Pages

Wednesday, August 28, 2013

अकारण ही ...



अकारण ही
अर्धरात्रि का समय
मुझे ऐसे घेरता है
कि मेरा इन्द्र भयभीत हो जाता है
एक भयानक झंझावात उठता है
और उसी पर एक प्रलयंकारी
वृष्टि एवं अग्निवर्षा होने लगती है....
योगमाया का ही तो प्रभाव है
कि प्रगाढ़ निंद्रा में सोये मेरे द्वारपाल
अचानक जग कर्तव्यपालन में
पूरी तरह से लग जाते हैं ....
बंदीगृह की तत्परता और
सूप की व्यग्रता देखी नहीं जाती
यमुना और शेषनाग रह-रह कर
सामने आने लगते हैं ....
मेरा शिलापट भी क्षुधातुर हो उठता है
पर जो बेड़ियाँ हैं न
वो और भी दृढ़ता से बांध जाती है
करागार का फाटक पहले ही
खुलने से मना कर देता है ....
बड़ी बेचैनी है , घबराहट है
इस गर्भ में ये कैसी आहट है ?
सावधानी तो बरत रही हूँ
पर असावधानियाँ कंस-सी
आतातायी हो रही है ....
अब अपने ही अत्याचारों के भार को
सहन करने में असमर्थ हूँ
पर उस अजन्मे अवतार को जन्म दूँ
कहाँ इतनी मैं समर्थ हूँ ?
अर्धरात्रि के बीतते ही
झंझावात के साथ-साथ
गर्भ भी शांत हो जाएगा
और दिन में स्वप्नावतार को
पूरी तरह से भूलभाल कर
अपने घर-ऑफिस के कामकाज में
बैल की तरह फिर से लग जाएगा .

Friday, August 23, 2013

प्रेम को कौन कब समझ सका है....



कुछ न कुछ कचोटती-सी
ग्रथित गूँज जरूर रह गयी होगी
सुधि से एक गंध उठकर
संचारित साँसों से बह गयी होगी !

उन्हीं अभिभूत अनुस्मृतियों को
मैं अनंतक अभिसार दे रही हूँ
हाँ! जन्मों-जन्मों के बाद भी
तुम्हें फिर से पुकार दे रही हूँ !

यह जो निगूढ़ नाद है
न मालूम कबसे चल रहा है
हो-न-हो दो बिछुड़े शून्यों में
अश्लेष अर्थ-सा पल रहा है !

उन्हीं अर्थों को तबसे कितने ही
संभृत शब्दों में घोल रही हूँ
और तेरी स्मृति-मंजूषा को
मैं बोल-बोल कर खोल रही हूँ !

कहीं उन शंसित शब्दों की कौंध में
तुम्हें कुछ स्मरण आ जाए
और चिर-वंचित विस्मृतियाँ
अपने अवगुंठित अर्थों को पा जाए !

इस जीवन का अर्थ तुम्हीं से
औ' सौभाग्य का क्षण-क्षण प्रयोजन है
धूप-दीप , अर्चा , फूल , बंदनवार लिए
ह्रदय-महल का सजा ये सिंहासन है !

कितनी आकांक्षाओं-अभीप्साओं को ले
इस दुर्लभ जन्म को हमने पाया है
अब दिवस-रात निष्फल न बीते
इसलिए तो तुम्हें फिर से बुलाया है !

कुछ महत होने के है करीब आया
कोई विधि-विधान मत खोजो तुम
अनघट घटना ही घट रही है
सरस होकर उसे सहेजो तुम !

प्रेम को कौन कब समझ सका है
प्रयत प्रतीति है केवल खोने में
ये जन्मों-जन्मों की गंधवाही गूँज भी
सुन , कहती है  हो जा  मेरे होने में .
 

Tuesday, August 20, 2013

मुई मानवीय भूल है न....



एक और हादसा
विपक्ष पीड़ितों के पक्ष में
पक्षाघाती बोल बोल रहे हैं
और पक्षपाती अपने मातहत से
आहतों का ब्योरा ले रहे हैं...
राहत की बात ये है कि
राहत की रवानगी का 
पूरा इंतजाम किया जा रहा है
इसमें समय तो लगता है...
कटे-फटे अंगों को जोड़-जोड़ कर 
गिनती जारी है
आधिकारिक और सूत्रों के
बेमेल आंकड़ों में
गलती गणित की ही है...
मन ही मन कात्यायनी माता को
धन्यवाद दे दे कर अवाक हो  
सहरसा और खगड़िया अचम्भित है
अपनी खैरियत पर हैरान भी है  
धमारा धू-धू कर जल गया
और कितनी ही कटी लाशें 
अपनी अंतिम संस्कार के लिए 
कितनी आसानी तैयार हो गयी है 
यदि वे कहीं से पूरी हो जाए तो...
वहाँ पहुँचे अधिकारियों को 
खदेड़-खदेड़ कर भगाया गया
या वे खुद ही जान बचाने के लिए
वहाँ से भाग निकले ?
अब तो रेल से गलती होनी थी , हो गयी 
जिन्हें-जिन्हें कटना था वे तो कट चुके
देखने वालों को गुस्सा दिखाना था , दिखा चुके
जितनी तोड़-फोड़ मचानी थी , मचा चुके
समय है , बीतेगा ही
धीरे-धीरे सब चुप भी हो जायेंगे
जैसा कि होता आया है....
अपने आलाकमान जी 
अधिकारियों के लाईन पर लगातार बने हुए हैं
हेल्पलाईन भी जारी किया जा चुका है
इसी से घायलों को भी 
समय पर बचा लिया गया है
फिर एक कमीशन को बिठाने के लिए
बड़ी जगह बनायी जा रही है
फिर एक खुली बहस की
पुरजोर तैयारी चल रही है
जो कि नैतिक जिम्मेवारी पर 
हवाबाज़ी करती रहेंगी...
एक-दूसरे को तिरछी नजरों से देखने के लिए 
आँखों को फरमान जारी कर दिया गया है
आँखे हैं कोई रेल नहीं
डर से मानने को राजी हैं
और जो महज एक
मुई मानवीय भूल है न
वो देश छोड़ कर भाग भी तो नहीं सकती है 
जिसके मचान से माथे पर
सारा दोष मढ़ दिया जाएगा
साथ ही इस गाढ़े वक्त पर
गढ़ी-गढ़ाई हुई गलफूटों को
फिर से गला पकड़ कर
फिर-फिर गढ़ दिया जाएगा .

  

Wednesday, August 7, 2013

धीरज हिलता है ...


                       अब विश्व -यातना को और
                       नहीं सह सकता है यह प्राण
                        नहीं सह सकता है हे! प्रभो
                       क्रन्दन -ध्वनि का जयगान

                       सिन्धु समान महानाद कर
                        बाँसों -बाँस उछलना चाहूँ
                       बड़वानल-सा वंकट हो कर
                      स्वार्थ-बेड़ियाँ कुचलना चाहूँ

                      कुटिल-सी आग में झुलसकर
                      सकल समाज ही हुआ नरक है
                     निष्ठुर नाश मनुज का देखकर
                      फूट -फूटकर रो रहा पावक है

                     एक प्रचंड तूफ़ान को उठाकर
                    दीनों-दलितों को चिताना चाहूँ
                   ऊँचे पर्वत का भी मान हिलाकर
                   द्वेष -विष जड़ से मिटाना चाहूँ

                     जब असहायों के क्रूर शोषण से
                     पाप को  नित पोषण मिलता है
                     तब जलते ज्वालामुखी पर बैठे
                   अग्निधर्माओं का धीरज हिलता है

                    एक करुण क्रोधानल में जलकर
                     दंभी कंटकों को दहकाना चाहूँ
                    शोणित शोकों का शमन करके
                     शोधन बस शोधन करना चाहूँ

                     विश्व -उदय की है झूठी गाथा
                     झूठा जयघोष ,झूठा गुणगान
                    अब नहीं सह सकता है हे!प्रभो
                     यंत्रणा से आकुल हुआ है प्राण

                      हर प्राण यदि ले ले ये संकल्प
                    तो एक नूतन विश्व बनाना चाहूँ
                    संकल्प तो अति कठिन है मगर
                     कदम उस ओर ही बढ़ाना चाहूँ .



Saturday, August 3, 2013

हाय! हाय!



हाय! हाय!
सूरज की छाती पर
दिनदहाड़े ये कैसी फड़-फड़ ?

जो चमगादड़ों में मची है चूँ-चपड़
घुग्घूओ में भी हो रही धर-पकड़...
झींगुरों का मनमाना शोर
मेंढकों में भी मीठा रोर...
सियारों में गुप्त मुलाक़ात
श्वानों का घुन्ना उत्पात...
सांप-चील का षड्यंत्र
छुछुंदर-नेवला सा ये तंत्र...
गिरगिटों का घुमड़ी परेड
मकड़ियों पर पड़ता रेड...

मधुमक्खियों में जो पड़ी फूट
मक्खियों को मिल गयी बम्पर छूट...
खच्चर-टट्टूओं में खटास
बन्दर-रीछों का लुभावना नाच...
चींटियों की ताबड़तोड़ तालियाँ
मच्छरों से छुपती नहीं गालियाँ...
चूहों में प्लेग विलायती
बिल्लियाँ बनी फिरती हिमायती...

हाईब्रिड हाथियों का मेला
शेर के हिस्से में कच्चा केला...
मगरमच्छों का आँसू-दर्शन
गोरिल्लाओं का अंग-प्रदर्शन...
ऊँटों का अनुभव ज्ञान
घोड़ों का बिना रुके सलाम...
अन्धेरा से होती फरमाइश
काले झंडों की चलती रहे नुमाइश...

हाय! हाय!
सूरज की छाती पर ही लट्ठम-लट्ठ
गड़बड़झाला भी है गड्डम-मड्ड...
देखो! बेल्ट में फँसाकर अपना पतलून
कितना मज़े में है सब नियम-क़ानून .