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Thursday, January 28, 2021

अनुरागी चित्त ही जाने .......

अनुरागी चित्त ही जाने 

अनुरागी चित्त की गति

श्रृंगारित स्नेहित स्पंदन  

मंद-मंद मद-मत्त मति


ऊब उदधि नैनों से उद्गत 

ॠतंभरा की ॠणि उदासी

मख-वेदी में मन का मरम

हिय बीच हिलग प्यासी


सोन चिरैया सुख सपना

विकट विदाही विकलता

कली से कमलिनी का क्लेश

क्षण-क्षण क्षत हो छलकता


रस रसिकों को ज्ञात कहाँ

कि रचना रक्त से रचती है

चिर-वियोगी चित्त की चिंता

प्रघोर पीड़ाओं से गुजरती है .

20 comments:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 29-01-2021) को
    "जन-जन के उन्नायक"(चर्चा अंक- 3961)
    पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद.

    "मीना भारद्वाज"

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २९ जनवरी २०२१ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  3. अनुप्रास की अनुपम छटा है। वियोगी ही था पहला कवि।अभी सूत्र नही बदला।

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति

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  5. वाह!गज़ब का सृजन आदरणीया दी।

    रस रसिकों को ज्ञात कहाँ

    कि रचना रक्त से रचती है

    चिर-वियोगी चित्त की चिंता

    प्रघोर पीड़ाओं से गुजरत है..मन को छू गई रचना।
    बधाई एवं शुभकामनाएँ।

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  6. संवेदना और सौंदर्य..दोनो की सुन्दर अभिव्यक्ति..

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  7. सच जिसपर गुजरती हैं वही जानता है

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  8. व‍िशुद्ध ह‍िंंदी की उत्कृष्ट रचना...वाह अमृता जी

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  9. ‘जो घनीभूत पीड़ा थी, मस्तक में स्मृति-सी छायी.दुर्दिन में आँसू बनकर वह आज बरसने आयी’
    काव्य का सृजन सम्भवतः ऐसे ही होता है

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  10. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति, अमृता दी।

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  11. ऊब उदधि नैनों से उद्गत
    ॠतंभरा की ॠणि उदासी
    मख-वेदी में मन का मरम
    हिय बीच हिलग प्यासी....
    बहुत ही सुंदर व प्रभावशाली शब्द संयोजन।

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  12. अनुराग-रस व्यथित अनुरागिनी के क्लेश-कलश में गिर कर पीड़ा की ध्वनि करता है.
    बहुत सुंदर.

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  13. बहुत ही बढ़िया है नमन शुभप्रभात

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  14. आपके लेखन की सकारात्मकता और आशावादिता का मैं क़ायल हूँ

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