Pages

Sunday, September 9, 2012

मैं बोझिल बदरिया ...


तुमने तार क्या छेड़े
पुकार क्या दे दी
सोया गीत जाग उठा...
मेरे सँभलने के पहले ही
उनींदे नयन-पाटल
ऐसे खुले कि
इस मन-मधुबन से
मेरा ही मधुमास लुटा...
आह !
निश्च्छल नेह की प्रतीति ऐसी होगी
तो प्रिय ! मृदु-मिलन की
रास - रीति कैसी होगी ?
ये सोच -सोचकर
बड़ी दुविधा में प्राण है
और दाँव पर तेरा मान है...
घुट-घुट कर विरह अधीर है
भर-भर जाती कैसी यह पीर है ?
अब तो घुमड़कर ह्रदय में ही
रागिनी है कंपकंपाती
अधर तक पहुँच कर भी
लुटी हुई सी लौट जाती..
कहो ! ये कैसी कलियाँ
तुमने बिछाई है सहेज कर
कि नुपुर बन झनक रहा है
शूल प्रतिपल सेज पर...
अपने कसक की बात , बोलो
किससे कहूँ मैं ?
और बिन कहे तो और भी न
रह सकूँ मैं ...
मेरा गीत क्यूँ डगमगा रहा है ?
बंदी- सा क्यूँ अकुला रहा है ?
मौन की भाषा तो अनजान है
बड़ी दुविधा में प्राण है...
प्रिय ! हो सके तो
आज तुम
अपने शब्दों को ही
इन गीतों में भर आने दो
मैं बोझिल बदरिया
मुझे बरबस ही
बहक- बहक कर बरस जाने दो .


37 comments:

  1. Amrita,

    SAMAJH NAHIN AA RAHAA KYAA KAHOON. HONE WAALE PREM PAL KI KALPAATMAK SOCH KAA BAHUT HI SUNDE VARNAN HAI.

    Take care

    ReplyDelete
  2. मेरा गीत क्यूँ डगमगा रहा है ?
    बंदी- सा क्यूँ अकुला रहा है ?
    मौन की भाषा तो अनजान है
    बड़ी दुविधा में प्राण है...


    बहुत सुंदर
    क्या कहने

    ReplyDelete
  3. प्रेम का जादू बादल बनाये , बना दे बूंदें ,... प्रेम में सब संभव है

    ReplyDelete
  4. काव्य रस से भीग जाते है हम इधर आकर . ये बदली तो बोझिल जीवन में रस की फुहार लाती है .

    ReplyDelete
  5. गीत का डगमगाना...अकुलाना उसके बोलों से थमेगा ही...

    सुन्दर रचना..
    अनु

    ReplyDelete
  6. वाह!
    आपके इस उत्कृष्ट प्रवृष्टि का लिंक कल दिनांक 10-09-2012 के सोमवारीय चर्चामंच-998 पर भी है। सादर सूचनार्थ

    ReplyDelete
  7. प्रिय ! हो सके तो
    आज तुम
    अपने शब्दों को ही
    इन गीतों में भर आने दो
    मैं बोझिल बदरिया
    मुझे बरबस ही
    बहक- बहक कर बरस जाने दो .

    बेहद उम्दा प्रस्तुति ……गहनता लिये अध्यात्मिक भाव भी उभर रहा है।

    ReplyDelete
  8. मेरा गीत क्यूँ डगमगा रहा है ?
    बंदी- सा क्यूँ अकुला रहा है ?
    मौन की भाषा तो अनजान है
    बड़ी दुविधा में प्राण है...
    निश्च्छल नेह की प्रतीति ऐसी ही होगी
    अद्धभुत अभिव्यक्ति !!

    ReplyDelete
  9. प्रेम रस हो या भक्तिभाव दोनों ही भावों में सुंदर रचना ...

    उनींदे नयन पाटल ... पटल कर लें ।

    ReplyDelete
    Replies
    1. आदरणीय , यहाँ पाटल का अर्थ 'गुलाब' के सन्दर्भ में लिया गया है . आपका आभार .

      Delete
  10. अपने कसक की बात बोलो
    किससे कहूँ मैं?
    ...............
    रंग बातें करे...
    बात से खुशबू आये.....

    ReplyDelete
  11. कविता के शिल्प और भाव अच्छे लगे।

    ReplyDelete
  12. प्रिय ! हो सके तो
    आज तुम
    अपने शब्दों को ही
    इन गीतों में भर आने दो
    मैं बोझिल बदरिया
    मुझे बरबस ही
    बहक- बहक कर बरस जाने दो

    आपके पोस्ट पर आना सार्थक हुआ। रचना काफी अच्छी लगी । धन्यवाद।

    ReplyDelete
  13. निश्च्छल नेह की प्रतीति ऐसी होगी
    तो प्रिय ! मृदु-मिलन की
    रास - रीति कैसी होगी ?

    प्रिय ! हो सके तो
    आज तुम
    अपने शब्दों को ही
    इन गीतों में भर आने दो
    मैं बोझिल बदरिया
    मुझे बरबस ही
    बहक- बहक कर बरस जाने दो


    बहुत सुन्दर भाव

    ReplyDelete
  14. प्रेम पगी विह्वलता का उदात्त चित्रण -मनुष्यता इन्ही भावों ,संवेदनाओं के चलते ही तो अखिल ब्रह्माण्ड में अनूठी है - :-)

    ReplyDelete
  15. गहन और बहुत सुन्दर उदगार ह्रदय के ...
    मन झूमने सा लगा ...!!

    दुनिया को ये कमाल भी कर के दिखाइये ....
    मेरी जबीं पे अपना मुक़द्दर सजाइये ...

    ये शेर याद आ गया पढ़ कर ...

    ReplyDelete
  16. ऐसे भाव की अभिव्यक्ति आसान नहीं होती. जिस तरह ये शब्द उतरे हैं वह कवियित्री के भाव और शब्दों के दृढ़ संबंध की रचनात्मक मिसाल है.

    ReplyDelete
  17. जो बहता है, वह बहने दे,
    मन कहता है, वह कहने दे।

    ReplyDelete



  18. चमके चंचल बिजुरिया, प्रगटे बादल रोष ।

    करे इंद्र उत्पात तो, मोहन का क्या दोष ?

    मोहन का क्या दोष, कोष में है जितना जल ।

    देता मेघ उड़ेल, तोड़ना चाहे सम्बल ।

    रविकर नहीं अनाथ, व्यर्थ तू दमके बमके ।

    कृष्ण कमरिया हाथ, बदन हर्षित मम चमके ।

    ReplyDelete
    Replies
    1. उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

      Delete
  19. इन गीतों में भर आने दो
    मैं बोझिल बदरिया
    मुझे बरबस ही
    बहक- बहक कर बरस जाने दो,,,,, .

    भाव और शब्दों की उत्कृष्ट प्रस्तुति,,,

    RECENT POST,,,,मेरे सपनो का भारत,,,,

    ReplyDelete
  20. प्रेम की अभिव्यक्ति है ये रचा ... भाव मय ...

    ReplyDelete
  21. भाव और शब्दों की सुन्दर प्रस्तुति,,,

    ReplyDelete
  22. प्रिय ! हो सके तो
    आज तुम
    अपने शब्दों को ही
    इन गीतों में भर आने दो
    मैं बोझिल बदरिया
    मुझे बरबस ही
    बहक- बहक कर बरस जाने दो .
    वाह ! अमृता जी, बहुत सुंदर भावों का निर्झर बहाया है आपने...

    ReplyDelete
  23. सुन्दर भावपूर्ण पोस्ट।

    ReplyDelete
  24. शब्दों से भरी गीतों की बदरिया बरस रही है....
    बहुत सुन्दर भाव...

    ReplyDelete
  25. प्रिय ! हो सके तो
    आज तुम
    अपने शब्दों को ही
    इन गीतों में भर आने दो
    मैं बोझिल बदरिया
    मुझे बरबस ही
    बहक- बहक कर बरस जाने दो .

    प्रेम रस में डूबी मनमोहक

    ReplyDelete
  26. प्रिय ! हो सके तो
    आज तुम
    अपने शब्दों को ही
    इन गीतों में भर आने दो

    बेहद भावपूर्ण रचना.

    ReplyDelete
  27. प्रिय ! हो सके तो
    आज तुम
    अपने शब्दों को ही
    इन गीतों में भर आने दो
    मैं बोझिल बदरिया
    मुझे बरबस ही
    बहक- बहक कर बरस जाने दो .
    विरहणी का उच्छ्वास ,बढ़िया प्रस्तुति -
    टकराओं परबत शिखरों से ,
    बरखा बन बरस जाओ ,

    .
    ram ram bhai
    सोमवार, 10 सितम्बर 2012
    आलमी हो गई है रहीमा शेख की तपेदिक व्यथा -कथा (आखिरी से पहली किस्त )

    ReplyDelete
  28. प्रेम का श्रृंगार पक्ष भी कम लालित्यपूर्ण नहीं है !
    खूबसूरत कविता !

    ReplyDelete
  29. हमेशा की तरह कविता को २ ,३ बार पढ़ा और हर अहसास को आत्मसात किया .....
    निश्च्छल नेह की प्रतीति ऐसी होगी
    तो प्रिय ! मृदु-मिलन की
    रास - रीति कैसी होगी ?
    ....बस क्या कहूं ......भीग गयी आपकी रचना में ....

    ReplyDelete
  30. शब्दों में अगर प्राण भरा जा सकता तो आपकी पूरी कविता ही pranmayi और sajiw ho jaati. sirf कुछ पंक्तिया तो मात्र अनमोल रत्नों में कुछ चुन लेने जैस ही है.प्रतीक्षा रत विरही ह्रदय की ब्यथा और पुकार उन भावमयी बादलों जैसी है जो अंत अंत तक भीगा ही डालते है.अमृता जी इतनी कोमल कविता के लिए मेरे पास शब्द नहीं है.मेरी उस परमात्मा से बिनती होगी की आपके ह्रदय का प्रवाह बना रहे ताकि हिंदी को आप जैसे लोगों से समृधि बनती रहे.सामान्य से सामान्य लोगों को भी प्यार की इस अमित प्यास की अभिब्यक्ति आपकी कविता से मिलाती रहे.

    ReplyDelete
  31. अपने कसक की बात , बोलो
    किससे कहूँ मैं ?
    और बिन कहे तो और भी न
    रह सकूँ मैं ...
    मेरा गीत क्यूँ डगमगा रहा है ?
    बंदी- सा क्यूँ अकुला रहा है ?
    मौन की भाषा तो अनजान है
    बड़ी दुविधा में प्राण है...
    प्रिय ! हो सके तो
    आज तुम
    अपने शब्दों को ही
    इन गीतों में भर आने दो
    मैं बोझिल बदरिया
    मुझे बरबस ही
    बहक- बहक कर बरस जाने दो .

    ReplyDelete
  32. Kya koi richa un paatalon ke naam likh doon?
    Sundaratam upama!

    ReplyDelete
  33. मैं बोझिल बदरिया
    मुझे बरबस ही
    बहक- बहक कर बरस जाने दो .

    बेहद उम्दा प्रस्तुति

    ReplyDelete
  34. meetha meetha sa dard...pyaari si khoobsurat si kavita :)

    ReplyDelete
  35. आपके लेखन से मन मग्न हो जाता है अमृता जी.
    क्या इसीलिए आपका नाम भी 'तन्मय' हुआ हैं जी.

    ReplyDelete