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Saturday, April 30, 2011

समग्र-सार

ढाई - अक्षर   की  कथा
आधा सुख,आधी व्यथा


चार   क्षणों  का   जीवन
कभी विरह,कभी मिलन

  
मोम-प्रस्तर  से ये  शब्द
आज चकित,कल स्तब्ध


अर्थ  से  भी    गहरा  अर्थ
कभी उपयोगी,कभी व्यर्थ


मेघाच्छन्न है हृदयाकाश
कभी अँधेरा,कभी प्रकाश


समग्र-सार  है   यथातथ्य
आधा मिथ्या,आधा सत्य . 

Friday, April 22, 2011

ह्रदय-गीत

होरा हूँ मैं होरा हूँ
हर क्षण बजती होरा हूँ
मधुर स्वर से अंतर्मन में
ब्रह्मनाद सा हर एक कण में
हर क्षण बजती होरा हूँ
होरा हूँ मैं होरा हूँ.



कोरा हूँ मैं कोरा हूँ
हर क्षण बनती कोरा हूँ
हर प्रसून के प्रस्फुटन में
सृजन के हर एक स्पंदन में
हर क्षण बनती कोरा हूँ
कोरा हूँ मैं कोरा हूँ.



डोरा हूँ मैं डोरा हूँ
हर क्षण बँधती डोरा हूँ
धरा-गगन के आकर्षण में
चराचर के हर एक विचलन में
हर क्षण बँधती डोरा हूँ
डोरा हूँ मैं डोरा हूँ
हर क्षण बँधती डोरा हूँ.



होरा----घंटा
कोरा----नया
डोरा----प्रेम का बंधन  

Friday, April 15, 2011

देखना है

एक झोंका
हवा का
हवा दे गयी 
दबी चिंगारी को ..
या
मरे बीज में
भर प्राण
दे गयी 
अपनी गति
अपनी उर्जा ...
देखना है
लगती है आग
निर्जन में..
या
बनता है
कोई वटवृक्ष . 

Friday, April 8, 2011

मुहर

पंचजन्य तो
फूँक दिया है मैंने 
हुँकार अभी बाकी है....
मंजिल तो 
दिख ही रही है 
पहुँचना अभी बाकी है ...
दूरी तो
तय कर ली है हमने
हाथ का फासला बाकी है ...
रास्ते तो
फूलों से भरे है
कांटा चुनना अभी बाकी है ...
कदम तो
डगमगा रहे हैं पर
उन्हें घसीटना बाकी है ....
यह तो
प्रमाणित सत्य है
पर निर्विवाद होना बाकी है ..
हाँ!
हस्ताक्षर तो
कर दिये है मैंने और 
मुहर लगनी अभी बाकी है....  

Wednesday, March 23, 2011

कलई

निजता के आधार पर
निहायत गुप्त बातों में
बेईमानी का दिखना
प्रायः नगण्य होता है .......
पर मैं तो देखती रहती हूँ
स्वहित के मामले में
वह कैसे फन उठाती है 
और मैं कितनी चालाकी से 
उसकी फुफकार को
हुकुम मानते हुए उसे
दूध-लावा चढ़ाती हूँ ...........
भले ही आंतरिक रूप से कायर
पर बाह्यरूप से मैं ठहरी
अहिंसा की पुजारी
फन कुचलने से बेहतर
यही है कि उसकी
सारी सुख-सुविधा का
भरपूर ख्याल रखते हुए
अपना जंगल-राज दे दूँ ....
ताकि वह सार्वजानिक रूप से
विद्रोह न कर दे........
जिसको दबाने में कहीं
मेरी ईमानदारी की
कलई न खुल जाए . 

Saturday, February 26, 2011

क्लोनिंग


हिटलर जीन के
आदेश पर
प्रतिकृतिकरण
भ्रष्ट मानव का........
अनियंत्रित विभाजन
कैंसरयुक्त कोशिका की तरह
मेटास्टैसिस की
भरपूर क्षमता लिए हुए...
हाँ ! कुछ-कुछ
हवा से फैलने वाला
संक्रामक रोग सा.........
आह !
इस कलयुगी प्रयोगशाला में 
परीक्षण मानव पर ही   
जो छलांग लगा रहे हैं
विकास के चरम बिंदु से
पशु-रेखा के नीचे 
और शुभचिंतक बन
स्वजनों को साथ लिए ...
वाह !
भौतिक उपभोग का
सबसे सरल तथा 
उपयोगी विधि  
आत्मा का घोटाला कर
सबकुछ अपने पेट में डालना
जो तोंद दिखने लग जाये तो
कालिख में मुँह छुपा लेना .......
हाय !
स्वपोषण के लिए
मानवता का ऐसा दोहन....
आज हर तरफ दिख रहा है
भ्रष्ट मानव का
प्राकृतिक क्लोनिंग
सौ फीसदी शुद्धता वाला......
परिणाम
बुरी तरह से घिरे हैं हम
व्यभिचार और भ्रष्टाचार के बीच
जो खुले बाज़ार में नंगा हो
दिखा रहा है अपना
विध्वंसक तांडव.


एक तड़क तड़का और .......

भ्रष्टाचार के गर्म तवे पर
कुछ ज्यादा रोटी सिंक रही है
लूट सको तो लूट लो भाई
यह मुफ्त में ही बिक रही है .







Thursday, February 17, 2011

स्फिंक्स

वक़्त-बे-वक़्त
मेरी आतंरिक आवश्यकताएँ
करने लगती है
सुरसा से प्रतिस्पर्धा.....
चतुर-बहवे की चतुराई को भी
सूक्ष्मता से शिकस्त देते हुए...
सोने की लंका की क्या बिसात
आकाश-महल बनाने की
जिद लिए हुए ...............
देखते-ही-देखते 
मेरी महत्वाकांक्षा
पिरामिड का शक्ल
लेने लगती हैं............
आधार इतना बड़ा कि
उसकी संतति भी
रह सके सदियों तक........ 
लेकिन ऊपरी छोर
इतना नुकीला कि
वो भी टिक न पाए ............
और मैं स्फिंक्स बन 
करती रहती हूँ रखवाली
कहीं मेरे ममी पर ही
ये खड़ी न हो जाए.
चतुर-बहवे ---हनुमान

Monday, February 7, 2011

दबंग यादें

मुई यादें हमेशा
पीठ पीछे करती हैं वार....
कई-कई तीर बिंध जाते हैं 
छाती में और
उसके अन्दर का यन्त्र
कुछ पल के लिए
टीस के मारे 
अपना काम भूल जाता है...
अतीत के चाक पर
समय बेतरतीब नाचने लगता है
घटनाएँ दर्शक बन
अगली पंक्ति में बैठने को
करने लगती हैं मारामारी
कुछ दबंग यादें
अपना रौब दिखाकर 
चाक के बीचो-बीच
बैठ जाती हैं
जहाँ से कोई भी 
माई का लाल उठा न पाए...
उसकी खुशामद में 
दासानुदास बन जाते हैं
सोच के यन्त्र
अब चढावा चढ़ाओ
सारी सोच का
तब तक चढाते रहो
जब तक वे खुश न हों ...
आत्म शोषण का
एक रोमांचक खेल
भावनाएं एक अति से
दूसरे अति पर कूदती हुई
हम निरीह होकर
सिर्फ देखते रहते हैं....
दबंग यादें -इतनी बाहुबली कि
अतीत को भी
वर्तमान बनाने का
दम- ख़म रखती हैं....
और हम
उसी यंत्रणा-काल जनित
सुख-दुःख के भंवर में
उलझते चले जाते हैं . 
   
आइये ...इस बसंती -बयार में कुछ मिजाज़ बदला जाये ......................

Monday, January 31, 2011

विजिगीषा

घनघोर बियाबान
घुप्प अँधेरा
घातक जीव-जन्तु
घड़ी-घड़ी घुटन से  
घिघियाती हुई........  
मैं -एक ठूँठ
अपने आखिरी पत्ते को 
कसकर......पकड़ी हुई
पास पड़े एक
पत्थर को देखकर 
मन-ही-मन
सोचती हुई कि--
कभी तो
किसी के पैर से छूकर
शापमुक्ति संभव है ....
पर मुझे तो
अपने उसी आखिरी
पत्ते के सहारे ही
वसंत की राह देखनी है
ताकि मैं फिर से
हरी -भरी हो सकूँ
उस बियाबान में भी
जिजीविषा से भरी हुई
विजिगीषा का
सन्देश देते हुए .........
 
जिजीविषा -अदम्य जीने की इक्क्षा
 विजिगीषा -विजय पाने की इक्क्षा.

Sunday, January 16, 2011

दावा

जितनी रहस्यमयी है
घर से बाहर की दुनिया
उससे कहीं ज्यादा
रहस्यमय है -ये घर
ऐसा भूलभुलैया
जिसका सबकुछ
कहीं खो गया है...
इसके नक़्शे में तो
सात सौ खिड़की और
नौ सौ दरवाजों का जिक्र है....
मानो समय
पृथ्वी के गर्भ में
छोड़ गया हो
साँस के साथ जनमती आशा 
उसी के साथ मरती भी ....
देह की झुर्रियां गवाही देती
और भी रहस्यमयी ...
घर का कोना -कोना
एक अनसुलझी पहेली
जिसे सुलझाते-सुलझाते ...
उलझती मैं........
वो सुई भी खोई है
इसी घर में
जिससे मैं कभी
सिया करती थी
समय के टुकड़ों को...
अधूरी पड़ी मेरी चादर
थोड़ी ढकी मैं
थोड़ी उघडी...
घर की तरह ही -
रहस्यमयी.......
दावा करती हुई 
कि--------मैं हूँ .

Saturday, January 1, 2011

निजूठा

 निबद्ध पूर्वाग्रहों को
निभृत पूर्वानुमानों को
निःसत्व पूर्व दृष्टियों को
निध्यात पूर्वोपायों को
निधेय पूर्वोक्तियों को
क्यों न हम प्रिय 
पूर्णतः निग्रह करें....
नवागत पलों का
साद्धंत सम्मान करें..
सानंद समालिंगन करें.....
आओ प्रिय !
पुनः नव जाग्रत हो
निजूठे क्षणों का अवकलन करें
निजूठे स्वप्नों का सृजन करें
निजूठे कल्पनाओं का आयोजन करें....
हाँ प्रिय !
प्रति नव क्षण में
क्यों न हम
निजूठे आत्मानंद का संग्रहण करें ?

निजूठा-जो पहले न सोचा गया हो
निबद्ध -बंधा हुआ ...,निभृत -निश्चित ....,निःसत्व -सारहीन ....., निध्यात -विचारित ...,निधेय -स्थापित किये जाने योग्य ..., निग्रह -रोकना ...,साद्धंत -सम्पूर्ण ...,
आशा है कि आप सबों को असुविधा नहीं होगी . मैं अपने प्रिय संग हर  आने वाले पल का स्वागत कुछ इस तरह ही करना चाहती हूँ .आप सबों को भी हार्दिक शुभकामनाये .... कि हर पल मंगलमय हो और कुछ नया हो ...........  जिसे आप आनंद से स्वीकार करें.

                               

Wednesday, December 22, 2010

विरोधाभास

क्यूँ मैं कहूँ
पारदर्शी हो तुम 
पूरे सौ प्रतिशत
जबकि तुममें
दिखती हूँ मैं...
पर कहीं न कहीं
है विरोधाभास
जहाँ मेरी धडकनें
मिल गयी है तुमसे
वहीँ एक -एक विचार
कहीं छूट गए है...
मैं अनुभव कर सकती हूँ
तुम्हारी विराटता का
अपनी ग्राह्यता के अनुसार
ग्रहण कर सकती हूँ तुम्हें 
मिलावटों से निथारते हुए...
पर सांसो की डोर
बंधी है तुमसे ...
और मैं लेना चाहूंगी
जन्म-जन्मान्तर तक जन्म
तुमसे बंधने के लिए
या अपनी मुक्ति के लिए
या फिर
विरोधी सत्य के लिए ?
 

Thursday, December 2, 2010

इतर

कोई परिग्रह नहीं
परिग्रह तो दूर की बात
कोई आग्रह भी नहीं ...
कोई प्रतिबंध नहीं
प्रतिबंध तो दूर की बात
कोई अनुबंध भी नहीं ...
कोई विकांक्षा नहीं
विकांक्षा तो दूर की बात
कोई आकांक्षा भी नहीं ...
कोई परिवर्जन नहीं
परिवर्जन तो दूर की बात
कोई आवर्जन भी नहीं ...
कोई विक्षोभ नहीं
विक्षोभ तो दूर की बात
कोई क्षोभ भी नहीं ...
कोई प्रतिलंभ नहीं
प्रतिलंभ तो दूर की बात
कोई उपालंभ भी नहीं ...
कोई परिसंवाद नहीं
परिसंवाद तो दूर की बात
कोई संवाद भी नहीं ....
प्रिय! इन सबसे इतर यदि
हम एक-दूसरे में
प्रतिपल प्रमत्त हों ...
हमारा रोम-रोम
प्रतिक्षण प्रस्फुटित हो...
और हमारी तरंगें
प्रतिसम प्रसक्त हों ...
तो निःस्संदेह
प्रेम ही है ...

Wednesday, November 17, 2010

औचित्य .......

खोजती रही मैं ..
अपने पादचिह्न
कभी आग पर चलते हुए
तो कभी पानी पर चलते हुए
खोजती रही मैं ..
अपनी प्रतिच्छाया
कभी रात के घुप्प अँधेरे में
तो कभी सिर पर खड़ी धूप में
खोजती रही मैं ..
अपना परिगमन -पथ
कभी जीवन के अयनवृतों में
तो कभी अभिशप्त चक्रव्यूहों में
खोजती रही मैं..
अपनी अभिव्यक्ति
कभी निर्वाक निनादों में
तो कभी अवमर्दित उद्घोषों में
खोजती रही मैं ..
अपना अस्तित्व
कभी हाशिये पर कराहती आहों में
तो कभी कालचक्र के पिसते गवाहों में
हाँ ! खोज रही हूँ मैं ........
नियति और परिणति के बीच
अपने होने का औचित्य .

Monday, November 8, 2010

अज्ञात नदी

ऐसा नहीं हो सकता कि
कोई अज्ञात नदी
पृथ्वी तले चुपचाप बहती हुई
समंदर की तरफ बढ़ी जा रही हो
हालाँकि उसका सफ़र
थोड़ा मुश्किल भरा होगा
उसे कुछ ज्यादा
वक्त लग रहा होगा
फिर भी बहती चली जा रही है
धीरे -धीरे , धीरे -धीरे
अपनी व्यथा को
स्वयं में ही समेटे हुए
हाँ प्रिय !
वो नदी मैं ही हूँ और
बाँहें फैलाये हुए तुम - समंदर
मुझमें ठंडा उन्माद है
तो तुममें उतप्त धैर्य
समय के साथ एकाकार होकर
मैं आ रही हूँ , आ रही हूँ ....
राहगीरों की प्यास बुझाते हुए
तुम भी अपनी सीमाओं को
और फैलाओ , और फैलाओ ....
ताकि जब हम मिलें तो
क्षितिज भी शेष न रहे .

Wednesday, November 3, 2010

सोचती हूँ ........

दीवाली है
सोचती हूँ
सबों के साथ
उत्सवी उमंग में डूब जाऊं
संभृत समस्याओं को छोड़
सफाई पुताई में लग जाऊं ....
मन के कचड़े को
कहीं दूर ले जाकर
सुरक्षित निपटान करूँ
कुछ चटकीले रंगों से
नए कलेवर में
रंग रोगन करूँ ......
खुशियों की रेवड़ियाँ
जी भर के खाऊं खिलाऊं...
सभी तो
घर से बाहर तक
दीपों से रोशनी फैलाते हैं
अपने अन्दर के शोर को
पटाखों से दबातें हैं
अतृप्त तृष्णा को
छप्पन भोग लगाते हैं
सोचती हूँ ......
कभी किसी भी
प्रदुषण से मैं
पूर्णतः मुक्त होकर
एक ह्रदय दीप भी
जला लूँ तो
हो जाए
दीवाली .

Thursday, October 28, 2010

अहंता

विद्वेष
वैमनस्य
विवाद
शीतयुद्ध
न संधि न समाप्ति
एक समान योद्धा
मेरी बनायीं हुई दुनिया
एकतरफ ......
और मैं
दूसरी तरफ
क्या मुझे
मरना पड़ेगा
स्वामी - हंता
अहंता से .

स्वीकार

ठहरने को तो
ठहर जाऊं कुछ पल
तुम्हारे पास
पर मैं रुक नहीं सकती
तबतक , जबतक की तुम
रोकना चाहो मुझे
सँवरने को तो
सँवर जाऊं कई -कई बार
तुम्हारे लिए
पर मैं निखर नहीं सकती
वैसे , जैसे की तुम
निखारना चाहो मुझे
प्रिय ! तब आरोपण क्यों
अगर प्रेम है तो
आओ .......
एक -दूसरे को हम
स्वीकार करें
समग्रता से
सहज रूप में .

Wednesday, October 27, 2010

न्याय

मेरे व्यक्तित्व के
विभिन्न पक्षों को
परस्पर
संतुलित करता है
मेरी आत्मा में
निहित न्याय
मेरी आवश्यकताएं
पूरक माध्यम ......
मेरी गतिशीलता
मेरी अकर्मण्यता
मेरी हिम्मत
मेरा साहस .....
मेरी चेतना में
अद्भुत समन्यवय
दुर्लभ सामंजस्य
जो मुझे बोध कराता है
मेरे कर्तव्य का
मेरे अस्तित्व का
फिर मैं
और क्या अपेक्षा करूँ
उस न्याय से
जो अन्य करते हैं
अपने हिसाब से
मेरे लिए .

अपेक्षा

अपनी दया पर आश्रित मैं
मुझसे कैसी अपेक्षा
सद्गुणों की या
उसकी किसी भी धारणा की
मूल्यों की या
उसकी किसी भी ऊंचाई की
मौलिकता की या
उसकी किसी भी छाया की
सर्वश्रेष्ठता की या
उसके किसी भी दु:स्वप्नों की
मानवता की या
उसकी किसी भी प्रतिबद्धता की
यदि मैं स्वयं से ही
स्वतंत्र हो जाऊं तो
मुझसे की जाने वाली
तमाम अपेक्षाएं
जायज है .