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Thursday, January 31, 2013

खुशबूदार बदलाव ...


कुर्सियां है तब तो
व्यवस्था की बातें हैं
व हर दरवाजे पर
जोर की दस्तक है ...
पस्त-परेशान-सा
पसीना है
वातानुकूलित कमरे के
फर्श-कगारों पर
कैट-वॉक करती
चहलकदमियाँ हैं
रूम-फ्रेशनर सा
खुशबूदार बदलाव है...
उबासियाँ-जम्हाइयां तो
विश्वविद्यालयों से
बड़ी डिग्री पाने की
जुगत में हैं
और झपकियाँ
घड़ी की सुइयों की
रसबतिया में बीजी है...
कुर्सियां हैं तब तो
पायों में छिपी-सी
अराजकता भी है
टांगों के पीछे-नीचे
कबड्डी खेलती हुई
जिसे देखकर
झाड़-फ़ानूस से
झूलता हुआ युग
कल्पनाओं में उड़ता है
स्पाइडरमैन की तरह
और कुर्सियों से
जुते घोड़ें
हिनहिनाना छोड़कर
उन कौओं को
खोज रहे हैं
जिनके पास हैं
गिरवी बतौर
उनके कान .

36 comments:

  1. कुर्सियां है तब तो... तथाकथित बदलाव की बयार है ... कुर्सियां है तब तो ... तमाम जद्दोजहद का कोरा भ्रम है ...कुर्सियां है तब तो .. माया का खूबसूरत कोलाज है ...

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  2. कुर्सियां है तब तो
    व्यवस्था की बातें हैं
    व हर दरवाजे पर
    जोर की दस्तक है ...बहुत सुन्दर रचना

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  3. बिलकुल निराले अंदाज की कविता |भाषा की सहजता भी सराहनीय |

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  4. सीधे सरल भाषा में सराहनीय अभिव्यक्ति,,,,

    recent post: कैसा,यह गणतंत्र हमारा,

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  5. कुर्सियां हैं तब तो
    पायों में छिपी-सी
    अराजकता भी है
    टांगों के पीछे-नीचे
    कबड्डी खेलती हुई

    सटीक व सुन्दर ...

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  6. कुर्सियों के पाये में छिपी ताकत..अपना अस्तित्व उसके तले..क्या करें जो दिल जले।

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  7. Amrita,

    MUJHE LAGTAA HAI KI YEH AAJ KI RAJNEETIK PRASTHITI PAR VYANG HAI. SAHI LAGTAA HAI.

    Take care

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  8. विचार कविता की सांद्रता और अ -कविता सा बिखराव ,राजनीति की झर्बेरियाँ सब कुछ एक साथ है इस रचना में .अ -सम्बद्धता में तारतम्य सा है .

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  9. नि कुर्सिए .....

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  10. कुर्सियां हैं तब तो
    पायों में छिपी-सी
    अराजकता भी है
    टांगों के पीछे-नीचे
    कबड्डी खेलती हुई

    वाह....
    आपकी शब्दों की जादूगरी की कायल हूँ...

    अनु

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  11. और कुर्सियों से
    जुते घोड़ें
    हिनहिनाना छोड़कर
    उन कौओं को
    खोज रहे हैं
    जिनके पास हैं
    गिरवी बतौर
    उनके कान .
    - बहुत सार्थक प्रयोग !

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  12. बहुत अच्छा लिखती हैं आप. शब्द ताज़ी हवा के झोंके की तरह मन ताज़ा कर देते हैं. रसबतिया प्रयोग बहुत अच्छा लगा.

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  13. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

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  14. वाह अमृताजी ,
    आप की सोच और कल्पना को शब्दों का माध्यम बना कर हमेशा ही एक नए रूप में उतार पाने की आपका अंदाज ही निराला है .हर बार की तरह यह ब्यंग एक बार फिर से आज के समाज की विसंग तियो की ओरयात्रा कराती प्रतीत होती है.बधाई .

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  15. कटाक्ष,हास्य,दुःख से भरी परिस्थिति

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  16. उबासियाँ-जम्हाइयां तो
    विश्वविद्यालयों से
    बड़ी डिग्री पाने की
    जुगत में हैं
    और झपकियाँ
    घड़ी की सुइयों की
    रसबतिया में बीजी है...
    वाह ...सुन्दर शब्द विन्यास ...बहुत सार्थक रचना ...बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें।

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  17. कविता में सर्वथा नवीन प्रतीकों का प्रयोग उसके सौंदर्य में वृद्धि कर रहा है।

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  18. जिनके पास कुर्सियां नहीं हैं..वे उन्हें पाने की फ़िराक में हैं..

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  19. उबासियाँ-जम्हाइयां तो
    विश्वविद्यालयों से
    बड़ी डिग्री पाने की
    जुगत में हैं

    कितना सत्य ...और कितने प्रबल भाव ...
    मानना पड़ेगा ...अमृता जी आपके व्यापक दृष्टिकोण को .....

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  20. कुर्सियां है तब तो
    व्यवस्था की बातें हैं
    व हर दरवाजे पर
    जोर की दस्तक है ...
    बहुत सही कहा आपने

    दमदार अभिव्‍यक्ति

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  21. राजनितिक अव्यवस्था पर कटाछ करती
    बेहतरीन रचना..परिस्थिति भी यही है...

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  22. सार्थक प्रयत्न से दमदार प्रस्तुति. आज की व्यवस्था पर बेहतरीन कटाक्ष.

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  23. जवाब नहीं आपके शब्दों का जादूगरी है... सटीक अभिव्यक्ति...

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  24. कुर्सियां हैं तब तो
    पायों में छिपी-सी
    अराजकता भी है
    टांगों के पीछे-नीचे
    कबड्डी खेलती हुई

    ज़बरदस्त कटाक्ष ....

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  25. वातानुकूलित कमरे के
    फर्श-कगारों पर
    कैट-वॉक करती
    चहलकदमियाँ हैं
    रूम-फ्रेशनर सा
    खुशबूदार बदलाव है...

    सचमुच खुशबूदार बदलाव है

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  26. bahut sundar abhivyaktie, aam shabdon k vishesh vyanjanatmak prayog unhe alag mayne de rahe hain, kataksh bahut umda hai!

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  27. व्यवस्था का यह आलम और आपकी कविता ....!

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  28. एक बार और पढ़ूंगा, तब उपयुक्‍त टिप्‍पणी कर पाऊंगा। अभी तो इतना समझा कि परदे के पीछे भयंकर खेल हो रहे हैं।

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  29. सुन्दर अभिव्यक्ति .......

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  30. आज की राजनीति पे करार प्रहार ...

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  31. विश्वविद्यालयों से
    बड़ी डिग्री पाने की
    जुगत में हैं
    और झपकियाँ
    घड़ी की सुइयों की
    रसबतिया में बीजी है...
    कुर्सियां हैं तब तो
    पायों में छिपी-सी
    अराजकता भी है
    टांगों के पीछे-नीचे
    कबड्डी खेलती हुई

    क्या बात है अमृता जी ...

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  32. बहुत सुन्दर रचना!
    http://voice-brijesh.blogspot.com

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  33. सुन्दर अभिव्यक्ति


    www.darshanjangra.blogspot.com


    www.premkephool.blogspot.com

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