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Friday, July 21, 2017

प्रासंगिकता ......

सूक्ष्म से
सूक्ष्मतर कसौटी पर
जीवन दृष्टि को
ऐसे कसना
जैसे
अपने विष से
अपने को डसना ....
गहराई की
गहराई में भी
ऐसे उतरना
जैसे
अपनी केंचुली को
अपनापा से कुतरना .....
महत्वप्रियता
सफलता
लोकप्रियता
अमरता आदि को
रेंग कर
ऐसे
आगे बढ़ जाना
जैसे
जीवन - मूल्यों की
महत्ता को
प्रेरणा स्वरूप पाना .....
जैसी होती है
कवित्त - शक्ति
वैसी ही
होती है
अंतःशून्यता की
भाषिक अभिव्यक्ति .....
जब
प्रश्न उठता है
कि प्रासंगिक कौन ?
तब
कवि तो
होता है मौन
पर कविता तो
हो जाती है
सार्वजनिक
सार्वकालिक
सार्वभौम .

14 comments:

  1. बहुत सही और सटीक कहा आपने.
    रामराम
    #हिन्दी_ब्लॉगिंग

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  2. वाकई , बहुत खूब !

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  3. कवि तो
    होता है मौन
    पर कविता तो
    हो जाती है
    सार्वजनिक
    सार्वकालिक
    सार्वभौम

    कवि और कविता के उद्देश्य को बेहतर अभिव्यक्ति दी है आपने इन शब्दों के माध्यम से.

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  4. जैसी होती है कवित्त शक्ति
    वैसी ही होती है अंतः शून्यता की
    भाषिक अभिव्यक्ति
    कवि और कविता के मर्म को लिख दिया है .

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  5. गहराई की
    गहराई में भी
    ऐसे उतरना
    जैसे
    अपनी केंचुली को
    अपनापा से कुतरना .....

    बहुत ही कठिन अभिव्यक्ति है लेकिन स्वभाविक ही संप्रेषित हुई है. 'अंतः शून्यता की भाषिक अभिव्यक्ति' मर्म है कविता का. बहुत ही सुंदर.

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    1. बकवास।अपना ही तो बिचार है। जैसा सोचें।

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  6. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " "कौन सी बिरयानी !!??" - ब्लॉग बुलेटिन , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  7. सूक्ष्म जीवन दृष्टि अति प्रभावशाली

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    1. कोई हलन नहीं कोई चलन नहीं वाली कविता पर मेरी टिप्पणी प्रकाशित नहीं हुई. कृपया देख लें.

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  8. कविता में यह क्षमता है -वह मन का संस्कार करती है.

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  9. बहुत सुंदर और सटीक दर्शन..कवि जब मौन होता है तभी कविता जन्मती है..

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  10. कविता कुखर है इसलिए समय के साथ आगे निरंतर बढती रहती है ...

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  11. वाह ... गहं और सूक्ष्म भाव

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