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Thursday, January 27, 2022

शब्द ब्रह्म को मेरा प्रणाम ! ........

शब्दों को मेरा प्रणाम !

उनके अर्थों को मेरा प्रणाम !


उनके भावों को मेरा प्रणाम !

उनके प्रभावों को मेरा प्रणाम !


उनके कथ्य को मेरा प्रणाम !

उनके शिल्प को मेरा प्रणाम !


उनके लक्षणों को मेरा प्रणाम !

उनके लक्ष्य को मेरा प्रणाम !


उनकी ध्वनि को मेरा प्रणाम !

उनके मौन को मेरा प्रणाम !


उनके गुणों को मेरा प्रणाम !

उनके रसों को मेरा प्रणाम !


उनके अलंकार को मेरा प्रणाम !

उनकी शोभा को मेरा प्रणाम !


उनकी रीति को मेरा प्रणाम !

उनकी वृत्ति को मेरा प्रणाम !


उनकी उपमा को मेरा प्रणाम !

उनके रूपक को मेरा प्रणाम !


उनके विधान को मेरा प्रणाम !

उनके संधान को मेरा प्रणाम !


शब्द ब्रह्म को मेरा प्रणाम !

उनको बारंबार मेरा प्रणाम !

                                      "ॐ शब्दाय नम:" शब्द ब्रह्म उस परम दशा का इंगित है जो निर्वचना है। हृदय काव्यसिक्त होकर ही उस ब्रह्म नाद में तन्मय होता है। तब "शब्द वाचक: प्रणव:" अर्थात शब्द उस परमेश्वर का वाचक होता है। उसी अहोभाव में हृदय प्रार्थना रत है और हर श्वास से ध्वनित हो रहा है- शब्द ब्रह्म को मेरा प्रणाम !


Thursday, January 20, 2022

कैसे भेंट करूँ? ........

गुलाब नहीं मिला 

तो पंँखरियाँ ही लाई हूँ !

बाँसुरी नहीं मिली

तो झंँखड़ियाँ ही लाई हूँ !

कैसे भेंट करूँ ?

सुवासित हुई तो

सुगंधियाँ लाई हूँ !

गुनगुन उठा तो

ध्वनियाँ ही लाई हूँ !

कैसे भेंट करूँ ?

देखो !

प्रेम प्रकट है

निज दर्श लाई हूँ !

तुम्हें छूने के लिए

कोमल से कोमलतम 

स्पर्श लाई हूँ !

कैसे भेंट करूँ ?

संग-संग इक

झिझक भी लाई हूँ !

ये मत कहना कि

विरह जनित

मैं झक ही लाई हूँ !

कैसे भेंट करूँ ?

तुम ही कहो !

तुम्हें देने के लिए

बिन कुछ भेंट लिए

कैसे मैं चली आती ?

लाज के मारे ही

कहीं ये धड़कन 

धक् से रूक न जाती !

यूँ निष्प्राण हो कर भला

जो सर्वस्व देना है तुम्हें

कहो कैसे दे पाती ?

मेरे तेजस्व !

हाँ ! निज देवस्व

देना है तुम्हें

अब तो कहो !

कैसे भेंट करूँ ?

Sunday, January 16, 2022

स्नेह-शिशु ..........

                                       अविज्ञात, अविदित प्रसन्नता से प्रसवित स्नेह-शिशु हृदय के प्रांगण में किलकारी मारकर पुलकोत्कंपित हो रहा है। कभी वह निज आवृत्ति में घुटने टेक कर कुहनियों के बल, तो कभी अन्य भावावृत्तियों को पकड़-पकड़ कर चलना सीख रहा है। विभिन्न भावों से अठखेलियाँ करते हुए, गिरते-पड़ते, सम्भलते-उठते, स्वयं ही लगी चोटों-खरोंचों को बहलाते-सहलाते हुए, वह बलक कर बलवन्त हो रहा है। कभी वह हथेलियों पर ठोड़ी रख कर, किसी उपकल्पित उपद्रव के लिए, शांत-गंभीर होकर निरंकुश उदंडता का योजना बना रहा है। तो कभी अप्रत्याशित रूप से उदासी को, मृदु किन्तु कम्पित हाथों से गुदगुदा कर चौंका रहा है। कभी वह अपने छोटे-छोटे, मनमोही घुँघरुओं की-सी रुनझुनाहट से, पीड़ित हृदय के बोझिल वातावरण को, मधुर मनोलीला से मुग्ध कर रहा है । तो कभी इधर-उधर भाग-भाग कर, समस्त नैराश्य-जगत् को ही, अपने नटराज होने की नटखट नीति बता रहा है। 

                     स्नेह-शिशु कभी निश्छल कौतुकों से ठिठक कर, इस भर्राये कंठ में जमे सारे अवसाद को पिघलाने के लिए, प्रायोजित उपक्रम कर रहा है। तो कभी वह ओठों के स्वरहीन गति को, निर्बंध गीतों में तोतलाना सिखा रहा है। वह येन-केन-प्रकारेण हृदय को, अपने अनुरागी स्नेह-बूँदों की आर्द्रता देकर, नव रोमांच से अभिसिंचित करना चाह रहा है। उसके नन्हें-नन्हें हाथों का घेराव, उसका यह कोमल आग्रह बड़ी प्रगाढ़ता से, मनोद्वेगों को समेट रहा है। फिर आगे बढ़ कर उसे आगत-विगत के समस्त व्यथित-विचारों से, विलग कर अपने निकट खींच रहा है। संभवतः उसका यह भरपूर लेकिन गहरा स्पर्श, उस अर्थ तक पहुँचने का यत्न है, जो स्वयं ही अवगत होता है। जिसे नैराश्य-जगत् का झेंप और उकताहट, मुँह फेर कर अवहेलना कर रहा है। पर स्नेह-शिशु की प्रत्येक भग्नक्रमित भंगिमाएँ उसे भी सायास मुस्कान से भर रहा है। तब तो उदासी भी अपलक-सी, अवाक् होकर उसका मुँह ताक रही है। जिससे उसपर पड़ी हुई व्यथा की, चिन्ता की काली छाया, विस्मृति के अतल गर्त में उतरने लगी है। 

                             स्नेह-शिशु अयाचित-सा एक निर्दोष अँगराई लेते हुए, विस्तीर्ण आकाश को, बाँहों से फैला रहा है। वह मनोविनोदी होकर, छुपा-छुपाई खेलना चाह रहा है। ऐसा करते हुए वह कभी दु:ख के पीछे, कभी संताप के पीछे छुप रहा है। तो कभी चुपके-से वह व्यथा का, तो कभी हताशा का आड़ ले रहा है। उसे पता है कि वह कितना भी छुपे, पर अब कहीं भी छुप नहीं सकता। फिर भी वह घोर निराशा के पीछे, स्वयं को छुपाने का अनथक प्रयास कर रहा है। पर उसका यह असफल प्रयास, हृदय को अंगन्यास-सा आमोदित कर रहा है। जिसे देखकर वह भी अपने स्वर्ण-दंत-पंक्तियों को निपोड़ते हुए, प्रमोद से खिलखिला रहा है। ऐसा करते हुए वह कभी इधर से तो कभी उधर से, अपने सुन्दर-सलोने मुखड़े को आड़ा-तिरछा करके, उदासी को चिढ़ा रहा है। तो कभी प्रेम-हठ से उसका हाथ पकड़े, चारों ओर चकरघिन्नी की तरह घुमा रहा है। उदासी अपने घुमते सिर को पकड़कर, उसे कोमल किन्तु कृत्रिम क्रोध से देख रही है।

                    स्नेह-शिशु को यूँ ही उचटती दृष्टि से देखते हुए भी चाहना के विपरीत, बस एक अवश भाव से मन बँधा जा रहा है। वह भाव जो प्रसन्नता के भी पार जाना चाहता है। वह भाव जो उसके प्रेम में पड़कर उसी के गालों को, पलकों को, माथे को बंधरहित होकर चूमना चाह रहा है। ऐसा लग रहा है कि जैसे वह भी प्रतिचुम्बन में उदासी के आँखों को, कपोलों को,  ग्रीवा को, कर्णमूल को, ओठों को एक अलक्षित चुम्बन से चूम रहा हो। जिससे अबतक हृदय में जमा हुआ सारा अवसाद द्रवित होकर द्रुत वेग से बहना चाह रहा है। फिर तो उसकी उँगलियाँ भी उदासी के माथे के उलझे बालों से बड़े कोमल स्पर्श में खेलने लगी हैं। ऐसा अविश्वसनीय इन्द्रजाल! ऐसा संपृक्त सम्मोहन! ऐसा आलंबित आलोड़न! जिससे हृदय एक मीठी अवशता से अवलिप्त होकर सारे नकारात्मक भावों को यथोचित सत्कार के साथ विदा करना चाह रहा है। 

                                                 स्नेह-शिशु के लिए एक स्निग्ध, करुण, वात्सल्य-भरा स्पर्श से उफनता हुआ हृदय स्वयं को रोक नहीं पा रहा है। उसकी सम, कोमल थपकियों से, कभी बड़ी-बड़ी सिसकियों से अवरूद्ध हुआ स्वर, पुनः एकस्वर में लयबद्ध हो रहा है। फिर कानों में जीजिविषा की एक अदम्य फुसफुसाहट भी तो हो रही है। फिर से इन आँखों को भी सत्य-सौंदर्य की दामिनी-सी ही सही कुछ झलकियाँ दिख रही है। उदास विचार मन से असम्बद्ध-सा उसाँस लेकर क्षीणतर होने लगा है। अरे! ये क्या ? स्नेह-शिशु के पैरों का थाप चारों ओर तीव्र-से-तीव्रतर होता जा रहा है। मानो स्नेह-शिशु का इसतरह से ध्यानाकर्षण, सहसा स्मृति के बाढ़ को ही इस क्षण के बाँध से रोक दिया हो।

                                     स्नेह-शिशु के इस जीवन से भरपूर, ऐसा प्रगाढ़ चुम्बन और आलिंगन में हृदय हो तो किसी भी अवांछित उद्वेग को, मन मारकर, दबे पाँव ही सही अपने मूल में लौटना ही पड़ेगा। तब चिरकालिक शीत-प्रकोपित अलसाये उमंगों को भी मुक्त भाव से मन में फूटना ही पड़ेगा। मृत-गत विचारों के बाहु-लता की जकड़ को ढीली करके, आकाश के विस्तार में फिर से हृदय को ऊँची छलांग लगाना ही होगा। कोई भी टूटा स्वर ही क्यों न हो सही पर,जीवन-गीत को नित नए सुर से गाना ही होगा। साथ ही जीवन के सरल सूत्रों के सत्य से, आंतरिक सहजता को आदी होना ही होगा। जब क्षण-क्षण परिवर्तित होते भाव-जगत् में भी भावों का आना-जाना होता ही रहता है तो ये उदासी किसलिए ? स्नेह-शिशु भी तो यही कह रहा है कि जब कोई भी भाव स्थाई नहीं है तो उसे पकड़ कर रखना व्यर्थ है और आगे की ओर केवल सस्नेह बढ़ते रहने में ही जीवन का जीवितव्य अर्थ है। 

Monday, January 10, 2022

जात न पूछो लिखने वालों की .........

जात न पूछो

लिखने वालों की

ख्यात न पूछो

न दिखने वालों की


रचना को जानो

जितना मन माने

उतना ही मानो

पर रचनाकार को 

जान कर क्या होगा?

उसको पहचान कर क्या होगा?

परम रचयिता कौन है?

सब उत्तर क्यों मौन है?

प्रश्न तो करते हो पर

उस परम रचनाकार को

क्या तुमने जाना है?

जितना जाने

उतना ही माना है

न जाने तो

बस अनुमाना है


जात न पूछो

लिखने वालों की

मिथ्यात न पूछो

न दिखने वालों की


यदि रचना में

कोई त्रुटी हो तो

निर्भीक होकर कहो

पर नि:सृत रसधार में

रससिक्त होकर बहो

और यदि

स्वाग्रह वश

बहना नहीं चाहते 

तो बस दूर रहो

मन माने तो

रचना को मानो

न माने तो मत मानो

पर रचनाकार को

जान कर क्या होगा?

उसको पहचान कर क्या होगा?


जात न पूछो

लिखने वालों की

अखियात न पूछो

न दिखने वालों की .

                  " भाषा जब सांस्कृतिक अर्थ व्यंजनाओं से निरंतर जुड़ कर समाज को शब्दों के माध्यम से सम्प्रेषित करती है तो सर्जनात्मकता अपने शिखर को पाती है । तब लिखने वाले माध्यम भर ही रह जाते हैं और हमारी भाषा स्वाधीनता की ओर अग्रसर होती है । "

         *** विश्व हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

Wednesday, January 5, 2022

कह तो दे कि वो सुन रहा है .….….

                        नियति के आश्वासन जनित,  अपरिभाषित आत्मीय संबंधों के स्मरणाश्रित अतिरेकी बातें, अस्तित्व विहीन हो कर भी, अकल्पित अर्थों को अनवरत पाती रहतीं हैं । वें पल-पल पर-परिणति को पाते हुए भी बनीं रहतीं हैं एक अपरिचित एकालाप-सी । नितान्त एकाकी होकर भी एकाकार-सी । अन्य विकल्पों से एक निश्चित दूरी बनाए हुए पर समानांतर-सी ।  एक ऐसे प्रश्न की भांति जो प्रश्न होने में ही पूर्ण हो । जिसे सच में कभी भी किसी उत्तर की कोई आवश्यकता होती ही नहीं हो । बस उन आत्मीय संबंधों में स्वयं को असंख्य कणों के आकर्षणों में पाना अविश्वसनीय आश्चर्य ही है ।        

                                  उन संबंधों को जीते हुए किसी से समय रहते हुए वो सब-कुछ नहीं कह पाने का एक गहरा परिताप सदैव सालता रहता है । समय रहते यदि वो सबकुछ कह दिया जाता जो अवश्य कह देना चाहिए था तो ............... । तो क्या नहीं कह पाने के पश्चाताप को दुःख से बचाया जा सकता था ? संभवतः नहीं । कारण वो सबकुछ,  जो आज उसके न होने पर,  कुछ अधिक ही स्पष्ट हुई है,  उसे जीते हुए अस्पष्ट ही थी । तो क्या कह देना चाहिए था उससे ? वो जो उस समय उसे अपनी अस्फुट धुन बनाये हुए जी रहे थे या अब उस धुन के बोलों को समझने में उलझते हुए जो कहना चाहते हैं । हाँ! उस समय भी कह देना चाहिए था और आज भी कह देना चाहिए कि तुम मेरी नियति के आश्चर्य हो, मेरे अस्तित्व-सा ।

                                        सच में, कोई भी रागात्मक संबंध रूपाकार होकर जीवन-छंद-लय को समूचा घेर लेता है । पर जीवन राग का कोई विरागी सहचर,  उससे भी गहरा होकर एक अरूपाकार आवरण बनकर,  कवच की भांति अस्तित्व को ही घेरे रहता है । कोई कैसे सम्वेदना का अनकहा आश्वासन बनकर हमारे भावना-जगत् में हस्तक्षेप करने लगता है । वह हमारी उन मूक संभावनाओं को सतत् सबल बनाता रहता है जिनकी हमें पहचान तक नहीं होती है । हम ऐसा होने के क्रम में  इतने अनजान होते हैं कि इस सूक्ष्म बदलाव के प्रति हमें ही आश्चर्य तक नहीं होता है । जब कभी आँखें खुलती है तो अपने ही इस रूप पर हम अचंभित रह जाते हैं । लेकिन धीरे-धीरे वह निजी जीवन में भी एक निश्चयात्मक स्वर बन कर अस्फुट वार्तालाप करने लगता है । हमें भरोसा दिलाता रहता है कि वह हर क्षण हमें दृढ़ता से थामें है और हम सुरक्षित हैं । 

                                          अब उसके नहीं होने के दुःख के साथ प्रायश्चित का दुःख भी भावों को नम किये रहता है । अब किससे कहना और क्या कहना ? जिससे कुछ कहना था वो मौन हो गया तो अब मौन में ही सबकुछ कहा और सुना जा रहा है । यदि वो अज्ञात से ही सही सुन रहा है तो ये मौन के शब्द उसे अवश्य वो सबकुछ कहते होंगे, जो कभी शब्दों में नहीं कहे जा सकते हैं । पता है, इन भींगे हुए शब्दों में भी उस दुःख की कभी समाई नहीं हो पाएगी । जब हृदय कहना चाहता था तो मस्तिष्क जनित द्वंद्व उसे कहने नहीं दिया । अब वही मस्तिष्क हृदय की पीड़ा को प्रबलता से प्रभावित कर रहा है । अब एक अंतहीन प्रतीक्षा है और एक अनवरत पुकार है । जिसे वह भी चुपचाप अनदेखा तो नहीं कर सकता है । संभवतः वह भी बोल रहा है कि पुनः मिलना होगा, अवश्य मिलना होगा ।  अटूट आस्था तो यही कहती है ‌।  उसकी ओर ही यात्रा भी हो रही है । अब वो सारी बातें उसे समय से कही भी जा रही है । बस एक बार ही सही वह कह तो दे कि वो सुन रहा है .….…

                                                                               

Sunday, September 19, 2021

कल्पना का खजाना .........

                              कल्पना करें यदि आपके सामने एक तरफ कुबेर का खजाना हो और दूसरी तरफ कल्पना का खजाना हो तो आप किसे चुनेंगे ? गोया व्यावहारिक तो यही है कि कुबेर का खजाना ही चुना जाए और बुद्धिमत्ता भी यही है ।  तिसपर महापुरुषों की मोह-माया-मिथ्या वाले जन्मघुट्टी से इतर बच्चा-बच्चा जानता है कि इस अर्थयुग में परमात्मा को पाने से ज्यादा कठिन है अर्थ को पाना । क्योंकि अर्थ के बिना जीवन ही अनर्थ है । इसलिए जो कुबेर के खजाने को चुनते हैं उनको विशुद्ध रूप से आदमी होने की मानद उपाधि दी जा सकती है । यदि कोई दोनों ही हथियाने के फिराक में हैं तो उन्हें बिना किसी विवाद के ही महानतम आदमी माना जाएगा । और जो ..... खैर !

                        पर कोई तो इस लेखक-सा भी महामूर्ख होना चाहिए जो रबर मैन की तरह दोनों बाँहों को बड़ा करके लपलपाते जिह्वा से लार की नदियाँ बहाते हुए कल्पना के खजाना को पूरे होशो-हवास में चुने । कारण लिखनेवाला एक तो तोड़-मरोड़ वाला लेखक है ऊपर से जोड़-घटाव वाला कवि भी है । तो कल्पना के खजाने का रूहानियत उससे ज्यादा भला कोई और कैसे जान सकता है । कल्पना करते हुए वह खुद को कुबेर से भी ज्यादा मालामाल समझता है । यकीन न हो तो उसके कल्पना से कुछ भी माँग कर देखें । यदि महादानी कर्ण भी रणछोड़ न हुआ तो नया महाभारत लिख दिया जाएगा इसी लेखक के काल्पनिक करों से ।

                               तो कल्पना करते हुए लेखक वो सब कुछ बन जाता है जो वो कभी हक़ीक़त में बन नहीं सकता है । अक्सर वह स्पाइडर-मैन की तरह महीन और खूबसूरत जाला बुनता है जिसमें खुद तो फँसता ही है , औरों को भी झाँसा देकर ही खूब फँसाता है । फिर शक्तिमान की तरह अपने काल्पनिक किल्विष को हमेशा हराता रहता है । अपनी कल्पनाओं की दुनिया में ही वह एक बहुत ही सुन्दर दुनिया बसाता है । जिसमें वास्तविक रूप से सुख, समृद्धि और शांति ले आता है । जो उसे कुछ पल के लिए ही सही पर बहुत सुकून देता है । जो इस दुनिया में अब कहीं ढ़ूँढ़ने से भी उसे नहीं मिलता है । शायद उसके लिए सारी सतयुगी बातें अब काल्पनिक हो गई हैं या फिर सच में विलुप्त होने के कगार पर ही है । 

                           तो अब सवाल ये है कि कल्पना के बिना इस बर्दाश्त से बाहर वाली दुनिया में दिल लगाए भी तो कैसे लगाए । जहाँ कुछ भी दिल के लायक होता नहीं और जो होता है उसके लायक लेखक होता नहीं है । तो ऐसे में सच्चाई को स्वीकार करते-करते हिम्मत बाबू अब उटपटांग-सा जवाब देने लगें हैं । तो फिर जन्नत-सी आजादी की बड़ी शिद्दत से दरकार होती है जो सिर्फ कल्पनाओं में ही मिल सकती है । एक ऐसी आजादी जिसे किसी से न माँगनी पड़ती है और न ही छीननी पड़ती है । तब तो वह कल्पना के खजाने को खुशी से चुनता है और उसकी महिमा का बखान भी एकदम काल्पनिक अंदाज में करता है । 

                           फिर से कल्पना करें कि यदि सब हीरे-जवाहरातों में ही उलझ जाएंगे तो सबके ओंठों पर काल्पनिक ही सही पर मुस्कान कौन खिलाएगा ? आखिर मुस्कान खिलाने वाले प्रजातियों को भी थोड़ी तवज्जो ज़रूर मिलनी चाहिए । ताकि मुंगेरी लालों के काल्पनिक दुनिया में एक से एक हसीन सपने अवास्तविक और अतार्किक रूप से और भी ऊँची-ऊँची कुलाँचे भर सके । जिन्हें नहीं पता है तो वे अच्छी तरह से पता कर लें कि इस छोटी-सी जिंदगी में महामूर्खई करके हँसी-दिल्लगी भी न किया तो फिर क्या किया । इसलिए हमारे जैसे महामूर्खों की कल्पनाओं की दुनिया तो कुछ ज्यादा ही आबाद होनी चाहिए ।

                                      वैसे भी इस सिरफिरे को बेहतर इल्म है कि कभी इसे सूरज पर बैठ कर चाय की चुस्कियाँ लेने की जबरदस्त तलब लगी तो बेचारा कुबेर का खजाना कुछ भी नहीं कर पाएगा । पर कल्पना का खजाना ही वो चिराग वाला जिन्न है जो इस तुर्रेबाज तलब को पूरा करके पूरी तरह से तबीयत खुश कर सकता है । ऐसे ही बेपनाह आरजुओं की लंबी-चौड़ी फेहरिस्त है जो सिर्फ कल्पनाओं में ही पूरी हो सकती है । तो कोई भी अपने सुतर्कों से लेखक के चुनाव को कमतर साबित करके तो दिखाएं । या फिर अपनी ही कल्पनाओं को हाजी-नाजी बना कर देख लें ।

                                                यदि इस कल्पनानशीन ने और भी मुँह खोला तो ख़ुदा कसम पृथ्वी बासी जैसे कल्पना के बाहरी दुनिया के जालिम लोग सरेआम उसे पागल-दीवाना जैसे बेशकीमती विशेषणों से नवाजेंगे । फिर तो इज्ज़त-आबरू जैसी भी कोई चीज है कि नहीं जिसे थोड़ा-बहुत बचा लेना लेखक का फ़र्ज़ तो बनता है । इसलिए खामखां अपनी कल्पनाओं की खिंचाई न करवा कर बस इतना ही कहना है कि जो कोई भी कुबेर के क़ातिल क़फ़स में फँसना चाहे शौक से फँसें । उन्हें ख़ालिस आदमी होने के लिए मुबारकबाद देने में भी ये महामूर्ख सबसे आगे रहेगा ।               

                       *** एक हास्यास्पद चेतावनी ***

 *** यदि किसी महामानव को इस महामूर्ख पर हल्की मुस्कान भी आ रही हो तो वह अट्टहास कर सकता है किन्तु आभार व्यक्त करते हुए ***

Tuesday, September 14, 2021

लेखनी चलती रहनी चाहिए .......

                 हिन्द दिवस पर हार्दिक प्रसन्नता के साथ ये स्वीकार करते हुए आत्मगौरव की अनुभूति हो रही है कि जब-जब स्वयं को अभिव्यक्त करना चाहा तब-तब अपनी भाषा के चाक पर गीली मिट्टी की भांति पड़ गई । जैसा स्वयं को गढ़ना चाहा वैसे ही गढ़ गई । हाँ !  मेरी भाषा ने ही मुझे हर एक भाव में व्यक्त कर मुझे आत्मभार से मुक्त किया है । हर बार निर्भार करते हुए हिन्दी ने मुझे ऐसा अद्भुत, अनोखा और अद्वितीय रूप में सँवारा है कि बस कृतज्ञता से नतमस्तक ही हुआ जा सकता है । आज अपनी भाषा के बल पर ही अपनी स्वतंत्रता की ऐसी उद्घोषणा कर सकती हूँ । जिसकी अनुगूँज में हमारी हिन्दी हमेशा गूँजती रहेगी । जिसका खाना-पीना, ओढ़ना-बिछौना हिन्दी ही हो तो उसे बस हिन्दी में जीना भाता है । फिर कुछ और सूझता भी नहीं है । वैसे हिन्दी की दशा-दिशा पर चिंतन-मनन करने वाले हर काल में करते रहेंगे पर जिन्होंने हिन्दी को अपना सर्वस्व दे दिया उनको हिन्दी ने भी चक्रवृद्धि ब्याज समेत बहुत कुछ दिया है । इसलिए हमारी मातृभाषा हिन्दी को बारंबार आभार व्यक्त करते हुए .........

अनुज्ञात क्षणों में स्वयं लेखनी ने कहा है कि -
लेखनी चलती रहनी चाहिए 
चाहे ऊँगलियां किसी की भी हो 
अथवा कैसी भी हो
  
चाहे व्यष्टिगत हो 
अथवा समष्टिगत हो 
चाहे एकल हो 
अथवा सम्यक् हो 
 
चाहे अर्थगत हो 
अथवा अर्थकर हो 
चाहे विषयरत हो 
अथवा विषयविरत हो 
 
चाहे स्वांत: सुखाय हो
अथवा पर हिताय हो
चाहे क्षणजीवी हो
अथवा दीर्घजीवी हो
 
चाहे मौलिक हो
अथवा प्रतिकृति हो
चाहे स्वस्फूर्त हो
अथवा पर प्रेरित हो
 
चाहे मंदगति हो
अथवा द्रुतगति हो
चरैवेति चरैवेति
लेखनी चलती रहनी चाहिए
 
इन ऊँगलियों से न सही
पर उन ऊँगलियों से ही सही
लेखनी चलती रहनी चाहिए 
सतत् लेखनी चलती रहनी चाहिए .

*** हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ***
 

Saturday, September 11, 2021

वो प्रेम ही क्या ........

वो प्रेम ही क्या

जो कहीं के ईंट को

कहीं के रोड़े से मिलाकर

भानुमती का कुनबा जोड़वाए

और उन्हें कोल्हू पर लगातार

तेरे-मेरे का फेरा लगवाकर

दिन-रात महाभारत करवाए


वो प्रेम ही क्या

जो दूसरों के मनोरंजन के लिए

खेल वाला गुड्डा-गुड्डी बनकर

सबको खुश कर जाए

फिर अपने बीच होते

पारंपरिक खटरागी खटर-पटर से

सबों को मिर्च-मसाला दे कर

खूब तालियां बजवाए


वो प्रेम ही क्या

जो जरा-सा ज्वलनक वाले

फुसफुसिया पटाकों की तरह

झट जले पट बुझ जाए

और उसके शोर को भी कोई

कानों-कान सुन न पाए

फिर भरी-पूरी रोशनी में भी

कालिख पोत बस अंधेरा ही फैलाए


वो प्रेम ही क्या

जो उबाऊ-सी घिसी-पिटी

दैनिक दिनचर्या की तरह

अति सरल-सुलभ हो कर

सुख-सुविधा भोगी हो जाए

और बात दर बात पर

अहं कटारी ले एक-दूसरे का

आजीवन प्रतिद्वंद्वी बन जाए


वो प्रेम ही क्या

जो पहले से निर्धारित सुलह के 

परिपाटी पर पूरा का पूरा खरा उतरे

पर जिसमें कोई भी रोमांच न हो

या न हो सैकड़ों-हजारों झन्नाटेदार झंझटें

और जो जान-जहान का रिस्क न लेकर

उठाये न लाखों-करोड़ों खतरे


वो प्रेम ही क्या

जिसको भली-भांति 

ये न पता हो कि

बस कुछ पल का ही मिलना है

और बहुत दूर हो जाना है

फिर मिलने की तड़प लिए

हर पल तड़फड़ाना है


वो प्रेम ही क्या

जिसपर दुनिया एक-से-एक

मजेदार मनगढ़ंत कहानियाँ

बना-बनाकर न हँसे

और एक सुर मिलाते हुए

सही-गलत की कसौटी पर

खूब बाँच-बाँच कर न कसे


वो प्रेम ही क्या

जो आह भरा-भरा कर

सबके सीने पर

जलन का साँप न लोटवाए

काश! उन्हें भी कभी

कोई ऐसा प्रेम मिल पाता

ये सोचवा-सोचवा कर

प्रेम हलाहल न घोटवाए


वो प्रेम ही क्या

जो दहकता अंगार बना कर

हर पल प्रेम दवानल में

बिना सोचे-समझे न कुदवाए

और अल्हड़ अक्खड़ता से

दोधारी तलवार पर चलवाकर

खुशी-खुशी शीश न कटवाए


वो प्रेम ही क्या

जो युगों-युगों तक

साँसों का सुगंध बन

सबके नथुनों को न फड़काए

और जीवित मुर्दों के साथ-साथ

लकीरों के फ़कीरों में भी

भड़भड़ करवा कर न भड़काए


वो प्रेम ही क्या

जो शब्दातीत होकर

शाश्वत न हो जाए

शायद इसीलिए तो

रुक्मिणी के शैलीगत प्रेम पर

राधा का शहद लुटाता प्रेम 

सदा के लिए भारी पड़ जाए .

Sunday, September 5, 2021

जब माँ किलक कर कहती है ...........

जब माँ 

अपनी बेटी से

किलक कर

कहती है कि

अरे !

तू तो 

मेरी ही माँ

हो गई है

तब गदराये गाल

और झुर्रियों की

अलोकिक दपदपाहट

ऊर्जस्वित होकर

सृष्टि और सृजन को

हतप्रभ करते हुए

परम सौभाग्य से

भर देती है.


                                   साधारणतया जो गर्भ धारण कर बच्चे को जन्म देती है वो माँ कहलाती है । माँ अर्थात सृष्टि सर्जना जिसकी सर्वश्रेष्ठता अद्भुत और अतुलनीय होती है । इसलिए मातृत्व शक्ति प्रकृति के नियमों से भी परे होती है जो असंभव को संभव कर सकती है । एक माँ ही है जो आजीवन स्वयं को बच्चों के अस्तित्व में समाहित कर देती है । जो बिना कहे बच्चों को सुनती है, समझती है और पूर्णता भी प्रदान करती है । पर क्या बच्चें अपनी माँ के लिए ऐसा कर पाते हैं ?  क्या बच्चें कभी समझ पाते हैं कि उनकी माँ भी किसी की बच्ची है ? भले ही माँ की माँ शरीरी हो या न हो । पर क्या बच्चें कभी जान पाते हैं कि उनके तरह ही माँ को भी अपनी माँ की उतनी ही आवश्यकता होती होगी ? 

                                   सत्य तो यह है कि माँ का अतिशय महिमा मंडन कर केवल धात्री एवं दात्री के रूप में स्थापित कर दिया गया है । जिसे सुन-सुनकर बच्चों के अवचेतन मन में भी यही बात गहराई से बैठ जाती है । जिससे वे माँ को पूजित पाषाण तो समझने लगते हैं पर वो प्रेम नहीं कर पाते हैं जिसकी आवश्यकता माँ को भी होती है । जबकि वही बच्चें अपने बच्चों को वैसे ही प्रेम करते हैं जैसे उनके माता-पिता उन्हें करते हैं । पुनः उनके बच्चें भी उनको उसी रूप में प्रेम करते हैं तब बात समझ में आती है कि कमी कहाँ है ।

                                 अपने माता-पिता को अपने बच्चों की तरह न सही पर दत्तक की तरह ही प्रेम कर के देखें तो पता चलेगा कि प्रेम का एक रूप यह भी है । जैसे अपने बच्चों को प्रेम करते हुए बिना कुछ कहे ही सुनते-समझते हैं वैसे ही अपने माता-पिता को भी सुनने-समझने का प्रयास कर के तो देखें तो सच में पता चलेगा कि प्रेम का वर्तुल कैसे पूर्ण होता है । सत्यत: प्रेम की आवश्यकता सबों को होती है और अंततः हमारा होना प्रेम होना ही तो है ।


मैंने माँ को 

बच्ची की तरह

कई बार किलकते देखा है

हर छोटी-बड़ी बातों में

खुश हो-होकर

बार-बार चिलकते देखा है

हाँ ! ये परम सौभाग्य

मेरे भाग्य का ही तो 

अकथनीय लेखा है

जो मैंने माँ को भी

सहज-सरल बाल-भाव में

मुझे अनायास ही

माँ कहते हुए देखा है .         

                      *** परम पूज्य एवं परम श्रद्धेय ***

      *** समस्त प्रथम अकाल गुरु (माता-पिता) को समर्पित ***

                   *** हार्दिक शुभकामनाएँ एवं आभार ***           

Thursday, September 2, 2021

क्षणिकाएँ ...........

जहाँ किसी की परवाह भी 

चलन में अब नहीं रहा

वहाँ जिंदा होने की गवाही

लाउडस्पीकर पर 

साँस लेना हो गया है


***


जहाँ फूँक-फूँक कर भी

छाँछ पीने पर

मुँह में फफोले पड़ जाए तो

वाकई हम कुछ ज्यादा ही

संवेदनशीलता की दौर में हैं


***


जहाँ सबों से जुड़ते हुए

खुद से टूटने का

ज्यादा अहसास होता हो

वहाँ भयावह सच्चाइयों से

नजर न मिलाना ही बेहतर है


***


जहाँ भावनाऐं

हाथी के दांत से भी

बेशकीमती हो गई हों

वहाँ वक्त के फटेहाली पर

यकीन कर लेना चाहिए


***


जहाँ दो गज जमीन पर भी

इतनी मार-काट मची हो

वहाँ सभ्येतर ठहाकों की गूंज

शांति की बातों से 

कहीं ज्यादा डराती हैं . 

Sunday, August 29, 2021

साधो, हम कपूर का ढेला !.........

साधो, हम कपूर का ढेला !


कोई पक्का तो कोई कच्चा

कोई असली तो कोई गच्चा

कोई बूढ़ा खोल में भी बच्चा

कोई उत्तम तो कोई हेला !

साधो, हम कपूर का ढेला !


इक चिंगारी भर की दूरी पर

बस नाचे अपनी ही धुरी पर

पर सब हठ मनवाए छूरी पर

हर कोई अपने  में अलबेला !

साधो, हम कपूर का ढेला !


एक-एक चाल में धुरफंदी

समझौता से गांठें संधी

जुगनू से लेकर चकचौंधी

दिखाए रंग-बिरंगा खेला !

साधो, हम कपूर का ढेला !


अबूझ-सा सब लालबुझ्क्कड़

अपनी गुदड़ी में ही फक्कड़

उड़े ऐसे जैसे हो धूलधक्कड़

सज्जन बनकर भी रहे धुधेला !

साधो, हम कपूर का ढेला !


फटे बांस में दे सुरीला तान

करता रहे बस ताम-झाम

अपने से ही सब अनजान

खुद ही गुरु खुद ही चेला !

साधो, हम कपूर का ढेला !


कोई शुद्ध तो कोई मिलावटी

कोई घुन्ना तो कोई दिखावटी

कोई ठोस में भी घुलावटी

कोई बली तो कोई गहेला !

साधो, हम कपूर का ढेला !

Wednesday, August 25, 2021

खीझ-खीझ रह गई रतिप्रीता ............

अबकी सावन भी 

सीझ-सीझ कर बीता

खीझ-खीझ 

रह गई रतिप्रीता


बैरी बालम को 

अब वो कैसे रिझाए

किस विधि अपने 

बिधना को समझाए

अपने बिगड़े बिछुरंता से

ब्यथित बिछिप्त हो हारी

बिख से बिंध-बिंध कर

मुआ बिछुड़न बिछनाग जीता

खीझ-खीझ 

रह गई रतिप्रीता


दिन तो यौवन का

याचनक राग गवाए

नित सूनी सर्पिनी सेज पर 

रो-रो प्रीतरोगिनी रजनी बिताए

अँसुवन संग आस 

बिरझ-बिरझ कर रीता

ओह ! मिलन मास में भी

मुरझ-मुरझ मुरझाए मधुमीता

खीझ-खीझ 

रह गई रतिप्रीता


धधक-धधक कर

ध्वंसी धड़कन धमकावे

धमनियों में रक्त

धम गजर कर थम-थम जावे

न जाने न आवे किस कारन

तन मन प्राण पिरीता

आखिर क्यों बैरी बालम हुआ 

बिन बात के ही विपरीता

खीझ-खीझ

रह गई रतिप्रीता


अंग-अंग को

लख-लख काँटा लहकावे

लहर-लहर कर 

प्रीतज्वर ज्वारभाटा बन जावे

रह-रह मुख पर हिमजल मारे

तब भी होवे हर पल अनचीता

धत् ! अभंगा दुख अब सहा न जाए

कब तक ऐसे ही कुंवारी रहे परिनीता

खीझ-खीझ 

रह गई रतिप्रीता


फुसक-फुसक कर

चुगलखोर भादो भड़कावे

ठुसक-ठुसक कर

बाबला मन धसमसकाए

कासे कहे कि

अरिझ-अरिझ हर धमक बितीता

हाय रे ! सब तीते पर

झींझ-झींझ हिय रह गया अतीता

खीझ-खीझ

रह गई रतिप्रीता


अबकी सावन भी 

सीझ-सीझ कर बीता

खीझ-खीझ

रह गई रतिप्रीता .

Saturday, August 21, 2021

गृह लक्ष्मियाँ ..........

सँझाबाती के लिए
गोधुलि बेला में
जब गृह लक्ष्मियाँ
दीप बारतीं हैं
कर्पूर जलातीं हैं
अगरू महकातीं हैं
अपने इष्ट को
मनवांछित
भोग लगातीं हैं
और आचमन करवातीं हैं
तब टुन-टुन घंटियाँ बजा कर
इष्ट के साथ सबके लिए
सुख-समृद्धि को बुलातीं हैं

ये गृह लक्ष्मियाँ
प्रेम की प्रतिमूर्तियाँ
छुन-छुन घुंघरियाँ बजाते हुए
खन-खन चूड़ियाँ खनका कर
सिर पर आँचल ऐसे सँभालतीं हैं
जैसे केवल वही सृष्टि की निर्वाहिका हों
और अहोभाव से झुक-झुक कर
प्रेम प्रज्वलित करके
घर के कोने-कोने को छूतीं हुई
अपने अलौकिक उजाले से 
आँगन से देहरी तक को
आलोकित कर देतीं हैं
जिसे देखकर सँझा भी
अपने इस पवित्रतम
व सुन्दर स्वागत पर
वारी-वारी जाती है

तब गृह लक्ष्मियाँ
हमारी सुधर्मियाँ
तुलसी चौरा का 
भावातीत भाव से
परिक्रमा करते हुए
दसों दिशाओं में ऐसे घुम जातीं हैं
जैसे जगत उनके ही घेरे में हो
और सबके कल्याण के लिए
मन-ही-मन मंतर बुदबुदा कर
ओंठों को अनायास ही 
मध्यम-मध्यम फड़का कर
कण-कण को अभिमंत्रित करते हुए 
बारंबार शीश नवातीं हैं
फिर दोनों करों को जोड़ कर
सबके जाने-अनजाने भूलों के लिए
सहजता से कान पकड़-पकड़ कर
सामूहिक क्षमा प्रार्थना करते हुए
संपूर्ण अस्तित्व से समर्पित हो जातीं हैं
 
हमारी गृह लक्ष्मियाँ
दया की दिव्यधर्मियाँ
करूणा की ऊर्मियाँ
सदैव सुकर्मियाँ
सिद्धलक्ष्मियाँ
नित सँझा को
पहले आँचल भर-भरकर
फिर उसे श्रद्धा से उलीच-उलीच कर
मानो धरा को ही चिर आयु का
आशीष देती रहतीं हैं .

Tuesday, August 17, 2021

बस हमने यही जीवन जाना ...…..

अदृश्य श्वासों का आना-जाना

अदम्य विचारों का ताना-बाना

अव्यक्त भावों का अकुलाना

बस इसको ही जीवन माना


जब जग से कुछ कहना चाहा

क्वारीं चुप्पियों के बोल न फूटे

बस घिघियाते ही रहे सारे स्वर

और विद्रोही बीज अंतर न टूटे


सुख-सपनों की नीलामी में 

बिकती रही धीरज की पूंजी

जनम-जनम की जमा बिकी

और जुग-जुग की खोई कुंजी


खुशियों के बाजारों में बस

आंसुओं का व्यवसाय हुआ

उभरते रहे नासूर समय के

औ' दर्द बेबस असहाय हुआ


अब तो शाम है ढ़लने वाली

धुंधली-धुंधली सी छाया है

किंतु जीर्ण-जगत से फिर भी

क्यों नहीं छूटता माया है ?


अमरता की कैसी अभिलाषा ?

तिक्त सत्य क्यों झूठा लगता?

अनंत कामनाओं में ही जीना

क्यों बड़ा प्रीतिकर है लगता?


क्यों इतना अब रोना-गाना ?

क्या है वो जिसे खोना-पाना?

भूल-भुलैया में ऐसे भरमाना

बस हमने यही जीवन जाना .

Sunday, August 8, 2021

कृपया गरिमा बनाए रखें! ........

ठक! ठक! ठक!

कृपया गरिमा बनाए रखें!

कृपया मर्यादा बनाए रखें!

अन्यथा सख्त कार्यवाही होगी

हमारे हर एक, झुठफलाँग-उटपटाँग सा

भ्रांतिकारी-क्रांतिकारी, क्रियाकलापों का

हमारे ही, कलह-क्लेशी कुनबे के, कटघरे में 

तुरत-फुरत वाली, आँखों देखी, गवाही होगी!

ठक! ठक! ठक!

कृपया गरिमा बनाए रखें!

कृपया मर्यादा बनाए रखें!

अन्यथा सख्त कार्यवाही होगी!


इसलिए हमें मिल-बैठकर, पद की प्रतिष्ठा बचाकर

अपने परिजनों के, बेहतर आज के लिए, कल के लिए

नागरिक, भूगोल और इतिहास फाड़ू फैसला लेना है

और सबको चौंकाऊ-सा, चकाचौंध भरा हौसला देना है

ताकि हम संसार के, माथे पर, उचक कर बैठ सके

फिर चकाचक-झकाझक, फर्राटेदार विकास गति पर 

अपनी पीठ थपथपाते हुए, आव-ताव देकर, खूब ऐंठ सके! 


इसलिए कृपया कोई भी, जिंदा या मरे मुर्दों को, न उखाड़ें

और बेकार के बहाने से, बहिष्कार की रणनीति पर

न ही अपनी, चिंदी-चिंदी मानसिकता को 

हल्के-फुल्के या गंभीर, मुद्दों पर भी, इस तरह से उघाड़ें!

अन्यथा सख्त कार्यवाही होगी

कृपया मर्यादा बनाए रखें!

कृपया गरिमा बनाए रखें!


रूकें! रूकें! रूकें!

बहुत ही, हीं-हीं, ठीं-ठीं, हो रहा है

बहुत ही, खों-खों, खीं-खीं, हो रहा है

ओह!  ये किसने? किसको? किस अदा से आँख मारा?

और इतने सारे, कागजों को, किसने है फाड़ा?

ये मेजें-कुर्सियां, ऐसे क्यों उठ रही हैं?

उफ्फ! मेरी आवाज भी, इसमें घुट रही है

कृपया सब, अपनी जगहों पर, संतों की भांति, बैठ जाएँ

कानफाड़ू शोर-शराबा न करें, कोशिश करके ही सही, पर शांति लाएँ!


फिर अपनी, बादाम-अखरोट खायी हुई

याददाश्त को, फिर से, याद दिलाए कि

हम कुनबा चलाने वाले हैं, या उसको डूबाने वाले हैं

इस तरह से, आलतु-फालतू मुद्दों पर, जब आप सब

एक साथ ही, उलट कर, सड़क पर, ऐसे उतर जाएंगे 

तो बताइए, सड़क पर रहने वाले, भला कहाँ जाएंगे?

तब, उनके लिए ही वर्षों से, अटकी-लटकी हुई सैकड़ों-हजारों

झोलझाली योजनाओं को, हम लोग, कैसे लागू करायेंगे?


यदि ईमानदारी से, आप सबों को, याद आ जाए 

कि आखिर परिजनों ने, हमें किसलिए चुना है?

तो आइए, विकास की चाल को, सब मिलकर

जोर से, धक्का लगा-लगा कर, आगे बढ़ायें

बिना बात के ही, विरोध में, इस तरह से, काम रोक कर

कृपया परिजनों के, समय और संसाधनों को

इतनी निर्लज्जता से, राजनीति के गटर में, न डूबायें!

अन्यथा सख्त कार्यवाही होगी

कृपया मर्यादा बनाए रखें!

कृपया गरिमा बनाए रखें!


अरे! अरे! अरे!

अचानक से, ये क्या हो रहा है?

क्यों सबका, खोया हुआ आपा भी, खो रहा है?

इस तरह से, जुबानी जंग में, जुमलों का चप्पल-जूता

बिना सोचे-समझे, एक-दूसरे पर, यूँ ना उछालें

और अपने पैने-नुकीले, सवालो-जवाबों से

न ही ऐसे छिलें, एक-दूसरे की, नरम-मुलायम छालें!


हो सके तो, अपने-अपने हाथों-पैरों को 

हाथ जोड़ कर, या प्यार-मोहब्बत से, जरा समझाएँ

कि बात-बेबात ही, भड़क कर कहीं, इधर-उधर न भिड़ जाए

फिर आपस में, इसतरह से, गुत्थम-गुत्थी कर के 

आप सब मिलकर, इसे ओलंपिक जैसा विश्व स्तरीय 

कुश्ती प्रतियोगिता का, चलता हुआ, अखाड़ा न बनाएँ

कृपया संयम बरतें, और मेरे आसन के सामने, ऐसे उछाल मारकर

यूँ दहाड़ते हुए, तख़्त विरोधी तख़्तियां,  दिन-दिहाड़े न दिखाएँ!


आपसे हार्दिक अनुरोध है कि, अपने आसनों पर ही 

बाकी सब लोग, विराजमानी जमाते हुए, मेजों को भी

अपने कोमल हथेलियों का, कुछ ज्यादा ख्याल रखते हुए

ढ़ोलक जान, जोर-शोर से, इतना ज्यादा न थपथपायें

न ही थोथेबाजी में, फिजुल का, नारेबाजी करते हुए

चलते सत्र को, बीच में ही छोड़कर, सब बाहर निकल जाएँ!

अन्यथा सख्त कार्यवाही होगी

कृपया मर्यादा बनाए रखें!

कृपया गरिमा बनाए रखें!


सुनें! सुनें! सुनें!

हमारे कुनबे से, बाहर के लोग सुनें! 

आपके लिए है, करजोरी-बलजोरी, क्षमा याचना के साथ

एक अत्यन्त आवश्यक, सूचना एवं वैधानिक चेतावनी

कि हम अपने कुनबे में, एक ही चट्टे-बट्टे के, सब लोग 

चाहे कितना भी, और कैसा भी, करते रहें मनमानी

पर कृपया दूर-दूर तक, कोई भी चरित्र अथवा पात्र

आगे बढ़कर इसे, बिल्कुल अन्यथा न लें 

और इस कुपितरोगी-भुक्तभोगी, दृश्यकाव्य के

किसी भी, हिस्से से चुराकर, कोई भी कथा न लें!


कारण, इसका प्रत्यक्ष और प्रामाणिक संबंध 

केवल और केवल, हमारे निहायत निजी, कुनबे से है 

क्योंकि संसार के, बड़े-बड़े अलोकतांत्रिक देश, की तरह ही 

हम अपने, छोटे-से कुनबे में भी, नियम-कानून बनाने के लिए

कुछ ऐसे ही, चिल्ल-पों कर-करके, शासन चलाते हैं 

और काम-काज के बीच में ही, हुड़दंग मचा-मचाकर

ऐसे ही, कुढ़गा कुक्कुटासन, लगाते हैं!


इसलिए इसका, मुँह और दिल खोलकर

केवल और केवल, कृपया आनन्द उठाएँ 

और गलती से भी, किसी दूसरे से, हमें जोड़कर

अथवा अन्यथा लेकर, हमारी जगहँसाई, न करवाएँ!

अन्यथा सख्त कार्यवाही होगी 

कृपया मर्यादा बनाए रखें!

कृपया गरिमा बनाए रखें!

Wednesday, August 4, 2021

उन भ्रूण बेटियों के लिए.........

अहा! चहुँओर आज तो मंगल गान हो रहा है
बची हुई नाक का देखो ना यशोगान हो रहा है
सदियों से एक सिरे से उन सारी उपेक्षितों का भी
इतना ज्यादा अनपेक्षित मान-सम्मान हो रहा है

भूरि-भूरि प्रशंसाओं के हैं काले-सफेद बोल
सब खजाना भी लुटा रहे हैं हृदय को खोल
हर चेहरे पर ओढ़ी हुई है लंबी-चौड़ी मुस्कानें
हर कोई जीते पदकों से खुश होकर रहा है डोल

पर आज उन कोखों की भी कुछ बात की जाए
जिनपर दबाव होता है कि वे बेटी को ही गिराये
कोई समाज के सारे पाखंडी परंपराओं को तोड़
उन भ्रूण बेटियों के लिए भी सुरक्षित घर बनाये

क्यों बेटों के लिए बेटियों को कुचला जाता है ?
कोई क्यों बेटियों का ही भ्रूण हत्या करवाता है ?
घरेलू हिंसा की पीड़िता सबसे है पूछना चाहती 
क्या इस तरह ही समाज गौरवशाली बन पाता है ?

यदि सारी बेटियाँ अपने ही घर में बच जाएँगी
तो वे विरोध से नहीं बल्कि प्रेम से बढ़ पाएँगी
तब तो दो-चार ही क्यों अनगिनत पदकों का भी
अंबार लगाकर ढ़ेरों नया-नया इतिहास बनाएँगी .

      *** बेटी खेलाओ पदक जिताओ ***

Sunday, August 1, 2021

एक कालजयी कविता के लिए .....

एक कालजयी कविता के लिए
असली काव्य-तत्त्व की खोज में
जब-जब जहाँ-तहाँ भटकना हुआ
तब-तब अपने ही शातिर शब्दों के 
मकड़जाल में बुरी तरह से अटकना हुआ

न जाने कैसी-कैसी और कितनी बातों को
गुपचुप राज़ सा या खुलेआम ख्यालातों को
जाने-अनजाने से या किसी-न-किसी बहाने से
चोरी-छुपे पढ़ती, सुनती और गुनती रही
शायद हीरा-जवाहरात मानकर ही सही
पूरे होशो-हवास और दम-खम से
अपने कलमकीली कबाड़ झोली में 
बस कंकड़-पत्थर ही बीनती रही

अब तक के उन तमाम नामी-गिरामी
कलमतोड़ों और कलमकसाइयों के
पदछापों पर मजे से टहलते हुए
अपने ख्याली पुलावों को 
बड़े चाव से कलमबंद करते हुए
उसी कबाड़ झोली का सारा जमा-पूंजी को
आज का अँधाधुँध सत्य जानकर
मन ही मन में खुद को कलम का उस्ताद मानकर
शब्दों में आयातित गोंद और लस्सा लगाकर
उसे उसके संदर्भ से जोड़ना चाहा

पर मेरी उधाड़ी जुगाड़ी कोशिशों को भाँपकर 
बरबादी की ऐसी सत्यानाशी सनक से काँपकर
अपनी ही रूह की होती मौत देख बेचारी कविता 
सिर धुनती हुई बन गई रूई का फाहा

तिस पर भी उसको मनाने के वास्ते मैंने
बाजार जाकर खरीद-फरोख्त की गई
वर्जनाओं को, उत्तेजनाओं को, अतिरंजनाओं को
इधर-उधर से माँगी-चाँगी हुई, छिनी-झपटी हुई
अन्तर्वेदनाओं को, संवेदनाओं को, परिवेदनाओं को
शोहरती तमन्नाओं की आग में ख़ूब तपाया
पर निर्दयी कविता तो जरा-सी भी न पिघली 
लेकिन शब्दों और अर्थों का डरावना-सा
लुंज-पुंज अस्थि-पंजर जरूर हाथ आया

फिर उसको रिझाने-लुभाने के वास्ते मैंने
अपनी सारी बे-सिर-पैर की तुकबंदियों को भी 
ग़ज़लों-छंदों का सुन्दर-सा आधुनिक परिधान पहनाया
और उसे उसके अर्थो से भी एकदम आजाद करके
कसम से आज़माईश का सारा गुमान चलाया

अब जी मैं आता है कि 
किसी भी काव्य-तत्त्व की खोज में
प्रेतों-जिन्नों की तरह भटकना छोड़ कर 
प्राणों से फूटती कविता के इंतजार में
चुपचाप सबकी नजरों से कहीं दूर जाकर
खुद से भी छुपकर धूनी रमाए बैठ जाऊँ

पर नालायक कवि मन कहता है कि
गलती से ही सही पर जब तेरे माथे पर
लिखा जा चुका है कि तू कवि है तो
जो जी में आए बस तू लिखता रह, लिखता रह
ज्यादा न सही पर कुछ तो शोहरत-नाम मिलेगा
झटपट लिखो-छापो के इस जादुई जमाने में
फटाफट ढ़ेर सारा ज़हीर कद्रदान मिलेगा
अगर मेहरबानों की नजरें इनायत हुई तो
झोली भर-भर कर भेंट और इनाम मिलेगा

तो कवि मन के झांसे में आकर मैंने भी सोचा कि
कोई मुझे एक-एक शब्द पर पढ़-पढ़ कर सराहे 
या शेखचिल्ली समझ कर खूब खिल्ली उड़ाए
या मुझे मुँह भर-भरकर गाली-आशीर्वाद दे
या फकत कलमघिस्सी जान ज़ायका-आस्वाद ले

पर लिखने वाला हर बेतरतीब-सी बिखरी चीजों को
बुहारी मारते हुए समेट कर लिखता है
जिसमें किसी को सुन्दर कविता तो
किसी को बस रद्दी का टुकड़ा ही दिखता है
इसलिए मैं भी क्यों कहीं दूर जाकर
प्राणों की कविता के इंतजार में बैठ जाऊँ
कवि हूँ तब तो ईमानदारी से या बेइमानी से 
अगड़म बगड़म कुछ भी लिख-लिख कर क्यों नहीं
रद्दियों का ही सही बड़ा-सा अंबार लगाऊँ .

Wednesday, July 28, 2021

रूठी रहूंगी सावन से ......

तुम्हारे आने तक 
रूठी रहूंगी सावन से

हिय रुत मनभावन से
बूंदों के सरस अमिरस गावन से
अगत्ती अगन लगाने वाला 
छिन-छिन काया कटावन से
नव यौवनक उठावन से
कनि-कनि कनेरिया उमगावन से
ऐसे में मुझ परकटी को छोड़ कर
पीड़क परदेशी तेरे जावन से
तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से

घिर-घिर आएंगी कारी बदरिया
बन कर तेरी बहुरूपिनी खबरिया
कभी गरज कर, कभी अरज कर
कभी चमका कर बिजई बिजुरिया
बरस-बरस कर मुझे मनावेंगी
पर मुझपर न चलेगा
कोई भी तेरा जोर जबरिया
न मानूंगी किसी भी लुभावन से
तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से

ढोल, मंजीरों पर थाप पड़ेंगी
मृदंग संग झांझे झमकेंगी
घुंघरू पायल की रुनझुन में
सब सखियन संग झूलुआ झूलेंगी
सबके हाथों सजन के लिए मेंहदी रचेंगी
और हरी-भरी चूड़ियां खन-खन खनकेंगी
पर मुझ बिरहिन, बैरागिन को
बिरती है सब सिंगार सजावन से
तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से

कली-कली चहक कर चिढ़ाती
अकड़ कर डाली-डाली अँगड़ाती
फूल-फूल कंटक-सा चुभता
क्यारी-क्यारी यों कुबानी सुनाती
जलहीन मीन सी अँखियां अँसुवाती
और उर अंतर चिंता ज्वाल से धुँधुवाती
हाय! बड़ा बेधक है ये बिलगना
पर क्या हो अब पछतावन से
तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से

पंथ है बड़ा कठिन ज्यों जानती
परदेशी तुमको बस पाहुन ही मानती
हर रुत परझर सा है लगता
तुम्हें हिरदेशी बना मैं ऐसे न कानती
और तेरी जोगनिया बन हठजोग न ठानती 
तब अंधराग तज सावन का संदेसा पहचानती
तन-मन से हरियाती, झुमरी-कजरी गाती
बस एक तेरे आवन से
तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से

तुम्हारे आने तक
रूठी रहूंगी सावन से .

***सुस्वागतम्***

Friday, July 23, 2021

गुरुक्रम हो तुम .......

पहले प्यास हुए
अब तृप्ति की आवृत्ति हो तुम
मेरी प्रकृति की पुनरावृत्ति हो तुम

पहले उद्वेग हुए
अब आसक्ति के आवेग हो तुम
मेरी अभिसक्ति के प्रत्यावेग हो तुम

पहले आकर्ष हुए
अब भक्ति के अनुकर्ष हो तुम
मेरी आकृति के उत्कर्ष हो तुम

पहले श्रमसाध्य हुए
अब आप्ति के साध्य हो तुम
मेरी प्रवृत्ति के अराध्य हो तुम

पहले साकार हुए
अब अनुरक्ति के आकार हो तुम
मेरी अतिश्योक्ति के अत्याकार हो तुम

पहले अलंकार हुए
अब अभिव्यक्ति के शब्दालंकार हो तुम
मेरी गर्वोक्ति के अर्थालंकार हो तुम

पहले भ्रम हुए
अब जुक्ति के उद्भ्रम हो तुम
मेरी मुक्ति के गुरुक्रम हो तुम .

*** गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ ***
*** हार्दिक आभार समस्त गुणी जनों को ***

Sunday, July 18, 2021

मोह लगा है ........

जबसे सोने के पिंजरे से मोह लगा है

अपना ही ये घर खंखड़ खोह लगा है

सपना टूटे , अब अपना ही सच दिखे

दिन- रात एक यही ऊहापोह लगा है


इस घर में अब उदासी-सी छाई रहती है

मेरे सुख-चैन को ही दूर भगाई रहती है

मन तो बस , बंद हो गया उसी पिंजरे में

उसे पाने की इच्छा , फनफनाई रहती है


स्तब्ध हूँ कि कैसे मैं अबतक हूँ यहाँ

जो दिखता था जीवन , यहाँ है कहाँ

छल करता हर एक सुख है , पर अब

आँखों को दिखता साक्षात स्वर्ग वहाँ


अब वही , सोने का स्वर्ग मुझे चाहिए

मदाया हुआ , उन्मत्त गर्व मुझे चाहिए

दुख में ही तो बीता हीरा जनम , अब

क्षण-क्षण छंदित मेरा पर्व मुझे चाहिए


अपना होना भी मिटाना पड़े मिटा दूंगी

सबकुछ लुटाना पड़े तो , सब लुटा दूंगी

हँसते-हँसते उस सोने के पिंजरे के लिए

पर कटाना पड़े तो , खुशी से कटा लूंगी


अभी तो उस झलकी का संयोग लगा है

जीर्ण- जगत गरल सम प्रतियोग लगा है

असमंजस में प्राण है बीते न बिताए पल

जबसे उस सोने के पिंजरे से मोह लगा है .