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Sunday, October 13, 2013

हे परमेशानि !

मेरे रोम-रोम से
तेरा आरव रँभित
रंच मात्र न
कोई रव दूजा हो
हे परमेशानि !
ऐसे तू मुझसे
प्रकट हो कि
मेरा हर कृत्य ही
तेरी पूजा हो !

मेरे आकुल ताप में
तेरी मधुर कल्पना हो
व उद्वेलित मन में
बस प्रिय भावना हो
और विह्वल तिक्तता में भी
तेरी आलंबित धारणा हो ......

कोई क्षुद्रोल्लास ही
जीवन-ध्येय नहीं हो
व कभी उग्राह्लाद
प्राप्य विधेय नहीं हो
और क्षणिक हर्षोल्लाद में
कुछ भी हेय नहीं हो ........

तेरे दुर्लभ योग की
प्रबल अभिलाषा हो
व गरिमान्वित गर्जन से
बँधती हर आशा हो
और तेरे रहस्यों को बस
पीने की उत्कट पिपासा हो .......

हर रुधिर में रंजित
तेरा आलोड़न हो
व श्वास-श्वास में
एक ही आन्दोलन हो
और विभोर तन-मन में
तुझसे दृढ आलिंगन हो .......

तेरी गति-कंपन से
प्राणों में कलरव
कल-कल कर
सुप्तराग सा गूँजा हो
हे परमेशानि !
ऐसे तू मुझसे
प्रकट हो कि
मेरा हर कृत्य ही
तेरी पूजा हो !


27 comments:

  1. ''कोई क्षुद्रोल्लास ही
    जीवन-ध्येय नहीं हो
    व कभी उग्राह्लाद
    प्राप्य विधेय नहीं हो
    और क्षणिक हर्षोल्लाद में
    कुछ भी हेय नहीं हो ........''

    उत्कृष्ट काव्य पंक्तियां। जीवन में अगर कुछ पाना है तो नियम के साथ चलना और रहना चाहिए। आपके कविता के उपर्युक्त काव्य पंक्तियों मे व्यक्ति को क्या करना चाहिए इसका मार्गदर्शन है।

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  2. आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [14.10.2013]
    चर्चामंच 1398 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें |
    रामनवमी एवं विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाओं सहित
    सादर
    सरिता भाटिया

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  3. निश्चित रुप से इस कविता गति-कंपन ने प्राणों में कलरव मचा दिया है और आशा व निष्‍ठा का ऐसा अनूठा जादू जगा दिया है कि संगीत आरव प्राणों से आलिंगनबद्ध हो गया है।

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  4. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति,विजयादशमी (दशहरा) की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  5. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति हैअमृता जी ,विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  6. कोई क्षुद्रोल्लास ही जीवन-ध्येय नहीं हो.....पंक्तियाँ बहुत कुछ कह रही है..अनंत उम्मीदों का प्रकाश पुंज हमारे आसपास है .... हम कैसे इनको अपने अन्दर समाहित करे ? इसी का मार्ग दिखाती है ये उम्दा पोस्ट...

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  7. सच में समय विशेष ही क्यों ....अगर हर क्षण, हर कर्म में वही निष्ठा व समर्पण रखें तो भव-सागर, सुख-सागर हो जाये .

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  8. बहुत सुन्दर .
    नई पोस्ट : रावण जलता नहीं
    नई पोस्ट : प्रिय प्रवासी बिसरा गया
    विजयादशमी की शुभकामनाएँ .

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  9. विजयादशमी की अनंत शुभकामनाएं

    बहुत सुंदर
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बधाई

    आग्रह है- मेरे ब्लॉग में भी समल्लित हों
    पीड़ाओं का आग्रह---
    http://jyoti-khare.blogspot.in


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  10. यही रूप ध्यान की भाव -अवस्था है। राधा -महाभाव है। बेहद सुन्दर प्रस्तुति।

    सब साधन जनु देह सम ,रूप ध्यान जनु प्रान ,

    खात ,गीध अरु स्वान जनु ,कामादिक शव मान (भक्ति शतक १० )


    यदि सभी प्रकार के ध्यान ,योग ,मनन को शरीर मेडीटेशन कहा जाए तब रूप ध्यान को ध्यान -मनन का प्राण (प्राण वायु ) माना जाएगा। जिसप्रकार निष्प्राण शरीर स्वानों और गिद्धों के खाद्य के समान है इसी प्रकार रूप ध्यान से शून्य साधना को फिर काम ,क्रोध ,लोभ -लालच ,और ईर्ष्या खा जाती है।

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  11. मेरा हर कृत्य ही तेरी पूजा हो। जब कर्ता का भाव ही मिट गया तो अहंकार कहाँ रहता !
    बहुत खूब !

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  12. आदरणीया अमृता जी ..कोई क्षुद्रोल्लास ही
    जीवन-ध्येय नहीं हो
    व कभी उग्राह्लाद
    प्राप्य विधेय नहीं हो
    और क्षणिक हर्षोल्लाद में
    कुछ भी हेय नहीं हो .....वाकई लाजबाब भावनाओं को व्यक्त करती शानदार रचना के हार्दिक बधाई ...

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  13. इस पोस्ट की चर्चा, मंगलवार, दिनांक :-15/10/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" चर्चा अंक -25 पर.
    आप भी पधारें, सादर ....राजीव कुमार झा

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  14. सुन्दर रचना दशहरे की शुभकामनायें।

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  15. सुंदर समर्पण भाव अमृता जी ....!!

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  16. तेरी गति-कंपन से
    प्राणों में कलरव
    कल-कल कर
    सुप्तराग सा गूँजा हो
    हे परमेशानि !
    ऐसे तू मुझसे
    प्रकट हो कि
    मेरा हर कृत्य ही
    तेरी पूजा हो !
    बहुत सुन्दर !

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  17. सुंदरतम रचना, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  18. ये परमेशानि ही योगमाया है कृष्ण की दिव्य शक्ति (superior energy ),दुर्गा ,सीता ,मीनाक्षी ,पार्वती ,राधा ,काली ,...... सब इसी योगमाया का प्रगटीकरण हैं अति सुन्दर भाव गंगा भक्तिरस की बहा दी आपने।

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  19. रोंगटे खड़े हो गए इसे पढ़ते हुये.... बेहतरीन.....

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  20. गज़ब की शब्द सामर्थ्य है भाई :)
    बधाई !

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  21. अद्भुत शब्द सामर्थ्य … अति सुन्दर

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  22. तेरे दुर्लभ योग की
    प्रबल अभिलाषा हो
    व गरिमान्वित गर्जन से
    बँधती हर आशा हो
    और तेरे रहस्यों को बस
    पीने की उत्कट पिपासा हो ....
    ईश्वर को जानने ओर उसको प्रापर करने की प्रबल पिपासा ही आशा को बांधे रखती है ... मधुर काव्य ... अतुनीय शब्द क्षमता से परिपूर्ण रचना ...

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  23. This comment has been removed by the author.

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  24. अपने अंतर की शक्ति की पूजा का ओजस्वी रूप है इस कविता में. बहुत सुंदर.

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