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Friday, October 14, 2011

झंकार

कौन अपनी अकुलाहट को जानता है
काल-व्यूह से निकलने को ठानता है
कुछ अस्पष्ट सी ध्वनि को टानता है
परिवर्तन की आहट को पहचानता है

लग गयी किस को ये कैसी लगन है
काल-चिंतन में ही जो बस  मगन है
बड़वानल- सा हर क्षण जो  चेतन है
सुगन्धित हो रहा कनक -चन्दन है

एक- एक कर संगी - साथी छूटते हैं
अभंग जिसकी सीमाएं , भी टूटते हैं
जब ह्रदय से यूँ ही फव्वारे  छूटते हैं
तब मरू- भूमि में भी अंकुर फूटते हैं

क्यूँ भीतर- भीतर मचा  हाहाकार है
किसलिए मुझे देता कोई ललकार है
न जाने कौन -सी सत्य की पुकार है
संभवत: मेरे मैं की  पहली  झंकार है

अदृश्य- सी डोर से खींचता  है   कोई
अज्ञात - अब्धि में  सींचता  है  कोई
अनवगत - सा पथ दिखाता है  कोई
अप्रति मैं ही हूँ वही या है इष्ट कोई.  
  
 

60 comments:

  1. बहुत ही खुबसूरत....

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  2. क्यूँ भीतर- भीतर मचा हाहाकार है
    किसलिए मुझे देता कोई ललकार है
    न जाने कौन -सी सत्य की पुकार है
    संभवत: मेरे मैं की पहली झंकार है
    बहुत सुंदर,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  3. स्वयं को जानने का बोध किसी देवत्व से कम नहीं है।

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  4. बेहतरीन शब्द संयोजन .....

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||
    बहुत बहुत बधाई ||

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  6. बहुत बढ़िया लगा! बेहद ख़ूबसूरत ! शानदार प्रस्तुती!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
    http://seawave-babli.blogspot.com

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  7. बहुत ही मनभावन कविता है।

    सादर

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  8. 'अंतरात्मा' को झकझोरने वाला वीर-रस सा यह गीत प्रेरक है।

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  9. एक एक कर संगी छूटते हैं...
    अभंग जिसकी सीमाएं भी टूटते हैं....

    अद्भुत रचना ...
    सादर....

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  10. 'संभवतः मेरे मैं की पहली झंकार है'- इस पंक्ति में संपूर्ण कथा और इष्ट से सघर्ष भरा है. बहुत ही सुंदर काव्य-सृजन.

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  11. सुन्दर काव्य ...झंकार ही होती हुई मनन करने को प्रेरित करती रचना

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  12. संगी साथी छूट जाते है, अकेला चला जाता है बंजारा :(

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  13. आप की पीछे की तीनो कविताएँ पड़ी.अब हम निशब्द हो गए. आप की सृजन शीलता तथा अद्भुत कल्पनाशीलता जीवन की यथार्त धरातल को साथ लिए ले चलती हैं एक नयी सी छितिज कीओर .जन्हा खो जाता है सुब कुछ और रह जाती है एक अनगुंज सस्वाता को गूंजती हूक.अब बधाई लिखना शोभा नहीं देता.
    एक बात और आपकी प्रोफाइल में मैंने देखा था की आपकी रूचि homeopathy में है और मैंने एक महिला की जिसे बिगत दस वर्षों से सरे डॉक्टर लएलाज कह चुके थे बिगत तीन महीनो में ही आपके बताये दवाओं का अद्भुत असर हुआ .अब वे अपनी दिनचर्या स्वं ही करने लगी है.आप की कविताओं की तरह homeopathy का ज्ञान भी अद्भुत है. आप कृपया परामर्श देने के लिए एक साईट बना दें . जब तक ऐसी बय्वास्था नहीं है तो क्या मेल से परामर्श देंगी.

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  14. bahut hi khubsurat ...........dil me jhankar baja gayi , apki kavita dil ke taro ko baja gayi .

    sapne-shashi.blogspot.com

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  15. बहुत सुन्दर.......बहुत दिनों बाद वो रस, वो अंदाज़ जो पहले था.....एक गहन आध्यात्मिकता समेटे ये पोस्ट लाजवाब.......हैट्स ऑफ इसके लिए |

    बस......टानता, बड़वानल, अब्धि, अनवगत.....का अर्थ बता दीजिएगा अमृता जी|

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  16. स्वंय से पहचान कराती बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  17. बेहतरीन रचना ......

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  18. आत्मसाक्षात्कार का द्वन्द है शायद ...

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  19. द्वन्द का खुबसूरत चित्रण , बधाई

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  20. आपकी कविता खुद को ठीक वैसी उसी अनुभूति से गुजर जाने का आमंत्रण है ....प्रभावपूर्ण ....!

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  21. behad hi adhboot or sundar parstooti..
    jai hind jai bharat

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  22. बहुत सुंदर रचना,आभार.

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  23. अंतर्मन के द्वन्द का बहुत गहन और प्रभावी चित्रण...

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  24. संभवतः मेरे मैं की पहली झंकार है ....

    अन्तर्मन की उलझन और अंतरद्वंद को दर्शाती रचना. खुद को खुद से पहचान कराने की कोशिश. आपकी रचनाओं के शब्द-संयोजन, भाव और अभिव्यक्ति बेमिशाल है..प्रभु का स्नेह और आशीर्वाद मिले आपको और आप यूँ ही लिखती रहें.

    आभार.

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  25. झंकृत कर गयी झंकार

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  26. शब्‍दों का बेहतर इस्‍तेमाल।
    मन के भावों का सुंदर तरीके से चित्रण।

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  27. 'जब ह्रदय से यूँ ही फव्वारे छूटते हैं
    तब मरुभूमि में भी अंकुर फूटते हैं'
    ......................बहुत सुन्दर ...भावों की प्रभावी प्रस्तुति

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  28. मनोभावो का सुन्दर चित्रण.....

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  29. सुंदर मुक्तकीय प्रस्तुति


    गुजर गया एक साल

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  30. क्यूँ भीतर- भीतर मचा हाहाकार है
    किसलिए मुझे देता कोई ललकार है
    न जाने कौन -सी सत्य की पुकार है
    संभवत: मेरे मैं की पहली झंकार है

    शब्दों का सरल और सहज प्रवाह ....आपकी रचना काबिल - ए - तारीफ है .....!

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  31. बहुत बढ़िया लिखा है आपने! और शानदार प्रस्तुती!
    मैं आपके ब्लॉग पे देरी से आने की वजह से माफ़ी चाहूँगा मैं वैष्णोदेवी और सालासर हनुमान के दर्शन को गया हुआ था और आप से मैं आशा करता हु की आप मेरे ब्लॉग पे आके मुझे आपने विचारो से अवगत करवाएंगे और मेरे ब्लॉग के मेम्बर बनकर मुझे अनुग्रहित करे
    आपको एवं आपके परिवार को क्रवाचोथ की हार्दिक शुभकामनायें!
    http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/

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  32. बहुत ही सुन्दर रचना है अमृता जी सचमुच
    बहुत बहुत बधाई हो आपको

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  33. कोई झंकार कुदरत के कण कण में गूंज ही रही है... कोई कब तक उससे बचेगा...आपकी कविता आमन्त्रित कर रही है उस अनजान लोक की यात्रा के लिये...आभार!

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  34. अम्रता जी,आपने शब्दों का संयोंजन बहुत अच्छा किया है,एक एक शब्द
    अपना भाव दर्शाते है,कुल मिलाकर आपकी रचना मुझे बहुत लगी..बधाई समय निकाल कर मेरे ब्लॉग में आइये आपका स्वागत है......

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  35. शब्दों और भावों का संयोजन....

    बेहतरीन रचना.....!!

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  36. लाजवाब कविता।
    प्रत्येक पंक्ति प्रभावशाली है।

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  37. क्यूँ भीतर- भीतर मचा हाहाकार है
    किसलिए मुझे देता कोई ललकार है
    न जाने कौन -सी सत्य की पुकार है
    संभवत: मेरे मैं की पहली झंकार है........ACHE SABDOAN KA SANGRAH.BADHAYI..........?

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  38. सुंदर कविता और सुंदर शब्द संयोजन. बधाई.

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  39. अमृता जी, आपके पोस्ट पर आना सार्थक सिद्ध होता है । यह रचना भाव-प्रवण होने के कारण अन्य रचनाओं की तरह अपना वैशिष्ट्य स्थापित करने में सर्वरूपेण एवं सर्वभावेन सफल सिद्ध हुई है । मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद ।

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  40. बहुत ही भावपूर्ण रचना,बधाई!

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  41. मेरी पोस्ट में आकार आपने जो हौसला बढाया,उसके लिए सुक्रिया आभार.....

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  42. आपकी कविता बहुत सुन्दर है.

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  43. सत्य की पुकार पर यह कैसी झंकार
    रोम-रोम में जागरण,साँस-साँस फुँफकार.
    खड़े हुए पाषाण भी , करने लगे हुंकार
    निकल गई है म्यान से,स्वाभिमानी तलवार.

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  44. अद्दुत और बहुत खूबसूरत..बेहतरीन! शानदार!!

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  45. Greetings ,

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    Regards,
    Ankush Jain

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  46. बेजोड़ रचना...बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  47. सुन्दर भाव लिए प्यारी रचना अमृता जी ...जब ह्रदय से यूं ही फव्वारे छूटते हैं तब .....मरू भूमि में भी अंकुर फूटते हैं ..बहुत खूबसूरत अहसास
    भ्रमर ५

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  48. सच है इक इक के सब छूट जाते हैं बस अंतस ही साथ देता है ... तभी ह्रदय से फव्वारे छूटते हैं ...

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  49. सुन्दर प्रस्तुति!

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  50. आपकी दार्शनिक अभिव्यक्ति अचंभित कर देती है.
    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

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  51. कौन अपनी अकुलाहट को जानता है
    काल-व्यूह से निकलने को ठानता है
    कुछ अस्पष्ट सी ध्वनि को टानता है
    परिवर्तन की आहट को पहचानता है
    sarthak post..
    jai hind jai bharat

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  52. बहुत बढ़िया रचना.. बहुत मिस किया आपकी रचनाओं को..
    ब्लॉग्गिंग से बहुत दिन दूर रहने के बाद फिर से उपस्थित हूँ..

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