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Wednesday, September 14, 2016

हे देवी हिन्दी ! .....

" या देवि सर्वभूतेषु हिन्दीरूपेण संस्थिता ।
  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः "


हे सृष्टिस्वरूपिणी !
हे कामरूपिणी !
हे बीजरूपिणी !
जो जिस भाव और कामना से
श्रद्धा एवं विधि के साथ
तेरा परायण करते हैं
उन्हें उसी भावना और कामना के अनुसार
निश्चय ही फल सिद्धि होती है .......

हे भाषामयी !
हे वांङमयी !
हे सकलशब्दमयी !
हृदय में उदित भव भाव रूप से
मन में संकल्प और विकल्प रूप से
एवं संसार में दृश्य रूप में
अब तुम्हारे स्वरूप का ही दर्शन है .....

हे ज्योत्सनामयी !
हे कृतिमयी !
हे ख्यातिमयी !
अब बिना किसी प्रयत्न के ही
संपूर्ण चराचर जगत में
मेरी यह स्थिति हो गई है कि
मेरे समय का क्षुद्रतम अंश भी
तुम्हारी स्तुति , जप , पूजा
अथवा ध्यान से रहित नहीं है .....

हे शक्तिमयी !
हे कान्तिमयी !
हे व्याप्तिमयी !
इस बात को स्वीकार कर
मैं अति आह्लादित हूँ कि
मेरे संपूर्ण जागतिक आचार और व्यवहार
तुम्हारे प्रति यथोचित रूप से
व्यवहृत होने के कारण
तुम्हारी ही पूजा के रूप में
पूर्णतः परिणत हो गये हैं .

हे देवी हिन्दी !

13 comments:

  1. बहुत सुन्दर ... काश की धरती के अंत अंत से अंश अंश तक हिंदी देवी के शब्द व्याप्त हों ...

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  2. वाह बहुत ही सुन्दर कल्पना और शब्द संयोजन | आनंदम आनंदम

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  3. जय जय देवी हिंदी ... सुन्दर शब्द संयोजन. लाज़वाब रचना

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  4. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 15-09-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2466 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  5. हिन्‍दी के प्रति अपने समय केे क्षुद्रतम अंश का भी ऐसा सदुपयोग निश्चित ही आपको हिन्‍दी का सर्वश्रेष्‍ठ तारणहार बनाता है।

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  6. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 16/09/2016 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

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  7. हिंदी सेवी वही है जो अपने दिल की बात सभी से हिंदी में कहता है. वही ममतामयी हिंदी है. आपका रचना-संसार इस बात का गवाह है.

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  8. हिंदी देवी शरणं गच्छामी ।
    Seetamni. blogspot. in

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  9. हिंदी अमृता है.
    हिंदी तन्मयता है
    अमृता तन्मय से हिंदी की विलक्षणता है

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  10. हिंदी की महिमा अपार है..

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  13. ...पर एक दिन सबको कहना पड़ेगा। .. सकल पदारथ हिंदी जग माहि।।।।

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