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Saturday, July 28, 2012

क्षणिकाएँ...


एक जरा सी शुरूआत भी
बला की तूफ़ान ले आती है
फिर तो हलकी सी थपकी भी
जोरदार चपत लगा जाती है .

           ***

कोई कैसे बताये कि
कौन किसपर भारी है
हँस जीते या फिर बगुला
सिक्का-उछालू खेल जारी है .

           ***

गुदड़ी की गुत्थमगुत्थी भी
क्या खूब गुदगुदाती है
और बाँकी बर्बरता बैठकर
मजे में चने चबाती है .

           ***

टिमटिमाती मशालों की टीमटाम
हेठी दिखा कर हेल देती है
बरजोरी में अग्निशिखाओं को भी
एकदम पीछे धकेल देती है .

           ***

अनेक को एक ही सोंटे से
सोंटने में ही एकता है
जो ताखा चढ़ तूंबी बजाये
वो ही तुरुप का पत्ता है .


Tuesday, July 24, 2012

ख़ालिस खिचड़ी ...


आप पकाए क्या  ख़ालिस खिचड़ी
हांडी  को  ताकता  रह  जाए  खीर
बड़ा  नशीला है  ये जालिम नमक
जिसके   आगे   भागे   देखो  भीड़

बारह   मसाला   में   तेरह   स्वाद
लज्ज़त   लुटाये   आपका   चोखा
लार  टपक  कर  लड़ता  रह  जाए
और  जीभ  तो  खाता  रहे  धोखा

चाहे  आप  कुछ   भी  कहें  न  कहें
तनिक न  लगती  किसी को कड़वी
वर्जिश  करना  भी  भूल चुके  सब
आपका  घी  ही  घटाए  जो  चरबी

मिर्च  और   खटाई   खेले  खटराग
तिसपर पर्दापोशी करे  आप अचार
एक   बार  जो  जी  चढ़   जाए  तो
हिचकियाँ  लगाए  हुड़दंगी  विचार

बिन  जामन  के   ही  आप जमाए
कफ़ - वात- पित्त   नाशक    दही
छुआछूत   से  तौबा  कर  जीवाणु
हर  बात  को   बस   ठहराए  सही

कोई   हरजाई  जो  पलटी  मारे  तो
पटेबाज़ी  कर पटाये  आपका पापड़
मुँह पर  मैंने ऊँगली  डाल लिया जी
वर्ना  कहीं  खिचड़ी कर  दे न चापड़ .

Friday, July 20, 2012

मेरा पद्म तुम्हें भर लेगा...


गिरने   दो  अपनी   अहं - दीवारें
सम्पूर्ण - समर्पण   की   राहों  में
तब   मेरा  पद्म   तुम्हें  भर  लेगा
मूक -मिलन  के  मधुर  बाँहों  में

तुम  चाहे  जिस -जिस   देश रहो
जब -जब  चाहे   कोई  वेश   धरो
पल -पल की प्रतिच्छाया  बनकर
ये   अम्बुज  अंक   लगा  जायेगा

इन अधरों  के  इति  इंद्रधनु  बनो
और  बस भोले दृग की  बात सुनो
तरल -चपल  गतिविधियाँ  न्यारी
ये कलित कंज कर भरमा जाएगा

ज्यों   धरा   तरसे  तुम  भी  तरसो
उस   धाराधर  सा  जमकर  बरसो
तन - मन -प्राण से  भींग जाने को
ये जलज  भी  खिल-खिल जाएगा

विगत -आगत  से तुम  विरत रहो
जिधर मैं खींचू  बस  उधर ही बहो
मंद -मदिर  सा  अधीर  समीर में
ये  पुलकित  पंक  लहरा   जाएगा

माना  एक  से  बढ़  एक  चुभन  है
चंचल चित्त उद्वेलित  चिंतन  है
पर  कोई  सुन्दर  स्वप्न  सुनहला
ये  कमल  किलक  दिखा  जाएगा

शब्द - शब्द  से  कुछ  भी  न कहो
असह्य  वेदना  का  अनुताप सहो
तेरी   धड़कनों  की  आह का स्वर
ये  सरसिज  स्वयं  में  पा जाएगा

कोमल कितने प्रिय!चरण तुम्हारे
कि काँटे हिल -मिल  बसुधा बुहारे
और   तेरे   पथ  पर  पंखुड़ियों को
ये  शतदल  सदा  बिखरा  जाएगा

कितना  मृदुल - मोहक है  ये पाश
चहुँ ओर प्रिय! लखे  तेरा  ही भास
जिसपर गर्वित  रूप  कर निछावर
ये  नंदित नलिन  निखरा  जाएगा

मत  घबराओ  निज  हाथ  बढ़ाओ
मिट जाओ इन्हीं  शाश्वत चाहों में
तब   मेरा   पद्म   तुम्हें   भर  लेगा
मूक -मिलन   के   मधुर  बाँहों  में .

Monday, July 16, 2012

गहूँ - गहूँ


पीली  - पीली
उगूँ    -   उगूँ
सीली - सीली
बहूँ    -    बहूँ

चली  -   चली
रुकूँ    -   रुकूँ
कली  -  कली
फिरूँ   -  फिरूँ

मिली -  मिली
कहूँ     -  कहूँ
खिली -खिली
दिखूँ  -  दिखूँ

घड़ी   -   घड़ी
पगूँ    -   पगूँ
भरी   -   भरी
रहूँ     -    रहूँ

दिया  -  दिया
जलूँ   -   जलूँ
पिया  -  पिया
गहूँ     -    गहूँ  .

Friday, July 13, 2012

ग़ाफ़िल ग़ज़ल


जानते हो तुम
कि तुमसे ही है मेरी
मलाहत भरी मुस्कुराहट
बेसबब बेसमझ बेपरवा सी
न थमने वाली खिलखिलाहट....
और तुम खामख़ाह फुरकते ग़म देते हो
व मुद्दत बाद बेहाली से मिलते हो...
मैं रूठूँ तो यूँ न रूठो कहते हो
तिस पर खिलखिलाती रहूँ ख्वाहिश भी करते हो..
क्या कहूँ मैं...
कुछ न भी कहूँ तो
ये पलक ही उठकर
तुमसे हजार बातें कह जाती
और जब गिरती है तो
घबराकर क्यूँ साँसे तुम्हारी अटक जाती....
फिर तुम जबतक
इस माथे की उलझती-सुलझती लकीरों को
चूम-चूम कर सुलझा नहीं लेते
इन गालों की बदलती रंगत को
बड़ी सादगी से सहला नहीं लेते
गीतों के कुछ बेतरतीब पंक्तियाँ
बिन सुर गुनगुना नहीं लेते
उस चाँद के ग़रूर को भी
उसके दागों से आजमा नहीं लेते
और इस रूठी को मना नहीं लेते...
तबतक क़समें दे-देकर
वक़्त को तो रोक ही देते
छुनन-मुनन कर छेड़ती हवा को भी
झींख भरी झिड़क से टोक ही देते...
जैसे कि
मेरी मुस्कराहट की मुहताजी हों सब
जिसे देखकर खिल उठेंगे मोगरे के फूल
ठठा ठठाकर ठिठक जायेंगी
खिदमती खुशबू भी राह भूल....
फिर मानो पूरी कायनात ही
तुम्हारी इस ग़ाफ़िल ग़ज़ल की
गवाही देने को हो जायेगी बेचैन
और ये होंठ हिलते ही
मिल जाएगा सबको आराम-चैन....
ये जानते हुए भी
अजब-गजब अदा दिखा कर
मैं तो मानी हुई ही रूठी रहूँगी
कितने पिंगल पिरो-पिरोकर
तेरी प्रीत है झूठी कहती रहूँगी........
ताकि तुम यूँ ही
बेहिसाब ग़ाफ़िल ग़ज़ल गाते रहो
और बेताबी से बस मुझे मनाते रहो .

Sunday, July 8, 2012

सबकी अपनी मर्जी...


सबकी  अपनी  मर्जी
सबका   अपना   ढंग
कोई     मारे     सीटी
कोई     फोड़े    मृदंग

बेसुरा      छेड़े     सुर
बेताल     देवे     संग
लकवा    मारा   नाच
फड़के      अंग - अंग

दाद,   खाज,  खुजली
खूब     जमाये     रंग
मन-मौजी     मलहम
और    मिलाये    भंग

बेमौसम   फूल   खिले
कौन     करे    शैतानी
कैसे   छिपाए  पतझड़
हँफनी   भरी    हैरानी

मुश्किल  में  मानसून
किससे    माँगे   पानी
छीछालेदर   सुन-सुन
और    बढ़ी   परेशानी

राग-मल्हार    छेड़कर
दुश्मनी   किसने ठानी
अब      नहीं    चलती
उसकी   ही  मनमानी

आसमान    सा   हुआ
दमड़ी      का      दाम
रिश्वत   खाए  बादल
भूले    अपना    काम

कंबल    तले   लेटकर
केवल     करे   आराम
मौसम     पैर    दबाये
ठोंके     जोर   सलाम

दलाल     बन     हवा
खींचे   सबका    चाम
कितना    जहर   बाँटे
राहत   कमाए   नाम

लटापटी    खूब    करे
धागा     बिन    पतंग
झुका      रहे     तराजू
चढ़ा     हुआ    पासंग

दहाड़      मारे     दहाड़
तुनका    हुआ    उमंग
आवाज़   चुप्पी    खाए
गूंगा    मचाये   हुडदंग

सींकिया मलखंभ  चढ़े
दबका    हुआ    दबंग
देख  बदलती  दुनिया
खरबूजा  कितना  दंग

सबकी    अपनी   मर्जी
सबका    अपना    ढंग
कोई       चढ़े      सीढ़ी
कोई        करे       तंग .

Tuesday, July 3, 2012

चिरजीविता


मैं अनवरत
अपनी ही भाषा की खोज में
अपनी प्रकृति से
सतत स्पष्ट-अस्पष्ट
संवाद करती रहती हूँ...
स्वयं ही
दृश्य-अदृश्य गति-तरंगों में
वाक्य-विन्यास सी बनती-बिगड़ती हूँ...
अति आंतरिक किन्तु
जटिल संरचनाओं को उसके
मूलक्रमों में सजाती-संवारती हूँ.....
फिर शब्द-तारों को
सुमधुर स्वरचिह्नों में
समस्वरित-समरसित करती हूँ.....
सरल-विरल भावों के
सुलझे-अनसुलझे
रहस्यों को बुनती-गुनती हूँ.....
उस काव्य-बोध के
चरम-बिंदु का
पहचान-निर्माण करती हूँ....
जिसके द्वारा रचित
चिरजीविता कविता को
उसकी यात्रा पर
अक्षरश: अग्रसर करती हूँ....
सत्यश:
मैं....मैं तो केवल.....
अभिव्यक्ति का व्याकरण बन
नवरसों के नवसृजन का
बस मधुपान-मधुगान करती हूँ .

Monday, June 25, 2012

सच कहो...


मुझे
अपने हाथों की
प्रत्यंचा बना सकते हो...
अपने तरकस से
तीर पर तीर चला सकते हो...
बेध सूर्य-चन्द्र को
अँधेरे को जिता सकते हो...
मेरी ऊँगली से
अपना चक्र भी चला सकते हो...
तुम्हारी विराटता सिद्ध हो तो
कण-कण में
मुझे बिखरा सकते हो....
और अपने जय-घोष में
मुझसे ही
शंख भी फुंकवा सकते हो....
पर जब मैं
तुम्हारा भेद खोलने लगूँ तो
सच कहो
अठारहों अध्याय भी
कम तो नहीं पड़ जायेंगे .

Thursday, June 21, 2012

कहीं पा न जाऊं ...


कल्पना  जिसकी  संजोयी  हूँ
उसे  सामने कहीं  पा  न जाऊं

घड़ी -दो -घड़ी  के  लिए  सही
मैं  अधन्या उसे  भा  न जाऊं

उस की  वंशी - धुन  सुन कर
शहनाई सी कहीं बज न जाऊं

बिन   श्रृंगार - पिटारी  के  ही
उसके रूप  से  सज   न  जाऊं

ठगे से  इन नयन के  ठांव में
मैं लुंठित  कहीं  लुट  न जाऊं

और लज्जा की लालिमा ओढ़े
नवोढ़ा - सी  ही  घुट  न  जाऊं

ह्रदय पर जो हरक्षण  छाई  है
प्रिय -छवि तो  अनोखी होगी

वह  मधुर - बेला  मिलन  की
कितनी   चकित  चोखी  होगी

उसके रंग के छिटके  छींटे  में
आभा  मेरी  भी  निखरी  होगी

मरुदेश सा इस मन मरघट में
इक हरियाली सी बिखरी होगी

हिलोर  लेती  छुई -मुई  घटाएँ
गगन में ऐसे भी  घिरती होगी

बन कर  दाह की  चिनगारियाँ
प्यास अधरों पर  तिरती होगी

सरस-सरस  स्वर   ले -ले कर
अमराई बन  छिटक  न  जाऊं

महक-महक कर मदमाती सी
जूही सी  कहीं  लिपट  न जाऊं

यदि वो घड़ी अभी आ जाए तो
भावना में  मैं  ही  बह  न जाऊं

न जाने  किस - किस भाषा में
क्या  कुछ  कहीं  कह  न जाऊं

ठिठक  गये  यदि  पग   मगर
मन  लिए ही कहीं बढ़ न जाऊं

लोक - लीकों  का  तोड़  भरम
सोच के पार  ही  चढ़  न  जाऊं

गरल  विरह  का  पी - पी कर
प्रेम - गीत  कहीं  गा  न  जाऊं

कल्पना  जिसकी  संजोयी  हूँ
उसे सामने  कहीं  पा न  जाऊं .

Sunday, June 17, 2012

प्रेम-वरदान


माना कि हर समय
पलड़े का झुका काँटा है
और दैविक सुअवसरों ने
केवल दुःख ही दुःख बाँटा है....
पर सच देखा जाए तो
हीरे ने ही हीरे को काटा है
चाहे जितना भी खींचता हुआ
त्रासदियों का ज्वार-भाटा है....
कौन कहता है कि
जिसे तिरना नहीं आता
हर लहरों से वह हारा है
उसका भी क्षिति से क्षितिज तक
क्षण प्रति क्षण का सहारा है....
अनुक्त अनुभूतियों का भी
विस्तृत विसदृश्य किनारा है..
जिसने अतल गहराइयों से भी
हर बार , हर बार उबारा है.......
ये भी माना कि
जिसे जीवन की नदी में
अपना द्वीप बनाना नहीं आता...
गंभीर ग्रीष्म को देखकर भी
मेघ बन उफन जाना नहीं आता...
और सूर्य की दीप्त किरण से
विमल हो मिल जाना नहीं आता....
पर वे भी एक
अकल्प अद्भुत संयोग ही हैं
विषम व्यवधान हेतु
एक विलक्ष वियोग ही हैं......
किन्तु ये तो बस समय की बात है
जिसमें संभवत: नियति के
खलनायक का भी बड़ा हाथ है.....
ह्रदय तो बस
ह्रदय की भाषा जानता है..
काल-दूरी से परे जाकर
बस धड़कनों को पहचानता है....
कहीं से तनिक भी
पाकर अनमोल प्रेम-वरदान
निर्मल सरोवर सा
बन जाता है हर सूखा प्राण....
जी उठती है जिसमें असीमित धार
छोड़ सारे अहम् व वहम को
कर ही लेता है वो
अभिनव,अभिभूत,अपरिमित प्यार .

Tuesday, June 12, 2012

क्रांति...


सक्रिय सहभागिता मेरी
जीवन के हर एक
स्पंदन और विचलन में
उच्छृंखलता और नियमन में
चढ़ान और फिसलन में
अवसाद और थिरकन में...
पर साथ-साथ
फन उठाये एक डर भी
उलझाता एक एहसास भी
परजीवी होने का....
अपने पेट में ही
उलझ-सुलझ कर
अपनी स्वतंत्रता को
कमोवेश निगलते जाना....
अपनी ही बिठाई
निष्पक्ष जाँच की धार पर
संभल-संभल कर चलना....
न जाने कब
अपदस्थ कर दी जाऊं...
अपने ही किसी काल-कोठरी में
नजरबंद कर दी जाऊं...
तब एक चरम बिंदु तय करके
समग्र साधनों को संचित करके
अगुआई करती हूँ
एक आत्मक्रांति की
और हो जाती हूँ - मुक्त
कुछेक पल के लिए...
हाँ! ये मेरी क्रांति ही
झझकोर रही है आज
समस्त संधित
संदीप्त चेतना को .

Sunday, June 3, 2012

पुन:पुन:...


तुममें खोई थी
कुछ बीजों को बोई थी
अब फूल खिलें हैं
काँटों में भी उलझे हैं....
तुममें खोती रही
बस तुम्हें
फूल ही फूल देती रही
और कांटे चुभोती रही....
चुभे काँटे हैं
दर्द देंगे ही
लाख मना करूँ
पर तुमसे कहेंगे ही....
तब तुम बाँहों में मुझे
यूँ घेर लेते हो
उन्हीं फूलों को
बिखेर देते हो
और कहते हो -
भूल जाओ दर्द को....
ये जिद ही है मेरी
कि मैं
तुममें यूँ ही खोती रहूँगी
और काँटे चुभोती रहूँगी
बस तुम्हें फूल देती रहूँगी
पुनर्नव पीड़ा पिरोती रहूँगी
पुन:पुन:
बस तेरे बाँहों के घेरे में
होती रहूँगी और खोती रहूँगी .

Monday, May 28, 2012

इसलिए ...


अक्सर
मेरी कविता
लाँघ जाती है
अनगिनत खींची हुई
लक्ष्मण रेखाओं को...
रावणों को
चकमा देकर
हथिया लेती है
पुष्पक विमान...
विस्मृति में कहीं
भटक रहे हैं
हनुमान...
जटायु को
ज़िंदा रखना है
इसलिए खुद ही
लाती है संजीवनी बूटी...
लम्बी सेवा के बाद
सुरसा को
मिली है छुट्टी...
पर उस
त्रिजटा को
कौन समझाए
जो कर रही है
प्रतिपल प्रतीक्षा
उसी अशोक वाटिका में .

Thursday, May 17, 2012

क्षणिकाएँ



बेझिझक बोलों के अब
पोल खुले ही रहते हैं
जिसपर बेमानी बुद्धिवाद
चिथड़ों में सजे रहते हैं .


बबूला भी बलबलाकर
बड़ा होने में ही फूटता है
पर इन्द्रधनुषी इठलाहटों का
कोई भ्रम कहाँ टूटता है .


भला कौन किसको अब
कोई परामर्श दे सकता है
जहाँ एक घास का तिनका भी
अनुभवों को बाँचते फिरता है .


उपद्रवी ब्योरों का भी
ब्योरा-ये-हाल कोई तो कहे
जो चींटियों की धड़कनों पर भी
धड़कन रोके नजरें चुभाये बैठे हैं .


नगाड़ों में खुदुर-बुदुर कौन सुने
सब समय की ही तो बात है
नक्कारखाना भी अब हैरान है
जिसमें तूती की चलती धाक है .


तूफानी विचारों की आँधी में
बेचारा 'देश'तो वही रह जाता है
पर अक्सर आगे लगा 'उप'
बस 'आ' में बदल जाता है .



Thursday, May 10, 2012

प्रीतम का संदेशा


रोम-रोम को
अकस्मात सुख ने सिहराया है
चिर प्रतीक्षा की
व्याकुलता ने मानो वर पाया है
टिमटिमाते लौ से
जित ज्वाला सा जगमगाया है...

लगता है कि
मेरे प्रीतम का संदेशा आया है

ठहरी हवाओं को
प्रेम पंखो पर झुलाया है
पीपल पातों ने
ये कैसा कोलाहल मचाया है
चुप चातकी ने
चहक-चहक कर चौंकाया है...

हाँ ! प्रीतम का
प्यारा संदेशवाहक ही आया है

मरू नभ पर
घनघोर घन लहराया है
मोर मोरनी के
नयन में नयन दे मुस्काया है
नए-नए गीत
नई ध्वनियों ने मिल गाया है...

हुलस कर जिसे
मैंने भी निज-हाल सुनाया है

हर पल पर
लिखी पाती उसे थमाया है
कि ह्रदय को
कैसे मैंने उपासना-गृह बनाया है
अपने प्रीतम को
उसमें देव सदृश बिठाया है...

हठचेती ह्या ने
हठात भेद उगलवाया है कि

बिन मदिरा के
बेसुध सी रात ने मुझे भरमाया है
और भोर तक
जगते सपने ने निर्मोही को दिखाया है
हर तत्पर दिन
पुन: सूनी संध्या में समाया है...

हलाहल पी कर
मैंने भी ये संदेशा भिजवाया है

कि उसका दिया
विरह उपहार भी बड़ा मनभाया है
और हर्षोन्माद में
बस उसी को तो मैंने पाया है
दुःख देकर भी
आखिर उसी ने तो दुलराया है...

हाय ! प्रीतम तक
कैसा संदेशा उसने पहुँचाया  है .

Sunday, May 6, 2012

एक थकान की मन:स्थिति में


एक थकान की मन:स्थिति में
शरीर के ज्वार-भाटे में
बिना जिद के तिरते रहना....
बेवश विवशता के नियमों को
उसके गतिनुसार चलते देखना...
क्षुद्र स्वार्थों के लिए दौड़ में बनाए
कीर्तिमानों का आकलन करना...
मड़ियल मिश्रित मुस्कान लिए
स्वयं के साथ किये गये
उपघाती उत्पीड़नों का उल्लाप करना
और छटाँक भर राहत के लिए
छद्मावरण तोड़ देने के लिए छटपटाना....
उफ्फ़ !
फिर मन तो मन ही है
उसी थकान की मन:स्थिति में
करता रहता है अपना काम...
मजे से मचल कर वह
विचारों को एक राजसी ठाट-बाट दे
अपने बादशाही बिछौने पर
आराम से लिटा देता है...
हौले-हौले पंखा झलता है
धीरे-धीरे उसके पाँव दबाता है...
कुलबुलाते सवालों व खलबलाते खेदों से
विशेष अनुरोध करता है कि वे
सुबह की ताज़ी हवा का सेवन करें
और एकात्मक एकांत का
मौन अभ्यास व अध्ययन करें....
आह ! उसी मन:स्थिति में
अपनी बुद्धिवादिता पर वह हँसता है
विस्मित होता है , आश्चर्य करता है....
एक आभासी शक्ति से स्वयं को
प्रोत्साहित करता है और देता है
एक खुला आमंत्रण
उस पूर्ण चंद्र को भाँवर रचाने के लिए
उसे कहता है- इन ओठों पर
गहरा व लंबा चुम्बन जड़ने के लिए...
रिझाने व मनाने के लिए
और फिर राव-चाव से
रास-क्रीड़ा करने के लिए....
ताकि सबकुछ भूल कर
इस तिरते ज्वार-भाटे में
तिरते-तिराते हुए सबकुछ
हो जाए पूर्णत: तिरोहित
उसी थकान की मन:स्थिति में .

Tuesday, May 1, 2012

कल्पशून्य


तुमसे प्रेम करके
जितना मैंने
खुद को बदला है
तुम्हारी जरूरतों और इच्छाओं के
प्रमादी प्रमेय के हिसाब से
उतना ही तुम
अनुपातों के नियम को
धता देकर सिद्ध करते रहे
कि चाहतों के गणित को
सही-सही समझना
मेरे वश की बात नहीं.....
जबकि मैंने तो
गणितीय भाषा से
केवल जाना है
एक अनंत को....
और तुम जोड़-तोड़ करके
मुझे बंद कर लेते हो
अपनी चाहतों की
छोटी सी कोष्ठक में......
प्रेम किया है तो
तुमसे कोई शत-प्रतिशत
परिणाम पाने की चाहत भी नहीं
बल्कि तुमसे सूत्रबद्ध होने के लिए
करती रहती हूँ सूचकांक को
शून्य से भी नीचे.....
ताकि पूरी तरह से तुम
होते रहो संतुष्ट
और मैं छू-छू आऊँ
उस अनंत को.....
पर तुम मुझे यूँ ही
गुणा कर लेते हो
किसी शून्य से और
अपने संख्यातीत चाहतों के
आगे-पीछे लगा लेते हो
केवल अपने हिसाब से....
क्या तुम नहीं जानते कि
तुम्हारा गणित भी है सूत्रहीन
या तो मेरे अनंत होने मात्र से
या बस कल्पशून्य होने मात्र से . 

Thursday, April 26, 2012

तदर्थ गढ़ा है ...


आत्म विभोर होकर
सस्ते में मैंने मान लिया कि
हर एक शब्द हीरा है
मंहगा न पड़ जाता कहीं
आत्मभार इसलिए
चुटकी बजा कर उठा लिया
ऐसा-वैसा हर बीड़ा है ....
अब क्षमता से अधिक भार लिए
कलम के नीचे दब रही हूँ
खुद को तो बचाना ही है तो
अपनी स्याही की ताकत को
खोखले शब्दों में भर रही हूँ.....
हैरान हूँ , वही आड़ी बन कर
मुझे ही ऐसे चीरा है
किससे और कैसे कहूँ -
आहत अभिमान बड़ी पीड़ा है ...
उलटे शब्दों ने व्यंग से कहा -
निराशाओं की पगडण्डी
इतनी छोटी होती नहीं
आँखों से चाहे गिरा लो
जितने भी आँसू
पानी ही है कोई मोती नहीं
अब बिचारी गंगा भी
धर्म व नीति के विरुद्ध
आचरणों को धोती नहीं
समय की भी टूटी कमर है
इसलिए सबको वह ढ़ोती नहीं...
और तो और ... मेरे बिना
कोई बात भी तो होती नहीं.....
सीना चौड़ा करके गर्व से
शब्द आगे कहता रहा -
जरा देखो हर तरफ बस
मेरा ही बोलबाला है
हर उजली बातों के पीछे
कहीं तो छिपा कुछ काला है...
मुझसे ही सजे हुए सबके
अपने -अपने अखाड़े हैं
जितना भी खेले गुप्त दाँव-पेंच
लेकिन सब मुझसे ही हारे हैं....
आखिर मुझसे ही तो
हर एक नाम लिखा जाता है
फिर अपने ही जमघट में ही
तड़प-झड़प कर खो जाता है....
नाम वाले कहते हैं - मुझमें
उन्होंने अपना अर्थ भरा है
पर सच तो यही है कि मैंने भी
उनको तदर्थ गढ़ा है .

 

Friday, April 20, 2012

किस भाँति मैंने....


मत पूछो कि
किस भाँति मैंने
निज को लुटाया है

अपने ही बंद झरोखे को
धीरे से खुलते पाया है
मैं न जानूं कौन है वो पर
चुपके से कोई तो आया है....
नींद बड़ी गहरी थी तो
झटके में उसने जगाया है
पसरे चिर सन्नाटे को
हौले-हौले थपकाया है.......

मत पूछो कि
किस भाँति मैंने
मन को लुटाया है

स्फुटित श्वास ,स्तब्ध नयन
हाय ! ये कैसा सौन्दर्याघात है
एक उत्तेजित,उल्लसित किन्तु
स्निग्ध उल्कापात है.....
ढुलमुलायी हवाओं में भी
कोई न कोई तो बात है
क्या ये अतर्कित प्रेम का
उदित,अनुदित उत्ताप है.....

मानो मुंदी-मुंदी रातों में
धूप सा वह उग आया है
मेरे पथरीले पंथों पर
दूब बन कर लहराया है.......
उहूँ ! मेरे विश्व में ये कैसा
संदीप्त सनसनाहट मचाया है
तैर रही हैं लहरें और
सागर को ही डूबाया है......

अब तो ये मत पूछो कि
किस भाँति मैंने
उसको पाया है .




Monday, April 16, 2012

काव्य-धारा


जरूरतों और इच्छाओं के इर्द-गिर्द
नाचती-घुमती दिनचर्या में
जीवन के काव्यात्मक उपकरण
कैसे/कहाँ खो जाते हैं कि
उन्हें खोजने के लिए
लेना पड़ता है सहारा
सूक्ष्मदर्शी/दूरदर्शी यंत्रों का....
फिर भी चारों और से
घेरे रहता है भयानक भय
बाकी सब खो जाने का....
यदि कभी/कहीं वे
मिल भी जाते हैं तो
सारे तार ऐसे तार-तार होते हैं
कि सधे हाथों से भी जोड़ो तो
ऋणात्मक-धनात्मक छोरों में
ठनी होती है अड़ियल अनबन...
व विभिन्न तीव्रता में प्रवाहित धारा
कुछ ज्यादा ही होती है
जोरदार झटका देने के लिए....
उसके जंग लगे कल-पुर्जों से
लगातार होता रहता है
कानफोडू कोलाहल
साथ ही विषैले रिसाव का
दमघोटूं दबाव धमनियों पर...
तब ख्याल आता है कि
ज़िंदा साँसे भी होती है या नहीं
ये भी ख्याल आता है कि
बाज़ार में उछाल पर क्यों है
कृत्रिम ऑक्सीजन की मांग/आपूर्ति...
सब मानते हैं / मैं भी
ज़रूरी है कोई भी ऑक्सीजन
काल्पनिक काव्यशैली में भी
जीने/ जिलाने के लिए
कृत्रिम फूलों की कृत्रिम सुगंध के
आदान/प्रदान के लिए...
सबसे ज्यादा तो ज़रूरी है
खुद को ज़िंदा दिखाना
एक-दूसरे को भरोसा देना
सुन्दर-सा मुस्कान चिपकाए रखना
और ये कहते रहना कि
कृत्रिम काव्य-धारा में भी
कितना सुन्दर बह रहा है जीवन .