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Wednesday, September 23, 2015

क्षणिकाएँ .......

जिन सुन्दर भ्रमों को रात फैलाते हैं
उन्हीं से दिन भी दिग्ध होता है
और उन भ्रमों का टूटना भी
केवल भ्रम ही सिद्ध होता है

               ***

मिथ्या-मदक की चमक के आगे
सत्य-सुर तो केवल लुप्तप्राय होता है
और संतत सूर्य को खोज लेने का
एक किरण-मार्ग भी उपाय होता है

               ***

यथार्थ में सत्य के पीछे हम सभी
कभी भी खड़े होना नहीं चाहते
और ' मैं और तू ' के समस्त विवाद में
' मेरा सत्य ' से कभी बड़े होना नहीं चाहते

               ***

स्थापित ' मैं ' की परितृप्त परिभाषाएँ
केवल पन्नों पर ही गरजती रहती है
बाहर अति व्यक्तित्व खड़े हो जाते हैं
और भीतर चिता सजती रहती है

               ***

आलाप में अर्थ भरने की कोई क्रिया
सहज न होकर हठात होती है
और दो के बीच कोई अंतर न हो
तो ही अंतर की बात होती है
         

Monday, September 14, 2015

''हिन्दी-हिन्दी'' दियो पुकार ........

नाऊ माडर्न हिन्दी उपजै इन मीडिया
लाइक मल्टीब्रांड हर साइट बिकाय |
चायनीज-जापानीज़-जर्मन जेहि रुचै
ये हिन्दी-रूप देख मुख फिंगर दबाय ||
 
'मदर-टंग' में न कभी कोई कीजिये
सो-कॉल्ड मंकी-फंकी स्टाइलिश बात |
एप्प-नप्प , कूल-फूल कल्चर के आगे
कितनी है अपनी हिन्दी की औकात ?

जहाँ हिन्दी पढ़ि-पढ़ि सब गँवार हुआ
और रोजी-रोजगार भी मिले न कोई |
वहाँ बाई स्टिक-स्टिच जो अंग्रेजन बने
अप-टू-डेट स्टेटस का फूल गारंटी होई ||

अब तन-मन-दर्पण में अंग्रेजी को ही
आनेस्टली, बस सब कोई लिओ उताड़ |
जब हिन्दी-दिवस निज मुख उठाये तो
मुख से ही ''हिन्दी-हिन्दी'' दियो पुकार ||

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राष्ट्रभाषा से
स्वाभाविकता , शब्द-सहानुभूति और सौंदर्य-शक्ति जब खोती है |
संभवतः भाषा-पीड़ा की भावोन्मत्त भंगिमा ऐसी ही होती है ||
संभवतः सोया हुआ हिन्दी-प्रेम आज पुनः जाग रहा है |
हाँ! जीतेगी हमारी हिन्दी और 'वो' कोई तो हार रहा है  ||

                     !!!शुभकामनाएं !!!

Monday, March 23, 2015

क्या हर्ज है ?

कोई मंजिल मिल जाती कोई मुकाम मिल जाता
जिंदगी की जानलेवा अदाओं को काबिल नाम मिल जाता

मुसाफ़िराना गुफ़्तगू के महज मुश्किल से इशारे हैं
मतलब जो समझे वो कुछ जीते वर्ना सब तो हारे हैं

कागज़ का एक उड़ता टुकड़ा है जिसपर कुछ लिखा है
ये जिंदगी ! बेऐतबारी में ही तो तेरा पता दिखा है

बदखती का ये आलम है तो तुझे लापता ही कहना है
समझी हूँ तुझे न समझी थी न ही कभी समझना है

तुझे जीना न आया तो तुझसे बेज़ोश क्यों होऊं ?
बस ख़्वाब है तू सोच कर अपना होश क्यों खोऊं ?

दर्द का फ़लसफ़ा है तू या फ़ुरक़त का कोई फ़साना है
ये जिंदगी ! तू जिंदगी ही है तो क्यों ये शोख़ वीराना है ?

जहां ज़िंदा दफ़न होकर जिंदाँ से रस्में यूँ जोड़ लेते हैं
वहां साया भी सरफ़रोशी की कसमें यूँ तोड़ देते हैं

अपनी मदहोशी में कभी शेर होकर जिलाओ तो मैं मानूं
ये जिंदगी ! कभी शराबे-सेर होकर पिलाओ तो मैं जानूं

लगी रह तू जिंदगी अपना अलग ही गुल खिलाने में
ये माशूकाना बेखबरी है तो क्या हर्ज है तुझपर मुस्कुराने में ?

Wednesday, March 11, 2015

ज्वालामुखी तो ज्वालामुखी है.....

ज्वालामुखी तो ज्वालामुखी है
चाहे वह अलसाई रहे या सोई रहे
चाहे अपनी चुप्पी को ही चुप कराती रहे
या फिर ओढ़ी रहे बर्फ के ठंडापन को
या सिर्फ फैलाती रहे स्वाद के हरियालीपन को
या कि बहाती रहे सोतों से मीठापन को.....
जैसे वह अपने गर्भ में
उबलते असंख्य लावा के बीच भी
बचाये रखती है ज़िंदा बीजों को
वैसे ही बचाये रखती है
और भी मुर्दा-सा बहुत कुछ को......
जैसे अपने अंदर उठते बवंडर से
धार का भी जंगलीपन छुड़ाती है
वैसे ही चक्रवाती-तूफानी आवाज पर
हर सैलाब का साज भी बिठाती है.....
पर उसके ऊपर पसरी शान्ति का
मतलब ये नहीं होता है कि
उसे हिलना नहीं आता है
या अपने अंदाज से
कोई करवट लेना नहीं आता है
या कि उसे जंग छुड़ाकर
पूरी तरह जागना नहीं आता है......
बस कोई उसे
मन लगाने के लिए ही सही
यूँ ही बेतहाशा थपकियाँ न देता रहे
या उँगलियों पर घुमाने के लिए ही सही
यूँ ही बेहिसाब उँगलियाँ न करता रहे......
ज्वालामुखी तो ज्वालामुखी है
जब वह बेतरह टूटती है
तो बेबस होकर फूटती है
और जब बेजार सी फूटती है
तो उससे निकलती हुई
आग के सलाखों के पीछे
बेहिसाब चीखों को भी
चुपचाप दफ़न होना पड़ता है .

Tuesday, March 3, 2015

भीतर तक रंगीली हो गयी ......

पपीहा से तो
किसी ने बस इतना ही पूछा
कि मधुमास क्या है ?
जवाब में वह
पी कहाँ , पी कहाँ की रट से
नये-नये पापों को नेहाने लगा

मधुकंठ से तो
किसी ने बस इतना ही पूछा
कि फगुनाहट क्या है ?
जवाब में वह
सौंधा-सौंधा सा
मंजराकर झरझराने लगा

मैना से तो
किसी ने बस इतना ही पूछा
कि जिद्दी जादू क्या है ?
जवाब में वह
चहक-चहक कर
ढाई आखर की पाती
पढ़ने और पढ़वाने लगी

तितली से तो
किसी ने बस इतना ही पूछा
कि मन का उड़ना क्या है ?
जवाब में वह
महक-महक कर
अपना गुलाबी गाल छुपाने लगी

बुलबुल से तो
किसी ने बस इतना ही पूछा
कि गुलाल क्या है ?
जवाब में वह
बहक-बहक कर
बौराये हास-परिहास को ही
बादलों में घोल फहराने लगी

भौंरा से तो
किसी ने बस इतना ही पूछा
कि रंग क्या है ?
जवाब में वह
फूलों से झट भींगकर
भर दम ऊधम मचाने लगा

और मुझसे तो
किसी ने पूछा भी नहीं
कि फाग क्या है ?
पर आप से ही मैं
सब रंगों में गिरकर
भीतर तक रंगीली हो गयी .

Saturday, February 14, 2015

उस कल्पतरु की छाँव में .....

अंतर के सुप्तराग को जगाकर
कामनाओं को अति उद्दीप्त कराकर
नभ से प्रणयोतप्त जलकण टपकाकर
इस अमा की घनता को और बढ़ाकर
पूर्ण उद्भट चन्द्र सा तुम आना नहीं
यदि आना भी तो मुझे अपनी
चाँदनी से उकसाकर चमचमाना नहीं
यदि मैं चमचमा भी गयी तो नहीं ले जाना तुम
उस कल्पतरु की छाँव में
और मत ही भरना मुझे अपनी बाँह में

उस कल्पतरु की छाँव में
आलिंगनयुत तेरे बाँहबन्धों में
संधित कल्पनायें रति-रत होने लगेंगी
औ' आतुर मन की चिर सेवित संचित
प्रणय-पिपासा भी सदृश्य हो खोने लगेंगी
एक कुतूहल भरा मालिन्य मुखावरण में
दो देह भी कथंचित् अदृश्य होना चाहेंगे
पर अमा-विहार की हर एक गति-भंगिमा से
कई-कई गुणित विद्युतघात छिटक जाएंगे

उस कल्पतरु की छाँव में
चिर-प्रतीक्षित वांछक का हर वांछन
क्षण में तड़ित-गति से पूरा होगा
पर प्रखर जोत से ओट की वांछा लिए
इस निराकुल निरावृता का तो
हर यत्न ही मानो अधूरा होगा
निखरी हुई दिखावे की अस्वीकृति में
निहित होगी पूर्ण मौन स्वीकृति
औ' लालायित लज्जित प्रणय-अभिनय भी
प्रिय होंगे सम्मोहक स्वाभाविक सहज कृति

उस कल्पतरु की छाँव में
वर्ण-वर्ण के कल्प-पुष्पों से
मेरी वेणी को मत गूँधित करना
औ' इन अंगों पर पुष्प-पराग का लेप लगा
संशुद्ध सौंदर्य को मत सुगंधित करना
माणिक-मणियों-रत्नों या स्वर्णाभूषणों को
संयोगी-बेला का बाधा मत ही बनाना
कुछ अन्य प्रमाण यदि शेष रह जाए तो
तुम यथासंभव उसे निर्मूल मिटाना

उस कल्पतरु की छाँव में
उन्मत हो रतिफल-मदिरा मत ही चखना
औ' मेरी मदिरा से भी दूर ही रहना
यदि मदमोहित होकर तुम मधुमय हुए तो
यदि मुझसे    -क्रीड़ा में जो तन्मय हुए तो
तुम्हें या स्वयं को भला मैं कैसे सम्भालूंगी ?
विदित हो जाएगा कोई भी साक्ष्य तो
केवल मैं ही अभिसारिका कहलाउंगी

हाँ! प्रेम है तुमसे पर लोगों में
किसी भी संक्रामक अचरज को न  जगने दूंगी
औ' कोई भी अनुमान सहज न लगने दूंगी
इसलिए मत भरना मुझे अपनी बाँह में
उस कल्पतरु की छाँव में .

Thursday, February 5, 2015

बिजहन.....

                  कईसन बिपता अईले हो रामा !
                 अब बिरवा कईसे फूले हो रामा !

                  बढ़िया फसल के ढँढोरा पिटाई
                   अउर मरल बीज मुफ्ते बँटाई
                अईसे घेघा में परल फास हो रामा !
                बिथराई गईल सब आस हो रामा !

                 बिजुका हकबकाये रे बीचे खेत
                आरी पर परल हई हरिया बिचेत
                भाग उजार देलो दलाल हो रामा !
               मानुस जनम पर मलाल हो रामा !

                   कटल करेजा न फूटल जरई
                  कऊन दाना अब चुगत चिरई
                 खेती न करब सरकारी हो रामा  !     
              बिजहन के मारल बनिहारी हो रामा !   

                महाजन के बियाज कईसे लौटाई ?
                पेट के ही खातिर मरियादा बिकाई
                करम अभागा होई गेल हो रामा !
                सरकार ला ई सब खेल हो रामा !

                ढँढोरची के फूटल ढोल हो विधाता !
               भुखर के ढारस से खाली जोरे नाता
               नेतवन के त हमनीं थारी हो रामा !
               जईसे भात-दाल-तरकारी हो रामा !

                 अब बिरवा कईसे फूले हो रामा !
                 कईसन बिपता अईले हो रामा !


बिपता- मुसीबत , बिरवा- पौधा
बिथराई- बिखरना , बिजुका- पुतला
हरिया- हल जोतने वाला
बिजहन- निर्जीव बीज
जरई- बीज से अंकुर
बनिहारी- खेती-बाड़ी.   

Saturday, January 31, 2015

पीवत जो बसंतरस लगी खुमारी .....

बसंत कियो जो हिय में बसेरा
आपुई मगन भयो मन मेरा

आओ पिय अब हमारे गाँव
बसंत को दियो अमरपुरी ठाँव

फिर कोंपलें फूट-फूट आई
फिर पत्तों ने पांजेब बजाई

झरत दसहुँ दिस मोती
मुट्ठी भर हुलास भयो होती

झीनी-झीनी परत प्रेम फुहार
चेति उड़ियो पंख पसार

कहा कहूँ इस देस की
प्रेम-रंग-रस ओढ़े भेस की

चहुंओर अमरित बूंद की आंच
सांच सांच सो सांच

जस पनिहारिन धरे सिर गागर
नैनन ठहरियो तो पेहि नागर

सब कहहिं प्रेम पंथ ऐसो अटपटो
तो पिय आओ , मोसे लिपटो

दांव ऐसो ही है दासि की
मद पिय करे सहज आसिकी

पिय मिलन की भई सब तैयारी
पीवत जो बसंतरस लगी खुमारी .

Sunday, January 25, 2015

हे जगद्धात्री !

हे  जगद्धात्री !
न धुन है न रस है
न संगीत है न ही सुवास है
न कोई विधि-विधान है
न कोई अभ्यास है
अकारण ही तेरा अनुग्रह हो
बस यही एक आस है

हे वाक् अधिष्ठात्री !
न कोई वक्तृत्व-शैली है
न कोई वाक-विन्यास है
न ही कोई कृति-कौशल है
यदि तू देती रहे सद्बुद्धि तो
बस यही एक बल है

हे विश्व धात्री  !
जब बोलने को कुछ हो
तो ही मुझे बोलना आये
अन्यथा मेरा चुप होना ही
बस सार्थक हो जाये

हे दीप्ति धारित्री  !
मेरी अनुभव सम्पदा
सौभाग्य का साधन बने
और मुझसे निकली वाणी
बस तेरा वाहन बने

हे दिव निर्मात्री !
मेरे गीतों से
सबके ह्रदय का प्रसाद बढे
जो गहन से गहन होकर
और-और पगे

हे विद्या विधात्री,
तेरा वरद्हस्त हो तो
शब्दों के काव्य भी
हो जाते हैं इतने रस सने
और जो तू वृहद्वर दे तो
मेरा सम्पूर्ण जीवन ही
शाश्वत काव्य बने .

हे अमृत दात्री!    

Saturday, January 17, 2015

नष्ट नहीं हुई हूँ मैं .......

जीवित सत्य से भ्रष्ट की गयी हूँ
मिथ्या सत्य से त्रस्त की गयी हूँ
समाज से या स्वयं से
बनाने/बचाने में ही
हाय! कैसे मैं नष्ट की गयी हूँ

अब मैं धिक्कार लूँ ?
या आग की ललकार लूँ ?
या दर्द से दुलार लूँ ?
या काट की तलवार लूँ ?

केवल मैं धिक्कार हूँ ?
या स्वयं से स्वीकार लूँ ?
या समाज से प्रतिकार लूँ ?
या द्वंद से दुत्कार लूँ ?

अनजान होना पड़ता है कुछ जानकर भी
बहुत कुछ मानना पड़ता है न मानकर भी
साँचे में ढालना पड़ता है स्वयं को सानकर भी

कैसे मैं धिक्कार लूँ ?
कैसे प्रतिगत प्रहार लूँ ?
कैसे निर्वीर्य आभार लूँ ?
कैसे प्रतिपापी आधार लूँ ?

क्या मैं धिक्कार लूँ ?
या क्या केवल विष-आहार लूँ ?
या क्या सत्य से ही निवार लूँ ?
या क्या मिथ्या से भी अंगार लूँ ?

सबकुछ भष्म करने को लपलपाती हुई जीवित आग है
प्राण में भी उन्मन सा सरसराता हुआ नाग है
अर्थ , उद्देश्य , लक्ष्य क्या ? या जीवन ही विराग है

धिक्कार , धिक्कार , धिक्कार दूँ
इस मृत समाज को धिक्कार दूँ
सब मृत सत्य को धिक्कार दूँ
और मृत जीवन को भी धिक्कार दूँ

क्यों मैं धिक्कार लूँ ?
क्यों न विक्षोभ का हाहाकार लूँ ?
क्यों न विरोध का विकार लूँ ?
क्यों न विद्रोह का आकार लूँ ?

जीवित सत्य से भ्रष्ट की गयी हूँ मैं
मिथ्या सत्य से त्रस्त की गयी हूँ मैं
सत्य है , सबसे नष्ट की गयी हूँ मैं
पर आह ! नष्ट नहीं हुई हूँ मैं .

Thursday, January 8, 2015

आ न कौआ ........

                   आ! मेरे मुँडेर पर भी तू आ न कौआ
                    उसे टेर पर टेर दे कर बुला न कौआ
                  मेरा मनचाहा पाहुन आये या न आये
                  झूठ- सच जोड़ मुझे फुसला न कौआ

                   रात की हर आहट ने है मुझे जगाया
                   कोई वंशी-धुन आ साँसों से टकराया
                 हिय की हलबलाहट क्या बताऊँ कौआ
                  बड़ी जुगत से सपनों को संयत कराया

                तिस पे रात ने पूछा यह भुलावा किसलिए ?
                  औ' नींद ने पूछा यह छलावा किसलिए ?
                   कुछ कहने को नहीं रह जाता है कौआ
               जब देह भी पूछता है यह बुलावा किसलिए ?

                   अब भोर हुआ जग गए धरती-गगन
                  बोझ से झपीं पलकें है अभी तक नम
                  किन्तु ये आस तो मौन नहीं है कौआ
                   देखो! द्वार पर ही बैठे हैं दोनों नयन

                    हर घड़ी की भाव- दशा है स्वागत की
                   तू ही तो संदेशा लाता है हर आगत की
                   मेरा पाहुन आएगा , आएगा न कौआ ?
                    ना मत कह , मत बात कर आहत की

                   कहूँ तो एकमात्र अतिथि है मेरा पाहुन
                  जो बिन तिथि के ही ले आता है फागुन
                  इस तिथि को तू भी अतिगति दे कौआ
                  और तू टेर पर टेर दे कर, कर न सगुन

                   आ! उस ऊँची मुँडेर से तू आ न कौआ
                  अपना चंचल गीत तू किलका न कौआ
                   इस घर-आँगन, देहरी-दरवाजे पर बैठ
                  मेरे मनचाहा पाहुन को तू बुला न कौआ .  
   

Friday, December 26, 2014

प्रेम-प्रवण .........

आर्य प्रिय वो
जो तीक्ष्ण पीड़ा से
तृण तोड़कर
त्राण दे सके
और सुरभित कस्तूरी को
तेरे गोपित नाभि से
नीलिन होकर ले सके

निज क्लेश न्यून कर
और अपनी प्रीति
प्रदान उसे कर
जो तेरी सुधि में
नित पुष्पित हो
नित सुष्मित हो
निज सुध-बुध खोकर

उसे अवश्य
तुम सुख पहुँचाना
जो सदा रहे
अपने सुख से
सहर्ष अंजाना
और तेरे दुःख को
निज श्वास भूलकर
केवल अपना जाना

प्रेम दृढ
श्रद्धा अक्षय
हो अटूट अनुराग
तुमपर जिसका
निश्चय ही
भ्रमकारी देह से परे
प्राण एक होगा उसका

हो हरक्षण
उसकी भंगिमा मनोहर
सहज ही नैन
उठ जाते हों
मृदुल भाव से
हर्षित ये चित्त
सदा ही चैन पाते हों

हो नित्य नवीन जो
प्रेम-प्रवीण जो
विधाता की हो
पहली कृति
जिसे कोई देखे
तो कभी न लगे
कोई भी अतिश्योक्ति

अनायास ही
अहैतुक ही
जब हृदयंगम
होता है ये लक्षण
तब अहोभाग्य से
रहता सदैव ह्रदय
केवल और केवल
प्रेम-प्रवण .

Thursday, December 18, 2014

दो मिनट के मौन में ......

दो मिनट के मौन में
सब कह दो
वो सब कुछ कह दो
जो कहना चाहते हो
कुछ भी मत सोचो
कोई भी चुप न रहो
या कोई भी इन्तजार मत करो
किसी भी अगले
दो मिनट के मौन का.......
क्योंकि हो सकता है
कुछ-कुछ कहने के बीच
वो सब कुछ कहने का
कोई अर्थ ही न रह जाए
दो मिनट के मौन में
और सबके जिस्म में
चिपके हुए खूनी राख से
खौलती हुई सुर्ख उम्मीदें
कहीं सोचने न लगे
कि आग की तलाश व्यर्थ है........

दो मिनट के मौन में
चुप नहीं रहना चाहिए
किसी भी चीत्कार को
इसतरह मची हाहाकार को
और व्यर्थ नहीं जाना चाहिए
किसी भी एक धिक्कार को......
हरतरफ से
इतनी आवाजें आनी चाहिए
इतनी आहें उठनी चाहिए
और इंसानियत को भी
फूट-फूट कर
इतना रोना चाहिए कि
इसतरह से न भरने वाला ज़ख्म
और कभी ख़त्म न होने वाला दर्द
कोई भी देता है वो
पूरी तरह से ख़ाक हो जाए
दो मिनट के मौन में .

Thursday, December 4, 2014

मेरे ग्रीष्म !

                     आज चट्टानों में मैं घिरी हूँ
                     धार ही से कट कर फिरी हूँ
                     गति से यूँ हुआ है अलगाव
                    बेचैन है बस व्यथा का भाव

                     एक अलग धार में फूटकर
                   अपनी सहज गति से टूटकर
                    चलती नहीं , रुक जाती नहीं
                   या किनारे से लग जाती नहीं

                 कोई शाप अथवा नियति नहीं ये
                 क्षणभंगुर सी परिस्थिति नहीं ये
                 झूला रही है बस मायावी पलना
                   सूझता कहीं भी कोई हल ना

                   पतवारों से निकलती है अंधड़
                  फड़फड़ाता है यूँ मौन का बीहड़
                  उफन कर सीमाएं टूटती नहीं है
                क्षुद्र अपनी बनावट मिटती नहीं है

                किनारे छिन गए पर तूफ़ान न मिला
              किरण तक पहुँचने का वरदान न मिला
                 पीड़ा जाती नहीं , दुःख जाता नहीं
                ज्वर टूटता नहीं , ज्वार आता नहीं

                    सागर तक का कोई राह नहीं है
                   पाषाण-कारा का भी थाह नहीं है
                   निज जल-बेड़ियों के भीतर कहीं
                   कोई आधार या मूलाधार नहीं है

                   स्वयं से ही हारा मन माँग रहा है
                   धीरज विकलता को लाँघ रहा है
                    मधु सागर ! मुझे पुकार तो दो
                    इस शिथिल गति को धार तो दो

                   मेरे ग्रीष्म ! लौट कर तो आओ
                  मेघों में मुझे पुनः उड़ा ले जाओ
                   मिट-मिटकर मैं मेघा बन घूमूँ
                   हिम-श्रृंग को जी भर कर चूमूँ

                   इस मिटने को वरदान कहूँ मैं
                  मधु-सागर तक अविराम बहूँ मैं
                   उसकी बाहों में मैं यूँ भर जाऊँ
                   कि भर-भरकर मैं वही हो जाऊँ .

Thursday, July 24, 2014

अमृता में तन्मय ...

                   हाँ ! पंख लगे मेरे सपनों को
                   सिर पर ही पैर लिए दौड़ी मैं
                   ऐसी झलक दिखी है उसकी
                  कि सदियाँ जी ली क्षण में मैं

                  क्षण में ही जीकर सदियों को
                 जीवन के अर्थ को जान लिया
                 अक्षय-प्रेम का आभास पाकर
                गर्त के शीर्ष को पहचान लिया

                 मैं चौंकी , मेरी कुंठा जो टूटी
               अमृता से ही सब कुछ खो गया
               चित्त- चंदन को घिस- घिसकर
               एक सौरभ भर गया नया- नया

                धन्य हुई , आभार फिर आभार
               भाव में भासित उस चिन्मय को
                डुबकी मारी जो तो डूब ही गयी
               बचा न पाई , मैं इस तन्मय को

                 अर्द्धोच्चारित से शब्द हैं सारे
                उच्चार में भी वो न समाता है
                पर इतना प्रीतिकर है वह कि
                 बिन उच्चारे रहा न जाता है

                 सांस में भीतर,सांस में बाहर
                 वही तो आता है औ' जाता है
                 पर जब मैं उसे बुलाती हूँ तो
                 अमृता में तन्मय हो जाता है .

Wednesday, July 9, 2014

कोई दिलनवाज़ ही बचाये ....

दिल को तो बड़ा ही सुकून मिलता है
जब अपना इल्जाम गैर के सर चढ़ता है

दर्द के नासूर का भी इतना ही है इशारा
गर चोट न हो तो कहीं उनका नहीं गुजारा

हरतरफ शातिराना शिकायतों की सरगोशियाँ है
मुआफ़िक़त ज़ख़्मों की जुनूनी दस्तबोसियाँ है

मवाद मजे से मशग़ूल है महज बहने में
इल्लती दस्तूर को क़तरा-क़तरा से कहने में

लबे-खामोश से कुछ पूछने से क्या फ़ायदा ?
नामुनासिब मजबूरियों का भी अपना है क़ायदा

बिरानी साँसों में भी अब न वैसी खनखनी है
जैसे ये दुनिया बस ग़म के वास्ते ही बनी है

शौक़ से ख़ुशी दर्दो-आह में गुजरी जाती है
सारी उम्र यूँ ही गुनाह में गुजरी जाती है

दर्द का काफिला है और दिल की नादानियां है
भरोसा है , ठोकरें है और उनकी कहानियां है

जहां पर हर आगाज ही इसकदर तक बुरा हो
तो कोई दिलनवाज़ ही बचाये अंजाम जो बुरा हो .

Thursday, June 26, 2014

मुझे तो अब .....

                  अभी तो और भी है सोपान
                जिसपर अपना पाँव रखना है
                 रोको न मुझे ! मुझे तो अब
                 चाँद-सूरज को भी चखना है

                 बेठौर बादलों को फुसलाकर
                कांच का सुंदर-सा एक घर दूँ
                 ख़रमस्ती में खर-भर करके
                बिजलियों को मुट्ठी में भर लूँ

                 चकचौंहाँ तारों पर यूँ जाकर
                 तनिक देर तक सुस्ता आऊँ
                 रोशनी को नर्म रूई बनाकर
                मैं आहिस्ता-आहिस्ता उड़ाऊँ

                समय को यूँ सटका दिखाकर
                 कहूँ, उठक-बैठक करते रहो
                 हवाओं को डाँट कर कहूँ कि
                 कान पकड़ कर बस बैठे रहो

                मौसम से सब शैतानी छीनके
                 पल में नींद- चैन को उड़ा दूँ
               सावन को भी बुद्धू-सुद्धू बनाकर
                  झट से सारा पानी मैं चुरा लूँ

                  सब दिशाओं को समेट कर
                  एक छोर से मैं ऐसे टाँक दूँ
                क्षितिज को भी खींच-खींचकर
                  मैं आकाश को जैसे ढाँक दूँ

                 शायद मेरे ऐसा-वैसा करने से
                  कुछ गाँठ ही सही खुल जाए
                 और ये गीत सुरीला बन कर
                  सबके ओंठों में ही घुल जाए  

Monday, June 16, 2014

फ़रियाद ....

क्यों तूफ़ान की तरह आते हो
और तिनका की तरह
मुझे उड़ा ले जाते हो ?
मैं कुछ भी समझ पाती
उसके पहले ही
मेरे वजूद को
अपना बवंडर बना
मुझपर ही
कहर बरपा जाते हो..
ये जो खुद्दार जिस्म है
उसके जर्रा-जर्रा में
दबी रहती है
जो इक जिद
उसे बेकदर मसह कर
बेकाबू सा जूनून न बनाओ...
तेरी तल्खी से तड़पता है जो
उसे अपने सीने से लगाकर
अपना सुकून न बनाओ...
न मैं संगेराह हूँ तेरी
न ही संगतराशी का
अब कोई शौक है मुझे
न ही किसी सैयाद से
किसी सिला की है आरजू
न ही किसी सज्जाद से ही
किसी वफ़ा की है जुस्तजू....
जिस्म है तो
उसकी फितरत ही है
सुलगते रहने की...
साँसे हैं तो
उसकी किस्मत है
अपनी बेवफाई में ही
उलझते रहने की...
जान है तो
उसकी भी बेताबी है
कहीं निसार हो जाए
और रूह है तो
उसकी भी बेबसी है
फना होने के लिए
कहीं बोसोकनार हो जाए...
पर जब तिनका का तक़दीर
कोई तूफ़ान लिखने लगता है
तो तिनका भी उड़कर
तूफ़ान की आँखों में ही गिरता है
फिर किसने कहाँ किस वजह से
ज़रा सी भी करवट ले ली
किसे रहता है उसकी याद
और बहते हुए
बेकसूर अश्कों की
सुनी नहीं जाती है
कभी कोई फ़रियाद .

Tuesday, June 10, 2014

उस 'शायद' में......

हो सकता है
मेरे फैले फलक पर
रंगबिरंगे बादलों का
छोटा-छोटा टुकड़ा सा
मेरा लिखा हुआ
सिर्फ काले अक्षर हों
या बस काली स्याही हो
और उसके चारों तरफ
बढ़ता हुआ
हो अनंत खाई.....
उसे खोज-खोज कर
या जोड़-जोड़ कर
पूरा पढ़ने के बाद भी
जटिल बुनावट वाली
ढरकते कगार ही मिलें
जिसपर सीधी रेखा में
चढ़ने के बाद भी
शब्दों से बाहर होने का
कोई उपाय न हो
और मुझे कांट-छांट करके
कहीं से भी दोहराते हुए
बस यूँ ही
समझने का उपक्रम भर
किया जाता रहे
साथ ही
मुझसे सहमत हुए बिना ही
असहमत शब्दों को छीन कर
भर दिया जाए
कोई और अर्थ.....
पर मैं
इस आशा में
लिखती हूँ / लिखती रहूँगी
कि 'शायद' कोई-न-कोई
कभी-न-कभी
शब्दों के खिलाफ होकर ही
उसे शास्त्र बना दे....
हो न हो
उस 'शायद' में
कहीं 'मैं' ही तो नहीं ?

Wednesday, June 4, 2014

भूलना ही सही है ....

प्रगति या पतन के
तय मानको के बीच
याद रखना
जरूरी तो नहीं है
उन सूखी पत्तियों को
जिन्हें कभी हवा
अपनी
जरा सी फूंक से
उड़ा देती है
इधर से उधर
या खेल-खेल में
लहका कर
लगा देती है
जमीन पर
राख का ढेर....
भूलना ही सही है
उन सूखी पत्तियों की
खड़खड़ाहट को
जो एकांत के अकेलेपन में
घोलती रहती है
और भी उदासीनता
ओर-छोर तक
फैलता-गहराता धुंधलापन
नहीं चाल पाता है
अपनी चलनी से
जीवन के अंतर्विरोधों में
भागते-दौड़ते हुए
मूल्याँकन की
विसंगतियों को..
याद रखना
जरूरी तो नहीं है
उन हरे पत्तों को भी
जो श्रमशोषण , संघर्ष
या अन्याय के
विघटनकारी
ताकतों के बीच भी
जीवन में मौजूद
उस अंध व्यवस्थाओं के
केंद्र से हरसंभव
समझौता करने में
नाकाम रहते हैं....
भूलना ही सही है
एक-दूसरे को
दोस्त-दुश्मन बनाते हुए
धक्का-मुक्की करते हुए
उन हरे पत्तों को
जो काफी हद तक
टहनियों को
मजबूती से
पकड़ने के बाद भी
डाहवश
झाड़ दिए जाते हैं
सर्वहारा की तरह
और समय ठूंठ सा
अपनी गर्दन
हिलाने के सिवा
कुछ भी नहीं
कह पाता है .