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Saturday, January 31, 2015

पीवत जो बसंतरस लगी खुमारी .....

बसंत कियो जो हिय में बसेरा
आपुई मगन भयो मन मेरा

आओ पिय अब हमारे गाँव
बसंत को दियो अमरपुरी ठाँव

फिर कोंपलें फूट-फूट आई
फिर पत्तों ने पांजेब बजाई

झरत दसहुँ दिस मोती
मुट्ठी भर हुलास भयो होती

झीनी-झीनी परत प्रेम फुहार
चेति उड़ियो पंख पसार

कहा कहूँ इस देस की
प्रेम-रंग-रस ओढ़े भेस की

चहुंओर अमरित बूंद की आंच
सांच सांच सो सांच

जस पनिहारिन धरे सिर गागर
नैनन ठहरियो तो पेहि नागर

सब कहहिं प्रेम पंथ ऐसो अटपटो
तो पिय आओ , मोसे लिपटो

दांव ऐसो ही है दासि की
मद पिय करे सहज आसिकी

पिय मिलन की भई सब तैयारी
पीवत जो बसंतरस लगी खुमारी .

20 comments:

  1. झीनी-झीनी परत प्रेम फुहार
    चेति उड़ियो पंख पसार ..
    बसंत, बहार ... प्रेम फुहार ... मन पखेरू उड़ो हमार ...
    बहुत ही सुन्दरता से गढ़े छंद ... मज़ा आ गया ...

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  2. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (01-02-2015) को "जिन्दगी की जंग में" (चर्चा-1876) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. तभी तो बुल्ले शाह भी कहने से अपने को रोक नहीं पाये

    बुल्लिहआ शौह दी सेज पिआरी,
    नी मैं तारनहारे तारी
    किंवे किंवे मेरी आई वारी
    हुंण विछ्ड़नं होइआ मुहाल नी …।

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  4. बहुत सुन्‍दर खुमारी। बहुत सुन्‍दर गीतगान।

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  5. आहा...इस पर क्या कहा जाय सिवाय ग़ालिब के इन शब्दों के -

    करता है बसके बाग़ में तू बेहिजाबियाँ
    आने लगी है नकहत-ऐ-गुल से हया मुझे...

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  6. झरत दसहुँ दिस मोती
    मुट्ठी भर हुलास भयो होती

    झीनी-झीनी परत प्रेम फुहार
    चेति उड़ियो पंख पसार

    कहा कहूँ इस देस की
    प्रेम-रंग-रस ओढ़े भेस की

    चहुंओर अमरित बूंद की आंच
    सांच सांच सो सांच

    बहुत खूबसूरत भाव अमृता जी

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  7. अहा, सुन्दर.... बहुत सुन्दर

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  8. पहले भी लिख चुके हैं और अब भी लिख रहे हैं आपकी कलम में अमृता जी अद्भुत क्षमता है। कभी नागार्जुन का व्यंग्य, कभी समकालीन कवि बन वर्तमान का वास्तव, कभी महादेवी का दुःख-दर्द-पीडा तो कभी मीरां का कृष्णमय होना।

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  9. बासंती मौसम के भाव को संजोय सुंदर प्रस्तुति।

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  10. बसंत का सुन्दर चित्रण...

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  11. अहा-अहा बहुत खूबसूरत रचना … हिय की अमराई में बौरा उठा बसंत …

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  12. अहा, बहुत सुंदर प्रस्‍तुति। http://natkhatkahani.blogspot.com

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  13. बसंत का जादू सिर चढ़ कर बोलने लगा है..खूबसूरत रचना..

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  14. बहुत बहुत खूब...

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  15. बहुत सुन्दर ..वासंती चित्रण ने तो मन मोह ही लियो
    जय श्री राधे
    भ्रमर ५

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