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Monday, February 24, 2014

उसकी मुक्ति तो...

वह प्रकृति के
ज्यादा करीब है
थोड़ी प्राकृतिक है...
शास्त्रों/सिद्धांतों से
थोड़ी दूर है
कम शिक्षित है...
बुद्धि की भाषा
पढ़ना नहीं चाहती
कम बौद्धिक है...
तर्को/झंझटों से
भागती रहती है
कम सभ्य है...
इसलिए उसे
रोना होता है
तो रो लेती है
हॅंसना होता है
तो हँस लेती है
थोड़ी जंगली है...
बोलना होता है
तो बोल देती है
चुप रहना होता है
तो चुप रहती है
थोड़ी मूर्ख है...
सामाजिकता के हर
कठोर नियम को
बार-बार तोड़कर
वह मुक्त होती है
व अप्राकृतिक सभ्यता को
बार-बार अंगूठा दिखा
सबको मुक्त करती है
क्योंकि वह मुक्त है ...
जो बँधे हैं
बाँधते रहे उसे
अपने किसी भी
सही-गलत उपाय से
पर उसकी मुक्ति तो...

22 comments:

  1. .......सम्‍भव नहीं लग रही।

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  2. प्रकृति अन्ततः स्वयं को स्थापित कर लेती है।

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन तीसरी पुण्यतिथि पर विशेष - अंकल पई 'अमर' है - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. क्या आज के हालात में यह संभव दिखायी देता है? सार्थक प्रश्न उठाती बहुत प्रभावी रचना...

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  5. सामाजिकता की चादर वास्तविक भावनाओं को ढक जो देती है !

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  6. उसकी मुक्ति .... उसका चक्रव्यूह है
    जहाँ वह मासूमियत के साथ
    बंधनों को खोल रही है

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  7. Uski mukti to tai hai ....jo man se mukt ho use koi nahi baandh sakta .....

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  8. उसकी मुक्ति तो किसी और को मुक्त कर देने में है..दरअसल उसके भीतर मनमुक्त महासागर है.. आँधियों में भी मासूम विह्वल भाव बिखेरती हुई...मौन..सहज..

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  9. मन से मुक्त वो अपनी दुनिया की मालकिन है भले सामाजिकता का बंधन उसे बार बार बांधे.........सुन्दर रचना ..........

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  10. उसकी मुक्ति तो अपने साथ - साथ सबको मुक्त करने में है ... असम्भव है उसे बांध पाना...

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  11. Maatrtwa watsalya mayi swaroop to hoti hi aisi hai.

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  12. निश्चित है...

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  13. वही कुछ इंसानी गुण हैं, पिंजरा है, सलीब है....

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  14. कैसा संयोग है इसी बंधन पर आज सुबह फेसबुक पर यह अपडेट डाला -
    कहाँ तो मनुष्य को चिर स्वतंत्र होना था और वह बंध गया जीवन के अनेक बंधनों से -माया मोह से ,पत्नी परिवार से ,देश काल से ,नाते रिश्तेदार से नौकरी -सेवकाई से और आज भी उसके तमाम अविकसित जैवीय विकास सहयात्री मुक्त स्वछंद जीवन बिता रहे हैं जंगलों में -अहा वन्य जीवन

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  15. सहजता और सरलता कि प्रतिमूर्ति

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  16. सभ्यता की बलिवेदी पर चढ़ती है प्राकृतिक मंशाएं !

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  17. संवेदना से लवरेज प्रस्तुति।अप्रतिम । मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा।

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  18. उसकी मुक्ति गर चाहें तो संभव है। क्यूंकी असंभव में भी संभव छिपा होता है।

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  19. स्वयं सिद्ध है

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  20. उसकी मुक्ति तो सनातन है. वह खुद मुक्ति की परिभाषा है.

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