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Thursday, December 13, 2012

मैं तुम्हें दे दूँ...


ये किनारा भी , मैं तुम्हें दे दूँ
वो किनारा भी , मैं तुम्हें दे दूँ
ये गझिन गारा भी , मैं तुम्हें दे दूँ
और ये धवल धारा भी , मैं तुम्हें दे दूँ

मेट कर अपनी बनावट , मैं ढह जाऊँ
तेरे अपरिमित ज्वार को , मैं सह जाऊँ

ये तनु तरलता भी , मैं तुम्हें दे दूँ
ये मृदु मधुरता भी , मैं तुम्हें दे दूँ
ये चटुल चपलता भी , मैं तुम्हें दे दूँ
और ये उग्र उच्छ्रिंखलता भी , मैं तुम्हें दे दूँ

तेरी हर साँस में ,  ऐसे मैं बह जाऊँ
हर साँस की गाथा , हर किसी से कह जाऊँ

ये परिप्लव प्राण भी , मैं तुम्हें दे दूँ
ये निरवद्द निर्वाण भी , मैं तुम्हें दे दूँ
ये अमित अभिमान भी , मैं तुम्हें दे दूँ
और ये अमर आत्मदान भी , मैं तुम्हें दे दूँ

तनिक भी इस मैं में , न मैं रह जाऊँ
बस और बस तुम्हीं में,  मैं सब गह पाऊँ .



गझिन - गाढ़ा और मोटा
गारा - मिट्टी( जैसे नदी के तल की )
तनु - सुकुमार
चटुल - चंचल
परिप्लव - तैरता हुआ , बहता हुआ
निरवद्द - दोषरहित , विशुद्ध

40 comments:

  1. बहुत सुन्दर समर्पण....
    पूर्णता इसी में है...

    अनु

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  2. तनिक भी इस मैं में , न मैं रह जाऊँ
    बस और बस तुम्हीं में, मैं सब गह पाऊँ .

    ...सम्पूर्ण समर्पण की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति..

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  3. समर्पण की चरम सीमा... अति सुन्दर शब्द चयन ने चार चाँद लगा दिए हैं... आभार

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  4. ये गझिन गारा भी , मैं तुम्हें दे दूँ
    अबकी बार कुछ कठिन शब्द हैं जो समझ मे नहीं आ रहे हैं ....आपका कवि बिना समझे रह नहीं सकते ...कृपया कठिन शब्दों के अर्थ दे दें ....शायद और पाठक भी यही कहें ....
    ऐसे रचना तो लाजवाब है ही ...उत्कृष्ट समर्पण भाव के साथ .... .....

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    1. आपकी कविता बिना समझे नहीं रह सकते ......ऊपर गलत छप गया है ...क्षमा कीजिएगा ....

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    2. अनुपमा जी , मुझे ही शब्दों का अर्थ देना चाहिए था . कविता के भाव में डूबते-उतराते भान ही नहीं रहा . अच्छा लगा आपका इसतरह से कहना . हार्दिक आभार .

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  5. बहुत ही अलबेली कविता .बिलकुल अलग शैली में लिखी गयी |

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  6. मेट कर अपनी बनावट , मैं ढह जाऊँ
    तेरे अपरिमित ज्वार को , मैं सह जाऊँ

    गजब का समर्पण और निष्ठां ..

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  7. तनिक भी इस मैं में , न मैं रह जाऊँ
    बस और बस तुम्हीं में, मैं सब गह पाऊँ ....

    नदी का समुन्द्र में समावेश हो जाना ... इसीको कहते हैं ....

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  8. तेरी हर साँस में , ऐसे मैं बह जाऊँ
    हर साँस की गाथा , हर किसी से कह जाऊँ

    समर्पण ही प्रेम है..
    बहुत सुंदर।।।

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  9. सब चाहूँ और सब दे दूँ

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  10. prem ,chah aur samrpan ki adbhut rachna..

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  11. ये अमित अभिमान भी , मैं तुम्हें दे दूँ
    और ये अमर आत्मदान भी , मैं तुम्हें दे दूँ

    वाह ...बहुत सुन्दर समर्पण

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  12. नैसर्गिक प्रेम की अभिव्यक्ति, बहुत बढ़िया.

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  13. सुन्दर भाव और शब्द....बहुत अच्छी कविता.

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  14. फ़ज़ा की आँख भर आई हवा का रंग उड़ा
    सुकूत-ए-शाम ने चुपके से तेरा नाम लिया
    हर एक ख़ुशी ने तेरे गम की आबरू रखी
    हर एक ख़ुशी से तेरे गम ने इंतकाम लिया
    -------------------------------

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  15. पूर्ण समर्पण की चाह ... खुद को मिटा कर ही पूरी होती है .... बहुत सुंदर रचना

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  16. प्रेम में प्रेम पूर्वक समर्पण भाव बिखेरती उम्दा प्रस्तुति
    अरुन शर्मा
    www.arunsblog.in

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  17. यह सर्वस्व देकर ही तो सम्पूर्ण परिपूर्णता ,संतृप्ति को प्राप्त कर लेना होता है न!
    गहन प्रेम ,आध्यात्म से भावापूरित अभिव्यक्ति!

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  18. समर्पण और प्यार का बहुत बढिया,उम्दा सृजन,,,, बधाई अमृता जी,,

    recent post हमको रखवालो ने लूटा

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  19. क्या लिखें? समझ ही नहीं आ रहा.... :) सभी कुछ तो लिख गया... अब बचा क्या ? :)
    समर्पण हो तो ऐसा...
    ~सादर!!!

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  20. सारी कविता मूलतः समर्पण भाव को ले कर चली है. ये पंक्तियाँ कुछ और भी कह जाती हैं
    तेरी हर साँस में, ऐसे मैं बह जाऊँ
    हर साँस की गाथा, हर किसी से कह जाऊँ

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  21. This comment has been removed by the author.

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  22. मेट कर अपनी बनावट , मैं ढह जाऊँ
    तेरे अपरिमित ज्वार को , मैं सह जाऊँ.....
    अच्छा बन पडा है ...

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  23. एक लय में बंधी ये कविता बहुत सुन्दर बन पड़ी है.......शानदार ।

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  24. Amrita,

    SACHE PREM KI BHAWNA THEEK KAHI AAPNE, YEH EK PREMI KE LIYE YAA APNE BACHE KE LIYE HO SAKTI HAI.

    Take care

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  25. समर्पण की सुन्दर चाह..बहुत सुन्दर..

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  26. Beautiful :)

    http://www.iredeem.blogspot.in/

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  27. तनिक भी इस मैं में , न मैं रह जाऊँ
    बस और बस तुम्हीं में, मैं सब गह पाऊँ .

    सुंदर गीत. अदभुत भाव.

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  28. समर्पण की पराकाष्ठा जैसे प्रेम का सागर उमड़ आया हो ...
    बहुत खूब ...

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  29. तनिक भी इस मैं में , न मैं रह जाऊँ
    बस और बस तुम्हीं में, मैं सब गह पाऊँ .

    सुंदर....

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  30. shandaar prastuti...aapkee bahurangi rachnaaon ka ek shandar rang...sadar badhayee

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  31. काबिल-ए-तारीफ समर्पण। स्वागत है।

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