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Sunday, July 28, 2013

चुपचाप ही सही ....




आँधियाँ तो चल रही है
चुपचाप ही सही
बोझिल-सी , डगमगाती-सी
बिना सन सन सन के
तुम्हारे ही बंद दिशाओं में...

प्राणों में पुंजित पीर है
नयन में नेही नीर है
हिम-दंश सहता ये ह्रदय-हवि
अभी तक जमा नहीं है
साँसों का गीत भी थमा नहीं है...
जो तुम्हारे सागर पर
उत्पीड़ित धूप-सा जलता रहेगा
अपने काँधे पर तुम जाल फैलाए रहो
तो भी तुम्हारे सतह पर पिघलता रहेगा....

आँधियाँ कल जो इधर आ रही थी
अब भी उड़ती है , फड़फड़ाती है
तुम्हारे ही बंद आकाश में
कबतक रोके रहोगे उसे प्रस्तर-पाश में ?

चाहो तो मना कर दो
उन पत्तियों को कि चुटकियाँ न बजाये
उन डालियों को कि चुटकियाँ न ले
और उन तरु-वृंदों को कि चुटकियों में न उड़ाये
आँधियों के इंगित को
इंगित के उन अंत:स्वर को
जो मन्त्र-भेद करता है ...

आँधियाँ है बहती रहेंगी
चुपचाप ही सही
तुम्हारा दिया पीर भी सहती रहेंगी
चुपचाप ही सही
जिसकी पड़पड़ाहट सुन कर
चिड़ियों से चुक-चुक , चिक-चिक चहकेंगी ही
उन मुरझाई कलियों से
किलक कर कुसुमावलि फूटेंगी ही....

तुम लाख उन्हें रोकने की ठानो
या उनके इंगित को मानो न मानो
पर चुपचाप ही सही
आँधियों का धर्म ही है बहना
जो जानती नहीं है कभी थमना...

यदि थम गयी तो स्वयं ही हाँफने लगेंगी
और उस अंतगति की उपकल्पना मात्र से ही
ये पूरी सृष्टि कलप कर काँपने लगेगी .



Tuesday, July 23, 2013

सावन है आया अब चले आओ ....





                   आज कोई भी बहाना न बनाओ
                   पुकारा है तुम्हें, अब चले आओ

                     तप्त सूरज  सागर में समाये
                     गो-रज से गोधूलि डगमगाए
                     एक दूरी से विहग लौट आये
                    दीप भी देहरी पे निकल आये

                    जब विकल नेह है अनुराग है
                   क्यों शलभ से विमुख आग है ?

                   आज तारों में भी कुछ तनी है
                    चाँद की किस से यूँ ठनी है ?
                    न बादलों की बात ही बनी है
                   नदियाँ भी चलती अनमनी है

                    जब अपने राह चलती चाह है
                    क्यों भ्रम में भटकती आह है ?

                   बैरिन बिंदिया भी विरहन गाये
                    सुन , चूड़ियाँ भी चुप्पी लगाए
                    मेंहदी पर न  वह रंग ही आये
                    आंसू में ही  महावर धुल जाए

                  जब प्राण से प्राण मोल है लिया
                  क्यों यह व्यथा  अनमोल दिया ?

                   साँसें सिमटी जाती सुनसान में
                   धड़कन धूल-सी उड़ी वितान में
                   ह्रदय कुछ कहता है यूँ कान में
                   आँखें घूम जाती है अनजान में

                  जब आस पर ही तो विश्वास है
                  क्यों चातक से  चूकी प्यास है ?

                  अब मेघ घिर रहे हैं  चले आओ
                  फूल खिल भर रहे हैं चले आओ
                  सब झूले तन गये हैं चले आओ
                  देखो!सावन है आया चले आओ

                  जब विवश-सा नेह है अनुराग है
                   तो मिलन से ही बुझती आग है

                  पुकारा है तुम्हें, अब चले आओ
                  आज कोई भी बहाना न बनाओ .



Saturday, July 20, 2013

निद्रा है टूटेगी ....

                   

                    निद्रा है टूटेगी , तीव्र घात करो
                    कोमल अंगों पर वज्राघात करो

                    पर उससे पहले तुम तो जागो
                   ऐसे कंबल ओढ़ कर मत भागो

                     जब चारो ओर आग लगी है
                    आलोड़नों से हर प्राण ठगी है

                    झकोरों की चपेटें हैं घनघोर
                    खोजो! उसी में छिपा है भोर

                 उस भोर से चिनगियाँ छिटकाओ
                  हर बुझी मशाल को फिर जलाओ

                   जब बुझी मशाल पुन: जलती है
                  तब रुढियों की हड्डियां गलती है

                अंधविश्वास भस्मासुर बन जाता है
                 स्वयं अपनी आँच में जल जाता है

                किया जा सकता है तभी बहुत कुछ
                 यहीं तय करो तुम अभी सब कुछ

                आशा-ही-आशा में ओंठ न सुखाओ
               कमजोरी कुचल कर अलख जगाओ

                समय की शंकाओं पर विवाद करो
                 समाधान सोच कर नव नाद करो

                 स्व उत्थान से ही नवयुग आता है
                 औ' कल्पित स्वर्ग सच हो जाता है

                   निद्रा है टूटेगी , तीव्र घात करो
                   कोमल अंगों पर वज्राघात करो .

Wednesday, July 17, 2013

मिड डे मील से बच्चों की मौत पर ....

ओ ! आसमान के रखवाले
तुम्हारे मौसम तक
जमीन को किया है
तुम्हारे ईमान के हवाले...

चाहे तो तू
जमीन का खून पी ले
या उसे पूरा ही खा ले
पर उनकी बददुआ
तुम तक ही जायेगी
और तुम्हें जब
जख्म मिलेगा तो
कोई भी मरहम-पट्टी
तुम्हारे काम न आएगी....

थोड़ी शर्म कर !
अपनी जमीर की सुन !
इन्सानियत के नाते ही सही
तू उनकी बददुआ ना ले...

याद रख !
जमीन जब फटेगी तो
तुझे ही निगल जायेगी
तब उस खिचड़ी की याद
तुम्हें बहुत रूलायेगी
जिससे ललचाकर
तुम आसमान बन जाते हो
और भरे मौसम में भी
जमीन पर सिर्फ
सूखा ही उगाते हो....

ऐसी पढ़ाई से तो
वो अनपढ़ भला
जो खिचड़ी न खा कर
अपने घास-पात पर है पला...

अब जाओ !
उन सूनी गोद को
कुछ मुआवजा से भर दो
अगले मौसम की भी
तैयारी करनी है तो
हर लाश पर
एक झाड़ूमार नौकरी के साथ
खून टपकाता हुआ
एक घर दो .

Sunday, July 14, 2013

मैं भी........


तुम कुछ भी कहो या करो
मैंने अबतक बस इतना ही जाना है
कि अस्तित्व के दो छोर हैं हम
और तुम मुझे लुढ़का रहे हो
किसी ऐसे ढ़लान पर
जो कि अनजाना है....

हो न हो कहीं किसी घाटी तले
तुम्हारा ही कोई ठीकाना हो
जहाँ ले जाकर मुझे
मेरा ही शिखर दिखाना हो
ये मानकर मैं कितना भरूँ खुद को ?

मैं भी जानती हूँ कि
मेरा कितना ही खाली खाना है
हो सकता है कि
ये लालायित लालित्य का
कोई लोकातीत ताना-बना हो
पर ऐसे अतृप्त अदेखा सच को
मैंने अबतक नहीं माना है...

इसलिए रहने दो
अपने स्वर्गीय स्नेहित स्पर्शन को
रहने दो सारी दिव्य दृप्त दर्शन को
जो मेरी इस छोटी सी समझ से बाहर है..

मैं भी बस अपनी कहना चाहती हूँ
कि मेरे लिए तो प्रिय है
चौंधियाया हुआ सुखों का आकर्षण
मर्त्य इच्छाओं का घनिष्ठ घर्षण
और उससे उत्पन्न दुःख-ताल के
उन्माद की गतियों के बीच
मैं भी झूमकर नाचना चाहती हूँ...

ह्रदय पर हथौड़े सी पड़ती
हर चोटों पर मुस्कुराना चाहती हूँ...
हर छलनामय क्षितिज के छंदों पर
छुनन-मुनन कर गुनगुनाना चाहती हूँ
और आखिरी साँस तक
बिना रुके पन्ने-पन्ने पर खुद को
लिख जाना चाहती हूँ ....

और तुम !
तुम्हें तो अविचिलित रहना है - रहो
मेरे आवेग और आक्रोश को
निरावृत निर्वात में
निखारते रहना है - निखारो
पर मैं भी
नश्वरता और संघर्ष के क्लेशों के बीच
तुम्हारी तरह ही अविचिलित रहूँगी .


Tuesday, July 9, 2013

सुमन-शय्या और मालपुआ...

'' सुमन-शय्या पर लेटे-लेटे
मालपुआ चाभने वालों के
श्री मुख से केवल
मेवा-मिष्ठान ही झड़ता है ''
भला बताइए तो
इसकी व्याख्या का प्रसंग निर्देश
अनिवार्य अंग है या नहीं ?
साथ ही इसके कार्य-कारण का
पुर्न-पुर्न व्याख्या करने हेतु
हममें-आपमें अब भी वो उमंग है या नहीं?

ये प्रश्न हमें हर प्रसंग में
स्वयं से करते रहना चाहिए
व सत्य से विमुख हुए बिना
स्वीकार भी करते रहना चाहिए कि
हमसे-आपसे समीक्षित
संदर्भगत संक्षिप्त भूमिका भी
उसके मूलभाव से कोसों दूर रहती है
और हम देखते रहते हैं कि
हमारी बेबस व्याख्या
सुमन-शय्या और मालपुए के
व्यूह में ही कैसे उलझती है ....

तब तो बस यही कहा जा सकता है कि
अपने कर्मक्षेत्र में बिन वंशी के हम
ता-ता थय्या करने वाले क्या जाने
वो सुमन-शय्या कैसे सजता है ?
और सिर के ऊपर बहते अभाव में
बस कलम चला-चला कर क्या माने
कि वो मालपुआ कैसा दिखता है ?

आइये ! हम इन बड़ी-बड़ी बातों में
अपने लिए छोटी बात छाँट लेते हैं
मज़बूरी का नाम कहीं शब्द न हो जाए
इसलिए ये छोटी बात यूँ ही बाँट लेते हैं-
कि हम अपना पसीना भी उनपर बहाए
और शब्दों को भी उनके लिए बरगलाये
पर वे खूब फले-फूले
व अपने आस-पास को भी फुलाए ...
अब तो हमें भी कुछ तय करना चाहिए
कि अपना शब्द किसपर खर्चना चाहिए ?

वैसे भी इस खण्डन-मण्डन से
उनका तो कुछ बिगड़ता नहीं है
और हमपर भी छप्पड़ फाड़ कर
सुमन-शय्या और मालपुआ बरसता नहीं है...
हाँ! आप अपनी जाने
कि आपके अन्दर क्या-क्या चलता है
पर उन सुमन-शय्या और मालपुए को
सोच-सोच कर मेरे मुँह में तो
इस किल्लती-युग में भी
दस-बीस गैलन पानी आ भरता है .

 
 

Sunday, June 30, 2013

आने वाला युग पढेगा हमें...

आने वाला युग भी पढ़ता रहेगा हमें
जैसा कि अबतक पढ़ते आ रहे हैं हम
प्रकारान्तर में हर पिछले युग को
या तो विरोधों पर आपत्तिजनक विरोध दर्ज करके
या फिर एक जटिल साम्य की खोज करके

उन अनपढ़ी लिपियों पर चिपके हुए
भुरभुरे भावाश्मों को खुरच-खुरच कर
एक संकीर्ण शोध की सतत प्रक्रिया से
अपने व्याख्यायों के परिणाम को
अपने ही तर्कों से प्रमाणित करते हुए
या फिर वतानुकूलीय विभिन्नताओं में पैदा होते
अनचीन्हे जीवाणुओं-विषाणुओं से उत्पन्न
प्रतिलिपियों के सूक्ष्म संक्रमण के
वस्तुनिष्ठ तथ्यों को यथासंभव प्रस्तुत करके
या फिर सांस्कृतिक गरिमा के प्रति
बहुआयामी भावनाओं को स्फुरित करने वाले
नई लिपियों के प्रतिरोधक तंत्रों को
अपनी गली उँगलियों पर ही सही
समय की स्याही से ठप्पा लगाते हुए

आने वाला युग भी पढ़ता रहेगा हमें
जैसा कि अबतक पढ़ते आ रहे हैं हम
एक विश्लेष्णात्मक औपचारिकता का निर्वाह करके
अनुकरण-पुनरावृत्तियों में घुले लवणों को
अपने बौद्धिकीय चुम्बक से सटाते हुए
संभवत: कुछ दूर तक ही सही
समकालीन नैतिकता को नई परिभाषा मिले
या फिर नियति के त्रासदी को कोई
प्रमाणिक हस्ताक्षर ही मिल जाए
और बुढ़ाई खांसियों का इतिहास
अपने गले के खरास से निजात पाए
व यहाँ-वहाँ फेंके अपने बलगम पर
सूखे हुए खून के धब्बों की गवाही में
हर अगला युग को वैसे ही खड़ा पाए
जैसे कि आज हम खड़े हैं .



Saturday, June 22, 2013

हे महाकाल !

ताण्डवमत्त हे महाकाल !
प्रत्येक शिरा को
चकित-कम्पित करता हुआ
तेरा ये कैसा अट्टहास है?
कि शत-शत योजनों तक
हिम पिघल कर तेरे चरणों पर ही
ऐसे लोट रहा है
देखो तो ! विध्वंस का उद्दाम लीला
हर व्याकुल-व्यथित ह्रदय को
स्मरण मात्र से ही कैसे कचोट रहा है....
तुम्हारा दिया ये घोर दु:ख
तुम्हारे ही प्रसन्न मुख को
इसतरह से क्लांत कर रहा है
कि प्रत्यक्ष महाविनाश
तेरे अप्रत्यक्ष महासृजन को ही
रौंदता- सा दिख रहा है
और समस्त अग-जग को
बड़ी वेदना में भरकर
तुमसे ही पूछने के लिए
विवश भी कर रहा है कि
तेरा ये कैसा उद्दत पौरुषबल है ?
जो अपने ही आश्रितों से ऐसा
अवांछनीय व्यवहार करता है....
क्यों निर्मम , निर्मोही-सा
क्षण भर में ही सबको
जिसतरह से नष्ट कर देता है कि
ठठरी कांपती रह जाती है
त्राहि-त्राहि करती रह जाती है....
एक तरफ तुम्हार कठोर चित्त
दूसरी तरफ सम्पूर्ण चराचर सृष्टि का
केवल उद्भव और विनाश के लिए ही
विवशता और बाध्यता....
ओ!अँधेरी गुफा में भी पथ दिखाने वाले
फिर तू ही ऐसा अन्धेरा क्यों करता है ?
रुको महाकाल !
क्षण भर के लिए ही रुको!
कातर भाव की पुकार सुनो!
अपने उन्मत्त शक्ति को सहज गति दो!
उस गति के अनुरूप ही सबको मति दो!
रक्षा करो! रक्षा करो!
हे महाकाल !
तुम्हारा जो प्रसन्न मुख है
उसी के अनुग्रह द्वारा
सबकी रक्षा करो !


  

Saturday, June 15, 2013

इसलिए मैं रुकी हूँ ...

इसलिए मैं रुकी हूँ
कि मुझे तेल से पोसा हुआ
एक मजबूत डंडा चाहिए
और शोर-विहीन
बड़ा सा डंका चाहिए...
अपना हुनर तो दिखा ही दूंगी
व बड़े-बड़े महारथियों को
धकिया कर धूल चटा ही दूंगी..
हाँ! अपनी हिम्मत को बटोरने में
बस थोड़ी हिम्मत ही जुटानी है
फिर तो
अपना और अपने बाप का
टैक्स चोरी करने के लिए
किसी से कुछ पूछना थोड़े ही है
इसके लिए अपने को
कोई कच्चा-पक्का सा
आश्वासन ही तो देना है
और दुनिया को दिखाने के लिए
किसी भी नकली कार्ड पर
लम्बी लाईन में लगकर
सड़ा हुआ राशन ही तो लेना है.....
साथ ही उन आयकर वालों को
भुना हुआ चना बनाकर चबाना है
और किसी विशेष श्रेणी की
सारी सुविधाओं को कैसे भी जुटा कर
अपना एक सुरक्षा घेरा बनाना है
ताकि मैं दम भर चोरी कर सकूँ
सबके हिस्से का भी मजा लूट सकूँ....
दिल की कहूँ तो
विशुद्ध ईमानदारी भी तो कोई चीज़ है
इसलिए एक-दूसरे को
उस कटघरे से भी बचाना है
फिर तो हमारी तिजोरी देखकर
सब ज्यादा से ज्यादा यही कहेंगे कि
अपने सीधे किये आँगन में
हम खूबसूरत पैर वाले
ठुमकते-मटकते मोर हैं
और हमें भी अपना सच कहने में
कोई शर्म नहीं है कि
अब अपने हयादार हमाम में
हम सब वैसे नंगे तो नहीं हैं
पर चिलमन पर चिलमन चढ़ाकर
खुले चरागार में चरते हुए
बड़े ही चालाक चोर हैं .


Monday, June 10, 2013

ऐसी की तैसी ....




उनकी प्रवीणता ही ऐसी है कि
जहाँ काँटा न भी हो
वहाँ भी तकनीक को घुसाकर
ऐसे गड़ा देते हैं कि
पैर तो आपस में उलझते ही हैं
साथ में अंग-प्रत्यंग भी
बहिष्कार का कोमल हथियार
हवा में यूँ ही लहरा लेते हैं

मुद्दे की तो ऐसी की तैसी
ये बहस ही है तो फिर सार्थक कैसी ?

उनकी कुशलता ही ऐसी है कि
मेजों-कुर्सियों को ऐसे सरका देते हैं
कि भारी बहुमत देखकर ही
कथ्य-प्रयोजन भी चुप्पी लगा जाते हैं
फिर तो अगल-बगल के सब
आत्मबलिदानी-सा आगे बढ़कर
अपने माथे पर कलंक-टीका
बड़े गर्व से सजा लेते हैं

विरोधों के नक्कारखाने की ऐसी की तैसी
जहाँ जूता-जूती हो वहाँ तूती कैसी ?

उनकी सफलता ही ऐसी है कि
मजाक में भी बेमेल तालमेल
मिल-बैठकर बिठा लेते हैं
और मजबूती से खड़े ढाँचे से
अपने हिसाब से ईंटों को खिसका देते हैं
जब बेचारी बेबस बुनियाद
बुबकार मारती है तो
नकली चाँद से भी बहला लेते हैं

बन्दरबाँट नियत की ऐसी की तैसी
फिर तो नक्कालों से उम्मीद ही कैसी ?

उनकी सरलता ही ऐसी है कि
संतगिरी के जूसी जुमले से भी
जेबकतरों को सहला देते हैं
जब गिट-पिट हद तोड़ने लगती है तो
जुलाब की गोलियाँ भी खुद ही
चुपके से चबा ऐसे लेते हैं
फिर तो गाली-गुफ़्ता थोक में मिले
या कि मिलती रहे तालियाँ
सबको ही ठिकाने लगा आते हैं

उन जीती मक्खी खाने वालों की ऐसी की तैसी
और उनके लिए तो ये है बस चंडूखाने की गप जैसी .



Wednesday, June 5, 2013

वह प्रसून-प्रसूता है ...




वह अकेली है
छबीली है
निगरी है
निबौरी है
जितनी कोमल
उतनी जटिल
जितनी सहज
उतनी कुटिल
तरल-सी है
पर जमी हुई
पिघला कर
बहा देती है
अपने किनारे
लगा लेती है
निचुड़ कर
निचोड़ लेती है
शब्द-सिन्धु में
अक्षर-हंस सा
छोड़ देती है...

वह अकेली है
हठीली है
निहत्थी है
निरंकुश है
विरोधी यथार्थ का
प्रतिरोध करती है
जोखिम उठाकर
शिकार बनाती है
मुटभेड़ से
कोहराम मचाती है
घमासान का
घाव सहलाती है
विवशताओं के बीच
जगह बनाती है
असहमत होकर
उम्मीद जगाती है
व्यवहार-आग्रह से
नया छंद खोजती है
घोर असंतोष में
संतोष-गीत गाती है
नितांत बंजर पर
अमरबेल उगाती है...

वह अकेली है
उर्वीली है
नियोगी है
निरति है
हर चिंता की
वह चुनौती है
हारे मन की
वह मनौती है
पर काँटों के लिए
वह करौती है
वह प्रसून-प्रसूता है
हाँ! वह कविता है .

Saturday, June 1, 2013

अँगारा को जगाना है ...




निरे पत्थर नहीं हो तुम
अतगत अचल , निष्ठुर , कठोर
आँखें मूंदे रहो , युग बीतता रहे
किसी सिद्धि की प्रतीक्षा में
या किसी पुक्कस पुजारी की दया-दृष्टि
तुम पर ऐसे पड़े कि तुम सहज ही
अवगति को उपलब्ध हो जाओ
और उसके ओट में अपने खोट का
खुलेआम बोली लगाओ
फिर उसके बाजारू वरदान से
उसके मंदिरों की शोभा बढ़ाओ
ताकि पत्थर ह्रदय जरूर खींचे आयें
फूलों से तुम्हें ही चोट दे जाए

या तुम वो पत्थर भी नहीं हो
जो अपना भविष्य , प्रतिभा और शक्ति लिए
किसी के चरण पर लोट जाए
उसकी अवांछित ठोकर से बस चोट खाए
वह तुम्हारा उपयोग करते हुए
अपने रास्ते पर सजा ले
व तुमपर मुधा मुक्ति का
चीवर चढ़ा कर खुद भोग का मजा ले
तुम उसकी भक्ति में सब भूलकर
उसकी मदारीगिरी की महिमा का गान करो
उसके बजाये डमरू पर खूब नाचो
और उसके फूंके मंत्र से राख समेटो

यदि सभ्यता और संस्कृति का पूर्ण अभ्यास करके
आत्मपीड़न हेतु पत्थर ही होना चाहते हो तो
वो पारस पत्थर नहीं हो पाओ
तो कोई बात नहीं
खुद को परख लो तो हीरा हो जाओ
यदि नहीं तो अपने कोने-कातर में दबी
चिंगारियों को रगड़ तो सकते हो
एक आग तो पैदा कर सकते हो
और जड़ पत्थर के छाती को कुरेद कर
अपने धुंधकारी आँच से धधका तो सकते हो
या तो वह अपनी कुरूपताओं की अंगीठी में
अँधेरा समेत पूरी तरह से जल जाए
या फिर उल्कापाती अँगारा हो जाए

आज ही इस महाप्रलयी अँधेरा को हराना है
हाँ ! अँगारा होकर अँगारा को जगाना है .



Wednesday, May 29, 2013

अनसुनी है नहीं ...



अहर्निश आतुरता
कहती है तुमसे आज ये
अनसुनी है नहीं
मेरी अनसुनी आवाज ये

पृक्ति से उठती प्रतिध्वनि में
तुम अपनी गहनता दे दो
पूर्व पगी प्रतीति की
साध्यंत सघनता दे दो

चाहो तो आन फेरकर
मेरी आधारशिला खींच लो
और जो निसर्ग शेष है
उसे भी तुम भींच लो

इस विसर्जन से नहीं माँगती मैं
तुमसे सर्जन का कोई वरदान
जो मेरा मूल्य खंडित कर
मुझे ही बना दिया मूल्यवान

बस मेरे मूल में
मौलिक गंध बन मिले रहो
और कल्पना के कल्पतरु पर
कामित कमल बन खिले रहो

प्रस्फुटन की पीर प्रिय है मुझे
तेरी कान्तिमयी कमलिनी बनने के लिए
मेरे रचयिता! जानती हूँ कि रचना
रची ही जाती है रक्त से सनने के लिए .


Saturday, May 25, 2013

भ्रूणमेध यज्ञ करते हुए ...


जननी जो जानती कि
वह किसी
मलेच्छ की माँ बनने जा रही है
जो जनि (स्त्री) पर ही
अत्याचार की सीमाओं का
भयानक अतिक्रमण करेगा
और अपने ऐसे घोरतम अपराध से
उसे मुँह दिखाने के लायक नहीं छोड़ेगा
तो वह स्वयं ही
अपना नाक-कान काटकर
शूर्पनखा बनना स्वीकार कर लेती .....
यदि वह जानती कि
जिसे गोद में रख
अपने आँचल का ओट देकर
अमृत-जीवन दे रही है
वही आँचल तार-तार करके
जहाँ- तहाँ विष-वमन करेगा
और जघन्यता-से कई गोद उजारेगा
तो वह स्वेच्छा से
पूतना ही बनना स्वीकार कर लेती ....
यदि वह जानती कि
थोड़े-से कागज़ के टुकड़ों के लिए
उसके मातृत्व का टुकड़ा-टुकड़ा कर
उसी के माथे पर
वह कुकृत्यों का इतिहास लिखेगा
तो वह स्वयं ही
अपने गर्भ में
वेदों-उपनिषदों का वेदी बनाती
और भ्रूणमेध यज्ञ करते हुए
एक नया वेद का सृजन कर देती
पर किसी मलेच्छ की माँ बनना
किसी कीमत पर स्वीकार नहीं करती .

Tuesday, May 21, 2013

ये ब्लॉगिंग है जनाब !


ये ब्लॉगिंग है जनाब !
जैसे हड्डी-शोरबा मिला शोख़ क़बाब
या गज़क लाजवाब
पर यहाँ नहीं है कोई नवाब
एक-दूजे का जोरदार हुकुम बजाइये
और नजराना में वही आह-वाह पाइये
नहीं तो चोर-रास्ते भी हैं , उसी से आइये
पृष्ठ-दर्शकों की संख्या इजाफा करके
उनके अंकों में ग़ुम हो जाइये
मज़ाल है कि कोई आपको टोक दे
या कहीं भी आने-जाने से रोक दे

ये ब्लॉगिंग है जनाब !
जैसे पर लगा हुआ कोई सुरखाब
या मुश्कबू बेहिसाब
यहाँ पर उठा हुआ हरएक हिजाब है
आप भी तूफानी रफ़्तार से
किसी भी विधा में खूब गर्दा उड़ाइए
गर नजरें भींचे तो नाक-कान में घुसाइये
खुद भी अपने साफ़ी से मनमुताबिक़ छानिये
दिल जितना कहे उतना भर ही मानिए
व मिजराब से छेड़कर एक-दूजे का गुण गाइये
और संगी-साथी को भी कोरस में बिठाइये

ये ब्लॉगिंग है जनाब !
जैसे उँगलियों पर नाचता हुआ सैलाब
या करामाती ख़्वाब
यहाँ पर बस चलता है तो वह है आदाब
ख़ामख़ा अपना रौब-दाब न दिखाइये
व खुद को दूज का माहताब भी न बनाइये
नज़ाकत से नाजुकख्याली में घूमिये
नफ़ासत से नाजुककलामी कीजिये
गर मीठे बोल हो तो ही मुँह खोलिए
व तखालुक को भी शालीन लफ़्जों में बोलिए
और जितना हो सके ज़ज्ब-ए-इश्क ही घोलिये

ये ब्लॉगिंग है जनाब !
जैसे न डूबने वाला आफ़ताब
या न मुरझाने वाला गुलाब
या तोहफ़ा नायाब
पर यहाँ नहीं है कोई नबाब
ये ब्लॉगिंग है जनाब !

Friday, May 17, 2013

रिश्वत न धराओ ...


मुझे किसी ऊँचे मंच पर
यूँ ही खड़ा न कराओ
खड़ा कराओ भी तो चुप रहने के लिए
राजस्व से ही रिश्वत न धराओ ....
बड़ी मुश्किल में हूँ मैं
जबसे चींटियाँ लगातार
मेरी साँसों की सच्चाई पर संदेह कर रही है
मच्छड़ खून में ही विद्रोह ढूंढ़ रहे हैं
व मक्खियाँ मेरी आत्मा का पुचारा कर रही है
और कीड़े मेरी कट्टरता से पिल रहे हैं
तो भला चुप कैसे रहूँ ?
कैसे काले चश्मे की आड़ में
अपने अंधेपन को सार्वजनिक करूँ ?
या अपने होंठों को खींचकर
उस अहिंसक मुद्रा के नीचे
कैसे युद्धखोर भाषा को छिपा लूँ ?
अब मुझे किसी भी मंच से
कूटनीति के आदर्शों का
सुन्दर शब्दों में बचाव या समर्थन नहीं चाहिए
या हर मूढ़ता के मौके पर
बेवकूफी भरी हँसी नहीं चाहिए
बल्कि तंत्र-परम्परा के प्रभाव का
विश्लेष्ण करने की पूरी स्वतंत्रता चाहिए
केवल विश्लेष्ण ही नहीं
बल्कि परिवर्तन की पुकार चाहिए
और गुप्त-पेटियों से पुच्छल सरकार नहीं
बल्कि भीषण ललकार चाहिए ....
हाँ ! मुझे तो
दहाड़ता-चीग्घारता हुआ हरएक वोट चाहिए
या कहूँ तो केवल वोट ही नहीं
बल्कि हर मंच पर बदलाव का विस्फोट चाहिए
इसलिए मुझे तमाशा बनाकर
किसी मंच पर खड़ा न कराओ
यदि खड़ा कराओ भी तो
मूर्ति बने रहने के लिए रिश्वत न धराओ .



Friday, May 10, 2013

कौन ले जाता है ?


कोई तो बता दे मुझे
कौन ले जाता है ?
मेरी नींद
सेंध कुछ ऐसी लगती है
मानो कोई
अशर्फियों से भरी संदूकड़ी को
मेरे सिरहाने ही लगा जाता है
और समुचित संरक्षण के लिए
मुझे जोगिन-सा जगा जाता है

कोई तो बता दे मुझे
कौन ले जाता है ?
मेरा चेत
चिन्हार-सा चारु हास कर
मानो कोई
एक चितवन चमक नयन में भर
मुझे मुझसे ही चुराता है या
उस सेंधिया की सिधाई कहूँ तो
मुझे मुझको ही चुकाता है

कोई तो बता दे मुझे
कौन ले जाता है ?
मेरा काँटों का सेज
रग-रोयें में एक गंध घोलकर
मनो कोई
बिखरा कर क्वांरी कलियों को
मुझे भी बहुरिया बना जाता है
और एक धुकधुकी धधकाकर
स्पर्शइन्द्रियों को उकसा जाता है

कोई तो बता दे मुझे
कौन ले जाता है ?
मेरा अंगदान
अनंग- क्रीड़ा को क्रियमाण कर
मानो कोई
लोकोपवाद को लज्जित करके
अंगलेप-सा मुझे लेस जाता है
और मेरे अंगविन्यास को उलझाकर
मुझे भी लोकातीत बना जाता है

कोई तो बता दे मुझे
कौन ले जाता है ?
मेरा............


Monday, May 6, 2013

क्षणिकाएँ ...


जैसे सूक्ष्म की शल्य-चिकित्सा का
कोई विलिखित , विख्यायित प्रमाण नहीं है
वैसे ही श्वास-सेतु से जुड़ा हरेक कण है
कोई भी अज्ञात आयाम नहीं है


          ***


जैसे सतत प्रवाह में
कोई भी अंतराल संभव नहीं है
वैसे ही इस काल में गति के लिए
कोई भी स्थान अथवा प्रतिकाल संभव नहीं है


          ***


जैसे मन के क्रकच आयत पर
जो विभाजित , विस्थापित हो सत्य नहीं होता
वैसे ही सोये अक्षरों से निस्कृत अर्थ
कभी भी नित्य नहीं होता


          ***


जैसे शीर्ण शब्दों के मध्य में
मनवांछित मौन महिमावान नहीं होता
वैसे ही आरोपित आधान में अवधान से
कोई जागतिक विराम नहीं होता


          ***


जैसे पार की अभिव्यक्ति
पार हुए बिना नहीं होती
वैसे ही भावक भावों की आप्त अनुभूति
निराकार हुए बिना नहीं होती .



क्रकच आयत ---- प्रिज्म
आधान --- प्रयत्न
अवधान --- ध्यान

Thursday, May 2, 2013

मैराथन करते हुए ...


शुक्र है कि
अनगिनत आँखों वाली जिन्दगी की
अनगिनत दिशाओं की दौड़ में
कोई डोपिंग टेस्ट-वेस्ट नहीं है
और कोई मानक मापदंड भी नहीं है...
जो जैसा चाहे , दौड़ लगा सकता है
पर जिन्दगी की इस बेमेल दौड़ में
अपने अनुकूल दौड़ का चुनाव
न कर पाने की गहरी टीस
मुझे घुन की तरह खा रही है ...
उसपर जो चाहे उस दौड़ में भी
धकिया कर दर्द ही दे जाता है
तिसपर सबसे पीछे रहकर
अपना मैराथन करने का
गम बहुत सालता है ...
काश! कोई रेफरी ही बना देता
या फिर दर्शक-दीर्घा में ही
एक सीट आरक्षित करवा देता
नहीं तो मेरे हाथों जीत का
पुरस्कार ही बंटवाता तो
अपने मैराथन से राहत मिलती....
मैं अपने प्रदर्शन में सुधार के लिए
कोशिश पर कोशिश किये जा रही हूँ
रामबाण-सीताबाण नुस्खा के साथ में
कई टोना-टोटका भी आजमा रही हूँ...
शक्तिवर्धक गोली-चूरण का
डेली हाई डोज ले रही हूँ
यदि इसी का बही-खाता बनाती तो
मेरे नाम एक रिकार्ड भी बन जाता
साथ ही उस दो बूंद को पी-पीकर
सारी बीमारियाँ उड़न-छू हो गयी
पर ये मुआ पैर है कि सीधे पड़ते ही नहीं...
कई बार तो लबालब आस्था लिए
सट्टेबाजों के चरण पर साष्टांग समर्पित कर आई
और उन मादक-द्रव्यों का भी
भरपूर सेवन कर देख लिया
पर मेरा मैराथन अपनी ही चाल में
ठुमक-ठुमक कर चल रहा है....
वैसे मैं भी पूरी तरह से
मैदान छोड़ने वालों में से नहीं हूँ
मन में विश्वास लिए
मतलब पूरा का पूरा विश्वास लिए
मैराथन किये जा रही हूँ,  किये जा रही हूँ..
वैसे.... कहने में तो अभी के अभी
अपना झंडा लहराकर
अपनी जीत की दुंदभी बजा दूँ
और आप सबको बरगला कर हरा दूँ
पर सच में मैराथन करते हुए
सबसे पीछे और सबके पीछे रहने का
गम बहुत सालता है .



Sunday, April 28, 2013

सो जाओ चुपचाप ...


कुछ नहीं
हवा का झोंका है
सो जाओ चुपचाप !
भारी मन है तो
बत्तियां बुझाकर
कर लो
जी भर विलाप !
नींद नहीं आ रही ?
तो करते रहो अपने
शपित शब्दों से संलाप...
जाने भी दो
हाँ! जिसके पंजे में
जो पड़ आता है  
उसी का गला घोंटने में
वह अड़ जाता है
व दर्द का दौरा
ये हमारा हिमवत ह्रदय
पिघल कर भी
सह जाता है..
कोई हर्जा नहीं
कि रक्तचाप
थोड़ा बढ़ा जाता है
और खून को
खौला-खौला कर
लज्जा - घृणा में
उड़ा जाता है...
कोई फिक्र नहीं
सब ठीक हो जाएगा
कल नहीं तो अगले महीने
नहीं तो अगले साल..
हाँ ! कभी न कभी
सब ठीक हो जाएगा
देर है पर अंधेर नहीं..
कुछ नहीं है ये
बस हवा का झोंका है
जो कहीं न कहीं
हर मिनट बहता रहता है
और पतित पंजों से
पंखनुचा कर
संतप्त संघात को
सहता रहता है ...
अब तो
हर अगले मिनट की
आँखों पर
काली पट्टी चढ़ाकर
लड़खड़ाती जीभ को
समझा - बुझाकर
कहना पड़ता है कि -
इसपर इतना
मत करो
प्रमथ प्रलाप
कुछ नहीं
बस हवा का झोंका है
सो जाओ चुपचाप !