Pages

Friday, July 22, 2011

पूर्णविराम

प्रायश:
मेरे पूर्णविराम का
परकाया गमन
प्रायोगिक नहीं
प्रायोजित होता है
कभी अल्पविराम में
कभी योजक चिह्न में
कभी प्रश्नवाचक चिह्न में
कभी विस्मयाधिबोधक चिह्न में
तो कभी किसी उद्धरण चिह्न में..
कभी तो नियमों के पार जाकर
अपने स्थान पर
क्रमागत बिन्दुओं को
इसतरह सजा देता है कि
उसे भरने में
मैं शून्य हुए जाती हूँ
और न जाने
कहाँ से आ जाता है
उस शून्य के भी आगे
अनंत का चिह्न......
ये कौन सी पहेली है
ये कैसा खेल है
कोई भूलभुलैया भी होता तो
पता होता कि इसी में
खोया है कहीं पूर्णविराम
या मेरा परकाया गमन
अनंत में हो जाता तो
मिल जाता पूर्णविराम.......
इस नयी-नयी काया में
आत्मा के साथ यात्रा का
हो जाता सुखद अवसान
दम साध , दम भर
कर लेती मैं आराम
पर न जाने क्यूँ
सारे चिह्न
प्रायोजित होकर
बारम्बार मेरी काया में ही
प्रवेश कर जाते हैं
मैं सोचती रह जाती हूँ कि
क्यों मेरा गमन
फिर किसी
पर काया में हो जाता है
और हर बार की तरह
एक बार फिर
मेरा पूर्णविराम
मुझसे ही
कहीं खो जाता है.

53 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.

    ReplyDelete
  2. बहुत गहन भावों को अपने मे समेटे है यह कविता।
    बेहतरीन।

    सादर

    ReplyDelete
  3. Ukt rachna mein aapki bhashayi gyan ki gahanata aur bhavanatmak parakashta spasht dikhlayi padti hai... Bahut Acchhi Rachna

    ReplyDelete
  4. मनोवैज्ञानिक भावों की अनुपम प्रस्तुति।

    ReplyDelete
  5. आपकी किसी रचना की हलचल है ,शनिवार (२३-०७-११)को नयी-पुरानी हलचल पर ...!!कृपया आयें और अपने सुझावों से हमें अनुग्रहित करें ...!!

    ReplyDelete
  6. itne gahan gahre shabdon ka chayan... per spasht suruchipurn

    ReplyDelete
  7. मेरा पूर्णविराम
    मुझसे ही

    कहीं खो जाता है ..।

    बहुत ही अच्‍छी रचना ...बधाई ।

    ReplyDelete
  8. Anant bhawon ko apne andar smete huye hai apki ye rachna...
    Jai hind jai bharat:)Anant bhawon ko apne andar smete huye hai apki ye rachna...
    Jai hind jai bharat:)

    ReplyDelete
  9. Ukt prastuti mein aapki bhashayi gyan ki gahanta aur bhawanatmak parakashtha ki spast jhalak dikhlayi padti hai.. Badhai..

    ReplyDelete
  10. बहुत सुंदर
    भावपूर्ण अभिव्यक्ति
    शुभकामनाएं

    ReplyDelete
  11. सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना लिखा है आपने! हर एक पंक्तियाँ दिल को छू गयी! इस उम्दा रचना के लिए बधाई!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

    ReplyDelete
  12. सुन्दर भावाभिव्यक्ति ||
    बधाई ||

    ReplyDelete
  13. आज 22- 07- 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


    ...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर
    ____________________________________

    ReplyDelete
  14. एक बार नहीं दो तीन बार पढ़ना पड़ता है आपकी गहन कविताओं को, अच्छी लगती हैं, परकाया प्रवेश जैसे गम्भीर विषय को आप आसानी से कविता में ले आती हैं...

    ReplyDelete
  15. और देखों न आज आपने फिर रचन तो लिख डाली पर फिर से खो दिया पूर्णविराम :)
    बहुत सुन्दर रचन दोस्त बहुत गहरे भावों को दर्शाती खूबसूरत रचना |

    ReplyDelete
  16. baut umda, bahot personal par bebak.bahot badhia

    ReplyDelete
  17. बहुत सुंदर भावपूर्ण अभिव्यक्ति...

    ReplyDelete
  18. गहनतम अभिव्यक्ति।
    ..बहुत बधाई।

    ReplyDelete
  19. बहुत ही खूबसूरती से भावो क वयक्त किया आपने..

    ReplyDelete
  20. बहुत गहन चिंतन और उसकी इतनी भावपूर्ण अभिव्यक्ति..नमन है आपकी लेखनी को. बधाई

    ReplyDelete
  21. बहुत ही परिपक्व और मझी हुई रचना। बधाई।

    ReplyDelete
  22. विराम से आगे बढ़ता सिलसिला.

    ReplyDelete
  23. मेरा गमन फिर किसी पर काया में हो जाता है
    ....मेरा पूर्ण विराम मुझ से ही कहीं खो जाता है...

    बहुत ही रचनात्मक और सुंदर पंक्तियाँ.

    ReplyDelete
  24. कविता भाव, शिल्प और गठन की दृष्टि से उत्तम कोटि की है।

    ReplyDelete
  25. बहुत खूबसूरती से लिखा है जीवन दर्शन ..

    ReplyDelete
  26. गहनतम भावों की सुन्दर प्रस्तुति.
    आपका 'तन्मय स्वरुप' दिलकश है.
    परकाया प्रवेश को फिर फिर सोचना पड़ेगा.

    भगवद्गीता(अ.१५ श.१०) में भगवान कृष्ण कहते हैं
    'उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुज्जानं वा गुणान्वितम

    विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः'

    मेरे ब्लॉग पर आपका आना अच्छा लगता है.
    नई पोस्ट पर आपका स्वागत है.

    ReplyDelete
  27. बहुत सुन्दर भावो का समन्वय।

    ReplyDelete
  28. अद्भुत कृति . पूर्णविराम कभी ना आये . आभार .

    ReplyDelete
  29. अमृता जी अपने पल्ले कुछ नहीं पढ़ा.......परकाया गमन से क्या तात्पर्य है?

    ReplyDelete
  30. गहन चिंतन, उम्दा प्रस्तुति| बधाई स्वीकार करें|

    ReplyDelete
  31. कविता का भाल जीवन के विभिन्न विंदुओं को परिभाषित करता हुआ प्रतीत होता है।सघन भावों से भरी कविता अच्छी लगी।धन्यवाद।

    ReplyDelete
  32. amrita, tum to 'tanmay' ho kar gambheer kavitaye likh rahi ho. kavita parhi, achchha laga.shubhkamanaen...

    ReplyDelete
  33. सुन्दर संवेदनशील अभिव्यक्ति...

    ReplyDelete
  34. हर तरह के ग्रामर को तोडती हुई अच्छी रचना.well said..........

    ReplyDelete
  35. एक बार फिर
    मेरा पूर्णविराम
    मुझसे ही
    कहीं खो जाता है.

    संवेदनशील अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  36. बेहद गहरे अर्थों को समेटती खूबसूरत और संवेदनशील रचना. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

    ReplyDelete
  37. एक अच्छी कविता का सृजन किया है आपने।

    ReplyDelete
  38. अमृताजी जीवन के अंतर द्वंद्व ,मानसिक कुहांसे का नया व्याकरण कोई आपसे बुनना सीखे .बेहतरीन रचना ,अपने से बाहर आने की कश - म -कश .

    ReplyDelete
  39. गहन चिंतन से उपजा नवीन सृजन ...
    बहुत लाजवाब है रचना ...

    ReplyDelete
  40. देखिये उक्ति वैचित्र्य ,दार्शनिकता और निर्वैयक्तिकता का अपना आनंद जरुर है मगर जब बहुत कुछ मांसल ,इन्द्रियगोचर विद्यमान हो तो आखिर कोई इनमें क्यों फंसे -पूरी उम्र बाकी है अभी ... :)

    ReplyDelete
  41. ये कविता जितनी बार पढता हूं, नई लगती है।

    ReplyDelete
  42. सुन्दर और दार्शनिक अंदाज की कविता बधाई

    ReplyDelete
  43. बहुत सुंदर, सशक्त भाव..!!

    ReplyDelete
  44. अत्यन्त गहन, दार्शनिक भाव और विराम चिन्हों का शाब्दिक उच्चकोटि का प्रयोग आपकी कल्पनाशक्ति की अद्भुत क्षमता का परिचायक है...
    मेरे ब्लाग पर आकर विचार प्रकट कगने के धन्यवाद...

    ReplyDelete
  45. सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ

    ReplyDelete
  46. गहन अभिव्यक्ति ...विचारणीय भाव लिए पंक्तियाँ

    ReplyDelete
  47. गहन भावों की लाजवाब प्रस्तुति
    एक-एक शब्द ....तरासे गए हीरे जैसा

    ReplyDelete
  48. Amrita,

    TEEN KAVITAYEN PARHI. NIYAT TAAP PAR BATAATI HAI KE HUM THEEK SAMAY PAR KUCHH BHI KAR SAKTE HAIN AGAR HUM CHAHEIN. UDHAM TO AAJ KAL KE ZAMANE KE BAAT HAI KI KAISE LOG APNA LAKSHYA POORA KARNA CHAAHTE HAI BINA KISSI SOCH KE KI THEEK RASTAA THEEK HAI KE NAHEIN. IS KAVITA KA ARATH MERE SE TO HAI KI HUM APNE VICHAAR KO KAYEE DHANGON SE KAH SAKTE HAIN. KAY MERA YEH SOCHNA SAHI HAI?

    Take care

    ReplyDelete
  49. मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

    ReplyDelete