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Tuesday, September 15, 2020

कल भाग गई थी कविता .......

कल भाग गई थी कविता लिपि समेत

पन्नों के पिंजड़े को तोड़कर

लेखनी की आँखों में धूल झोंककर

सारे शब्दों और भावों के साथ

शुभकामनाओं और बधाइयों के 

अत्याधुनिक तोपों से

अंधाधुंध बरसते 

भाषाई प्रेम- गोलों से

खुद को बचाते हुए

अपने ही झंडाबरदारों से

छुपते हुए , छुपाते हुए

कानफोड़ू जयकारों से

न चाहकर भी भरमाते हुए

सच में ! कल भाग गई थी कविता

आज लौटी है 

विद्रुप सन्नाटों के बीच

न जाने क्या खोज रही है .

14 comments:

  1. चलिये इसी बहाने सही आप निकल के आयीं और आपकी कविता भी एक लम्बे अन्तराल पर। शुभकामनाएं फ़िर भी हिन्दी दिवस की।

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  2. हिन्दी दिवस पर कविता का भागना ...
    आप कभी कभी आएँगी तो ऐसा ही होगा ... निरंतर रहिये .. हिन्दी दिवस की बधाई ...

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  3. हिंदी दिवस पर ही सही पर कविता लौटी है. सन्नाटा तो आपने छोड़ा हुआ था. खैर ! कलम की आँखों से धूल धो दीजिए अब.

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  4. कविता खोज रही है पांव टिकाने की तिल भर जगह,थोड़ी सी जगह मिल भर जाये वह फिर से अपना आशीष बरसाएगी

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  5. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 17.9.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

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  6. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १८ सितंबर २०२० के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  7. वर्षों बाद भी आपके लेखनी की रफ़्तार सटीक है
    साधुवाद

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  8. शुभकामनाओं और बधाइयों के
    अत्याधुनिक तोपों से
    अंधाधुंध बरसते
    भाषाई प्रेम- गोलों से - वर्तमान की सच्चाई ...

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  9. आज लौटी है

    विद्रुप सन्नाटों के बीच

    न जाने क्या खोज रही है - - नमन सह।

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  10. बहुत सुन्दर ..बहुत दिनों के बाद लौटी है कविता आपके
    सृजन के रूप में ।

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  11. क्या करे बेचारी ..भागना है लाचारी
    संवेदनहीन समाज में रुके भी कहाँ...
    बहुत ही सुन्दर... लाजवाब।

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  12. बहुत सुन्दर... शीर्षक बड़ा ही आकर्षक बन पड़ा है...

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  13. khoj toh liye kavita ne शब्द - प्रसुताओं के हो रहे हैं पाँव भारी se lekar शब्दों के घास , फूस की खटमिट्ठी खेती हूँ ..... takk ke anek vishay upvishay aur unmein jeewan ke aashay sanshay aadi aadi

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