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Thursday, January 31, 2013

खुशबूदार बदलाव ...


कुर्सियां है तब तो
व्यवस्था की बातें हैं
व हर दरवाजे पर
जोर की दस्तक है ...
पस्त-परेशान-सा
पसीना है
वातानुकूलित कमरे के
फर्श-कगारों पर
कैट-वॉक करती
चहलकदमियाँ हैं
रूम-फ्रेशनर सा
खुशबूदार बदलाव है...
उबासियाँ-जम्हाइयां तो
विश्वविद्यालयों से
बड़ी डिग्री पाने की
जुगत में हैं
और झपकियाँ
घड़ी की सुइयों की
रसबतिया में बीजी है...
कुर्सियां हैं तब तो
पायों में छिपी-सी
अराजकता भी है
टांगों के पीछे-नीचे
कबड्डी खेलती हुई
जिसे देखकर
झाड़-फ़ानूस से
झूलता हुआ युग
कल्पनाओं में उड़ता है
स्पाइडरमैन की तरह
और कुर्सियों से
जुते घोड़ें
हिनहिनाना छोड़कर
उन कौओं को
खोज रहे हैं
जिनके पास हैं
गिरवी बतौर
उनके कान .

Sunday, January 27, 2013

प्रेम का ही आभार है ...


               कुछ कह नहीं सकती यह कि
                 ह्रदय की जीत है या हार है
                  ये पीड़ा है मुझे बड़ी प्रिय
                  जो प्रेम का ही आभार है

               आभार इतना कि हर भार से
                अतिगत ही जैसे अछूती हूँ
                 अछूती-अछूती ही हरपल
                  प्रिय को ऐसे मैं छूती हूँ

               वह अलबेला कितना अनछुआ
                  छू-छू कर अब मैंने जाना है
                    पाया-पाया सा है लगता
                    पर उतना ही उसे पाना है

                कुछ कह नहीं सकती यह कि
                  पाकर भी उसे पा ही लूँगी
                   जो पा भी लिया उसे तो
                  सबसे मैं तो छिपा ही दूँगी

                 उस अनजाने-अनपहचाने को
                 अनजाने में ऐसे जान लिया है
                  प्रीति लगी बस उस नाम की
                  जो इतना मैंने नाम लिया है

                  अब वही नाम इक गीत बन
                 इन साँसों से बस टकराता रहे
                 और उखड़ी-उखड़ी धड़कन को
                   इक विरह-धुन पकड़ाता रहे

                 कुछ कह नहीं सकती यह कि
                 यही धुन उसने भी गाया होगा
                मतवाली-मतवाली फिरती देख
                मुझपर उसका मन आया होगा

                अभी उसे तो देखा भी नहीं है
               जो मिले भी तो मैं पहचानूँ ना
               बस प्रीति लगी है उस नाम की
                कैसे लगी यह भी मैं जानूँ ना

                बस जानने से जी भरता नहीं
                जान-जान कर मैंने जाना है
                वह अनजान रहे तब भी उसे
                इन साँसों का अर्घ चढ़ाना है

                कुछ कह नहीं सकती यह कि
              ये अर्घ है या अलख प्रतिकार है
                 ये पीड़ा है मुझे बड़ी प्रिय
                 जो प्रेम का ही आभार है .


Tuesday, January 22, 2013

देखो न मुझे ...



एक छोटी-सी
कोठरी का अँधेरा
देखो कैसे
बाहर निकल आया है
जैसे ही
कोई जलता दीया
इस बुझे दीये के
बेहद करीब आया है ...
एक गहरे-काले
घोल की-सी रात
दहककर
पिघलने लगी है
जिसमें
एक स्वप्नातीत
स्वरुपातीत-सी
गहरी नींद
स्तब्धता में भी
जगने लगी है
और
एक चिर-संचित
सुशोभित,सुसज्जित
मेरी प्रतिमा सी-ही
मुझमें ही कुछ
ऐसे ढहने लगी है ...
मानो
सहसा हाथ बढ़ाकर
कोई खींच लिया है
गले लगाकर मुझे
कसकर भींच लिया है ...
वही
लावा-सा बहकर
मेरे शिराओं में
ऐसे भीग रहा है ...
देखो न मुझे
मेरा रोम-रोम भी
उसी में
कैसे सीझ रहा है .

Monday, January 14, 2013

तुम गा लेना...


जब शब्द-भ्रम पुरत:
तिमिर की घनी छाँव बन जाए
धुँधली-धुँधली सी सब ज्योति पड़ जाए
और आँखों में अश्रुघन उमड़ आये
तो प्रच्युत प्रतिनाद को तुम पा लेना
बस उसी गीत को तुम गा लेना...

शब्द-बोध , शब्द-श्लेष
भेद कर बुद्धि जन्य क्लेश
लख स्निग्ध उर-तल उन्मेष
उस प्रतिध्वनि को तुम पा लेना
बस उसी गीत को तुम गा लेना...

जब शब्द-व्यूह पुन:
अपने मूल स्रोत में समा जाए
तब जो भी अर्थ शेष रह जाए
वही तुमसे कोई गीत रचा जाए
उस शेषनाद को तुम पा लेना
बस उसी गीत को तुम गा लेना...

शब्द-शून्य , शब्द-रिक्त
उसी भाव में हो दृढ़ चित्त
थिरकता हुआ ये जीवन-नृत्य
उस धुन को तुम पा लेना
बस उसी गीत को तुम गा लेना...

जब शब्द-ब्रह्म पुन:-पुन:
उसी राग-रंग के संग गाये
एक मुक्त प्रार्थना नभ छू आये
और वेदना भी गंगा-यमुना बन जाए
उस अविरल धार को तुम पा लेना
बस उसी गीत को तुम गा लेना...

शब्द-शमित , शब्द-हीन
तुम-तुम-तुम बजे शाश्वत-बीन
क्षण-क्षण हो जिसमें लवलीन
उस हृत्प्रिय क्षण को तुम पा लेना
बस उसी गीत को तुम गा लेना . 

Wednesday, January 9, 2013

केवल एक युक्ति है ...


मैंने अब धारा की
उस प्रचंडता को पहचान लिया है
व अपने अनुरूप ही
हर ढाल का भी निर्माण किया है...
ये भी माना कि
प्रवाह-शक्ति बड़ी मद से भरी है
पर सामने भी तो
कई भीमकाय बाधाएँ भी खड़ी है...
जहाँ निषेध है
वहाँ उद्रेकता में उछल जाती हूँ
और मूल से ही
हर पाषाण को रेत-रेत कर जाती हूँ...
ऐसे न बहूँ तो
ये जो तृषा है शांत कैसे होगी ?
कुछ कमल व हंसों में
मानसरोवर की गति जैसे होगी...
गर्जन-तर्जन करके
सारी वर्जनाओं को तोड़ देना है
पोखरों में ही सिमटी हुई
अन्य धाराओं को भी जोड़ लेना है...
सच! बहने में ही
हम सबों की अंतिम मुक्ति है
यही नियति है और
यही एक और केवल एक युक्ति है .


Friday, January 4, 2013

प्यार के साथी ! सच मानो ...


प्यार के साथी ! सच मानो
अपनी चुप-सी पतझड़ को , मैं
बस तुमसे ही गुदगुदाना चाहती हूँ
और इस बासित बगिया में
तेरा ही , बांका बसंत खिलाना चाहती हूँ ...

कहो तो ! हवाओं को सनसनाकर
हर पत्तियों की चुटकियाँ झट से बजा दूँ
अलसाई सी हर कलियों की
आँखों को चूम-चूमकर जगा दूँ ...

यूँ बलखाती डालियों-सी
तुझपर ही , मैं ढुलमुलाना चाहती हूँ
ओ! मेरे सघन तरु , मैं
लता सी ही , तुझसे लिपट जाना चाहती हूँ ...

इस लगन को प्रिय!
बस पागलपन मत कहो तुम
प्रीत पुरातन है मेरा
निरा आकर्षण मत कहो तुम ...

प्यार के साथी ! सच मानो
अपने हर रोदन को
तुमसे अमर गान बनाना चाहती हूँ
और थामकर हाथ तेरे
मुश्किलों को भी आसान बनाना चाहती हूँ ...

कहो तो ! इस उफनते यौवन को
मैं , तुममें अभी ऐसे समा दूँ
कि तुमसे ही उघड़कर
तुम्हे ही मैं , घूँघट भी बना लूँ ...

तेरे लहरों में सिहर कर
अंग-अंग को भिंगाना चाहती हूँ
और तुम्हारे ही सहारे
तुममें ही , डूब जाना चाहती हूँ ...

इस नेह-हिलोर को
बस लड़कपन मत कहो तुम
बड़ी बेबूझ ये चित्त है
रुत का चलन मत कहो तुम ...

प्यार के साथी ! सच मानो
अपनी गहरी प्यास को
तुममें ही , तृप्ति बनाना चाहती हूँ
और वासनाओं के पार कहीं
निर्वासना का रस भी बहाना चाहती हूँ ...

प्यार के साथी ! सच मानो .

Tuesday, January 1, 2013

अति आवश्यकता है ...


अति आवश्यकता है
समस्त शुभकामना की
सही समय भी है
हालांकि अपने अनुसार समय
हमेशा सही ही होता है पर
गलती से ही कभी वह
जो झपकी लेता है तो
गलत भी अपनी परिभाषाओं का
अतिक्रमण कर देता है
और आदमी अपनी ही
परिभाषाओं की परिधि पर
सर पटक-पटक कर रोता है ...
अति आवश्यकता है
शुभकामना लेने और देने की
हर छटपटाते ह्रदय को
अमृत-वृष्टि में भिंगोने की
उस छुई-मुई सी निराशा को
जड़ से उखाड़ कर फेंकने की
और आशा के अक्षयवट को
पुन: जतन से संजोने की ...
अति आवश्यकता है
शुभाकांक्षी शुभकामना की
शुभ हो! शुभ हो! शुभ हो!

Thursday, December 27, 2012

नजरबन्द ...


आजकल
शब्दों की हिम्मत भी
हवा देखकर बढ़ सी गयी है ...
न जाने क्यूँ वे
अपना आक्रोश मुझपर ही
अजीब तरह से व्यक्त कर रहे हैं
मैं निकल जाने को भी कहूँ तो
कुछ बुदबुदाते हुए उबल रहे हैं ....
तब तो शब्दों की छाती पर
मैंने भी तान दिया है पिस्तौल
अब तो उन्हें राजद्रोह स्वीकारना होगा
साथ में गिरफ्तारी भी देनी होगी
अपना बॉडी- वारंट देखे बिना ....
अब वे करते रहे अपना वकील
लिखवाते रहे अपने लिए हिदायतें
छाँटते रहे सही-गलत बातों को
अपना छाती दुखा-दुखा कर
करते रहे अपना जिरह
व अपनी पैरवी के लिए
करते रहे सारे प्रबंध-कुप्रबंध
और अपने धारदार बहसों से
काटते रहे गले के फंदों को ....
पर मैं तो एकदम से इन शब्दों की
बौराई हुयी सरकार सी हो गयी हूँ
अति आक्रोश में हूँ
इसलिए कुछ गिरगिटी शब्दों को छोड़कर
बाकी उन सभी रुष्ट शब्दों को
एक-एक करके
नजरबन्द कर देना चाहती हूँ
अपने कलम में ही .


Friday, December 21, 2012

हंसा , उड़ चल न ...


उड़ - उड़ कर , बहुत छान लिया
हमने कई , अम्बर - भूतल
कितने पंख , गिर गये हमारे
अबतक , तिल- तिल कर जल
अंगारों पर ही , चल रहा है
बंदी -सा , हर छिन - पल

क्यों किसी द्वार पर
नहीं रुकते ये शिथिल चरण ?
क्यों व्याकुल प्रश्नों से
बोझिल है ये धरती - गगन ?
क्यों संझियाई उदासी लिए
उत्तर के ताके है नयन ?

अब तो निर्लक्ष्य , न उड़
विकल खग -सा ,  रे! मन
देख , मरू के मग पर
क्षण भर को ही , लहराया है घन
भाग , उठ , उस रस का
भींग कर , कर आलिंगन

कबतक जड़वत जीवन से
खाता रहेगा , तू ठेस रे!
ठगिनी माया है , तुझे रिझाए
धर , हंसिनी का वेश रे!
हंसा , उड़ चल न
अपने ही , उस देश रे!

जिस देश का दुर्गम पथ भी
बने हमारा , पावन बंधन
उस बंधन से ही , बंध जाए
इस मन का , सब सूनापन
और सूनेपन में भी , खिल जाए
कमल - पंखुड़ियों सा , ये जीवन

तब ताकता रह जाएगा , तू ही
उन पंखुड़ियों को , अनिमेष रे!
सबकुछ अपना , निछावर करके
न रखेगा  , कुछ भी शेष रे!
हंसा , उड़ चल न
अपने ही , उस देश रे!

Monday, December 17, 2012

लिखो , लिखो , खूब लिखो ...


लिखो , लिखो , खूब लिखो
खुरदरे , संकरे किनारे से भी धकेले हुए
पीछे के पन्नों पर बनाए गये
कँटीले बाड़ों में बिलबिलाते
उन वंचितों के लिए
लिखो , लिखो , खूब लिखो

लिख भर देने से ही
झख मारते हुए इतिहास बदल जाता है
इसी झांसे में आकर
इतिहास का भूगोल भी बदल जाता है
और कितनी ही कुवांरी क्रांतियाँ
गर्भ बढाए हुए अजन्मे परिवर्तन का
नामाकरण संस्कार करवाती है
फिर अचानक से यूँ ही
भरे दिन में गर्भपात करा लेती है

ऐसी वंचनाओं का आदि इतिहास
इस आदि इतिहास का अमर इतिहास
उन्हीं वंचितों को कोसता रह जाता है

लिखो , लिखो , खूब लिखो
शेषनाग सा फन फैलाए हुए
अपने सम्पूर्ण सामर्थ्य से चूसते हुए
उन शोषणों के खिलाफ
और नैसर्गिक निरीहता में भी
अर्थवत्ता को सुलगाते हुए
उन शोषितों के लिए

लिखो ,लिखो , खूब लिखो
उनके दर्द से कलपते देह को
और काल के कोड़ों से
फव्वारे की तरह फूटते खून को
उनके ही खंडहर के दीवारों से टकराती हुई
चमगादड़-सी डरी हुई उनकी आत्मा को
उनके ही भुरभुरे भग्नावशेषों को
और उनके जीजिविषा के अवशेषों को

लिखो , लिखो , खूब लिखो
उन अपढ़ ,निरक्षरों के लिए
जिनके लिए आज भी
काला अक्षर मरी हुई भैंस ही है
जिसके थनदुही में लगे हुए हैं
अक्षरों के थानेदार और हवलदार

लिखो ,लिखो , खूब लिखो
विवश विचारों की आँधियाँ उठाओ
कुचक्रों के चक्रवातों में उन्हें फँसाओ
और अपने काले- उजले अक्षरों को
घसीट-घसीट कर ही सही
अपंग- अपाहिज सा इतिहास बनाओ .  

Thursday, December 13, 2012

मैं तुम्हें दे दूँ...


ये किनारा भी , मैं तुम्हें दे दूँ
वो किनारा भी , मैं तुम्हें दे दूँ
ये गझिन गारा भी , मैं तुम्हें दे दूँ
और ये धवल धारा भी , मैं तुम्हें दे दूँ

मेट कर अपनी बनावट , मैं ढह जाऊँ
तेरे अपरिमित ज्वार को , मैं सह जाऊँ

ये तनु तरलता भी , मैं तुम्हें दे दूँ
ये मृदु मधुरता भी , मैं तुम्हें दे दूँ
ये चटुल चपलता भी , मैं तुम्हें दे दूँ
और ये उग्र उच्छ्रिंखलता भी , मैं तुम्हें दे दूँ

तेरी हर साँस में ,  ऐसे मैं बह जाऊँ
हर साँस की गाथा , हर किसी से कह जाऊँ

ये परिप्लव प्राण भी , मैं तुम्हें दे दूँ
ये निरवद्द निर्वाण भी , मैं तुम्हें दे दूँ
ये अमित अभिमान भी , मैं तुम्हें दे दूँ
और ये अमर आत्मदान भी , मैं तुम्हें दे दूँ

तनिक भी इस मैं में , न मैं रह जाऊँ
बस और बस तुम्हीं में,  मैं सब गह पाऊँ .



गझिन - गाढ़ा और मोटा
गारा - मिट्टी( जैसे नदी के तल की )
तनु - सुकुमार
चटुल - चंचल
परिप्लव - तैरता हुआ , बहता हुआ
निरवद्द - दोषरहित , विशुद्ध

Saturday, December 8, 2012

ऐ ! आलोचना के बाबुओं ...


क्या कहूँ ?
इस मुख से कहते हुए
बड़ी ही लज्जा सी आती है
कि कैसे
आज की कविता अपना चीरहरण
खुद ही करवाती है
और अपनी सफाई देते हुए
बात-बात में
गीता या सीता को
बड़ी बेशर्मी से ले आती है ...
और तो और
आल्वेज हॉट राम-कृष्ण का
कलरफुल कॉकटेल बनाकर
सबको उकसाती है , लुभाती है ...
ऐ ! आलोचना के बाबुओं
आप अपने को बचाए रखिये
बामुश्किल से चलती परम्परा को
किसी भी कीमत पर निभाये रखिये
यदि आपको कोई
ऑफर पर ऑफर दे भी तो
अपनी नजरें फिराए रखिये
और आपके कम्बल के भीतर
भला झाँकता कौन है ?
ये जो आज की नशीली कविता
कुछ ज्यादा ही बहकने लगे तो
उसी गीता या सीता को
हाजिर-नाजिर करके
जोर-जबरदस्ती से ही सही
अपना नीबूं-अचार चटाते रहिये .

Tuesday, December 4, 2012

डर मत मन ...



               इति-इति पर अड़ मत मन
               नेति-नेति से लड़ मत मन
                दुगुना दुःख कर मत मन
               वेदना से तू , डर मत मन

              गहन कोमलता जब लुटती है
                इक टीस सी तब उठती है
                मधुघट भी फूट जाता है
              मृदुमिटटी में मिल जाता है
               मृत्यु पूर्व ही मर मत मन
               वेदना से तू , डर मत मन

                 ह्रदय खोल और हुक उठा
              पुण्य प्रबल है , बस उसे लुटा
               जतन से चुभन को सहेज ले
                अगन को सूरज का तेज दे
               उत उलझन में पड़ मत मन
                वेदना से तू , डर मत मन

               व्यर्थ ही मिलती नहीं पीड़ा
              शैवाल तले बहती सदानीरा
              उपल के अवरोधों को सहती
               जल से ही जलधि है बनती
               अंजुली छोटी कर मत मन
                वेदना से तू , डर मत मन

               दुगुना दुःख कर मत मन
               वेदना से तू , डर मत मन .



Saturday, November 24, 2012

मैं मनचली ...

जबसे प्रिय प्यारे के
तीखे नयन ने कुछ यूँ छुआ
मुझ रूप-गर्विता को
न जाने क्या और कुछ क्यूँ हुआ ?

अपने रूप पर ही
और इतना इतराने लगी हूँ
लुटे तन-मन की
निधि सहसा ही बिखराने लगी हूँ...

आज बस में नहीं कुछ
खो गया है सारा नियंत्रण
पा प्रिय का
पल-प्रतिपल मोहक नेह निमंत्रण...

मैं किरण-किरण भेद
कुटिल कुतूहल जगाने लगी हूँ
बड़े भोलेपन से ही
बजर बिजलियाँ गिराने लगी हूँ...

गगन को ही छुपा कर
बिरंगी बदरिया बन घिर रही हूँ
उस गंध की गंगा सी
हवाओं के संग मैं फिर रही हूँ...

जैसे कोई क्वांरी कली
प्रथम आलिंगन से खुद को छुड़ा रही हो
उस प्रणय ज्वाला को  
हर पात से लजा कर बता रही हो...

और दे भी क्या सकती हूँ
हवाला या प्रमाण अपनी बात का
बस छलिया का
छुअन ही सब हाल कहे मेरे गात का...

मैं मनचली ,मचल-मचल
अपने प्रिय को ऐसे लुभाने लगी हूँ
और मचलते प्राण से
बस प्रिय! प्रिय! प्रिय! गुनगुनाने लगी हूँ .

Sunday, November 18, 2012

सिरा खोज लूं ...



कोई
मेरे गले में
घंटी बाँध
आँखों पर पट्टियाँ चढ़ा
न जाने कहाँ
लिए जा रहा है...
पांव थककर
रुके तो पीछे से
कोड़े बरसा रहा है
कहीं दौड़ना चाहूँ तो
चारों तरफ
खाई बना रहा है...
पराई गलियों के
अनजान रोड़े भी
तरस खाने लगे हैं
सपनों में चुभे
काँटों को
सहलाने लगे हैं...
घर की महक
वापस बुलाती हैं
इसीलिए मैं
अपने समय के भीतर
खुदाई कर रही हूँ
ताकि
इन्द्रजालों के
महीन बानों को
काटकर
कोई भी
सिरा खोज लूं .

Saturday, November 10, 2012

तो ये है -


आपको दमा का दौरा दिला
हर बेहया सुबह को फूंक-फूंक सुलगाती हुई
रोटियों को हथेलियों से पीट-पीट कर
अपने स्टाईल में जलाती-पकाती हुई
सहमें नमक-प्याज संग पेट खोले गठरी में रख
पगडंडियों या रस्ते पर बदहवास दौड़ती हुई
आपको हर रोज कविता जो दिखे तो
आप उसे गुड मॉर्निंग कह सकते हैं और
अपनी च्वायस माफिक सौन्दर्य भी ढूंढ़ सकते हैं

फिर नजरें घुमाए तो
टेलर या लॉरी पर अजीब सी लटकी हुई
बसों-रेलगाड़ियों के छतों पर भी चिपकी हुई
कहीं तगारी-ईंटों से हंसी-ठिठोली करती हुई
या फिर फैक्ट्रियों के धुएँ को हराने वास्ते
ओंठों के बीच कसकर बीड़ी दबाये हुए
सारे टेंशन को छल्लों में घुमाकर
अपने हौसले से छेड़कानी करती हुई
कोई बिंदास सी कविता दिखे तो, आप
ईजिली अपने अन्दर भटकती कला को
नेशनल हाईवे पर दौड़ा सकते हैं

या फिर आपके इर्द-गिर्द
अपने झिल्लीदार आँखों से झुर्रियों के बीच फंसे
नन्हे-नन्हे जीवों को पुचकारती हुई
या अपने असली आंतो और दांतों को
किसी सेठ-साहूकार के यहाँ गिरवी लगाती हुई
या फिर किसी इंटरनेशनल ब्रांड के वास्ते
अपने गंजेपन का फोटो खिंचवाती हुई
और किसी फुटपाथ पर बिकते हुए
उताड़े कपड़ों की मजबूती जांचती हुई
उस ब्लैक एंड व्हाईट पीरीयड टाईप की
कोई कविता दिख जाए तो, बेशक आप
अपने आँखों पर काला चश्मा चढ़ाकर
न देखने का रियल एक्टिंग कर सकते हैं

या फिर गाहे-बगाहे
उस रंग-बिरंगे बीप करते बटनों पर
मक्खियों सी भिनभिनाती हुई
या किसी भी पॉलिश्ड पॉलिसी पर
छिपकलियों सी फिसल जाती हुई
और उस स्ट्रांग इकोनॉमी के नीचे
लाईटली, चींटियों सी दब जाती हुई
और तो और , हमारे-आपके
चारों तरफ दिन-रात उगते हुए
प्लास्टिक-पालीथीन को चबाती हुई
चुकरती , रंभाती वही कैटल क्लास सी
कोई कविता जो दिखे तो, आप
किसी भी पतली गली से निकल लेंगे
नहीं तो हाथी के दांतों से उलझ जायेंगे

और अक्सर रात गए
कहीं अपनी ही बोली लगाती हुई
या सामूहिक रूप से लुट जाती हुई
या फिर अपने गले के लिए फंदा बनाती हुई
कोई भी अगली सी , डर्टी सी कविता दिखे तो
आप राम-राम रटते हुए
अपने-अपने घरों में दुबक जायेंगे
और किसी फ्लॉप फिल्म की स्टोरी मान
उसको एकदम से भूल जायेगे
तो ये है -
   '' अपरिवर्तनीय और अछूत भारत की कविता ''

  ( इनकन्वर्टिबल और शनिंग इण्डिया की कविता )



Wednesday, November 7, 2012

तो ये है -


सुबह-सुबह
आँख मलते हुए आप सैर को जाएँ
वहाँ दौड़ती-भागती , चक्कर लगाती
चेहरे पर ताज़ी लालिमा उगाये
कोई कविता दिख जाए तो
बेशक ! हैरानी की कोई बात नहीं होगी
आखिर सोशलिस्ट सेहत का जो मामला है

या फिर कभी
किसी ब्यूटी पार्लर में
फेशियल-मसाज़ करवाती हुई
या बालों को रंगने के वास्ते
कुछ अलग-सा डाई चुनती हुई
या किसी बुटीक में
डिजायनर परिधानों को ट्राई करती हुई
एक गर्माहट बिखेरती जो कविता मिले
तो घबराने वाली भी
ऐसी कोई घटना नहीं होगी
चिर-युवा दिखना कौन नहीं चाहता ?

हो सकता है किसी दिन
किसी नामी-गिरामी डेंटिस्ट के यहाँ
अपने जबड़े को दुरुस्त करवाती हुई
नकली दांतों में हीरे-मोती जड़वाती हुई
यूँ ही खिलखिलाती हुई कविता मिले तो
आप भी लुढकने को तैयार हो जाएँ
आखिर खनकती चमकीली हँसी पर
कौन नहीं मर-मिटता है ?

फिर किसी शाम
हाई-प्रोफाइल सब्जी-मंडी में
आँखों को रोकती हुई
किसी बड़ी लग्जरी गाड़ी की डिक्की में
ढेरों साक-सब्जियां लदवाती हुई
जीरो-फिगर वाली कोई कविता दिखे तो
आप बस इतना ख़याल रख सकते हैं
कि अपनी दसों उँगलियाँ
कुछ ज्यादा ही चबा न लें

और फिर किसी रात
भरपूर हेल्थ-ड्रिंक्स के साथ-साथ
हेल्थ-पिल्स फांक कर
किसी सॉफ्ट म्यूजिक पर
योग-ध्यान लगाती हुई
और पूरे चैन की नींद लेती हुई
कोई कविता दिखे तो
आप जरूर पूरे जल-भुन कर
उससे रश्क खा सकते हैं
तो ये है -
'' इनक्रेडिबल और शाइनिंग इंडिया की कविता ''




...और भारत की कविता अगली कड़ी में .

Saturday, November 3, 2012

क्षणिकाएँ ...


क्षणों की लहरों ने तो
विभीषिकाओं का पाठ पढ़ाया है
पर मैंने भी हर लहर के लिए
डांड तोड़ कर डोंगा बनाया है

           ***

अमानुषिक ऊँचाइयों की परछाईयाँ
मैंने चतुराई से चापा है
और हरेक चीज़ों को बस
अपने सिर के हिसाब से नापा है

           ***

धीरे-धीरे सरक कर
सपनों के छोरों को जोड़ा है
और अस्तित्व के गिने पन्नों में
मैंने चोरी से कुछ को मोड़ा है

           ***

दो जोड़ दो को हरबार
मैंने तीन या पाँच कहा है
और निन्यानवे का फेरा लगा-लगाकर
शून्य से ही तिजोड़ी को भरा है

           ***

आईने में जैसी भी तस्वीर मिली
मैंने बस उसी को जाना है
ओर पीछे पुता कलई ने जो कुछ कहा
उसी को आँख बंद करके माना है .



Tuesday, October 30, 2012

जिन्हें तकलीफ है किसी से ...


भीखमंगा बनकर सबसे
मोती मांगने का चलन है
बोनस में मिलते दुत्कार का
करता कौन आकलन है...

अपने ही प्राणों में दौड़ती
कड़वाहटों का जलन है , पर
एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप
करने में ही सभी मगन हैं...

मारे शर्म के पाताल में
कहीं छुप गया गगन है
भागीरथी-कतार देखकर तो
उसका बढ़ रहा भरम है...

भूल-चूक से भूल हो तो
ऐसी कोई बात नहीं है
अँधेरे को भी जो छलता है
वो तो कोई रात नहीं है...

कालिख से पुता उजाला
अपने ब्रांड को भजा रहा है
सफेदी की चमकार का हवाला दे
हाट-घाट पर दूकान सजा रहा है...

मछली तो फंसने के लिए होती है
और मल्टी-चारा भी कमाल है
मुँह में चूहे का दांत दबाये हुए
सबके कंधे पर एक जाल है...

सुख तो कोई दुर्लभ चीज नहीं
बस नीचे गिरते जाना है
बिन सोचे वो सब कर के
इस दुनिया का कर्ज चुकाना है...

जिन्हें तकलीफ है किसी से
चुपचाप जगह खाली कर दे
और भीखमंगों की झोली को
अपने आत्मसम्मान से भर दे .

Sunday, October 21, 2012

शुभ शक्तिपात करो !


जीवन-नृत्य को
द्रुत गति से कराने वाली
सचेतन संगीत से
स्वर्णाभ सुर-लहरी लहराने वाली
गीतातीत मेघ-गर्जना के
पार्श्व ताल को थपकाने वाली
स्नेहिल विद्युत्-स्पर्श से
पुनीत-पुलक जगाने वाली...

हे माँ!
विहिंसक वृत्तियों पर वज्रपात करो!
और सब पर शुभ शक्तिपात करो!

मधुरित पुष्प-मंजरी सी
उप्त उल्लास खिलाने वाली
चिर चाहना के चषक में
अमृत-पय पिलाने वाली
इंद्रधनुषी इच्छाओं में
नख-शिख तक उलझाने वाली
मोहिनी-मुग्धा सी
पुन: माया को लील जाने वाली...

हे माँ!
अनृत , मिथ्यात्व पर कठोर आघात करो!
और सब पर शुभ शक्तिपात करो!

अपने सम्पूर्ण सौन्दर्य में
अर्धरात्री को उकसाने वाली
इस संकटापन्न संसार को
स्वर्गीय स्वानुभूति कराने वाली
घोर तमस के तृषा को भी
अंतत: त्राण दिलाने वाली
संकल्पित संकाश से
जगत को नित्यश: नहलाने वाली...

हे माँ!
अपने वैभव-विलास युत वक्ष से
अजात प्रकृति-शिशुओं को दीर्घजात करो !
और सब पर शुभ शक्तिपात करो!