयी उसी में
कभी वो बह गया उससे
कभी वह समा गयी उसमें
कभी वो रच दिया उसको
कभी वह हवा सी हो गयी
यूँ ही अनवरत चलता रहता है
उनका प्रणय- सृजन और
जन्म लेती हैं कवितायें
मैं तो तन्मय हुई जाती हूँ
शब्द और चेतना के बीच
इस अद्भुत समागम में
और केवल पहनाती रहती हूँ
कविताओं के पाँव में पायल
झनक-मनक करती हुई वह
जिस ह्रदय तक पहुँचती है
अपनी निरी झणत्कार से
क्षण भर के लिए ही सही
उसे झंकृत कर जाती है .


Friday, December 16, 2011

मिट्टी की सेज

नहीं चाहा कभी
मिट्टी की सेज पर बिछना
और मिट्टी हो जाना
बस गंधी से कुछ गंध
उधार लेकर
भर दिया कल्पनाओं में
कर दिया हवा के हवाले
नहीं पता था कि
पंख समेट कर हवा भी
चल देगी अपने रस्ते
मिट्टी पर गिरकर वो
गंध जायेगी उसी गंध में....
वही भभका देगा
फूल बनने के स्वांग को और
कन्नी काटकर निकल लेंगे
भंवरे , तितलियाँ ....
बैठकखाने के सजावट को भी
खिल्ली उड़ाने का
मिलेगा मौका भरपूर...
नहीं पता था कि
मिट्टी में गड़कर
मरना होता है , सड़ना होता है
फूटती हैं तब कोंपले
चाहतों का क्या
बस चाहना काम है...
अभी भी बस
भनक ही लगी है कानों को
पता चलते - चलते
पतझड़ में तो
जरुर मिलना होगा उससे..
अभी दिख रहा है
भागता हुआ बसंत
पतझड़ के पीछे...
कल्पनाओं में ही खिले रहे
अमरबेलों पर फूल
न मुरझाने वाला
गंधी को उधार लौटाने का
जी नहीं कर रहा है ... 
हाँ , नहीं बिछना चाहती हूँ
मिट्टी की सेज पर
नहीं होना चाहती हूँ मिट्टी
खुद से जो प्यार हो गया है .