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Friday, September 30, 2016

खालिस पंडिताऊ बोल .......

सबका अपना तबेला
सबकी अपनी दौड़
लँगड़ी मारे लँगड़ा
लड़बड़ाये कोई और

अब्दुल्ला का ब्याह
बेगाने माथे मौर
बारूद मारे माचिस
धुँधुआये कोई और

कोई बजाये पोंगली
कोई फाड़े ढोल
पोंगा बढ़कर बाँचे
खालिस पंडिताऊ बोल

कोई चटाये चूना
कोई चबकाये पान
कथ्था मारे कनखी
थूक फेंके पीकदान

कोई दबाये कद्दू
कोई बढ़ाए नीम
पिटारा भर बीमारी
चुप्पी साधे हकीम

कोई कबूतर झपटे
कोई उड़ाये बाज
छिछला छुड़ाये छिलका
गुदा छुपाये राज

आजादी माँगे आजादी
जंजीर पहने जंजीर
नट भट मिलकर
खेले एक खेल

इसकी उसकी डफली
बस अपना राग
कोई मनाये मातम
कोई फैलाये फाग .

10 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "भाखड़ा नंगल डैम पर निबंध - ब्लॉग बुलेटिन“ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. :):) यही हो रहा है ... अपनी अपनी डफली और अपना अपना राग .

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  3. यही उलबासियाँ सब ओर देखने को मिल रही हैं.

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  4. हमें इन स्थितियों को बदलने का कारक नहीं बनना चाहिए?

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  5. ऐसे ही अंतर्विरोधों में आजकल हम सभी जी रहे हैं. उलटबाँसियाँ उस बात को कह रही हैं.

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  6. आजकल के माहौल का कटाक्षपूर्ण काव्यात्मक वर्णन ।

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  7. कितना अंतर्विरोध हो गया है आज देश में ... सब अपनी अपनी ढपली बजा रहे हैं ... सटीक प्रहार ...

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  8. हर जगह यही हालात बनते जा रहे हैं.. लेकिन एक उम्मीद तो कहीं न कहीं पनप ही जाती है...

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  9. aree waaah ye bhi jbrdast hai .... khooob !!!!!

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