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Thursday, November 28, 2013

शुक्रिया ! बोलती हूँ .....

इससे ज्यादा
बेचारगी का आलम
और क्या होता है
कि बेतरतीब से बिखरे
बेजुबान हर्फों को
बड़ी तरकीब से
सजाने के बावजूद
मतलब की बस्ती में बस
मातम पसरा होता है....

वो उँगलियों के सहारे
कागज़ पर खड़ी कलम
इस हाले-दिल को
खूब जानती है
और अपनी मज़बूरी पर
कोई मलाल न करते हुए
घिसट-घिसट कर ही सही
दिए हुकुम को बस मानती है....

कोई तो आकर
मुझको समझाए
कि महज दिल्लगी नहीं है
उम्दा शायरी करना
गर करना ही है तो पहले
इक दर्द का दरिया खोदो
फिर उसमें कूद-कूदकर
सीखो ख़ुदकुशी करके मरना ....

शायद हर्फ़-दर-हर्फ़
महल बनाने वालों ने ही
मुझे इसतरह बहकाया है
व मेरे नाजुक लबों पर
उस 'आह-वाह' का
असली-नकली जाम लगाकर
हाय! किसकदर परकाया है....

असलियत जो भी हो
पर ये कलमकशी भी
फ़ितरतन मैकशी से
जरा सा भी कम नहीं है
और ये बेखुदी
आहिस्ता-आहिस्ता ही मगर
इस खुदी को ही पी जाए
तो कोई ग़म नहीं है....

अब बस
इतनी सी ख्वाहिश है कि
इस महफ़िल की आवाज में
हर किसी को सुनाई देती रहे
अपनी आवाज
वैसे भी क्या ज़ज्ब करने पर
कभी छुपा है किसी का
शौके-बेपनाह का राज ?

आज वही राज जो खुला ही है
उसे फिर से मैं खोलती हूँ
कि इस महफ़िल को
गुलजार करने वालों !
आप सबों को दिल से
इन बेतरतीब हर्फों के सहारे ही
शुक्रिया ! शुक्रिया ! शुक्रिया !
शुक्रिया ! बोलती हूँ .
 

Thursday, November 21, 2013

कुछ भी हो सकता है ...

अब नट-नटी बहुत खुश हैं
जैसे उन्हें किसी खजाने का
कोई खोया रास्ता मिल गया हो
और वे अपने पुरखों को
मन ही मन करम अभागा कह कर
रस्सी और बांस से करतब करते हुए
देसी-विदेशी बैंकों में खाता खुलवाने के लिए
एक्सपर्ट से कांटेक्ट करने के साथ-साथ
खुद भी नेट पर सर्च कर रहे हैं....

अब अकड़ू बन्दर भी खुश है
वह पहली बार गले में पड़े पट्टे से
बड़ा सम्मान का अनुभव कर रहा है
और मदारी अनएस्पेक्टेड सम्मान को
कल्पना में ही सही
अपने गले में पट्टे सा लगाकर
कुछ विशेष विनम्रता और शालीनता का
विशेष परिचय दे रहा है
और अंदर ही अंदर
डमरू के डंके को थैंक्यू भी कह रहा है...

अब सांप भी अपने सेंसेक्स की
परवाह न करते हुए
बहक-बहक कर बावला हुआ जा रहा है
और सपेरा को बार-बार
ऐसे चूम रहा है कि वह अपने सपने में ही
किसी प्रतिष्ठित पत्रिका में छापा हुआ
अपना लेख पढ़ने लगा है ....

पर सबसे ज्यादा खुश तो
अपने सर्कस का जोकर लग रहा है
पहले वह दस फीट उछलता था
अब बिना ताली के ही
बीस-बीस फीट उछलने लगा है
ये सोच-सोचकर कि
शायद कभी कहीं उससे खुश होकर
कोई पांच साल के लिए ही न सही
उसे गद्दी न दे दे
और वह अपने मुकुट के डिजायन को लेकर
अभी से ही बहुत टेंसन में है ....

पर बेचारे विदेशी
च: ..च: ..च: ...च: ...च: ....
हमसे कुछ ज्यादा ही डर गये हैं
और अपने सम्मानों का
जल्दी से जल्दी देशी पेटेंट करा रहे हैं
क्या पता हममें से कोई
कभी अति देशभक्त होकर
उनके सम्मानों को भी
उपहारों के रैंकिंग लिस्ट में
टॉप पर न सजा दे
और मनोरंजन के काउंटर पर
उनके करेंसी को भी
अपने टिकट में न भजा ले....

मतलब साफ़ है कि
अगर समय खुद ही आगे बढ़कर
ट्विस्ट करना चाहे तो
उसका सरप्राइज
कुछ भी हो सकता है
और रही बात अपने प्राइज की तो
वो भले ही अपना वैल्यू खो दे
पर अपना कॉन्ट्रोवर्सि
कभी भी नहीं खो सकता है .

Saturday, November 16, 2013

प्रशस्ति-गान...

सब तरफ से
भलभल करता हुआ
प्रशस्ति-गान को सुन-सुनकर
आज मेरा मन भी
भाट हुआ जा रहा है.....
जैसे कोई रूमानी रेशम
टट्टर को देख-देखकर
खुद ही टाट हुआ जा रहा है....
अब तक के इतिहास का
आह! क्या रोमांचक पल है
इसलिए तो छलियन शब्दों से
आज छँटा हुआ सारा छल है
और अपनी छटकती अनेकता में
असली एकता का नारा लगाते हुए
सब भावुक हो-हो कर
कुछ- न-कुछ कहे जा रहे है
साथ ही उनमे से कुछ तो
प्रशंसकों की खुली प्रतियोगिता में
अव्वल आने की लिए
अजीबों-गरीब हरकत भी किये जा रहे हैं....
क्या महावीर के कैवल्य का
या बुद्ध के निर्वाण का
ऐसा लुभावना दृश्य रहा होगा ?
जो आज के इस अवतारी भगवान के
महाभिनिष्क्रमण का दृश्य है ...
आजतक के सारे रिकार्ड को तोड़कर
नया रिकार्ड बन रहा है
और जिनका कार्ड लकी है उन्हें
मीडिया भी बड़ा से बड़ा फुटेज दे रहा है ...
जो सिरे से नास्तिक हैं
वे अपने शक-शुबहा को
गधे के सिंग से तुलना कर रहे हैं
और जो आस्तिक हैं
वे अपने नये क्रीड़क भगवान के
इस क्रांतिकारी क्रीड़ा को
अविश्वसनीय बनाने का बीड़ा उठा रहे हैं.....
सच में धन्य हुई जा रही है धरती
उससे भी कहीं ज्यादा
धन्य हुए जा रहे हैं हम
और सामूहिक प्रशस्ति-गान से
जैसे-तैसे नये भगवान का
स्तुति पर स्तुति किये जा रहे हैं....
वैसे भाटों के भाड़ में भरभरा कर
अबतक मैंने कोई
विशेष महारथ तो हासिल नहीं किया है
लेकिन मेरी भी यही तमन्ना है कि
मेरा ये प्रशस्ति-गान ही
चारो तरफ से उठता हुआ शब्द-भाटा में
सब गान को कोरस में धकेल कर
सबसे ऊँचा तान हो जाए
और अपने इस अनजान प्रशंसक से
अपनी इतनी सुन्दर प्रशंसा को सुनकर
सबका नया भगवान भी
न चाहते हुए ही हैरान हो जाए .

Monday, November 11, 2013

रचनाकर्म ....

भाषिक अभिव्यक्ति के स्तर पर रचनाकर्म
सादृश्यता में मधुमक्खी के छत्ते की प्रतिकृति है
एक बहुआयामी रसास्वाद की व्यापकता
और सौंदर्यानुभूति ही इसकी प्रकृति है.....

क्या ये निज मधु मापने की
कोई मौनाबलम्बित मिति है ?
या दिग्ध-दंश से विक्षत होने की
कोई व्यग्र पटाक्षेपी वृति है ?

न ही जीवन की यथार्थ भूमिका से
यूँ ही तटस्थ रहा जाता है
न ही प्रयोजन-निष्प्रयोजन का ही
कोई स्थूल भेद कहा जाता है.....

विरोधाभासों की विक्षुब्धता तो
और भी सहा नहीं जाता है
पर मन को कितना भी रोको तो भी
सबके सुख-दुःख में बस बहा जाता है.....

तिसपर घटनाओं और भूमिकाओं की
अपनी-अपनी परिस्थितियां हैं
साथ ही भावनाओं और व्यंजनाओं की
विशेष अनाधिकृत व्युतपत्तियां हैं.....

क्या ये आनंद और आंतरिक पीड़ा से
क्षणिक भावावेश में मोहाछन्न मुक्ति है ?
या हर्षोल्लास और वेदना की
अपने दृष्टिनिक्षेप में व्यर्थ व्यासक्ति है ?

तब तो व्यक्तित्व से अस्तित्व तक का विस्तार
सबको विचित्र व्यथा से भर देता है
और कोई उपलब्ध क्षण पसर कर
मानवीय मूल्यों को घर देता है..........

एक यही घर तो हमारे जीवित होने का
श्वास से भी अधिक प्रमाण देता है
और शब्दों-भावों का एक संसार सजकर
रचनाकर्म को निरंतर विधान देता है......

निस्संदेह सर्जन-प्रक्रिया में विलक्षण चमत्कार सा
नितांत नया युग भी स्वयं को व्यंजित पाता है
इसलिए तो सामान्य मानसिक स्थितियों से अलग
रचनाकर्म की मनोभूमि को अतिविशिष्ट माना जाता है . 

Thursday, October 31, 2013

कवित्व-दीप ....

सत्य को सत्यता की सत्ता से भी
उपलक्षित करने के लिए
श्रेष्ठ को श्रेष्ठता की श्रेणी से भी
उपदर्शित करने के लिए
और सुन्दर को सुंदरता की समृद्धि से भी
उपपादित करने के लिए
विभिन्न रूपों और विभिन्न स्तरों पर
शब्दों एवं अर्थों के सहभावों व समभावों की
अभिनव अभिव्यक्ति अनवरत होते रहना चाहिए
और चिर प्रतिद्वंद्वी अन्धकार मिटता रहे
इसलिए कवित्व-दीप सतत जलते रहना चाहिए....

आदि काल से ही कवि को
कालज्ञ , सर्वज्ञ , द्रष्टा अथवा ऋषि
अमम आत्मनिष्ठा से कहा जाता है
प्रमाणत: उसकी रचनात्मक कल्पनाशीलता में
आकाश की व्याप्ति भी वाङ्मुख होकर
निर्बाध बहा जाता है
इसलिए तो भिन्न-भिन्न आयामों से
सम्पूर्ण मानवीय ज्ञान को
कवित्व के आलोक में पढ़ा जाता है
इस स्वयं प्रकाशित एवं आप्त उद्घाटित
सहजानुभूति के लिए
हर ह्रदय में प्रेमानुराग प्रज्वलित होते रहना चाहिए
और ये चिर प्रतिद्वंद्वी अन्धकार मिटता रहे
इसलिए कवित्व-दीप सतत जलते रहना चाहिए....

मन उद्दाम भाव-भूमि से लेकर
उद्दिष्ट अनुभव-आकाश तक कुलांचे भरता है
अपने ही चाल की विशिष्टता से विस्तार पा
चमकृत होता रहता है
और अकथ आनंद-आस्वाद को
पल-प्रतिपल पुन: पुन: पाता रहता है
इस प्रेय उद्गार एवं गेय मल्हार की
अभिव्यक्ति के लिए
अप्रतिम तथा अमान्य संवेग
सदैव प्रस्फुटित होते रहना चाहिए
और चिर प्रतिद्वंद्वी अन्धकार मिटता रहे
इसलिए कवित्व-दीप सतत जलते रहना चाहिए....

अत: अतिशयोक्ति नहीं है कि
कवित्व ही
समस्त वस्तुओं का मूल है
अमृत-सा ये अमर फूल है
ये चेतना का चिंतन है
तो अस्तित्व का ये कीर्तन है
प्रेम का ये समर्पण है
तो विरह में भी मिलन है
ये समृद्धि का प्रहसन है
तो दरिद्रों का भी धन है
दुःख में ये धैर्य है
तो सुख का शौर्य है
हर पाश का ये प्रतिपाश है
तो अन्धकार में प्रकाश है.....

दीपों के त्योहार से हमें और क्या चाहिए ?
बस ये चिर प्रतिद्वंद्वी अन्धकार मिटता रहे
इसलिए कवित्व-दीप सतत जलते रहना चाहिए .



( उपलक्षित---संकेतित , उपदर्शित---व्याख्या करना
उपपादित---सिद्ध करना , वाङ्मुख---ग्रंथ की  भूमिका
 उद्दाम---स्वतंत्र , उद्दिष्ट---चाहा हुआ )
 

Friday, October 25, 2013

अहं की व्यापारी हूँ ....

अहं की व्यापारी हूँ
आंतरिक संघर्ष से हारी हूँ
अत्यंत महत्वाकांक्षी हूँ
बस सम्मान की आकांक्षी हूँ ...

आस-पास के लोगों को
अपने हिसाब से गढ़ लेती हूँ
व उनकी असहमतियों को भी
सहमति की भाषा में पढ़ लेती हूँ...
कभी कुछ ऊँचे लोग दिखते हैं तो
उन्हें कुछ ही आदर दे देती हूँ
पर बराबरी वालों से बस
तुच्छतागर्भित सहिष्णुता बरत लेती हूँ
और निचले दर्जे की बात करने से ही
अपने-आप में अपमान अनुभव करती हूँ
वैसे भी उनकी औकात या बिसात क्या
कि उन्हें लोगों में भी गिनती करूँ
उनपर कभी गलती से जो
मामूली नजर भी पड़ जाती है तो
बहुत घृणा से भर जाती हूँ ....

बड़ी दुखकारी हूँ
उथली धूर्तता से खारी हूँ
अत्यंत असहनशील हूँ
सबसे ज्वलनशील हूँ ...

अबतक जो सिर मिलता रहा
उसी पर चढ़ कर चली हूँ
किसी भी तरह अपना कद बढ़ता रहे
इसी में जी-जान से लगी हूँ....
हर समय फन उठाये रहती हूँ
पूँछ से भी बिना कारण जहर छोड़ती हूँ...
जो मुझे गलती से भी दुःख पहुंचाते हैं
उनका तो जी दुखाने में
एक विचित्र सुख मिलता है
और पहुँच के बाहर वालों से
बस बदले का भाव पलता है.....
यदि किसी से मन मिल जाए तो
उनको जानबूझ कर सताती हूँ
कभी वे मुझसे निष्ठुरता बरते तो
उन्हें सुधरने का मौक़ा दिए बिना
उन्हीं के घर का रास्ता बताती हूँ ...

दम्भी और इच्छाचारी हूँ
बलात सबपर भारी हूँ
अत्यंत विध्वंसक हूँ
पर बड़ी आत्मप्रशंसक हूँ ....

सब दोषों की अजूबा दस्तकारी हूँ
इसलिए तो अहं की व्यापारी हूँ.

Friday, October 18, 2013

हे ! शिशिर-यामिनी

हे ! शिशिर-यामिनी
न जाने किस गुप्त ग्रास से
या किसी त्रपित त्रास से
या विरक्त हो अपने विलास से
कहो , तू फिर चली आई
क्यों प्रिय के बाहुपाश से ?

हे ! कंजाभी कामिनी
यदि आ ही गयी तो तुम्हें
अपने अभिसार-पथ पर
सूक्ष्म-संकेत नहीं छोड़ना चाहिए
व सबके सामने अंगराई ले-लेकर
अंग-अंग नहीं तोड़ना चाहिए.....

रुको , हे ! रम्य रागिनी
अपने प्रणयी पलकों को
अब ऐसे मत खोलो
व श्लथित श्वासों में समा कर
शीत-तरंगों को भी न घोलो...

अरी ! मृदुल मानिनी
मणियों-सा ये ओस-कण है
या तू ही लज्जा से पानी-पानी है
चल हट , कुछ कह या न कह
हर पात-पात पर तो
बस तेरी ही कहानी है.......

हे ! अखंड अभिमानिनी
यूँ अलक लटों को बिखरा कर
किसके लिए तुम मनहर सा
क्रीड़ा-मंडप सजा रही हो ?
व खद्योतों के मद्धम-मद्धम जोत से
मंजुल मंजिर बजा रही हो ?

हे ! सौम्य साक्षिणी
सुन ! तू तो है
अपने कर-कंकण की ताल पर
मोर-मनों को नचाने वाली
और गात-गात को गलबहियाँ दे कर
एक मदिर क्लेश भर जाने वाली......

जरा ठहर , हे ! भद्रा भामिनी
बस उन ठिठुरती कमलिनियों को
किंकणी धुन दे कर ऐसे ही मत जगाना
और कमल तो ठहरे कमल हैं
वे तो यूँ ही किंजल उड़ाते रहते हैं
उन्हें छेड़कर और मत उकसाना
नहीं तो तेरी चुनरी चेष्टातुर हो कर भी
उन्हें आवृत न कर पाएगी
और असफल किन्तु प्रिय प्रयास पर
तू खुद ही अनायास मुस्कायेगी......

अरी ओ ! शरत शालिनी
तू अब वहाँ जा जहाँ तेरे लिए
मिलन के मधुर-गान से
चहुँओर मंगल-असीस मंत्रित हो
जितना चाहे तू अंक फैलाकर उसे भर
पर उससे पहले तू वहाँ जा जहाँ
वियोगवश दुबलाई काया
दुसह्य दुःख से विदग्ध हैं
उस दुःख को जितना संभव हो सके
अपने कोमल स्पर्श से कम कर ....

हे ! शिशिर-यामिनी .


Sunday, October 13, 2013

हे परमेशानि !

मेरे रोम-रोम से
तेरा आरव रँभित
रंच मात्र न
कोई रव दूजा हो
हे परमेशानि !
ऐसे तू मुझसे
प्रकट हो कि
मेरा हर कृत्य ही
तेरी पूजा हो !

मेरे आकुल ताप में
तेरी मधुर कल्पना हो
व उद्वेलित मन में
बस प्रिय भावना हो
और विह्वल तिक्तता में भी
तेरी आलंबित धारणा हो ......

कोई क्षुद्रोल्लास ही
जीवन-ध्येय नहीं हो
व कभी उग्राह्लाद
प्राप्य विधेय नहीं हो
और क्षणिक हर्षोल्लाद में
कुछ भी हेय नहीं हो ........

तेरे दुर्लभ योग की
प्रबल अभिलाषा हो
व गरिमान्वित गर्जन से
बँधती हर आशा हो
और तेरे रहस्यों को बस
पीने की उत्कट पिपासा हो .......

हर रुधिर में रंजित
तेरा आलोड़न हो
व श्वास-श्वास में
एक ही आन्दोलन हो
और विभोर तन-मन में
तुझसे दृढ आलिंगन हो .......

तेरी गति-कंपन से
प्राणों में कलरव
कल-कल कर
सुप्तराग सा गूँजा हो
हे परमेशानि !
ऐसे तू मुझसे
प्रकट हो कि
मेरा हर कृत्य ही
तेरी पूजा हो !


Monday, October 7, 2013

उठाओ कुदाल !

क्या बना रखा है
तुमने अपना ये हाल ?
ऐसे परती धरती न निहारो
उठाओ कुदाल !

माना कि सिर पर सजी धूप है
पल-पल बदलता
पसीने का छद्म-रूप है
तनिक सुस्ताने के लिए कहीं
कोई ठौर नहीं है
पर चकफेरी के सिवा चारा भी तो
कोई और नहीं है......

बदलो अपने हिसाब से
सूरज की चाल !
ऐसे परती धरती न निहारो
उठाओ कुदाल !

अबतक कितना पटका
तुमने पत्थरों पर सिर ?
तुम्हीं से पूछ रहा तेरा आँसू
बरबस नीचे गिर
कबतक अपने भाग्य को कहीं
गिरवी रख आओगे
और पसारे हुए हाथ पर
दो-चार मिश्रीदाना पाओगे ?

अपने आस्था के जोत को
अपने कर्म-दीप में सँभाल !
ऐसे परती धरती न निहारो
उठाओ कुदाल !

देखो ! कब से उदास बीज
मेड़ पर है खड़ा
प्राण से तुम छू दो उसे
तो हो जाए वह हरा-भरा
बीज को बिथरा कर जब
परती धरती टूटती है
तब अक्षत अंकुरी भी अनवरत
अगुआकर तुम्हीं से फूटती है......

चाहे कितना भी उलट कर
रुत हो जाए विकराल !
ऐसे परती धरती न निहारो
उठाओ कुदाल !

बादलों को चीर कर बिजली
क्या कहती है सुन
उठ ! तू भी परती की छाती पर
कुदाल से अपनी हरियाली बुन
तुम ही अपने बीज हो
और तुम ही तो हो किसान
अपने भूले-भटके भाग्य के
बस तुम ही हो भगवान.......

भ्रमवश किसी विषपात्र में
अपना अमृत न डाल !
ऐसे परती धरती न निहारो
उठाओ कुदाल !



Thursday, October 3, 2013

लोग जान जायेंगे....

इतना न लिखो मुझे
लोग जान जायेंगे
फिर अर्थों के अधीर अधरों पर
अपना कान लगायेंगे
व शब्दों में घुली सुरभि से ही मुझे
ऐसे पहचान जायेंगे
कि रिक्त स्थानों में भी
अबुध अनुमान लगायेंगे....

बेरोक-टोक फिर तो मैं
बह न पाऊँगी
कोई टोक दे तो कुछ
कह न पाऊँगी
उन चुभती नजरों को तब मैं
सह न पाऊँगी
और बिन चिढ़े भी तो
रह न पाऊँगी.....

मेरी चिढन की चिनक से भी
लोग जान जायेंगे
फिर प्रचल पीड़ा के पदचाप में भी
अपना कान लगायेंगे
और गुप-चुप रोती वेदना को भी
ऐसे पहचान जायेंगे
कि सुषुप्त साँसों के शुष्क-गान में भी
अयुक्त अनुमान लगायेंगे....

बोलने से उथली हो हर बात
बह जाती है
जो न भी कहना चाहो वो भी
कह जाती है
कौड़ियों के उलाहना को भी जाने कैसे
सह जाती है
और न कहो तो ही वह कीमती
रह जाती है....

इसलिए इतना न लिखो मुझे
लोग जान जायेंगे
फिर अर्थों के अधीर अधरों पर
अपना कान लगायेंगे .


    

Saturday, September 28, 2013

नव स्वाति-नक्षत्र...

खगोल शास्त्र के हुकुम की
नाफ़रमानी न करते हुए
नव स्वाति-नक्षत्र को आना ही है
अपने लेखा पर रोते हुए भी
दाँत निकाल-निकाल कर मुस्कुराना ही है...
पर उसका कई मन से भी भारी मन
और भारी-भारी पाँव को देखते हुए
मेरे जी में आ रहा है कि
मैं भी उसे एक बिलकुल मुफ़्त सलाह दे दूँ
कि वह चुपचाप अपना पथ बदलकर
उत्तरी या दक्षिणी ध्रुव जाए
और किसी बर्फ-घर के तहखाने में
छिपकर तबतक आराम फरमाए
जबतक कि संहिता के हिसाब से
सीपी सब सुधर न जाए.....
उन सीपियों का क्या ?
उन्हें तो यूँ ही अपना मुँह फाड़े रहना है
जो कुछ भी आ जाए उसमें
उसे बस निगलते जाना है
फिर गलती से भी डकार नहीं लाना है
क्योंकि गुप्त आँखों का भी तो जमाना है
साथ ही इधर-उधर डोलती-फिरती हुई
भद्दी-गन्दी बूंदों को भी
रोगन-पालिश कर-करके मोती बनाना है.......
हाय! इन अत्याधुनिकाएँ बूंदों की तो
हर अदा ही निराली होती जा रही है
एक तो पहले ही हूर सरीखी चाल थी
अब तो और भी मतवाली होती जा रही है.....
उनके पास अब तो एक-से एक चकाचक घोषणापत्र है
जिसमें शेखचिल्ली को मात करने वाला
एक-से-एक चौंकाऊ चुटकुले हैं
जैसे कि पिरामिड को पीट-पीट कर बराबर करना
या चीन की दीवार को खिसकाकर लाना
या फिर एफिल-टॉवर को बौना करना
या झुकी मीनारों के रीढ़ को खींचकर सीधा करना
ऐसे ही और भी बड़ी-बड़ी योजनायें हैं
जिसे सुनकर अब
न तो हँसी आती है न ही दिल से रोना
सही ही कहा जाता है कि
कुछ पाने की उम्मीद में ही
चेतावनी-सा लिखा होता है खोना.....
वैसे भी पञ्चवर्षीय संवैधानिक चाल से
नव स्वाति-नक्षत्र का आना हो या जाना
या सीपियों का ही हो सौतिया सोखाना
या फिर मोतियों का ही हो मनमोहक मनमाना
या बूंदों का ही हो येन-केन-प्रकारेण बिजली गिराना
पर हम कंकड़-पत्थरों का क्या ?
उस विशेष घड़ी में
घुड़क-घुड़क कर है एक ठप्पा लगाना
फिर बाकी दिन तो वैसे ही एक समाना
और अपनी ही उलझी अंतड़ियों में
थोड़ा और उलझ कर
सौ के बदले हजार तरह से मरते जाना .


Sunday, September 22, 2013

मोक्ष-मोह में ....

फिर पितर लोक में
उत्सवी चहल-पहल है ...
अगस्त्य मुनि पत्नी लोपामुद्रा के साथ
पिंडदानियों के सुन्दर स्वागत में
जी-जान से लग गये हैं
उनके लिए विशेष पैकेज की
विशेष रूप से व्यवस्था करवा रहे हैं...
पितृपक्ष मेला दुल्हन की तरह
सज-संवर रहा है....
प्रेतशिला पर्वत से लेकर तलहटी तक
पिंडवेदी पर कौवे मंडरा रहे हैं
और आत्माएं आस्था के ब्रह्मकुंड में
लगातार लग रही डुबकियों से
सांस नहीं ले पा रही है....
देवघाट के सामने बहती फल्गु
शापित होकर भी मोक्षदायिनी है...
गाय , तुलसी और ब्राह्मण
सबका मार्ग रोक- रोककर
बता रहे है मुक्ति का मार्ग
और असली नक्शा लिए बरगद
गद-गद है गर्दन हिला-हिला कर
पर उसका सच सुनने वाला कोई नहीं......
इस तर्पण-अर्पण में
सर्वकुल , नाम-गोत्र आदि
नोट से ही अपनी पहचान दे रहे हैं
उसी में भूल-चुक , क्षमा-प्राप्ति आदि का भी
प्रमुख प्रावधान सुरक्षित है
और सबके लिए स्वर्ग तो
बेटा पैदा होने के साथ ही आरक्षित है.....
जो होशियार व हाईटेक हैं
वे अपने घर में ही जीते-जी
माँ-बाप को नर्क-भोग करा रहे हैं....
वैसे भी आज न कल
इस पतित धरती का मोह
सबको छोड़ना ही होता है
इसलिए समय रहते ही वे
व्यावसायिक रूप से
अमानवीय व्यवहार को कैश करा कर
उन्हें जमीन-जायदाद आदि से
बेरहमी से बेदखल करके
गया का महात्म्य समझा रहे है.....
माँ-बाप भी हैं कि
अपने ही बच्चों की नजरों में
सबसे पहले नकारा होकर
अपने मोक्ष-मोह में
न जाने किस स्वर्ग के लिए
सीढ़ी पर सीढ़ी बना रहे हैं .

Tuesday, September 17, 2013

मैं प्रतीक्षा करूँ ....

                        तेरे ही बगल में मैं बैठ कर
                       तेरी ही कितनी प्रतीक्षा करूँ?
                         कभी तो थामेगा तू मुझे
                        बस इतनी ही इच्छा करूँ

                      दिवस-दिवस मधुर आशा में
                        हर एक दंश को चूमती हूँ
                      निराशा में विश्वास पालकर
                       पल-प्रतिपल मैं झूमती हूँ

                       छोटी-छोटी उर्मियाँ उठकर
                      एक अनोखी आस जगाती है
                      विलग-विलग किनारा छूकर
                     उस पार की झलक दिखाती है

                       एक धागा पिरोती रहती हूँ
                      मन के अन्स्युत मनकों में
                       सहन तक ही तुम आते हो
                      सुनती हूँ अस्फूट भनकों में

                     यह जो जीवन का तिमिर है
                      वह खोजता तेरा उजास है
                     स्नेह-ज्योति सहज ही घिर
                      ले आता मुझे तेरे पास है

                      तू जला दे शत दीपावलियाँ
                       मेरे प्रेम के कोने -कोने में
                      या बुझाकर मेरी ज्वाला को
                        बस हो जा मेरे ही होने में

                         बैठी हूँ, यूँ ही बैठी रहूँगी
                    चाहे जितना जन्म कम जाये
                  या अनियंत्रित रिसना घावों का
                       बह-बह कर यूँ थम जाए

                    कब परस करोगे जी को प्रिय!
                    क्यूँ ऐसी कोई मैं पृच्छा करूँ?
                      तेरे बगल में ही बैठकर
                    बस तेरी ही मैं प्रतीक्षा करूँ .


Thursday, September 12, 2013

क्या तुम्हें चाहिए ?

                  एक ने जीता सारा जग
                  दूजे से लज्जित है हार
                दो में से क्या तुम्हें चाहिए
                  धनुष या कि तलवार ?

                इस धनुष  में बड़ी शक्ति है
                   राग -रंग जगाने वाली
                 दक्खिन , दिल्ली ही नहीं
               हर दिल को थिरकाने वाली

               और तलवार एक दंपति है
               निज संतति ही खाने वाला
                कुकृत्यों को नंगा करके
               हम सबको दहलाने वाला

              व्यक्ति नहीं व्यक्तित्व ये
               इस युग के हैं नव आधार
              तुम ही कहो कि अब कैसे
               रचना है अपना संसार ?

               हार-जीत हैं दोनों हमसे
             रुक कर थोड़ा करो विचार
             दो में से क्या तुम्हें चाहिए
            धन्य धनुष या तम तलवार ?

Monday, September 9, 2013

धाय हूँ ....

बेबस हूँ , असहाय हूँ
अपने ही
धावक विचारों की धाय हूँ...

जिधर-जिधर वे जाते हैं
उनके ही पीछे-पीछे जाना मेरा काम है
पर वे मुझे भगा-भगा कर
इतना थकाते हैं कि
एक पल के लिए भी न चैन है न आराम है...

अक्सर वे आपस में ही गूंथकर
एक-दूसरे को ही इसकदर
गंभीर चोट पहुंचाते हैं कि
बीच-बचाव मैं करूँ तो
उल्टे मुझे ही इधर-उधर धकियाते हैं....

हरसमय ऐसे चिल्ल-पों मचा रहता है कि
मैं कितना भी सम्भालूँ
पर सँभाल में नहीं आते हैं
हाय! वे कितना मुझे सताते है
और कितना मुझे रुलाते हैं....

जब बढ़िया-बढ़िया खाना खिलाकर
बड़ी मुश्किल से उन्हें बहलाती हूँ
फिर फुसला-फुसला कर
बिस्तर पर उन्हें ले आती हूँ
और बड़े प्यार से पैर दबाकर
मीठी-मीठी लोरी सुनाती हूँ
पर कितनी हतभागी मैं कि
उनकी आँखों को जरा भी नींद नहीं दे पाती हूँ
और नींद से झपती मैं
खुद को ही थपथपा कर जबरन जगाती हूँ....

न जाने कैसे उन्हें
मछलियों का खेल भी आता है
छोटी-छोटी मछलियों को निगलना
क्यों उन्हें भी बड़ा भाता है....

जो जितना बलवान है सबके सरदार बन जाते हैं
फिर चिनगियाँ छिटका-छिटका कर
खुद पर ही बड़ी धार चढाते हैं
जिसे देखकर मैं क्या
सब चौंक-चौंक कर चिहुक जाते हैं
और खुद ही हटकर उनके लिए रास्ता बनाते हैं....

कैसे कहूँ कि मेरा कुछ चलता नहीं है
मैं तो निरी गाय हूँ , निरुपाय हूँ
बड़ी बेबस हूँ , असहाय हूँ
अपने ही
धावक विचारों की धाय हूँ .

Thursday, September 5, 2013

टेंशन का वेट घटाया जाए....


आज की इस अर्थव्यवस्था पर
की जा रही कोई भी टिप्पणी
मुझे टीन एजर सा कन्फ्यूज कर रही है
और मजेदार से मजेदार व्यंग भी
हाई डोज कोकीन सा बरगला रहा है
सेंसेटिव कविता तो सीधे
डांस-बार में ही पैर पटकवा रही है
ऊपर से ये विश्लेष्ण-विमर्श
उफ्फ! डेंगू सा कंपकंपा कर डरा रहा है....

जब हम पर चारों तरफ से
मार ही मार पड़ रही हो तो
कुछ भी समझ में नहीं आता है
बस मंदी के चक्रव्यूह में
देश का विकास दिख रहा है
और दिख रहा है दिवालियेपन का मुहाना
जो मुँह मोड़ने को राजी नहीं है....

इससे कैसे बचकर हम कहाँ जाएँ ?
क्या माडर्न मंहगाई को ही चबा-चबा कर खूब खाएँ ?
और तो और अपने रुपया को कैसे डॉलर बनाएँ ?
कैसे सबके हिस्से का गुलछर्रे उड़ायें ?

इस राष्ट्रीय संकट की चपेट में
धीरे-धीरे हम सब आ रहे हैं
और एक-दूसरे को कुछ भी
उल्टा-सीधा कहकर समझा रहे हैं
जबकि तस्वीर बिल्कुल साफ़ है
इसपर झूठ बोलना तो और भी माफ़ है...

भ्रम फैला रही बहसों के बीच
टी.वी. का चैनल बदल-बदल कर
खुद को उबा और थका रही हूँ
फिर दिल को थोड़ा बहलाने के लिए
मोबाईल मैसेजिंग व नेट चैटिंग पर
ज्यादा से ज्यादा समय लगा रही हूँ
साथ ही आऊट डेटेड डेट पर जा-जा कर
इंटरटेनमेंट का न्यू-न्यू आईडिया बुला रही हूँ...

पर लगता है कि इस मंदी में
बुद्धि भी बहुत मंद हो चली है
आगे मंडराते चुनाव में
वो एटम बम वाला नहीं बल्कि
किसी ऐसे हिटलर को देख रही है
जो हार्ड डिसीजन को अप्लाई करके
इस लड़खड़ाते देश को थोड़ा संभाल ले
और अर्थव्यवस्था को गर्त से निकाल दे...

पर इस मंद बुद्धि में कोई 'बुद्धिमान जी'
आकर बार-बार कहते हैं कि
'मैडम बुद्धू ' बैलेट से ऐसे पिकुलियर चेंजेज
बस आपके माइंड में ही पलते हैं....

बहुत टेंशन हो रहा है सच में
सोच रही हूँ कि अब नया क्या किया जाए ?
या कुछ नया करने के लिए किचन में चला जाए
देशी-विदेशी सारी कुकरी किताब खोलकर
ग्लोबलाइज्ड डिशेज को आजमाया जाए...

बॉडी का वेट बढे तो उसका टेंशन
पर खा-खा कर ही सही
औनेस्टली टेंशन का वेट घटाया जाए .


Sunday, September 1, 2013

तब-तब मैं पढ़ ली जाऊँगी ...

जब-जब
ओस की बूँदें बेचैन होंगी
घास के मुरझाये पत्तों पर ढरकने को
धीरे से धरती भी छलक कर उड़ेल देगी
भींगा-भींगा सा अपना आशीर्वाद
और बूँदों के रोम-रोम से
घास का पोर-पोर रच जाएगा
हरियाली की कविता से
तब-तब मैं पढ़ ली जाऊँगी
उन तृप्ति की तारों में

जब-जब
आखिरी किरणों से
सफ़ेद बदलियों पर बुना जाएगा
रंग-बिरंगा ताना-बाना
उसमें घुलकर फ़ैल जाएगा
कुछ और , कुछ और रंग
हौले से आकाश भी उतरकर
मिला देगा अपनी सुगंध
उन रंगों की कविता में
तब-तब मैं पढ़ ली जाऊँगी
हर किरण की कतारों में

जब-जब
आनंद की ओर
उचक-उचक कर झाँकते
किसी की प्रतीक्षा में खड़े दो नयन
अपनी सारी धूलिकण को बहाकर
तारों से आती आशा के सन्देश को
कोने-कोने की किलकारी बनायेंगे
और एक प्रार्थना बिखरने लगेगी
कण-कण की कविता से
तब-तब मैं पढ़ ली जाऊँगी
हर आश्चर्य की पुकारों में

जब-जब
हवाओं की छन्दों को
छू-छू कर बेसुध राग फूटेंगे
जिसपर जग-साँसें गीत गायेंगी
थिरक उठेगा ये जीवन
अपने ही उल्लास से भरकर
एक लय की कविता में
तब-तब मैं पढ़ ली जाऊँगी
निर्झर-सी झनकारों में

इस धरती से उस आकाश तक
मैं ही लिखी जाती हूँ
और मैं ही पढ़ी जाती हूँ....
इस छोर से उस छोर तक की
एक उन्मुक्त उद्गारा हूँ मैं
हाँ! कल-कल-कल-कल करती हुई
अनंत की अनवरत काव्य-धारा हूँ मैं .

Wednesday, August 28, 2013

अकारण ही ...



अकारण ही
अर्धरात्रि का समय
मुझे ऐसे घेरता है
कि मेरा इन्द्र भयभीत हो जाता है
एक भयानक झंझावात उठता है
और उसी पर एक प्रलयंकारी
वृष्टि एवं अग्निवर्षा होने लगती है....
योगमाया का ही तो प्रभाव है
कि प्रगाढ़ निंद्रा में सोये मेरे द्वारपाल
अचानक जग कर्तव्यपालन में
पूरी तरह से लग जाते हैं ....
बंदीगृह की तत्परता और
सूप की व्यग्रता देखी नहीं जाती
यमुना और शेषनाग रह-रह कर
सामने आने लगते हैं ....
मेरा शिलापट भी क्षुधातुर हो उठता है
पर जो बेड़ियाँ हैं न
वो और भी दृढ़ता से बांध जाती है
करागार का फाटक पहले ही
खुलने से मना कर देता है ....
बड़ी बेचैनी है , घबराहट है
इस गर्भ में ये कैसी आहट है ?
सावधानी तो बरत रही हूँ
पर असावधानियाँ कंस-सी
आतातायी हो रही है ....
अब अपने ही अत्याचारों के भार को
सहन करने में असमर्थ हूँ
पर उस अजन्मे अवतार को जन्म दूँ
कहाँ इतनी मैं समर्थ हूँ ?
अर्धरात्रि के बीतते ही
झंझावात के साथ-साथ
गर्भ भी शांत हो जाएगा
और दिन में स्वप्नावतार को
पूरी तरह से भूलभाल कर
अपने घर-ऑफिस के कामकाज में
बैल की तरह फिर से लग जाएगा .

Friday, August 23, 2013

प्रेम को कौन कब समझ सका है....



कुछ न कुछ कचोटती-सी
ग्रथित गूँज जरूर रह गयी होगी
सुधि से एक गंध उठकर
संचारित साँसों से बह गयी होगी !

उन्हीं अभिभूत अनुस्मृतियों को
मैं अनंतक अभिसार दे रही हूँ
हाँ! जन्मों-जन्मों के बाद भी
तुम्हें फिर से पुकार दे रही हूँ !

यह जो निगूढ़ नाद है
न मालूम कबसे चल रहा है
हो-न-हो दो बिछुड़े शून्यों में
अश्लेष अर्थ-सा पल रहा है !

उन्हीं अर्थों को तबसे कितने ही
संभृत शब्दों में घोल रही हूँ
और तेरी स्मृति-मंजूषा को
मैं बोल-बोल कर खोल रही हूँ !

कहीं उन शंसित शब्दों की कौंध में
तुम्हें कुछ स्मरण आ जाए
और चिर-वंचित विस्मृतियाँ
अपने अवगुंठित अर्थों को पा जाए !

इस जीवन का अर्थ तुम्हीं से
औ' सौभाग्य का क्षण-क्षण प्रयोजन है
धूप-दीप , अर्चा , फूल , बंदनवार लिए
ह्रदय-महल का सजा ये सिंहासन है !

कितनी आकांक्षाओं-अभीप्साओं को ले
इस दुर्लभ जन्म को हमने पाया है
अब दिवस-रात निष्फल न बीते
इसलिए तो तुम्हें फिर से बुलाया है !

कुछ महत होने के है करीब आया
कोई विधि-विधान मत खोजो तुम
अनघट घटना ही घट रही है
सरस होकर उसे सहेजो तुम !

प्रेम को कौन कब समझ सका है
प्रयत प्रतीति है केवल खोने में
ये जन्मों-जन्मों की गंधवाही गूँज भी
सुन , कहती है  हो जा  मेरे होने में .
 

Tuesday, August 20, 2013

मुई मानवीय भूल है न....



एक और हादसा
विपक्ष पीड़ितों के पक्ष में
पक्षाघाती बोल बोल रहे हैं
और पक्षपाती अपने मातहत से
आहतों का ब्योरा ले रहे हैं...
राहत की बात ये है कि
राहत की रवानगी का 
पूरा इंतजाम किया जा रहा है
इसमें समय तो लगता है...
कटे-फटे अंगों को जोड़-जोड़ कर 
गिनती जारी है
आधिकारिक और सूत्रों के
बेमेल आंकड़ों में
गलती गणित की ही है...
मन ही मन कात्यायनी माता को
धन्यवाद दे दे कर अवाक हो  
सहरसा और खगड़िया अचम्भित है
अपनी खैरियत पर हैरान भी है  
धमारा धू-धू कर जल गया
और कितनी ही कटी लाशें 
अपनी अंतिम संस्कार के लिए 
कितनी आसानी तैयार हो गयी है 
यदि वे कहीं से पूरी हो जाए तो...
वहाँ पहुँचे अधिकारियों को 
खदेड़-खदेड़ कर भगाया गया
या वे खुद ही जान बचाने के लिए
वहाँ से भाग निकले ?
अब तो रेल से गलती होनी थी , हो गयी 
जिन्हें-जिन्हें कटना था वे तो कट चुके
देखने वालों को गुस्सा दिखाना था , दिखा चुके
जितनी तोड़-फोड़ मचानी थी , मचा चुके
समय है , बीतेगा ही
धीरे-धीरे सब चुप भी हो जायेंगे
जैसा कि होता आया है....
अपने आलाकमान जी 
अधिकारियों के लाईन पर लगातार बने हुए हैं
हेल्पलाईन भी जारी किया जा चुका है
इसी से घायलों को भी 
समय पर बचा लिया गया है
फिर एक कमीशन को बिठाने के लिए
बड़ी जगह बनायी जा रही है
फिर एक खुली बहस की
पुरजोर तैयारी चल रही है
जो कि नैतिक जिम्मेवारी पर 
हवाबाज़ी करती रहेंगी...
एक-दूसरे को तिरछी नजरों से देखने के लिए 
आँखों को फरमान जारी कर दिया गया है
आँखे हैं कोई रेल नहीं
डर से मानने को राजी हैं
और जो महज एक
मुई मानवीय भूल है न
वो देश छोड़ कर भाग भी तो नहीं सकती है 
जिसके मचान से माथे पर
सारा दोष मढ़ दिया जाएगा
साथ ही इस गाढ़े वक्त पर
गढ़ी-गढ़ाई हुई गलफूटों को
फिर से गला पकड़ कर
फिर-फिर गढ़ दिया जाएगा .