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Monday, September 19, 2011

गवारा

काँपी धरती
ह्रदय भी काँपा
मौत के ख़तरे को
हम सभी ने भाँपा
तन-मन जोर से डोला
फिर सच ने
वही अपना राज़ खोला
जिस घर के लिए
दुश्मन हुए भाई
नाते-रिश्तों की
खूब कीमत लगाई
या आजीवन खर्च किया
खून-पसीने की
गाढ़ी कमाई
कौन सा किया नहीं
तेरी - मेरी
उसी घर को
छोड़ने में तनिक भी
लगाई नहीं देरी
जान बचा भाग चले
खड़े हो गए
आसमान तले
ओह ! कैसा उभरा
दृश्य निराला
उस अपने घर में
एक पल किसी को
रहना हुआ न गवारा .
 
 
 
भूकंप को मैंने इतनी अच्छी तरह महसूस किया कि पोस्ट डालने से खुद को रोक नहीं पायी .

44 comments:

  1. आपने तो अपनी कविता में ही भूकंप ला
    दिया अमृता जी.आपकी अंतिम पंक्तियाँ
    न पढता तो हैरान होता मैं कि सब कुछ
    क्यूँ हिल रहा है.

    वाह! बहुत बहुत आभार जी.

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  2. बहुत सशक्त अभिव्यक्ति..रचना के भावों ने अंतस को भूकंप से ज्यादा झकझोर दिया..

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  3. प्रलय में भी सच को ढूंढ़ निकाला | कमाल ..कमाल..कमाल..

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  4. सार्थक व सटीक लेखन ।

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  5. तेरी-मेरी करते हुए यदि धरती काँपने लगे तो तेरी-मेरी को भूल कर मानव जान बचाने भगता है. धरती के कांपने से पहले वह किसी के दिल को कितना कँपा रहा था उसे याद नहीं रहता.

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  6. ह्र्दय की गहराई से निकली अनुभूति रूपी सशक्त रचना

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  7. भूकंप का सटीक वर्णन सच्चाई से कही गयी बात

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  8. बहुत खूब कहा आपने
    भूकंप को भी हिला दिया आपने
    कविता करती है सच्चाई को बयां
    एस यादे छोड़ जाती है दिल पर कदमो के निशान ........

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  9. bahut badi sachchai harday ki gahan anubhooti vaykt ki hai aapne.jindgi bhar kis liye liye laden jab ek kafan hi saath jaana hai.

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  10. भूकंप से उभरे दृश्य को आपने ख़ूबसूरती से उकेरा है.
    मकान से ज़्यादा जान जरूरी है.

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  11. ह्र्दय की गहराई से निकली, सार्थक व सटीक रचना...

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  12. मानव चाहे जितनी वैज्ञानिक उन्नति कर ले परंतु उसे प्रकृति के सामने झुकना ही पड़ेगा। वस्तुतः प्रकृति के नियमानुसार आचरण करना ही धर्म है किन्तु पोंगा-पंडितों ने अधर्म और अज्ञान को धर्म के जामे मे परोस रखा है जिस कारण झगड़े-टंटे खड़े होते हैं। ऐसी घटनाएँ याद दिलाती हैं कि अब भी अधर्म को छोड़ कर वास्तविक धर्म को अपना लिया जाये ।

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  13. दृश्य निराला
    उस अपने घर में
    एक पल किसी को
    रहना हुआ न गवारा .

    यह प्राकृतिक आपदा वास्तव में हिला कर रख देती है. मन की भावनाओं को खूबसूरती से रखा है. बधाई.

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  14. कुदरत ही दिखाती है आईना !बहुत बढ़िया प्रतीकात्मक प्रस्तुति .

    सोमवार, १९ सितम्बर २०११
    मौलाना साहब की टोपी मोदी के सिर .

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  15. dil se nikli hai yeh udgar .............bahut hi sarthak rachna

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  16. मार्मिक अभिव्यक्ति!!

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  17. सशक्त अभिव्यक्ति...बहुत सुंदर

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  18. कभी अपने भी पराये हो जाते है, अपना घर भी काटने को दौड़ता है

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  19. सार्थक व सटीक लेखन| धन्यवाद|

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  20. मैं भी एक पल डर गया था जब मुझे खबर मिली...सही बात है भूकंप में अगर अपने खून पसीने से बनाय घर को गिरते देखने से ज्यादा दुखद और क्या हो सकता है..

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  21. आपबीती ही इतनी सटीकता दर्शा सकती है...........कुछ दिनों पहले यहाँ दिल्ली में भी रात हमने महसूस किया भूकंप.........ईश्वर इन सब आपदाओ से बचाए सबको.......आमीन

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  22. भूकम्प का हल्का असर ऊपरी असम में भी हमने महसूस किया, घर से निकल आए थे पर जिस शिद्दत से आपने इस अनुभव को लिखा है काबिले तारीफ है... आभार!

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  23. प्राकतिक आपदा जब आती है इंसान सब कुछ भूल जाता है .. जान की परवा करता है ... पर अच्छे समय में उसको याद नहीं करता ...
    सार्थक लेखन आपका ..

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  24. भोगा यथार्थ हम भूल जाते है . सब माया है .

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  25. बड़ी सामयिक और सटीक पोस्ट ,वाह.

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  26. सशक्त अभिव्यक्ति.....

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  27. ओह ! कैसा उभरा
    दृश्य निराला
    उस अपने घर में
    एक पल किसी को
    रहना हुआ न गवारा ...


    अमृता जी हमने आपकी हरेक रचना में भूकंप से झटकों को महसूस किया है.. यह झटका भी बहुत जबर्दस्त रहा.. आभार..

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  28. न घर तेरा न घर मेरा ,चिड़िया रैन बसेरा !

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  29. बहुत ही सुंदर।
    सामयिक विषय पर गंभीर चिंतन

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  30. हाँ ज़िन्दगी भर प्यारी रही चीज़ें जान के वक़्त मामूली हो जाती हैं..

    *पोस्ट के नाम को सही करके "गंवारा" कर दें..

    आभार
    तेरे-मेरे बीच पर आपके विचारों का इंतज़ार है...

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  31. काँपी धरती
    ह्रदय भी काँपा
    मौत के ख़तरे को
    हम सभी ने भाँपा

    very true....

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  32. यथार्थ का मार्मिक चित्रण ....
    वास्तव में बड़ी हृदयविदारक घटना घटित हुई |

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  33. सबसे पहले जीवन... यथार्थ यही है...
    सार्थक रचना...
    सादर...

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  34. जान है तो जहान है...

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  35. जान है तो जहान है:)...भूकंप के एक मानवीय पहलू को खूब उभारा आपकी इस कविता ने ....साधुवाद !

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  36. अद्भुत रचना भूकंप का लाइव टेलीकास्ट कहूँगा

    जिस घर के लिए लोगों ने कितने प्रपंच किये
    उसे ही छोड़ भागे अपनी जान बचाने के लिए
    लोग अब भी उस बात में यकीं करते हैं
    जान है तो जहान है....

    लेकिन जान बच गयी
    तो लौट के बुद्धू को घर में आना ही था
    फिर वाही जोड़-तोड़ और छल-प्रपंच वाली जिंदगी का बोझ
    अपने कंधों पर उठाने के लिए...................

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