क्यूँ मैं कहूँ
पारदर्शी हो तुम
पूरे सौ प्रतिशत
जबकि तुममें
दिखती हूँ मैं...
पर कहीं न कहीं
है विरोधाभास
जहाँ मेरी धडकनें
मिल गयी है तुमसे
वहीँ एक -एक विचार
कहीं छूट गए है...
मैं अनुभव कर सकती हूँ
तुम्हारी विराटता का
अपनी ग्राह्यता के अनुसार
ग्रहण कर सकती हूँ तुम्हें
मिलावटों से निथारते हुए...
पर सांसो की डोर
बंधी है तुमसे ...
और मैं लेना चाहूंगी
जन्म-जन्मान्तर तक जन्म
तुमसे बंधने के लिए
या अपनी मुक्ति के लिए
या फिर
विरोधी सत्य के लिए ?
Wednesday, December 22, 2010
Thursday, December 2, 2010
इतर
कोई परिग्रह नहीं
परिग्रह तो दूर की बात
कोई आग्रह भी नहीं ...
कोई प्रतिबंध नहीं
प्रतिबंध तो दूर की बात
कोई अनुबंध भी नहीं ...
कोई विकांक्षा नहीं
विकांक्षा तो दूर की बात
कोई आकांक्षा भी नहीं ...
कोई परिवर्जन नहीं
परिवर्जन तो दूर की बात
कोई आवर्जन भी नहीं ...
कोई विक्षोभ नहीं
विक्षोभ तो दूर की बात
कोई क्षोभ भी नहीं ...
कोई प्रतिलंभ नहीं
प्रतिलंभ तो दूर की बात
कोई उपालंभ भी नहीं ...
कोई परिसंवाद नहीं
परिसंवाद तो दूर की बात
कोई संवाद भी नहीं ....
प्रिय! इन सबसे इतर यदि
हम एक-दूसरे में
प्रतिपल प्रमत्त हों ...
हमारा रोम-रोम
प्रतिक्षण प्रस्फुटित हो...
और हमारी तरंगें
प्रतिसम प्रसक्त हों ...
तो निःस्संदेह
प्रेम ही है ...
परिग्रह तो दूर की बात
कोई आग्रह भी नहीं ...
कोई प्रतिबंध नहीं
प्रतिबंध तो दूर की बात
कोई अनुबंध भी नहीं ...
कोई विकांक्षा नहीं
विकांक्षा तो दूर की बात
कोई आकांक्षा भी नहीं ...
कोई परिवर्जन नहीं
परिवर्जन तो दूर की बात
कोई आवर्जन भी नहीं ...
कोई विक्षोभ नहीं
विक्षोभ तो दूर की बात
कोई क्षोभ भी नहीं ...
कोई प्रतिलंभ नहीं
प्रतिलंभ तो दूर की बात
कोई उपालंभ भी नहीं ...
कोई परिसंवाद नहीं
परिसंवाद तो दूर की बात
कोई संवाद भी नहीं ....
प्रिय! इन सबसे इतर यदि
हम एक-दूसरे में
प्रतिपल प्रमत्त हों ...
हमारा रोम-रोम
प्रतिक्षण प्रस्फुटित हो...
और हमारी तरंगें
प्रतिसम प्रसक्त हों ...
तो निःस्संदेह
प्रेम ही है ...
Wednesday, November 17, 2010
औचित्य .......
खोजती रही मैं ..
अपने पादचिह्न
कभी आग पर चलते हुए
तो कभी पानी पर चलते हुए
खोजती रही मैं ..
अपनी प्रतिच्छाया
कभी रात के घुप्प अँधेरे में
तो कभी सिर पर खड़ी धूप में
खोजती रही मैं ..
अपना परिगमन -पथ
कभी जीवन के अयनवृतों में
तो कभी अभिशप्त चक्रव्यूहों में
खोजती रही मैं..
अपनी अभिव्यक्ति
कभी निर्वाक निनादों में
तो कभी अवमर्दित उद्घोषों में
खोजती रही मैं ..
अपना अस्तित्व
कभी हाशिये पर कराहती आहों में
तो कभी कालचक्र के पिसते गवाहों में
हाँ ! खोज रही हूँ मैं ........
नियति और परिणति के बीच
अपने होने का औचित्य .
अपने पादचिह्न
कभी आग पर चलते हुए
तो कभी पानी पर चलते हुए
खोजती रही मैं ..
अपनी प्रतिच्छाया
कभी रात के घुप्प अँधेरे में
तो कभी सिर पर खड़ी धूप में
खोजती रही मैं ..
अपना परिगमन -पथ
कभी जीवन के अयनवृतों में
तो कभी अभिशप्त चक्रव्यूहों में
खोजती रही मैं..
अपनी अभिव्यक्ति
कभी निर्वाक निनादों में
तो कभी अवमर्दित उद्घोषों में
खोजती रही मैं ..
अपना अस्तित्व
कभी हाशिये पर कराहती आहों में
तो कभी कालचक्र के पिसते गवाहों में
हाँ ! खोज रही हूँ मैं ........
नियति और परिणति के बीच
अपने होने का औचित्य .
Categories:
वास्तविक रस
Monday, November 8, 2010
अज्ञात नदी
ऐसा नहीं हो सकता कि
कोई अज्ञात नदी
पृथ्वी तले चुपचाप बहती हुई
समंदर की तरफ बढ़ी जा रही हो
हालाँकि उसका सफ़र
थोड़ा मुश्किल भरा होगा
उसे कुछ ज्यादा
वक्त लग रहा होगा
फिर भी बहती चली जा रही है
धीरे -धीरे , धीरे -धीरे
अपनी व्यथा को
स्वयं में ही समेटे हुए
हाँ प्रिय !
वो नदी मैं ही हूँ और
बाँहें फैलाये हुए तुम - समंदर
मुझमें ठंडा उन्माद है
तो तुममें उतप्त धैर्य
समय के साथ एकाकार होकर
मैं आ रही हूँ , आ रही हूँ ....
राहगीरों की प्यास बुझाते हुए
तुम भी अपनी सीमाओं को
और फैलाओ , और फैलाओ ....
ताकि जब हम मिलें तो
क्षितिज भी शेष न रहे .
कोई अज्ञात नदी
पृथ्वी तले चुपचाप बहती हुई
समंदर की तरफ बढ़ी जा रही हो
हालाँकि उसका सफ़र
थोड़ा मुश्किल भरा होगा
उसे कुछ ज्यादा
वक्त लग रहा होगा
फिर भी बहती चली जा रही है
धीरे -धीरे , धीरे -धीरे
अपनी व्यथा को
स्वयं में ही समेटे हुए
हाँ प्रिय !
वो नदी मैं ही हूँ और
बाँहें फैलाये हुए तुम - समंदर
मुझमें ठंडा उन्माद है
तो तुममें उतप्त धैर्य
समय के साथ एकाकार होकर
मैं आ रही हूँ , आ रही हूँ ....
राहगीरों की प्यास बुझाते हुए
तुम भी अपनी सीमाओं को
और फैलाओ , और फैलाओ ....
ताकि जब हम मिलें तो
क्षितिज भी शेष न रहे .
Wednesday, November 3, 2010
सोचती हूँ ........
दीवाली है
सोचती हूँ
सबों के साथ
उत्सवी उमंग में डूब जाऊं
संभृत समस्याओं को छोड़
सफाई पुताई में लग जाऊं ....
मन के कचड़े को
कहीं दूर ले जाकर
सुरक्षित निपटान करूँ
कुछ चटकीले रंगों से
नए कलेवर में
रंग रोगन करूँ ......
खुशियों की रेवड़ियाँ
जी भर के खाऊं खिलाऊं...
सभी तो
घर से बाहर तक
दीपों से रोशनी फैलाते हैं
अपने अन्दर के शोर को
पटाखों से दबातें हैं
अतृप्त तृष्णा को
छप्पन भोग लगाते हैं
सोचती हूँ ......
कभी किसी भी
प्रदुषण से मैं
पूर्णतः मुक्त होकर
एक ह्रदय दीप भी
जला लूँ तो
हो जाए
दीवाली .
सोचती हूँ
सबों के साथ
उत्सवी उमंग में डूब जाऊं
संभृत समस्याओं को छोड़
सफाई पुताई में लग जाऊं ....
मन के कचड़े को
कहीं दूर ले जाकर
सुरक्षित निपटान करूँ
कुछ चटकीले रंगों से
नए कलेवर में
रंग रोगन करूँ ......
खुशियों की रेवड़ियाँ
जी भर के खाऊं खिलाऊं...
सभी तो
घर से बाहर तक
दीपों से रोशनी फैलाते हैं
अपने अन्दर के शोर को
पटाखों से दबातें हैं
अतृप्त तृष्णा को
छप्पन भोग लगाते हैं
सोचती हूँ ......
कभी किसी भी
प्रदुषण से मैं
पूर्णतः मुक्त होकर
एक ह्रदय दीप भी
जला लूँ तो
हो जाए
दीवाली .
Thursday, October 28, 2010
अहंता
विद्वेष
वैमनस्य
विवाद
शीतयुद्ध
न संधि न समाप्ति
एक समान योद्धा
मेरी बनायीं हुई दुनिया
एकतरफ ......
और मैं
दूसरी तरफ
क्या मुझे
मरना पड़ेगा
स्वामी - हंता
अहंता से .
वैमनस्य
विवाद
शीतयुद्ध
न संधि न समाप्ति
एक समान योद्धा
मेरी बनायीं हुई दुनिया
एकतरफ ......
और मैं
दूसरी तरफ
क्या मुझे
मरना पड़ेगा
स्वामी - हंता
अहंता से .
स्वीकार
ठहरने को तो
ठहर जाऊं कुछ पल
तुम्हारे पास
पर मैं रुक नहीं सकती
तबतक , जबतक की तुम
रोकना चाहो मुझे
सँवरने को तो
सँवर जाऊं कई -कई बार
तुम्हारे लिए
पर मैं निखर नहीं सकती
वैसे , जैसे की तुम
निखारना चाहो मुझे
प्रिय ! तब आरोपण क्यों
अगर प्रेम है तो
आओ .......
एक -दूसरे को हम
स्वीकार करें
समग्रता से
सहज रूप में .
ठहर जाऊं कुछ पल
तुम्हारे पास
पर मैं रुक नहीं सकती
तबतक , जबतक की तुम
रोकना चाहो मुझे
सँवरने को तो
सँवर जाऊं कई -कई बार
तुम्हारे लिए
पर मैं निखर नहीं सकती
वैसे , जैसे की तुम
निखारना चाहो मुझे
प्रिय ! तब आरोपण क्यों
अगर प्रेम है तो
आओ .......
एक -दूसरे को हम
स्वीकार करें
समग्रता से
सहज रूप में .
Wednesday, October 27, 2010
न्याय
मेरे व्यक्तित्व के
विभिन्न पक्षों को
परस्पर
संतुलित करता है
मेरी आत्मा में
निहित न्याय
मेरी आवश्यकताएं
पूरक माध्यम ......
मेरी गतिशीलता
मेरी अकर्मण्यता
मेरी हिम्मत
मेरा साहस .....
मेरी चेतना में
अद्भुत समन्यवय
दुर्लभ सामंजस्य
जो मुझे बोध कराता है
मेरे कर्तव्य का
मेरे अस्तित्व का
फिर मैं
और क्या अपेक्षा करूँ
उस न्याय से
जो अन्य करते हैं
अपने हिसाब से
मेरे लिए .
विभिन्न पक्षों को
परस्पर
संतुलित करता है
मेरी आत्मा में
निहित न्याय
मेरी आवश्यकताएं
पूरक माध्यम ......
मेरी गतिशीलता
मेरी अकर्मण्यता
मेरी हिम्मत
मेरा साहस .....
मेरी चेतना में
अद्भुत समन्यवय
दुर्लभ सामंजस्य
जो मुझे बोध कराता है
मेरे कर्तव्य का
मेरे अस्तित्व का
फिर मैं
और क्या अपेक्षा करूँ
उस न्याय से
जो अन्य करते हैं
अपने हिसाब से
मेरे लिए .
अपेक्षा
अपनी दया पर आश्रित मैं
मुझसे कैसी अपेक्षा
सद्गुणों की या
उसकी किसी भी धारणा की
मूल्यों की या
उसकी किसी भी ऊंचाई की
मौलिकता की या
उसकी किसी भी छाया की
सर्वश्रेष्ठता की या
उसके किसी भी दु:स्वप्नों की
मानवता की या
उसकी किसी भी प्रतिबद्धता की
यदि मैं स्वयं से ही
स्वतंत्र हो जाऊं तो
मुझसे की जाने वाली
तमाम अपेक्षाएं
जायज है .
मुझसे कैसी अपेक्षा
सद्गुणों की या
उसकी किसी भी धारणा की
मूल्यों की या
उसकी किसी भी ऊंचाई की
मौलिकता की या
उसकी किसी भी छाया की
सर्वश्रेष्ठता की या
उसके किसी भी दु:स्वप्नों की
मानवता की या
उसकी किसी भी प्रतिबद्धता की
यदि मैं स्वयं से ही
स्वतंत्र हो जाऊं तो
मुझसे की जाने वाली
तमाम अपेक्षाएं
जायज है .
Tuesday, October 26, 2010
उत्तरदायी
मेरी नैतिक शिक्षा
हर अच्छे और बुरे
कार्यो को मेरे
वैयक्तिक पहल व
साहसिकता की भावना से
करने देती है ......
हालाँकि
बहुत बार ऐसा भी
होता है कि स्वयं
मेरा नैतिक अस्तित्व
नष्टप्राय होता है
जिसपर मेरा कोई भी
नियंत्रण नहीं होता है
मैं ही गिरती हूँ
औँधे मुँह
पुनः
मैं ही उठती हूँ
सतत प्रगतिशील मैं
मेरे द्वारा होती है
मेरी ही प्रगति
जिसकी उत्तरदायी
केवल मैं ही होती हूँ .
हर अच्छे और बुरे
कार्यो को मेरे
वैयक्तिक पहल व
साहसिकता की भावना से
करने देती है ......
हालाँकि
बहुत बार ऐसा भी
होता है कि स्वयं
मेरा नैतिक अस्तित्व
नष्टप्राय होता है
जिसपर मेरा कोई भी
नियंत्रण नहीं होता है
मैं ही गिरती हूँ
औँधे मुँह
पुनः
मैं ही उठती हूँ
सतत प्रगतिशील मैं
मेरे द्वारा होती है
मेरी ही प्रगति
जिसकी उत्तरदायी
केवल मैं ही होती हूँ .
Monday, October 25, 2010
पश्चाताप
जीवन की असारता
पश्चाताप
जिसे सुनने के लिए
केवल मैं या
एकांत तथा शांत प्रकृति
आँखों को दिखता
क्रूर नृत्य
प्रलय की लहरों का
जो बाहुपाश में मुझे
जकड़ती जा रही है
और मैं हो रही हूँ
विलीन तथा विनष्ट
स्वयं में ही ........
पश्चाताप में
निमग्न होकर भी
कोई शक्ति मुझे
देती है प्रेरणा
आभ्यंतर प्रेरणा
कर्मशील होने की
मैं पुनः
आसक्त होती हूँ
जीवन के प्रति
मुझमें संचार होता है
आशा का
सुनहरे तीर बरसाती
अलौकिक सुबह
मुझे आलोकित करती है
जिसमें दिखता है प्रेम
मेरा प्रेम
मंद-मंद मुस्कुराता हुआ
दूर होकर भी
बहुत पास बहुत पास
मेरे पैर स्वतः
बढ़ चलते हैं
धीरे -धीरे
धीरे -धीरे
उसकी ओर .... .
पश्चाताप
जिसे सुनने के लिए
केवल मैं या
एकांत तथा शांत प्रकृति
आँखों को दिखता
क्रूर नृत्य
प्रलय की लहरों का
जो बाहुपाश में मुझे
जकड़ती जा रही है
और मैं हो रही हूँ
विलीन तथा विनष्ट
स्वयं में ही ........
पश्चाताप में
निमग्न होकर भी
कोई शक्ति मुझे
देती है प्रेरणा
आभ्यंतर प्रेरणा
कर्मशील होने की
मैं पुनः
आसक्त होती हूँ
जीवन के प्रति
मुझमें संचार होता है
आशा का
सुनहरे तीर बरसाती
अलौकिक सुबह
मुझे आलोकित करती है
जिसमें दिखता है प्रेम
मेरा प्रेम
मंद-मंद मुस्कुराता हुआ
दूर होकर भी
बहुत पास बहुत पास
मेरे पैर स्वतः
बढ़ चलते हैं
धीरे -धीरे
धीरे -धीरे
उसकी ओर .... .
वरदान
क्यों मैं डालूं तुम्हारे पैरों में
अपनी कल्पनाओं की बेड़ियाँ
क्यों मैं बांध लूँ तुम्हें
अपने इन्द्रधनुषी सपनों में
क्यों मैं घेर लूँ तुम्हें
अपनी बांहों के घेरे में
क्यों मैं बनाऊं तुम्हारे लिए
अपनी सीमाओं का लक्ष्मण रेखा
क्यों मैं खींचती रहूँ तुम्हें
अपने तन मन के आकर्षण में
मेरे लिए तुम्हारा भावस्पर्श ही
अद्भुत वरदान है
जिससे मैं पाषाण से बन गयी
जीती जागती इन्सान
परिपक्व चेतना युक्त
और तुम्हारे असीम सीमा में
हो गयी अवस्थित
साक्षी भाव में तन्मय
तुममे तन्मय .
अपनी कल्पनाओं की बेड़ियाँ
क्यों मैं बांध लूँ तुम्हें
अपने इन्द्रधनुषी सपनों में
क्यों मैं घेर लूँ तुम्हें
अपनी बांहों के घेरे में
क्यों मैं बनाऊं तुम्हारे लिए
अपनी सीमाओं का लक्ष्मण रेखा
क्यों मैं खींचती रहूँ तुम्हें
अपने तन मन के आकर्षण में
मेरे लिए तुम्हारा भावस्पर्श ही
अद्भुत वरदान है
जिससे मैं पाषाण से बन गयी
जीती जागती इन्सान
परिपक्व चेतना युक्त
और तुम्हारे असीम सीमा में
हो गयी अवस्थित
साक्षी भाव में तन्मय
तुममे तन्मय .
Friday, October 22, 2010
दीवार
अपने भीतर खड़े
ऊँची - ऊँची दीवारों को
ढहाने के लिए
मैंने बनाया
अपने विचारों का
एक बहुत बड़ा
मजबूत हथौड़ा
जब तब करती रही
प्रहार पर प्रहार
हर प्रहार के बाद
चकनाचूर होकर
गिर जाता मेरा ही
एक व्यर्थ विचार
अब जो शेष है
वो है केवल अनुभवों का
समग्र सार
और मैं निर्विचार
या मैं ही हूँ
कोई सत्य की दीवार .
ऊँची - ऊँची दीवारों को
ढहाने के लिए
मैंने बनाया
अपने विचारों का
एक बहुत बड़ा
मजबूत हथौड़ा
जब तब करती रही
प्रहार पर प्रहार
हर प्रहार के बाद
चकनाचूर होकर
गिर जाता मेरा ही
एक व्यर्थ विचार
अब जो शेष है
वो है केवल अनुभवों का
समग्र सार
और मैं निर्विचार
या मैं ही हूँ
कोई सत्य की दीवार .
Wednesday, October 20, 2010
वितंडा
एक कोशिश या
हठधर्मिता
या फिर
बलात सम्प्रेषण
अभिव्यक्ति के अधिकार
के तहत
कविता से संवाद
या फिर
स्वयं के मानसिक
विलासिता के लिए
शब्द निर्मित अत्याधुनिक
भोग विलास के साधन
एक वितंडा
स्वयं में ही
मैं हूँ संसार में
सबसे अमीर .
हठधर्मिता
या फिर
बलात सम्प्रेषण
अभिव्यक्ति के अधिकार
के तहत
कविता से संवाद
या फिर
स्वयं के मानसिक
विलासिता के लिए
शब्द निर्मित अत्याधुनिक
भोग विलास के साधन
एक वितंडा
स्वयं में ही
मैं हूँ संसार में
सबसे अमीर .
जतन
मुझमें
तेरा अवतरण
तुझमें
मेरा अवशोषण
हाय ! मुझसे
मेरा ही अवहरण
अब मेरी सांसों में
तेरा ही आवागमन
विरह वेदना में
तेरा अवगाहन
और
मिलन - बेला में
देह को लाँघ
तुम्हे छूने का जतन
क्यों इस पूर्णता में भी
है एक अधूरापन
प्रिय ! यही प्रेम है तो
आओ इसी का
हम लें आलंबन .
तेरा अवतरण
तुझमें
मेरा अवशोषण
हाय ! मुझसे
मेरा ही अवहरण
अब मेरी सांसों में
तेरा ही आवागमन
विरह वेदना में
तेरा अवगाहन
और
मिलन - बेला में
देह को लाँघ
तुम्हे छूने का जतन
क्यों इस पूर्णता में भी
है एक अधूरापन
प्रिय ! यही प्रेम है तो
आओ इसी का
हम लें आलंबन .
Saturday, October 16, 2010
खुली मुट्ठी
चुपके से किसी पल को
मुट्ठी में छुपा लेना
हर पल उस पल को
मुट्ठी खोल देखते रहना
समय ! मैंने तुम्हे मात है दिया
दम है तो मेरी खुली मुट्ठी से
छीन लो उस पल को
जिस पल मैंने स्वयं को
समर्पित किया है
अपने प्रियतम को
और मैं कहीं गुम हूँ
अपने प्रियतम में .
मुट्ठी में छुपा लेना
हर पल उस पल को
मुट्ठी खोल देखते रहना
समय ! मैंने तुम्हे मात है दिया
दम है तो मेरी खुली मुट्ठी से
छीन लो उस पल को
जिस पल मैंने स्वयं को
समर्पित किया है
अपने प्रियतम को
और मैं कहीं गुम हूँ
अपने प्रियतम में .
Friday, October 15, 2010
रचना
जब अपना ही मौन
निष्क्रिय कर देता है स्वरतंत्र को
जब अपनी ही सोच
दिखाने लगती है त्रिआयामी चलचित्र
जब अपने ही आँखों में
घूमने लगता है अपना विकृत चेहरा
जब अपनी ही चीख
गूंजने लगती है अपने कानों में
जब अपना ही क्रोध
अंग प्रत्यंग को जलाने लगता है
तब मैं अतिशय कोशिश करती हूँ
सामान्य से सामान्य रहने की
नरम आवरण के अन्दर
बहुत कुछ टूटने लगता है
बार बार होता ये विध्वंस
सृजनात्मक होता तो एक बात होती
पर मेरे विचारों का महल
मलवों में तब्दील होते रहते हैं
मलवे, मलवे ही मलवे
जिसके नीचे दबी मैं
सोच रही हूँ
एक नई सृष्टि की ही
क्यूँ न रचना कर दूँ .
निष्क्रिय कर देता है स्वरतंत्र को
जब अपनी ही सोच
दिखाने लगती है त्रिआयामी चलचित्र
जब अपने ही आँखों में
घूमने लगता है अपना विकृत चेहरा
जब अपनी ही चीख
गूंजने लगती है अपने कानों में
जब अपना ही क्रोध
अंग प्रत्यंग को जलाने लगता है
तब मैं अतिशय कोशिश करती हूँ
सामान्य से सामान्य रहने की
नरम आवरण के अन्दर
बहुत कुछ टूटने लगता है
बार बार होता ये विध्वंस
सृजनात्मक होता तो एक बात होती
पर मेरे विचारों का महल
मलवों में तब्दील होते रहते हैं
मलवे, मलवे ही मलवे
जिसके नीचे दबी मैं
सोच रही हूँ
एक नई सृष्टि की ही
क्यूँ न रचना कर दूँ .
Categories:
अद्भुत रस
Wednesday, October 13, 2010
विवशता
शब्दों की
व्यग्रता व्याकुलता
अर्थों की सीमा को
तोड़ देने की हठता
स्वयं को इस तरह
व्यक्त करने की अधीरता
हाय ! शब्दों में ही
इतनी अराजकता
प्रिय !
इन बेतरतीब शब्दों से
कुछ अर्थ ग्रहण कर पाओ तो
समझ लेना मेरी विह्व्लता
और शब्दों से
बंघी होने की विवशता
पर प्रिय !
कैसी है ये विषमता
पास जो होते हो तुम तो
शब्दों की क्यों
नहीं होती आवश्यकता
दिखती है क्यों
इतनी निरर्थकता
कुछ कहती है क्यों
उद्वेलित नि : शब्दता
जिसमें हो जाते हैं
दोनों समाहित और
रह जाती है केवल
प्रेम की मधुरता
Categories:
प्रेम रस
हो सके तो
हो सके तो बन जाना
तुम मेरे लिए
गर्मी में लू का थपेड़ा
सर्द रातों में
हाड़ को चीड़ती हवा
हो सके तो बन जाना
तुम मेरे लिए
मेरे पैरों के नीचे
दहकता अंगारा
गर्दन पर
लटकती तेज़ तलवार
हो सके तो बन जाना
तुम मेरे लिए
फूटता हुआ ज्वालामुखी
अत्यधिक तीव्रता वाला भूकंप
तब भी मैं अगर
तुमसे करती रहूँ प्यार
तो समझ लेना
प्यार केवल सुखद क्षणों का
साक्षी नहीं होता
बल्कि जीवन संघर्ष में
जीतना भी सिखाता है .
तुम मेरे लिए
गर्मी में लू का थपेड़ा
सर्द रातों में
हाड़ को चीड़ती हवा
हो सके तो बन जाना
तुम मेरे लिए
मेरे पैरों के नीचे
दहकता अंगारा
गर्दन पर
लटकती तेज़ तलवार
हो सके तो बन जाना
तुम मेरे लिए
फूटता हुआ ज्वालामुखी
अत्यधिक तीव्रता वाला भूकंप
तब भी मैं अगर
तुमसे करती रहूँ प्यार
तो समझ लेना
प्यार केवल सुखद क्षणों का
साक्षी नहीं होता
बल्कि जीवन संघर्ष में
जीतना भी सिखाता है .
Categories:
सात्त्विक रस
Sunday, October 10, 2010
उलझन
कुछ सवाल सुलझाते हैं
उलझे अभिवृतियों को
हालाँकि इसका कोई
यथोचित जबाव नहीं होता
फिर भी पतली गली के लिए
बहुधा इसे पीसा जाता है
तर्क-वितर्क के सिलवटटे पर
और इसकी संतति बढती जाती है
कुछ जबाव उलझाते हैं
सुलझे अभिकथनों को
जिसके गर्भ में पनपते रहते हैं
कई कई सवाल और उनकी
कर दी जाती है भ्रूणहत्या
मूक वधिरों की जमात
आजीवन अनुगामी बनकर
नैतिकता व मर्यादा की दासता
स्वेच्छा से स्वीकारते हैं
सवाल और जबाव के बीच
उलझी जिंदगी चलती रहती है
जो जितना उलझे होते हैं
वे स्वयं को हिटलर या सिकंदर
घोषित कर लेते हैं
जो सुलझे होते हैं वे
बुद्ध क्राइस्ट की तरह
मुखरित मौन को धारणकर
युगों युगों के लिए
अपने विचारों को छोड़ जाते हैं .
उलझे अभिवृतियों को
हालाँकि इसका कोई
यथोचित जबाव नहीं होता
फिर भी पतली गली के लिए
बहुधा इसे पीसा जाता है
तर्क-वितर्क के सिलवटटे पर
और इसकी संतति बढती जाती है
कुछ जबाव उलझाते हैं
सुलझे अभिकथनों को
जिसके गर्भ में पनपते रहते हैं
कई कई सवाल और उनकी
कर दी जाती है भ्रूणहत्या
मूक वधिरों की जमात
आजीवन अनुगामी बनकर
नैतिकता व मर्यादा की दासता
स्वेच्छा से स्वीकारते हैं
सवाल और जबाव के बीच
उलझी जिंदगी चलती रहती है
जो जितना उलझे होते हैं
वे स्वयं को हिटलर या सिकंदर
घोषित कर लेते हैं
जो सुलझे होते हैं वे
बुद्ध क्राइस्ट की तरह
मुखरित मौन को धारणकर
युगों युगों के लिए
अपने विचारों को छोड़ जाते हैं .
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