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Friday, January 20, 2012

फरमा

एक ही फरमा में
भली-भांति कसकर
कितनी कुशलता से
सभी सम्पादित करते हैं
दैनंदिन दैनिक-चर्या
सेंटीमीटर , इंच से
नाप - नाप कर..
कांटा - बटखरा से
तौल - तौल कर..
रात को शुभरात्रि
कहने से पहले ही
करते हैं हिसाब-किताब
नफ़ा - नुकसान का
वही चित्रगुप्त वाला
बही-खाता पर
वही-वही लेखा-जोखा....
भावी योजना पर विचार
ज़रूरी फेर - बदल
कुछ ठोस उपाय
कुछ तय - तमन्ना
कल को और
बेहतर बनाने का....
आँख लगने के पहले ही
आँख खुलने के बाद के
कार्यक्रम को तय करना...
वाह रे ! माडर्न युगीन
मशीनी मानव
फिर -फिर
खुद को ही
फ़रमान जारी करते रहो
उसी फिक्स फरमा में
फिर से फ़िट होने का .

43 comments:

  1. bahut achhaa prashn uthaayaa aapne
    janm se ant tak yah karo yah naa karo
    yah nahee karoge to anarth ho jaayegaa
    yah karoge to swarg mil jaayegaa
    in sab ke farmo mein insaan ko fit kar diyaa jaataa
    apnee ichhaa se jee nahee paataa

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  2. समाज और देश के फरमों में कसा मानव जीवन

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  3. ha ha ha bahut hi accha farma hai !! bahut sundar mem really ...insaani farma !!

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  4. adhunik jeevan ka sunder khaka khincha hai aapne.......

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  5. यह ख़ास अंदाज आपका ही है लिखने का .... बहुत अलग सा , बहुत बढ़िया

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  6. आज की रोबोटीय ज़िन्दगी के रोजनामचे की सुन्दर प्रस्तुति .
    औरों से क्या रहते खुद से ही अलसाए लोग ,
    बने बनाए सांचे लेके फिरतें हैं बौराए लोग .

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  7. जो फिट है वो हिट है...फरमे में कसे जाने पर ही जीवन निखरता है...

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  8. वक़्त के साथ चलना है कल को बेहतर बनाना है, तो भावी योजना पर विचार करना ही होगा... अच्छा अंदाज़

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  9. बहुत अच्छा लिखा है आपने....
    kalamdaan.blogspot.com

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  10. सच में...कभी नियमों को तोड़ कर भी तो जिया जाये...
    ये जीना भी कोई जीना है ???
    बेहतरीन रचना.

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  11. आज सब रोबोट बन गए हैं और फरमें में फिट हो जाते हैं ..अच्छी प्रस्तुति

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  12. बढिया रचना।

    वक्‍त किसी के लिए नहीं रूकता इसलिए इसका कद्र करना जरूरी है।

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  13. बहुत कुछ बांधते नापते फरमे ......सशक्त रचना

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  14. कितनी प्रोत्साहन देती पंक्तियाँ है...... बहुत बढिया रचना

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  15. सच है .....वही फर्मा ...उसी में फिर फिट होने की जद्दोजहद में ही जीवन बीत रहा है ....!!

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  16. इसी तरह की फिटनेस सारे समाज में है.सफलता की चढ़ाई के लिए जरुरी है कि फिटनेस के खांचे में ही रहा जाए..इसमें वही लोग नहीं समा पाते जो या तो फिटनेस के खांचे से ज्यादा मोटे होते हैं..या जो विद्रोही होते हैं...अधिक मोटे लोग पिछडते रहते हैं और विद्रोही खत्म कर दिए जाते हैं.....हैरानी है कि खांचा में फिट होते रहने को लेकर फिर भी मारामारी कम नहीं होती....

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  17. लाजबाब ,बहुत कुछ कह दिया |

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  18. अमृताजी, आपने तो कितनों की दुखती रग पर हाथ रख दिया...

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  19. आखिरी पंक्तियाँ इस पूरी पोस्ट की जान है......मशीनी मानव......बिकुल सही शब्द दिया है आपने इस मॉडर्न युगीन मनुष्य को..........सुन्दर पोस्ट|

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  20. ये ही सच है ...आज के वक्त का आईना

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  21. Amrita ji .......bilkul alag andaj aur prabhavshali rachana likhi hai apne ...badhai sweekaren .

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  22. फरमा को सही ही होना चाहिए .
    फरमा हमारा मानक स्वरुप तय करता है .
    हमारा दृष्टिकोण स्पष्ट हो तब आनंद भी दुगुना होता है .
    सुन्दर संवेगात्मक रचना के लिए बधाई

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  23. wah sunder prastuti .........alag andaj me alag sawal , alag khayal . badhai .

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  24. फरमा का फरमान बढ़िया लगा.

    बधाई.

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  25. शानदार प्रस्तुति ! आज के मशीन होते जा रहे मानव की विवशता का सुन्दर चित्रण.

    आभार.

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  26. ..और दैव संजोग से फरमा में फिट होने वाला कवि ह्रदय हो तब तो उसे बेचैन रहना ही है।

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  27. बहुत ही प्रशंसनीय प्रस्तुति । मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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  28. बहुत बढ़िया सार्थक अभिव्यक्ति,बेहतरीन पोस्ट....
    new post...वाह रे मंहगाई...

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  29. जीवन को यंत्रवत हमने ही बना डाला है.बहुत ही यथार्थवादी रचना.कदम-कदम पर पैमाना, नापजोख, लेखाजोखा.

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  30. लकीर का फ़कीर बनने के फायदे इतने हैं
    कि इंसान सिर्फ "फरमे" में सेट होने से ही संतुष्ट नहीं होता

    फरमे को मजबूत बनाने के जतन भी करता है
    इसे कमजोर बनाने वालों के खिलाफ भी रहता है

    अगर वे सफल हुए तो मन मारकर तारीफ़ भी करता है.

    एक बेहतर विचार के साथ आने की अच्छी कोशिश. स्वागत है.

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  31. आज का आदमी इसके सिवा और कर ही क्या सकता है।
    प्रभावशाली कविता।

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  32. गहन प्रश्न उठाती कविता...

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  33. सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार रचना!

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  34. बहुत बढ़िया सार्थक प्रस्तुति। धन्यवाद।

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  35. बहुत बढिया प्रस्तुति........जन-मानस के मन की बात । अति उत्तम रचना :))

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  36. आज के मुकाबले भविष्य में बेहतर करना एक आवश्यकता बन गई है ताकि व्यक्ति दुनिया के बाज़ार में टिक सके. फ़रमे की सीमाएँ तो रहेंगी.

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  37. फरमा होंने के फायदे हैं और नुक्सान भी पर... छटपटाहट बखूबी व्यक्त की आपने

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  38. फर्में में फंसे
    कैसे निकलें.

    आत्मानुभूति करते हुए तन्मय होना ही इसका उत्तर है.

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  39. आज तक कहाँ बन पाया है बेहतर कल ?

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