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Tuesday, March 11, 2014

चुप रहना ही बेहतर है .....

जब सब भोंपू लगाकर
गली-गली घूमकर
सबके दिमाग को फिराकर
बार-बार कहते हैं कि
गंदगी को जड़ से साफ़ करने वाले
वे ही सबसे अच्छे मेहतर हैं
तो ऐसी हालत में
मेरा चुप रहना ही बेहतर है....

गंदगी , गंदगी , गंदगी
उठते-बैठते , चलते-फिरते
सोते-जागते , खाते-पीते
बस गंदगी को ही
वे ऐसे बताते हैं कि जैसे
उनकी जिंदगी जिंदगी न होकर
कोई जादुई झाड़ू बन गयी हो
और मूंठ को पकड़े-पकड़े
दूसरों की किसी भी सफाई पर
मानो उनकी मुट्ठी ही तन गयी हो....

मेहतर से महावत बनना
उन्हें बहुत खूब आता है
तब तो अपने हाथी को
जहाँ-तहाँ भगा-भगा कर
वे साबित करते हैं कि
उन्हें भौं-भौं की आवाज
क्यों इतना भाता है....

वे मानते हैं कि
भौंकने वाले भी भौंक-भौंक कर
अपना दुम ज़रूर हिलाएंगे
जो नहीं हिलाएंगे वे भी भला
उनसे बचकर कहाँ जायेंगे ?

उन्हें ये भी लगता है कि
भौंकने वाले उनके भुलावे में आकर
अब काटना भूल गये हैं
पर वे खुद भूल जाते हैं कि
वे काटने के साथ-साथ
अब चाटना भी भूल गये हैं.....

उफ़!  जितनी गंदगी नहीं है
उससे कहीं ज्यादा तो
अब किसिम-किसिम के मेहतर हैं
जो बड़ी सफाई से
खुद ही गंदगी फैला-फैला कर
दावा करते हैं कि
वे किसी से किसी मामले में
कहीं से भी न कमतर हैं
तो ऐसी हालत में
मेरा चुप रहना ही बेहतर है .

24 comments:

  1. सूरज चाँद गुजर जाते हैं
    गम केवल रह जाते हैं
    जाने कितनी बार नयन से
    खुद आंसू बह जाते हैं
    हम हारे सा एक जुआरी
    चुप रहने की आदत है
    टुकड़ों में चलते हैं अक्सर
    टुकड़ों में बह जाते हैं

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  2. हम आपसे सहमत हैं, हम भी चुप हो जाते हैं।

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  3. समझ रहे हो हमको भोला
    ऐसा हर अरमान छोड़ दो
    बार-बार दे सकोगे धोखा
    तुम ये भूल नादान छोड़ दो.... सुन्दर रचना … हार्दिक शुभकामनायें 

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  4. चुप रहना ही बेहतर होगा .......राजनिति और किस स्तर तक जायेगी...
    आज के हालात बयां करती सशक्त रचना .....




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  5. गंदगी जुटाने वाले किसिम-किसिम के मेहतर की सफाई तो भगवान भरोसे है... हम सब चुप ही तो हैं.. सब छलावे के लोकतंत्र में अपना नाम-दाम पीट रहे हैं..

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  6. जो गरजते हैं, वे बरसते नहीं
    चुप होकर दिल-दिमाग की रक्षा ज़रूरी है

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  7. सच कहा आपने ............ चुप रहना ही बेहतर है

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  8. चुप रहकर भी तो कितना कुछ कह ही दिया आपने..सदके इस चुप्पी पर..

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  9. इस चुप्पी का अब कोई मायना नहीं ... अप तो चीख चीख कर उनकी सचाई बताने का समय है ... अर्थपूर्ण रचना ...

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  10. कब तक हम चुप रहेंगे...अभी तक हम चुप ही तो रहे हैं..अब तो बोलना ही होगा...बहुत सटीक रचना...

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  11. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन समोसे के साथ चटनी फ्री नहीं रही,ऐसे मे बैंक सेवाएँ फ्री कहाँ - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  12. चुप ही नहीं हो पाते हैं
    वहाँ कोई नहीं सुनता
    तो यहाँ चले आते हैं ।

    बहुत सुंदर ।

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  13. बहुत खूब.
    बस........
    चुप रहना ही बेहतर है.

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  14. उनके शब्दों पर भी तो कंट्रोल लगे !

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  15. ह्रास की हद कब तक देखते रहेंगे ..... कब तक जनता चुप रहेगी ?

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  16. पर चुप भी कब तक रह सकते हैं।

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  17. वो मारा झाड़ू वाले को :-)

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  18. क्हां तो बस खामोश अंतिम नज़ारा देखेंगे

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  19. आपके हाथ में कलम है...बोलने से बेहतर है अपने विचारों को लिपिबद्ध करना...

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  20. और कोई राह ही कहाँ है ..... ? विचारणीय बात

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  21. कुछ परिणाम आने में देर लगाते हैं. शायद कुछ साल लगे.

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  22. अच्छा व्यंग्य। अब तो जी बस जो भी मेहतर चुना जाय, वो वाकई का मेहतर निकले, वार्ना तो सब के सब जो दावेदार हैं, बाद में पता चलता है कि वे स्वयं ही गंदगी फैलाने वाले हैं.

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  23. बहुत चुप रह लिए अब सहा भी तो नहीं जाता कई बार चुप रहना भी सामने वाले को शय दे जाता है।

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