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Tuesday, January 22, 2013

देखो न मुझे ...



एक छोटी-सी
कोठरी का अँधेरा
देखो कैसे
बाहर निकल आया है
जैसे ही
कोई जलता दीया
इस बुझे दीये के
बेहद करीब आया है ...
एक गहरे-काले
घोल की-सी रात
दहककर
पिघलने लगी है
जिसमें
एक स्वप्नातीत
स्वरुपातीत-सी
गहरी नींद
स्तब्धता में भी
जगने लगी है
और
एक चिर-संचित
सुशोभित,सुसज्जित
मेरी प्रतिमा सी-ही
मुझमें ही कुछ
ऐसे ढहने लगी है ...
मानो
सहसा हाथ बढ़ाकर
कोई खींच लिया है
गले लगाकर मुझे
कसकर भींच लिया है ...
वही
लावा-सा बहकर
मेरे शिराओं में
ऐसे भीग रहा है ...
देखो न मुझे
मेरा रोम-रोम भी
उसी में
कैसे सीझ रहा है .

31 comments:

  1. देखो न
    दूब की हथेलियों पर
    आकाशगंगा उमड़ रहा है
    उसी में घुप अँधेरा
    पिघल रहा है .....

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  2. जीवन के कृष्ण पक्ष से शुक्ल पक्ष की ओर ,अन्धकार से प्रकाश की ओर .......विचार और भाव की सशक्त रूपकात्मक अभिव्यक्ति हुई है इस रचना में .आपकी ताज़ा टिपण्णी के लिए आभार .

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    1. आपकी इस कविता की भावनाओं से मई भी सहमत हूँ .मै जितना भी ब्लॉग की कविताओं को देखा है मुझे लगता है की जिस अध्यात्मिक स्तर की चित्रण अमृता जी कर रही है वह पुरे मानव समाज की एक अनबुझ भूख जो लगातार ही स्थूल को माध्यम बना कर सूक्ष्म की ओर अग्रसर होना चाहती है उसका सटीक निर्देश करती प्रतीत होती है..मानव मन की भूख ही आनंद पाने की है.और सिर्फ स्थूल की चाहत तो दुःख ही सृजन करती है.

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  3. कविता मन को छू गयी है..

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  4. कविता बहुत ही मर्मस्पर्शी और सुन्दर है |आभार

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  5. Amrita,

    KISI CHAHAT PAANE PAR MAN MEIN GOOMTHE VICHAAR SAHI KAHE.

    Take care

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  6. आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (23-01-13) के चर्चा मंच पर भी है | अवश्य पधारें |
    सूचनार्थ |

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  7. बहुत सुन्दर भाव..

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  8. कविता एक से अधिक बार पढ़ गया .. अच्छी लगी।

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  9. सहसा हाथ बढ़ाकर
    कोई खींच लिया है
    गले लगाकर मुझे
    कसकर भींच लिया है ...
    वही
    लावा-सा बहकर
    मेरे शिराओं में
    ऐसे भीग रहा है ...
    देखो न मुझे
    मेरा रोम-रोम भी
    उसी में
    कैसे सीझ रहा है

    सुंदर भाव
    अच्छी रचना

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  10. गहरी बात ....... हृदयस्पर्शी

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  11. अति सुन्दर , शब्द नहीं मिलते अब .

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  12. अमृताजी आपकी हर रचना ...एक जीवन दर्शन लगती है ...करीब से देखा हुआ.....छुआ हुआ ....साभार ..!

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  13. बहुत गहन भाव लिए सुन्दर पोस्ट।

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  14. एक स्वप्नातीत
    स्वरुपातीत-सी
    गहरी नींद
    स्तब्धता में भी
    जगने लगी है
    और
    एक चिर-संचित
    सुशोभित,सुसज्जित
    मेरी प्रतिमा सी-ही
    मुझमें ही कुछ
    ऐसे ढहने लगी है ...
    सचमुच तारीफ के लिए शब्द नहीं हैं अमृता जी... लाज़वाब

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  15. बहुत सुंदर अमृता जी..किसी के जले हुए दीप से ही भीतर प्रकाश होता है..

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  16. कोमल और हृदयगम्य प्रस्तुति..

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  17. सदैव की तरह एक गहन और उत्कृष्ट रचना...

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  18. एक छोटी-सी
    कोठरी का अँधेरा
    देखो कैसे
    बाहर निकल आया है
    जैसे ही
    कोई जलता दीया
    इस बुझे दीये के
    बेहद करीब आया है ...

    bahut khoob

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  19. निशब्द करती लाजबाब अभिव्यक्ति,,,,अमृता जी,,,

    recent post: गुलामी का असर,,,

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  20. आतंरिक सेरिनेड सी सुन्दर रचना।

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  21. बहुत दिनो बाद पढ़ रहा आपकी रचना...कुछ भी नहीं पढ़ पाया इस बीच में...किसी की भी नहीं .....आपकी लेखनी जीवंत होती हैं...और लगातार ऐसी सुंदर चीवन्त और समयानुकूल रचनाओ की प्रखरता आपके कृतित्व को उद्भाषित करती हैं....परिकल्पनाएँ जहां सजीव हो जाती....वहीं से कलम लेखनी को ले जीवित हो उठता है....तारीफ के शब्द शायद मिल नहीं रहे....पर इतना ही कह सकता हिन हूँ...की निःशब्द हूँ....बेहद सुंदर और प्रभावी लेखन....

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  22. लावा-सा बहकर
    मेरे शिराओं में
    ऐसे भीग रहा है ...
    देखो न मुझे
    मेरा रोम-रोम भी
    उसी में
    कैसे सीझ रहा है .

    सशक्त रचना.

    ६४ वें गणतंत्र दिवस पर बधाइयाँ और शुभकामनायें.

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  23. बेहद सुन्‍दर।

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  24. बहुत सुन्दर भावों की सशक्त रचना

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